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Thursday, May 4, 2023

मारीना- किताब इन दिनों


-दिनेश कर्नाटक 

कुछ दिनों पहले रूसी कवयित्री मारीना की Pratibha Katiyar द्वारा लिखी जीवनी स्टोरी टेल पर सुनी। सोच रहा था, जल्दी ही इसके असर से मुक्त हो जाऊंगा, लेकिन मारीना लगातार साथ बनी हुई है ठीक ऐसे जैसे वे जीवनीकार के साथ बचपन में पढ़ी कविताओं के रूप में बनी रही।
 
मारीना के जीवन को कैसे देखें ? एक ओर तो उसे उसकी लेखन के प्रति प्रतिबद्धता के रूप में देख सकते हैं, जहाँ वह निर्वासन में चरम कष्टों व अभावों के दौर में भी लेखन से मुँह नहीं मोड़ती। ऐसी कविताएँ लिखती हैं, जिन्हें उस दौर के बड़े लेखक बोरिस पास्तरनाक रिल्के को पढ़ने को भेजते हैं। दूसरा उसका जिया जीवन जिसमें वह अपने तरह से जीने की जिद के साथ जीये चली जाती है और खुद एक न भूलने वाले ऐसे किरदार के रूप में हमारे सामने आती है, जो प्रेम की तलाश में अतिरेकों से पूर्ण संबंध बनाती चलती है।

इस जीवनी को एक पश्चिमी महिला लेखिका की लेखन प्रक्रिया व चुनौतियों को समझने के लिए भी पढ़ सकते हैं। मारीना की जीवनी को एक ऐसे इंसान के जीवन संघर्ष के रूप में भी पढ़ा जा सकता है, जो अपने जीवन को आसान व सुविधाजनक बनाने के लिए दायें या बायें का हिस्सा बनने के बजाय सही का पक्ष चुनना पसंद करता है और इसकी कीमत चुकाता है।

सबसे बढ़कर मारीना की जीवनी को पढ़ते हुए हम दो विश्व युद्धों के बीच शोषण से मुक्ति और बराबरी के दावे के साथ हुई क्रांति की शत्रु समझे जाने वाली रूसी कवयित्री व लेखिका के साथ हुए शत्रुतापूर्ण व्यवहार को देख सकते हैं, जिसने अंततः उसके जीवन को नारकीय बनाते हुए उसे आत्महत्या को मजबूर किया। मारीना के जीवन से गुजरना सिर्फ एक कवयित्री के जीवन के त्रासदीपूर्ण जीवन से गुजरना नहीं इतिहास की अंधेरी तथा यातना पूर्ण लम्बी गली से गुजरना भी है।

Sunday, October 10, 2021

मेरी आत्मा मुरझाती जा रही है- मारीना


- प्रतिभा कटियार

अपना देश छोड़ने के बाद मारीना घने अकेलेपन में घिरने लगी थी. उसके आसपास जिस तरह के हालत और लोग थे, उसे लगता था कि उसके लिखे को समझ पाने वाला कोई नहीं. वह अपनी नोटबुक और शब्दों के साथ लगातार गहरे एकांत में उतरती जा रही थी. कलम और नोटबुक उसके इकलौते संवाद के साथी रह गए थे. इन दिनों के बारे में उसकी बेटी आल्या यानी अरिदाना ने 1969 में अपने एक संस्मरण में लिखा, ‘मारीना ऐसे लोगों में से थी, जो लोगों से मिलने-जुलने, कहने-सुनने में, साझेदारी में यक़ीन करती थी. लेकिन यहाँ पेरिस में यह संभव होता नहीं दिख रहा था. मारीना को कोई अगर एक आवाज़ दे तो वह चलकर नहीं, भागकर वह पहुँचने वालों में से थी.’

शायद मारीना की उदासी की यही वजह रही होगी कि उसके आसपास लोग ही नहीं थे, उस माहौल में उस देश में मारीना के लेखन को संभवतः काफी लोग समझ नहीं पा रहे थे. इसी वजह से उसके लिखे की आलोचना भी खूब हो रही थी, लेकिन कुछ लोग थे जो उसे अपना दोस्त मानते थे, उसके लेखन को पसंद को पसंद करते थे और उसकी यथासंभव मदद भी करते थे.

इसी दौरान मारीना की दोस्ती येलेना अलेक्सेंद्रोवना से हुई. वह रूस के पूर्व विदेश मंत्री की बेटी थी. वह अनुवाद करके इन दिनों पैसे कमा रही थी. उसने मारीना को इसके पहले सिर्फ तस्वीरों में देखा था. उससे मिलने के बाद ही वे दोनों एक-दूसरे को पसंद करने लगीं.

वह मारीना के बारे में लिखती है-

‘मैं जिस मारीना से मिली वह मुझे कोई और ही लगी. मैंने, ’माइलस्टोन’ पढ़ते समय जिस मारीना की तस्वीर देखी थी, वह बेहद आकर्षक, गोल चेहरे वाली प्यारी सी मारीना थी, लेकिन जिससे मैं उस शाम मिली वह न तो खूबसूरत थी न ही आकर्षक. वह दुबली पतली, पीली पड़ी हुई निस्तेज सी स्त्री थी. उसे देखकर ऐसा लग रहा था मानो जीवन ने उसे बर्बाद किया है. उसका चेहरा मुरझाया हुआ था, उसके कटे हुए बाल बेजान से थे. उनमें सफेदी झलकने लगी थी. उसकी आँखों में कोई चमक नहीं थी. लेकिन फिर भी वह कुछ विशिष्टता को बरकरार रखे हुई थी. हमने उस शाम देखा कि वह एकदम मुरझाई हुई है. लेकिन बहुत जल्द उसने समय के मुताबिक खुद को बदला और शाम को होने वाली बातचीत में सक्रिय प्रतिभाग किया. वह लोगों से मिलने-जुलने की इच्छुक रहती थी. उनकी उपेक्षा नहीं करती थी. उसकी संवेदना हमेशा उसे लोगों से जोड़कर रखती थी. वह लोगों से जुड़कर रखने की हरसंभव कोशिश किया करती थी.

येलेना अपनी माँ के साथ मारीना के घर के पास ही रहती थी. मारीना उससे मिलने के लिए कभी-कभी उसके फ़्लैट में जाया करती थी. वो वहां उपस्थित लोगों की पसंद की मुताबिक कवितायेँ भी पढ़ा करती थी. येलेना मारीना के वहां आने और मारीना के घर जाने के बारे में लिखती हैं-

हम अक्सर मारीना के घर जाया करते थे. वहां, कविता, साहित्य, प्रकृति व कलाओं पर काफी बातचीत हुआ करती थी जिससे मारीना का उदास चेहरा खिल उठता था. मैं इस तरह की बुद्धिजीवी, तेज बुध्धि वाली सहज बातचीत करने वाली किसी शख्सियत से पहले कभी नहीं मिली थी. हम उसके घर जाते थे. वह हमें कभी चाय तो कभी वाइन पिलाया करती थी. हम कभी-कभी पास के सेंट जॉर्ज चर्च भी जाया करते थे. धर्म के बारे में मारीना के अलग विचार थे. लेकिन वह चर्च की गतिवधियों को बारीकी से देखा करती थी.

सबसे बड़ी दिक्कत मारीना के सामने यह थी कि उसे लिखने का वक़्त बिलकुल नहीं मिल रहा था. रात के खाने से पहले उसे घंटों घरेलू कार्यों को देने होते थे. पुत्र मूर की देखभाल करनी होती थी कभी-कभी दोस्त भी आ जाया करते थे. नतीजतन सब निपटाने के बाद उसका अपने विचारों से, लिखने की इच्छा से नाता टूट जाया करता था. उसने इसके बारे में तेस्कोवा को लिखा-

‘ऐसा लगता है कि सिर्फ मेरा दिमाग ही नहीं मेरी आत्मा भी लगातार मुरझाती जा रही है. कभी-कभी मैं इस तरह भी सोचती हूँ कि भावनाओं के लिए समय की जरूरत होती है, विचारों के लिए नहीं. विचार किसी बिजली की तरह कौंधते हैं जबकि भावनाएं उस रौशनी के नन्हे धागों से जुड़ी होती हैं जैसे दूर किसी तारे की रौशनी से...महसूस करने के लिए वक्त चाहिए...आप भय के, तनाव के साये में महसूस नहीं कर सकते. एक छोटा सा उदाहरण देती हूँ, मेरे सामने फर्श पर ढेर सारी मछलियाँ पड़ी हैं मैं इसके बारे में सोच तो सकती हूँ लेकिन महसूस नहीं कर सकती. मछलियों से आने वाली महक महसूस करने से रोकती है. यानि भावनाओं को विचारों से ज्यादा वक़्त चाहिए. या तो सब कुछ या कुछ नहीं. मैं इन दिनों अपनी भावनाओं को समय नहीं दे पा रही हूँ. अपने महसूस करने को. मैं हर वक़्त लोगों से घिरी रहती हूँ. सुबह के 7 बजे से रात 10 बजे तक मैं घरेलू कार्यों और लोगों से मिलने-जुलने में उलझी रहती हूँ. बेहद थक जाती हूँ. फिर महसूस करने को कुछ नहीं बचता. महसूस करने के लिए वक़्त भी चाहिए और ऊर्जा भी.’

ये हालात, ये द्वंद्व उसकी कविता ‘माइलस्टोन’ में भी दिखते हैं. इन हालात के बारे में उसने लिखा-

‘मैंने जीवन से बहुत कम अपेक्षाएं रखी थीं फिर भी उसने मुझे भयंकर कष्ट दिए. यहाँ पेरिस में लोगों ने उपेक्षित किया, मुझसे नफरत की. वे लोग मेरे लिखे का कुछ भी अर्थ निकालकर उस पर अनाप-शनाप बकवास लिखा करते हैं. उनकी घृणा ने मुझे वहां के सामान्य जीवन से अलग कर दिया है. अख़बार अपने हिसाब से अपनी कहानियां लिख रहे हैं.’

इसके अलावा उसने आगे लिखा-

‘क्या आपने सुना है यूरेशियन द्वारा तंग की जाने वाली घटनाओं के बारे में. संक्षिप्त जानकारी है कि यूरेशियन्स को बोल्शेविकों द्वारा समन भेजे जा रहे हैं. जाहिर है, इस बात के कोई प्रमाण नहीं मिलेंगे वह जो लेखक हैं और प्रवासी हैं वे इसे समझ सकते हैं. मैं इन सबसे बाहर हूँ लेकिन मेरी राजनैतिक शिथिलता पर भी असर पड़ रहा है. यह बिलकुल उसी तरह है जैसे मुझे भी बोलेशेविक समन मिल रहे हैं. सेर्गेई भी इस सबसे काफी परेशान है. वह सुबह 5 बजे से रात 8 बजे तक एक स्टूडियो में काम करता है, जिसके बदले उसे दिन के 40 फ्रेंक मिलते हैं. जिनमें से 5 फ्रेंक आने-जाने के किराये में खर्च हो जाते हैं. 7 फ्रेंक लंच में. सिर्फ 28 फ्रेंक ही बच पाते हैं.’

