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Saturday, April 11, 2015

एक बार फिर वेरा...

'वेरा उन सपनों की कथा कहो' का चौथा संस्करण पलटते हुए मैं सोच रही हूं कि कविता के सुधी पाठकों का संसार शायद इतना भी सीमित नहीं. मार्च 1996 में यह संग्रह पहली बार प्रकाशित हुआ था। इस संग्रह से कोई रोशनी सी फूटती नजर आ रही थी। इसकी कविताएं महज शब्द नहीं, एक पूरा संसार हैं स्त्री मन का संसार। इन कविताओं में प्रेम की ताकत भी है, पाकीज़गी भी और तमाम रूढियों व अहंकारों से मुक्ति भी। इसके जरिये वेरा तक पहुंचना हुआ, निकोलाई की वेरा तक। उसकी आंखों से देखना सपना शोषण मुक्त समाज का। इस किताब ने हिंदी प्रकाशन को नया संदेश भी दिया।  वेरा की साज सज्जा, इसके कवर पर बनी दांते और बिएत्रिस की तस्वीर, ले-आउट, डिजाइन सबने ध्यान खींचा। आज आलोक श्रीवास्तव की वेरा 18 साल की हो गई। चौथा संस्करण को हाथ में लेते हुए मन बेहद खुश है। सजा-सज्जा में तनिक बदलाव कुछ नई कविताओं और भूमिकाओं के साथ एक बार फिर वेरा अपने ही सपनों को हमारी पलकों में सजाने को आतुर है...स्वागत है वेरा! शुक्रिया आलोक!

दुःख प्रेम और समय

बहुत से शब्द 
बहुत बाद में खोलते हैं अपना अर्थ

बहुत बाद में समझ में आते हैं 
दुःख के रहस्य

खत्म हो जाने के बाद कोई संबंध
नए सिरे से बनने लगता है भीतर

.....और प्यार नष्ट  हो चुकने
टूट चुकने के बाद
पुर्नरचित करता है खुद को...


Friday, May 6, 2011

प्रेम की एक कथा


यह प्रेम की कथा है
किसी दर्शन की नहीं
किसी सत्य की नहीं
किसी साधना की नहीं
न किसी मोक्ष की

वह घटी थी धरती पर
जैसे घटता है प्रेम
जिसमें समाहित हैं
दर्शन, सत्य, साधना, मोक्ष
सौंदर्य

कहां समाप्त हुई वह कथा अभी
अहर्निश वह जागती है
इस धरती पर
वह इस धरती की 
प्रेमकथा...
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मृत्यु को जीतने नहीं

किसने कहा कि वह संतप्त था
मृत्यु को देखकर?

वह मृत्यु को जीतने निकला था
किसने कहा?

साक्षी हैं उसके वचन कि 
उसने सिर्फ जीवन को खोजा
बस यह चाहा कि 
काया की मृत्यु से पहले 
न मरे मनुष्य....


- आलोक श्रीवास्तव

(कविता संग्रह दुख का देश और बुद्ध से)

Wednesday, May 4, 2011

दु:ख को समझना ही दु:ख को जीतना है...


- प्रतिभा कटियार 
धरती के इस छोर से उस छोर तक दुख की कारा है. संसार का कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जो दुख की इस कारा में कैद न हो. जैसे काली अंधियारी रात में अचानक टिमटिमाता है कोई तारा, वैसे ही दुख के इस गहनतम अंधकार के बीच उदित होता है एक नाम बुद्ध. इस धरती पर जहां भी कोई अपने दुख से लड़ रहा है, बुद्ध वहीं हैं. दु:ख को समझना ही दुख से लडऩा है. बुद्ध कहते हैं अपना दीपक खुद बनो. दुख की कारा से बाहर निकलो और काया के खत्म होने से पहले मत मरो. दु:ख के देश में बुद्ध का आना एक दुर्लभ संयोग है. यह आना कविताओं के माध्यम से हो तो संयोग और भी दुर्लभ हो जाता है. आलोक श्रीवास्तव का नया कविता संग्रह दु:ख के देश में बुद्ध यह संयोग रचता है. 

