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Thursday, August 1, 2024

तारिक का सूरज


तारिक का सूरज एक ऐसी कहानी है जो कल्पना के कैनवास पर अपने मन की दुनिया का एक कोना गढ़ती है। ऐसा कोना जहां रोशनी तनिक अधिक है। तारिक का सूरज दुनिया को थोड़ा ज़्यादा रोशन करती है।

कहानी कुछ यूं है कि तारिक को भी बाकी बच्चों की तरह खेलना बहुत पसंद है और उसका खेलना निर्भर है दिन पर। सूरज डूबा, रात हुई और खेल बंद। शाम होते ही अम्मी की पुकार कि तारिक शाम हो गयी आ जाओ, पढ़ाई करो, खाना खाओ सो जाओ के अनकहे निर्देश कहानी में हैं जो तारिक को खास पसंद नहीं। वो तो रात में भी खेलना चाहता है। इसलिए उसे रात में सूरज की कमी खलती है। अब तारिक कर भी क्या सकता है। एक रोज यूं ही वो कागज पर गोचागाची करते हुए सोचने लगा कि काश रात में भी सूरज उगता तो उसे खेलने को और समय मिलता। सोचते-सोचते तारिक कागज पर सूरज बना देता है और वो सूरज रात को चमकने लगता है। यही है इस कहानी की दुनिया।

तारिक का सूरज पढ़ते हुए हम कल्पना की ऐसी दुनिया में जा पहुँचते हैं जहां दुनिया के सारे बड़े और समझदार लोगों को पहुँच ही जाना चाहिए। क्योंकि असल में तो हम सब के भीतर भी एक तारिक है, जो कहीं खो गया है।

कल्पना, तर्क और संवेदनशीलता के बीच का समन्वय बनाती यह बाल कहानी बच्चों के लिए कल्पना के नए द्वार खोलती है। संवेदना के ऐसे महीन रेशे हैं इस कहानी में कि सूरज रात को उगे तो किसी को परेशानी भी न हो। तो कैसे सब संभाल लिया जाय सब यहाँ काम आती है तारिक की तरकीब।

किसी भी मनःस्थिति में पाठक इस कहानी के पन्ने पलटें कहानी से गुजरते हुए एक खामोशी से भर उठेंगे। ऐसी खामोशी जो दुनियादारी की तमाम पेचीदीगियों से दूर ले जाती है।

इस छोटी सी कहानी में बड़ी से दुनिया के तमाम बड़े-बड़े सवालों के जवाब मिलते दिखते हैं। जितनी बार इस कहानी को पढ़ते हैं एक संवरी हुई दुनिया का ख़्वाब मुस्कुराता नज़र आता है।

नन्हा तारिक रात में भी खेलने की ललक में अपने कागज पर बनाए सूरज को सेम की बेल पर टांग देता है। बेल चढ़ जाती है आम के पेड़ पर और उसका सूरज दिप दिप करने लगता है। तारिक की दुनिया में अब रात में भी सूरज उगने लगता है।

तर्क कहता है कि भला रात को भी कहीं सूरज उगता है? लेकिन कल्पना के आकाश पर क्या नहीं हो सकता। पिछले दिनों आई फिल्म ‘स्काई इज़ पिंक’ का एक संवाद याद आता है जिसमें माँ अपने बच्चे से कहती है, ‘अगर तुम्हारा स्काई पिंक है तो स्काई का कलर पिंक ही है। तुम्हें किसी के भी कहने से अपने स्काई का रंग बदलने की जरूरत नहीं है।‘

शिक्षक जब बच्चों को कल्पना और सृजनात्मक होने के अवसर देते हैं तब भी उसमें काफी दीवारें खड़ी होती हैं जो सामाजिक संरचना के तमाम कारणों ने मिलकर बनाई हैं जो खुलेपन को भी खुलने नहीं दे पाती। ऐसे में यह कहानी बताती है कि इस कहानी और ऐसी तमाम कहानियाँ, कक्षा में मौजूद बच्चों के जीवन के अनुभवों को किस तरह पिरोना है, किस तरह उनका हाथ थामकर आगे बढ़ना है।

बात सिर्फ तारिक के सूरज के रात में भी उगने तक सीमित नहीं रहती है बल्कि उल्लू की उस परेशानी तक जा पहुँचती है जब रात में उगे सूरज के कारण उल्लू जो रात में खाने की तलाश में निकलता है परेशान होकर तारिक की खिड़की पर जा बैठता है।

मासूम तारिक खुद के खेलने के लिए रात में सूरज तो चाहता है लेकिन वो यह भी नहीं चाहता कि उल्लू भूखा रहे। वह उसे खाने के लिए दूध रोटी देता है। अब यहाँ ठहरकर सोचने की बात यह है कि क्या यह सिर्फ उल्लू की बात है, उसकी भूख की बात है। तारिक का उसे दूध रोटी देना कितनी बड़ी रेंज खोलता है मासूमियत का हाथ थामे इस दुनिया को संवार देने की।

उल्लू का या कहना कि ‘लेकिन मैं तो कीड़े खाता हूँ’ तारिक को सोचने पर मजबूर कर देता है। खुद के लिए कुछ चाहना क्या सिर्फ खुद के लिए कुछ चाहना भर होना चाहिए। सवाल और जवाब दोनों इस नन्ही कहानी के बड़े से फ़लक में समाये हैं।

रात को भी तो परेशानी है न सूरज के रात में उगने से। वो हवा से शिकायत करती है। हवा समझती है उसकी बात।

ये जो एक-दूसरे को समझना, अलग होना स्वभाव में फिर भी सहगामी होना अलग-अलग होकर भी साथ मिलकर सुंदर दुनिया को बनाने में, बचाने में अपनी भूमिकाओं को निभाना कितना जरूरी है इसकी कहन है कहानी।

यह कहानी शिक्षकों को ढेर सारे अवसर उपलब्ध कराती है। वे इस कहानी के बहाने बच्चों के मन की दुनिया में क्या-क्या चलता है, कैसे वो सोचते हैं, क्या हो अगर जब वो सोचते हैं वो हो जाए तो जैसे बिन्दुओं पर चर्चा कर सकते हैं, उन्हें सोचने, तर्क करने, कल्पना के आसमान में ऊंची उड़ान लेने को मुक्त कर सकते हैं।

‘इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है...’ जैसे नीरस हो चुके वाक्य से दूर अगर इस कहानी के बारे में एक लाइन में कहें तो यह कहानी बच्चों को मजेदार लगने वाली और अपनी सी लगने वाली कहानी है।

दिन के सूरज में तारिक के सूरज की भी रोशनी है यह पंक्ति हम सबके हिस्से की पंक्ति है। हम सबका होना कहाँ-कहाँ शामिल है, कहाँ-कहाँ खिल रहा है। हमारे होने ने क्या इस दुनिया को जरा भी बेहतर बनाने में कोई भूमिका निभाई है। अगर नहीं तो सोचने की ओर इशारा करता है तारिक का सूरज।

लेखिका शशि सबलोक ने क्या ही तरल और सरल गद्य का प्रयोग इस कहानी में किया है। कम शब्दों के उपयोग के साथ कैसी एक बड़ी दुनिया में गोता लगाया जाता है यह इस कहानी में देखने को मिलता है।

तविशा सिंह ने सुंदर चित्र बनाए हैं। उन्होंने कहानी के मर्म को जस का तस पकड़ा है और कहानी के चित्र वैसे ही बनाए हैं जैसे तारिक ने बनाए हों। नन्हे मासूम हाथों की लकीरों की छुअन महसूस होती है इसमें। अनगढ़पन का भी एक रंग होता है उसकी भी एक खुशबू होती है लेकिन उसका उपयोग कम ही लोग कर पाते हैं। तविशा इन चित्रों को बनाते हुए सीधे तारिक के मन की दुनिया में प्रवेश करती हैं और धीरे से उनकी उँगलियाँ तारिक की उँगलियाँ होने लगती हैं। कहानी के चित्र कहानी का विस्तार हैं। रंगों और लकीरों का लिखी गयी कहानी से अच्छा सामंजस्य है।

तक्षशिला के अंतर्गत जुगनू प्रकाशन ने इसे प्रकाशित किया है।

शिक्षकों को इस कहानी के जरिये कक्षा में काम करने के तमाम अवसर नज़र आएंगे। इस कहानी को बार-बार पढ़ने की जरूरत है। हर बार कुछ नयी समझ नए एहसास की परतें खुलती हैं। पढ़ते हुए हमें महसूस होगा कि आसमान में जो सूरज है उसमें तारिक के सूरज की रोशनी तो शामिल है ही थोड़ी सी हमारे मन के रोशन कोनों की खुशबू और चमक भी शामिल है।

-प्रतिभा कटियार

Friday, May 5, 2023

रिश्ता बचाने से ज्यादा जरूरी है ज़िन्दगी बचाना


- प्रतिभा कटियार
टूटना हर हाल में बुरा होता है. कोई भी रिश्ता नहीं टूटना चाहिए लेकिन रिश्ते के न टूटने की कीमत व्यक्ति का टूटना तो नहीं हो सकता. इसलिए जब रिश्तों के अंदर इन्सान मरने लगे, जज्बात मरने लगें तो जरूरी है रिश्ते की दहलीजों से पार निकलना और खुद को बचाना. लेकिन अब भी यह समाज सड़े-गले रिश्तों के झूठे सेलिब्रेशन पर निसार रहता है और टूटे, सड़े, बजबजाते रिश्ते से बाहर निकलने की हिम्मत देने के बारे में सोच भी नहीं पाता. ऐसे में अगर कोई स्त्री तलाक भी ले और तलाक के बाद उसे सेलिब्रेट भी करे तो कैसे न होगा समाज के पेट में दर्द. तमिल टीवी अभिनेत्री शालिनी ने तलाक के बाद एक फोटोशूट कराकर जिसमें वो तलाक को मुक्ति के तौर पर देख रही हैं और मुक्ति का जश्न मना रही हैं समाज की सड़ी गली सोच को अंगूठा दिखाया है.
समाज स्त्रियों से अपेक्षा रखता है कि वो अपनी मर्जी से किसी रिश्ते में न जाएँ. जो भी रिश्ता उन्हें पकड़ा दिया जाय उसे पूरी शिद्दत से निभाएं और निभाते-निभाते मर जाएं. मरते-मरते भी उस रिश्ते के झूठे सुख के कसीदे पढ़ना न भूलें.
हमारे आसपास न जाने कितनी ही ऐसी शादियाँ हैं जिसमें लोग एक-दूसरे को बड़ी मुश्किल से झेल रहे हैं. हर दिन कुढ़ रहे हैं. अपनी शादी को कोस रहे हैं. लेकिन उसी शादी की झूठी हैपी फैमिली वाली तस्वीरें भी लगातार पोस्ट कर रहे हैं. ये सुखी दिखने का इतना दबाव जाने कहाँ से आ गया है.
चारों तरफ दुःख, अवसाद, झगड़े, झंझट वाली शादियां नजर आती हैं लेकिन उनसे निकलने की हिम्मत करने वाले लोगों की संख्या अब भी बहुत कम है. एक पूरी उम्र टूटे-बिखरे रिश्ते के लिए बिसूरते हुए गुजार देने वाले लोग भी शादी को बचाने की वकालत करते नजर आते हैं. अच्छे खासे पढ़े लिखे लोग, आर्थिक रूप से सम्पन्न, आत्मनिर्भर लोग भी तलाक से बचे रहना चाहते हैं. और विडम्बना यह कि लोग प्रेम बचे रहने की दुआ नहीं देते, रिश्ता बचे रहने की देते हैं.
प्रेम और सम्मान के अभाव में किसी भी रिश्ते को क्यों बचे रहना चाहिए? और यह अलग होना सुभीते से क्यों नहीं होना चाहिए?
एक स्त्री के लिए तलाक के फैसले तक पहुँचने की राह आसान नहीं होती. यह लड़ाई पहले मन के भीतर लम्बी चलती है और उसके बाद कोर्ट में. जिस रिश्ते के बनने को कभी सेलिब्रेट किया था उससे मुक्ति पाने के लिए कोर्ट की सीढियां चढ़ना आसान नहीं होता. परिवार के लोगों से लेकर, कोर्ट, कचहरी, वकील, जज और आसपास के लोग सब मिलकर संदेह की नज़र से देखते हैं. आपमें दोष तलाशते हैं.
एक स्त्री शादी के 28 साल बाद तलाक लेने पहुंची तो जज ने कहा, ‘अब इतनी उम्र कट गयी है बाकी भी काट लो, क्यों लेना है तलाक? अलग तो रहते ही हो, तलाक लेने की क्या जरूरत है? अब इस उम्र में दूसरी शादी तो करनी नहीं है फिर पड़ी रहने दो शादी?’
ये जो है न पड़ी रहने दो शादी इसी ने जिन्दगी अज़ाब बनाई है. कुछ भी करके शादी को बचा लेने पर तुला है समाज. शादी के भीतर चाहे कुछ बचा हो या न बचा हो शादी बची रहे बस. कभी बच्चों की दुहाई देकर, कभी बुढ़ापे का सहारा कौन होगा की दुहाई देकर और कभी सब लोग क्या कहेंगे की दुहाई देकर.

रिश्ता बचाया जाना यक़ीनन जरूरी है लेकिन अगर रिश्ते में से और जीवन में से कुछ चुनना हो तो बेशक जीवन को ही चुना जाना चाहिए.

https://ndtv.in/blogs/issue-divorce-celebration-saving-life-is-more-important-than-saving-relationship-opinion-pratibha-katiyar-4005984

Tuesday, November 8, 2022

हिंसा तो उपेक्षा भी है


-प्रतिभा कटियार

‘अम्मू’ फिल्म देखकर खत्म की है. लेटी हूँ. ख़ामोशी पसरी हुई है. भीतर भी, बाहर भी. ‘अम्मू’ की कहानी नयी नहीं है लेकिन नयी न होने से क्या कहानी नहीं रहती, क्या उस कहानी की तासीर कम हो जाती है. ‘डार्लिंग्स’ देखी थी तब ऐसी ख़ामोशी महसूस नहीं हुई थी. इस ख़ामोशी को बुरा लगने से जोड़कर देखना ठीक नहीं है. क्योंकि दोनों ही फिल्मों के अंत में बुरा महसूस नहीं होता लेकिन कुछ महसूस होता है. यह कुछ महसूस होना फिल्म की ताकत है.

कुछ लोग कहेंगे कि ‘डोमेस्टिक वायलेंस. क्या यह अब भी होता है?’ इनमें महिलाएं भी होंगी. खासकर मध्य वर्ग की महिलाएं. कुछ कहेंगी ‘मेरे ‘ये’ तो कभी तेज़ आवाज़ में बात भी नहीं करते.’ कुछ और इतरा के कहेंगी ‘मेरे ये तो मुझे किसी काम को करने से नहीं मना करते.’ कुछ पुरुष कहेंगे ‘भई, हमने कोई रोक-टोक नहीं की किसी तरह की. जैसे चाहें जियें, जो चाहें करें.’ इन संवादों के भीतर न जाने कितनी परतें हैं जिन तक उनकी खुद की भी नजर नहीं जाती. लेकिन अम्मू देखने के बाद मेरे मन में कुछ और ही बातें चल रही हैं और मुझे ‘थप्पड़’ फिल्म की याद बेतरह आ रही है.

जहाँ खुली हिंसा है, मारपीट है वहां भी लड़ाई कितनी मुश्किल है, स्त्रियाँ बार-बार बिना मांगी गयी माफियों को माफ़ करके उदार होती रहती हैं. परिवार को बचाने की कोशिश करती रहती हैं. सोचती रहती हैं, गुस्सा आ गया होगा किसी बात पर वैसे तो बहुत प्यार करते हैं, अम्मू भी यही कहती है, ज्यादा दिन तो अच्छे ही गुजरते हैं थोड़े ही दिन मारपीट वाले होते हैं. उन पर काम का दबाव रहा होगा शायद. फिर हिंसा का सिलसिला बढ़ता जाता है और जीवन और फिल्म दोनों अपने रास्ते तलाशते हैं.

‘थप्पड़’ फिल्म इसलिए ज्यादा करीब की लगी थी कि ‘सिर्फ एक थप्पड़ ही तो है’ कहकर रिश्ते को बचाने के लिए उसे सह जाने के खिलाफ खड़ी यह फिल्म थोड़ा ज्यादा बड़ा आसमान खोलती थी. लेकिन मेरे मन में लगातार कुछ सवाल हैं. क्या है हिंसा. कब कोई व्यवहार, कोई बर्ताव हिंसक होता है, कब नहीं.

लगभग हर दूसरी स्त्री अलग-अलग तरह की व्यवहारगत हिंसा का सामना कर रही है. हर रोज. सुबह से शाम तक, शाम से सुबह तक लेकिन यह सब हिंसा के दायरे में आता ही नहीं.

अक्सर पति अपनी पत्नियों के प्रति उपेक्षा का भाव रखते हैं. उन्हें याद ही नहीं रहता कि उनकी पत्नी कितनी सुंदर दिखती है. वो प्रशंसा करना तो भूल ही चुके होते हैं लेकिन मजाकिया लहजे में अपमानित करना उन्हें खूब आता है. ‘कैसी दिखने लगी हो, कितना खाती रहती हो? ठूंस लो, फ़ैल तो रही ही हो? सजने से क्या लगता है तुम सुंदर लगने लगोगी? क्या घर में पड़ी रहती हो? ऑफिस जाती हो तो क्या अनोखा काम करती रहती हो इतना क्या इतराती रहती हो.’ दोस्तों से कहना, ‘अरे बीवी की तो आदत है किच किच करने की, अब क्या करें.’