इस समय मारीना के परिवार में कोई सहयोग राशि नहीं आ रही थी. येलेना उनकी हालत के बारे में बताती हैं-

‘हम अपनी आँखों के सामने मारीना को लगातार गरीबी की ओर जाते, जूझते देख रहे थे... आह...मारीना...वह अपनी क्षमताओं से ज्यादा काम कर रही थी फिर भी कभी-कभी उन्हें भूखा रहने की भी नौबत आ जाती थी. पेरिस में रह रहे रूसी लोगों ने उसके जीवन की आपदाओं को महसूस किया. क्योंकि कविताओं और नाटकों को लिखकर जीवन के निर्वाह के लिए पैसे कमा पाना कितना मुश्किल है यह किसी से छिपा भी नहीं था, लेकिन वह इसके अलावा और कुछ कर भी नहीं सकती थी. ‘अ सोसायटी टू हेल्प फॉर मारीना त्स्वेतायेवा’ का गठन हुआ. जिसके जरिये मारीना के घर के किराये और राशन का इंतजाम किया जाने लगा. रूस से निर्वासितों को देखते हुए समझा जा सकता था कि वाकई में गरीबी होती क्या चीज़ है. मेयुडिन में पड़ोसियों ने मारीना की मुश्किलों को बांटने की कोशिश की. हम उसे यथसंभव मदद करते, लेकिन उसने हम सबको जो दिया उसके मुकाबले वह मदद कुछ भी नहीं...सचमुच कुछ भी नहीं.’

सितम्बर, 1927 में मारीना के घर मेहमान आ गए. ये मेहमान और कोई नहीं उसकी बहन अनस्तासिया थी, जो इटली से आई थी. इस समय वह मास्को के उसी फाइन आर्ट्स के संग्रहालय में काम कर रही थी, जो उसके पिता ने स्थापित किया था. वो मैक्सिम गोर्की पर एक किताब लिखने की योजना में थी. इस बारे में उसने गोर्की को लिखा भी. गोर्की ने उसे और मारीना को महीने भर के लिए इटली आमंत्रित किया. उन्होंने लिखा कि दोनों बहनें चाहें तो उनके घर आकर उनसे मिलें और कुछ दिन साथ रहें. अनस्तासिया ने इटली जाने की बजाय अपनी बहन मारीना के पास पेरिस आने का चुनाव किया.

उसने अपने पेरिस निवास के बारे में लिखा-

‘आल्या और मूर से लम्बे समय बाद मिलकर बहुत ख़ुशी हुई. उनका फ़्लैट भी काफी अच्छा था, लेकिन ऐसा लगा कि मारीना थक चुकी है और शिथिल पड़ने लगी है. उस पर उम्र का असर भी दिखने लगा है. उसने महसूस किया कि मारीना अपने बेटे मूर की परवरिश, आल्या की परवरिश से अलग कर रही है. इस बार परवरिश में वह ज्यादा संवेदनशील दिखी. मारीना की ऊर्जा मास्को से आने वाली खबरों के चलते लगातार कम हो रही थी.

एक शाम जब मारीना अपने छोटे से दीवान पर लेटी थी, जहाँ वह अक्सर लिखने-पढ़ने का काम भी किया करती थी और कभी-कभी सो भी जाया करती थी उसने आँखों में आंसू भरकर सिगरेट पीते हुए कहा, ‘क्या कोई समझ सकता है कि मैं इन हालत में कैसे लिख पाती हूँ. जब मुझे लिखने की इच्छा होती तब मुझे बाजार जाना होता है, अपने पास बचे हुए पैसों का हिसाब रखना होता है और बाज़ार में देखना होता है कि कैसे सस्ता खाना मिल जाए जो मेरे पास बचे हुए पैसों में आ सके. मैं अपने पर्स में हमेशा घर और घर से जुड़ी चिंताएं और काम लेकर चलती हूँ. इन सबके बाद मुझे घर की सफाई करनी पड़ती है, खाना बनाना होता है, आल्या और मूर का ख़यालरखना होता है, शारीरिक भी और भावनात्मक भी. जब यह सारे काम निपट जाते हैं तो मैं निढाल होकर इसी जगह लुढ़क जाती हूँ. देर रात...शरीर थका हुआ होता है और दिमाग खाली...एक शब्द भी लिख नहीं पाती. मैं अपनी पढ़ने की मेज़, अपने कमरे और लेखन के लिए थोड़े एकांत को तरस रही हूँ, और यह हर रोज का किस्सा हो चला है...’

प्यारी मेज़

तेरह बरस हो गए, हमें एक-दूसरे के साथ
हमारे प्यार और एक-दूसरे के प्रति वफादारी के
तेरह बरस
मुझे तुम्हारे एक-एक कण के बारे में पता है
और तुम्हें मेरे.
क्या हुआ कि तुम कोई लेखक नहीं हो
एक के बाद एक जिज्ञासाओं को तुमने संभाला है
बताया है कि आने वाला कल कुछ नहीं होता
जो होता है आज होता है, अभी होता है.
मेज़, जिसने सहेजे पाठकों के पत्र और पैसे
डाकिए की लाई चीज़ें
काम ख़त्म करने की समय सीमाएं
और रोज़ लिखी जाने वाली एक-एक पंक्ति
मुझे मिलने वाली ज़िंदगी की चुनौतियाँ
न मिलने वाला सम्मान
हो सकता है कल जब मेरे अतीत को खंगाला जाए
तो कहा जाए बेचारी बेवकूफ़ ग़रीब औरत...
(डेविड मैकडफ के अंग्रेजी अनुवाद पर आधारित)
अनुवाद- प्रतिभा

उसने अपनी डायरी में लिखा -

‘मेरे पास वर्तमान में कोई ऐसी जगह नहीं थी, जहाँ मैं खुद को सुरक्षित महसूस कर सकूं...न ही भविष्य की मुठ्ठी में ऐसी कोई उम्मीद थी. इस इतनी बड़ी समूची दुनिया में मुझे मेरे लिए एक इंच जगह भी ऐसी नहीं नजर आती थी, जहाँ मैं अपनी आत्मा को निर्विघ्न, बिना किसी डर के उन्मुक्त छोड़ सकूं. मैं धरती के उस अंतिम टुकड़े पर हूँ जिस पर मैं इसलिए खड़ी हूँ, क्योंकि मेरे होने से वह ख़त्म नहीं हो सका है. मैं इस छोटे से टुकड़े पर अपनी पूरी ताकत से खड़ी हूँ.

मैं ख़ुद भी किसी दूसरे की दुनिया में दख़ल न देती. किसी तकनीकी दुनिया में जिसका मुझसे कोई जुड़ाव ही न हो. मैं अकेली आत्मा हूँ...जिसे सांस लेने तक के लिए हवा नहीं मिल पा रही. और पास्तरनाक भी कोई नहीं, आंद्रेई ब्येली भी कोई नहीं...हम हैं, लेकिन हम अंतिम हैं. सिर्फ यह पूरा युग ही मेरे ख़िलाफ़ नहीं, सिर्फ लोग ही मेरे ख़िलाफ़ नहीं हैं, मैं भी इनके ख़िलाफ़ हूँ.’

तेस्कोवा को एक पत्र में उसने लिखा-

‘मैं नींद में बकबक करती हूँ. मैं बीस वर्ष के नौजवानों को देखती हूँ और ख़ुद को देखती हूँ, लेकिन कोई मुझे नहीं देखता. मेरे बाल सफ़ेद होने लेगे हैं, मैं सचमुच बूढ़ी होने लगी हूँ. एक स्त्री अपने छोटे से बच्चे के साथ लगातार बूढ़ी होते हुए. पर हो सकता है कि वह वाकई में मुझे देख ही न पा रहे हों. यह बड़ा कड़वा अनुभव है कि आप लोगों के लिए उपस्थित होकर भी न जैसे ही हों. कोई आप पर ध्यान ही न दे रहा हो.’

वेरा बूनिना को एक पत्र में मारीना ने लिखा-

‘पिछले कुछ बरसों में मैंने बहुत कम कविताएँ लिखी हैं. अब मुझसे मेरी कविताएँ कोई नहीं मांगता, न ही उन्हें स्वीकार करता है. उन्होंने मुझे गद्य लिखने के लिए कहा है. जब फ्रीडम ऑफ रशिया’ हुआ करता था तो मैं निश्चिंत होकर किसी भी तरह की कविताएँ लिखा करती थी, क्योंकि मैं जानती थी कि वह मेरी कविताओं को जगह देंगे. उन्होंने मेरी लिखी हर चीज को जगह दी, इसके लिए मैं उनकी दिल से आभारी रहूंगी लेकिन ‘फ्रीडम ऑफ रशिया’ में जब से रोज़ोनोव आया और उसने लम्बी कविताओं पर एकदम से रोक लगा दी. उसने कहा कि उसे 12 पेजों के लिए 15 कवियों की जरूरत है.

मैं अपनी लंबी कविताओं को लेकर कहाँ जाऊं? मेरी कविता ’द स्वान’ भी लगभग बेकार गई, क्योंकि वह बहुत लम्बी थी. इन्हीं वजहों से और भी बहुत सी लम्बी कवितायेँ बेकार गयीं. इसी सबके चलते अब गद्य लेखन शुरू हो गया. ऐसा नहीं कि गद्य लिखना मुझसे पसंद नहीं है, मुझे पसंद है लेकिन सच तो यही है कि इस ओर मुझे धकेला गया है, और अब मैं गद्य लिखने के लिए अभिशप्त हूँ.

निःसंदेह कविताएँ मुझ तक खुद आती हैं. लेकिन यह भी सच है कि आप कविताओं को जबरन नहीं लिख सकते. हालाँकि इन दिनों मेरा थोड़ा सा भी खाली वक़्त गद्य लिखने में जाता है. कविताएँ छोटे-छोटे टुकड़ों में डायरी में उतरती रहती हैं. अब भी कभी 8 लाइन, कभी 4 लाइन, कभी 2 लाइन. कभी-कभी मैं उनका तेज़ प्रवाह भी अपने ऊपर महसूस करती हूँ लेकिन फिर मैं कुछ भी नहीं लिख पाती...बहुत सारे ब्लैंक्स दिमाग में आ जाते हैं...सब कुछ धुंधला-धुंधला सा होता है.’