मनुष्य की संभावनाओं के प्रतीक बुद्ध की प्रासंगिकता लगातार बढ़ रही है. आलोक की कविताओं में आम आदमी के जीवन के कष्ट और उनसे लडऩे के लिए बुद्ध का दर्शन बेहद सहज ढंग से आता है. कोई राजपुत्र, कोई विरागी महात्मा नहीं, दु:ख के विरुद्ध संघर्ष की जनगाथा है बुद्ध. बुद्ध को समझना खुद को समझना है और मुक्त होना है दु:ख से. प्रस्थान करना है जीवन की ओर. आलोक की कविताएं हमारा ये काम बेहद आसान करती हैं. वे हमारा हाथ पकड़कर बुद्ध के हाथ में थमा देती हैं और हम मुक्त होता महसूस करते हैं. गहरी शांति का अनुभव करते हैं. महसूस होता है अपने भीतर प्रदीप्त होता उजास, जिसकी खोज में न जाने कितने साधू, सन्यासी घूमते फिरते हैं जंगल और पहाड़ों पर. कितना कम जानते हैं हम जीवन को. कितना कम समझते हैं हम खुद को. यह पथ बुद्ध की ओर नहीं, जीवन की ओर ले जाता है, तृष्णा के पार, जहां न कोई धर्म है, न चीवर, कोई शरण न कोई बुद्ध...बुद्ध खुद को स्थापित नहीं करते जीवन को स्थापित करते हैं. जीवन का होना बुद्ध का होना है, दु:ख से लडऩा बुद्ध का होना है...

इंसान जान भी नहीं पाता स्रोत दु:ख के, थकता-टूटता, हारता फिर भी पूजता, नवाता शीष, दुख के निर्माताओं के सम्मुख, कैसी है यह कारा दु:ख की...इस संग्रह से गुजरते हुए दुख की यह कारा टूटती न$जर आती है. जब हर रोज कोई न कोई कारण जीवन के सम्मुख चुनौती बनकर खड़ा हो ऐसे में यह संग्रह उम्मीद की लौ बनकर उभरता है. साक्षी हैं उसके वचन कि उसने सिर्फ जीवन को खोजा, बस यह चाहा कि काया की मृत्यु से पहले, न मरे मनुष्य...यह कोई मामूली विचार नहीं है. आलोक वरिष्ठ कवि हैं. उनके पहले भी चार कविता संग्रह आ चुके हैं. अपनी पिछली कविताओं में जहां वो प्रेम का एक खूबसूरत रूमान गढ़ते हैं, वहीं इस संग्रह में उनका यही रूमान बौद्ध दर्शन में ढलता है. मनुष्य को बचाये रखने की कल्पना, मनुष्यता को सहेजकर रखने की कामना और उसे दु:ख से दूर करने की सदेच्छा इस संग्रह की हर कविता में झलकती है. यूं ही नहीं लिख देता है कोई कि दु:ख को समझना ही दु:ख को जीतना है...सुजाता हो या यशोधरा बुद्ध एक आम आदमी की तरह दोनों के प्रति आभारी हैं. यशोधरा के दु:ख से अनजान नहीं हैं वे. 'जिस तरह उसने मणि मााणिक, मुकुट, गवाक्ष और रथ छोड़े, ज्ञानीजनों, उसी तरह नहीं छोड़ गया था वह, इस स्त्री यशोधरा को, सुनो नीरांजना का शोर, शायद उनके किनारे, उस दिन, कोई रोया था...वो यशोधरा के प्रति क्षमाप्रार्थी रहे जीवन भर. यशोधरा विश्वास करना, जब जर्जर हो गई मेरी देह, दीठ मंद, पांव शिथिल, तब भी तुम्हें नहीं भूला..तप और ज्ञान नहीं, बहुत सारी रातों में रोने के बाद वह अच्छी तरह जानता था, आंसुओं के बारे में...' 