पत्नियाँ जानती हैं कि पति ने न जाने कितने नए एप पर कितने अलग नामों से अपने सुख के कोने तलाश रखे हैं, लेकिन वो इग्नोर करती रहती हैं. सामने मिले एविडेंस को मुस्कुरा कर उपेक्षित करती हैं. और अगर झगड़ा करती हैं तो उन्हें ही बेकार की शक्की औरत के रूप में साबित करके नयी कहानियां गढ़कर उन्हें ही अपराधी बना देना बिलकुल भी नया नहीं है.

स्त्रियाँ सहती हैं और खुद ही अपराधबोध में मरी जाती हैं.

सोचती हूँ क्या यह सब हिंसा नहीं है? उनके काम को एप्रिशिएट न करना, उनके गुणों के बारे में बात न करना, उपहास करना, ताना देना, या हर बात के जवाब में चुप लगा जाना, घर की कलह का दोष उनके सर मढ़कर दूसरे रिश्तों क खोज में निकल पड़ना क्या यह सब हिंसा नहीं.

हर दिन ऐसी हिंसा का सामना करने वाली स्त्रियाँ राहत की सांस लेते हुए जब इतराकर करवा चौथ का व्रत रखकर खुश होती हैं और यह कहती हैं कि ‘मेरे ये तो कभी हाथ नहीं उठाते’ तो उनकी मासूमियत पर न हंसी आती है, न रोना.

विवाह संस्था इस कदर दमघोंटू है कि अक्सर इसके भीतर ऑक्सीजन की कमी होने लगती है. बहुत सारे रिश्ते वेंटिलेटर पर चल रहे हैं. दुःख इस बात का है कि खुद वेंटिलेटर पर चल रहे रिश्ते में जूझ रहे लोग दूसरों को शादी न करने पर ताने देने से, उपहास करने से बाज नहीं आते.

समय आ गया है कि विवाह संस्था को या तो खारिज किया जाय या इसकी पुनर्निर्मित हो. वरना अम्मू, डार्लिंग्स पर तो फिर भी बात हो जायेगी, थप्पड़ पर भी हो जायेगी लेकिन वो लोग घेरे में नहीं आयेंगे जो बिना मारे हर वक्त अपने साथी के सम्मान को, उनके आत्मविश्वास को चोटिल करते रहते हैं.

व्यवहारगत हिंसा को भी हिंसा के दायरे में लाना जरूरी है जिसमें उपेक्षा, उपहास और धोखेबाजी भी शामिल है.

Thursday, June 16, 2022

बच्चों के नन्हे हाथों में चाँद सितारे रहने दो...

- प्रतिभा कटियार
उसकी नन्ही उँगलियाँ एक बड़ा सा घर बनाने के लिए तेजी से चल रही थीं. लकीरें तनिक टेढ़ी-मेढ़ी होतीं तो वो इरेज़र से दुरुस्त करती और पूरे मन से घर बनाने में लग जाती. वो महक थी. देहरादून के सरकारी स्कूल की कक्षा 2 की छात्रा. अपने ही स्कूल में चल रहे समर कैम्प का आनन्द लेते हुए वो तन्मयता से डूबी हुई थी. उसने घर बनाया, घर के बाहर एक बकरी, एक कुत्ता भी था. फिर उसने घर के पास कुछ फूल उगाये. एक पेड़ भी आकार लेने लगा. महक ने कहा ‘मैं दो सूरज बनाउंगी.’ मैं जो देर से उसे चुपचाप लकीरों से अपना आसमान, अपनी जमीन गढ़ते देख रही थी उससे पूछ बैठी, सूरज तो एक ही होता है न? तो दो सूरज क्यों? बड़ी देर बाद उसने अपना सर ऊपर उठाया, अपनी नजरें मेरे चेहरे पर रखीं और दृढ़ता से कहा, ‘मुझे दो सूरज चाहिए इसलिए.’ और वो फिर से झुककर सूरज बनाने लगी. कुछ ही देर में उसकी कॉपी में दो सूरज चमक रहे थे. महक अब खुश थी. मुझे फिल्म ‘स्काई इज़ पिंक’ का वह संवाद याद आया जब दूर देश में बैठी माँ अपने बच्चे से पूरे आत्मविश्वास से कहती है, ‘अगर तुम्हारे आकाश का रंग गुलाबी है तो वह गुलाबी ही है.’

मैंने महक से पूछा, ‘तुम्हारे घर की खिड़की से क्या-क्या दिखता है?’ उसने मुस्कुराकर कहा, ‘जो भी मैं देखना चाहती हूँ’ मैंने पूछा क्या-क्या, तो उसने कहा, ‘पेड़, नदी, पहाड़, आसमान पूरा, हवाई जहाज...रसगुल्ले वाले की दुकान और...और आइसक्रीम और काम से लौटती मम्मी.’ महक से बात करते हुए मेरे भीतर कोई खुशबू फूटने लगी थी. महक के कल्पना के संसार में गोते लगाते हुए, उसके दो सूरज की मुस्कुराहट को सहेजते हुए अचानक लगने लगा था कि यह दुनिया सच में किस कदर खूबसूरत है जब तक ये नन्ही आँखों, नन्हे कदमों और नन्ही उँगलियों के हवाले है. और हम समझदार लोग इन्हें अपने जैसा बनाना चाहते हैं. क्योंकर आखिर? निदा फाज़ली साहब का शेर मौजूं हो उठा था, बच्चों के नन्हे हाथों में चाँद सितारे रहने दो, चार किताबें पढ़कर ये भी हम जैसे हो जायेंगे.

इसके बाद कुछ देर मैं पूजा के पास बैठी. उसे देखती रही कि उसकी कल्पना की दुनिया में कैसे-कैसे रंग हैं. उसने सुंदर से घर के बाहर एक प्यारी सी लड़की बनाई थी. बेहद खूबसूरत थी वो लड़की. मैंने पूजा से पूछा ‘ये तुम हो?’ पूजा अचकचा गयी. ‘नहीं नहीं...मैं नहीं. मैं तो काली हूँ न. और सुंदर भी नहीं हूँ. ये तो ईशा है मेरी बहन. वो बहुत सुंदर है.’ और पूजा ईशा की ड्रेस में रंग भरने लगी. मेरे भीतर कुछ दरक गया. नन्ही पूजा किस कदर मान चुकी है कि वो सुंदर नहीं है. किसने बताया उसे यह. और क्यों, किस आधार पर. मैंने बहुत देर तक पूजा से बात की और उसे कहा कि वो बहुत खूबसूरत है लेकिन वो मानी नहीं.

राहुल की दुनिया में झाँका तो वहां खिलौने थे बहुत सारे. एक हवाई जहाज था. घर उसका भी बड़ा था लेकिन उसके घर के बाहर जो पेड़ था उसके नीचे वो अपने दोस्तों के साथ खेल रहा था. रंग चटख थे राहुल की दुनिया के. उसने फूल कम बनाये थे खिलौने ज्यादा.

सिध्धार्थ ने पूछा, ‘क्या अपने मन से कुछ भी बना सकता हूँ?’ जब शिक्षिका ने कहा हाँ, कुछ भी बना सकते हो तो उसने कहा ‘मैं धरती बनाऊंगा.’ वो धरती बनाने लगा. गोल-गोल धरती. सिध्धार्थ कक्षा 1 में पढ़ता है. उसने एक गोला बनाया और उसमें कुछ गोचागाची कर दी. उसकी शिक्षिका ने कहा, ‘शाबास तुमने बहुत सुंदर धरती बनाई है. अब इस धरती में कुछ पेड़ भी लगा दो.’ लेकिन सिध्धार्थ का मन नहीं था पेड़ लगाने का. उसने उस गोचागाची वाली अपनी ड्राइंग में एक महिला की तस्वीर बनाने की कोशिश की. तस्वीर तो बन नहीं पा रही थी लेकिन यह समझ आ रहा था कि यह कोई स्त्री है. उसकी शिक्षिका ने उसके सर को चूमते हुए कहा, ‘जाओ जाकर बाहर खेल लो और फ्रूटी पीना मत भूलना.’

सिध्धार्थ धीमे कदमों से बाहर चला गया. शिक्षिका ने बताया कि इसने अभी स्कूल आना शुरू किया है. कोरोना में इसकी माँ की मृत्यु हो गयी है. इसके पापा काम पर जाते हैं. अक्सर वो इसे स्कूल से ले जाना भूल जाते हैं. बच्चा अभी बिना माँ के जीना सीख रहा है. उसने धरती पर जो स्त्री बनाई है शायद अपनी माँ को बनाया है. उस लगभग न समझ में आने वाले अनगढ़ से चित्र के भीतर के उस कोमल संसार को सिर्फ वो शिक्षिका समझ पा रही थी जो सिध्धार्थ को जानती है, उसके मन को जानती है.

इस जानने का, महसूस करने का शिक्षा में कितना गहरा उपयोग हो सकता है यह बात सर्वविदित है ही.

इस बार के ये समर कैम्प कई मायनों में अलग हैं. यहाँ रंगों और खेलों का जो संसार है न जाने कितने जख्मी दिलों पर मरहम भी रख रहा है. न जाने कितने नन्हे मन की उड़ान को खुला आसमान दे रहा है. शिक्षक बच्चों के और करीब आ रहे हैं, बच्चे अपने ही और करीब आ रहे हैं. शिक्षक चाहते हैं कि समर कैम्प के बहाने बच्चों के मन की सारी जकड़न टूट जाए, बच्चे चाहते हैं कि वो अपनी दुनिया के दो सूरज से इस दुनिया को और रोशन कर दें.

रही बात सीखने की तो मैंने महसूस किया कि इस दौरान बच्चों और शिक्षकों दोनों का जिस तरह का सीखना हो रहा है उसी की कमी से तो सारा समाज जूझ रहा है.

Wednesday, June 15, 2022

क्षमा करो हे परम्पराओं रीति-रिवाजों

- प्रतिभा कटियार
खुद से मोहब्बत करना सिखाने वाला देश, समाज नहीं है यह. यहाँ संस्कार का अर्थ है अपने हिस्से की रोटी दूसरे को देकर सुख पाना. स्त्रियों के हिस्से तो यह इस कदर आया है कि यह उनकी रोजमर्रा की आदत में शामिल हो गया कि घंटों खाना बनाने के बाद पहले घर के पुरुषों को परोसना, खिलाना, उन्हें खाते देखने का सुख लेना और जो उनके खाने से जो बच जाय उसे खाकर अपना भाग्य सराहना.

ऐसे देश, समाज में खुद से कोई इस कदर मोहब्बत कर बैठे कि खुद से ही ब्याह रचाने चल पड़े तो क्या हो भला? गुजरात की क्षमा बिंदु खुद से ब्याह करने वाली पहली महिला बन गयी हैं साथ ही उन्होंने बहुत सारे सवालों को भी जन्म दिया है. मैं उन सवालों उन टिप्पणियों पर बात नहीं करूंगी जिसमें उन्हें पब्लिसिटी स्टंट या सेल्फ औब्सेशन जैसी टिप्पणियों से नवाजा जा रहा है. मेरी चिंता कहीं और है, कुछ और है.

लम्बे समय से मैं विवाह संस्था की दुश्वारियों की बाबत सोच रही हूँ. क्योंकर आखिर विवाह संस्था को इस कदर सर पर चढ़ा लिया गया है कि वो दम घोंटने पर उतारू हो उठी हैं. फिर भी विवाह संस्था का ग्लैमर कम नहीं हो रहा है. लिवइन रिलेशनशिप जैसे वैकल्पिक कानून हमारे पास होने के बावजूद विवाह संस्था के वर्चस्व का किला लगातार मजबूत होता जा रहा है. क्षमा के खुद से विवाह करने के पीछे मुझे वही वर्चस्व नजर आता है.

विवाह संस्था का ग्लोरीफिकेशन इस कदर है कि कब वो ज़िन्दगी का एक बड़ा मकसद बन जाता है पता ही नहीं चलता. लड़कियों के लिए तो खासकर. अभी भी ज्यादा लड़कियों के सपने में उनका राजकुमार पहले आता है, करियर बाद में. बच्चियां होश बाद में संभालती हैं विवाह का वैभव उन्हें भरमाना पहले शुरू कर देता है. दुल्हन बनने का सपना, सजने-संवरने का सपना, मेहँदी, हल्दी, नाच, गाना इन सबका आकर्षण इस कदर उनके ज़ेहन में पैबस्त हो जाता है कि कई बार उनका दूल्हा भी प्राथमिकता के पायदान पर नीचे सरक जाता है और विवाह की परम्पराओं का आकर्षण पहले पायदान पर आ बैठता है.

दो दशक पहले तक यह बात चर्चा में आती तो थी कि विवाह में बेवजह के खर्चे, शोशेबाजी को कम करना चाहिए. उस वक़्त विवाह की रीढ़ पर दहेज़ के दानव की पड़ी हुई लात ही काफी थी. अभिभावक उसी से बिलबिलाये रहते थे. दूल्हे के घरवालों के सामने पगड़ी रखते लड़की के पिता को दिखाने वाले कितने ही दृश्य, दहेज के कारण बरात लौट जाने के कितने किस्से हम सबको याद हैं. लेकिन बजाय विवाह के खर्चों, शोशेबाजी पर लगाम कसने के यह उत्तरोत्तर बढ़ता गया. हिंदी फिल्मों और बाज़ार ने मिलकर इसमें खूब रोटियां सेंकीं. न सिर्फ विवाह की परम्पराएँ, रीति-रिवाज फैशन बन सर चढ़ने लगे, वैवाहिक उत्सव भी इसमें शामिल हो गये. करवाचौथ, शादी की सालगिरह आदि जैसी होड़ इसमें शामिल होने लगीं. अब आ गयी है शोशेबाजी की एक नयी विभीषिका शादी की 25वीं सालगिरह. रिश्ता कैसा है इस पर ध्यान नहीं लेकिन रिश्ते का सेलिब्रेशन और तस्वीरें चमकती हुई दिखना जरूरी हो गया है.

इंगेजमेंट, हल्दी, मेहँदी, बारात, जयमाल यह सब कितना फ़िल्मी स्टाइल हो यह अलग ही तनाव हो चला है. बेस्ट फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी, लाइव जयमाल, प्री वेडिंग सूट, पोस्ट वेडिंग सूट, प्रेगनेंसी फोटो शूट, पहला करवा चौथ, हर साल की एनवर्सिरी इन सबसे जुड़ी जो उत्सवधर्मिता है वो अचानक गायब हो जाती है जब कोई विवाह न करने का फैसला लेता है. पहले तो सिंगल रहने के निर्णय पर तथाकथित रिश्तेदार ही सवाल कर करके जान खा लेते थे यही कष्ट था अब एक और कष्ट जुड़ गया है इस निर्णय के साथ बाजार की चमचम करती यह उत्सवधर्मिता सिंगल व्यक्ति के जीवन से गायब हो जाती है.

क्या हो उन लड़कियों का जिन्होंने मेहँदी लगाने, शादी का लहंगा पहनने, सजने-संवरने के सपने देखते हुए ही ज़िन्दगी के सपने देखे हैं. एक बार एक लड़की को कहते सुना था, ‘यार शादी तो नहीं करनी लेकिन शादी की परम्पराएँ मजेदार लगती हैं, सोचती हूँ फेक मैरिज करके शादी वाले अरमान पूरे कर लूं.’ बात मजाक में कही गयी थी लेकिन उसकी जड़ें गहरी थीं.

एक काफी प्रोग्रेसिव कपल को जानती हूँ जो कई साल से लिव इन में थे लेकिन आखिर लड़के को उस रिश्ते से बाहर आना पड़ा क्योंकि लड़की को शादी करनी थी ताकि वो शादी की परम्पराओं को जी सके. लड़का इन परम्पराओं में यकीन नहीं करता था. शुरुआत में लड़की भी नहीं करती थी लेकिन एक आकर्षण उसे लगातर खींच रहा था.

एक बार जब एक दोस्त की करवाचौथ की रंगभरी तस्वीरबाजी से उकताकर इन परम्पराओं को खाए अघाए लोगों का शगल कह दिया था तो वो नाराज हो गयी थी. इसलिए जब कोई कहता है कि यह किसी पर दबाव नहीं है, मुझे ठीक लगता है मैं ऐसा कर रही हूँ, कर रहा हूँ किसी को न पसंद हो तो वो न करे तो उदास हो जाती हूँ. इतना सरलीकरण? सचमुच? दोस्त, यह बात इतनी सी नहीं होती. यहीं, बस इसी जगह ठहरकर सोचने की जरूरत है. कि यह जो मर्जी का ताना-बाना है यह आता कहाँ से है और यह होता कैसा है. कैसे आपकी कम्फरटेबल च्याव्स किसी की जबरन लादी हुई च्वायस में तब्दील हो जाती है पता ही नहीं चलता.

