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Saturday, October 31, 2009

मरने की तुम पे चाह हो

सुनना मेरी भी दास्तां, अब तो जिगर के पास हो,
तेरे लिए मैं क्या करूं, तुम भी तो इतने उदास हो.

कहते हैं रहिए खमोश ही, चैन से जीना सीखिए
चाहे शहर हो जल रहा, चाहे बगल में लाश हो।

खूं का पसीना हम करें, वो फिर जमायें महफिलें,
उनके लिए तो जाम हो, हमको तड़पती प्यास हो।

जंग के सामां बढ़ाइये, खूब कबूतर उड़ाइये,
पंखों से मौत बरसेगी, लहरेगी जलती घास हो।

हाथों से जितने जुदा रहें, उतने ख्याल ठीक हैं,
वरना बदलना चाहोगे, मंजर ये बदहवास हो।

धरती समंदर आसमां राहें, जिधर चले, खुली
गम भी मिटाने की राह है, सचमुच अगर तलाश हो।

है कम नहीं खराबियां, फिर भी सनम दुआ करो,
मरने की तुम पे चाह हो, जीने की सबकी आस हो।
- गोरख पांडे

Thursday, October 22, 2009

तेरी जीत में मेरी हार है

कैसे अपने दिल को मनाऊं मैं,
कैसे कह दूं कि तुझसे प्यार है,
तू सितम की अपनी मिसाल है,
तेरी जीत में मेरी हार है।

तू तो बांध रखने का आदी है,
मेरी सांस-सांस आजादी है,
मैं जमीं से उठता वो नग्मा हूं,
जो हवाओं में अब शुमार है।

मेरे कस्बे पर, मेरी उम्र पर,
मेरे शीशे पर, मेरे ख़्वाब पर
ये जो पर्त-पर्त है जम गया,
किन्हीं फाइलों का गुबार है।

इस गहरे होते अंधेरे में,
मुझे दूर से जो बुला रही,
वो हंसी सितारों की जादू से भरी,
झिलमिलाती कतार है।

ये रगों में दौड़ के थम गया,
अब उमडऩे वाला है आंख से,
ये लहू है जुल्म के मारों का
या फिर इंकलाब का ज्वार है।

वो जगह जहां पे दिमाग से
दिलों तक है खंजर उतर गया,
वो है बस्ती यारों खुदाओं की,
वहां इंसा हरदम शिकार है।

कहीं स्याहियां, कहीं रोशनी,
कहीं दोजख़ और कहीं जन्नतें
तेरे दोहरे आलम के लिए,
मेरे पास सिर्फ नकार है।
- गोरख पांडे