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Sunday, September 16, 2018

नायिका उस प्रेम से बाहर नहीं आ सकी थी


और मैंने पाया है अक्सरहाँ यह गुण तुम्हारी नायिका में कि वह घटनाओं में, संबंधों में, अनुष्ठानों में, कार्यक्रमों में, संवादों में, बारिशों में, स्वप्नों में आसानी से प्रवेश करती नहीं। और फिर जो भीतर चली ही जाए तो बाहर लौटती नहीं। बिना ओर-छोर के जंगल में भटकती जाने कौन-सी जड़ी-बूटी खोजती फिरती तुम्हारी नायिका। जीवन की सीढ़ियाँ चढ़ते-चढ़ते तुम्हारी कथाओं की जल भरी बावड़ी में उतर डुबकी लगाने वाली नायिका। फिर नर्मदा तट पर दीयों की झिलमिल संग डूबते-उतराते किसी अँधेरे ज़ेहन में उतर जाने वाली तुम्हारी नायिका।

नहीं, प्रेम से ही नहीं, तुम्हारी यह नायिका कहीं से भी बाहर नहीं आती। बल्कि ये बाहर आने के सारे विकल्पों पर कँटीली बाड़ खींचकर जंगल में प्रवेश करती है। ऐसी नायिका को जीवन की वह गुमी हुई बूटी न मिले तो भला किसे मिले ?

और वह पुरुष, जिसके पास हज़ार ज़िम्मेदारियों का विलाप रहा होगा, हमेशा एक हड़बड़ी रही होगी, गहमागहमी रही होगी; वह पुरुष कहीं प्रवेश नहीं करता पूरा-पूरा। वह, जो दिखता है परिवार में भी, ऑफ़िस की मीटिंगों में भी, अख़बार की सुर्ख़ियों पर बिला नागा प्रतिक्रियाओं में भी, घड़ी में भी, कैलेंडर में भी, स्मृतियों में भी, प्रेम में भी, वह कहीं नहीं है।
क्योंकि बात बड़ी सीधी है कि जो हर कहीं है, वह कहीं नहीं है।

और तुम्हारी यह दुष्टना नायिका, प्रतिभा !

वह एक अछूते गिटार के तारों में तक प्रवेश कर गयी है, जिसे कभी बजाया नहीं जाता। उस गिटार की असह्य धुन पूरी कहानी में गूँजी है।

ओह ! ऐसा आरोह !

मैं तुम्हें बताऊँ, मेरी दोस्त !
कि वह गिटार तुम्हारी कहानी का सबसे मुख्य क़िरदार है।
और बहुत रुलाया तुमने मुझे ऐसी रुत में
कि जब बाद बारिश सूरज तक चिपचिपाता है
कि जब मैंने ख़याल किया था कि नहीं देखनी है एक और बार 'द जैपनीज़ वाइफ़'
कि जब मुझे प्रेस करनी थी मटकुल की वह लेसदार रेड फ़्रॉक
कि जब मुझे समझना था इन दिनों कैसे रुपये किलो टमाटर का भाव
कि जब मुझे अकेले ढूँढ़ निकालना था ट्रेन में अपनी सीट
कि जब मुझे आँखें मूँद कर देखना था अपनी श्वास का विलोम
कि जब मुझे नज़र में आती चीज़ों को भी कर देना था नज़रअंदाज़
कि जब मुझे उड़ने देनी थी अपनी हँसी की तितलियाँ
तब मेरी दोस्त !
तुमने भेजीं मेरे लिए बेहिसाब बारिशें
मिलनी चाहिए तुम्हें इसकी कुछ तो सज़ा
कि जब इस मौसम में, प्रतिभा !
सूरज तक चिपचिपाता है
मैंने तय किया कि रहूँगी दिन भर एरिक क्लैप्टन के
मनभेदिये गिटार के साथ

टियर्स इन हैवन.. टियर्स इन हैवन
टियर्स इन..