बुद्ध के जाने के बाद भी उनका होना मिटा नहीं पृथ्वी से. कविता विश्वास जगाती है कि वह तुम्हें मुक्ति देने नहीं, दीप बनाने लौटेगा, तुम सुनना उसकी आवाज, खुले रखना द्वार. इस संग्रह से गुजरते हुए महसूस होती है दरवाजे पर दस्तक कि मानो बुद्ध लौट आये हैं. अचानक टूटने लगती है दुख की कारा, खिल उठते हैं तमाम फूल क्योंकि बुद्ध का होना, धरती का, रंगों का, ऋतुओं का, राग का होना है...यह संग्रह आज के दौर की जरूरत है. इसे जरूर पढ़ा जाना चाहिए कविता संग्रह के तौर पर भी और दु:ख की कारा को तोडऩे के हथियार के तौर पर भी. 

पुस्तक- दुख का देश और बुद्ध- कविता संग्रह
कवि- आलोक श्रीवास्तव
मूल्य- रुपये 75 
प्रकाशन- संवाद प्रकाशन, शास्त्रीनगर, मेरठ. 
(दैनिक जागरण में २ मई को प्रकाशित  )
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आइये इसी संग्रह से पढ़ते हैं एक कविता- 

बुद्ध का होना 
एक फूल का खिलना  है
हवा में महक का बिखरना
और दिशाओं में रंगों का छा जाना है

बुद्ध का होना 
अपने भीतर होना है
 दु:ख को समझते हुए जीना

पता नहीं पृथ्वी पर 
कितने कदम चले बुद्ध ने
कितने वचन कहे
कितनी देशना  दी 
पर बुद्ध का होना 
मनुष्य में बुद्ध की संभावना  का होना है
दु:ख की सहस्र पुकारों के बीच
दु:ख से मुक्ति की एक वचनश्रुति का होना है

बुद्ध का होना
धरती का, रंगों का, ऋतुओं का
राग का होना है...
(कवितायेँ जारी....)

Thursday, January 14, 2010

एक दुःख पुकारता है..

दबे पांव आता है दु:ख। बेहद खामोशी के साथ. हर पल, हर क्षण दु:ख से झरती है एक उम्मीद, उस दु:ख से पार निकल पाने की. ऐसे वक्त में जब दु:ख स्थाई हो चले हों. जब दुखों ने मुस्कुराहटों तक को न बख्शा हो और वहां भी बना लिया हो ठिकाना, तब बुद्ध याद आते हैं. बार-बार याद आते हैं. बुद्ध को याद करते हुए आलोक श्रीवास्तव की कविताएं पढऩा दु:ख के सुख को महसूस करने जैसा भी है. उनका नया संग्रह दु:ख का देश और बुद्ध बस आने को है. इसी संग्रह से आइये पढ़ते हैं कुछ कविताएं...
एक दु:ख पुकारता है
ये करुणा
आवा$ज देती है
एक दु:ख पुकारता है...
लहरों में सिर्फ दीप नहीं
जल में घुले आंसू भी हैं
इतिहास की बहती सरिता के तट पर
उन्हें किसी ने निहारा था
वह कह सकता था...
मैं लौटूंगा
जब भी धर्म की हानि होगी
मैं मुक्त करूंगा तुम्हें
पर उसने कहा
दु:ख से निष्कृति
दुख से भागने से नहीं है
उसने कहा...
अपना दीपक आप बनो
तप और ज्ञान नहीं
बहुत सारी रातों में रोने के बाद
वह अच्छी तरह जानता था
आंसुओं के बारे में।
उसकी डबडबाई आंखें
अब भी दिखती हैं
इतिहासों के पार...
कहां से आता है यह दु:ख
हजार-हजार पंखों पर सवार
चेतना को ग्रसता
छा जाता जीवन पर
इंसान जान भी नहीं पाता
स्रोत दु:ख के
थकता-टूटता हारता
फिर भी पूजता, नवाता
शीष दु:ख के ही निर्माताओं के सम्मुख
कैसी है यह दु:ख की कारा
लोहे से मजबूत
पर शक्तिहीन सूखी टहनी सी....

