Showing posts with label छोटी कहानियां. Show all posts
Showing posts with label छोटी कहानियां. Show all posts

Friday, August 1, 2025

कोई ताज़ा हवा चली है अभी ...


हँसती खिलखिलाती, इठलाती, शरारतें करती लड़की उस रोज गुमसुम हो गई जब वो सांझ के काँधे से लगकर झील में बस उतरने जा रहे सूरज को ताक रही थी और साँझ ने उसके माथे  पर पोशीदा सा एक लम्स रख दिया था। उस ठंडी शाम में लड़की के माथे पर रखा गुनगुना सा वो लम्स दहक उठा था। कदंब के पेड़ के नीचे मटरगश्ती करते मुर्गियों के झुंड ने मानो न कुछ देखा, न सुना।

सांझ ने मुस्कुराकर पूछा,'तुम खुश तो हो न?' 
लड़की की आँखें झरना हो चली थीं।
'ख़ुश' यह शब्द उसे उदास करता है इन दिनों।
'ख़ुश...' कितना अवसाद है इसके सीने में।

कोई ख़ुशी अकेले कभी नहीं आती। अपने साथ ढेर सारा अकेलापन, उदासी और पीड़ा लेकर आती है। ख़ुशी कल्पना में अच्छी लगती है। कल्पना में, कविताओं में, कहानियों में, रील में, फेसबुक में, इन्स्टा में उफनाती फिरती है। ये ख़ुशी उदास करने वाली ख़ुशी नहीं है। ये ख़ुशी किसी नशे सी है, जब तक है, तब तक है। कभी-कभी तब तक भी नहीं है।

जैसे चारों तरफ ख़ुशी का कोई सैलाब बिखरा पड़ा है। जल्दी जल्दी ख़ुशी परोसने वाला सैलाब। 
न सुख के भीतर सुख है, न दुख के भीतर दुख। बस एक शोर है।
लेकिन इस शोर के साथ डील करना आसान है। मुश्किल है एक गहरी लंबी चुप्पी के साथ डील करना।
 
साँझ ने साथ चलती एक मीठी सी लंबी चुप्पी के बाद लड़की के माथे पर ये लम्स जड़कर उसे न सिर्फ हैरत में डाल दिया बल्कि उसके खुश होने के भीतर समाये तमाम डर को आज़ाद भी कर दिया। 

अब झील के किनारे 4 जन थे। लड़की, साँझ, ख़ुशी से जन्मा डर और लगभग ठंडी हो चुकी चाय।

सूरज झील में डूबकर बुझ चुका था।
सांझ की आँखें उनींदी होने को थीं और लड़की अपने तमाम डर, बेचैनी को समेट वापस लौट रही थी।

साँझ का उसके साथ लौटना नामुमकिन था, यह  वो जानती थी।
और यह जानना ही सृष्टि का समूचा कष्ट है।

अब न लड़की साँझ के करीब जा पा रही, न खिलखिला कर हंस पा रही है।
वो नरम सा लम्स जिसके भीतर पूरी क़ायनात का सुख समाया था, न जाने कैसे उदास एहसास में बदल गया। सुख के साथ भरोसे का आना जरूरी है, कि वो रहेगा।
लेकिन अफसोस कोई सुख यह भरोसा लेकर नहीं आता। इसलिए हर सुख की आहट असल में उसके बीत जाने की आहट भी है। और यही उस सुख का दुख है।

लड़की ने चाय का पानी चढ़ाया, बालकनी में उचकती धूप को 'हैलो' कहा और गुलाम अली की गज़ल की आवाज़ तेज़ कर दी...कुछ तो नाज़ुक मिज़ाज हैं हम भी...आवाज़ सुबह में घुलने लगी।  

सुबह ने लड़की के माथे पर आई शिकन को चूम लिया था। धूप बिखरने लगी थी.
गुलाम अली की आवाज़ मुस्कुरा उठी थी, कोई ताज़ा हवा चली है अभी....

Tuesday, November 21, 2023

बात एक रोज की

फोटो- नितेश शर्मा 

'तुम्हारी मुट्ठी में क्या है? बताओ न? दिखाओ न? दिखाओ न...'  कहते हुए लड़की लड़के की मुट्ठी खोलने को जूझ रही थी। जैसे जैसे लड़की मुट्ठी खोलने को उत्सुक हो रही थी लड़का मुट्ठी कसता जा रहा था। आखिर लड़की थक गयी और फिर रूठ गई,'जाओ मुझे देखना ही नहीं।' कहकर उसने पीठ लड़के की तरफ कर दी। उसकी पीठ पर नीम के पेड़ से छनकर आती हुई चाँदनी कुछ इस तरह गिर रही थी जैसे किसी ने चाँदनी के छींटे बिखेर दिये हों।  लड़के ने उसकी पीठ को देखा और मुस्कुरा दिया। 

तू नहीं जानती नाराज होकर तूने कितना एहसान किया मुझ पर...लड़के ने सिगरेट के मुहाने पर उग आई राख़ को आहिस्ता से झाड़ते हुए कहा। लड़की ने पलटकर कहा, 'मैं तेरी बातों में नहीं आने वाली।' उसके यूं पलटने का असर यह हुआ कि चाँदनी के छींटे अब उसके सर पर झरने लगे। लड़का मंत्रमुग्ध उसे देख रहा था। चाँदनी लड़की पर बिखर रही थी। रातरानी की खुशबू इस जादू को आँखें मलते हुए देख रही थी। रात का तीसरा पहर था और धरती का यह कोना अल्हड़ इश्क़ के इत्र की ख़ुशबू से महक रहा था। 

लड़के ने मुट्ठी लड़की के आगे कर दी। 'लो...' लड़की ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, 'जब देना ही होता है तो क्यों करता है तू ऐसा?' 
'यह तू नहीं समझेगी।' कहकर लड़का नीम के पेड़ की उन शाखों को देखने लगा जहां से चाँदनी के बूटे खिल रहे थे और लड़की के देह पर बिखर रहे थे। 
लड़की ने मुट्ठी खोली। इस बार मुट्ठी आराम से खुल गयी। 
'अरे ये तो खाली है, मुझे बुधधू बना रहे थे।' लड़की ने लड़के को घूरते हुए कहा।
'खाली नहीं है ये, ध्यान से देखो।' 
लड़की ने खाली हथेली को उलट-पुलट कर देखा उसे कुछ भी नज़र नहीं आया। 
लड़का मुस्कुरा दिया। 'इसमें एक सपना है, एक पेड़ का सपना। गुलाबी फूलों वाला एक पेड़ एक छोटे से घर के सामने ।'  
लड़की की आँखें छलक पड़ीं। ऐसी ही किसी चाँदनी रात में एक रोज उसने अपना एक सपना लड़के को बताया था। एक छोटा सा घर, सामने नदी और गुलाबी फूलों से भरा एक पेड़। लड़के ने उस सपने को सहेज लिया था।

'सुनो, मेरा रिजल्ट आ गया है. सिलेक्शन हो गया। अगले महीने ज्वाइन करना है' लड़के ने लड़की के आगे अपनी हथेली को फैलाते हुए कहा। 
'ओह, तो इस मुट्ठी में तुम्हारे जाने की खबर है?'  लड़की की खुशी में उदासी घुल गयी थी। 
नहीं, जाने की नहीं हमारे साथ होने की। 
कैसे? लड़की ने अपनी आँखें लड़के की आँखों में उतार दीं। 

लड़का चुप रहा। कुछ देर बाद उसने बस इतना कहा, ' गुलाबी फूलों वाला पेड़?' 
लड़की समझ चुकी थी। लड़का अपने साथ जीवन भर चलने का प्रस्ताव लाया था। 
लड़की की नीली आँखों में भरोसे की बदलियाँ उतर आयीं। 
उसने बहुत प्यार से लड़के की हथेली को चूमा और उसे वापस बंद कर दिया। 
'तुम बहुत प्यारे हो। लेकिन तुम्हें मेरे सपने समेटने की जरूरत नहीं बस कि तुम साथ रहो मैं अपने सपने खुद सहेज लूँगी।' 
'तुम और मैं क्या अलग हैं?' लड़के की उदास आवाज़ में सुबह की अज़ान घुलने लगी थी। 
'हाँ, हम दोनों अलग हैं। प्यार में होना खुद को खो देना नहीं होता, खुद को पाना होता है। तुम हो तो मुझे मेरे सपनों पर यक़ीन होता है। मुझे मेरे सपनों को जीने दो और तुम अपने सपनों को जियो न।' 
'तो तुम साथ नहीं आओगी?' 
'आऊँगी, पर अभी नहीं। अभी मुझे मेरे सपनों की नींव रखनी है।' 
'तुम इतनी जिद्दी क्यों हो?'  लड़का तनिक खीझने लगा था। 
'सदियाँ लगाई हैं जिद करना सीखने में...' लड़की मुस्कुरा दी। नीम का फूल उसके कांधे पर आ गिरा था। 
लड़का उठने को हुआ तो लड़की ने उसे रोक लिया। 
चलो न एक नया सपना देखते हैं, हम दोनों का सपना। 
लड़की ने अपनी बंद हथेली उसके सामने की और कहा, खोलो। 
लड़के ने हथेली खोली और मुस्कुरा दिया, अब बताओ भी। 
'दिखी नहीं तुम्हें तुम्हारी वो बाइक जो मेरे उस गुलाबी पेड़ के नीचे खड़ी है।'
दोनों खिलखिलाकर हंस दिये। 

Friday, October 27, 2023

आसमानी बातें थीं उसकी...


लड़की ने स्याही में उंगली डुबोई और लड़के की पीठ पर रख दी। शफ़्फाक सुफेद शर्ट पर नीला आसमान उग आया था। लड़का उस नीले गोले को देख नहीं पाया था। उसने बस लड़की की उंगली की आंच को महसूस किया था। और शरारत के बाद की उस खिलखिलाहट के सैलाब में तिर गया था जो पीठ पर उंगली रखने के बाद लड़की के पूरे वजूद से झर रहा था।

पीठ पर उभरे उस स्याही के गोले का रंग लड़के की हथेलियों पर नीली लकीर बनकर उभरा जब प्रार्थना के वक़्त ड्रेस मॉनिटर ने उसे लाइन से बाहर निकाला और मास्टर जी ने हथेलियाँ आगे करने को कहा। लड़के के हाथ पर उभरी नीली लकीरें लड़की की आँख का नीला दरिया बनकर छलक पड़ी थीं। उसने कब सोचा था कि उसकी जरा सी शरारत का यह असर होगा।

लड़का अपनी हथेलियों पर आए दर्द को भूल गया था लेकिन उसे अपनी पीठ पर रखी लड़की की उंगली की आंच सुलगाये हुए थी। छुट्टी हुई। लड़की की बड़ी-बड़ी आँखों से दरिया बह निकला। लड़के की हथेलियाँ अपनी हथेलियों में लिए लड़की देर तक खामोश खड़ी रही।

लड़के ने लड़की की आँखों के दरिया से धरती को सींचा और लड़की की खिलखिलाहट के बीज बो दिये। मुद्दत हुई इस बात को। धरती के किसी भी कोने पर नीले अमलतास खिले देखो तो समझना वो लड़की की खिलखिलाहट खिली हुई है।

लड़के की पीठ पर अब भी आसमान टंका हुआ है। लड़की की आँखों में अब भी एक दरिया छलकता है। अक्टूबर का मौसम उन दोनों के प्रेम पत्र अपनी टहनियों पर समेटे बैठा है।

Saturday, October 7, 2023

हथेलियों में झरता अक्टूबर


'मैं अपनी कहानियों का अंत बदलना चाहती हूँ।' लड़की ने अपनी पनीली आँखों से लड़के की आँखों में देखते हुए कहा।
लड़के का ध्यान ट्रेन के एनाउंसमेंट पर था। उसने लड़की की आँखों में देखे बिना कहा, 'तो बदल दो न। तुम्हारी कहानी है तो अंत वही होना चाहिए जो तुम चाहती हो।' यह कहते हुए लड़का चलने को उठ खड़ा हुआ। उसकी ट्रेन का एनाउंसमेंट हो चुका था। 
'चलो, निकलता हूँ अब। तुम अपना खयाल रखना' कहकर लड़के ने ट्रेन की तरफ कदम बढ़ा दिये। 

लड़की अपनी पनीली आँखों से जाते हुए लड़के को देखती रही। 
लड़के की पीठ पर उसकी गीली आँखें चिपकी हुई थीं। लौटते कदमों से वापस लौटती हुए लड़की सोच रही थी क्या लड़के को अपनी पीठ पर उसके आंसुओं की नमी महसूस होती होगी? वो लड़के से कह न पाई कि 'अपना ख्याल मैं क्यों रखूँ वो तो तुम्हें रखना था न।' 

वो सोच रही थी कि क्या सचमुच वो अपनी कहानी का अंत बदल सकती है? 
तो फिर लड़का चला क्यों गया, रुक क्यों नहीं गया। इस कहानी में वो लड़के का रुक जाना लिखना चाहती थी। 
तो क्या वह झूठी कहानी लिखे? 

