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Friday, February 17, 2012

बोलो ना शिम्बोर्स्का...तुम हो ना?



- प्रतिभा कटियार

कविता मुझ तक पहले आई या मै कविता तक पहले जा पहुंची याद नहीं लेकिन विस्साव शिम्बोर्स्का के आँचल तले बैठते ही सुकून आ गया था ये अच्छी तरह याद है. उनके जाने की खबर भी मानो उसी तरह चुपके से आई जैसे उनकी कवितायेँ आती थीं और चुपचाप सटकर बैठ जातीं थीं. कविताओं की मुझे कितनी समझ है ये तो नहीं पता लेकिन शिम्बोस्रका को पढ़ते हुए हमेशा अपने भीतर कुछ पिघलता हुआ महसूस हुआ. उनकी कविताओं की आंच जैसे भावों को मजबूत बनाती हो और नर्म छुअन संवेदना के तरल तंतुओं को गूंध देते हों. नोबेल प्राइज विनर शिम्बोस्रका की मृत्यु की खबर भी मानो किसी कविता की तरह रची गयी हो. 

कोई कैसे जा सकता है इतनी ख़ामोशी से....ऐसे भी कोई जाता है क्या. ऐसे तो आया जाता है ना...चुपचाप और बना लिया जाता है किसी को बेहद अपना. घेर ली जाती है थोड़ी सी जगह और उसे प्रेम से, कविताओं से, अपने ओज से भर दिया जाता है चुपचाप. फिर ये थोड़ी सी जगह बढाती जाती है अपना दायरा और भौगोलिक सीमाओं को तहस नहस करते हुए लोगों के दिलों तक सेंध लेती है चुपचाप...ऐसे ही तो आया जाता है ना शिम्बोर्स्का? ऐसे ही तो तुम आई थीं टीन एज में किसी जन्मदिन पर सौगात में मिलीं थीं तुम्हारी कवितायेँ और तुम...बीतती सदी में...कैसे चुपचाप तुम दाखिल हुईं मेरे जीवन में. मेरे जन्मदिन के दिन...तुम्हें आना ही आता था प्रिये तुम्हें जाना क्यों नहीं आया. क्यों नहीं जान पायीं तुम कि जिस तरह तुमने आना सीखा था उसमें जाने का कोई नियम नहीं था. हर कविता के साथ तुम अपने ना जाने की नियति पर मुहर लगा रही थीं. देखो तो कैसी खबर आई है कि लोग कह रहे हैं तुम नहीं रहीं...तुम तो हो ना अभी. हमेशा रहोगी ना? 

कह दो ना इन दुनिया वालों से की मै कहीं नहीं गयी. ये मेरी नयी कविता का नया ढब है. एक दिन अचानक तुम सब पलट रहे होगे पन्ने...रेंग रही होंगी दुनिया की तमाम भाषाएँ मुझे अनुवाद करने में, कहीं किसी की चाय की प्यालियों के बीच जिक्र हो रहा होगा मेरा या कोई प्रेमिका अपने प्रेमी को सुना रही होगी मेरी कविता 'पहली नज़र का प्यार....' इसी बीच तुम चुपचाप ले लोगी एक आखिरी सांस. अचानक तुम्हारी कवितायेँ उड़ने लगेंगी हवाओं में और स्पंदित होने लगेंगे वो तमाम लोग जो इनसे गुज़र चुके हैं...जिन्हें तुमने बताया कि 'बायोडाटा जितने छोटे हों उतने ही अच्छे होते हैं' और ये भी कि 'सौगात में कुछ भी नहीं मिलता,' ' ना ही दोहराया जाता है कुछ भी...' ओह...तुम सचमुच कमाल की स्त्री थीं शिम्बोर्स्का की तुमने पहले ही चुन लीं थीं मरतु की आहटें जैसे हर लेखक चुन लेता है...अपने मरने से कई साल पहले. ना जाने किसने दर्ज कर दिया की तुम पोलैंड की रहने वाली थीं...चलो मान लिया तो वो कौन थी जो हमारे दिल में रहती थी. मै तो पोलैंड नहीं गयी कभी. 

अपने घर की देहरियों पर धूप की आवाजाही से खेलते हुए अपनी छोटी सी स्कर्ट में तुम्हारी कवितायेँ बटोरने का खेल मुझे बहुत पसंद था. सच कहती हूँ मेरी प्रिय कवित्री मेरा बायोडाटा कभी भी लम्बा चौड़ा नहीं हो सका कि वक्त रहते सीख ली थी मैंने तुमसे ये बात की जितने छोटे होते हैं बायोडाटा उतना ही अच्छा होता है खुद को बता पाना. मानो हम जितना चुप हम रहेंगे, उतना ही सुना जायेगा हमें. मुझे नहीं जानना तुम्हारा इतिहास पर नोबेल प्राईज़ लेते वक़्त तुमने जो भी कहा वो ध्यान लगाकर सुना था मैंने...जाने क्यों मुझे लगता था कि तुम मेरे सामने बैठकर बतिया रही हो मुझसे. नोबेल प्राईज़ समिति के लोगों ने तुम्हें कविता का मोजार्ट कहा था, तुम्हें याद है ना...कितना हँसे थे हम और तुम उस रोज. मेरे कमरे में टहलते हुए तुमने अपनी हंसी से सचमुच मोजार्ट की कोई धुन रची थी..