Sunday, January 3, 2010

प्रेम का मौसम

वेरा उन सपनों की कथा कहो (1996) से कविताओं का सफर शुरू करने वाले आलोक श्रीवास्तव के दो कविता संग्रह आने को हैं. पहला दिखना तुम सांझ तारे को और दूसरा दु:ख का देश और बुद्ध. इस बीच उनके दो कविता संग्रह और आये. जब भी वसंत के फूल खिलेंगे (2004) और यह धरती हमारा ही स्वप्न है (2006).वेरा की कविताओं ने एक पूरी पीढ़ी पर जादुई असर किया था. उन लोगों पर भी इन कविताओं का पूरा असर हुआ, जिन्हें कविताओं में खास रुचि नहीं थी. ये प्रेम में पगी हुई कविताएं थीं. प्रेम की परिभाषा का विस्तार देते हुए इन कविताओं में न मिलन की आस थी, न विछोह की पीड़ा या शिकायत, न मनुहार कोई. इनकी अलग दुनिया थी. जो प्रेम के साथ पूरा एक नया संसार रच रही थीं. इतिहास की यात्राएं करते हुए ये कविताएं भविष्य पर न$जर टिकाये थीं. ये प्रेम कविताएं समाज और मन दोनों पर बराबर पकड़ बनाये चलती हैं. यहां जो प्रेम के अर्थ खुले तो पूरा समाज भी खुला, वो कुहासे भी खुले, जिन्होंने मन के मासूम कोने को ढंाक रखा था. वेरा के बाद दिखना तुम सांझ तारे को पढऩा एक अलग ही अनुभव है. ये कविताएं नयी भूमि पर रची गयी महत्वपूर्ण कविताएं हैं. आलोक को बधाई देते हुए आइये पढ़ते हैं इसी संग्रह से दो कविताएं-

मैं नहीं कहता तुम्हें प्यार करताहूँ
मैं तो बस वह मौसम होना चाहता हूँ
तुम्हारे केशों को बिखरा दे तुम्हारे चेहरे पर
वह आवाजजो जंजीर बन जाए तुम्हारे पांवों में
और तुम एक दृश्य बन खड़ी रह जाओ
शाम का आसमान जिसे कौतुक से देखे
मैं तो वह रंग होना चाहता हूँ
जो तुम्हारी अंाख और पलक में
सपना बनकर घुलता जाए...
---------------------------------
तुम मुझे भूल भी जाओ
तो भी मैं सपना बन झांकूंगा
तुम्हारी आंख से
जहाँ भी तुम जाओगी
जो भी तुम करोगी
मई उसमें शामिल होऊंगादूर-दूर तक
मैं कहीं नहीं होऊंगा
पर तुम्हारी आंख
मुझे निहारेगीसूने किसी वन में
एकांत किसी राह पर
वीरान किसी मौसम में
तुम पत्तों में सुनोगी मेरी आवा$ज
हो सकता हैकिन्हीं पंखुरियों में
मुझे छुओ भी तुम
मैं तुम्हारा प्रेमी नहीं था
मैं तो बस एक मौसम था
तुम्हारी राह से गुजरा...