उसकी उदास आँखें जाते हुए लड़के की नहीं आते हुए, जीवन में रुक गए, साथ निभाने वाले लड़के की कहानी लिखना चाहती थीं। 

लेकिन वो झूठी कहानी नहीं लिखना चाहती थी। उसने आसमान से झरते अक्टूबर के आगे हथेलियाँ फैला दीं। घर पहुँची तो लड़का इंतज़ार करता मिला। 

अरे...तुम तो चले गए थे न? 
मैं कहाँ गया हूँ। कब तक इस डर को जीती रहोगी। कहीं नहीं गया मैं। ख्वाब था तुम्हारा। लो चाय पियो। 

लड़की ने खुद को टटोला वो सचमुच ख्वाब में थी। उदास ख्वाब का मौसम बीत चुका था। ट्रेन न जाने कितनी चली गईं लड़का कहीं नहीं गया। वादे की मुताबिक सुबह की चाय बना रहा है। चाय की प्याली के बगल में हरसिंगार के फूल मुस्कुरा रहे थे।  

लड़की ने उदास कहानियाँ लिखना बंद कर दिया है। उसके मोबाइल पर माहिरा खान की शादी के वीडियो तैर रहे हैं। 

Tuesday, February 21, 2023

चलो न मर जाते हैं


'चलो न मर जाते हैं' लम्बी सुनसान सर्पीली सी सड़क पर दौड़ते-दौड़ते थककर बीच सड़क पर पसरते हुए लड़की ने कहा. यह कहकर लड़की जोर से खिलखिलाई. चीड़ के घने जंगलों में जो धूप फंसी हुई थी लड़की की हंसी के कम्पन से वो झरने लगी. धूप का एक छोटा सा झरना लड़की के चेहरे पर कुछ यूँ गिरा कि लड़की का सांवला रंग चमक उठा. जैसे हीरे की कनी चमकती है रौशनी से टकराकर.
लड़की ने फिर से अपनी बात दोहराई, 'चलो न मर जाते हैं'.
लड़के ने उसकी नाक खीचते हुए कहा, 'तू मर जा, मुझे तो अभी बहुत जीना है.' लड़के के चेहरे पर शरारत थी.
लड़की ने उसी अल्हड़ अदा के साथ इतराते हुए कहा,' मेरे बिना जी लोगे?' 
'जी ही रहा था इतने सालों से...'तुम्हारे बिना'...लड़के ने तुम्हारे बिना पर जोर देकर कहा.
'आगे भी जी ही लूँगा.'
'वो जीना भी कोई जीना था लल्लू...' लड़की ने लड़के के हाथ से अपनी नाक छुडाते हुए कहा. और वो फिर से चीड़ के जंगलों में खो जाने को बावरी हो उठी.
'वैसे एक बात बताओगी?' लड़के ने लड़की के पीछे से एक सवाल उछालना चाहा.
लड़की ने हंसते हुए सवाल की इजाज़त दे दी. 
'ये तुम बात-बात पर मर जाने की बात क्यों करती हो? जीना तुम्हें अच्छा नहीं लगता?'
लड़की ने अपने दोनों हाथ कमर पर टिकाकर बड़ी अदा से पीछे पलटकर देखा फिर लड़के की तरफ चल पड़ी. उसके दोनों कंधे अपने हाथों से थाम कर उसने कहा,'मरना और जीना एक ही तो बात है. बिना जिए कौन मरता है भला. बिना जिए तो देह मरती है. जीना सिर्फ सांस लेना तो नहीं. मैं इतना जीना चाहती हूँ इतना जीना चाहती हूँ कि बस मर जाना चाहती हूँ.'
लड़के को कुछ भी समझ में नहीं आया. 
'तुम पागल हो एकदम. कसम से' उसने लड़की के बालों में अटकी पत्तियों को हटाते हुए कहा. 
लड़की ने कहा, 'इस दुनिया को सुंदर बनाये रखना का जिम्मा हम जैसे पागलों के ही हिस्से तो है जनाब. वरना समझदारों ने तो दुनिया का क्या हाल किया है तुम देख ही रहे हो.'
'चलो तो तुम्हें तुम्हारा पागलपन मुबारक.' लड़के ने उठते हुए कहा.
और तुम्हें मुबारक ये रौशनी से भरा लम्हा. लड़की ने लड़के के आगे बंद मुठ्ठी करते हुए कहा. 
लड़के ने जैसे ही उम मुठ्ठी को खोला उसमें रखा धूप का वक्फा बिखर गया.
लड़के की आँखें उस रौशनी से चुन्धियाँ उठीं...लड़की ने हंसते हुए लडके के गालों को चूमते हुए कहा, 'चलो न मर जाते हैं. लड़का मध्धम आवाज़ में बुदबुदाया.'हाँ, चलो न मर जाते हैं.' 

Monday, January 16, 2023

जीने की तलब


हथेलियाँ फैलाई थीं तो आसमान का एक टुकड़ा उतर आया था हथेलियों पर. धूप और बारिश ने मिलकर आसमान के उस सुनहरे टुकड़े को और भी निखार दिया था. लड़की उसे देर तक देखती रही. उसने हथेलियाँ बंद कर लीं, और लम्बी सांस ली. आसमान के उस टुकड़े को मुठ्ठियों में भींचे वो चल पड़ी थी. 

पास बहती नदी ने उसे देखा और पूछ बैठी, 'आसमान हथेली में लिए हो फिर भी उदास हो?' लड़की ने अपनी गीली हंसी को छुपाते हुए कहा, 'हाँ क्योंकि मुझे आसमान का टुकड़ा नहीं पूरा आसमान चाहिए...' यह कहकर लड़की जोर से हंसी. इतनी जोर से, इतनी जोर से कि क़ायनात घबराकर उसे देखने लगी. पेड़ों से पत्ते झरने लगे, परिंदे आसमान में उड़ते-उड़ते ही ठहरने को हो आये उन्होंने अपनी रफ्तार इतनी धीमी कर ली कि इस हंसी में डूब सकें. 

नदी समझ गयी. उसने लड़की को पास बिठाया, उसे गले से लगाया. उसके सूखे होंठों पर थोड़ी नमी रखी और कहा,'जानती हूँ तेरी ख्वाहिश, तू बहुत जीना चाहती है न?' लड़की ने सर झुकाकर कहा, 'शायद मर ही जाना चाहती हूँ इतना...' इतना कहते-कहते लड़की के होंठों पर मुस्कान तैर गयी थी.

बिना जिए कौन मरता है पगली. देह का जीना क्या और मरना भी क्या. वो तो संसार का चक्र है.

लड़की ने नदी में पाँव डाले हुए ही मुठ्ठी में बंद आसमान से कहा, 'तुम्हें घर ले चलूं? सिरहाने रखूंगी. भाग तो न जाओगे?' लड़की की नर्म हथेलियों में रखे-रखे आसमान ऊंघने लगा था. उसकी बात सुनकर मुस्कुरा उठा और बोला, 'वहीं जहाँ, मोगरे की खुशबू, सावन की बरसातें, पलाश की दमक, सरसों की खिलखिल, राग भैरवी,आम की बौर रखी है...?

लड़की ने हैरत से उसे देखा, 'तुझे ये सब कैसे पता..?

'मैं तेरे हिस्से का आसमान हूँ, मुझे कैसे पता नहीं होगा.' आसमान ने मुस्कुराकर कहा. सामने जो सरसों की पीली चादर बिछी थी वो लहरा उठी. स्कूल जाते बच्चे लड़की को देखकर हाथ हिलाने लगे. नदी की आवाज़ में लड़की की तमाम उदासी गुम होने लगी.

तभी लड़की ने महसूस किया कि किसी ने उसकी आँखें मूँद ली हैं. उसकी बंद आँखों ने सुना, 'मैं तुम्हारा आसमान हूँ, हमेशा तुम्हारे साथ.'

लड़की की रुलाई फूट गयी...यह सुख की रुलाई थी इसमें मौसम की खुशबू थी. खिलने वाले पलाश और आने वाले बसंत की आहट थी. उसकी जीने की तलब और बढ़ गयी थी.

सूरज उस रोज जरा देर से आया था...

Friday, October 7, 2022

बस इतना सा ख़्वाब था...



सुबह की आँख अभी खुली नहीं थी. सपनों की सुनहरी लकीर लड़की की पलकों से छनकर छलक रही थी. लड़की ने अपनी करवट में मुस्कुराते हुए सिसकी ली. उस सिसकी में रुदन नहीं था. उस सिसकी में झरे हुए हरसिंगार की रंगत थी. क़ायनात इस इंतज़ार में थी कि लड़की की आँख न खुले और उसका सपना न टूटे. इसलिए बादलों ने सुबह को छुपाने के तमाम जतन करने शुरू कर दिए.

बादल आये तो आई हवा भी और जब आई हवा तो सोई हुई लड़की के बिखरे हुए बालों को चूमने से खुद को रोक न सकी. लड़की चौंक के जाग गयी. उसे अपनी पलकों पर किसी चुम्बन की आहट मिली. ख़्वाब था शायद....हाँ, ख़्वाब ही होगा. नीम हरारत में सिमटी अनमनी लड़की ने खिड़की के बाहर टंगे बादलों को देखा और वापस नींद की नदी में उतरने को लेट गयी. लेकिन नींद जा चुकी थी. वो टूटे हुए सपने की रानाई में देर तक उलझी रही.

सपना बस इतना सा था कि लड़के ने कहा, 'सुनो आज मैंने तुम्हें सपने में देखा...' लड़की ने पूछा, 'सच'. लड़के ने कहा, 'हाँ सच.' कहते हुए लड़के ने लड़की की पलकों को चूम लिया था. लड़की की आँखें बह निकली थीं कि कोई किसी के ख़्वाब में यूँ ही तो नहीं आता.

डालियों पर अटके हरसिंगार हवा के झोंके के संग झूलकर धरती के गले लग चुके थे. लड़की अब नींद से बाहर थी. चाय के पानी के संग कुछ अल्फ़ाज महक रहे थे रसोई में, 'सुनो आज मैंने तुम्हें सपने में देखा'.

ख़्वाब में ख़्वाब की बातें हसीन होती हैं...है न? लड़की ने आईने से कहा.

मौसम सुहाना था शहर का. अक्टूबर महकने लगा था.  

Friday, May 27, 2022

तेरी आँखों के सिवा...



'तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है...' पार्क की उस  कुछ भीगी, कुछ सूखी बेंच से उठते हुए लड़का बरबस गुनगुना उठा था. सांझ अपनी पायल की रुनझन को उतारकर आई थी उस रोज. बेआवाज़ सी किसी धुन में डूबी हुई शाम थी वो. लड़की के मध्धम गति में बढ़ते कदम रुक से गये थे. नदी भी मानो बहते-बहते पल भर को ठहर गयी हो. लड़की की आँखें भर आई थीं. वही आँखें जिन्हें देखने को बेताब रहा करता था लड़का. वही जो अब इन आँखों से बहुत दूर जा रहा था.

एकदम से फफक के रोने का जी हो आया लड़की का. कि छोड़ दे मान सम्मान की सारी बात और जाए लिपट जाए उसके सीने से, चीख-चीख के आसमान को घायल कर दे और रोक ले लड़के को. लेकिन...बड़ी मेहनत से कमाया हुआ जो थोड़ा सा गुरूर है उसे कैसे छोड़ दे आखिर कि यह गुरूर अपने होने का है. और यह भी कि रोकने से तो रुकती है सिर्फ देह जाने वाला तो तभी जा चुका होता है जब वो जाने के बारे में सोच लेता है.

अपनी सिसकियों को भीतर ही घोंटते हुए लड़की ने अपने ठहरे हुए कदम आगे बढ़ा दिए. लड़का जानता था कि बात खत्म हो चुकी है. और यही तो वो चाहता था. यही करने तो वो आया था. बात खत्म. इसीलिए तो एक आखिरी बार मिलने आया था. जब वही हो रहा था तो कैसी उदासी. लड़की ने तो अपनी सिसकियों को किसी और मौके के लिए संभाल लिया था लेकिन लड़का इतना मजबूत नहीं था. उसे नहीं मालूम वो क्या चाहता है लेकिन इस लम्हे में उसे लड़की पर बहुत गुस्सा आ रहा था. ये क्यों ऐसी है? क्या इसे कोई दुःख नहीं हो रहा. क्यों ये उसे रोक नहीं रही? क्यों इस तरह उठकर चली जा रही है. इतना भी क्या मगरूर होना.

लड़की के कदमों की रफ्तार में इंतज़ार था कि लड़के के कदम उस रफ्तार का साथ दें शायद. या वो आवाज़ जिस पर बौराई फिरती है इस बार रोक ले उसके कदमों को. कचनार के झरे हुए गुलाबी फूलों से भरा हुआ रास्ता जिस पर अभी बरस के रुके बादलों के निशान काबिज़ थे आज लड़की को उदास कर रहा था. पार्क के मुहाने पर पहुंची तो हवा के हल्के से झोंके ने पत्तों पर रुकी बूंदों को उस पर गिरा दिया. उदास मुस्कराहट के साथ उसने सर उठाकर पेड़ की तरफ देखा, मन ही मन कहा, ‘दोस्त तू समझता है सब हाल का मन का.’ तभी चंद बूँदें टप्प से उसकी नाक और गालों पर टपक गईं.

मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग...लिखते वक्त फैज़ ने क्या सोचा होगा कि उनके लिखे का कोई यूँ बेजा इस्तेमाल भी करेगा. अपनी बेवफाई को छुपाने के लिए.

बेवफाई...हाँ, बेवफाई ही तो. बेवफाई किसी और के साथ जाना ही तो नहीं होती, जब और जहाँ आपको होना हो वहां न होना भी तो होती है. इश्क़ में होना और इश्क़ की आंच को सह न पाना भी बेवफाई ही तो हुई. लड़की को महसूस होने लगा था कि लड़का सच्चे प्यार की आंच सह नहीं पा रहा है. वो पिघल रहा है. साथ रहना तो चाहता है लेकिन डरता भी है. कमिटमेंट तो पहले ही कोई नहीं था दोनों के बीच. बस एक इच्छा थी साथ होने की जिसने दोनों को बाँध रखा था. फिर हुआ यूँ कि इश्क़ की खुशबू बिखरने लगी. और खुशबू की तो कोई सीमा होती नहीं. वो कब पाबन्द होती है कि कितना बिखरना है, कितना नहीं. कि सारा आलम उसकी गिरफ्त में आने लगा. चाँद, सितारे मगरूर होने लगे, दिन के पैरहन में टंके घुंघरुओं की छुन छुन बढ़ने लगी. रातरानी की खुशबू में कोई नशा घुलने लगा. रास्तों पर बिखरने लगी इंतज़ार की खुशबू.

लड़के ने इश्क़ के इत्र को न कभी छुआ था, न देखा था. हाँ, किस्से सुने थे, कहानियां पढ़ी जरूर थीं. वो नहीं जानता था नसों में घुलता ये जादू धीरे-धीरे वजूद का हिस्सा बनने लगता है और फिर एक रोज हम खुद से बेज़ार होने लगते हैं. लड़की का साथ उसे अच्छा लगता था लेकिन वो इस खुशबू क संभाल पाने में नाकामयाब होने लगा.

लड़की समझ रही थी कि लड़के के कंधे इश्क़ को सहेजने के लिए मजबूत नहीं हैं, एक रोज जब लड़की जुगनुओं को हथेली पर लिए उनसे लाड़ कर रही थी तो लड़के ने मिनमिनाती सी आवाज़ में कहा, ‘मैं तुम्हारे पास रहना चाहता हूँ लेकिन...’ वो रुक गया था. लड़की ने सारे जुगनू हथेली से उड़ाते हुए उसके होंठो पर उंगली रखते हुए उसे चुप रहने का इशारा किया. वो जानती थी कि लड़के के मन में क्या है. वो जानती थी उन दोनों के बीच कोई नहीं है. है तो लड़के की खुद की कमजोरी. वो जानती थी कि जो इश्क़ मोहता बहुत है उसके करीब जाना, उसे आत्मसात करना उसे जीना आसान भी नहीं.

लड़का इश्क़ के मोह में आ तो गया था लेकिन अब उसके कंधे छोटे पड़ने लगे थे.

लड़का धीरे-धीरे चलते हुए लड़की के पास आ पहुंचा था. दोनों खामोश साथ चलते रहे. लड़का आया तो था लड़की को विदा कहने लेकिन चाहता था उसे रोक ले लड़की. और लड़की ने किसी को भी रोकना बहुत पहले छोड़ दिया है. बादल फिर घिर आये थे. हल्की बूँदें भी गिरने लगी थीं.

‘तुम रुको मैं कार यहीं लेकर आता हूँ, इतनी दूर पैदल जाओगी तो भीग जाओगी’ लड़के ने हाथ थामकर उसे रुक जाने को कहा.

'छोड़कर जाने वालों को इतनी फ़िक्र करने का हक़ नहीं होता...' कहकर लड़की मुस्कुरा दी.
‘इतना बुरा लग रहा है तो रोक क्यों नहीं लेती?’ लड़के ने कहा. लड़के की उदासी उसकी आवाज़ में बिखर गयी थी.
‘अरे, मैंने कहा था क्या आने को? खुद आये थे खुद ठहरे जब तक ठहरना था और अब खुद ही जा रहे हो. तो मैं क्यों रोकूँ?’ लड़की ने मन में सोचा लेकिन कहा कुछ भी नहीं.

बस वो रुकी नहीं, और बारिश में भीगते हुए कार की ओर बढ़ने लगी.

लड़का रुआंसा हो गया था. उसने पीछे से आवाज़ दी, ‘सुनो, तुम्हें कोई और मिल गया है न?’ यह सबसे सस्ता और अंतिम प्रहार था लड़के का कि लड़की का गुरूर कुछ टूटे तो सही.

लड़की मुस्कुराई. उसने कहा ‘हाँ’.
जानता लड़का भी था कि उसने क्या किया है, जानती लड़की भी थी लड़के ने ऐसा क्यों कहा है लेकिन दोनों खामोश रहे. बाहर बारिश तेज़ हो आई थी भीतर का तूफ़ान थमने लगा था. दोनों कार तक पहुंचे तो एकदम भीग चुके थे.

‘मुझे रोक लो, मैं तुम्हारे पास रुकना चाहता हूँ. लड़के ने कहना चाहा पर वो चुप रहा.’
कार चल पड़ी...फैज़ की गज़ल बज उठी, 'अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मगर क्या कीजे...' लड़की ने मुस्कुराकर अपनी हथेलियाँ बरसती बूंदों के आगे कर दीं...

Tuesday, February 23, 2021

दो चाय



पीले फूलों का मौसम फिर से लौट आया था. चारों तरफ वासंती बहार थी. फ्योली के फूलों ने रास्तों को यूँ सजाया हुआ था जैसे जब प्रेम की पालकी गुजरेगी तो वो उसके संग हो लेंगे. पुलम, नाशपाती, बुरांश, पलाश और आडू के फूलों ने समूचे पहाड़ों को किसी खूबसूरत काल्पनिक से दृश्य में परिवर्तित कर दिया था. लड़की ने अपना झोला कंधे से उतारकर किनारे स्टूल पर रखा और चाय वाले दादा को चाय बनाने को कहा. दो चाय.

चाय वाले दादा इधर-उधर देखने लगे. उन्हें लगा दूसरा कोई आने वाला होगा. हालाँकि पहाड़ों पर बहुत दूर से आने वाले दिख जाते हैं कम से कम चाय बनने की देरी भर की दूरी भर तो दिख ही जाते हैं लोग. फिर भी उन्होंने दो कप चाय चढ़ा दी. लड़की देर तक सामने वाली पहाड़ी पर खिलखिला रहे आडू के गुलाबी फूलों को देखती रही. कई बरस बीत गए इस बात को जब वो इसी पेड़ के नीचे खिलखिला कर हंस रही थी और लड़के ने पेड़ की डाल को थोड़ा सा नीचे खींच के छोड़ दिया था. डाल ने लड़के की शरारत को समझ लिया था. वो मुस्कुरा दी थी. और उसने ऊपर जाते हुए ढेर सारे गुलाबी फूल लड़की पर बरसा दिए थे. बरसते फूलों से नहा उठी थी लड़की और उसकी खिलखिलाहटों से वादियाँ नहा उठी थीं. लड़का चमत्कृत सा उस दृश्य को देख रहा था.

वो मोबाईल वाले कैमरों का दौर नहीं था. सारी तस्वीरें आँखों से खिंचकर ज़ेहन की हार्डडिस्क में सेव हो जाती थीं. अपनी तमाम खुशबू समेत. ज़ेहन की इस हार्ड डिस्क में कोई डिलीट बटन भी नहीं था. और यह अच्छा ही था. लड़की ने खुद को उस दृश्य में पैबस्त कई बार देखा था. लड़के की आँखों में. लड़के ने उस सुंदर दृश्य को देखते हुए पनीली हो आई अपनी आँखों को दृश्य से हटा लिया था. वह दृश्य उन दोनों के जीवन का सबसे सलोना दृश्य था. सबसे सलोना लम्हा.

हर बरस लड़की इस मौसम में इस दृश्य को इन खिलते हुए गुलाबी फूलों के आसपास तलाशती है. फूल खुद मानो उस वैभव को तलाशते हों हर बरस. लड़की के सामने रखी चाय में गुलाबी फूलों की परछाईं गिर रही थी. स्कूल जाते बच्चों ने लपककर उन फूलों की एक छोटी टहनी तोड़ ली थी. कुछ दूर जाकर उन्होंने वह फेंक दी थी कि उनका मन भर गया था शायद उस टहनी के वैभव से. लड़की का मन क्यों नहीं भरा इतने बरसों में. लडकी ने लपककर उस फूलों से भरी टहनी को उठाया और अपने साथ ले आई. चाय के कप के पास अब वह टहनी रखे हुए मुस्कुरा रही थी. टहनी उठाकर लौटते वक़्त लड़की ने सड़क पर झरकर गिरे फ्योली के फूल उठाकर जुड़े में सजा लिए थे. गुलाबी और पीले फूलों की जुगलबंदी में चाय की खुशबू बिखर रही थी. लड़की ने स्मृतियों की शाख से अपना मनपसन्द लम्हा उतारकर सामने सजा लिया था.

वह बारी-बारी से दोनों कप से चाय पी रही थी. चायवाले दादा ने पूछा,'बिटिया कोई और आने वाला है?' लड़की मुस्कुराई. 'नहीं दादा, जो आने वाला था वो वहीं गया है जहाँ उसे जाना चाहिए था.' दादा को कुछ समझ नहीं आया उन्होंने 'अच्छा' कहकर फिर से दूसरे ग्राहकों की चाय चढ़ा दी.

अख़बार में ख़बर थी, आपदा में बचाव के लिए गए लोगों का कोई पता नहीं...अख़बार कई बरस पुराना था या शायद नया ही. खबर बदली नहीं थी. लड़की की उदास आँखों ने चाय को देखा, और गटक लिया. पहाड़ पर पहाड़ सी आपदा आई. फिर न जाने कितने घर उदास हुए...लड़की ने चाय के दोनों कप रखते हुए दादा को पैसे दिए और फूलों से कहा, 'इस बरस ज्यादा खिलना है तुम्हें, कि उदास है मन का मौसम.' वो चलने को हुई तभी एक फूल उसके काँधे पर आहिस्ता से आकर बैठ गया. लड़की ने महसूस किया इस जहाँ या उस जहाँ...जहाँ भी है वहां लड़का जरूर मुस्कुराया है.

Sunday, April 5, 2020

मन, मान और इंतजार

तस्वीर- संज्ञा उपाध्याय 
लड़की को नदियों, पर्वतों, जंगलों, समन्दरों से प्यार था. लड़की को पंक्षियों से प्यार था. जुगनू के पीछे भागते हुए जंगल में खो जाना उसे बहुत अच्छा लगता था. जब वो जंगल में गुम हो जाती तो पीले फूलों की कतारें उसे अपनी उँगली धीरे से थमा देतीं और वो उसे थामे-थामे घर लौटती.

रास्ते में उसे चाँद मिलता जिसे वो साथ लिए हुए घर लौटती. फूलों की कतारें घर के दरवाजे पर ठिठक जातीं लेकिन चाँद नहीं ठिठकता. वो उसके साथ चलते-चलते उसकी रसोई की खिड़की में लटक जाता. वो चाय बनाती तो चाँद मुस्कुराता, वो चाय लेकर अपने कमरे में आती तो वो लडकी की कमरे की खिड़की से झाँकने लगता. लड़की चाँद की शरारतों में पीले फूलों की कतारों को, जुगनुओं की शैतानियों को भूल जाती.

चाँद लड़की के इश्क में था. लड़की लड़के के इश्क में थी. लड़की सारी रात चाँद को लड़के के किस्से सुनाती. लड़का जो उस रात भी उससे मिलने आया नहीं था और इसके पहले कि लडकी उदास हो जुगनुओं ने लड़की का ध्यान भटका लिया था. लड़की भागती जरूर फिरी जुगनुओं के पीछे लेकिन ध्यान उसका हटा नहीं था.

लड़का लड़की के इश्क में तो था लेकिन वो इश्क की गरिमा से अनजान था. लड़की उसके इश्क में थी लेकिन अपने मन और मान को थामना भी उसने अब सीख लिया था. लड़के ने लड़की का मन पढ़ना नहीं सीखा था अब तक. वो दिन में कई बार अपने प्यार का इज़हार करता, लड़की को अपने प्यार का यकीन दिलाता लेकिन लडकी के मान को खंडित भी करता. लड़की मन और मान दोनों लेकर लड़के से मिलने जाती थी लड़का सिर्फ लड़की से मिलता था, उसका मन और मान वहीं कोने में ठिठके रहते. लड़की लड़के से मिलकर लौटती तो उसके साथ लौटती एक उदासी भी.