(प्रजातंत्र अख़बार में आज 10 अक्टूबर 2021 को प्रकाशित)

Saturday, September 18, 2021

एक व्यक्ति की नहीं पूरे समाज की जीवनी है मारीना- वीरेंद्र यादव


‘मारीना’ को पढ़ते हुए पाठक सिर्फ मारीना की जीवन यात्रा में ही शामिल नहीं होते बल्कि वो लेखिका प्रतिभा की विकास यात्रा को भी देख पाते हैं. सचमुच यह किताब हिंदी के पाठकों के लिए प्रतिभा का बड़ा योगदान है. इस काम की खासियत यह है कि यह पूरी तरह से मौलिक काम है. यह किताब एक व्यक्ति का जीवन भर नहीं है, यह एक सामाजिक जीवनी है. पहले और दूसरे विश्व युद्ध का वह समय और उस वक्त का समाज सब इस किताब में खुलता नजर आता है. वह पूरा दौर, बहुत सी अनकही और अनससुलझी बातें जो हमारी सोच, हमारी चेतना का हिस्सा नहीं थीं वो इस जीवनी के माध्यम से सामने आई हैं.

मारीना जिस समय के उथल-पुथल के दौर की उपज थी वह रूसी क्रांति से पहले का समय था. जारशाही के समय उसके शासन के दौरान जो आन्दोलन चल रहे थे मारीना बचपन से ही उन आंदोलनों, उन हलचलों के बीच रही. यह एक बड़ी बात है कि कोई किताब जो जीवनी के रूप में आ तो गयी साथ ही ढेर सारी उलझन भी लायी. अगर आप विचार पध्धति से जुड़े हैं तो कोई किताब आपको झकझोर दे, आपको सोचने पर मजबूर करे तो यह मामूली बात नहीं है.


इस किताब में लेखिका की झिझक भी दिखती है. एक तरीका यह हो सकता था कि बहुत निर्णायक तरह से उस दौर को उकेरते हुए उस समूचे दौर को सवालों के घेरे में रखने का प्रयास किया जाता. लेकिन इस किताब में प्रतिभा स्वयं एक असमंजस से गुजरती हुई मालूम होती हैं. वो असमंजस प्रतिभा का असमंजस नहीं है वो असल में मारीना का असमंजस है. मारीना का पति अगर व्हाइट आर्मी के साथ जुड़ा हुआ है तो उससे निर्विकार कैसे रह सकती थी मारीना. मारीना खुद जार के समय था उसके शासन की पक्षधर नहीं है. इस बात को समझने के लिए पाठक खुद उस समय में खुद को ढाल पायें उस समय से खुद को जोड़कर देख पायें तो बात समझ में आती है कि परिवर्तन का, क्रांति का दौर ऐसा गुजर रहा है जो कि बहुत साफ़ नहीं है. उस दौर को उस दौर का बुध्धिजीवी फैसलाकुन तरह से समझ नहीं सकता है. जबकि एक बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है. ये लोग देश छोड़कर जा रहे हैं. चाहे चेकोस्लोवाकिया में हो, जर्मनी में हो, फ़्रांस में हो बड़ी संख्या में पलायन हो रहा है. तो एक ऐसा दौर मारीना की निर्मिति का दौर है. मारीना का वह निर्माण काल सिर्फ मारीना का ही नहीं है इसके बहाने उस पूरे दौर के असमंजस को, उहापोह को समझा जा सकता है. अच्छी बात यह है कि निर्णायक स्वर न देते हुए भी उस दौर की जो जटिलतायें हैं उन जटिलताओं को किताब में उजागर किया गया है. मुझे लगता है कि अब बेबाकी के साथ हमें सवालों से टकराना चाहिए. इस तरह की जो किताबें होती हैं वो हमसे ईमानदार आत्मावलोकन की मांग करती हैं. मुझे लगता है इस किताब के साथ उस आत्मावलोकन की शुरुआत हो सकती है. बहुत मुखर न हो, मौन ही हो लेकिन शुरुआत तो हो.
 
मारीना के प्रेम को लेकर भी बात होती है कि न जाने कितने लोग उसके जीवन में आये और उसने मुक्त प्रेम की युक्ति अपनाई. यह युक्ति एक व्यक्तित्व की निर्मिति थी और इस संदर्भ में प्रतिभा ने परिशिष्ट में जो लिखा है, ’मेरी समस्या यह है कि मैं ऐसे हर मिलने वाले के जीवन में अविलम्ब प्रवेश कर जाती हूँ जो किसी कारण मुझे अच्छा लगता है, मेरा मन उसकी सहायता करने को कहता है. मुझे उस पर दया आती है कि वह डर रहा है कि मैं उससे प्रेम करती हूँ या वह मुझसे प्रेम करने लगेगा और उसका पारिवारिक जीवन तहस-नहस हो जाएगा. यह बात कही नहीं जाती पर मैं यह चीखकर कहना चाहती हूँ कि महोदय, मुझे आपसे कुछ नहीं चाहिए, आप जा सकते हैं, फिर आ सकते हैं, फिर जा सकते हैं, फिर कभी नहीं भी लौट सकते हैं. मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. मैं समझ, सहजता और स्वछन्दता चाहती हूँ. किसी को पकड़कर नहीं रखना चाहती और न ही कोई मुझे पकड़कर रखे.'

मारीना प्रेम में पज़ेसिव नहीं है कि वो अपने प्रेमी को प्रेम में जकड़कर रखे. प्रेम का जो सूत्र उसके पास है उसे उसके इस कहे से समझा जा सकता है कि ‘मैं समझ, स्वतन्त्रता और स्वछंदता चाहती हूँ’ यह उसके प्रेम का सूत्र है. प्रेम की जो एक पारम्परिक तरह की अवधारणा है या प्लेटोनिक प्रेम की जो अवधारणा है मुझे लगता है प्रेम की उन अवधारणाओं से अलग यह एक नया आयाम है. मारीना को समझने के लिए जो हमारे बने-बनाये ढाँचे हैं उन्हें तोड़ना होगा. उन ढांचों को भारतीय परिस्थितियों को समझना आसान नहीं है. उस समय का जो यूरोपीय समाज है उसके मद्देनजर देखना होगा.

यह देखिये कि उसका जीवन कितना त्रासद है. उसकी त्रासदी उसके जीवन की व्यक्तिगत त्रासदी नहीं है वो उस दौर के सामाजिक, राजनैतिक जीवन की उपज है. सवाल यह है कि अगर इतनी बड़ी बौध्धिक स्त्री, कवयित्री अगर एक जोड़ी जूते मांग रही है, कि वो उन जूतों के अभाव में कहीं जा नहीं पा रही है तो यह राजनीति से परे बात नहीं है. भले ही वह खुद को अराजनैतिक कहती है लेकिन वो है नहीं अराजनैतिक. कोई हो भी नहीं सकता है. बुकमार्क में लेखिका ने इस बात को बहुत अच्छे ढंग से उठाया है. असल में मारीना राजनीति का शिकार है. कितना त्रासद है यह सब. इस किताब को पढ़ते हुए हम अवसादग्रस्त होते जाते हैं. उसका पति जासूसी के आरोप में फंसता है, वो भी जेल जाता है, बेटी भी जेल जाती है. बेटा भी उत्पीड़ित है. यह सब उस दौर की राजनीति के कारण ही तो हो रहा है.

यह किताब उस दौर की राजनीति के बारे में निस्पृहता से विचार करने के लिए हमें प्रेरणा देती है. वो दौर उथल-पुथल का दौर था. स्टालिन ने 1935 में पेरिस में होने वाली कांफ्रेस में भाग लेने के लिए पास्तेरनाक को भेजा. जिस पास्तेरनाक को एंटी फासिस्ट कांफ्रेंस में भाग लेने के लिए भेजा यानी पास्तेरनाक पर उसे भरोसा था वही पास्तेरनाक बाद में उसी राजनीति के विक्टिम बने.

गोर्की बड़े नायक थे. उस समय की राजनीति की जो संरचना थी उसके अंतर्गत गोर्की भी मारीना की सहायता उस तरह से नहीं करते हैं. त्रासदी मरीना के हिस्से ज्यादा ही आई. तो सवाल यह है कि क्या नजरिया अपनाया जाय कि जो उस दौर में बहुत से साम्राज्यवाद के समर्थन का नजरिया अपना रहे थे या पूरी वैचारिक राजनीति में उथल-पुथल थी. एक कवियित्री की जीवनी के माध्यम से कितने रग-रेशे खुल रहे हैं. इसका दायित्व के साथ निर्वहन करना आसान नहीं था. यह काम बहुत परिपक्वता की मांग करता है और प्रतिभा ने उस परिपक्वता का परिचय दिया.

कितनी बड़ी त्रासदी है की मारीना ने आत्महत्या की लेकिन आत्महत्या के बाद उसे कहाँ दफन किया गया यह कोई नहीं जानता. उसकी कब्र कहाँ है आज तक किसी को नहीं पता. लोग ढूँढने गये लेकिन किसी को कोई ख़बर नहीं मिली. उस समय के लोग परिवार, लेखक समाज किसी ने उसे चिन्हित नहीं किया. किसी को नहीं पता वो कहाँ दफन है. कोई बताने वाला नहीं. इससे भी आप देखेंगे कि हालात कैसे थे और वो किस कदर उपेक्षित थी. मरीना का बेटा जो अपनी माँ की आत्महत्या को सही ठहराता है वो कहता है जिन हालात में माँ थी उन हालात में उसके पास कोई चारा नहीं था आत्महत्या के सिवा. वो कहता है ‘मेरी माँ ने सही किया.’ वो गवाह है उन स्थितियों का. वो सब देख रहा था. वो कहता है कि माँ ने जो किया यही उचित था किया जाना. कितनी बड़ी त्रासदी है कि बेटा माँ की आत्महत्या में ही उसकी मुक्ति देख रहा है. इन सारी परिस्थितियों का जो ताना-बाना बहुत उलझा हुआ है और उसमें उलझा है मारीना का जीवन.