जिन बच्चियों की आँखों में किताबों के, दुनिया बदलने के, कुछ बेहतर करने के सपने होने थे कैसे उनमें चूड़ी, बिंदी, गजरा, और राजकुमार के सपने फिट कर दिए गये सोचिये तो सही. यह सब अवचेतन में काम कर रहा होता है. हमारी चेतना अवचेतन की शिकार रहती है तब तक जब तक हम उसे झाड़ पोंछकर साफ़ न करें.

अगर यह सचमुच आपकी मर्जी है तो इसका ढोल क्यों पीट रहे हैं आप भाई. लगातार एक दबाव बनता जा रहा है, बढ़ता जा रहा है. निश्चित तौर पर मध्यवर्ग खासकर नवोदित मध्यवर्ग इसके चंगुल में ज्यादा है. यह दबाव उन पर किस कदर भारी पड़ रहा है इसका एक उदाहरण मेरे घर में मैंने देखा. मेरी खाना बनाने वाली पूनम. पूनम सिंगल पैरेंट है. दो बेटियों और एक बेटे को उसने अकेले ही पाला है. हाड़-तोड़ मेहनत करके उसने बच्चों को शिक्षा दी, घर बनाया और उनके अच्छे भविष्य के सपने देखे. मेरे आश्चर्य की सीमा न रही जब पता चला कि उसने बेटी के लिए सत्तर हजार का लहंगा लिया है. लड़के वालों ने कोई दहेज नहीं माँगा था बस एक ही शर्त थी कि शादी धूमधाम से हो. लड़की का भी यही सपना था. पूनम की बेटी का भी प्री-वेडिंग शूट हुआ. हर रस्म एकदम फ़िल्मी तरह से हुई और शादी के बाद पूनम 8 लाख के कर्ज में थी.

‘जिसे न करना हो वो न करे’ कहकर अपने ऐश्वर्य पर इतराने वालों से इतना ही कहना है कि आप जियें बेशक वो सब जो आप जीना चाहते हैं लेकिन उसका ढिंढोरा पीटकर दूसरों के लिए उस इच्छा का दबाव न बनाएं. क्या ही बड़ी बात है कि क्षमा ने भी इन्हीं परम्पराओं को जी लेने के मोह में खुद से विवाह किया हो. ठीक वैसे ही जैसे क्वीन फिल्म में अकेले हनीमून पर गयी थी कंगना.

उनके नजरिये से देखिये, शादी न करने का फैसला इतनी सारी उत्सवधर्मिता के बिना क्यों आये. तो लो जी अकेले रहेंगे ठसक से और शादी की तमाम रस्मों का आनन्द उठाएंगे. ऐसा ही सोचा होगा शायद क्षमा ने भी.

हालाँकि बेहतर तो यह होता कि हम सब मिलकर कहते क्षमा करो हे रीति रिवाजों, परम्पराओं, अब तुम्हारा और बोझ हमसे न ढोया जायेगा.

https://twitter.com/QuintHindi/status/1536741042044936192

Wednesday, May 4, 2022

दुनिया को तुम्हारी आँखों की तरह होना चाहिए...



लाड़ो मेरी,
अब जबकि तुम बसंत के 18 रंग देख चुकी हो, तितलियों से तुम्हारी दोस्ती एकदम पक्की हो चुकी है, आसमान भर साहस तुम्हारी आँखों में रहने लगा है तो तुम्हें देखना एक अलग ही सुख से भरता है. तुम्हारी आँखों को देखती हूँ तो लगता है दुनिया को तुम्हारी आँखों की तरह खूबसूरत होना चाहिए. उम्मीदों और सपनों से भरी आँखे.

तुम्हें याद है तुम्हारे कुछ सवालों पर मैं तुमसे कहती थी समय आने पर इन पर बात करेंगे तो शायद अब वो समय आ गया है. और अब जबकि वो समय आ गया है मैं जानती हूँ तुम्हारे वो सवाल अब रहे ही नहीं हैं. सवालों के साथ ऐसा ही होता है. मैंने तो यही समझा है कि सवालों के जवाब तलाशने की हड़बड़ी नहीं करनी चाहिए बल्कि तसल्ली से उन सवालों के साथ रहना चाहिए. नए सवालों को उगने देना चाहिए. कई बार जिस सवाल का जवाब हम तलाश रहे होते हैं असल में वह सवाल होता ही नहीं है. सवाल तो कोई और होता है. और हम निरर्थक सी किसी खोज में जुटे होते हैं. सवालों की बाबत यह बात वाकई कमाल की है कि जीवन में सवालों के होने में हमारा होना बचा रहता है. कई बार साथ रहते-रहते सवालों के भीतर ही जवाब उगने लगते हैं.

लाड़ो मेरी, संभावना एक खूबसूरत शब्द है जो साहस से सजता है. इसके बाद कुछ भी मुश्किल नहीं रह जाता. मुझे ख़ुशी है कि तुम यह जान चुकी हो. हम दोनों ने मिलकर जो उम्मीदों के नन्हे-नन्हे बीज बोये थे वो अब तुम्हारी आँखों में उगने लगे हैं. तुम्हारी सपनों से भरी आँखों से दुनिया बेहद खूबसूरत दिखने लगी है. मैं जानती हूँ जिस तरह तुमने मुझे ढेर सारी नयी बातें सिखायीं, नया नज़रिया दिया दुनिया को देखने का उसका पूरी दुनिया को इंतज़ार है.

अब जबकि तुम पहली बार मुझसे दूर जा रही हो तो कितना कुछ ‘पहली बार’ होना तुम्हारे करीब आ गया है. तुम महसूस करोगी कि आसमान पहली बार हथेलियों में रखा हुआ है. तुम जानोगी सख्त धूप में खिलखिलाते गुलमोहर की हंसी का राज. पहली बार यूँ होगा कि ठोकर लगेगी तो खुद ही उठोगी और सीखोगी कि आने वाली ठोकरों से कैसे बचा जाता है. पहली बार होगा कि कोई सफ़ेद बुलबुला तुम्हें घेरे रहेगा. ऐसा ही बहुत सारा पहली बार मेरी ज़िन्दगी में भी आया है. पहली बार तुम्हें खुद से दूर जाते देखना...पहली बार तुम्हारे लौटने का इंतज़ार, पहली बार तुम्हारी हथेलियों को, पलकों की चूमने की इच्छा होना और चूम न पाना.

तुम अपने ज़िन्दगी के सफर में चल सको मन मुताबिक, कुछ भी किसी को भी साबित करने के दबाव से दूर बिलकुल अपने मन के क़रीब. कि इस दुनिया को सबसे ज्यादा तुम्हारे खुश होने का इंतज़ार है.

तुम्हारी
मम्मा

Monday, April 4, 2022

सीखना है कितना कुछ

- प्रतिभा कटियार

हमें क्या अच्छा लगता है, क्या बुरा लगता है. किस बात पर हमें हंसी आती है किस बात पर गुस्सा आता है ये सब हमारे व्यक्तित्व को दर्शाने वाले पैरामीटर्स हैं. व्यक्ति अपने चेहरे, रंग, कद से नहीं बनता. न जाति, धर्म, लिंग से बनता है वह बनता है अपनी सोच से, अपने व्यवहार से. कोई नयी बात तो नहीं है यह लेकिन फिर भी इतनी दूरी सी क्यों लगती है इस बात से. बहुत सारी अच्छी बातें करने वाले भी जब किसी फूहड़ से चुटकुले पर हंस देते हैं तब असल में उनके बड़े से बौध्धिक व्यक्तित्व की कलई खुल जाती है.
एक समय था जब कॉमेडी शोज़ की शुरुआत हुई थी. टीवी पर ये शो काफी लोकप्रिय हुआ करते थे. हर घर में इनका बोलबाला था लेकिन मैंने ये कभी नहीं देखे. क्योंकि जब भी इन शोज़ के कुछ टुकड़े मेरी नज़र से गुजरे मुझे ये बहुत दिक्कत भरे लगे. फूहड़ और भद्दे. बॉडी शेमिंग से भरे, जेंडर बायस्ड से भरे चुटकुले कैसे हंसा सकते हैं हमें. लेकिन वह फूहड़ दौर फलते-फूलते यहाँ तक आ पंहुचा है कि वाट्स्प फ़ॉरवर्ड में ऐसे चुटकुले, वीडियो, मीम्स भरपूर जगह पाते हैं और लोग इनका जमकर लुत्फ़ लेते हैं. हाँ, सच में. स्त्री विरोधी चुटकुलों को स्त्रियाँ खूब फ़ॉरवर्ड करती हैं.
मैं समझना चाहती हूँ कि दिक्कत कहाँ है. हमारा सेन्स ऑफ ह्यूमर इतना क्रूर क्यों है. इतना फूहड़ क्यों है. ऐसा क्यों है कि स्टैंडअप कॉमेडी जैसी नयी खूब फल-फूल रही इंडस्ट्री जो एक जरूरी दखल भी देती है, राजनैतिक खलीफाओं से पंगा भी लेती है वो भी गालियों को सामान्य मानती है. गालियाँ वही सब की सब स्त्री विरोधी. इसके पीछे तर्क है कि यह तो नॉर्मल है. इस नॉर्मल को स्त्रियाँ भी अपनाने लगीं वो भी स्त्री विरोधी गालियों को ले आयीं व्यवहार में. क्या सच में ऐसा होना था? बात शुचितावादी अप्रोच की नहीं है बात उस हिंसा की है जो उन शब्दों में समाई है जिन्हें हम नॉर्मल तरह से एक्सेप्ट कर रहे हैं.
तो इस नॉर्मल की जड़ तक जाने की कोशिश करते हैं. जाने क्यों समाज की हर छोटी-बड़ी बुराई का हल शिक्षा के करीब नजर आता है. स्कूल के वो दिन याद करती हूँ जब हम खेलते-खेलते या चलते-चलते गिर जाते थे, हम चोट के दर्द से ज्यादा अपमान के दर्द से गुजरते थे. किसी को गिरते देखना हंसने को कैसे जन्म देता है और क्यों इसे कोई रोकता नहीं. कुर्सी खींचकर हटा देना और गिरा देना फिर हँसना. कैसे किसी का शरीर किसी की हंसी की वजह बनता है. मोटा, थुलथुल, गंजा, काला ये सब चुटकुलों का सामान कब और कैसे बना. कैसे बने चुटकुले पति पत्नी वाले जहाँ पति विक्टिम है और पत्नियाँ दुष्ट खलनायिकाएं या मूर्ख.
कपिल शर्मा शो के पास दर्शकों की बड़ी भीड़ है लेकिन वो कैसे हंसाता है, पुरुषों को स्त्री बनाकर उनकी बॉडी शेमिंग करके. सवाल यह नहीं कि वो क्या बेचकर पैसा कमा रहा है सवाल यह है कि हमें जिन बातों पर दुःख होना था, गुस्सा आना था उन पर हंसी क्योंकर आई.
जब ऐसे फूहड़ शो देखकर लोग हंस रहे होते थे तो मैं अचकचा कर उन हंसने वालों के चेहरे देखती थी, इन्हें हंसी क्यों आ रही है, गुस्सा क्यों नहीं आ रहा. फिर लगने लगा शायद मेरा सेन्स ऑफ ह्यूमर कमजोर है. मुझे किसी भी बात पर हंसी नहीं आती.
काफी पहले की बात है एक न्यूज़ चैनल के बड़े ही वरिष्ठ पत्रकार न्यूज़ प्रेजेंट करते हुए धीमे से तब मुस्कुरा दिए जब एक रैप वॉक में मॉल फंक्शनिंग हो गयी. कुछ सेकेण्ड की वो मुस्कुराहट ऐसी चुभी न कलेजे में कि आज तक उनकी तमाम अच्छी बातें, भाषणों से मुतास्सिर न हो सकी. नज़र में चढ़ने के लिए आपको बहुत मेहनत करनी होती है लेकिन नज़र से गिरने का बस एक लम्हा होता है.
हैरत है कि हम ऐसे समाज का हिस्सा हैं जहाँ हमें यह सब नहीं दिखता. महसूस नहीं होता. शिक्षा ने सिर्फ आपको ऑफिसर नहीं बनाना था, मोटा पैकेज, अच्छी सुविधाओं की राह नहीं खोलनी थी उसे बताना था कि किसी के गिरने पर हंसना गुनाह है, दौड़कर उसकी मदद करना जरूरत है. हालाँकि दौड़कर मदद करने को भी बाज़ार ने किस तरह मार्कशीट के नम्बरों में तब्दील किया कि मदद से मदद का भाव गुम हो गया, संवेदना क्षरित हो गयी और दौड़ना बचा रह गया. यह एक अलग ही विषय है जिस पर फिर कभी विस्तार से बात होगी. अभी तो सवाल यह है कि किसी के अपमान को हंसी का सामान बनाना तो क्रूरता है न? लेकिन इस खेल में हम सब शामिल हैं. बुरी तरह शामिल हैं.
पिछले दिनों पूरी दुनिया में जोर-शोर से महिला दिवस मनाया गया. हर साल मनाया जाता है. हर साल मेरे मन में यह ख्याल आता है कि काश हम स्त्री विरोधी चुटकुलों पर हंसना और स्त्रियों को निशाना बनाकर दी जाने वाली गालियों का उपयोग बंद कर पाते तो भी बहुत बड़ी राहत होती. लेकिन इस खेल में तो स्त्री पुरुष सब शामिल हैं. आधुनिक और बोल्ड होने के नाम पर स्त्रियाँ भी स्त्री विरोधी भाषा का उपयोग कर रही हैं. क्या हम सच में कुछ देख, समझ पाने की क्षमता विकसित नहीं कर पाए हैं?
फिर तो अभी बहुत लम्बा सफर बाकी है कि इंसानियत की बुनियादी तालीम अभी हमसे दूर है. यह जरूर लगता है कि अगर शिक्षक बिरादरी तनिक सचेत हो पाती इस ओर तो कुछ उम्मीद की जा सकती है. लेकिन हर उम्मीद का बोझ शिक्षकों पर डालना भी कहाँ का न्याय है आखिर वो भी तो इसी समाज का हिस्सा हैं. क्या सचमुच, इस तर्क के पीछे शिक्षक बिरादरी को छुप जाने की रियायत है या ठहरकर सोचने का वक़्त है कि कैसे इस तरह के व्यवहार की जड़ को ही हटाना होगा. हिंदी, अंग्रेजी, गणित, विज्ञान सीखते हुए कब और कैसे व्यवहार को नरम बनाये रखने वाली संवेदना कहीं छूट जाती है. इस तरह का व्यवहार शुरू स्कूल से नहीं होता. इसकी जड़ें, घरों में, परिवारों में, समाज में गहरे धंसी हैं लेकिन शायद स्कूलों में इस तरह के व्यवहार की निराई संभव है. इसके लिए सबसे पहले तो शिक्षक बिरादरी को अपने भीतर जमी खर-पतवार की निराई करनी ही होगी.
मेरी उम्मीद नयी पीढ़ी से सबसे ज्यादा है. बच्चे जब मिसोजिनी को समझ पाते हैं, जब वो टोकते हैं कि यह कोई चुटकुला नहीं है, यह क्रूरता है. कैसे किसी की सेक्सुअलिटी को रिस्पेक्ट देना है, कैसे और कब कोई जजमेंटल हो जाता है. कैसे शिक्षक के उदाहरण इन्सेंसटिव हैं, रेसिस्ट हैं तो लगता है हाँ, यही तो होना था. इसी की जरूरत है. इस पीढ़ी को यह जिम्मा लेना है और हमें भी समझना है कि वो क्या कह रहे हैं, क्यों कह रहे हैं. हमसे चूक कहाँ हो रही है.
समय है बहुत सारा अनलर्न करने का. अपने व्यवहार को उलट-पुलटकर देखने का. यक़ीन मानिए अगर यह प्रक्रिया शुरू हो गयी तो जिन बातों पर अभी हंसी आती है न उन पर रोना आने लगेगा और दुःख होगा कि कितना कम जानते थे हम अब तक.

https://jansandeshtimes.net/view/5542/lucknow-city/

Wednesday, March 2, 2022

उदास समय और बदली हुई लड़ाइयाँ


- प्रतिभा कटियार
बहुत दिन हुए कि बहुत दिन नहीं हुए. ऐसा लगता है समय कहीं ठहरा हुआ है. फिर लगता है ठहरा ही रहता तो भी ठीक होता शायद. कभी-कभी समझ में नहीं आता दुःख है या उदासी. या दोनों ही हैं. हाँ, वही वजह जो होते हुए भी नहीं है. हिज़ाब का मुद्दा. अपनी भूमिका को तलाशती हूँ. क्या सोचती हूँ, क्या चाहती हूँ, किस तरफ हूँ. जाहिर है मैं किसी भी तरह की पर्देदारी की तरफ नहीं हूँ चाहे वो घूँघट हो नकाब. मैं किसी भी तरह के ऐसे परम्परागत पहनावे का समर्थन इसलिए नहीं करती क्योंकि उसे समाज ने ठीक माना है. जिसे जो पहनना है, जैसे रहना है यह नितांत निजी मसला है. लेकिन जैसे ही यह ‘निजी’ की बात आती है इसमें ढेर सारी कंडीशनिंग आ जाती है, ढेर सारा सामाजिक हिसाब-किताब, दबाव. और फिर वही बात कि हम नहीं जानते कि हमारी मर्जी बनकर जो हमारे भीतर है वो असल में समाज की पहले से सोची हुई तय की हुई बात है, व्यवहार है. तो इस लिहाज से हिजाब के समर्थन या न समर्थन की बात ही नहीं, जिसकी जो मर्जी हो वो पहने. लेकिन जिसकी मर्जी न हो उस पर कोई दबाव भी न बनाये.