Saturday, July 4, 2009

एक दिल बच गया है साबुत

हमने भी विदा कर दिया प्रेम
रुखसत कर दीं ख़ुद को टटोलने की
कोशिश करती बातें
ख़ुद पर से उतार दिया चांदनी का जादू
यह सफर यहां खत्म होता है

अब एक नाव तट से बंधी खड़ी है
एक आदमी कहीं पगडंडियों में खो गया है

पर, एक दिल बच गया है साबुत

कितना कुछ नष्ट होने के बाद भी
एक तपिश कहीं बची रही गयी है
शायद, कम ही जानते थे हम भी
गमे इश्क को।

दुख, प्रेम और समय

बहुत से शब्द
बहुत बाद में खोलते हैं अपना अर्थ

बहुत बाद में समझ में आते हैं
दुख के रहस्य

खत्म हो जाने के बाद कोई संबंध
नए सिरे से बनने लगता है भीतर
...और प्यार नष्ट हो चुकने
टूट चुकने के बाद

पुनर्रचित करता है खुद को
निरंतर पता चलती है अपनी सीमा
अपने दुख कम प्रतीत होते हैं तब
और अपना प्रेम कहीं बड़ा...
- आलोक श्रीवास्तव

Sunday, February 1, 2009

is vasant men


इस वसंत के किनारे रुको
इसके फूलों में
इसके पानी में
इसकी हवा में
डूब जाओ थोडी देर को
सुनो इसके पदों की आवाज़
छुओ इसकी पत्तियां
सौंप दो अपने को
एक नाद सुने देगा
दिखाई देंगे देवदूतों के चेहरे
तुम्हारे भीतर प्रेम
बस धीमे से एक बार
नाम लेगा किसी का
तुम अमर होगी इस ऋतू में
फूल, पानी, हवा, वृक्ष और पत्तियां
तुम्हें धन्यवाद देंगी
नदियों में तुम्हारे लिए
आशीष होगा!
अलोक श्रीवास्तव की कविता

Tuesday, November 25, 2008

तुम्हारी भी एक दुनिया है


मित्र आलोक श्रीवास्तव की एक और कविता...

तुम्हारे पास आकाश था

मेरे पास एक टेकरी

तुम्हारे पास उड़ान थी

मेरे पास

सुनसान में हिलती पत्तियां

तुम जन्मी थीं हँसी के लिए

इस कठोर धरती पर

तुमने रोपीं

कोमल फूलों की बेलें

मैं देखता था

और सोचता था

बहुत पुराने दरख्तों की

एक दुनिया थी charon or

थके परिंदों वाली

शाम थी मेरे पास

कुछ धुनें थीं

मैं चाहता था की तुम उन्हें सुनो

मैं चाहता था की एक पूरी शाम तुम

थके परिंदों का

पेड़ पर लौटना देखो

मैं तुम्हें दिखाना चाहता था

अपने शहर की नदी में

धुंधलती रात दुखों से भरी एक दुनिया

मैं भूल गया था

तुम्हारी भी एक दुनिया है

जिसमे कई और नदियाँ हैं

कई और दरखत

कुछ दूसरे ही रंग

कुछ दूसरे ही स्वर

शायद कुछ दूसरे ही

दुःख भी।


Friday, November 7, 2008

एक दिन आएगा

आलोक श्रीवास्तव की यह कविता बहुत खूबसूरत है।
वैसे उनकी और भी कवितायें बहुत सुंदर हैं लेकिन
आज यही.....

एक दिन आयेगा
जब तुम जिस भी रस्ते से गुजरोगी
वहीं सबसे पहले खिलेंगे फूल
तुम जिन भी झरनों को छूऊगी
सबसे मीठा होगा उनका पानी
jin भी दरवाजों पर
तुम्हारे हाथों की थपथपाहट होगी
खुशियाँ वहीं आएँगी सबसे पहले
जिस भी शख्श से तुम करोगी बातें
वह नफरत नहीं कर पायेगा
फ़िर कभी किसी से।
जिस भी किसी का कन्धा तुम छुओगी
हर किसी का दुःख उठा लेने की
कूवत आ जायेगी उस कंधे में
जिन भी आंखों में तुम झांकोगी
उन आँखों का देखा हर कुछ
वसंत का मौसम होगा
जिस भी व्यक्ति को तुम प्यार करोगी
चाहोगी जिस किसी को दिल की गहराइयों से
सरे देवदूत शर्मसार होंगे उसके आगे....