रिल्के, पास्तेरनाक, अन्ना अख्मातोवा आदि के नाम हैं उस दौर में लेकिन मैं ईमानदारी से कहूँगा की मारीना मेरी स्मृति में नहीं थी. मैंने उस समय के कुछ सोवियत कलेक्शन निकाले उसमें मारीना को ढूँढा. वर्ल्ड सोशलिस्ट पोयट्री का एक बहुत अच्छा पोयट्री कलेक्शन है और वो करीब 30 साल पहले का है पेंग्विन ने उसे प्रकाशित किया था जिसमें दुनिया भर के कवि हैं जिसमें पाब्लो नेरुदा भी हैं उसमें भी मारीना कहीं नहीं मिली. एक सोवियत पोयट्री का बहुत अच्छा कलेक्शन है उसमें भी मरीना को तलाशा मैंने उसमें स्टालिनवाद के समय के सब लोग हैं उसमें येसेनिन भी हैं मायकोवस्की भी हैं लेकिन यह नाम वहां भी नहीं है. प्रतिभा ने उस लिहाज से मारीना को उपस्थित भी किया है. हिंदी के पाठको के लिए तो यह है ही कि क्योंकि किताब हिंदी में है लेकिन इसके माध्यम से चर्चा आगे भी जा सकती है क्योंकि यह एक जीवनी भर नहीं है, एक खोज है. प्रतिभा ने इसको खोजा, इसको इस रूप में प्रस्तुत किया. यह आगे जाने वाला काम है. टिकने वाला काम है. जब भी इस तरह की कोई चर्चा होगी तब मारीना को खोजा जाएगा. इस काम को दूर तक जाना चाहिए.
 (जनवरी 2021 में लखनऊ में हुए एक कार्य्रकम में दिया गया वक्तव्य)
 पुस्तक- मारीना (जीवनी)
लेखिका- प्रतिभा कटियार 
मूल्य- 300 रूपये
प्रकाशक- संवाद प्रकाशन, 
पुस्तक अमेजन पर भी उपलब्ध है. अमेजन का लिंक- https://www.amazon.in/-/hi/Pratibha-Katiyar/dp/8194436206/ref=sr_1_1?dchild=1&keywords=pratibha+katiyar&qid=1631940830&sr=8-1

Thursday, July 15, 2021

अलग सा एहसास है मारीना को पढ़ना



इस नायाब किताब को मैने कई दिन लगाकर पढ़ा, लगभग हर पन्ना भावनाओं का सैलाब लाता है। मारीना का जन्म सन् 1892 में एक महान कला मर्मज्ञ और इतिहासकार, ईवान व्लादिमिरोविच के घर में हुआ था। लेकिन, नियती ही थी कि, चांदी का चम्मच मुँह में लेकर पैदा हुई मारीना के कुल जमा 49 साल के जीवन का अधिकांश हिस्सा अभावों से जूझते हुए बीता, अभाव प्रेम और सहयोग का! पैसों का! और सबसे अधिक समय का अभाव, जिसकी गूंज किताब में कदम-दर-कदम मिलती है!

किताब में मारीना की कुछ बेहतरीन अनूदित कविताएं पढ़ने को मिली, ‘एक सुबह’, ‘ऑन द रेड हाॅर्स’, ‘फ़ासले’, ‘कवि’, ‘प्यारी मेज़’ और भी कई, जिनका अनुवाद भी इतना मीठा है कि, मुझ जैसे सामान्य पाठक की ज़बान पर भी मारीना की कविताओं का स्वाद चढ़ गया। एक कविता में मारीना कहती हैं- “.... मेरी कविताएं संभाल कर रखी गई सुरा की तरह हैं मैं जानती हूं कि इनका भी वक़्त आएगा...”! कविता का ये अंश समय से कहीं आगे की बात कहता लगता है, जो सच हुआ। किताब में जब मारीना के जीवन को प्रभावित करने वाले अहम किरदारों के तौर पर पुश्किन, रिल्के, पास्तरनाक, जैसे महान कवियों के ज़िक्र आये, तो लगा, इन्हें भी तो रूक कर, थम कर पढ़ा जाना ज़रूरी है, फिर, उन्हें जानने की ख़्वाहिश में इण्टरनेट भी खूब खंगाला।

दरअसल मेरी नज़र में यह किताब मारीना की जीवनी नहीं, बल्कि कई-कई मुलाकातें हैं, मुलाकातें सिर्फ मारीना के साथ ही नहीं बल्कि दुनिया के उस दौर के दूसरे बेहतरीन कवियों के साथ भी। मारीना के जीवन में घटे अधिकांश घटनाक्रम सन्दर्भों के साथ लिखे गये हैं और जहां घटनाओं के सन्दर्भ नहीं हैं, वहां सम्भावनाओं के सन्दर्भ अंकित हैं, जिससे इस किताब में लिखे हर शब्द के प्रति विश्वास बढ़ जाता है। हम महसूस कर पाते हैं कि, बेरहम सत्ता और निरंकुश राजनीति कैसे कला और साहित्य जगत पर अपना शिकंजा कसती है, ये हर कालखण्ड की त्रासदी रही है। मारीना के इर्द-गिर्द लिखी घटनाओं से, प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के बीच के राजनीतिक उठापटक के उस दौर में साहित्य जगत पर पड़ने वाले प्रभावों की झलक भी मिलती है।

पाॅल गोगां हों, वाॅन गाॅग हों या मारीना! ये मुफलिसी न होती तो ये महान रचनाकार दुनिया को और भी न जाने क्या क्या दे जाते, मगर समय रहते हमें किसी की भी क़द्र ही कहां होती है? एक जगह किताब में मारीना कहती हैं, चिकित्सक इंसान के लिए ज़रूरी होते हैं, लेकिन कवि समाज़ के लिए...। वाकई! लेकिन, ये सर्जक जो समाज की ऑक्सीजन होते हैं, हम इन्हें वो सम्मान जीतेजी देते ही कब हैं? मारीना जिस विरासत को पोषित करती थी, उसे आज भी पूरी दुनिया आह भरकर देखती है। मारीना के पिता, मां, पति, पुत्री, बहिन और मित्र, सभी एक से बढ़कर एक रहे, जो खुद इतिहास और साहित्य जगत की सुनहरी इबारतें लिख गये हैं, ज़रूर उन सबके भी अपने अपने कष्ट थे, लेकिन मारीना ने जिन दुश्वारियों को झेला वो असहनीय थीं। आर्थिक तंगी की पराकाष्ठा, लेखन न कर पाने का मलाल, एक-एक कर अपने परिजन, अपने प्रियजनों का विदा हो जाना, अपने पति और बेटी का जेल में होना........... ऊफ्फ! इतनी पीड़ा से निबटना आसान भी तो नहीं था।

आखि़र में हम जो पाते हैं- अपनी ख़्वाहिशों को तीन चिट्ठियों में समेट कर इस दुनिया से विदा होती मारीना!

अपनी मां की मौत के बाद मरीना का बेटा मूर, जिसका हाथ मारीना कभी नहीं छोड़ती थी, अपने दोस्त को लिखता है कि, वह उस बारे में सिर्फ एक ही बात कह सकता है कि 'मम्मा ने जो किया, अच्छा किया, उनके पास खुद को ख़त्म कर देने की पर्याप्त वजहें थीं।' जब एक बेटे को अपनी मां की आत्महत्या इस रूप में स्वीकार करनी पड़े, तो इससे ज़्यादा दयनीय क्या हो सकता है?

मारीना सिखाती है कि, विपरीत परिस्थितियों में भी जीवनपर्यन्त ईमानदार बना रहा जा सकता है, जो अपने लेखन के प्रति, अपने पारिवारिक दायित्वों के प्रति, अपने पति, अपने प्रियजनों के साथ ही अपने आलोचकों के प्रति भी ताउम्र ईमानदार रही!

ये किताब मारीना के बचपन, युवावस्था, निर्वासन, माॅस्को वापसी जैसे जीवन के विशेष पड़ावों के आधार पर, अलग-अलग खण्डों में बंटी हैं। किताब में दिये कुछ विशेष घटनाक्रमों के आखिर में लेखिका ने बुकमार्क के तौर पर मारीना के साथ अपने संवादों की जो कल्पना की है, वो अप्रतिम है, यहां भावों की गगरिया छलछलाने लगती है। शायद बुकमार्क के इस तजवीज़ का भी असर है, कि मुझे ये किताब जीवनी से बढ़कर मुलाकात लगती है। वो दौर ख़त-ओ-किताब़त का दौर था, मारीना में उद्धृत ख़तों को पढ़कर नीली अन्तर्देशियां, पीले लिफाफे, पोस्टकार्ड भी खूब याद आये।

समझा जा सकता है कि, एक दूसरे देश की कवयित्री (जबकि मारीना खुद को रूस की कवि कहलाना पसंद नहीं करती थीं, वो खुद को सिर्फ कवि मानती थीं) की जीवनी को कागज़ में उतारने के लिए लेखिका ने कितनी मेहनत, कितना संयम, कितना समय और कितना धन विनियोजित किया होगा। किताब की शुरूआत में लेखिका के अपने उद्गार पढ़कर ही त्याग के इस ताप की आंच महसूस की जा सकती है।
एक बार इसी किताब पर परिचर्चा के दौरान एक समारोह में मैने प्रतिभा जी को सुना था। वो जब मारीना की छोटी बेटी के भूख से मर जाने की घटना के बारे में अपनी भावनाएं बांट रही थीं, मेरी आंखें डबडबाने लगी थीं। सच है, जब एक लेखक कोई जीवनी लिखता है तो उसकी ज़िम्मेदारी बहुत ज़्यादा बढ़ जाती है। प्रतिभा जी ने मारीना लिखकर हम पाठकों पर एहसान किया है, जिसे हम सिर्फ उन्हें बधाई देकर या धन्यवाद कहकर तो नहीं चुका सकते, लेकिन एक पाठक के तौर पर मैं उन्हे हमेशा इतना ज़रूर कहती हूँ कि, आपके दौर का पाठक होकर गर्व सा होता है।

प्रतिभा जी को एक बार फिर से हार्दिक बधाई और धन्यवाद

मारीना (जीवनी)रूस की महान कवयित्री मारीना त्स्वेतायेवा का युग और जीवन
लेखिका- प्रतिभा कटियार
मूल्य- 300 रूपये 
प्रकाशन: संवाद प्रकाशन, मेरठ

Wednesday, May 19, 2021

वर्तमान में कोई ऐसी जगह नहीं...मारीना

- ममता सिंह 
(अगर आपको जीवनी पढ़ना पसन्द है तो रूस की महान कवयित्री मारीना त्सेवेतायेवा की जीवनी ज़रूर पढ़नी चाहिए...
उथल पुथल,संघर्ष,देश से निर्वासन,ग़रीबी, बीमारी,बच्चों की मृत्यु के बीच भी लिखती हुई मारिया का जीवनवृत्त न केवल साहस और लिखने की छटपटाहट का चरम बिंदु है बल्कि यह आज के अंधेरे और आशाहीन समय में एक सम्बल भी है।)