अगर सच में कोई बदलाव चाहिए तो मर्जी को सच में उनकी ही मर्जी होने देना होगा. हम सब इसके शिकार हैं. हमारा पूरा आचरण, व्यवहार, खान-पान भाषा, बोली, लिबास, संस्कृति, त्योहार सब इसके दायरे में है. आज जब हिजाब को राजनैतिक उपयोग के लिए इस तरह चर्चा में लाया गया है तो उन सबके साथ ही पाती हूँ जो हिजाब पहनने को अपना हक मानती हैं. यह बिलकुल वैसा ही है जैसे सबरीमाला मंदिर में स्त्रियों के प्रवेश को लेकर बात थी. तब भी समझ नहीं आ रहा था कि मैं इन स्त्रियों के मंदिर में जाने की लड़ाई में साथ क्यों हूँ जबकि मेरी तो किसी मन्दिर-मस्जिद, चर्च, गुरूद्वारे में कोई आस्था है नहीं. बात वही सबके बराबर के हक की. लोकतांत्रिक व्यवहार की. हिजाब के खिलाफ जो हैं वो क्या घूँघट के खिलाफ भी हैं? वो क्या चूड़ियों और सिन्दूर के खिलाफ भी हैं. और क्यों होना है खिलाफ? समझ विकसित करनी है जिसके लिए शिक्षा की जरूरत पड़ेगी. शिक्षा जो बायस्ड न हो, अपनी मर्जी के मायने समझाए, सवाल करना, तर्क करना सिखाये.

फिर खुद पर हैरत होती है. क्या इतने बड़े राजनैतिक स्टंट का ऐसे मासूम सवालों से मुकाबला किया जा सकता है. होना तो यह था कि इल्म की रौशनी में हम सबको ऐसी तमाम रूढ़ियों, परम्पराओं से मुक्त होना था जिनका कोई अर्थ नहीं लेकिन हुआ यह कि उन्हीं रूढ़िगत ढांचों को जिन्हें गिराना था उनकी पैरवी करनी पड़ रही है कि भाई पहनने दो हिजाब, जाने दो मंदिर. कोई जरूरी नहीं कि जो हिजाब में है उसकी सोच स्वतंत्र न हो, बिलकुल वैसे ही जैसे कोई जरूरी नहीं कि जो लिबास और जबान से मॉर्डन दिख रहा है वो विचारों में, सोच में भी मॉर्डन हो.

यही है असल राजनीति. हमारी लड़ाई ही बदल दे जो. हमारी खड़े होने की दिशा ही बदल दे. कि जब हमें एक-दूसरे को समझना हो. एक-दूसरे के दुःख पर मरहम रखना हो तब हम एक-दूसरे के प्रति नफरत से भर उठें.

रवीश कुमार ने अपनी एक पोस्ट में लिखा कि एक बच्ची का उनके पास मैसेज आया कि छात्रों के वाट्स्प समूह में वो शिक्षिका सांप्रदायिक भेदभाव वाले मैसेज फॉरवर्ड करती हैं. शिक्षिका हैं वो उन्हें तो इन दीवारों को तोड़ना था वो मजबूत कर रही हैं, नयी दीवारें खड़ी कर रही हैं. इन्हीं जैसे शिक्षकों के विद्यार्थी होंगे वो जो भगवा लहराते हुए हिज़ाब की खिलाफत कर रहे थे. दुःख होता है, उदासी होती है. कैसे हो गए हम, हमें ऐसा तो नहीं होना था.

हमारी लड़ाइयाँ तो कुछ और होनी थीं और उन्हें बना कुछ और दिया गया है. हम न लड़ें तब भी उन्हीं की जीत है और हम बदल दिए गए हालात में बदले हुए मुद्दों के लिए लड़ें तो भी जीत उन्हीं की है.

इस उदासी में एक ही उम्मीद है शिक्षा व शिक्षक. शिक्षकों को अपनी असल भूमिकाओं को समझना होगा, अपने व्यवहार, सोच और तरीकों को पलट-पलट कर देखना होगा कि कहीं, जाने-अनजाने वो ऐसा कोई व्यवहार तो नहीं कर रहे जो एक पूरी पीढ़ी को उलझा रहा हो.

शिक्षा सिर्फ मार्कशीट में दर्ज नम्बर भर नहीं होती वो होती है जीवन को देखने की दृष्टि, मनुष्य होने की संवेदना. क्या हममें वो है? इस प्रश्न पर हम सब पढ़े-लिखे लोगों को एकांत में सोचने की जरूरत है, वरना पब्लिक फोरम में तो सबसे ज्यादा असंवेदनशील लोगों ने अपने भाषणों से लोगों को खूब रुलाया है और तालियाँ बटोरी हैं.

Tuesday, September 28, 2021

कमला भसीन : स्‍मृति शेष


भारतीय विकास नारीवादी कार्यकर्ता, कवयित्री, लेखिका और सामाजिक विज्ञानी कमला भसीन का 25 सितम्बर की सुबह निधन हो गया। वे 75 वर्ष की थीं। वे कैंसर से पीड़ित थीं । कमला भसीन ने महिलाओं के हक़ की लड़ाई के लिए लगभग 1970 से ही काम शुरू कर दिया था। उन्होंने लिंग भेदभाव, शिक्षा, मानव विकास, महिला सम्मान आदि चीजों पर खुलकर समाज के सामने लड़ाई लड़ी थी। उन्होंने ‘जागो री मूवमेंट’ के माध्यम से महिलाओं को पितृसत्तात्मक समाज से बाहर निकलने के लिए कई अथक प्रयास जारी रखें थे। भसीन ने नारीवाद और पितृसत्ता को समझने पर कई किताबें लिखी हैं, जिनमें से कई का 30 से अधिक भाषाओं में अनुवाद किया गया।
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सुबह आँख खुली तो एक उदास ख़बर सामने खड़ी थी। कमला भसीन नहीं रहीं। फेसुबक पर उदासी बिखरी हुई थी। मैं इधर-उधर के कामों को समेटते हुए लगातार कमला दी के बारे में सोच रही थी। इस ख़बर पर यक़ीन करने का मन ही नहीं कर रहा था। हालाँकि यह अचानक हुई दुर्घटना नहीं है। उनके स्वास्थ्य के बारे में लगातार जानकारी मिल रही थी। वो लम्बे समय से कैंसर से लड़ रही थीं। लगातार उनका स्वास्थ्य गिरता जा रहा था लेकिन उनकी जिजीविषा वैसी ही थी। खुश रहने की उनकी फितरत, दूसरों को खुश रखने की चाह और किसी भी हाल में हौसला न टूटने की प्रतिबद्धता।

कमला दी का जाना भारत में स्त्री आन्दोलन की पैरोकार का जाना है। उस आवाज़ का जाना है जो किसी भी हाल में समझौतापरस्ती का विरोध करती थीं और स्त्री के हक़ के लिए लड़ना जानती थी। कमला दी की जानिब से नारीवाद को देखना एक खूबसूरत दुनिया का सपना देखना था। उनका नारीवाद स्त्रियों के हक़ में तो था लेकिन पुरुषों के विरोध में नहीं था। असल में नारीवाद यही तो है स्त्री समानता की बात न कि पुरुषों के विरोध की बात।

वो कहती थीं कि नारीवाद का सिर्फ एक अर्थ है समानता। वो सदियों से पितृसत्ता की गाड़ी में बैल की तरह जुती स्त्री के मन की दशा भी समझती थीं और यह भी कि वो कौन से कारण हैं जो एक स्त्री को दूसरी स्त्री के खिलाफ खड़ा करते हैं। वो किसी व्यक्ति के नहीं विचार के खिलाफ थीं। सत्ता के विचार के, पितृसत्ता के विचार के। उन्होंने कहा कि, ‘मैं ऐसी बहुत सी स्त्रियों को जानती हूँ जो पितृसत्ता की पैरोकार हैं, जो स्त्री होकर भी स्त्री विरोधी हैं। लेकिन मैं ऐसे पुरुषों को भी जानती हूँ जो महिला अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं। फेमिनिज्म बयोलौजिकल मामला नहीं है यह आडियोलौजिकल मामला है।’

वो कहती थीं, ‘मैं चाहती हूँ नारीवादी महिलाएं ही न हों, नारीवादी पुरुष भी हों।’ ‘नारीवाद से हमारा मतलब है समानता सिर्फ समानता’। नारीवाद को पुरुषों के विरोध में उठे किसी स्वर के तौर पर नहीं देखना है बल्कि शोषण की उस बुनियाद को हिलाना है जहाँ किसी एक को मनुष्य के रूप में मिलने वाले अधिकारों से ही वंचित किया जा रहा हो। और जाहिर है ‘वह एक’ स्त्री ही तो है। लेकिन जब भी नारीवाद की बात होती है कुछ पुरुष कुछ उदाहरणों के साथ आ खड़े होते हैं कि महिलाएं भी तो जीना दूभर करती हैं, देखिये उसके साथ ऐसा हुआ, इसके साथ वैसा हुआ। कमला दी के उनकी पास हर बात का जवाब होता था। उनकी बात समझने के लिए दिमाग पर ज्यादा जोर डालने की जरूरत नहीं थी।

विचारों से मजबूत कमला दी भावनात्मक रूप से खूब नरम थीं। वे जल्दी से दोस्ती कर लेतीं, दिल लगा बैठतीं। दोस्ती में भी वो बराबरी के भाव को अहमियत दिया करती थीं। इसलिए उनके दोस्तों में ढेर सारे युवा और बच्चे भी शामिल हैं जिनमें से एक मैं भी हूँ।

जल्दबाजी में हुई एक छोटी सी मुलाकात और फोन पर हुई कुछ बातचीत भर से मेरा उनसे आत्मीयता का जो तार जुड़ा वो ज़िन्दगी भर जुड़ा रहेगा। उनसे बात करते हुए इतनी हिम्मत मिलती थी और इतनी उम्मीद जगती थी कि ‘अब सब ठीक हो जायेगा’ के भाव से मैं भर उठती थी। कई बार फेसबुक से पता चलता कि जब वो मेरी समस्याओं को सुलझा रही थीं तब वो मेरी समस्या से कहीं बड़ी समस्या से जूझ रही थीं।

व्यक्ति असल में विचार ही तो होता है। और इस लिहाज से कमला दी कहाँ गयीं, उनके विचार हैं हमारे पास। उनके विचार सदियों तक हमें रास्ता दिखायेंगे। ये जानते हुए भी इस ख़बर के बाद से तारी उदासी जा ही नहीं रही। कमला दी, आपसे एक बार तसल्ली से मिलना, देर तक गले लगना रह गया। मिस यू कमला दी।

प्रतिभा कटियार
लखनऊ में पली-बढ़ी प्रतिभा कटियार ने राजनीति शास्त्र में एमए किया, एलएलबी के बाद पत्रकारिता में डिप्लोमा किया. पत्रकारिता करना तय किया, 'स्वतंत्र भारत', ‘पायनियर’ 'हिंदुस्तान' 'जनसत्ता एक्सप्रेस' और 'दैनिक जागरण' जैसे हिंदी के महत्वपूर्ण अख़बारों में काम किया. इसके बाद अज़ीम प्रेमजी फ़ाउंडेशन के साथ जुड़कर शिक्षा के क्षेत्र में काम करना चुना. इन दिनों देहरादून में कार्यरत हैं.

(https://www.spsmedia.in/celebrity/passing-of-kamala-bhasin-the-advocate-of-womens-movement-in-india/)

Thursday, November 19, 2020

बेहतर विद्यार्थी होना सीख रही हूँ...


अजीब सी उलझनों वाले दिन थे वो. हर वक्त उलझन रहती थी, सोने ही नहीं देती थी. बेचैनी रहा करती थी. जिस प्रोफेशन को बहुत मोहब्बत से खुद के लिए चुना था, जिसे प्रोफेशन की तरह नहीं पैशन की तरह जिया हरदम वही अब तकलीफ दे रहा था. यूँ लगता था कि पत्रकारिता में इतने हाथ पैर बांधकर भला कैसे सांस ली जा सकती है. जिस कलम को समाज के आखिरी व्यक्ति के कंधे से कन्धा मिलाकर खड़े होना था, जिस कलम को बीन लेने थे राहगीरों की राह के कांटे, किसानों के साथ खड़ी धूप में खड़ा होना था वो कैसे पेज थ्री कॉलम, सेलिब्रिटी खबरों और कुछ ख़ास ख़बरों को सजाने, अच्छी हेडिंग लगाने में जाया होने लगी. न्यूज़रूम में रोज लड़ती थी, भीतर उससे ज्यादा लड़ा करती थी. एक टर्म हुआ करता था ‘डाउनमार्केट’. कोई समझ सकता है क्या कि इस टर्म का इस्तेमाल न्यूजरूम में होता हो और खूब होता हो तो कैसा लगता है. ये खबर डाउनमार्केट है, ये तस्वीर डाउनमार्केट है...इसे अंदर के पन्नों पर फेंको, इसमें ग्लैमर है इसे थोडा और बड़ा करो...पेज वन पर लाओ.

हम पत्रकारिता में नौकरी करने नहीं गये थे, हम तो पत्रकारिता को समझे थे मजलूमों के हक में खड़े होने वालों की जमात. शुरूआती दिनों में यह था भी. कि हमने अच्छी वाली पत्रकारिता के जाते हुए दिनों की पीठ भर देखी है. फिर पत्रकार को प्रोडक्ट की तरह देखा, सुना और पढ़ा जाने लगा. जाहिर है पैशन ब्रेक होना था, कब तक अड़े कोई कितना लड़े कोई. एक रोज तय कर लिया अब और नहीं...हालाँकि लड़ाई छोडकर चल देना मुझे अब भी ठीक नहीं लगता. हर इन्सान जो जहाँ है अपने हिस्से का बदलाव करने के लिए जूझता रहे तो भी कुछ न कुछ हो ही सकता है. लेकिन मैं अपने हिस्से की लड़ाई लड़ते लड़ते थकने लगी थी...सैचुरेशन की इंतिहा हो गयी थी, नकारात्मकता घेरे रहती थी. और एक रोज रिश्ता तोड़ लिया अख़बारों की दुनिया से, नहीं शायद यह कहना ठीक होगा कि अख़बारों की नौकरी करने से रिश्ता तोड़ा.

आजाद होकर वैसा ही लग रहा था जैसा आज़ाद होकर लगता है. सुकून और बेचैनी का कॉकटेल हो रखा था जेहन में. सुकून कि अब मैं आजाद थी, बेचैनी कि आगे क्या?

लिखने के सिवा तो कुछ आया ही नहीं, हालाँकि लिखना भी कितना आया यह भी पता नहीं. फिर कुछ अख़बारों और पत्रिकाओं से आये नयी नौकरियों के प्रस्ताव पर्स में डालकर चली गयी गोवा घूमने. सोचा कुछ दिन कोई नौकरी नहीं. वहीँ गोवा में एक मित्र का फोन आया कि अपना सीवी भेजो, मैंने दोस्तों से कभी पलटकर क्यों, क्या आदि पूछा नहीं. खुद पर ज्यादा भरोसा करने से ज्यादा भरोसा करने लायक दोस्तों का जिन्दगी में होना शायद इसका कारण होगा. तो गोवा से चला वो एक पेज का सीवी आ पहुंचा अज़ीम प्रेमजी फाउन्डेशन जहाँ मैं पिछले 8 बरसों से हूँ. एक पेज के सीवी की कहानी भी अजीब है कि बचपन में पोलिश कवियत्री विस्साव शिम्बोर्स्का की कविता पढ़ ली थी बायोडाटा जिसमें वो लिखती हैं कि जीवन कितना भी बड़ा हो/बायोडाटा छोटा ही होना चाहिए. वैसे मेरा तो जीवन भी छोटा ही था. क्या लिखती मैं. और बायोडाटा बनाया भी पहली बार ही था कि इसके पहले बायोडाटा बनाने की जरूरत पड़ी नहीं थी. तो वो एक पेज का पुर्जा जिस पर बायोडाटा लिखा था भेज दिया गया.

मैंने बस नाम भर सुना था अज़ीम प्रेमजी फाउन्डेशन का और यह भी कि एजुकेशन में काम करता है. क्या काम, कैसे काम करता है कुछ पता नहीं था. सच में कुछ भी नहीं. और जब इंटरवियु के लिए कॉल आई तो कुछ लोगों ने वेबसाईट की लिंक भेज दी कि पढ़ लो, जान लो संस्था के बारे में. मैंने सोचा पढकर जाना तो क्या जाना, जायेंगे, मिलकर जानेंगे. शिक्षा के बारे में मेरी समझ उतनी ही थी जो मेरे स्कूल कॉलेज के अनुभव थे और अख़बारों में काम करने के दौरान आने वाली ख़बरें. जाहिर है यह बेहद नाकाफी था. हाँ, मुझे यह जरूर पता था कि यह जो सिस्टम है न शिक्षा का बहुत बुरा है. ये सीखने के मौके कम देता है, न जानने वालों को अपमानित करने के तरीके ज्यादा जानता है.