नहीं तुम्हारे इतिहास में कोई रूचि नहीं मुझे, बस तुममें है कि मैंने बस तुमसे ही तो प्यार किया था...कह दो ना कि ये तुम्हारी कविता की कोई नयी शैली है...लेकिन जाने क्यों आज तुम्हारी ही एक कविता का शीर्षक बार बार खुल रहा है...' दोहराया कुछ भी नहीं जाता...' ओह शिम्बोर्स्का! मैं नहीं मानती ऐसी किसी खबर को सच फिर भी क्यों मेरी आँखें नम हैं...बोलो ना शिम्बोर्स्का क्यों मेरी आँखें नम हैं...
('आज समाज' में 9 फ़रवरी को प्रकाशित)

Sunday, May 3, 2009

सौगात में कुछ नहीं मिलता- शिम्बोर्स्का

सौगात में कुछ नहीं मिलता
जो भी है कर्ज है.
सिर से पैर तक कर्ज में डूबे हैं हम।
अपने अस्तित्व का कर्ज चुकाना है
सव्त्व देकर
िजंदगी के लिए जान देनी होगी।

यहां यही व्यवस्था है
दिल लौटाना और जिगर भी
हाथ पैर की उंगलियां तक
वापस चली जाएंगी।

अब तुम चाहो तो भी
यह करारनामा
फाड़कर फेंक नहीं सकते
चुकाने ही होंगे यह कर्ज
चाहे अपनी खाल बेचकर चुकाओ।

कर्जदारों की भीड़ में मैं
इस ग्रह परभटकने के लिए छोड़ दी गई हूँ
कोई अपने परों के कर्ज से लदा है
तो कोई परवाज की
कुछ ऐसे भी हैं, जिन्हें चाहे-अनचाहे
एक -एक फूल, एक-एक पत्ते का कर्ज चुकाना है।

हमारा रेशा-रेशा उधार है
एक कण भी नहीं बचाया जा सकता।

यह फेहरिस्त
कभी न खत्म होने वाली फेहरिस्त बताती है
की हमें खाली हाथ ही नहीं
बिना हाथों के लौटना है।

अब कुछ याद नहीं
की मैंने कब, कहां, क्यों और किसे
अपने नाम पर यह उधार-खाता खोलने दिया।

हम इसके खिलाफ आवाज उठाते हैं
शायद यह आवाज ही आत्मा है
हमारी एकमात्र चीज
जो इस फेहरिस्त में शामिल नहीं।

Saturday, May 2, 2009

विस्साव शिम्बोर्स्का की कविता विज्ञापन

नींद की गोली हूँ
घर में असरदार,
दफ्तर में उपयोगी।
मैं इम्तहान दे सकता हूँ
और गवाही भी।
मैं टूटे प्याले जोड़ सकता हूं।
आपको सिर्फ मुझे ले लेना है,
पिघलने देना है अपनी जीभ के नीचे
और फिर निगल जाना है
एक गिलास पानी के साथ।
मैं बिगड़ी किस्मतें बनाना जानता हूं,
बुरी खबरें पचाना जानता हूं,
अन्याय के एहसास को कम कर सकता हूं,
ईश्वर की कमी को भर सकता हूँ
और विधवाओं के लिए चुन सकता हूं
और आकर्षक नकाब
आप किस सोच में पड़े हैं-
भला मेरी रासायनिक करुणा से
भरोसेमंद क्या होगा!
आप अभी नौजवान हैं।
वक्त है कि सीख लें
अपने आपको ढीला छोड़ देना
कोई जरूरी नहीं कि मुट्ठियां
हमेशा भिंची और चेहरा तना रहे।
अपने खालीपन को मुझे दे दो।
मैं उसे नींद से भर दूंगा।
एक दिन आप शुक्रगुजार होंगे की
मैंने आपको चार पैरों पर चलना सिखाया।
बेच दो मुझे अपनी आत्मायों भी
उसका खरीदार कहां है
कि अब उसे भरमाने के लिए
कोई और शैतान नहीं रहा।