'अजीब बात है हर कोई अपनी-अपनी लड़ाई अकेले लड़ रहा होता है फिर भी किसी कंधे की तलाश होती है,जिसके सर पर ठीकरा फोड़ा जा सके,सुनने में अटपटा लग सकता है,लेकिन अक्सर हम ठीकरा फोड़ने के लिए अपने प्रिय कंधे ही तलाशते हैं।' पृष्ठ 56

'असल में प्रेम हमारे भीतर ही होता है,कोई होता है,जो हमारे भीतर के उस प्रेम तक हमें पहुंचा देता है,जाने-अनजाने,उसके बाद हम ज़िन्दगी भर उसी प्रेम में जीते रहते हैं,अलग अलग लोगों से,चीज़ों से घटनाओं से जुड़ते रहते हैं,लेकिन केंद्र में वही होता है प्रेम' पृष्ठ 86

'मेरे पास वर्तमान में कोई ऐसी जगह नहीं थी,जहां मैं ख़ुद को सुरक्षित महसूस कर सकूं...न ही भविष्य की मुट्ठी में ऐसी कोई उम्मीद थी,इस इतनी बड़ी समूची दुनिया में मुझे मेरे लिए एक इंच जगह भी ऐसी नहीं नज़र आती थी,जहां मैं अपनी आत्मा को निर्विघ्न,बिना किसी डर के उन्मुक्त छोड़ सकूँ.मैं धरती के उस अंतिम टुकड़े पर हूं जिस पर मैं इसलिए खड़ी हूँ,क्योंकि मेरे होने से वह ख़त्म नहीं हो सका है.मैं इस छोटे से टुकड़े पर अपनी पूरी ताक़त से खड़ी हूँ.' पृष्ठ 213

किताब-मारीना
लेखक- प्रतिभा कटियार
प्रकाशक-संवाद प्रकाशन
पृष्ठ-259
मूल्य-300


Sunday, April 11, 2021

'सिर्फ मेरे प्रेम पर ही सवाल क्यों?'- मारीना


 कल रात मारीना फिर आई. मुझे मालूम था वो आएगी. हम देर तक बात करते रहे. हालाँकि वो खामोश थी. लेकिन अब हम दोनों ने शब्दहीनता में संवाद करना सीख लिया है. मैंने उसकी कलाई अपने हाथ में लेते हुए पूछा, 'उदास हो?' वो चुप रही. सवाल तो होना चाहिए था 'खुश हो?' कि मारीना के जीवन और जिजीविषा के नाम एक पूरी शाम जो थी. कितना प्रेम मिल रहा था. वही प्रेम जिसके लिए वो जीवन भर तरसती भी रही और वही जिसमें वो जीवन भर निमग्न भी रही. उसकी ख़ामोशी की मुझे आदत है. मैंने कहा कॉफ़ी पियोगी? उसने हाँ कहा. 

मैं उसे पीले फूलों वाले बागीचे में छोड़कर कॉफ़ी बनाने गयी. कॉफ़ी बनाते वक़्त असल में मैंने अपने भीतर भी कोई उदास धुन को गलते हुए महसूस किया. क्यों है यह उदासी. जबकि मन तो ख़ुशी से भरा होना चाहिए था. मारीना की इतने सारे नये लोगों से दोस्ती हुई कल. इतना प्यार मिला उसे भी, मुझे भी. शायद हर सुख के अन्तस में कोई दुःख का केंद्र है. वही होगा उदासी की वजह. मैंने अक्सर बेहद खुश होने के अवसरों पर एक उदासी तारी होती महसूस की है. लेकिन इस दफे यह तनिक लग उदासी थी. 

मैं उसके आगे कॉफ़ी का मग बढ़ाते हुए कहती हूँ 'प्रेम' 

उसकी निगाहों में नजर आता है प्रेम. 

'जानती हूँ तुम्हारी उदासी की वजह' मैं उससे कहती हूँ. शायद यही वह मुझसे भी कहती है. 

'क्या मेरा जीवन सिर्फ मेरे प्रेम और मेरे रिश्तों के लिए ही जाना जायेगा? या उन दुखों के लिए जो मैंने सहे? या उस मृत्यु के लिए जिसे मुझे चुनना पड़ा? मैं अपनी रचनाओं के लिए भी जाने जाना चाहती हूँ.' उसकी पलकें नम थीं और कॉफ़ी का मग थामे वो दूर निगाहें टिकाये थी. 

कह देने से मन हल्का होता है. उसके कह देने से मेरा मन हल्का हो आया था. रूई सा हल्का. प्रेम अगर स्त्री का  हो, कई प्रेम तो उसकी तमाम प्रतिभाओं के बावजूद जब भी उस पर बात होती है केंद्र में उसके प्रेम ही जाने क्यों आ जाते हैं. मैं उसके कंधे पर हाथ रखकर कहती हूँ, 'दोस्त सौ बरसों का फासला गुजरा जरूर है लेकिन बहुत कुछ बदला नहीं है अभी भी. इसलिए नाराज न हो, उदास न हो कॉफ़ी पियो. कि तुम इस बाबत मुझे पहले ही बता चुकी हो प्रेम बाहर की नहीं भीतर की यात्रा है. कितने प्रेम नहीं कितना प्रेम, कितनी सघन यात्रा. प्रेम के सफर में आने वाले व्यक्तियों को गिने बिना अवसाद की,अधूरेपन की उस यात्रा को देख पाने का शऊर अभी सीखना है दुनिया को. कि जब हम लिबरल होकर कहते हैं न कि हमें उसके तमाम रिश्तों से आज़ाद ख्याली से कोई परेशानी नहीं तब भी कहीं होती है परेशानी.' 

'मैं प्रेम से भरी थी...'  वो कुछ कहने को हुई. 

'रुक जाओ कुछ न कहो.' मैं उसे रोक देती हूँ. 

'जस्टिफिकेशन कोई नहीं दोस्त. किसी को मत दो. लोगों को उनकी समझ के साथ छोड़ते हैं. उन्हें अभी परिपक्व होने में समय लगेगा. हम कॉफ़ी पीते हैं. '

'बस एक सवाल?' मारीना की उदासी आसपास भटकने लगी थी. 

'बस एक?' मैं हंसकर यूँ कहती हूँ जैसे मुझे तो सवालों के जवाब आते ही हैं. जैसे कि मैं तो बुध्धू हूँ ही नहीं. 

'क्या अगर मारीना पुरुष होती तो भी ये सवाल ऐसे ही होते, क्या तब भी समूची रचनात्मकता को उसके तमाम रिश्तों और प्रेम पर केन्द्रित कर सीमित कर दिया जाता?' 

मैं हंस देती हूँ. यह सवाल समूची आदमजात से है. उन सबसे जो एक स्त्री को जज करने के अपने भोथरे हथियारों के साथ सदियों से खड़े रहते हैं. न जाने साहित्यकार, कलाकार हैं दुनिया भर में जहाँ एकाधिक प्रेम के किस्से सहजता से स्वीकारे गए लेकिन एक स्त्री...उसकी रचनात्मकता के आगे उसके चरित्र का विश्लेष्ण खड़ा कर सारा विमर्श समेट दिया जाता है. चाहे उसके संघर्ष हों, उसकी सफलता या उसका जीवन.

'छोड़ो न ये सब, तुमने जीवन भर जिन बातों की परवाह नहीं की तो अब क्यों?'

'परवाह नहीं कर रही दोस्त उदास हूँ इतने बरसों के बाद भी स्त्री को देखने का नजरिया जरा भी नहीं बदला.'

मैं और मारीना कल शाम की तस्वीरों में खुद को तलाशने लगती हैं. कुछ मुस्कुराहटें हमारा हासिल हैं,  

Saturday, February 27, 2021

मारीना- ऐसे भी कोई जाता है क्या

हफीज़ किदवई युवा रचनाकार, संन्कृतिकर्मी और जन पैरोकार हैं. वो हमेशा मुद्दों के भीतर से मानवीय पक्ष खोज कर लाते हैं, उनकी हिमायत करते हैं. हफीज़ की कलम में एक ख़ुशबू है, एक रौशनी है. वो अल्फाजों के सहारे दुनिया को रोशन करना चाहते हैं और महकाना चाहते हैं. उनकी खासियत यह है कि वो सिर्फ कलमकार नहीं हैं सड़कों पर उतरकर, लोगों के घरों तक पहुंचकर उधड़े हुए समय और समाज को रफू करने के प्रयास वो निरन्तर करते हैं. मारीना पर उनकी यह टिप्पणी जो सोशल मीडिया पर है उसे प्रतिभा की दुनिया में सहेज रही हूँ- प्रतिभा  

अरे ऐसे भी कोई जीता है, अरे यार ऐसे भी कोई मर सकता है, यही तो निकला था मुँह से मारीना को पहली बार पढ़ते हुए । इस किताब को आपको ज़रूर पढ़ना चाहिए । यह किताब दो कवयित्रीयों के बीच बातचीत का अनूठा काम है । एक बहुत पहले अपनी कविता कह गए,एक आज अपनी कविता अपने दिल में सँजोए हुए हैं । एक को हमने नही देखा,मगर जिसको हमने देखा,उसने उसे हमे दिखा दिया,जिसे हमने नही देखा था । यह किताब अद्भुत है ।

एक तरफ रूस की महान कवियत्री मारीना त्स्वेतायेवा हैं, जिनकी यह जीवनी है, दूसरी तरफ हैं हमारे लखनऊ की कवियत्री प्रतिभा कटियार,जिन्होंने इसे सलीके से हिंदी में गढ़ा है । यह किताब ऐसे लगता है कि मारीना ख़ुद प्रतिभा से कहकर लिखवा रही हों । कोई लेखक कैसे किसी दूसरे लेखक के दिल की धड़कन,चेहरे की शिकन और शरीर की थकन के बीच प्रेम की ताज़गी को ढूंढ सकता है । यह तो तब तक सम्भव नही है, जब तक लिखने वाले शरीर में लिखे जाने वाले कि आत्मा न उतर आए,यह अद्भत घटना प्रतिभा कटियार की कलम में घटित हुई है ।
मैंने बहुत धैर्य से उस किताब को पढ़ा, यह महीने भर से थी मेरे पास,मैं उसे रोज़ पढ़ना चाहता था । चाहता था कि किताब खत्म न हों,क्योंकि मारीना का अंत पता था,और चाहता था कि किताब लम्बी होती चली जाए,यही प्रतिभा जी ने भी किया होगा । वह भी किताब खत्म नही करना चाहती होंगी,वह भी अभी भी मारीना के साथ रहना चाहती होंगी,मगर यह नही हो सका,क्योंकि हमारी सीमाएं निर्धारित हैं।