सरकारी स्कूलों में पढने से लेकर शहर के बेहतरीन कॉलेज, यूनिवर्सिटी तक में पढ़ने के अलग-अलग अनुभवों में यह बात एक सी ही थी कि कुछ बेस्ट स्टूडेंटस ही शिक्षा व्यस्व्स्था के परचम को लहराते हैं. चाहे वो अख़बारों में टापर्स की तस्वीरों का छपना हो या खुलेआम कुछ बच्चों को कम जानने पर अपमानित किया जाना.

मेरे सामने एक ऐसी संस्था थी जो मुझसे पूछ रही थी कि इस शिक्षा व्यवस्था को लेकर मेरी राय क्या है. सच कहूँ मेरा मन कसैला ही था. कक्षा 1 और 2 में पढ़ाने वाले गोपी सर के अलावा कोई शिक्षक याद नहीं जिसने मेरी शिक्षा को बेहतर बनाया हो. गोपी सर भी पढ़ाने के लिए कहाँ याद हैं, वो याद हैं कि वो मेरी चुप्पी को समझते थे और सर पर हाथ रखते हुए हौसला देते थे.

मैंने एक बात जानी है अपने जीने से कि ईमानदारी और सच्चाई के लिए आपको कोई तैयारी नहीं करनी पड़ती. आप जैसे हैं वैसे ही खुद को रख दीजिये...बस. यही मैंने हमेशा किया. यह संस्था अजीब ही थी/है. यह आपसे सवाल नहीं करती आपके सवालों को रिसीव करती है. मैंने सिर्फ इतना कहा था कि मुझे खुद से सिर्फ लिखना ही आता है थोड़ा बहुत, अगर शिक्षा में बदलाव के इस बड़े काम में मेरा यह काम किसी तरह कोई भूमिका निभा सके तो मुझे ख़ुशी होगी.

ऐसी संस्थाएं या ऐसे लोग मैंने नहीं देखे जो आपको आपके जानने से जायदा आपकी मंशा को परखते हैं. मुझे काफी समय लगा संस्था को समझने में, शिक्षा के मुद्दों को समझने में, दिक्कत कहाँ है, कैसे दूर हो सकती है. मेरे लिए हर दिन कुछ नया सीखने का दिन था. हर दिन एक नयी चुनौती से टकराने का. जैसे कक्षा 1 में फिर से दाखिला लिया हो. उजबक की तरह सबको सुनती थी, समझती थी, हाँ लिखने पढने को लेकर मेरी पिछली भूमिकाओं को देखते हुए संसथान ने मुझे प्रकाशन जिम्मेदारी जरूर दे दी थी. मैंने शिक्षकों की कहानियों को करीब से जाकर देखा, सुना महसूस किया. यह मेरे भीतर के पत्रकार को भरपेट मिलने वाली खुराक जैसा था. इन कहानियों को देश भर के अख़बारों में पत्रिकाओं में प्रकाशित होने भेजना शुरू किया. अपने अनुभवों को लिखना शुरू किया. और शुरू किया एक नया सफर न जाने हुए को जानने का. दूर-दराज के शिक्षकों से मिलती उनकी जर्नी को समझती, बच्चों से मिलती सब कुछ बदल रहा था. मैं बदल रही थी. हर दिन मेरा विद्यार्थी होना निखर रहा था.

अब समझ में आना लगा था कि असल में शिक्षा ही है बदलाव का असल टूल. और शिक्षा को डिग्री समझना बड़ी भूल है. शिक्षा में वो क्या और क्यों मिसिंग है जो एकेडमिक ग्रोथ की तरह धकेलते हुए ह्यूमन होने से दूर कर देता है. वो क्या है जो काम्पटीशन और होड़ बनाकर रख देता है शिक्षा को. समाज में यह जो असमानता, भेदभाव है क्या इसका कारण अशिक्षा है या ठीक शिक्षा का न होना है? दिमाग में हलचल होने लगी थी. मैं शिक्षा के उन डाक्यूमेंट्स को पढ़ रही थी जिनके नाम सुनकर शुरू शुरू में डर लगता था. उन शिक्षाविदों को पढ़ रही थी जिनके भारी भरकम नाम डराया करते थे.

मैं उन चिंतकों और फिलॉसफर्स को अब नए पर्सपेक्टिव से पढ़ रही थी जिन्हें पॉलटिकल साइंस की स्टूडेंट होने के नाते और अपनी इच्छा के चलते भी अलग पर्सपेक्तिव से पढ़ा था. पढ़ना मुझे हमेशा से पसंद था. राजनीति और साहित्य मेरे प्रिय विषय रहे. अब मैं नए जानर में प्रवेश कर रही थी. गिजुभाई, फ्रेरे को एक साथ पढ़ने के अनुभव थे. वाय्गोसकी, को दोस्तोवस्की को साथ में पढ़ रही थी. कृष्ण चंदर और कृष्ण कुमार को पढ़ रही थी. मुझे बड़ा अच्छा लग रहा था एक अवेयर लर्नर होना. जिस पर कोई प्रेशर नहीं था कुछ पढने का इम्तिहान देने का, कहीं खुद को साबित करने का. लेकिन अगर आप चाहें तो पूरे मौके थे पढने के समझने के. अनुभव करने के लिए स्कूलों की, गांवों की यात्राएँ थीं और उन सब कामों को फील्ड के साथियों के अनुभवों को सहेजने के लिए हमारे पास दो पत्रिकाएं थीं, उम्मीद जगाते शिक्षक और प्रवाह.

कोई भी काम आपको कितना ही अच्छा लगता हो और आप उसे कितने ही बेहतर ढंग से करते हों एक दिन आप उससे ऊब ही जाते हैं. लेकिन इस संस्था में आपको लगातार खुद को एक्सप्लोर करने का, नया सीखने का अवसर मिलता रहता है. मैंने यहाँ भाषा में काम करना शुरू किया. पढ़ना कैसे बेहतर होता है और पढ़ाना कैसे बेहतर होता है इसको लेकर समझ को विकसित करना और जुड़ना स्कूलों से. हर दिन कोई नयी ऊर्जा लिए घर लौटना होता था. कई बार मेरी आँखें पनीली हो जाती थीं, जब कोई शिक्षक यह कहता वो जो आपने बताया था न मैंने वैसे किया और बच्चों को बहुत अच्छा लगा. इतना सुख होता है जब स्कूल में आया देख बच्चे ख़ुशी से चहक उठते.

ये नयी दुनिया मेरी दुनिया बदलने लगी. जब कोई आप पर भरोसा करता है न तब वह उस भरोसे के लायक बनने की जिम्मेदारी भी थमा देता है. भाषा में को-डेव की प्रक्रिया ने बहुत सिखाया. सब मुझसे ज्यादा जानते थे, जानते ही हैं मैं सबसे सीख रही थी. मेरे पास वो सवाल थे जो बच्चों को सीखने के बीच खड़े थे, वो सवाल थे जो शिक्षकों के सिखाने के बीच खड़े थे. अपने से मेरे तईं हमेशा सवाल ही रहे हैं मैं उन सवालों को लेकर घूमती, जो मिलता उससे पूछती, किताबें पलटती रही. यह यात्रा अभी चल रही है. भाषा में काम करने के दौरान डायरी और यात्रा विधा पर काम करना बहुत समृद्ध करने वाला अनुभव रहा. डायरियां पढ़ी खूब थीं, यात्राएँ करने का शौक रहा है लेकिन इनका पढने-लिखने से जुडाव देख पाना और उस जुडाव को कक्षा में करके देख पाना एक अलग ही अनुभव था. बच्चे जब स्कूल में डायरी लिखने लगे, पत्र लिखने लगे और फिर वो जब बताते उन्हें कैसा लगा तो लगता कि लिखने को लेकर जो गांठें हैं खुल रही हैं. यही शिक्षकों के संग भी हुआ. बहुत सारे शिक्षक साथियों ने डायरियां लिखनी शुरू की, पढने-लिखने की संस्कृति के तहत ढेर सारे शिक्षक साथियों ने अपने अनुभव साझा किये कि किस तरह पढ़ना व्यक्ति के तौर पर समृद्ध करता है और जाहिर है शिक्षक के तौर पर भी और जिसका सीधा जुड़ाव कक्षा शिक्षण से होता ही है.

रेखा चमोली की डायरी इसका एक बड़ा प्रमाण बन चुकी है. शिक्षक साथियों और अपने फाउन्डेशन के साथियों में भी लिखने को लेकर जो संकोच था उसे तोड़ने की कोशिश की. इसलिए नहीं कि किसी को लेखक बनाना उद्देश्य था, या सबको लेखक ही बन जाना चाहिए. नहीं, बल्कि इसलिए कि अनुभवों को सहेजा जाना जरूरी है. शिक्षकों का अपने शिक्षकीय अनुभवों को लिखना वैसा ही है जैसे किसान का लिखना अपने खेत की मिट्टी और फसल के बारे में लिखना. मुझे पुश्किन हमेशा ऐसे मौकों पर याद आते हैं, जब वो कहते हैं, ‘अच्छा शास्त्रीय और सधा हुआ लिखना आसान है, ऊबड़ खाबड़ और सच्चा लिखना कठिन.’ मैं सबको सच्चे और ऊबड़-खाबड़ की ओर जाने को कहती. मैं भी तो उसी राह पर हूँ अच्छे लिखे की किताबों से तो दुनिया भर के पुस्तकालय भरे ही हैं. शिक्षक साथियों की हिचक टूटने लगी, फाउन्डेशन के साथियों की भी. उनके सच्चे सरल अनुभवों से शिक्षा जगत में सकारात्मकता की रौशनी जल उठी है.

इधर शिक्षक साथी कलम से दोस्ती करने लगे हैं उधर मेरा सीखने की इच्छा से रिश्ता लगातार गाढ़ा हो रहा है. इसमें लगातार कुछ नयापन जुड़ रहा है. इन दिनों गणित की दुनिया के दरवाजे खुले हैं. जिन नम्बरों को देखकर डर लगा करता था अब उनसे दोस्ती होने लगी है. किसी भी सीखने की शुरुआत की पहली सीढ़ी उस अजाने से दोस्ती होना ही तो है.

सीखने का यह सफर चल रहा है. हम सब को-लर्नर के तौर पर एक साथ जुड़े हैं और हाथ थामकर चल रहे हैं. इस हाथ थामने की खूबी यह है कि किसी को कुछ ज्यादा आता होगा किसी को कुछ कम लेकिन को-लर्नर होते ही वो जानना और कम जानना सबका साझा होने लगता है. जानने का कोई अहंकार नहीं होता, न जानने की कोई गिल्ट नहीं होती यह सफर हर किसी को समृद्ध करता रहता है...

मैं एक बेहतर विद्यार्थी होना सीख रही हूँ.



Saturday, April 25, 2020

बस जरा सर पर हाथ रख देना...



 प्रतिभा कटियार
स्कूल से लौटते हुए उस रोज मेरा मन इतना बेचैन था कि कुछ सूझ ही नहीं रहा था. बेचैनी इतनी ज्यादा थी कि सोचा साथियो से साझा करुँगी तो शायद कुछ कम होगी लेकिन ऐसा भी नहीं हुआ. वो दिन बीते आज महीनों बीत चुके हैं लेकिन अब तक वह बेचैनी जस की तस है. हाँ, इस बीच उस बेचैनी में कुछ नए आयाम जुड़े जरूर हैं. उस रोज जो हुआ वो कुछ भी अनोखा नहीं था, रोज जैसा ही था फिर भी बेचैनी क्यों हुई इस कदर.

वाकया कुछ यूँ है कि उस रोज मैं एक ऐसे स्कूल से लौट रही थी जहाँ मैं पहले भी चार-पांच बार जा चुकी थी. स्कूल के लगभग सभी 22 बच्चे मुझे और मैं उन्हें नाम से जानने लगे थे. हममें दोस्ती हो चुकी थी. पक्की वाली दोस्ती. मैं उन्हें कहानियां सुनाती, बदले में वो भी मुझे कहानियां सुनाते. बातें करते. उस रोज कक्षा 5 में कुछ समय बिताया. कक्षा 5 में 9 बच्चे हैं. सभी बच्चे पोटली की किताबें पढ़ते हैं, पोटली लाइब्रेरी का रजिस्टर बच्चे ही मेनटेन करते हैं. वो कहानियों को सिर्फ पढ़ते नहीं समझकर पढ़ते हैं और उस पर बातचीत भी करते हैं. उस रोज उन पढ़ी हुई कहानियों में उन्हें क्या अच्छा लगा इस पर लिखने वाला खेल हमने खेला. अनुभव यह है कि इस तरह अपनी मर्जी से लिखने को कहने पर बच्चों को अच्छा लगता है, खासकर तब जबकि उन्हें पता हो कि उनके लिखे को जांचा नहीं जायेगा. सभी बच्चों ने लिखना शुरू किया. फिर एक-एक कर बच्चों ने अपना लिखा हुआ पढ़ना शुरू किया. कक्षा के 3 बच्चे भुवन, सोमाली और रूद्र कॉपी से सर नहीं उठा रहे थे. ऐसा मालूम हो रहा था कि वो बहुत गंभीर होकर कुछ लिख रहे हैं. जब सारे बच्चों ने अपना लिखा पढ़कर सुना दिया तब भी ये 3 बच्चे कॉपी में ही सर घुसाए बैठे थे. मैंने प्यार से पूछा, जितना लिखा है उतना ही दिखा दो...तो उनके पास बैठे बच्चों ने कहा इनो लिखना नहीं आता मैडम. ऐसा कहने वाले बच्चे के चेहरे पर उपहास का हल्का भाव था, उन बच्चों ने सर और कॉपी में छुपा लिया. मैंने मैडम की ओर देखा. मैडम ने बहुत सहजता के साथ कहा, ‘इनको नहीं आता.’ ऐसी सहजता और वो उपहास मिलकर मुझे बेचैन करने के लिए काफी थे. लेकिन इससे ज्यादा मुझे फ़िक्र थी उन बच्चों की कि उन्हें कैसा महसूस हो रहा होगा. उन्हें सहज करने के इरादे से मैंने कहा, ‘कोई बात नहीं, नहीं आता लिखना तो तुम ऐसे ही बताओ तुमने जो कहानी पढ़ी वो तुम्हें कैसी लगी.’ बच्चे खड़े तो गए लेकिन बोले कुछ नहीं. उनके हाथ में किताब थी लेकिन वो चुप थे. थोड़ी देर बाद भुवन ने कहा, ‘मैडम हमें पढ़ना भी नहीं आता.’

मेरे लिए यह समझना मुश्किल था कि इन बच्चों को अपना नाम तक लिखना नहीं आता था और न ही वे किताब का शीर्षक पढ़ पा रहे थे. जबकि अपनी पिछली 5 स्कूल विज़िट के दौरान मैंने इन बच्चों को काफी सक्रिय और सीखने को उत्सुक पाया था. ये हर गतिविधि में बराबर शरीक होते थे खासकर भुवन. वो तो क्लास का मॉनिटर भी है. मैंने उसे किताबें पढ़ते हुए भी देखा है और एक बार तो उसने किताब को पलटते हुए पूरी कहानी भी सुनाई थी. मैंने जब पूछा कि ‘तुम तो उस दिन कहानी सुना रहे थे न किताब से,’ तो भुवन ने इत्मिनान से कहा ‘वो तो मैं साथ वाले बच्चों को पढ़ते हुए सुनता हूँ तो समझ जाता हूँ कि किस पेज पर किस जगह क्या लिखा है इसलिए.’ अब भुवन मुस्कुरा रहा था. उसने और बाकी दोनों बच्चों ने, कक्षा के बाकी बच्चों ने और शिक्षकों ने यह मान लिया है कि ये तीनों पढ़ना लिखना नहीं सीख सकते. मैडम का कहना था कि ‘कुछ बच्चे नहीं ही सीख सकते, ये वही बच्चे हैं. सारे बच्चे सीख जाएँ जरूरी तो नहीं है न?’ ऐसा मैडम मुझसे कह रही थीं या खुद से पता नहीं लेकिन मैं परेशान थी यह सोचकर कि जो बच्चा दोस्त को पढ़ते देखकर यह समझ जाता है कि किस पेज पर क्या लिखा है वो खुद क्यों पढना लिखना सीख पा रहा है. ये बच्चे अनुपस्थित रहने वाले बच्चे भी नहीं हैं. भुवन की बड़ी-बड़ी आँखे और मुस्कुराकर आत्मविश्वास के साथ कहना कि ,’मैडम हमको पढ़ना भी नहीं आता, लिखना भी नहीं आता’ जैसे आत्मा को घायल कर रहा था. उसे स्कूल की व्यवस्था ने यह अच्छे से समझा दिया था कि कुछ बच्चे नहीं ही सीख पाते हैं और वो उन बच्चों में से हैं. सच कह रही हूँ महीनों बाद भी यह सब लिखते हुए भुवन की आँखें मेरे सामने हैं. ये हर उस बच्चे की आँखें हैं जो पढ़ना लिखना सीख पाने से दूर हैं, जो शिक्षा की रेल में एक अलग डिब्बे में सफर कर रहे हैं, कहीं भी कभी भी उतर जायेंगे. कोई कक्षा 3 के बाद कोई 4 के बाद कोई 5 के बाद. व्यवस्था भी इनके यूँ उतर जाने से बेचैन नहीं है क्योंकि ये बच्चे आंकड़े बिगाड़ते हैं. उसी स्कूल में भुवन ने कक्षा 1 में दाखिला लिया था. आज उसी स्कूल से कक्षा 5 पास करके जाने वाला है बिना लिखना पढ़ना सीखे. हालाँकि कि लिखने-पढने से इतर भुवन हिसाब का पक्का है, हर काम ठीक से करता है, नाटक, कविता, कहानी सबमें शामिल होता है.