उस रोज लड़की दूधिया झरने की संगीत में खोयी हुई थी, उसका ध्यान चारों ओर बिखरे हरे पर था, उसके सर पर पीले फूलो का छत्र सा मढ़ा हुआ था उसकी आँखें सुख से भीगी हुई थी. किसी का इंतजार इतना सौन्दर्य लेकर भी आ सकता है सोचकर ही लड़की मुग्ध थी. इंतजार का हर लम्हा उसे इबादत में होने जैसा लग रहा था. फिर...लड़का आया. उसने लड़की की आँखें मूँद लीं. अपनी दोनों हथेलियों से लड़की का चेहरा ढांप लिया. लड़की सुख की सिसकी में डूब गयी. लडकी ने आँखें खोलीं तो लड़के ने मुस्कुराकर कहा , 'एक खुश खबर है'. लड़की ने पलकें झपकाकर पूछा, 'क्या'. लड़की ने पूछ तो लिया था लेकिन उसकी इच्छा जवाब जानने की नहीं थी. वो चाहती थी लड़का चुप होकर उसके साथ इस दृश्य का हिस्सा बने. वो दूधिया झरने का पानी पिए, पीले फूलों की झालर में अपने होने को गूंथ दे... इस जीवन में इस लम्हे में होने से ज्यादा खुशखबर क्या होगी भला?
लड़के ने बताया, 'उसका प्रमोशन हो गया है. उसे अब दूसरे शहर जाना होगा.' बाहर का दृश्य लड़के की खुशखबर और लडकी की आँखों से छलके आंसू से टकराकर टूट गया था.

लड़की लड़के से मिलने अब भी जाती है उन्हीं ठिकानों पर जहाँ वो आया करता था. वो अपने इंतजार की टोकरी लिए लिए ही वापस लौट आती थी.  वो सारी रात चाँद से उन मुलाकातों के बारे में बतियाती है जो हुई नहीं.  वो हो चुकी मुलाकातों के बारे में कभी कुछ नहीं कहती.

पेड़ों पर नयी कोंपले फूटने के दिन फिर से आये हैं. लड़की का इंतजार अब उन कोंपलों में ढलकर खिल रहा है...

Friday, November 15, 2019

छोटी सी प्रेम कहानी



'कैन आई ट्र्स्ट यू?' लड़की ने सकुचाते हुए पूछा.
'यस यू कैन.' लड़के ने अपने कंधे चौड़े करते हुए कहा.
ठीक उसी वक़्त पूरनमासी का चाँद छपाक से नीली नदी में कूद गया. समूची रात सुफेद फूलों की खुशबू से महक उठी.
लड़की की आँखें नम हो उठीं. यह प्रेम की दास्ताँ के सबसे उजले अक्षर थे.
इन्हीं की रौशनी में लड़की की जिन्दगी दिप दिप दिप दमकने लगी. 
वक़्त सरकता गया.
न लड़की ने भरोसा करना छोड़ा न लड़के के कन्धों की चौड़ाई कम हुई है फिर भी लड़की इन दिनों उदास ही रहती है.
भरोसा करने और भरोसा न टूटने के बीच भी काफी उदासी रहती है.

Tuesday, March 13, 2018

सपने वाला खेल


'आओ सपनों वाला खेल खेलते हैं, तुम मुझे अपना सबसे प्रिय सपना देना, मैं अपना सबसे प्रिय सपना तुम्हें दूंगा. हम एक दूसरे के सपनों को जियेंगे.'  लड़के ने कहा.

लड़की ने कहा, 'तुम. मेरा सबसे प्यारा सपना तुम हो'
लड़का हंस दिया, ' अम्म्म...मेरा सबसे प्यारा सपना है मेरे पास बहुत सारे पैसे हों, मुझे सारी दुनिया के लोग जानते हों.सम्मान करते हों
'
लड़की लड़के का सँभालने लगी. उसके पास पैसा है, शोहरत है लेकिन लड़की उदास है.

लड़का खुद के इर्द-गिर्द घूमता फिरता है. खुद के आगे न कुछ देख पाता है, सुन पाता है. वो भी बेहद उदास रहता है.

इस खेल के नियम ठीक नहीं थे. 

Tuesday, January 12, 2016

इश्क़ नमक भर, बस...



'मैं तुम्हें प्यार करती हूं, जिस तरह किसान करता है प्यार अपनी फसलों को। मां अपने बच्चे को, प्यास पानी को, मछली नदी को। मैं तुम्हें प्यार करती हूं उस तरह जिस तरह एक सामान्य स्त्री करती है प्यार अपने सामान्य प्रेमी को। मेरे इश्क में कोई खास बात नहीं, कोई ऐतिहासिकता नहीं, कोई बड़ा समर्पण भी नहीं, कोई आदर्श नहीं। 

नहीं कोई वादा कि हर हाल में रहूंगी तुम्हारे ही साथ जनम.जन्म तक, ये सच है कि तुम्हारा साथ शिद्दत से चाहती हूँ लेकिन अपना साथ भी खोना नहीं चाहती। मैं नहीं कहूँगी कभी कि तुम्हीं मेरे मंदिर तुम्हीं मेरी पूजा। नहीं मैं चाहती कि मंदिर में जलते किसी दिये की लौ की तरह जलती रहूं तुम्हारे प्यार में हमेशा और तुम ईश्वर की तरह अपने आसन पर विराजे रहो। मैं मर तो सकती हूं तुम्हारे प्यार में लेकिन तुम्हारे प्यार में अपना अपमान भी नहीं होने दूंगी। तुम धोखा दोगे तो मैं भी तुम्हारे लिए बिसूरती नहीं रहूंगी।

 सिर्फ दाल में नमक जितना ही करती हूं तुमसे प्यार। तुम चाहो तो प्रेम की महान दुनिया से मेरे नाम के सफहे मिटा दो लेकिन मैं इसके सिवा तुमसे और कोई वादा नहीं कर सकती। रुदन मेरे भीतर रहेगा, पलेगा लेकिन वो कमजोर नहीं करेगा मेरे कदमों को भूल जाओ कि तुम्हारे प्यार में कुछ भी सहूंगी, और न तुम्हारे सहने की वजह बनूँगी।'

'हम्मम...और?'  लड़के ने धीरे से कहा...
'फिलहाल इतना ही...' 
कहते हुए वो उठकर चल दी। सूखे पत्तों पर उसके पांवों के पड़ने से जो आवाज आ रही थी वो उस असीम एकांत को नरमाई से तोड़ रही थी। लड़का वहीं बैठा रहा। चांद पूरनमााशी का था लेकिन वो लड़के को आधा ही ढंक रहा था। सिर्फ आधा। लड़के की आधी देह चांदनी में और आधी महुए की पेड़ की छाया में ढंकी हुई थी। 
लड़की ने पलटकर देखा, मुस्कुराई...'वहीं बैठे रहोगे क्या?'
लड़का बैठा ही रहा...चुपचाप
'क्या हुआ तुमको?' लड़की ने अपने दोनों हाथ कमर पर रखकर पूछा।
'हुआ तो कुछ नहीं...बस कुछ सोच रहा हूं.'
'हां, तो सोचो न. सोचने के किसने मना किया है लेकिन यहां से उठो तो सही।'
'तुम्हें तो चांदनी रात में जंगल में बैठना बहुत पसंद था, अब क्या हुआ।'
'पसंद तो अब भी है लेकिन मुझे अभी चाय पीने की बड़ी इच्छा हो रही है।'
'अच्छा...और?' लड़के ने पूछा।
'और जोर से गाना गाने की, तुम्हारी उतरी हुई सूरत पे जोर से हंसने की.. इस जंगल को अपनी आवाज से गुंजा देने की...लड़की की आवाज में शोखी घुलने लगी थी। 
'चलो, चाय पीते हैं...'लड़का उसे लेकर जंगल से बाहर निकलने को हुआ। 
'तुम मुझसे डर गये न?' लड़की ने उसे छेड़ा
'किस बात से डर?' लड़के ने शांति से पूछा
'मेरे प्रणय निवेदन से, आई मीन मेरे प्रेम प्रस्ताव को सुनकर?' लड़की ने लड़के चेहरे के एकदम करीब अपना चेहरा ले जाते हुए पूछा।
लड़का शांत उसकी आंखों में देखता रहा। चांदनी झरती रही।
लड़के की आंख में कुछ था...प्यार के अलावा।  वो छलक रहा था. 
'कुछ पूछना है?'  लड़की का चेहरा अब लड़के के और करीब था। 
लड़के की आंख में अटका वो प्यार के अलावा वाला कुछ  टपक गया। 
'सवाल नहीं दुःख है...' उसने टपके हुए दुःख  को अपने गालों पर बहने दिया। 
लड़की ने लड़के के सीने पर सर टिकाकर कहा, 'मैं जानती हूं तुम्हारा दुःख।'
'मैं जानता हूं कि तुम जानती हो...फिर भी तुम्हें अपने प्रेम को इस तरह कहना पड़ा इसका दुःख है। यह दुःख समूचे समाज का है, उस समूची सोच का जहां प्रेम इतनी जड़ मान्यताओं के साथ आता है, जहां स्त्रियों के पास प्रेम इतने दुःख लेकर आता है, इतने संदेह, इतनी असुरक्षा। मैं समूची आदम जाति की ओर से इस दुःख को वहन कर रहा हूं...'
लड़की ने लड़के के सीने से सर उठाते हुए कहा, ' हां, और मैं समूची स्त्रियों की तरफ से अपने प्रेम को इसी तरह प्रस्तावित करना चाहती हूं...कि मैं तुममें उगना चाहती हूं लेकिन अपने भीतर भी बचे भी रहना चाहती हूं...' लड़की की आवाज अब भारी होने लगी थी।
'मैं तुम्हें तुम्हारे भीतर बचाये रखूंगा, रख सकूंगा ऐसा भरोसा नहीं दे पाया... तुम्हें सदियों से इसी असुरक्षा में अपने प्रेम को जीना पड़ रहा है' लड़के की आवाज पिघलने लगी थी. 
'मैं तुम्हारे प्रेम के प्रस्ताव को सम्पूर्णता में स्वीकार करता हूं...इश्क की किताबों में दर्ज होने को नहीं मेरी जिंदगी की फीकी दाल में स्वाद भर नमक की तरह तुम्हें चाहता हूं। कि तुम्हारे बिना उम्र भर बिना नमक की दाल, बिना पानी के जिंदा मछलियों का तस्सवुर, फसलों से खाली खेतों का किसान मैं नहीं होना चाहता...'

लड़की की आँखों से भरोसा बरसता रहा, आसमान से बरसती रही चांदनी, धरती पर प्रेम की अभिलाषा बरसती रही....




Friday, December 25, 2015

कहानियों वाला आसमान



लड़की को कहानियां सुनना पसंद था, लड़के को कहानियां कहना। वो जब मिलते तो कहानियों का एक संसार खुलता। लड़के की किस्सागोई गज़ब थी, लड़की की कहानियों की प्यास अज़ब थी. लड़के की पोटली में किस्सों का खजाना था. प्यार की कहानियां, राजा रानी की कहानियां, तोता मैना की कहानियां, नदी, जंगल, पहाड़ की कहानियां, खेत खलिहान की कहानियां, परियों की कहानियां, टूटते तारे और अधूरी इच्छाओं की कहानियां।

लड़का कहानियां खुले आकाश के नीचे ही सुनाता था. उसकी एक शर्त थी कि कहानी सुनते वक़्त लड़की को सोना मना है. लड़की का कहानी में जागना ज़रूरी था, संसार में भले ही वो सोयी हो. इसके लिए लड़की को हुंकार भरनी होती थी. लड़की कभी ठंडी सड़कों पर गर्म सांसों की आंच सेंकते हुए कहानियां सुनती, कभी नदी के पानी में झिलमिलाते चाँद को देखते हुए, कभी घंटाघर की बंद हो चुकी सुइयों के ठीक नीचे बैठकर, कभी चाय की ठेली के पास चाय सुड़कते हुए कहानियां सुनती। वो लड़के को गौर से देखती, कहानियां सुनाते हुए वो किसी फ़क़ीर सा लगता था. लड़की को कहानी सुनना इबादत में होने सा लगता। लड़की गलती से भी हुंकार भरना नहीं भूलती थी.

एक रोज लड़का उसे बिना बताये दूर देश चला गया. लड़की को कहानियों की याद बेहद सताती। वो बिना कहानी के भी हुंकार भरने की आदी हो चुकी थी. वो लड़के की तलाश में भटकती फिरती। दिन महीने साल बीते, लड़की भटकती रही. कई कहानी सुनाने वाले आये. तरह-तरह की कहानियां निकालते झोली से, तरह तरह की किस्सागोई अपनाते लेकिन लड़की को लड़के की कहानियों का इंतज़ार था. अगर कभी एक टुकड़ा नींद उसे हासिल हो भी जाता तो वो सपने में भी हुंकार भरती।

उधर लड़का रास्ता भटक चुका था. किसी ने शायद उसके रास्तों को छुपा दिया था, या रास्तों की अदला-बदली कर दी थी. वो पांव उठाता लेकिन जाने कहाँ पहुँच जाता। लड़का कहानियां भूल गया था. सपनो के साथ साथ वो नींद से भी बिछड़ गया था, जागी आँखों से नींदों का इंतज़ार करता और बंद आँखों में सिसकता। अपनी पोटली टटोटलता वहां कहानियां बची ही नहीं थीं, कुछ टुकड़े बचे थे. उन टुकड़ों को जोड़ना फिजूल था. लड़का बस चलता जाता कि कभी तो सही राह तक पहुंचेगा ही.