फिल्मों में,वीडियोज़ में बहुत बार भावुक पल आने पर तो आंसू आते हैं मगर किताब पढ़ने पर इनका निकलना बहुत ही अलग बात है और मारीना पढ़ने पर कई दफा आँसू आए । कई दफा मन भारी हुआ,यह कहिए कि यह किताब पढ़ी जितनी जाएगी,उससे कहीं ज़्यादा ही जी भी जाएगी ।

हम किताब के कंटेंट में नही जाएँगे, यह आप खरीदकर पढ़िए,अमेज़न या किसी बुक शॉप से लीजिये । हम तो इस किताब को सिर्फ इसके एक बुकमार्क के लिए खरीद सकते थे,जो फ़ोटो में मौजूद हैं । ऐसे बहुत से बुकमार्क किताब में हैं, यह एक बेहतरीन परम्परा लेखिका ने डाली है, जिसे हम सबको बढ़ाना भी है ।

मारीना की जीवनी लिखकर प्रतिभा जी ने ऐतिहासिक काम कर डाला । उन्हें खुद नही पता होगा कि मारीना से जो वह बात कर रही थीं,वह पल ऐतिहासिक थे,वह वक़्त आने वाली नस्लों को कुछ बीज देने जैसा था । जब कभी मारीना का नाम फलक पर चमकेगा और उनका लिखा हमारी दहलीज़ पर पहुँचेगा, तब पीछे पीछे प्रतिभा भी पहुँचेंगी, क्योंकि ऊँचाई में छिपे इस सितारे की चमक हम सबके सामने उन्होंने ही बिखेरी है । यह किताब अद्भुत है, बहुत बहुत धन्यवाद प्रतिभा मैम इसे लिखने के लिए,इसे सोचने केलिए,हमे पता है इसका लिखना कितनी वेदना समेटे था ।

एक आखरी बात प्रतिभा जी के लिए ,मारीना की जीवनी का चुनाव इस ज़मीन पर केवल आप ही कर सकती थीं,क्योंकि उसकी ज़िन्दगी के पड़ाव,बदलाव और माथे की शिकन के बीच अल्फ़ाज़ बुनती उँगलियों को केवल आपका संवेदनशील हृदय देख सकता था । यह किताब हमारी पीढ़ी के लिए आपका उपहार है, बहुत बहुत धन्यवाद....

किताब मंगवाने का लिंक- https://www.amazon.in/-/hi/Pratibha-Katiyar/dp/8194436206/ref=sr_1_1?dchild=1&keywords=pratibha+katiyar&qid=1614405248&sr=8-1

Thursday, February 4, 2021

गुमनाम कवयित्री की जीवनी

-वीरेन्द्र यादव

रूस की लगभग अलक्षित और लंबे समय तक गुमनाम रही लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण कवयित्री मारीना त्स्वेतायेवा की युवा लेखिका प्रतिभा कटियार द्वारा लिखित जीवनी 'मारीना' को पढ़ते हुए यह तथ्य बार बार उद्वेलित करता है कि चमकदार दिखते और लुभाते इतिहास के पीछे कितने अदीठ अंधेरे छिपे होते हैं.मुझे लगता है कि 'मारीना' की इस जीवनी का टेक्स्ट जितना महत्वपूर्ण है उससे कम महत्वपूर्ण नहीं है इसका सबटेक्स्ट. मारीना रिल्के और बारिस पास्तरनाक की प्रेमिका थी तो गोर्की की प्रशंसिका. पुश्किन की कविता उसकी प्रेरणा थी तो मैन्डेलस्ताम और अख्मातोवा उसके प्रिय समकालीन . सोवियत क्रांति की उथलपुथल ने उसे जिस त्रासद नियति का शिकार बनाया उसे आज भी पढ़ना अवसादकारी है. वह अपने वतन रुस से क्रांति पूर्व और पश्चात की परिस्थितियों के चलते उस दौर के अन्य रुसी बौद्धिकों की तरह देशबदर होने के लिए अभिशप्त थी. कविता व साहित्य उसकी प्राणवायु थी और प्यार उसकी सांस. प्यार में वह समझ, सहजता और स्वच्छंदता की कायल थी.वह रुसी क्रांति की गायक नहीं थी और क्रांति से उपजी अराजकता के प्रति अपनी कविताओं में आलोचनात्मक थी, लेकिन रुस से उसे अगाध प्रेम था. विडम्बना यह थी कि 'उस दौर में रुस से प्रेम के सीधे अर्थ नहीं थे. कोई इसे बोल्शेविक नजरिये से देख रहा था तो कोई राजशाही के समर्थन के नजरिये से'. मारीना न बोलशेविक समर्थक थीं और न राजशाही की. फिर भी उसे अपने देश से आत्मीयता के बजाय दुराव व हताशा ही मिली. वह गोर्की की प्रशंसक थी उन्हें काबिल, विनम्र और इंसानियत का पैरोकार मानती थी लेकिन गोर्की की दृष्टि में वह संदेहास्पद और गैर भरोसेमंद थी. पास्तरनाक से वह प्रेम में थी, लेकिन वे भी उसके मददगार नहीं सिद्ध हुए. उसके जीवन में एक दौर ऐसा भी था कि वह एक जोड़ी कपड़े और जूते की मोहताज थी.

एक बेटी की देखभाल करती मारीना दूसरी बेटी की अंत्येष्टि में शामिल होने से वंचित रही. स्टालिन की गुप्तचर एजेंसी ने उसके पति, बेटी और बेटे को अलग अलग समय पर गिरफ्तार किया. अंततः मारीना को अपने देश की नागरिकता तो मिली लेकिन उसके जीवन का त्रासद अंत उसकी आत्महत्या में हुआ. उसकी आत्महत्या के सूत्र मायकोवस्की और एसेनिन के आत्मघात से भी कहीं न कहीं जुड़ते हैं. मारीना को दफ्न किए जाने की जगह का पता तो नहीं चल सका लेकिन प्रतिभा कटियार ने उसे अपनी इस किताब द्वारा हिंदी पाठकों के समक्ष जीवित कर दिया है.मारीना की यह जीवनी जिस समर्पित भाव और बिना किसी निर्णायक मुद्रा के प्रतिभा ने लिखी है उसके लिए वह बधाई की पात्र हैं. इस जीवनी का महत्व यह भी है कि यह राजनीति और साहित्य के कई अनुत्तरित प्रश्नों को एक बार फिर शिद्दत के साथ प्रस्तुत करती है. इसका पढ़ना कई तरह से अवसादग्रस्त और बेचैन करने वाला है. हमारे शहर की लेखिका प्रतिभा कटियार का इसका निमित्त बनना सुखद है. एक बार फिर प्रतिभा कटियार को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ.
संवाद प्रकाशन , मेरठ से प्रकाशित इस पुस्तक का मूल्य 300 रु. है.

लखनऊ में ‘मारीना’