अजीब मन मिला है कि हमेशा ही हार गये, पिछड़ गए, हाशिये पर छूट गए लोगों के करीब जाकर बैठ जाता है. मैंने क्या किया, कितना कर पायी और आज भुवन कुछ महीनों में अपना नाम और दोस्तों का नाम लिखने लगा है की यात्रा पर बात करना बेमानी है क्योंकि सवाल तो इससे काफी बड़ा है. ठीक इसी वक़्त मुझे राजस्थान के एक साथी द्वारा सुनाया गया ऐसा ही अनुभव याद आता है. बच्चे का नाम दिलखुश था, खूब शैतान इतना कि कक्षा में किसी को पढने लिखने न दे, सब सामान बिखेर दे, झगड़ा करे सबसे और पढ़े लिखे बिलकुल न. शिक्षक बार-बार उसके अभिभावकों को बुलाकर कुछ कहें तो अभिभावक भी उसे ही पीटना शुरू कर दें कि घर पर भी यही करता था वो. फिर कुछ महीनों तक जब फाउंडेशन की साथी ने उसके साथ काम किया तो पाया कि बच्चे का दिमाग बहुत तेज़ है और गणित में तो वो बेमिसाल है. फिर अल्मोड़ा की वो बच्ची याद आ गयी जो नीरू मैडम का पल्ला-पकडे पकड़े घूमती थी और किसी से बात नहीं करती थी, उसे भी पढने लिखने में कोई दिलचस्पी नहीं थी. फिर एक और बच्चा दिनेशपुर का याद आया जिसका स्कूल में आना व्यवस्था को खराब करने जैसा होता था. सिर्फ झगड़ा और गाली गलौज करना ही उसका काम था. वो पढता भी नहीं था और पढ़ना चाहता भी नहीं था इसलिए बाकि बच्चों की कॉपी फाड़ता था पेन्सिल छुपा देता था. बाद में उस बच्चे के शिक्षक ने पाया कि उस बच्चे को भूख भर खुराक ही नहीं मिल रही है न घर पर न स्कूल में. उसकी भूख अन्य बच्चों से ज्यादा थी और खाना उसे सबके बराबर मिलता था. फिर एक एक कर न जाने कितने उदाहरण आँखों के सामने तैरने लगे. एक बच्ची जिसे दीखता कम था, एक जिसकी माँ की मृत्यु हो गयी थी, एक जिसके पिता रोज माँ को शराब पीकर पीटते थे, एक जिसका भाई उसकी किताबें फाड़ देता था.

ये सब बच्चे स्कूल जाकर भी सीख नहीं पा रहे थे. दिक्कत तलब यह कि एक व्यवस्था के तहत यह मान लिया गया था कि ये कुछ बच्चे होते ही ऐसे हैं जो सीख नहीं पाते. या स्कूलों में इतना कम शिक्षक स्टाफ है और ऐसे हालात हैं कि अलग से इन बच्चों पर काम करने की सोचना भी मुश्किल है. तर्क सही हो सकते हैं, शायद होंगे भी, आंकड़ों में दर्ज सत्तर या अस्सी प्रतिशत बच्चों के सीख जाने से संतुष्ट भी हो लेंगे लेकिन वो आँखें पीछा करती रहेंगी जो सीखने की इच्छा से स्कूल में दाखिल हुई थीं.

सरकारी स्कूलों में जो बच्चे आते हैं व्यवस्था को उनके और उनके परिवेश के प्रति संवेदनशील होना कितना जरूरी है यह बात समझ में आती है. किसी भी तरह के सीखने की शुरुआत उसी संवेदना के बिंदु से होती है जहाँ सीखने की इच्छा और सिखाने में स्नेह का मिलन होता है. अपने ही एक साथी की कही बात मुझे किसी भी तरह के सीखने-सिखाने को लेकर बताया गया मन्त्र लगता है कि पहले बच्चों के सर पर हाथ रखो प्यार से, उनकी आँखों में देखो तो सही कितने सपने हैं वहां, उनसे दोस्ती तो करो फिर आ जायेया लिखना भी पढ़ना भी. सोचती हूँ कि शिक्षा का इतना बड़ा तन्त्र ऐसी भावुक बातों से तो नहीं चलने वाला तो पाती हूँ कि हमारे शिक्षा के दस्तावेजों में भी इस संवेदना की पूरी स्पेस है. यूँ ही नहीं सभी के लिए न्यायोचित शिक्षा, बच्चे पर केन्द्रित उसकी जरूरत पर आधारित शिक्षा, सीखने की प्रक्रिया में हर बच्चे की प्रतिभागिता की बात कही गयी होगी. चाहे नेशनल एजुकेशन पॉलिसी हो या एनसीएफ 2005 या नेशनल करिकुलम फॉर एलीमेंटरी एंड सेकेंडरी एजुकेशन. अभी हाल ही में, 2005 के राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (एनसीएफ) ने एक व्यापक दृष्टिकोण प्रदान किया है, जिसमें सभी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण समावेशी शिक्षा प्रदान करने के तरीके शामिल किए गए हैं। वह शिक्षकों द्वारा निम्नलिखित कामों को करने की जरूरत को स्पष्ट करती है:

· हर बच्चे की अनोखी जरूरतों के प्रति संवेदनशील होना
· बच्चे पर केंद्रित, सामाजिक रूप से प्रासंगिक और न्यायोचित पढ़ाने/सीखने की प्रक्रिया प्रदान करना
· उनके सामाजिक और सांस्कृतिक सन्दर्भों में विविधता को समझना।

यानि मामला सिर्फ भावुक होने का नहीं है उस मर्म को समझने का है जहाँ ये बातें सिर्फ दस्तावेजों में दर्ज होकर न रह जाएँ कक्षा में हर बच्चे के जीवन से संवेदना के धरातल पर जुड़ सकें. बच्चों की जरूरतों को समझे बिना, उनके और उनके परिवेश को समझे बिना, उसके प्रति सम्मान का भाव लाये बिना इसे अमल में लाना मुश्किल है.

इसलिए जब कोई शिक्षक यह कहते हैं कि इन बच्चों के अभिभावक इन पर ध्यान नहीं देते, तो मुझे ‘इन बच्चों’ से और प्यार हो जाता है. और मैं शिक्षक साथियों से कहती कि सबका सीखना जरूरी है क्योंकि सीखना हक है सबका. ठीक उसी तरह जैसे जीवन पर हक है सबका. इसकी शुरुआत की पहली पैडागौजी है कक्षा में आये हर बच्चे से मन का रिश्ता बना पाना, उनका सम्मान करना और अपनी प्रक्रियाओं में थोड़ा अतिरिक्त चौकन्नापन शामिल करना कि कहीं कोई छूट तो नहीं रहा...

Monday, April 13, 2020

स्याह सन्नाटे के दौर में गुब्बारों की आमद


- प्रतिभा कटियार

लॉकडाउन का चौथा दिन था. सड़को पर सन्नाटा पसरा हुआ था. वही सड़कें जो किसी वक़्त ट्रैफिक जाम से कराहा करती थीं. इतनी शांति चारों ओर जैसे किसी और ही जहाँ में आ गए हों. लेकिन इस शांति में उदासी है. अफरा-तफरी वाली, भागमभाग वाली जिन्दगी से कुछ पलों को निजात तो चाही थी लेकिन वो ऐसे मिलेगी सोचा नहीं था. उदासी से घिरे मन के साथ उस रोज जब खिड़की से खाली सडक को देख रही थी तब अचानक साइकल पर एक गुब्बारे वाला आता दिखा. सुबह नौ बजे का वक़्त था. मुझे उस गुब्बारे वाले का चेहरा नहीं दिखा लेकिन गुब्बारों में उम्मीद दिखी जैसे रोज खिलते फूलों में दिखती है. वो गुब्बारे वाला जानता तो होगा कि कितना भला होगा उसका कुछ गुब्बारे बेचने से. जब लोग राशन सब्जी लेने को परेशान हों ऐसे में भला गुब्बारों के बारे कौन सोचता है फिर भी वो निकला है गुब्बारे लेकर. कुछ घंटो की छूट में उसे यही सूझा? उसे नहीं सूझा राशन की दुकान तक दौड़ जाना, उसके मन में क्या होगा…क्या जाने. गुब्बारे वाला चला गया लेकिन मुझे उम्मीद से भर गया. जब एक गुब्बारेवाला अपने लिए रास्ते बना रहा है तो हम क्यों सिर्फ उदासियों को ओढ़े बैठे रहें.

उसी रोज उदासी को किनारे लगाकर बच्चों को फोन लगाती शिक्षिका के चेहरे पर चमक लौट आई. बहुत सारे शिक्षक साथियों के पास वक़्त नहीं है दिया और थाली पर फेसबुक पर विमर्श करने का. उनके पास अब पहले से ज्यादा काम है. वो बच्चों से फोन पर सम्पर्क में हैं. उनके परिवारीजन की खैरियत ले रहे हैं. और यथासंभव मदद करने की कोशिश कर रहे हैं. उत्तराखंड के सरकारी स्कूलों में पढ़ाने वाले बहुत सारे शिक्षकों से बात करते हुए महसूस हुआ कि असल में शिक्षक होना असल में होता क्या है. शिक्षक न सिर्फ समुदाय की मदद के लिए रास्ते निकाल रहे हैं, उस मदद में प्रशासन को सहयोग कर रहे हैं बल्कि बच्चों को चारों तरफ छाई नकारात्मकता से बचाने की कोशिश ही कर रहे हैं.

चूंकि ये बच्चे जिस समुदाय से आते हैं वहां ज्यादातर रोज कमाने और रोज खाने जैसे हालात हैं और शिक्षकों से ये लोग सीधे सम्पर्क में होते हैं इसलिए इनके लिए आसान होता है सही व्यक्ति तक पहुँच पाना. कुछ शिक्षकों ने बच्चों से रोज बात करने का और उन्हें फोन पर कहानियां सुनाने, कवितायेँ सुनाने का काम शुरू किया है. कुछ शिक्षकों ने उन्हें फोन पर कुछ काम देना शुरू किया है. स्मार्ट फोन सबके पास नहीं होते हैं यह जानते हैं शिक्षक इसलिए शिक्षक साथियों ने टेक्स्ट मैसेज के जरिये, पहेलियाँ, सवाल आदि भेजकर उन्हें हल करने को बच्चों को प्रेरित किया है. शुरू-शुरू में तो बच्चों और उनके अभिभावकों को यह समझ में नहीं आया लेकिन टीचर्स ने जब फोन करके उन्हें इस प्रक्रिया के बारे में समझाया तो उन्हें अच्छा लगा. सबसे ज्यादा उन्हें अच्छा लगा कि मैडम, सर लोग उन्हें याद कर रहे हैं. अपनेपन के रिश्तों में ढले बिना भला कौन सी शिक्षा हुई है यही वो वक़्त है जब शिक्षक और शिक्षार्थी के रिश्तों को निखरना है. इसी समय में शिक्षक बच्चों से कह पा रहे हैं कि हम सचमुच आपके साथ हैं, सिर्फ कहने के लिए नहीं.

हमने जिन भी शिक्षकों से बात की, जो समुदाय के लिए मदद की और बच्चों के साथ शिक्षा को लेकर कुछ कर रहे हैं सभी ने उनके कामों का जिक्र न करने की बात कही. इसमें उतरकाशी, चमोली, बागेश्वर, देहरादून समेत कई जगहों के शिक्षक शामिल हैं. यह उनके काम का जिक्र न करने की बात उन शिक्षकों के प्रति सम्मान को और बढ़ा देता है.

कौन कहता है कि सरकारी स्कूलों के शिक्षक सिर्फ आराम पसंद होते हैं. कम से कम उत्तराखंड के शिक्षक तो उनसे की जा रही तमाम अपेक्षाओं से कहीं आगे तक करने की सोच भी रहे हैं और कर भी रहे हैं.

कहीं औनलाइन क्लासेस चल रही हैं, कहीं फोन पर इमला बोला जा रहा है, कहीं आधी कहानी सुनाकर उसे पूरा करने को कहा जा रहा है और कहीं बच्चों को कुछ मजेदार सवालों में, पहेलियों में उलझाया जा रहा है. मुहावरों और कहावतो को ढूंढकर लाने को भी कहा जा रहा है, पहेलियों में मम्मी पापा को भी शामिल करने को कहा जा रहा है.

इस बुरे वक्त से लड़ने का यह तरीका भी तलाश रहे हैं उत्तराखंड के कुछ शिक्षक साथी. शिक्षक संगठन भी समुदाय की सहायता में पूरी तैयारी और सकारात्मकता से जुटे हैं. यह वक़्त बीत जाएगा, हम काम पर लौटेंगे और जब इस दौर के दिनों को याद करेंगे तो ये कहानियां भी याद आएँगी और वो गुब्बारे वाला भी…

(नैनीताल समाचार में प्रकाशित-https://www.nainitalsamachar.org/corona-aur-gubbare-wala/?fbclid=IwAR2DaaMGmq2Ucac26rdIrZxQa9cJcizPEjDHJl2cBFsbSZipZc4YcdlqiCg)

Wednesday, April 8, 2020

लॉकडाउन में खुलना भीतर के तालों का


अरसे बाद सुबहों को सुन पा रही हूँ. शामों में जो एक धुन होती है न शांत सी, मीठी सी उसे गुनगुना पा रही हूँ. चाय की मिठास में पंछियों की चहचआहट घुल रही है. वक़्त के पीछे भागते-भागते वक्त को जीना भूलने लगे थे हम शायद. आज वक्त मिला है खुद को समझने का है. अपने आप से बात करने का है. सोचने का कि मशीन की तरह यह जो हम भागते जा रहे थे, उसके मानी क्या थे आखिर. द्वेष, ईर्ष्या, बैर इन सबका अस्तित्व क्या है आखिर. जीवन बहुत कीमती है. इसे प्यार करना, लम्हों को युगों की तरह जीना, लोगों को अपने होने से बेहतर महसूस करवा सकना और क्या?

इससे बात करना पसंद नहीं, उसने ऐसा क्यों कहा, वो ऊंचा है, वो फलां धर्म का है, मैंने तो हमेशा सबके लिए अच्छा किया फिर मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ...जैसे जाने कितने ख्याल हैं जो हमें बेहतर मनुष्य होने से रोकते हैं. जाहिर है ये ख्याल हम लेकर तो नहीं जन्मे थे, ये सब यहीं मिले हमें सामाजिकता, दुनियादारी के वैक्सिनेशन के बाद. हम वो विचार और व्यवहार अपना समझकर ढोने लगे जो न हमारे थे न हमारी च्वायस थे. तो हम अपने भीतर किसी और को जी रहे हैं इतने बरसों से?

यह मुश्किल वक़्त हमसे कुछ कहने आया है. इतना विनाशकारी वायरस भी हमें कुछ सिखा रहा है कि वो हमें सिर्फ मनुष्य के तौर पर पहचानता है. उसके लिए इस बात के कोई मायने नहीं कि आप किस देश के, किस राज्य के, धर्म के, जाति हैं. कौन से ओहदे पर हैं और क्या सामाजिक आर्थिक हैसियत है आपकी? उसके लिए हमारा मनुष्य होना ही काफी है. और हम न जाने कितने खांचों में बंटे हैं. एक पिघलन सी महसूस हो रही है भीतर. जी चाहता है अपने सब जानने वालों से जोर-जोर से बोलूं कि उनसे प्यार है. सबसे माफिया मांग लूं कि कभी दिल दुखाया हो शायद मैंने. कहूँ कि देखो न आज गले भी नहीं मिल सकते और गले मिलने के वो सारे लम्हे जब पास थे, हमने उन लम्हों को झगड़ों में गँवा दिया.

यह वक़्त हमें वो सिखाने आया है जो सीखने को लोग न जाने कितने पुस्तकालयों की ख़ाक छानते रहे, कितने वृक्षों के नीचे धूनी जमाने को भटकते रहे. मनुष्यता का पाठ.

अभी कुछ ही दिन पहले हमने दंगों की आग देखी है, बर्बर हिंसा देखी है. हिंसा बाहर बाद में आती है पहले वो भीतर जन्म लेती है. वो किसी भी बहाने बाहर फूट पड़ने को व्याकुल होती है. यह समय अपने भीतर की उस हिंसा को समझने का है, उसे खत्म करने का है.