Friday, December 12, 2008

शुक्रिया


शुक्रिया मैं कितनी अहसानमंद हूँ

उनकीजिन्हें मुहब्बत नहीं करती।

यह मान लेने में भी कितना सुकून है

की उनकी किसी और

को मुझसे ज्यादा जरूरत है

और कितना चैन है यह

सोचकर की मैंने भेड़िया

बनकर किसी की bhedon

पर कब्जा नहीं किया

कितनी शान्ति, कितनी आजादी

जिसे न मुहब्बत छीन सकती है

न दे सकती है

अब मुझे किसी का इंतज़ार नहीं

खिड़कियों और दरवाजे के दरमिया

कोई चहलकदमी नहीं

सूरज-घड़ी को भी मात दे रहा है मेरा सब्र।

main समझ गई हूँ जो प्यार नहीं समझ सकता,

मैं माफ़ कर सकती हूँ

जो प्यार नहीं कर सकता।

मुलाकात और ख़त के बीच

अब होते हैं चंद दिन-ज्यादा-से-ज्यादा

चंद हफ्ते कोई युगांतर नहीं होता

जिन्हें मुहब्बत नहीं करती

उनके साथ यातरायें

कितनी सीधी-सरल होती है

उनके साथ किसी संगीत समारोह में

चले जाओ या गिरजाघर में

और जब हमारे बीच होते है

सात पहाड़ और सात नदिया

तो उन पहाडों और नदियों के फासले

किसी भी नक्शे में देखे जा सकते है

आज मैं एक संगीतहीन समतल समय में

एक यथार्थ छितिज से घिरी हुई

सलीम और साबुत हूँ तो

यह उन्हीं की बदुलत है

शायद वे ख़ुद नहीं जानतेकी

उनके खाली हाथों में कितना कुछ है

लेकिन मैंने तो उनसे कुछ भी नहीं पाया

प्यार के पास इसके सिवा भला क्या जवाब होगा

इस सवाल का.....

Sunday, November 16, 2008

पहली नजर का प्यार


वे दोनों मानते हैं

की अचानक एक ज्वार उठा

और उन्हें हमेशा के लिए एक कर गया

कितना खूबसूरत है शंशय हीन विश्वास

पर शंशय इससे भी खूबसूरत है

अब चूँकि वे पहले कभी नहीं मिले

इसलिए उन्हें विश्वास है

की उनके बीच कभी कुछ नहीं था इससे पहले

तो फ़िर वह शब्द क्या था

जो गलियों, गलियारों या सीढियों पर

फुसफुसाया गया था?

क्या पता वे कितनी बार एक दूसरे के

एक-दूसरे के kareeb से गुजरे हों

mai उनसे पूछना चाहती हूँ

क्या उन्हें याद नहीं

रिवाल्विंग दरवाजे में घुसते हुए सामने पड़ा एक चेहरा

या भीड़ में कोई sorry कहते हुए आगे बढ़ गया था

या शायद किसी ने रौंग नम्बर कहकर फोन रख दिया था

लेकिन mai जानती हूँ उनका जवाब

नहीं उन्हें कुछ भी याद नहीं

उन्हें ये जानकर ताज्जुब होगा

की अरसे से संयोग उनसे आन्ख्मिचोनीखेल रहा था

पर अभी वक़्त नहीं आया था

की वह उनकी नियति बन जाए

वह उन्हें बार- बार करीब लाया

और दूर ले गया

अपनी हँसी दबाये उसने उनका रास्ता रोका

और फ़िर उछालकर दूर हट गया

नियति ने उन्हें बार-बार संकेत दिए

चाहे वे उन्हें न समझ पाए हों

तीन साल पहले की बात है

या फ़िर pichale मंगल की

जब एक सूखा हुआ पत्ता

किसी एक के कंधे को छूते

दूसरे के दामन में जा गिरा था

किसी के हांथों से कुछ गिरा

किसी ने कुच उठाया

कौन जाने वह एक गेंद ही हो

बचपन की झाडियों में खोई हुई

कई दरवाजे होंगे

जहाँ एक की दस्तक पर

दूसरे की दस्तक पड़ी होंगी

हवाई-अड्डे होंगे

जहाँ पास-पास खड़े होकर

सामान की जाँच करवाई होगी

और किसी रात देखा होगा एक ही सपना

सुबह की रौशनी में धुंधला पड़ता हुआ

और फ़िर हर शुरुआत

किसी न किसी सिलसिले की

एक कड़ी ही तो होती है

क्योंकि घटनाओं की किताब

जब देखो अधखुली ही मिलती है.....


शिम्बोर्स्का की यह कविता हर प्यार करने वाले

को बेहद अजीज लगती है...यही शिम्बोर्स्का का

जादू है जो एक बार सर चढ़ जाए तो फ़िर कभी नहीं

उतरता....

Tuesday, November 4, 2008

ओ वाणी

ओ वाणी, मुझसे खफा न होना
की मैंने तुझसे उधार लिए
चट्टानों से भरी शब्द
फ़िर ताजिंदगी उन्हें तराशती रही
इस कोशिश में
की वे परों से हलके लगें...
शिम्बोर्स्का