-कौशल किशोर
‘मारीना’ कवि-कथाकार-पत्रकार प्रतिभा कटियार की हिन्दी के पाठकों के लिए खोज है। यह उस कवि की तलाश है जो अपने देश रूस से बेइन्तहां प्यार करती थी। पर उसके देश ने क्या दिया? विस्मृति। उसे भुला दिया और उसकी याद भी आई तो मरने के बाद। यह कृति रूस की महान कवयित्री मारीना त्स्वेतायेवा के युग और जीवन पर केन्द्रित है। पिछले साल 2020 में संवाद प्रकाशन, मेरठ से आई। इसमें प्रतिभा की प्रतिभा छलछलाती हुई दिखती है।
मरीना को जो जीवन मिला, वह त्रासदी से भरा था। लगातार एक शहर से दूसरे शहर, एक जगह से दूसरी जगह, एक देश से दूसरे देश। यह न थमने वाला सिलसिला था। इसमें संघर्ष ही संघर्ष था। इसमें रोटी के जुगाड़ से लेकर जिन्दगी की छोटी से छोटी जरूरतें शामिल थीं। यह तो शब्द और कविता थी जिसने उसे सहारा दिया। खत और डायरी का साथ मिला। उसके दो प्रिय शगल थे - ख्वाबों से बात करना और खत लिखना। यह न होता तो वह कब की खत्म हो गई होती।
मृत्यु हमेशा उसके पास रही, साथ रही। मृत्यु में ही उसने जीवन देखा और उसे जीवन के कैद में महसूस किया। लोग अपना जन्मदिन मनाते हैं, सुखमय जीवन की कामना करते हैं। पर यहां कहानी उलटी है। वह अपने स़त्रहवें जन्मदिन पर मृत्यु की कामना करती है। 14 साल की उसकी उम्र थी जब मां गई। पिता का साथ 25 वें साल में छूटा। सबसे दर्दनाक मौत अपनी छोटी बेटी का देखने को मिला। विडम्बना यह कि उसकी मौत के बाद उससे वह मिल भी न पाई। वह बड़ी बेटी को नहीं छोड़ सकती थी जो जीवन और मृत्यु के बीच थी।
मरीना की दुनिया प्रेम से भरी थी। कह सकते हैं कि वह प्रेम के लिए ही बनी थी। उसे लगता कि प्रेम ही उसे बचा सकता है। उसका प्रेम पुश्किन से था। नेपोलियन के प्रति उसका आकर्षण था। पहला प्रेम किशोरावस्था में हुआ। सर्गेई से पिता की इच्छा के विरुद्ध जाकर शादी की। यह प्रेम विवाह था। उसे निभाया। उस पर कविता लिखी। प्रेम की उसकी दुनिया में रिल्के हैं, बोरिस पास्तरनाक हैं और भी कई हैं। प्रेम उसके यहां बहती नदी है।
मारीना की कविताई का दौर 13 साल की उम्र से शुरू हुआ। मां चाहती थी कि वह पियानो सीखे। उसका लगाव संगीत से हो लेकिन उसका प्रेम तो शब्दों से था। 17 साल की उम्र में पहला संग्रह ‘द इवनिंग एल्बम’ आया। ‘द फ्रेंड’, ‘पोयम फॉर यूथ’, ‘साइकिल’ जैसी कविता श्रृंखला से लेकर ‘द जार और मैडम’ जैसी अनगिनत कृतियों से उसने साहित्य की दुनिया को समृद्ध किया। रूस के लोकजीवन और लोक संस्कृति से उसका भावनात्मक लगाव था। वह कविता को देश के पार, भाषा के पार जाकर देखती थी। कवि को वह बन्धनमुक्त देखना चाहती थी। उसकी काव्य प्रतिभा से लगता है कि वह इस दुनिया की नहीं बल्कि इसके पार की है।
मारीना का समय दुनिया का सबसे हलचल, उथल-पुथल, उलझाव से भरा था। उसमें उसने विस्थापन, निर्वासन झेला। 17 साल अपने देश से बाहर रहना पड़ा। इतिहास के बारे में बातें करना और इतिहास जीना दो अलग चीजें हैं। वह इतिहास मारीना का वर्तमान था। वह ऐसा था जहां उसके लिए मृत्यु में ही मुक्ति थी। उसने यही चुना और परिदृश्य से ओझल हो गयी। वह इस तरह ओझल हुई कि पता ही नहीं कि उसे किस कब्रिस्तान में दफनाया गया। उसे मृत्यु के कई बरस बाद जाना गया, उसकी कविता को पहचाना गया। वह प्रतिष्ठित हुई। उसका मूल्यांकन करते हुए यहां तक कहा गया कि वह तो नोबल पुरस्कार की हकदार थी। उसका जीवन और संघर्ष और अन्त में मृत्यु का आलिंगन उस वक्त की राजनीति और सत्ता व संस्कृति की संरचना पर भी टिप्पणी है।
प्रतिभा की किताब इसी ‘मारीना’ की कथा है। यह जीवनी मात्र नहीं है। यह उसकी संघर्ष कथा, त्रासदी कथा, स्वप्न कथा, प्रेम कथा, काव्य कथा, आत्मकथा सबको समेटती है। बीच बीच में ‘बुक मार्क’ के रूप में टिप्पणियां कृति को जीवन्त है और पाठ को रोचक बनाती हैं। मरीना में प्रतिभा समाहित है। वह जिस तरह मारीना से इश्क करती है, यह उसकी दास्तां है। वह मारीना में अपने को पाती है, उसे रचती है, उससे बतियाती है, बहसती है, सवाल करती है और उसमें समा जाती है। इसीलिए यह अनूठी कृति बन पाई है। यह हिन्दी के उन पाठकों के लिए अनुपम भेंट है जिनकी विश्व साहित्य को जानने, समझने व पढ़ने की रूचि है।
 24 जनवरी के खुशगवार शाम में प्रतिभा के इस ‘मारीना’ से उसके अपने शहर लखनऊ के लोगों की मुलाकात हुई। आसमान साफ था। कई दिनों के बाद धूप खिली थी। इस अवसर पर प्रतिभा की इस कृति की सात साल की रचना यात्रा के संग-साथी शामिल थे। उसकी दोस्त ज्योति थी तो मम्मी भी थी जिन्होंने पल-पल का ख्याल रखा। बेटी ख्वाहिश इस पूरे लम्हे को अपने मोबाइल कैमरे में कैद कर लेने में जुटी थी। ‘मारीना’ के विमोचन का यह कार्यक्रम मानस नगर, हजरतगंज के एक खुले परिसर में सम्पन्न हुआ। अध्यक्षता आलोचक वीरेन्द्र यादव ने की। संचालन किया कवि व जसम उत्तर प्रदेश के कार्यकारी अध्यक्ष कौशल किशोर ने। वक्ता थे इप्टा के राष्ट्रीय महासचिव राकेश, आलोचक नलिन रंजन, कवि व पत्रकार सुभाष राय, कवि भगवान स्वरूप कटियार, कवयित्री विमल किशोर व सीमा सिंह और तारा कटियार। इस मौके पर कवि-कथाकार शालिनी सिंह, कवि-कथाकार तरुण निशान्त, युवा लेखक हाफिज किदवई आदि कई लोग मौजूद थे। आयोजन जन संस्कृति मंच का था।
प्रतिभा कटियार ने अपने शहर लखनऊ में ‘मारीना’ को पाकर बेहद खुश थी। उसने बताया कि उसने कैसे मरीना को जाना और कैसे जानती चली गई। उसने सात साल की लम्बी रचना प्रक्रिया की दास्तां सुनाई। मम्मी ने कैसे ख्याल रखा। मित्रों के साथ व सुझाव को भी याद किया। सर्वोपरि डा वरयाम सिंह के प्रेरक सहयोग के बारे में बताया कि अगर उनका साथ न मिला होता तो मारीना तक पहुंचना असंभव था। वे ही थे जिसकी वजह से यह संभव हो पाया। उन्होंने जितेन्द्र रघुंवशी, अशोक पाण्डेय सहित कई रचनाकारों के सहयोग-सुझाव को याद किया। कार्यक्रम के बाद प्रतिभा कटियार ने सोशल मीडिया पर लिखा भी ‘मारीना ने मेरे कान में चुपके से कहा- तुम्हारे शहर के लोगों ने समझा, मुझे प्यार किया। उन्हें शुक्रिया कहना। मैंने उससे हंसकर कहा कि हां, मैंने उन्हें शुक्रिया कहा है। हालांकि शुक्रिया नाकाफी होता है ऐसे अवसरों पर।’
तो यह कहानी है प्रतिभा कटियार की ‘मारीना’ की। जैसा पहले ही कहा कि इसमें प्रतिभा की ‘प्रतिभा’ प्रस्फुटित होकर सामने आई है। ऐसी कृति के लिए प्रतिभा को हार्दिक बधाई, दिली मुबारकबार वह शुभकामनांए। प्रतिभा की अगली किताब का बेसब्री से इंतजार रहेगा।





लखनऊ के दोस्तों से मिली मारीना



Pratibha Katiyar ने चर्चित रूसी रचनाकार
मारीना के जीवन और युग को दस साल में डिस्कवर किया है।हाल ही में संवाद प्रकाशन से प्रकाशित किताब #मारीना की रचना -प्रक्रिया को उन्होंने आज हम-सबसे शेयर किया।शिरोज हैंगाउट,गोमतीनगर,लखनऊ,में उनके साथ कथाकार किरण सिंह, कथाकार और कवयित्री उषा राय Usha Rai और नाटककार प्रदीप घोष Pradeep Ghosh के साथ मैं भी मौजूद था।
लगन, लगाव और जूनून के साथ मारीना और उसके समय को उन्होंने ऐसा उकेरा है कि मानो उनके हाथ में टाइम मशीन आ गई हो। इस किताब से मारीना की ज़िन्दगी हिन्दुस्तानियों के सामने साकार हो सकी है। दस साल तक प्रतिभा जी मारीना को अपने साँसों में महसूस करती रहीं।मारीना से प्यार और तकरार का दिलचस्प नज़ारा है यह किताब।

यूँ मिली मुझे मारीना


-Sunita Katoch


रूस की महान कवयित्री मारीना त्स्वेतायेवा के जीवन पर आधारित प्रतिभा कटियार की किताब मुझ तक वरयाम जी के माध्यम से पहुंची जिन्होंने मारीना की रूसी कविताओं का हिंदी में अनुवाद किया।।वरयाम जी ,उन सभी जगहों पर गए जहां मारीना ने अपने जीवन के क्षण गुज़ारे । हालांकि गैस रिसाव की किसी घटना के कारण हवाई सेवा बन्द होने पर वो फ्रांस नही जा पाए। मेरी फेसबुक मित्र प्रतिभा की किताब का इस तरह मुझ तक पहुंचना मेरे लिए सुखद और आश्चर्य का पल रहा। हालांकि मिलने से पहले मेरी और वरयाम जी के बीच किसी भी किताब को लेकर कोई चर्चा नही हुई। जब हम मिले मैंने उनसे पूछा आप मेरे लिए किताब लाए हैं क्या कोई। उन्होंने कहा हाँ - मेरे बैग में देखो। किताबें देखी तो मारीना उन्होंने कहा यह प्रतिभा की किताब है मैने कहा -हाँ वो मेरी फेसबुक फ्रेंड है और उनके आर्टिकल मैं पढ़ती रहती हूं और मारीना के कुछ अंश भी मैंने उनके पेज और वाल में पढ़े हैं। वो अत्यंत खुश हुए। यह एक सुखद संयोग था ।

Thursday, December 31, 2020

प्रस्तर मारीना- अनीता दुबे


कुछ जीवनियों को पढ़कर लगता है कि जैसे हम भी वहीं खड़े थे और दृश्य घटित हो रहे थे ।कभी लगता है कि जीवन किसी महान व्यक्ति का उतना सरल कभी नहीं हुआ। जो सफल दिखाई देते रहें हैं ।मारीना कवयित्री की कविताएँ चाहे जो कहती हो उसने भी स्त्री जीवन की हर मुश्किल का सामना किया । वो मुक्त हुई मगर सौगात ही देकर गई ।

उस कठिन समय की कवयित्री की जीवनी प्रतिभा तुमने बखूबी लिखा। मैं पढ़ते हुए कई बार बैचैन भी हुई ।
मगर तुमसे वादा था ।आज साल के आखिर दिन प्रस्तर से तुम्हारी मारीना ।
किसी जीवन को अपने लिए समझने के लिए "मारीना" को ज़रूर पढ़ा जाये ।