लड़की अब खुद की कहानियां लिखने लगी. अब उसकी कहानियों में वो सब होता जो जिंदगी में नहीं होता था. उसके सारे ख्वाब कहानी होने लगे. आज़ाद होते ख्वाब कितने हसीन होते हैं. लड़की ख़्वाबों  की आंच और सुलगाती, जिंदगी बेरहमी की आंच और बढाती। लड़की ने दुनिया के तमाम बांस के जंगलों से कलम बनने का इसरार किया। नदी उसकी आँखों में थी बस रात से रोशनाई मांगी उसने और नदी में घोल दी. कहानियां रात के आसमान पे लिखी जाने लगीं। ये कहानियां ज़माने के पढ़ने के लिए नहीं उसके खुद के जीने के लिए थीं.

आसमान में अब तारे नहीं कहानियां बसने लगीं। एक रोज नींद खो चुका लड़का आसमान ताक रहा था. अचानक उसकी बहती आँखों में मुस्कान चमकने लगी. वो अपनी खोई हुई कहानियों को देख पा रहा था. पढ़ पा रहा था. उसे अरसे बाद अपने दिल की धड़कनों की आवाज़ सुनी। अरसे बाद उसकी चाय पीने की इच्छा हुई.

लड़की धरती के एक छोर पर कहानियां लिखती जा रही थी लड़का धरती के दूसरे छोर पर कहानियां पढ़ रहा था. लड़की भूखी प्यासी, जागी सोयी बस कहानिया लिखती, कि वो जानती थी कि उसने कहानी लिखनी बंद किया और उसकी नब्ज़ थमी. वो लिखती थी क्योंकि वो जीना चाहती थी. उधर लड़का कहानियों के आसमान को ओढ़ता, बिछाता। वो जानता था कि उसकी जिंदगी ऑक्सीज़न से नहीं आसमान पे लिखी जा रही कहानियों से चल रही है. लड़का कहानी पढ़ते हुए हुंकार भरता, लड़की कहानी लिखते हुए हुंकार भरती।

एक रोज लड़का कहानी पढ़ते पढ़ते चौंक के उठा और कहानी की परीजाद के महल  की तरफ जानेवाली सड़क पे चलने लगा. परीजाद को मारने के लिए राछस निकल चुका था. शहजादा परीजाद के महल से बहुत दूर था. उस रात बहुत बारिश हो रही थी. लड़का चलता रहा, चलता रहा... लड़की की आँख लग गयी कहानी लिखते-लिखते। शहज़ादे को जिस ख़ुफ़िया रस्ते से परीजाद के पास पहुंचकर उसे बचाना था वो शहज़ादे को बताने से पहले लड़की की आँख लग गयी. लड़का भागने लगा, उसे, सिर्फ उसे ही वो रास्ता पता था, उसे परीजाद तक पहुंचना था. वो ज़ोर ज़ोर से हुंकार ले रहा था कि धरती के किसी भी कोने में नींद में लुढक चुकी लड़की तक उसकी हुंकार पहुँच सके, वो जागे, कहानी लिखे, शहज़ादे को परीजाद तक राछस से पहले पहुंचाए। लेकिन लड़की को सदियों की जाग के बाद नींद आई थी. कलम उसके हाँथ में थी, आँखों की नदी में घुली रात की सियही उसके गालों पे सूख चुकी थी. लड़के के पांव भागते जा रहे थे कि अचानक उसे ठोकर लगी. वो उठा, भागा, चिल्लाया, लड़की को जगाने की कोशिश की लेकिन राछस परीजाद तक पहुँच चुका था.

परीजाद ने शहज़ादे को बहुत पुकारा, शहज़ादा परीजाद की मदद को बहुत तड़पा लेकिन वक़्त बेरहम था. लड़की नींद में हुंकार भर रही थी, लड़का बारिश को चीरता हुआ भाग रहा था,... राछस अट्हास कर रहा था.

कहानियां  उसी रोज़ भस्म हो गयीं सारी, आसमान खाली है कहानियों से. शहज़ादा रास्ता भटक चुका है,

शहज़ादे के इंतज़ार वाली घायल परीजाद राछस का मुह तोड़ने की तैयारी कर रही है.

लड़की कब्र में गहरी नींद सोयी है. लड़का उसकी नींद के सिरहाने बैठा है, वो कहानी सुनाता रहता है, कब्र से हुंकार उठती रहती है.


Tuesday, August 25, 2015

वापस लौटना मुझे अच्छा नहीं लगता...



लड़की बेसब्र होकर रास्तों को बाहों में समेट लेने को दौड़ पड़ती थी। जब रास्ते उसके हाथों से फिसल जाते तो उसके भीतर एक और ही इच्छा जागती, उन रास्तों पर बिछ जाने की इच्छा, बहती धार को पोर-पोर में जज्ब कर लेने की इच्छा या अपनी सारी नमी बारिशों के हवाले कर देने की उफनती हुई इच्छा...लड़की अपने भीतर ढेर सारी इच्छाओं को गड्डमगड्ड होते देखती।

इन गड्डमगड्ड होती इच्छाओं के बीच एक चेहरा उगता। सुबह की पहली किरन सा उजला चेहरा। उस चेहरे की नाक पकड़ना लड़की को इतना पसंद था कि वो सारी रात अपनी इच्छाओं की आंच पर अपने आंसुओं का ईंधन डालकर उन्हें जलाये रखती और जैसे ही वो चेहरा उगता वो उसकी नाक पकड़ने को लपकती...

'आह...लगता है न पगली...' चेहरा अचानक बोल पड़ता।
'अरे, तुम तो सच्ची में हो?'  लड़की उसकी नाक पकड़े पकड़े ही पूछती।
'नहीं....मैं नहीं हूं...भूत है मेरा...' लड़का अनमना होकर जवाब देता।
'भूत....हा हा हा...हा...हा...हा...'
लड़की जोर-जोर से हंसती...

'अगर तुम भूत हो तो भी मत डरो। तुम्हारा कोई कुछ न बिगाड़ सकेगा.., '
'हां, अगर मैं भूतनी होती या डायन तब तो गई थी काम से...तुमको पता है पहले लोग डायनों से डरते थे अब डायनें लोगों से डरती हैं....'
लड़की की आवाज ज़रा सर्द होने लगी थी।

'वैसे है तो तू चुड़ैल ही...पर मैं तुझे कुछ होने नहीं दूंगा...' कहते हुए लड़के ने उसकी उदास होने को आई आवाज को धौल देते हुए उसकी चोटी खींची।

लड़की फिर से खिलखिला उठी...कि उस रोज हंसने का मौसम था...शाखों पर पत्ते हंस रहे थे, सड़कों पर भरा हुआ बारिश का पानी खिलखिला रहा था, छप्पाक छप्पाक खेलते बस्तों के भीगने से बेपरवाह बच्चे खुश थे, बछड़े की गरदन पर दुलार करती गैयया खुश थी....आसमान खुश था...धरती खुश थी...
लड़की को इस कदर खुश देखकर लड़का उदास हो जाता। जाने क्यों लड़की का यूं खिलखिलाकर हंसना उसे अच्छा शगुन नहीं लगता था। उसकी हर हंसी के भीतर लड़के को कोई उदासी, कोई नमी सी झांकती मिलती थी।

उधर लड़की ने बेवजह हंसना अभी नया-नया ही सीखा था। उसकी हंसी किसी नवजात की किलकारी सी मालूम होती थी। जिसे देख सुख का समंदर भी उमड़ पड़ता और अनजाना कोई भय भी दबोच लेता। तुरंत हाथ काला टीका लगाने को बढ़ते और मुंह से थू-थू निकलती है। उफफफ ये बुरी नज़र का चक्कर...

'अच्छा अब बस करो.' लड़का उसकी हंसी पर से अपनी निगाहें फेरते हुए कहता है। उसे डर है कि कहीं उसकी ही नजर न लग जाये लड़की को।
'क्यों? मैं तुम्हें हंसते हुए अच्छी नहीं लगती?'  लड़की हंसते-हंसते ही पूछती।
' नहीं, मैं तुम्हारी हंसी के पीेछे से आने वाली उदासी से डरता हूं। '
'अच्छा, मेरी दादी कहती थीं कि लड़कियों को जोर से नहीं हंसना चाहिए। वो भी नजर लगने से डरती होंगी तुम्हारी तरह, सारा जमाना तो लड़कियों की मुस्कुराहटों का बैरी ही बना है न जाने कबसे....लेकिन तुम डरा मत करो...
मैं तो इतना हंसना चाहती हूं कि सारी दुनिया में सिर्फ हंसी ही बचे. सोचो अगर धरती की सारी लड़कियां एक साथ खुलकर हंसे तो धरती किस कदर गम से खाली होगी...किस कदर महकती...लहकती...'
' हम्ममम ये तो है...लड़के ने धीरे से कहा।'

'बस, हमें अपने हंसने की वजह खुद बनना होगा...हर निराशा के आगे अपनी मुस्कुराहटों की बाड़ लगा देनी होगी...मैंने देखा है दुःख न मुस्कुराहटों से बहुत घबराता है। सच्ची।'  लड़की ने उसकी नाक फिर से पकड़ते हुए कहा...

'अच्छा बाबा ठीक है....'  लड़का अपनी लाल हो चुकी नाक को सहलाने लगा।
उस रोज बहुत बारिश हो रही थी। बहुत बारिश। लड़की ने अपनी भीगने की इच्छा को लड़के की हथेली पर रख दिया। लड़का उसे पंखों पर बिठाकर उड़ चला बादलों के गांव। धरती का कोना-कोना भीग रहा था...लड़की ने भी अपने सारे सूखे मन उस बारिश में बाहर निकाल लिए....कि कोई कोना भी सूखा रहे मन का तो भीगने का क्या फायदा...लड़की रास्तों पर नाचती फिरती थी। हरी-हरी पत्तियों को दुलराती फिरती थी। धरती की धानी चूनर को लपेटे वो खुद धरती हो गई थी।

वादियां कैसी चांदी सी चमक उठी थीं उस रोज। उनके चेहरे भी चांदी हो गए थे...उनकी हंसी भी। मुस्कुराहटों के गुच्छों को समेटने को पेड़ों की टहनियां कम ही पड़ गयी थीं। सो दीवारों पर भी उग आये थे हंसी के गुच्छे। कोई हरी सी हंसी...भरी-भरी सी हंसी।

वो बार-बार दौड़कर रास्तों के गले लगने को भागती, मौसमों को मुट्ठियों में भींच-भींचकर खुद को निचोड़ने की कोशिश करती। और थककर बैठ जाती...बूंदों भरे रास्ते पर।

लड़का उसे लाड़ में भरकर लौट चलने को कहता... लड़की की चहक दुगुनी हो जाती।

'नहीं...वापस लौटना मुझे अच्छा नहीं लगता...सुना तुमने...' और वो अपनी खिलखिलाहटों को आसमान में उछाल देती।

अब आसमान से बूंदें अकेले नहीं बरस रही थीं, उसमें लड़की की हंसी भी बरस रही थी।


Sunday, July 5, 2015

कॉपीराइट वाली मुस्कान..