**

[ प्रतिभा की ताज़ा कहानी के भीतर चले जाने के बाद ]


#बाबुषा

Sunday, November 26, 2017

प्रियतम की हथेली के प्रति- बाबुषा कोहली


[ जन्मों पुराना व्रत हूँ मैं
तुम्हारी अंजुरी से पी लिया जल
घूँट भर
त्योहार हो गया जीवन. ]

**
सदियाँ सोख कर बना है मेरी पुतलियों का गाढ़ा सियाह
जाने कब से देखती रही अपलक संसार को
ज्यों देख सकता है समय बिन ठहरे
बंद घड़ी के काँटों को
मेरी कविता के गलियारे में मुर्गे की बाँग तक सुनी है

कुछ उनींदे लोगों ने

दो सौ बरस तक चलती रही मेरी तीजा की रात
मैं जागी रही निर्जल
सितारों से पूछती रही उनके देश का हाल
मेघों के निकट रही बहुत
गाती रही सूखे कंठ लोकगीत बौछार के
द्वार पर बाँधती रही ऋतुओं के फुलहरे
देहरी पर नयन जलाए काटती रही अँधेरे की चाल
तोड़ती रही संसार के नियम
प्रतीक्षा का कठोर व्रत निभाती रही
मैं जागी रही निर्जल दो सौ बरस तक
थके-प्यासे यात्रियों से करती रही जल की बात

प्यासा ही नहीं चला जाता सदा कुएँ के निकट
कुआँ भी पुकारता है प्यासे को
रुई के फाहे को पुकारता चोटिल घुटनों का लहू
कागा को पुकारतीं सूनी छतें

नींद को पुकारते रहे मेरे स्वप्न
मैं अपने रतजगों में तुम्हें पुकारती रही

तुम्हें पाने का बालहठ कर बैठे जो, वह नादान है
तुम अमेरिका नहीं जिसे कोई कोलम्बस पा जाए
खो जाएँ जहाजों के बेड़े जहाँ
वह अटलांटिक हो तुम
मणिकर्णिका घाट नहीं जहाँ जीवन के हारे पाते हों मोक्ष
विश्वनाथ की उलझी हुई गलियाँ हो तुम जिसकी धूल फाँकते खो जाए कोई संन्यासिन

तुम सतपुड़ा के सघन वन हो
सागौन की लालसा में काट न ले कोई लकड़हारिन
एक पत्ता जूड़े में खोंसे
माँग में तुम्हारे हरे को भरे वनकन्या
तुमसे श्रृंगार रचाए
हृदय नहीं माँगा तुम्हारा
मैंने माँगी हथेली
कौंधती है आँखों में विस्मय की बिजली
धड़कन धमकती बादल गरजते
बेमौसम हो जाती बरसात
कितने तो रूप इस हथेली के
चन्द्रमा में जितनी कलाएँ नहीं !

सुबह का डाकिया डाल कर चला जाता
मेरी देहरी पर धूपीली चिट्ठियाँ
तुम्हारी उँगलियों के बीच की दरारों से
झर पड़ते ऊष्मा के पीले पोस्टकार्ड

मैं सूर्य की इच्छा करूँ
छज्जे पर दिन उतर आता है
ईश्वर की इच्छा करूँ
खाने की थाली लिए माँ चली आती है
मैं चाह लूँ दूर टिमटिमाता एक सितारा
तुम्हारी हथेली आकाश हो जाती है

जोगी !
सुबह उठते ही अपनी हथेली तो देखो
तुम्हारी रेखाएँ ओढ़े मैं ऊँघ रही हूँ

बेसुध !
ज्यों सोता है नवजात शिशु पिता की थपकियों की लय में निश्चिन्त

देखो तुम !
एक बार अपनी हथेली दुपहरी की चटख धूप में भी
रगों में आलस भरे उलटती-पलटती हूँ तुम्हारी रेखाओं के बिछौने पर
ज्यों करवटें बदलती है नव-विवाहिता
चादर की सलवटों पर

साँझ के ढलकते मद्धिम उजाले में देखो
सदियों की जागी थी
उठ रही अब
मैं वस्त्र बदल रही हूँ
सँवर रही
पहन रही हूँ तुम्हारी रेखाएँ
मैं जा रही हूँ तुम्हारी हथेली के अंतिम छोर तक
चन्द्रमा संग बैठूँगी अंतरिक्ष में पाँव लटकाए
यह रतजगा नहीं हृदय की जाग है, जोगी !
तीजा का व्रत अब पूरा हुआ
मेरे तलुवे और एड़ियों पर छपी धूल धुलेगी
बैठूँगी जल में पाँव डुबोए

मैं जान गयी हूँ
तुम्हारी तर्जनी से एक नदी निकलती है