कविता मुझ तक पहले आई या मै कविता तक पहले जा पहुंची याद नहीं लेकिन विस्साव शिम्बोर्स्का के आँचल तले बैठते ही सुकून आ गया था ये अच्छी तरह याद है. उनके जाने की खबर भी मानो उसी तरह चुपके से आई जैसे उनकी कवितायेँ आती थीं और चुपचाप सटकर बैठ जातीं थीं. कविताओं की मुझे कितनी समझ है ये तो नहीं पता लेकिन शिम्बोस्रका को पढ़ते हुए हमेशा अपने भीतर कुछ पिघलता हुआ महसूस हुआ. उनकी कविताओं की आंच जैसे भावों को मजबूत बनाती हो और नर्म छुअन संवेदना के तरल तंतुओं को गूंध देते हों. नोबेल प्राइज विनर शिम्बोस्रका की मृत्यु की खबर भी मानो किसी कविता की तरह रची गयी हो.
कोई कैसे जा सकता है इतनी ख़ामोशी से....ऐसे भी कोई जाता है क्या. ऐसे तो आया जाता है ना...चुपचाप और बना लिया जाता है किसी को बेहद अपना. घेर ली जाती है थोड़ी सी जगह और उसे प्रेम से, कविताओं से, अपने ओज से भर दिया जाता है चुपचाप. फिर ये थोड़ी सी जगह बढाती जाती है अपना दायरा और भौगोलिक सीमाओं को तहस नहस करते हुए लोगों के दिलों तक सेंध लेती है चुपचाप...ऐसे ही तो आया जाता है ना शिम्बोर्स्का? ऐसे ही तो तुम आई थीं टीन एज में किसी जन्मदिन पर सौगात में मिलीं थीं तुम्हारी कवितायेँ और तुम...बीतती सदी में...कैसे चुपचाप तुम दाखिल हुईं मेरे जीवन में. मेरे जन्मदिन के दिन...तुम्हें आना ही आता था प्रिये तुम्हें जाना क्यों नहीं आया. क्यों नहीं जान पायीं तुम कि जिस तरह तुमने आना सीखा था उसमें जाने का कोई नियम नहीं था. हर कविता के साथ तुम अपने ना जाने की नियति पर मुहर लगा रही थीं. देखो तो कैसी खबर आई है कि लोग कह रहे हैं तुम नहीं रहीं...तुम तो हो ना अभी. हमेशा रहोगी ना?
कह दो ना इन दुनिया वालों से की मै कहीं नहीं गयी. ये मेरी नयी कविता का नया ढब है. एक दिन अचानक तुम सब पलट रहे होगे पन्ने...रेंग रही होंगी दुनिया की तमाम भाषाएँ मुझे अनुवाद करने में, कहीं किसी की चाय की प्यालियों के बीच जिक्र हो रहा होगा मेरा या कोई प्रेमिका अपने प्रेमी को सुना रही होगी मेरी कविता 'पहली नज़र का प्यार....' इसी बीच तुम चुपचाप ले लोगी एक आखिरी सांस. अचानक तुम्हारी कवितायेँ उड़ने लगेंगी हवाओं में और स्पंदित होने लगेंगे वो तमाम लोग जो इनसे गुज़र चुके हैं...जिन्हें तुमने बताया कि 'बायोडाटा जितने छोटे हों उतने ही अच्छे होते हैं' और ये भी कि 'सौगात में कुछ भी नहीं मिलता,' ' ना ही दोहराया जाता है कुछ भी...' ओह...तुम सचमुच कमाल की स्त्री थीं शिम्बोर्स्का की तुमने पहले ही चुन लीं थीं मरतु की आहटें जैसे हर लेखक चुन लेता है...अपने मरने से कई साल पहले. ना जाने किसने दर्ज कर दिया की तुम पोलैंड की रहने वाली थीं...चलो मान लिया तो वो कौन थी जो हमारे दिल में रहती थी. मै तो पोलैंड नहीं गयी कभी.
अपने घर की देहरियों पर धूप की आवाजाही से खेलते हुए अपनी छोटी सी स्कर्ट में तुम्हारी कवितायेँ बटोरने का खेल मुझे बहुत पसंद था. सच कहती हूँ मेरी प्रिय कवित्री मेरा बायोडाटा कभी भी लम्बा चौड़ा नहीं हो सका कि वक्त रहते सीख ली थी मैंने तुमसे ये बात की जितने छोटे होते हैं बायोडाटा उतना ही अच्छा होता है खुद को बता पाना. मानो हम जितना चुप हम रहेंगे, उतना ही सुना जायेगा हमें. मुझे नहीं जानना तुम्हारा इतिहास पर नोबेल प्राईज़ लेते वक़्त तुमने जो भी कहा वो ध्यान लगाकर सुना था मैंने...जाने क्यों मुझे लगता था कि तुम मेरे सामने बैठकर बतिया रही हो मुझसे. नोबेल प्राईज़ समिति के लोगों ने तुम्हें कविता का मोजार्ट कहा था, तुम्हें याद है ना...कितना हँसे थे हम और तुम उस रोज. मेरे कमरे में टहलते हुए तुमने अपनी हंसी से सचमुच मोजार्ट की कोई धुन रची थी..
नहीं तुम्हारे इतिहास में कोई रूचि नहीं मुझे, बस तुममें है कि मैंने बस तुमसे ही तो प्यार किया था...कह दो ना कि ये तुम्हारी कविता की कोई नयी शैली है...लेकिन जाने क्यों आज तुम्हारी ही एक कविता का शीर्षक बार बार खुल रहा है...' दोहराया कुछ भी नहीं जाता...' ओह शिम्बोर्स्का! मैं नहीं मानती ऐसी किसी खबर को सच फिर भी क्यों मेरी आँखें नम हैं...बोलो ना शिम्बोर्स्का क्यों मेरी आँखें नम हैं...
('आज समाज' में 9 फ़रवरी को प्रकाशित)