लड़का हर शाम उसकी पलकों की जाग को नींद की चादर ओढ़ाकर सुभीते से  विदा लेता। उसके सिरहाने अपनी खुशबू  रखता और बेहद आहिस्ता से रुखसत होता। वो सारी रात चाँद से, बारिश से या हवाओं से गुज़ारिश करता कि लड़की की जाग पर वो जो नींद की चादर ओढ़ाकर आया है, उसे सब मिलकर सहेजे रखें । लड़की की सदियों की जाग का उसके पास कोई उपाय नहीं था,  कुछ प्रयास थे जिन्हें वो करते रहना चाहता था. लड़का कभी उसके सिरहाने सारी रात बैठकर उसे सोते हुए देखना चाहता तो लड़की उसे वापस भेज देती ये कहकर कि ' तुम्हारे होने से तुम्हारे होने का एहसास टूटता है'. लड़का एहसास बचाना ज़रूरी समझता और चला जाता।

लड़की की जाग पर स्मृतियों की पहरेदारी थी. वो नींद की चादर के भीतर करवटें बदलती रहती और स्मृतियों की चुभन को महसूस करती रहती. लड़के की कोशिश नाकाम हुई ये सोचकर उसका दिल न टूटे इसलिए सुबह वो लड़के को अपनी गहरी मुक्कमल नींद का यक़ीन दिलाती।

लड़की को रात को प्यास लगती लेकिन वो अपनी प्यास को नींद की चादर में समेटे रहती। वो अपनी जाग तो समेट सकती थी लेकिन नींद की चादर से बाहर निकलने पर सिरहाने रखी लड़के की खुशबू के बिखरने का जोखिम वो नहीं ले सकती थी.  लड़का हर रोज नींद की चादर ओढाते हुए उसके कान में कहता कि सुबह की पहली किरण से पहले वो उसकी पलकों को अपनी हथेलियो से ढँक लेगा। लड़की उन हथेलियों को अपनी पलकों पर महसूस करने के लिए सारी रात अपनी प्यास को समेटे रहती।

नींद बाहर होती तो ज़रूर आती, नींद तो भीतर थी अधूरी उचटी,  उखड़ी,  बेचैन नींद। हर नींद अपने भीतर इतने किस्से लिए होती कि नींद अपने ही भीतर समाये किस्से सुनने को उठ बैठती। आँखें कड़वी होने लगती लेकिन किस्से खत्म ही न होते।

नाना जी की कहानियों से लम्बे किस्से. दुनिया की सबसे सुन्दर राजकुमारी के किस्से और उस खतरनाक राछस के किस्से। आधी रात तक किस्सों के बीच की हुंकार और  खिंचते जाते किस्से. किस्से ख़त्म नहीं होते, जाने कब.… नींद झरती किस्से की जगह हम  माँ की गोद में लुढक जाते. जाने वो किस्सा सपना थे या नींद। जो भी था लेकिन नाना जी मुस्कुराहट सच्ची थी बिलकुल लड़के के मुस्कुराहट की तरह. उसकी नन्ही सी कोमल सी मुस्कान, जिसके एक सिरे पर कोई झरना ठहरा हुआ मालूम होता और दूसरी तरफ फूलों की घाटी।

लड़की ध्यान से याद करती नाना जी की मुस्कराहट को. जो अक्सर चाय में चीनी कम होने की शिकायत करते वक़्त खिलती थी, या गुलगुले खाने की फरमाइश के वक़्त। लड़की को लड़के की और  नाना जी की मुस्कुराहट एक जैसी लगती।

वो अपनी बात को कन्फर्म करने माँ के पास जा पहुँचती। नाना जी की मुस्कान को कागज पे उतारती और लड़के की मुस्कान को भी. उसे दोनों एक सी लगतीं। नाना जी नींद के लिए किस्सों की चादर ओढाते थे और लड़का अपनी नींद की चादर ओढ़ाकर नए किस्से गढ़ने लगा था.

लड़की अपनी जाग में विचरती थी लेकिन ठीक सुबह की पहली किरण के उगने से पहले नींद पलकों पे रख लेती। उसे अपनी पलकों पर लड़के की हथेलियों की छुअन से जागना इतना अच्छा लगता था कि वो सारी उम्र सोने और जागने के खेल में जिंदगी बिता देना चाहती थी.

कभी हथेलियों की छुअन सूरज की किरण से हार भी जाती थी लेकिन तब वो सूरज की किरण की ओर से मुंह फेरकर तब तक सोयी रहती जब तक लड़के की आहटें उसके कानों तक न आ पहुंचतीं। ये जाग का और नींद का एक खेल था.

एक रोज हथेलियों को पलकों पे महसूस करने के इंतज़ार में दोपहर हो गयी. लड़की उसी नींद की चादर के भीतर अपने दोनों घुटनों के बीच अपना सर फंसाये लेटी रही. कितने बुलावे आये वो नींद की चादर से बाहर न निकली. उसकी पलकें इंतज़ार में थीं. बिना पलकों पर एक छुअन उगे उसका दिन उग ही नहीं सकता था. बुलबुल, मैना, तोता, कबूतर सब आये लेकिन लड़की धुन की पक्की थी और वादे की भी. लड़का जिंदगी के ट्रैफिक जाम में फंसा रहा और लड़की नींद की चादर के भीतर अपनी प्यास में सुलगती रही.

मौसम उसके माथे पर हाथ फेरकर जाते रहे लेकिन लड़की न उठी. मौसम बीते, बरस बीते न लड़की की सुबह हुई न लड़की की नींद की चादर हटी.

एक रोज आषाढ़ की तेज़ बारिश वाली रात में कोई मुसाफिर वहां ठहरने को रुका। किसी ने उसे सोने को जगह तो दे दी लेकिन ताकीद के साथ कि इस घर में नींद नहीं आ सकेगी उसे. मुसाफिर ने कहा उसे नींद नहीं थोड़ी बर्फ चाहिए, उसकी हथेलियों में बहुत जलन है। पडोसी बर्फ लाने गया. मुसाफिर बेसब्र बेचैनी में घर में भटकने लगा. वो किसी गहन पीड़ा में था. बेचैनी में उसने लड़की की नींद की चादर खींच ली और उसे कहा मुझे बर्फ चाहिए। बहुत जलन हो रही है. लड़की अपनी उनींदी जाग में बुदबुदाई प्यास.... मुसाफिर  ने बिना उसकी और देखे उसे जगाने के लिए उसकी पलकों को छुआ.

लड़की ने आँखें खोलीं, 'कितनी देर कर दी तुमने आने में',

नींद की उस उधड़ी चादर के बीच लड़की की प्यास टूट चुकी थी. लड़की ने पलकों पर उस छुअन को महसूस किया, मुस्कुराई और बुदबुदाई नाना जी की मुस्कान बहुत अच्छी थी, तुम्हारी तरह. एक बार मुस्कुराओ न, आषाढ़ की मूसलाधार बारिश के बीच उस मुसाफिर लड़के ने भीगी हुई पलकों से मुस्कुराते हुए कहा, कितने बरस हुए मुस्कुराये। लड़की ने अपने प्यासे  होंठों पर पानी की बूँद महसूस की. लड़के ने अपनी हथेलियों की जलन कम होते महसूस की.

जिंदगी का ट्रैफिक जाम अब भी वैसा ही था, लेकिन लड़का सारे  ट्रैफिक सिग्नल तोड़ चुका था. लड़की एक गहरी नींद में जा चुकी थी लड़का एक लम्बी जाग में उसके सिरहाने मुस्तैद था.…

नाना जी की मुस्कान पे लड़की का कॉपीराइट अब भी था।

Sunday, June 8, 2014

यह किसका प्रेम है बोलो तो?


लड़का- 'तुम इस धरती पर कब आईं....?'
लड़की-' धरती पर नदियों के आने से भी पहले, खेतों में पहली फसल की खुशबू उगने से बहुत पहले, मौसम की पहली अंगड़ाई लेने से भी पहले....'

लड़का- 'इतनी सदियों से धरती पर आकर तुमने क्या किया?'
लड़की- इंतज़ार
लड़का- 'किसका?'
लड़की- 'तुम्हारा नहीं....'
कहकर लड़की खिलखिला कर हंस पड़ी। ज्यों-ज्यों वो हंसती जाती नदियों का कोलाहल बढ़ता जाता, फूलों की गमक बढ़ती जाती, बादलों की धमक बढ़ती जाती। सूरज का ताप बढ़ता जाता.....
लड़की ने लड़के की पीठ से अपनी पीठ टिकाते हुए कहा, 'सुनो ये धरती पर नदियों के जन्म से पूर्व की कथा है। ये किसी भी राजा या रानी के अस्तित्व में आने से पूर्व की कथा है। यह बुद्ध के ज्ञान और ईसा के क्रूस पर लटकाये जाने से भी बहुत पहले की बात है। धरती एकदम खाली थी। खुशी से भी, गम से भी। तभी एक लड़की ने धरती पर पांव रखा। धरती को मानो प्राण मिले। अकेली धरती, कबसे अपनी धुरी पर घूमते-घूमते उकता चुकी थी। उसका न कोई साथी, न सहेली।

लड़की आई तो धरती ने उसे सीने से लगाया। खूबसूरत मौसम जो न जाने कबसे बिना किसी भाव के बस आते-जाते रहते थे। धरती ने उन मौसमों की चूनर में आकाश के सारे तारे टांककर एक सुंदर ओढ़नी बनाई। उसे लड़की को ओढ़ाया। लड़की मुस्कुरा उठी। यह धरती पर लड़की की पहली मुस्कुराहट थी। उसके मुस्कुराते ही मौसम भी मुस्कुरा उठे। लड़की और धरती अब सखियां थीं। लड़की कभी-कभी धरती से कहती लाओ अपना बोझ मुझे दे दो, तुम थोड़ा आराम कर लो, थक गई होगी....अपनी परिधि पर लगातार घूमना आसान है क्या...और सचमुच धरती कुछ दिन लड़की के पहलू में सिमटकर सो जाती, उन दिनों सूर्य के चारों ओर धरती नहीं, लड़की चक्कर लगाती थी। सृष्टि के कारोबार में कोई विघ्न डाले बगैर यह दोस्ती गाढ़ी हो रही थी। 

सुनो तम्हें एक राज की बात बताती हूं, लड़की अब भी कभी-कभी धरती हो जाती है, धरती कभी-कभी लड़की। 

एक रोज जब आसमान में खूब घने बादल थे....धरती भी रात के तीसरे पहर में ऊंघते हुए सफर कर रही थी लड़की की आंख से पहला आंसू टपका। वो आंसू धरती पर गिरा तो धरती पर नदियां बहने लगीं....धरती ऊंघते से जाग उठी। इसके पहले कि धरती कुछ समझ पाती धरती पर मीठे पानी का सोता फूट पड़ा। पानी ही पानी। झरने फूट पड़े। मीठे पानी वाले झरने। धरती ने उस पानी को चखा ये समंदर के पानी सा खारा नहीं था। इस पानी की मिठास ही अलग थी।
एक रोज धरती ने लड़की का हाथ पकड़ लिया और पूछा,' तू क्यों उदास रहती है? क्या तलाश रही है तू? '
लड़की खामोश...हवाएं शांत...चांद चुप, तारे टकटकी लगाये उसे सुनने को बेताब। 'मैं धरती पर किसी को तलाशते हुए आई हूं....कोई ऐसा जो मेरे होने को विस्मृत करे, कोई जिसे देखते ही आंखें तृप्त हों, जिसे सुनकर लगे कि सुना सबसे मीठा संगीत, कोई आत्मा के तमाम बंधनों से मुक्त करे...कोई जो होने को होना करे और जिसके साथ मिलकर धरती पर प्रेम रचा जा सके....

धरती ने ठंडी आह भरी...आकाश की ओर देखा, आकाश मौन रहा...उसने सिर्फ पलकें झपकायीं....'ओह...प्रेम की तलाश...?' संपूर्ण सृष्टि ने कहा, 'यानी दुःख की अभिलाषा....धरती बुदबुदाई...लड़की जा चुकी थी...दूर कहीं एक और नदी जन्म ले रही थी। ये लड़की के भीतर का प्रेम था, जिसकी चंद बूंदें भर छलकने से धरती पर नदियों का जन्म हुआ...यह धरती पर नदियों के आने की कथा है...कोई भागीरथी नहीं लाया था किसी की जटाओं से मुक्त कराकर कोई नदी, दरअसल, स़्त्री के प्रेम से जन्मी हैं सारी नदियां....कुछ समझे बुद्धू...'
लड़की ने कहानी के आखिरी सिरे में गांठ लगाते हुए कहा।
लड़का- तुम फिर शुरू हो गई? तुम और तुम्हारी कहानियां। दुनिया में हजार परेशानियां है और तुम्हारी कहानियां...जाने किस दुनिया से आती हैं। 

लड़का अचानक उठ खड़ा हुआ। उसके इस तरह अचानक उठकर खड़े होने लड़की जो उसकी पीठ पर पीठ टिकाये थी लुढ़क गई। लड़की बिना संभले हुए ही मुस्कुरा उठी। 'तुम चिढ़ गए हो ना?' वो अपनी मुस्कुराहट को चुपके से चबा रही थी।
लड़का- 'मैं क्यों चिढूंगा? क्यों चिढूंगा मैं बोलो?' ऐसा कहते हुए लड़का झुंझला रहा था।
लड़की- 'क्योंकि मेरी कहानी में इस बार तुम नहीं हो। कहीं नहीं हो....इसलिए...' लड़की ने सामने बहती नदी में कंकड़ उछालते हुए कहा। 

लड़का उठकर चल दिया। यूपीएससी के फॉर्म जमा करने की आखिरी तारीख है। उसे याद आया। वो जनता था कि लड़की से इस बारे में कुछ भी कहने का कोई अर्थ नहीं। वो फॉर्म के टुकड़े करके हवा में उछाल सकती है।
लड़की अपनी ही धुन में थी।

'बोलो चिढ़ गये न तुम....?' अब लड़के ने मुस्कुराहटें चबाईं....उसने लड़की की लंबी चोटी खींचकर उसे अपने करीब कर लिया। शरारतें गुम हो गईं सारी...सिर्फ सांसें बचीं...

'वो जो लड़की की आंख का पहला आंसू गिरा था धरती पर वो किसके लिए था बोलो तो...इन नदियों में पानी नहीं प्रेम बहता है...पता है ना? यह किसका प्रेम है बोलो तो? लड़की चुप....लड़का चुप...धरती चुप....आसमान चुप...'
कुछ देर बाद वहां न लड़का न लड़की सिर्फ नदी की चौड़ी धार बहती दिखी....जिसके किनारों पर अल्हड़ खिलखिलाहटों का जमावड़ा था, जिसके किनारे पंछियों की चहचआहट थी, फसलों की खुशबू, जिंदगी नदी के किनारों पे महक रही थी....