यह वक्त गुजर जाएगा. यकीनन हम वापस अपनी जिंदगियों में लौट आयेंगे. सब पहले जैसा हो जायेगा. लेकिन...क्या हमें सब पहले जैसा ही चाहिए? क्या हमें पहले से बेहतर दुनिया नहीं चाहिए. मेरी दोस्त बाबुशा कहती है आपदा का यह समय बीत जाने के बाद यदि हम बचे रह जाएँ, और हम एक बदले हुए मनुष्य न हों तो मरना बेहतर है. सच ही तो कहती है वह.
यह वक़्त अपने भीतर नमी को सहेज लेने का है, उन सबके प्रति प्रेम से भर उठने का जिनके प्रति कभी भी जरा भी रोष रहा हो. क्या होगा इस हिसाब-किताब का कि किसने क्या कहा, किसने क्या किया.
अपने भीतर के विन्रमता के पौधे को, मनुष्यता के पौधे को खूब खाद पानी देने का समय है. जी भर कर रो लेने का, प्यार से भर उठने का समय है. यह समझने का भी कि हमारे ईश्वर, अल्लाह, नानक ने हमें हमारे ही हवाले किया है, हमारी चेतना और संवेदना के हवाले. सोचना है कि हम उनके नाम पर कर क्या रहे हैं.

सामाजिकता ने हमारे भीतर जो खांचे बनाये हैं जिनमें न जाने कबसे हम अनजाने ही लॉकडाउन हैं उनसे खुद को मुक्त करना है. हम बेहतर मनुष्य होकर लौटेंगे और ज्यादा ऊर्जा और सकारात्मकता से काम पर जायेंगे. अपने भीतर पनप रहे नाकारात्मकता के वायरस को खत्म करके हाथ भी मिलायेंगे, गले भी मिलेंगे.

यकीनन इस बार हम पहले से बेहतर मनुष्य होकर मिलेंगे.

Sunday, February 23, 2020

कथन-अमानुषिकता से जूझती दुनिया

कथन का नया अंक है इन दिनों साथ. कथन सजाकर रखने, उलट-पुलटकर देखने और रख देने वाली पत्रिका नहीं है. इसमें डूबना होता है, आप पढकर निकल जाएँ ऐसा इस पत्रिका की सामग्री होने नहीं देती. यह पिछले इतवार की बात है जब कथन की पैकिंग खोली और इत्मिनान वाली धूप में कवितायेँ पढ़ीं. मलखान सिंह की कविताएँ झकझोर देने वाली कवितायें हैं. सभ्य कहे जाने वाले समाज को आईना दिखाती कवितायेँ. लीलाधर मंडलोई,मुस्तफा खान, विमल चन्द्र पांडे, श्रुति कुशवाहा,आत्मा रंजन और विहाग वैभव की कवितायेँ पुनर्पाठ मांगती हैं जैसे हर अच्छी कविता मांगती है. बीते इतवार पढ़ी गयी ये कवितायेँ पूरे सप्ताह जेहन में खदबदाती रहीं. अनुज लुगुन की कविताओं को राजेश जोशी जी की टिप्पणी के साथ पढा. एक कविता के कितने पाठ हो सकते हैं, कितने अर्थ.


आज जब फिर इतवार मिला तो फिर इन कविताओं को पढ़ा. कविताओं के अतिरिक्त अभी दो कहानियां और एक साक्षात्कार पढ़ सकी हूँ. कहानियां सीमा आजाद और प्रियदर्शन जी की. सीमा आज़ाद की कहानी फेसबुक लाइव जहाँ इंटरनेट की दुनिया की हकीकत खंगालती है वहीँ प्रियदर्शन जी की कहानी 'सडक पर औरत' एक रिश्ता बुनती है हर स्त्री का दूसरी स्त्री से. चेतना से उपजा यह रिश्ता संवेदना के तल पर मजबूत होता है.
लाल बहादुर वर्मा जी से संज्ञा की बातचीत संभालकर रखने लायक है. अमानुषिकरण की समस्या पर यह विस्तृत बातचीत है जिसमें जितने मंझे हुए सवाल हैं उतने ही उदार और मुक्त जवाब जिसमें अमानुषीकरण की समस्या के समाधान पर चर्चा तो है लेकिन वर्मा जी पहले समस्या को ठीक से समझने पर जोर देते हैं और कारणों की पड़ताल करते हैं.अभी जो पढ़ना शेष रह गया है उसमें गौहर रजा जी का लेख गांधी के रास्ते पर लौटना ही होगा और राजीव भार्गव का लेख 'ब्रह्मणवाद के विरोध का वास्तविक अर्थ' पहली फुर्सत में पढ़ना है.

बढती अमानुषिकता से जूझती दुनिया इस अंक की थीम है. कथन का यह अंक हम सबके पास होना चाहिए. पढने के लिए दोस्तों को बांटने के लिए और इसमें दी गयी सामग्री पर बातचीत करने के लिए.
मलखान सिंह की एक कविता-

महज इत्तेफाक नहीं है यह
कि सदियों से वे
साढ़े तीन हाथ लम्बी नाक लिए
अवतरित होते हैं
हम पैदा होते हैं नकटे ही
नकटे ही मर जाते हैं.

कि हमारी धोती
घुटने नहीं ढंक पाती हमारे
उनकी धोती अंगूठा चूमती है पैर का
तर्जनी में घूमती है.

कि हल की मूठ भी
पकड़ना नही जानते थे
कहलाते नम्बरदार
हम पूरी उम्र
बैल बन हाँफते हैं
हरामखोर कहलाते हैं.

कि हमारी बस्ती में उगा पौधा
दरख्त होने से पहले ही
सूख जाता है
उनके आंगन का बूढा पेड़ भी
हाथी सा झूमता है.

कि हमारे सर नंगे हैं
हमारे पैर नंगे हैं
वे रोज जूता बदलते हैं
सर पर मुडासा बाँध
चौधराहट पेलते हैं.

कि लम्पट हैं वे
लफंगई करते हैं
हवेलियों में रहते हैं
आँखों के अंधे हम
उम्र भर लददू बने
छत को तरसते हैं.

कि उनकी हर सुबह
सतरंगे पंख लगाये उगती है
हमारी रात है ससुरी
सिमटने का नाम ही नहीं लेती.

तभी तो आज
आज़ादी की आधी सदी बाद
हमारे पेट खाली हैं
हमारे हाथ खाली हैं
हम बिकने जाते हैं चौराहों पर
नहीं बिक पाते जिस रोज
चूल्हा भी नहीं जल पाता है.

Thursday, December 12, 2019

छोटा उ से उम्मीद


इसमें आश्चर्य की भला क्या बात है कि सारा देश जश्न मना रहा है कि एनकाउंटर न्याय हुआ. क्यों होना चाहिए आश्चर्य कि बाबाओं को बचाने के लिए हिंसक होने तक टूट पड़ने वाली भीड़ उसी पुलिस पर फूल बरसाती है जिसके पास जाकर रिपोर्ट लिखवाने जाने से डरती हैं स्त्रियाँ. पुलिस कस्टडी में हुए रेप की संख्या के बारे में नहीं सोचती जनता तो कोई आश्चर्य नहीं होता. कोई आश्चर्य नहीं होता कि इस जनता में ज्यादातर पढ़े-लिखे लोग शामिल हैं. सांसद से लेकर पत्रकार, साहित्यकार, फ़िल्मकार सब. क्यों होना चाहिए आश्चर्य आखिर? हम अतार्किक लोग हैं. हम भीड़ हैं हमें भीड़ बनना सिखाया गया है, तालियाँ बजाना सिखाया गया है. बात मानना और झुण्ड बनकर किसी के पीछे चलना सिखाया गया है. और यही असल सुख है यह भी हमारे भीतर बो दिया गया है. किस बात पर कितना हंसना है, किस बात को किस हद तक सहन करते जाना है सदियों तक और किसे पीट-पीटकर मार डालना है यह सब हमारे लिए कोई और तय करता है. हमने कब खुद के लिए खुद की मर्जी से सोचना सीखा. हम तो बताई गयी मार्जियों पर अपनी मर्जी की मुहर लगाकर ही जीते जा रहे समाज ही रहे हैं हमेशा से.


क्यों आश्चर्य हो जब आपके तार्किक होने और यह पूछने को कि 'क्या यह कोई न्यायिक प्रक्रिया है' गुनाह मान लिया जाय. शिक्षकों के आन्दोलन को, दरकिनार किया जाय और छात्रों के फीसवृद्धि की मांग को देशद्रोह ही कह दिया जाय.

सवाल पूछना आपका काम नहीं था. ताली बजाना था, जयकारा लगाना था. सवाल पूछोगे तो मारे जाओगे इसमें हैरत क्यों भला. क्यों हैरत हो कि हम यह भी न सोचें कि यही पुलिस अपनी ही महिला अधिकारी की रक्षा में नाकाम है. पुलिस क्या कोई व्यक्ति है? भीड़ क्या कोई व्यक्ति है? नहीं दोनों ही सत्ता के खिलौने हैं जिससे सत्ता अपनी-अपनी तरह से खेलती रहती है.

पुलिस महकमा अपने भीतर भी तमाम लड़ाईयां लड़ रहा है. एक सिपाही छुट्टी न मिलने पर 5 लोगों को मारकर खुद को भी मार लेता है यह बात क्यों चर्चा का विषय नहीं बनती. महीनो उन्हें घर जाने को नहीं मिलता, हफ़्तों छुट्टी नहीं मिलती, 16-16 घंटे ड्यूटी करनी पड़ती है. यह पूरे महकमे की कुंठा भरी बाते हैं. ऐसी कुंठा भरी खबरें पुलिसिया अपराधों की राह प्रशस्त करती हैं. पुलिस अपने नकारेपन को इस तरह ढंकती है और हिट हो जाती है. जनता नाच रही है कि न्याय हुआ है, पर क्या न्याय हुआ है? बिलकुल आश्चर्य नहीं होता कि यही जनता सवाल नहीं करती कि बलात्कार, हत्या व अन्य अपराधों में शामिल लोग संसद में क्यों हैं? ओहो जनता ने ही तो उन्हें चुनकर भेजा है आखिर. क्यों भेजा होगा जनता ने उन लोगों को संसद में यह सोचना मना है. हम तमाशबीन समाज हैं क्योंकि ऐसे ही हम बनाये गए हैं. इसमें आश्चर्य कैसा भला. और जो इस भेडचाल में शामिल नहीं हुए हैं, जिन्होंने सवाल करने बंद नहीं किये हैं, जिन्होंने बेहतर समाज का सपना देखना छोड़ा नहीं, जो हकों के लिए अब भी लड़ना जानते हैं उनका अगर मजाक उड़ाया जाए , उन पर मुकदमे दर्ज हों, उन्हें नजरबंद किया जाय, देशद्रोही कहा जाय तो भला क्यों आश्चर्य होना चाहिए. एक जागे हुए दिमाग से ज्यादा खतरनाक भला और क्या होता है, तो उसे घेरने में तो सत्ताएं जुट ही जाएँगी न?

नहीं आश्चर्य होता कि हम सबको, इस पूरे समाज को धर्म, जाति, मंदिर, मस्जिद और कहीं कहीं सत्ता की चापलूसी से मिलने वाले फायदों, पुरस्कारों आदि की अफीम चटा-चटाकर कठपुतली बना दिया गया है. ये कठपुतलियां भीड़ हैं, साइबर सेल हैं. ये कठपुतलियां विलक्षण लेखक हैं, पत्रकार हैं, फ़िल्मकार हैं. इनके पास तर्क हैं जो इंसानियत की पैरवी नहीं करते धर्म की करते हैं, जाति की करते हैं. तर्क जो अपराधियों में भी धर्म देखते हैं और पीड़ित में भी.

आश्चर्य तो यह है कि कोई उम्मीद है जो अब तक बुझी नहीं है. आश्चर्य तो यह है कि एक सुंदर समाज का सपना है जो तमाम किरचों में टूट जाने के बावजूद बचा हुआ है. दूर किसी गाँव में कोई शिक्षक बच्चों को सुना रहा है प्यार भरी कोई कविता और कोई बच्ची लिख रही छोटा उ से उम्मीद.

Friday, October 25, 2019

निर्मल वर्मा स्मृति- बीतकर भी कहाँ बीतता है कुछ


बीतता अक्टूबर पलटकर देख रहा है. सुबह के छह बजे हैं. यह निर्मल वर्मा की सुबह की चाय का वक़्त है. मेरे पास एक प्याला चाय है और हैं निर्मल वर्मा की ढेर सारी स्मृतियाँ. पेड़ों की शाखों पर खिले धूप के गुच्छे अच्छे लगने लगे हैं. गुलाबी ठंड में सिमटी सड़कें अपने आंचल में पीले और लाल फूलों की पंखुडियां समेटे हुए मुस्कुरा रही हैं. दूर किसी कोने पर चाय की टपरी के पास कुछ युवा चाय पी रहे हैं. पास ही नीली गर्दन और सुनहरे पंखों वाली चिड़िया बांस के झुरमुट में छुपने और दिखने का खेल खेल रही है.

थोर्गियर अभी-अभी यहीं कहीं से गुजरे हैं. निर्मल उन्हें देख मुस्कुरा रहे हैं. धीमे क़दमों से चलते हुए वो थोर्गियर के कंधे पर हाथ रखते हुए बेहद धीमे अंदाज और आवाज में कहते हैं, ‘आदमी को पूरी निर्ममता से अपने अतीत में किये कार्यों की चीर-फाड़ करनी चाहिए, ताकि वह इतना साहस जुटा सके कि हर दिन थोड़ा सा जी सके.’ थोर्गियर चाय की टपरी पर रुककर चाय के लिए हाथ बढ़ा देते हैं. निर्मल की बात को चाय के साथ चुभलाते हुए वो नीली गर्दन और सुनहरे पंखों वाली चिड़िया को देखने लगे हैं.

न...न...यह प्राग नहीं है, बर्लिन भी नहीं, पेरिस नहीं, कोपेनहेगन भी नहीं. यह 2019 है. लगभग बीत चुके अक्टूबर की 14 बरस पुरानी पगडण्डी पर निर्मल वर्मा की स्मृति की एक शाख अब तक हिलती है. स्मृति की यह शाख जब हिलती है तो उनके कहानी संग्रह ‘परिंदे’, ‘जलती झाडी’, ‘पिछली गर्मियों में’, ‘कौव्वे और काला पानी’, ‘सूखा व अन्य कहानियां’ याद आते हैं. उनके उपन्यास ‘वे दिन’ ‘एक चिथड़ा सुख’ ‘रात का रिपोर्टर’ ‘लाल टीन की छत’ ‘अंतिम अरण्य’ मुस्कुराते हैं. साथ ही ‘चीड़ों पर चांदनी’ के साए में कोई ‘धुंध से उठती धुन’ सुनाई देती है जो ‘हर बारिश में’ की याद दिलाती है.

निर्मल की डायरी के पन्नों को पलटना अपने भीतर की तमाम गांठों को खोलने सरीखा लगता है. ये पन्ने ज़ेहन पर छाई धुंध को छांटने में मदद करते हैं. उनकी डायरी के इन पन्नों का हाथ थाम काफ़्काई हरारत को अपने भीतर उतरते महसूस करना सुख है. लंदन की सड़कों पर टहलते हुए निर्मल की डायरी के पन्नों की याद का सुख है. किसी दोस्त से प्राग के किस्से सुनना और बर्लिन की यात्रा पर निकल पड़ना सुख है. शिमला की सड़कों से गुजरते हुए शाल को शरीर पर कसकर लपेटते हुए किसी पगडण्डी पर खुद को चलते देखना सुख है. किसी यात्रा के दौरान बड़े से डैने वाले सफेद पंछी(जहाज) के काँधे पर बैठकर बादलों के गाँव में विचरते हुए डूबते सूरज को करीब से देखना और याद करना किसी अल्हड़ सी पहाड़ी धुन को, धुंध में डूबी वादियों में डूबते हुए खुद को डूबने से बचा भी लेना और चीड़ों पर झरती चांदनी को हथेलियों पर उतरते हुए महसूस करना सुख है. यह निर्मल के करीब से होकर गुजरने का सुख है, उन्हें महसूस करने का सुख है. सुख की इस जब्त में उनकी वो सुफेद कोमल और बेहद मुलायम हथेलियों की याद लाज़िम है जब कई बरस पहले ऐसे ही एक मौसम में उनका हाथ मेरे हाथ में था. उस स्नेहिल स्पर्श की स्मृति पलकों के भीतर चमकता हुआ सुख है.

जीवन को देखने का नज़रिया ही तो जीवन को जीवन बनाता है. वरना सांसों के कारोबार से ज्यादा भला क्या है जीवन. निर्मल के करीब बैठना, उस नज़रिये को बनते हुए देखना है. निर्मल का नज़रिया नहीं उनकी जानिब से हमारा खुद का नज़रिया. जीवन के द्वंद्व, उहापोह, आसक्ति, विरक्ति, सामाजिक चेतना, राजनैतिक पक्षधरता, जीवन, मृत्यु सब पर सोचने का एक ढब मिलता है उनके यहाँ.

उनकी डायरियां सिर्फ यात्राओं के कुछ पड़ाव भर नहीं हैं, वो पूरी यात्रा हैं, जीवन की यात्रा. मनुष्य के चेतनशील, संवेदनशील बनने की यात्रा. एक ईमानदार यात्रा जिसमें सिर्फ सुख नहीं था. इसी के साथ यह बात भी मन में उठती है कि सुख आखिर है क्या? वो लिखते हैं, ‘यात्राओं में अनेक ऐसी घड़ियाँ आई थीं जिन्हें शायद मैं आज याद करना नहीं चाहूँगा...लेकिन घोर निराशा और दैन्य के क्षणों में भी यह ख्याल कि मैं इस दुनिया में जीवित हूँ, हवा में साँस ले रहा हूँ, हमेशा एक मायावी चमत्कार-सा जान पड़ता था। महज़ साँस ले पाना-जीवित रहकर धरती के चेहरे को पहचान—पाना यह भी अपने में एक सुख है—इसे मैंने इन यात्राओं से सीखा है.’