Tuesday, September 24, 2013

किसी से न कहना


सुनो, अरे सुनो तो....राघव हांफते हुए काजल के पीछे भाग रहा है.
काजल पलटकर देखती है. खिलखिलाकर हंसती है और फिर भागने लगती है. दम है तो जीतकर दिखाओ. वो चिल्लाकर कहती है. राघव पेट पकड़कर बैठ जाता है.
जा तू, मैं तुझसे नहीं बोलता. तू ही जीत जा. सर की चमची.
मैं सर की चमची....मैं सर की चमची....गुस्से में चिल्लाते हुए काजल राघव के पास आती है और उसे एक तमाचा मारती है. राघव दर्द से कराह उठता है. काजल और मारती है. 
माफ कर दे रे काजल, तू नहीं मैं सर का चमचा...
ठीक से माफी मांग. काजल कमर पे हाथ रखकर खड़ी हो जाती है.
राघव कान पकड़कर माफी मांगता है.
सुन....राघव काजल से कहता है
तू ना, किसी को बताना मत कि तूने मुझे मारा है.
क्यों...काजल उसे घूरकर देखती है. तेरी इज्जत घट जायेगी ये बताने से कि मुझसे पिटा है, इसलिए.
राघव धीरे से कहता है हां....
जिनके सामने तेरी इज्जत घट जायेगी तू मुझे बताइयो मैं उन्हें भी एक रहपटा लगा दूंगी. फिर सबकी इज्जत एक सी हो जायेगी. ठीक?
राघव मन ही मन सोच रहा है कि कैसे काजल को मनाये....
अच्छा सुन, अगर तू किसी को नहीं बतायेगी तो मैं तुझे इमली वाली गोलियां दूंगा.
अच्छा....और?
काजल चलते-चलते पूछती है.
और बिस्कुट....
और? काजल फिर पूछती है...
और ऑरेंज वाली टॉफी. देख इससे ज्यादा मैं कुछ नहीं दे सकता. हां...राघव खिसिया गया.
अबे, तेरी इज्जत का सवाल है. इमली की गोली, ऑरेंज वाली टॉफी और बिस्किुट भर की है तेरी इज्जत? काजल ने व्यंग्य किया.
राघव ने मुंह फुला लिया.
अच्छा चल नहीं बताउंगी. तू घर जाते वक्त मेरा बस्ता भी उठायेगा.
ठीक. राघव ने कहा.
मेरी बात मानेगा. काजल कहती है
ठीक. राघव कहता है.
अब से तेरी इज्जत मेरे हाथ में सुरक्षित है. काजल मुस्कुराती है.
गुरू जी ने विज्ञान की कक्षा हेतु जिन बच्चों से जंगल से किसी खास पेड़ की पत्ते मंगवाये थे उनमें काजल सबसे पहले लौटी थी.
राघव, कपिल, घुग्घू तो वहां तक गये ही नहीं.
सौरभ पहुंचा जरूर लेकिन देर से.
गुरू जी काजल को देखकर मुस्कुराए....
शाबास! लाओ पत्तियां यहां रख दो.
राघव, तुम भी यहां रख दो अपनी पत्तियां.
ना...गुरूजी हम ना लाये...हम ना...गिर पड़े रस्ते में सो ला ना पाये...जो गिरते ना तो पक्का ले आते. देखो कपड़ा भी मैले हो गये गिरने से.
काजल फिस्स...से हंस दी. राघव ने उसे घूरा...
गुरूजी अगली बार हम पक्का लेकर आयेंगे. तब तक सौरभ, कपिल और घुग्घू भी कक्षा में आ गये. सिर्फ सौरभ के हाथ में पत्ते थे.
गुरूजी ने काजल के सबसे पहले काम पूरा करने के लिए पूरी कक्षा को तालियां बजाने को कहा. साथ ही उन्होंने राघव को बुलाकर कहा, बेटा मुझे पता है तुम गिरे नहीं थे. तुम्हें काजल ने मारा था.
पूरी कक्षा के सामने एक लड़की के हाथ पिटने की बात स्वीकार करते हुए राघव को आंसू आ गये. उसने काजल की ओर देखा. काजल ने इशारे से कहा कि उसने नहीं बताया गुरूजी को.
गुरू जी ने कहा, मैंने तुम दोनों की बातें सुन ली थीं. उन्होंने काजल को भी डांट लगाई. और पूरी कक्षा से कहा,
बच्चो कोई भी काम न लड़कों का है न लड़कियों का. कोई भी क्षमता और इच्छा से सधता है. इसलिए अगर काजल जंगल में जाकर पत्तियां ला सकती है तो राघव मीठा गीत गा सकता है. और राघव, जब कपिल और सौरभ से पिटकर तुम्हारी इज्जत नहीं घटती सिर्फ दर्द होता है तो काजल से पिटकर इज्जत क्यों घटती है. क्योंकि वो लड़की है. यह गलत बात है. पीटना या पिटना अपने आप में गलत बात है, लड़का हो या लड़की. समझे? उन्होंने राघव से कहा, जी गुरू जी.
और काजल अब तुम किसी को नहीं पीटोगी.
जी गुरू जी.....काजल ने धीरे से कहा.

(उत्तराखंड के जेंडर मॉड्यूल में पठन सामग्री के तौर पर शामिल )

Tuesday, June 18, 2013

वो लोगों से दुःख मांगता था...


वो कोई दरवेश था शायद. उसके कंधे पर कोई पोटली नहीं थी. लेकिन कुछ था तो पोटलीनुमा. अदश्य. वो कहता था कि उसके पास दुनिया के हर सवाल का जवाब है. हर समस्या का समाधान है. पलक झपकते ही वो बारिश ला सकता था, पलक झपकते ही आपको फूलों से भरे बागीचे में ले जाकर छोड़ सकता था. एक ही पल में आप खुद को राजा समझ सकते थे और अगले ही पल तितली की तरह उड़ते या फूल की तरह खिलते महसूस कर सकते थे.

वो लोगों से दुःख मांगता था. बड़ी सी हथेली थी उसकी. बहुत बड़ी सी. उसकी हथेली पर जाते ही बड़े से बड़ा दुःख नन्हा सा हो जाता था. वो दरवेश धरती की तरह गोल-गोल घूमता था. उसके साथ पूरी सष्टि घूमती थी. एक रोज बहुत सारे बच्चों ने उसे घेर लिया, हमें जलेबियां खानी हैं...पूरे कमरे में जलेबियां ही जलेबियां. बच्चे खाते जा रहे थे...खाते जा रहे थे...खाते ही जा रहे थे....न जाने कबसे भूखी पड़ी अंतड़ियों और सपनों से खाली आंखों में उस रोज तृप्ति की बारिश हुई. चारों ओर जलेबियों की खुशबू फैली हुई थी.

एक रोज दरवेश ने बच्चों से पूछा, क्या तुम चाहते हो कि ये बादल तुम्हारे पैरों के नीचे बिछ जाएं....? बच्चे चुप...ऐसा भी कहीं होता है क्या? दरवेश ने पूछा कि क्या तुम चाहते हो कि इस तेज गर्मी वाले मौसम में बारिश हो जाए...बच्चों की आंखों में चमक तो आ गई पर वो खामोश ही रहे....ऐसा भी कहीं होता है क्या?

फिर धीरे से एक गुमसुम सी, खामोश सी सिलबिल ने हाथ उठाया...हां...बारिश....
क्या?
दरवेश ने पूछा.
बारिश हो जाए सिलबिल ने पलकें झपकाते हुए कहा...धीरे धीरे और बच्चों के भी हाथ उठे और दरवेश ने गोल-गोल घूमना शुरू किया...बच्चों ने भी घूमना शुरू किया. गोल...गोल...गोल....गोल....और कुछ ही देर में बादल के कुछ टुकड़े कमरे के भीतर झांकने को बेकल हो उठे.

कुछ ही देर में हल्की फुहार गिरने लगी. किसी की नाक पर एक बूंद गिरी, किसी के सर पर..कोई बोला...देखो बारिश आ गई....दूसरा बोला...कहां? तीसरी बोली...यहां मेरी नाक पर...कोई बोला मेरे सर पर और अचानक पूरा कमरा बारिश की बूंदों की आवाज में डूब गया. सारे बच्चे तर-ब-तर.

कमरे के बाहर भी बारिश थी, कमरे के भीतर भी. कमरा...शरीर का भी, ईंट पत्थर का भी.

दरवेश की ख्याति दूर-दूर तक फैलने लगी. लोग अपनी-अपनी समस्याएं लेकर आते और दरवेश आंखें बंदकर गोल-गोल घूमते और थोड़ी ही देर में समस्या गायब...लोग खुशी-खुशी वापस लौट जाते. रागिनी के पास कोई दुःख नहीं था, कोई परेशानी नहीं या वो किसी से कुछ कहना ही नहीं चाहती थी.

दरवेश ने उसके करीब जाकर पूछा, तुम्हें कुछ नहीं चाहिए...वो चुप रही.

दरवेश ने उसकी हथेलियों को अपने हाथों में लिया...उसके सर पर हाथ पर फिरा दिया. दोनों चुप बैठे रहे...रागिनी ने कहा, आप सचमुच कुछ भी कर सकते हो?

दरवेश चुप रहा.
रागिनी ने फिर कहा, आप मेरी मां को वापस ला सकते हो? वो भगवान के पास चली गई है. कहते हुए रागिनी ने अपनी आंख का एक आंसू दरवेश की हथेली पर रख दिया.

आप सब बच्चों से झूठ क्यों बोलते हैं?
दरवेश चुप.

मैं जानती हूं उस रोज कोई बारिश नहीं हुई थी. कोई बादल बच्चों की बात नहीं मानता. कोई जलेबियां नहीं खाई थीं हमने...
ऐसा क्यों करते हो आप....बोलो...

दरवेश बोला, बेटा, जादू मेरे पास नहीं तुम सबके पास है. तुम सब हो दरवेश. मैं तो तुम सबके बीच आकर अपना दुख, अपनी परेशानी कम करता हूं. हां, एक बात है कि मैं झूठ नहीं बोलता. जिन बच्चों ने कहा बारिश हुई उन्होंने उसे सचमुच महसूस किया. जिंदगी में किसी भी बात का होना न होना हमारे चाहने पर निर्भर करता है. हम क्या चाहते हैं, कितना चाहते हैं, किस तरह चाहते हैं. अपने उस चाहने के प्रति कितनी जिद है हमारे भीतर...

मैं अपनी मां को वापस लाना चाहती हूं....रागिनी फूट-फूटकर रोने लगी....तभी उसने देखा कि दरवेश उसकी मां में बदल गया. वो दरवेश उसकी मां ही थी. जो भेष बदलकर रागिनी से मिलने आई थी. रागिनी देर तक मां से लिपटकर रोती रही. मां ने उसे खूब प्यार किया. दोनों ने जलेबियां खाईं. और देर तक बारिश में भीगती रहीं.

अगले रोज जब रागिनी की आंख खुली तो न बादल थे, बारिश, न जलेबियां, न बच्चे न दरवेश न मां....हां, लेकिन रागिनी की आंख में आंसू भी नहीं था....

Sunday, March 11, 2012

एक मोड़ पर रखा इंतजार...