उनका कहा कान में गूंजता है, ‘जिस हद तक तुम इस दुनिया में उलझे हो, उस हद तक तुम उसे खो देते हो.’

डायरियों के साथ यह खूबसूरत बात होती है कि वो ईमानदारी से खुद को अभिव्यक्त करने का ठीहा बनती हैं. डायरियों की बाबत निर्मल खुद कहते हैं, ‘डायरी हमेशा जल्दी में लिखी जाती है. उड़ते हुए, अनुभवों को पूरी फड़फड़ाहट के साथ पकड़ने का प्रलोभन रहता है, अनेक वाक्य अधूरे रह जाते हैं, कई बार अंग्रेजी के शब्द घुमड़ते चले आते हैं एक लस्तम-पस्तम रौ में बहते हुए.’

इस लस्तम-पस्तम रौ का अलग ही आकर्षण है. इसी में मिलते हैं कई ईमानदार सवाल और कई बेहद ईमानदार जवाब भी. जीवन अपनी रवानगी में बहता हुआ लस्तम-पस्तम दरिया ही तो है. लगता है निर्मल कहीं गए नहीं हैं, यहीं हैं. बस कि जितनी देर में चाय का पानी खौल चुका होगा, चिड़िया अपने बच्चों को कोई गीत सुना चुकी होगी उतनी देर में वो आकर बैठेंगे ड्राइंग के सोफे पर चाय का इंतजार करते हुए. और पूछेंगे, ‘कैसा चल रहा है जीवन.’ हमारे पास दो ही शब्द होंगे कहने को लस्तम-पस्तम. वो मुस्कुरा देंगे.

https://hindi.thequint.com/zindagani/remembering-nirmal-verma-writer-of-rare-sensibilities?fbclid=IwAR1tPdmm1KuLwi4l-D7GmqCuwbh6iEb-jtLzZ6jjPBtJ17YgnTddCyUZHNc

Monday, February 11, 2019

राजनीति से दूर रखने की राजनीति


- प्रतिभा कटियार

नई बहू आई थी घर में, गाँव में. बच्चों में बहू को देखने का चाव था कि जरा घूँघट हटे और एक झलक मिले. बडी-बुजुर्ग महिलाओं और जवान ननदों की यह चिंता कि घूँघट कहीं हट न जाए. नयी बहू का उत्साह रसोई में तरह-तरह के व्यंजनों में, साज-श्रृंगार में छलकता रहता. इसी बीच आ गए चुनाव और नयी बहू का वोट इसी गाँव में पड़ना तय हुआ. घर में ही नहीं पूरे गाँव में एक पार्टी, एक नेता की लहर थी. सोचने-समझने की कोई गुंजाईश किसी के लिए थी ही नहीं. महिलाएं भी वोट डालने के उत्साह में थीं. उसी जगह वोट डालने के उत्साह में जहाँ डालने को घर के मर्दों ने कहा था. नयी बहू ने अपनी ननद से पूछा, ‘दीदी आप किस पार्टी को वोट दोगी?’ ननद ने इतराते हुए कहा, ‘जहाँ सब घर के लोग डालेंगे.’ ‘सब लोग यानि सब आदमी?’ बहू ने पूछा, ‘हाँ, तो और क्या? अम्मा, चाची, ताई सब वहीँ डालते हैं.’ ‘लेकिन क्यों? वो पार्टी महिलाओं के लिए क्या करने वाली है?’ ‘ऐ भाभी, इत्ता न सोचते हम, ये सब सोचना हमारा काम नहीं. भैया, चाचा लोग कुछ गलत थोड़ी न कह रहे होंगे.’ भाभी कुछ समझती इससे पहले देवर जी पर्ची लेकर आ गये और सबको समझाने लगे किस तरह वोट देना है, कौन से खाने में मुहर लगानी है. नई बहू ने कुछ कहना चाहा तो उसको समझाया गया ‘तुम नयी हो अभी, यही कैंडीडेट ठीक है यहाँ के लिए. सवाल न करो, जल्दी चलो वोट देने.’ बहू ने सोचा कि उसका वोट तो उसका है, वो तो वहीँ डालेगी जहाँ उसे डालना है. लेकिन जब वो पोलिंग बूथ पर पहुंची तो पता चला उसका वोट पड़ चुका था.

यह किस्सा 2014 के चुनाव का है और एकदम सच्चा है कि मैं उस बहू को करीब से जानती हूँ. यही वजह है कि कितने प्रतिशत महिलाओं ने वोट डाला इन आंकड़ों को देख मैं खुश नहीं हो पाती. आंकड़ों में शामिल वो बहू भी तो है हालाँकि उसने तो वोट भी नहीं डाला था, आंकड़ों में वो ननद और सास भी हैं जिन्होंने घर के मर्दों की मर्जी से वोट दिया, जहाँ वो चाहते थे. उदाहरण भले यह एक हो लेकिन ऐसी महिलाएं बहुत हैं.

राजनीति पर बात करना महिलाओं को क्यों पसंद नहीं होता होगा, क्यों साड़ी, चूड़ी और व्यंजन की बात करना उन्हें पसंद होता होगा. क्योंकि दूसरों की बात मान लेने की आदी महिलाओं की पसंद नापसंद भी एक ख़ास ढांचे में ढाला गया. उन्हें जानबूझकर राजनैतिक हस्तक्षेप से दूर रखा गया. उस वक्त जब उनके सौन्दर्य की प्रशंसा, पकवान के स्वाद की तारीफ की जा रही थी, उन्हें समर्पण की देवी कहकर भरमाया जा रहा था ठीक उसी वक़्त देश दुनिया की राजनीति के दाँव-पेच चले जा रहे थे.

उन्हें सवाल न करना सिखाया गया और सवाल न करने, बात मानने वाली महिलाओं के लिए तमगे गढ़े गए और बदले में उन्हें एक कम्फर्ट जोन भी परोसा गया. घर में होने वाले राजनैतिक डिस्कशन्स के दौरान चाय देकर सीरियल देखने का या सब्जी बनाने का, होमवर्क कराने का कम्फर्ट. कभी तो घर के किसी सूने कोने में रो लेने का कम्फर्ट भी. कितनी गहरी राजनीति थी यह महिलाओं को राजनैतिक चर्चाओं से, भागीदारी से दूर रखने की. ‘तुम परेशान मत हो, मैं संभाल लूँगा सब’ कहकर कितनी ही महिला सीट के लिए चयनित ग्राम प्रधानों की मुश्किल हल की है उनके घर के पुरुषों ने. उस वक़्त भी चुपचाप हर बताई गयी जगह पर हस्ताक्षर करती जाती स्त्रियाँ क्या सच में कुछ नहीं सोचती होंगी.

महिलाएं अब भी सॉफ्ट टारगेट हैं, उनसे (सबसे नहीं) वो लिखवाया जा रहा है जो लिखवाया जाना पहले से तय है, वो बुलवाया जा सकता है, जो सबको सुनना अच्छा लगता है, उनसे वो करवाया जा सकता है जिसकी पितृसत्ता को जरूरत है. महिलाओं का अपनी चुनौतियाँ, अपना गुस्सा, अपना सुख-दुःख साझा करने वाला कोई समाज बनने ही नहीं दिया गया.

वोटर होना उनकी राजनैतिक भागीदारी की शुरुआत बने यह होना अभी बाकी है. पति के नाम उसकी राजनैतिक सत्ता सँभालने के लिए रबर स्टैम्प बनने से इंकार करना बाकी है, पंचायतों में सिर्फ महिला सीट होने की वजह से उनके नाम का इस्तेमाल हो जाने और खुद को कठपुतली की तरह काम करने से रोकना अभी बाकी है. बाकी है अपनी डिग्रियों को किनारे रख अपनी शिक्षा को असल शिक्षा में तब्दील करना और सोचना खुद से, खुद के लिए. बाकी है हिम्मत से सामना करना बाहर निकलने पर आने वाली मुश्किलों का सामना करना. बाकी है धता बताना है उन तमाम चालाकियों को जो सुरक्षा और सुविधा के नाम पर उनका रास्ता रोके हैं.

राजनीति में शामिल होकर ही राजनीति का शिकार होने से बचा सकता है. सिर्फ वोट देने, इलेक्शन लड़ने से, ऊंचे पद हासिल करने भर की बात नहीं है यह, महिलाओं को अपनी शक्ति और अपनी जरूरत को महसूस करना होगा और उसके लिए लड़ना भी सीखना होगा.

इसकी शुरुआत आने वाले चुनाव से की जा सकती है सिर्फ वोटर बनने की नहीं जागरूक वोटर बनने की जरूरत है. राजनैतिक विमर्श में शामिल होना, तमाम पार्टियों के घोषणापत्रों को ठीक से पढ़ना, उनके इरादों को भांपना और तय करना एक ठीक उम्मीदवार. अगर नहीं है कोई उम्मीदवार मन मुताबिक तो ‘नोटा’ है न? लेकिन अब महिलाओं की भागीदारी के आंकड़ों को असल में महिलाओं की भागीदारी में ही बदलने का वक़्त आ गया है. महिलाओं को राजनीति से दूर रखने की राजनीति को अब समझना भी होगा और उस राजनीति का शिकार होने से खुद को बचाना भी सीखना होगा.

Saturday, January 26, 2019

कहीं खो तो नहीं गया बतौर शिक्षक हमारा सुख


‘और देखते-देखते रास्ते वीरान, संकरे और जलेबी की तरह घुमावदार होने लगे थे. हिमालय बड़ा होते होते विशालकाय होने लगा. घटायें गहराती-गहराती पाताल नापने लगीं. वादियाँ चौड़ी होने लगीं. बीच-बीच में करिश्मे की तरह रंग-बिरंगे फूल शिद्दत से मुस्कुराने लगे. उन भीमकाय पर्वतों के बीच और घाटियों के ऊपर बने संकरे कच्चे-पक्के रास्तों से गुजरते यूँ लग रहा था जैसे हम किसी सघन हरियाली वाली गुफा के बीच हिचकोले खाते निकल रहे हों. इस बिखरी असीम सुन्दरता का मन पर यह प्रभाव पड़ा कि सभी सैलानी झूम-झूम कर गाने लगे, ‘सुहाना सफर और ये मौसम हंसी...’ पर मैं मौन थी. किसी ऋषि की तरह शांत थी. मैं चाहती थी कि इस सारे परिदृश्य को अपने भीतर भर लूं. मेरे भीतर कुछ बूँद-बूंद पिघलने लगा था. जीप की खिड़की से मुंडकी निकालकर मैं कभी आसमान को छूते पर्वतों को देखती तो कभी ऊपर से दूध की धार की तरह झर-झर गिरते जल प्रपातों को. तो कभी नीचे चिकने-चिकने गुलाबी पथ्थरों के बीच इठला-इठला कर बहती चांदी की तरह कौंध मारती बनी-ठनी तिस्ता नदी को. सिलीगुड़ी से ही हमारे साथ थी यह तिस्ता नदी. पर यहाँ उसका सौन्दर्य पराकाष्ठा पर था. इतनी खूबसूरत नदी मैंने पहली बार देखी थी. मैं रोमांचित थी. पुलकित थी. चिड़िया के पंखों की तरह हल्की थी. ‘

- साना साना हाथ जोड़ी से – लेखिका- मधु कांकरिया

इन दिनों मैं दसवीं में पढ़ रही हूँ, अपनी दसवीं में पढने वाली बिटिया के साथ. हाल ही में उसने मुझे हिंदी के एक पाठ 'नौबतखाने में इबादत' पाठ को लेकर कहा, सिर्फ यही मुझे एकदम बोर लगता बाकी सब अच्छे हैं. इसके पहले यही बात उसने 'साना साना हाथ जोड़ी' को लेकर भी कही थी. कुछ दिनों पहले ‘मैं क्यों लिखता हूँ’ के बारे में भी.

मुझे अपने स्कूल के दिन याद आते हैं उसकी ऐसी बातें सुनकर. दुःख है कि मेरे जीवन में साहित्य या कुछ भी स्कूल में या कॉलेज में पढने से नहीं आया. जिन हिंदी की कविताओं को घर में खुद पढ़ने में सुख होता था वही पाठ वही कवितायेँ स्कूल में शिक्षिका द्वारा पढाये जाने पर भारी बोझ सी लगने लगती थीं. ऐसा और विषयों में भी हुआ ही. मैंने बिटिया से कहा जो पाठ तुमको बोर करते हैं वो दिखाओ, उसने मुझे पाठ दिखाए तो मेरा चेहरा खिल उठा. 'साना साना हाथ जोड़ी' मधु कांकरिया जी का लिखा यात्रा वृतांत है और 'नौबतखाने में इबादत' यतीन्द्र मिश्र द्वारा लिखा संस्मरण और प्रिय कवि अज्ञेय का लिखा पाठ ‘मैं क्यों लिखता हूँ’ था.

मैंने बिटिया की समस्या का कोई हल नहीं किया सिवाय इसके कि जब वह हल्के-फुल्के मूड में होती उसके साथ मिलकर इन पाठों को मन से पढ़ा. 'साना साना हाथ जोड़ी' पढ़ते हुए गंगटोक और सिक्क्किम की यात्राओं के बहाने हमने न जाने कितनी यात्राएँ कीं, कितनी ही यात्राओं को फिर से महसूस किया, पिंडर, झेलम, नर्मदा, बेतवा नदियों को तिस्ता के बहाने याद किया. भाषा की सुन्दरता को महसूस किया, लेखिका के मन की स्थिति को समझा. ठीक यही हुआ 'नौबतखाने में इबादत' को पढ़ते हुए. बिस्मिल्ला खां के बारे में पढ़ते हुए बनारस शहर का जिक्र जिस तरह आता है कि कचौड़ियों की खुशबू देहरादून में महसूस होने लगती है. एक सही सुर के लिए बिस्मिल्ला खां साहब की तलब, उनकी सादगी, विनम्रता, फटी लुंगी का किस्सा और उनके जन्म शहर डुमरांव की नरकट घास तक का जिक्र पाठ के लिए मोहब्बत जगाने में पूरी तरह कामयाब है. अज्ञेय का 'मैं क्यों लिखता हूँ' पढ़ते हुए भी कुछ ऐसे ही हालात बने. लिखना किस तरह आंतरिक विवशता से होता है इस बात को उसने खूब अच्छे से समझा और अक्सर मुझे लिखते देख हंसकर कहती, 'नानी अभी मम्मा को आंतरिक विवशता आ रही है.'

हम माँ बेटी ने इन पाठों का आनन्द लिया. अभ्यास प्रश्नों की ओर हमने देखा भी नही. मुझे यकीन है कि जिस तरह उसने पाठ को समझा है उसके लिए कोई प्रश्न मुश्किल नहीं होगा.

मुझे यह प्रसंग इन दिनों इसलिए भी याद आ रहे हैं कि इन इनों उत्तराखंड में चल रहे सेवारत शिक्षक प्रशिक्षण में शिक्षकों के साथ संवाद में हूँ. जहाँ शिक्षक कई बार किताबों में ज्यादा कोर्स होने, पढ़ाने के दौरान आने वाली चुनौतियों के बारे में बात करते हैं, समय की कमी, बहुत सारे काम करने होते हैं की बात करते हैं. मुझे इन सब समस्याओं का एक ही हल दिखता है कि क्यों शिक्षण के इस खूबसूरत काम को अपना आनन्द बना लिया जाए. जब तक पढाना पहले पढना नहीं होगा, खुद का आनंद नहीं होगा तब तक ये खूबसूरत पाठ काम के बोझ से लगते रहेंगे. फिर यही बोझ बच्चों को भी ट्रांसफर होगा. होता ही है.

जिन पाठों को पढ़ते हुए जिन्दगी से जुड़ा जा सकता था, उन्हें पढ़ना बच्चों को और पढाना शिक्षकों को बोझ लग रहा है. शायद मेरी बेटी को हिंदी पढ़ाने वाली शिक्षिका ने भी अपनी नौकरी की पूर्ति के तौर पर पाठ पढ़ाया होगा. तो भला दिल से लिखे गये ये खूबसूरत पाठ बच्चों के दिल में किस तरह उतरते जब वो शिक्षक के दिल में ही नहीं उतरे. बाकी विषयों के बारे में यकीन से नहीं कह सकती लेकिन भाषा के संदर्भ में जरूर लगता है कि भाषा चाहे हिंदी हो, अंग्रेजी या कोई और उसका कनेक्शन सीधे दिल से होना जरूरी है. दिल से रिश्ता न होगा तो भाषा अपने पेचोखम में उलझा लेगी, जो लिखा गया है उसकी भावभूमि तक पहुंचना मुश्किल ही होगा.

एनसीईआरटी ने बेहद खूबसूरत किताबें बनायी हैं, इन्हें पढ़ना एक सुख है, जाहिर है इन्हें पढ़ाना भी सुख होना चाहिए. अगर यह काम हो रहा है, सुख नहीं तो जरूर हमने पढ़ाने से पहले अपने पढ़ने के सुख को खो दिया है. आइये, पहले अपने सुख को तलाशें.