रास्ते नए नहीं थे. रास्तों के दोनों ओर मौसम ठाठ से सजा था...बीच बीच में फूल चुआता..और कभी मस्ती में शाखें और पत्तियां लहराता. वो लड़की उस शहर में भागती फिरती थी. उन रास्तों पर दूर तक दौड़ कर जाती, फिर वापस लौट आती. किसी मोड़ पे देर तक ठहरी रहती, फिर बैठ जाती...एकटक एक ओर देखती जाती. उसकी आँखों से एक-एक कर सारी नदियाँ बह निकलतीं. लोग उसे रूककर देखते तो वो मुंह घुमा लेती. अचानक वो जोर-जोर से रोने लगती और वो जगह छोड़कर भाग जाती...मै उसे अक्सर देखती थी. उसे चलने में कुछ तकलीफ थी शायद. शुरू-शुरू में उसके कपडे-वपड़े ठीक ठाक से लगते थे और वो किसी भले घर की लड़की लगती. मुझे लगा कि भले घर की लड़की है, शायद उदास है किसी बात पर. ( हालाँकि 'भला घर' मेरे लिए हमेशा से एक प्रश्न चिन्ह ही रहा है ) अपनी उदासी को सड़कों के सीने पर मल रही है. धीरे-धीरे उसकी हालत खस्ता होती दिखी...उसके कपडे भी अस्त-व्यस्त और सिसकियाँ लगभग चीखों में बदलने को थीं.
दरयाफ्त करने पर पता चला कि कोई पागल है...किसी से बात नहीं करती. अगर कोई मदद करना चाहे तो और चिल्लाकर रोने लगती है. खाना भी नहीं लेती, फेंक देती है. पैसे भी नहीं लेती. मै उसे दूर से देखती रही. जाने क्यों हिम्मत नहीं हुई उसके करीब जाने कि कहीं मेरे जाने को भी फेंक दिया तो...? मन में न जाने कितने सवाल जागे...कौन होगी वो लड़की...क्यों ऐसे भटकती फिर रही है. क्यों किसी की मदद नहीं लेती? 
एक रोज गाड़ी के सामने आ गयी. जोर से ब्रेक न लगाया होता तो गयी थी वो तो...बेहोश थी. उसे अस्पताल ले गयी.
पता चला भूख से बेहोश हुई है. न जाने कब से उसने कुछ नहीं खाया. होश आया तो अस्पताल के कमरे की सूनी छत को ताकने लगी. बड़ी हिम्मत करके मैंने अपनी आवाज में ढेर सारा प्यार भरकर पूछा, नाम क्या है तुम्हारा? वो चुप ही रही.
मैंने दोबारा नहीं पूछा. सिस्टर ने कुछ फल दिए खाने को तो उसने खा लिए. शायद भूख ज्यादा थी या फिर थोडा भरोसा भी.
फिर वो उठकर जाने लगी.
मैंने पूछा, 'कहाँ जाना है?'
कुछ नहीं बोली वो.
डॉक्टर ने उसे प्यार से समझाया, 'अभी तुम्हारी तबियत ठीक नहीं है. ठीक हो जाना तो जाना.'
वो अच्छे बच्चों की तरह बात मान गयी.
मै रोज जाती उसे देखने और उसके लिए कुछ फल ले जाती. अस्पताल की देखरेख में वो निखर रही थी.
एक दिन मैंने देखा कि वो खिड़की के पार लगे फूलों में से एक फूल तोड़कर अपने बालों में लगाये है और बहुत खुश है. मैंने उससे पूछा 'क्या बात है, आज बहुत खुश हो?'
उसने पहली बार कुछ कहा, 'आज जन्मदिन है...'
'अच्छा....' मैं बहुत खुश हुई. मेरा बड़ा मन हुआ कि उसे बाँहों में भरकर खूब प्यार करूँ. मैंने बाहें बढ़ा दीं. वो उनमे समा गयी और रोने लगी....मै उसकी पीठ पर हाथ फिराती रही...ऐसे मौकों पर शब्द सबसे बड़े अवरोधक का काम करते हैं मै जानती थी. मैंने कुछ नहीं कहा बस उसकी पीठ सहलाती रही...उसकी आँखें बहती रहीं...हिचकियाँ टूटती रहीं...वो रोते-रोते थक गयी तो सर घुमाकर लेट गयी, मैंने कुछ भी नहीं पूछा.
शाम को लौटी तो एक केक और कुछ फूल थे मेरे हाथ में. जाने क्यों उससे एक अनकहा नाता सा बन गया था और मै खुद को उसके बहुत करीब पाने लगी थी.
अस्पताल पहुंची तो पता चला वो जा चुकी है, बिना किसी को कुछ भी बताये...
फूल मेरी तरह मुरझा गए और केक सहमकर डिक्की में चुपचाप रख गया. उदास मन से मैं लौटने लगी. मैंने महसूस किया कि मेरे भी गालों पर कुछ रेंग रहा है...आंसूनुमा . तभी एक मोड़ पर वो मुझे दिखी. मै खुश हो गयी.
गाड़ी एक किनारे लगायी और धीरे-धीरे उसके पास पहुंची.
वो मुझे देखकर मुस्कुरा दी.
मैंने उससे लाड में भरकर पुछा, 'तुम बिना बताये क्यों चली आयीं? मै कितना परेशान हुई पता है?'
उसने कोई जवाब नहीं दिया.
'सुनो मै तुम्हारे लिए केक लायी हूँ. चलो तुम्हारा जन्मदिन मानते हैं.'
वो शरमा गयी. 'मेरा जन्मदिन नहीं है.' उसने कहा.
'फिर...? सुबह तो तुमने कहा था.'
'उनका है...' उसने शरमाते हुए कहा और गर्दन झुका ली.
'उनका किनका?'
अब चौंकने की बारी मेरी थी.
'वही...जिनके लिए मैंने घर छोड़ा था...जिन्हें मैं प्यार करती हूँ.'
'ओह! तो वो हैं कहाँ?'
सवालों को मौका मिले तो वो जोंक की तरह चिपकने लगते हैं.
वो फिर खामोश हो गयी. उदास. गुमसुम.
फिर से रास्तों की ओर ताकने लगी..
मै भी आसानी से छोड़ने वालों में से तो हूँ नहीं. मेरे भीतर के अहंकार ने सर उठाया. अहंकार...हाँ, हाल ही में एक दोस्त ने बताया था कि हमेशा किसी की मदद करने को उत्सुक रहना भी एक तरह का अहंकार ही होता है...जो भी हो मुझे इस लड़की की मदद करनी थी...
मैंने अब कोई सवाल नहीं किया.
उससे कहा, 'अच्छा चलो, तुम्हारे उनका जन्मदिन मनाते हैं.'
वो मान गयी...उसने केक काटा और गाया, 'हैप्पी बर्थडे डियर पंकज...' और जोर से रो पड़ी.
मैंने उसे गले लगाया. वो न जाने कितनी देर तक रोती रही. मानो उम्र भर का रोना हो. मैं भी रो पड़ी उसके साथ.
वो एक भरी-पूरी चलती हुई सड़क थी. ये शहर मेरा जाना हुआ है. मेरी इन हरकतों की खबर घर पहुँचने का पूरा खतरा था फिर भी मैंने परवाह नहीं की. उसके साथ सड़क के किनारे बैठी रही. हाथों में हाथ लिए. मुझे इस वक़्त दुनिया की हर शय से शिकायत हो उठी थी. क्या फायदा है कायनात की इस सुन्दरता का जब एक प्रेम इस तरह मुरझा रहा हो. क्या करूँ मैं इन चाँद सितारों का, खूबसूरत रास्तों का, गुलमोहर के पेड़ का, नदी के किनारों का....सब बेमानी...
अभी तक बस इतना सुराग मिला था कि इसका कोई प्रेमी है, जिसका नाम पंकज है. बस. अरे हाँ, उसका आज जन्मदिन है ये भी. मैंने लाये हुए फूलों में से एक फूल उसके बालों में लगाया और एक अपने बालों में. हमने केक एक दूसरे को खिलाया. फिर हम पैदल सड़कें नापने निकल पड़े.
थोड़ी दूर जाकर वो ठिठक गयी और वापस लौट पड़ी...
मैंने कहा 'क्या हुआ?'
उसने कहा, 'ज्यादा दूर नहीं जाएगी...उसने यहीं मिलने का वादा किया था. यहीं इसी मोड़ पर. कहा था कि कोने वाले पलाश के पेड़ के नीचे मिलना. मैं वहां से दूर नहीं जा सकती. वो आएगा. वो आएगा...वो आएगा...' वो फिर से रोने लगी.
'हाँ, वो आएगा. ज़रूर आएगा. क्यों नहीं आएगा. तुम इतनी प्यारी हो, तुम्हें छोड़कर कौन जा सकता है भला?'
मैंने उसे सँभालने की कोशिश की.
मोबाईल चीख-चीख के शांत हो चुका था. मुझे पता था कि मेरे घर पर भी हंगामा होगा आज.
सर पर खिले पलाश देखकर रोने का जी हो आया. सुना था कि पलाश की शाखों पर फूलों के साथ साथ प्रेमियों के मिलने का वादा भी खिलता है. लेकिन फ़िलहाल पलाश का यूँ खिला होना भी कुछ काम नहीं आ रहा था सिवाय इसके की वो हम दोनों के सर पर बीच बीच में कुछ फूल गिरा देता था. वो फूल जिन्हें तेज रफ़्तार गाड़ियाँ बेरहमी से कुचलती भी जा रही थीं. कुछ सड़क किनारे पड़े पड़े बेवजह मुस्कुरा रहे थे. मैंने पहली बार पलाशों से मुंह फेरा.
'उसका कोई नंबर है?' उससे पूछा?
उसने 'ना' में सर हिलाया.
'तुम्हारा नाम क्या है अच्छा?'
उसने 'ना' में सर हिलाया.
'तुम्हारा घर कहाँ है...कहाँ की हो?'
मै उसका ठिकाना जानना चाहती थी कि सुरछित हाथों में सौंप सकूं. महिला आश्रम ठीक जगह नहीं है इस प्यारी सी लड़की के लिए जो अपने प्रेम से बिछड़ गयी है और उसी मोड़ पर बैठी उसका इंतजार कर रही है.
लेकिन उसके पास मेरे किसी सवाल का जवाब नहीं था. वो बस उन रास्तों को ताक रही थी, जिन पर चल कर उसके प्रेमी पंकज को आना था. अब कैसे ढूँढूं पंकज को जिसकी प्रेमिका का नाम तक पता नहीं. कैसे छोड़ दूं उसे भटकने के लिए. जी चाहा चिल्ला चिल्ला के गूंजा दूं धरती को पंकज....पंकज...पंकज....कहीं से कोई आये तो सही, ले जाये अपनी मुरझाती मोहब्बत को. सजा ले अपनी दुनिया. पर मैंने ऐसा कुछ नहीं किया. रात अपना आँचल पसार रही थी...मैंने उससे बहुत कहा कि रात भर वो मेरे घर चले. सुबह हम पंकज के पास जायेंगे. लेकिन वो किसी तरह मानने को राजी न हुई. आखिर रात कि ड्यूटी पर मुस्तैद सिपाही को पांच सौ रूपये देकर मैंने उसकी सुरछा की गारंटी ली और अन्ना के आन्दोलन को मुंह चिढाया. उसे अपना शॉल उढ़ाया और पलाश के पेड़ से कहा कि उसका ख्याल रखे.
रास्ते भर उसके बारे में सोचती रही. किसी अच्छे घर की लड़की लगती है. किसी से प्रेम कर बैठी. 'अच्छे घर' हुंह...खुद पर ही हंस पड़ी.
वो लड़की जो प्रेमी ने जहाँ मिलने का वादा किया, वहां से हिलने को तैयार नहीं है और वो प्रेमी कहाँ है? वो लड़की तबसे उन्हीं सड़कों पर भटक रही है. क्यों न आया होगा उसका प्रेमी? पहला ख्याल तो यही आया कि प्रेमी होते ही दगाबाज हैं...कम्बख्त...फिर लगा कि कहीं उसका एक्सीडेंट न हो गया हो...फिर ये भी लगने लगा कि जिन दिनों वो अस्पताल में थी, तब वो आकर चला न गया हो...कहीं दोनों एक-दूसरे को ढूंढ न रहे हों...अख़बार में खबर छपवाना ठीक होगा क्या? लड़की का तो नाम भी नहीं पता. खबर में क्या छपेगा कि 'घर से भागी लड़की अपने प्रेमी की तलाश में दर-दर भटक रही है....' नहीं अख़बार वालों और पुलिसवालों से तो दूर ही रहना होगा. तो किया क्या जाये...यही सोचते हुए मेरा घर आ गया...जहाँ देर से आने और फोन न उठाने के कारण सबकी त्योरियां चढ़ीं थी.
रात भर मै उसके बारे में सोचती रही. कितना गहन प्रेम है उस लड़की का कि उसे कुछ भी याद नहीं सिवाय इसके कि उसके प्रेमी ने उस मोड़ पर मिलने का वादा किया था. यहाँ तक कि अपना नाम भी याद नहीं. क्यों नहीं आया होगा उसका प्रेमी. कहीं डर तो न गया होगा ज़माने से? मेरा अनुभव तो यही कहता है कि प्रेम करने में लड़के माहिर होते हैं और निभाने में लड़कियां. लेकिन मै मन ही मन मनाती हूँ, हर बार कि मेरा अनुभव गलत साबित हो. सुबह उठते ही सबसे पहले उसके पास जाऊंगी. चाहे ऑफिस से छुट्टी ही क्यों न लेनी पड़े कल उसका कुछ तो इंतजाम करना ही होगा. कम से कम उसके रहने का. ऐसे सड़क पर छोड़ देना ठीक नहीं है. खुद पर ग्लानि हुई कि पांच सौ रूपये देकर उसे अंजान पुलिसवाले के हवाले कर आई. जी चाहा आधी रात को जाकर उसे उठा लाऊँ. जैसे-तैसे रात कटी, बच्चो को स्कूल भेजा और खुद निकल पड़ी उस अनजान दोस्त की ओर.
वहां जाकर देखा कि भीड़ लगी है. रात कोई गाड़ी उसे कुचल गयी...पुलिस उसका शव पोस्टमार्टम के लिए ले जा रही थी. मैंने देखा उसके बालों में लगा फूल अब भी ताजा था...मैं भारी क़दमों से लौट रही थी...मै उसके बारे में कुछ भी नहीं जानती थी सिवाय इसके कि वो किसी पंकज कि प्रेमिका थी...वो पंकज जिसके आने का वादा उस पलाश के पेड़ के नीचे रखा था...पंकज कहाँ होगा इस वक़्त ?

( आज जनसत्ता में प्रकाशित )