Friday, November 20, 2020

यूं मिलती हूँ मैं मारीना से- नीरा त्यागी

-नीरा त्यागी 
होली से एक दिन पहले, हिचकिचाती हुई पहली मंजिल के फ़्लैट में प्रवेश करती हूँ कमरे में किसी को न पाकर वापस दरवाजे पर लौटकर घंटी बजाती हूँ प्रतिभा किचन से निकलते हुए मेरा स्वागत करती है मैं आपके फोन का इंतज़ार कर रही थी. किचन से उड़ती खाने की महक भरे पेट में भूख जगा देती है. तभी हंसी के फव्वारों, होली के रंगो से सरोबर तूफ़ान (ख़्वाहिश और उसके दोस्त) ड्राइंगरूम पर कब्ज़ा कर लेते हैं. वो अपनी चहेती आंटी के साथ होली खेलते हैं फिर उन्हें दरी बिछा कर ज़मीन पर बैठाया जाता है ताकि उनके पेट उनकी फेवरेट आंटी के बनाये खाने पर धावा बोल सकें। बच्ची की छेड़छाड़, उनकी हंसी, खिखिलाहट, प्लेट में चम्मचों की खटपट और रसोई में चकला-बेलन की तालमेल ड्राइंगरूम में ही नहीं मेरे भीतर के सन्नाटों में भी संगीत भर देती है. खुश रहना तो सिर्फ बच्चों से ही सीखा जा सकता है. प्रतिभा दो चाय के प्याले लिए मेरे पास बैठी है और शुरू होता है हमारी बातों का सिलसिला. हम ड्राइंगरूम से शुरुआत करते हैं, फिर छत पर मसूरी के पहाड़ों की पहचान करते हुए, फागुन की गुनगुनी धूंप में नहाते हुए, अंगूर के दाने फांकते हुए, वापस ड्राइंगरूम में और फिर नीचे गलियारे में फ्लैटों का चक्कर लगाते हुए दोपहर से शाम के अँधेरे तक बात करते हैं। लौटने का समय आया और प्रतिभा ने कह कर टाल दिया कुछ घंटे और रात के अंधेरों में अकेले सफर करने से मुझे आज भी डर लगता है प्रतिभा का आग्रह और एक और प्याली साथ पीने का लालच मेरे डर को उलटे पाँव भगा देते हैं. बारी आती है मरीना को छूने की, हाथ में पकड़ने की, सूंघने की. दो प्रति थामे मैं भारी दिल से विदा लेती हूँ. घर लौट कर एक प्रति पापा को भेंट करती हुँ जिसे वह दो दिन में पढ़ कर समाप्त कर देते हैं वो ज्यादा शब्दों में कहने के आदी नहीं हैं वो सिर्फ इतना कहते हैं " बड़े रोचक और सुन्दर शब्दों से गढ़ी अलग किस्म की किताब है. इसे रचने में काफी मेहनत की गई है." मरीना की दूसरी प्रति मेरे साथ लम्बी यात्रा करती है.
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प्रतिभा की किताब मरीना कहने को जीवनी है पर पढ़कर ऐसा लगता है जैसे दो अलग-अलग युग में पैदा हुई औरतों की तपस्या की कहानी है. मरीना त्स्वेतायेवा जो एक संभ्रात परिवार में पैदा होकर, राजनैतिक उठापटक की वजह से कभी रूस के शहरों में, कभी बर्लिन, प्राग, पेरिस में भटकती है, तमाम उम्र अपने परिवार का पेट भरने और उनके लिए छत जुटाने के संघर्ष से झूझती रही. इस सब के बावजूद अपनी कलम के प्रति वफादार रही. दूसरी और इस युग की प्रतिभा है जिसकी तपस्या मरीना पर किताब लिखना था. लिखने के लिए पहले शोध, मरीना के बारे में मेटीरियल इकट्ठा करना, लोगों से मिलना, जेएनयू में रहना और फिर लिखना. यह एक साधना की तरह है जिसे प्रतिभा ने बखूबी निभाया है. प्रतिभा को मरीना की कविताओं की किताब अपने पिता के घर में बचपन में मिली और एक नन्ही बच्ची मरीना की तस्वीर और कविताओं पर मर मिटी. बरसों बाद प्रतिभा ने अपने पहले प्यार को इस किताब के रूप में अंजाम दिया. 

लेखिका ने मरीना की ज़िंदगी में आये परिचितों, दोस्तों, प्रेमियों को उसके द्वारा लिखे खतों के जरिये जाना है, किताब के हर कोने से हर उस स्त्री की वेदना और विवशता की अनुगूँज है जिन्हें आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक और पारिवारिक परिस्थितियां कविता लिखने से दूर करती हैं किस प्रकार मरीना असंभव हालात में भी कविता लिखने की भूख का पोषण करती नज़र आती है. यह किताब उन सभी औरतों के लिए पथ प्रदर्शक है जो अपनी कलात्मक अभिव्यक्ति के लिए छटपटाती रहती हैं क्योंकि माँ और पत्नी की जिम्मेदारियां, घर की सफाई, चौका-बर्तन, राशन जुटाने की जद्दोजहद, बच्चो की परवरिश में अपनी सारी ऊर्जा झोंकने के बाद अपनी कला के लिए ऊर्जा न जुटा पाने को अभिशप्त हैं. मरीना का चरित्र किताब में इस तरह उतर कर आता है कि वो बार- बार पाठक को याद दिलाता है किस प्रकार मरीना विपरीत परिस्थितियों में भी अपने कलात्मक रुझान के प्रति वफादार रही. मरीना ने जागते हुए लिखा, नींद में लिखा, दौड़ते-भागते लिखा, बग्घी में, ट्रेन में लिखा, कमरे में रखी मेज पर लिखा, रसोईघर में खाना बनाते हुए लिखा पीढ़े पर बैठ कर लिखा, उसने अपनी बेटी की मौत पर लिखा. मरीना ने कवितायें लिखी, लेख, संस्करण, डायरी और पत्र लिखे, उसने लोककाव्य, नाटक और बच्चो के लिए कहानियां लिखी. उसने प्रेम में और प्रेम की टूटन में लिखा. यह किताब मरीना के लिखने की ताकत का हर मुमकिन और नामुमकिन हालात में विजयी होने का जीता-जागता सबूत है.

अध्याय के बाद बुकमार्क है जिसमें लेखिका और मरीना के बीच छोटे-छोटे संवाद है यह संवाद देह और आत्मा के अंतर को समाप्त करता नज़र आता है वह दोनों मुखौटे उतार एक दूसरे के सामने होती हैं बात करती हैं प्रश्न पूछती हैं इकट्ठे चाय पीती हैं उन दोनों के बीच का संवाद पाठक को उस धरातल पर ले चलता है जहां मरीना कौन है और प्रतिभा कौन दोनों का अंतर समाप्त हो जाता है.

इस किताब को पढ़ने में जो सबसे ज्यादा आँखों में अटकते है वो हैं रूसी नाम, उस नाम से जुड़े चरित्र को याद रखना और चरित्र का मरीना से रिश्ते को याद रखना कठिन हो जाता है लेकिन फिर भी बहुत से परिचित नाम भी हैं जो मरीना की ज़िंदगी में आये, मरीना का रिल्के और गोर्की, से उसका पत्राचार रहा. मरीना पर लिखी किताब जीवनी होते हुए भी जीवनी नहीं है और अनुवाद होते हुए भी अनुवाद नहीं है यह जीवनी और अनुवाद दोनों से कुछ हटकर और कुछ बढ़कर है. लेखिका मरीना की ज़िंदगी की टोह उसके द्वारा लिखे गए खतों से लेती हैं जो मरीना ने अपने रिश्तेदारों और दोस्तों को लिखे. मरीना अपनी आर्थिक समस्याओं और मुश्किल हालात के प्रति काफी पारदर्शी थी यह उनके खतों से जाहिर है. मरीना के संघर्ष, उनकी गरीबी, बच्चों का पालन-पोषण और शिक्षा की कवायद, बेहरत जीवन और सुरक्षित छत की तलाश में एक देश से दूसरे देश में भटकने को प्रतिभा ने मरीना के खतों के मार्फ़त इस किताब में लिखा है. इसके अलावा लिखने के प्रति मरीना की जिजीविषा और तड़पन को प्रतिभा ने खुद जिया है तभी तो वह इस तड़प की नब्ज़ को पाठकों की अँगुलियों पर रख देती है.

Friday, October 9, 2020

लिखन बैठी जाकी छवि: कुछ भाव

- कंवलजीत कौर 

Hello Pratibha, 

मुझे चाव से मारीना की जीवनी पढ़ते देख कर हम्माद ने कहा इस पर कुछ लिख दो ,लिख दिया तो कहने लगे आप को भेज दूं सो भेज रही हूं अब आगे जैसा आप ठीक समझे , आपकी प्रतिक्रिया का इंतज़ार रहेगा । स्नेह और सम्मान के साथ -कंवल

1974 के एक टीवी इंटरव्यू में सोल्जेनितिसन ने मारीना को बीसवीं सदी के महान कवियों में शुमार किया है . मैंने मारीना को पहली बार पढ़ा और फ़िर देर तक अफ़सोस रहा कि अब तक क्यों न पढ़ा। डॉ . इंद्रजीत जी से प्रतिभा कटियार द्वारा लिखित मारीना की जीवनी उपहार में मिली यूँ ही पेज पलटा तो नज़र वहीं ठहर गई. लिखा था - " मेरे सामने समंदर है, मेरी आँखों में समंदर है , मैं दूर तक समंदर को देखती हूँ लेकिन महसूस करती हूँ कि नहीं ये मैं नहीं हूँ. समंदर की लहर हो जाना चाहती हूँ. क्यों यह संभव नहीं हो सकता ." 

थोड़ा और आगे बढ़ी तो लेखिका की स्वीकारोक्ति थी कि वह पापा के किताबों के खजाने से -'मारीना त्स्वेतायेवा : डायरी कुछ खत कुछ कविताएं ' कवर पर बनी मारीना की तस्वीर के आकर्षण में उसे अपनी फ्रॉक में छुपा कर ले आती हैं उस किताब का संग-साथ और आकर्षण ही उनकी इस किताब के सृजन का आधार बना .और जब मैंने जीवनी को पूरा पढ़ डाला तो यकीन हो गया कि लेखिका मारीना को अपना पहला प्यार क्यों मानती हैं.

हाँ, इस किताब को मैंने फ्रॉक में तो नहीं दिल में छुपा लिया. जिसे मैं निर्धन के धन की तरह धीरे-धीरे पलट-पलट कर पढ़ती और यूँ मारीना मेरे साथ मेरे घर में रहने लगी और गाहे-बगाहे मुझे निर्देशित भी करने लगी. लेखक की जीवनी पढ़ना यानी अपने अन्य प्रिय लेखकों के बारे में भी पढ़ना, उनको उनके लेखन के अतिरिक्त जानना -गोर्की , ब्लोक, रिल्के, पास्तरनाक , अख़्मातोव , मायकोवस्की, बूनिन. उन सब को एक ही पुस्तक की छत तले मिलना कितना अद्भुत है ! मारीना के जीवन को चार शब्दों में व्यक्त करना चाहूं तो वो शब्द , समंदर , प्रेम और कविता हैं. पर बचपन से ही उसमें मृत्यु के प्रति अदम्य आकर्षण का भाव है सम्भवतः इस का मुख्य कारण बचपन में ही माँ और सौतेले भाई की क्षय रोग से मृत्यु और पति का क्षय रोग से ग्रस्त होना था . वो अपने संस्मरणों में बार - बार मृत्यु की कल्पना करती है एक जगह वो लिखती हैं - " मैं चाहती हूँ की मुझे तारूसा के पुराने कब्रगाह में फूलों की झाड़ियों के नीचे दफनाया जाए ........ जहां सबसे मीठी स्ट्राबेरी फलती रहे ."
सुख के चरम पर ही वो मर जाना चाहती है ' गिव मी डेथ एट सेवेन्टीन ' में वो लिखती हैं -
आपने मुझे यादगार बचपन दिया
अब मैं चाहती हूँ मृत्यु
अपने सत्रहवें जन्मदिन पर .
कुछ और उदाहरण देखिये -
जीवन और मृत्यु की छुअन से जन्मी मेरी कविताएं
जो कब्रों में सोये हैं क्या वो सचमुच मर चुके हैं और जो कब्रों से बाहर हैं , क्या वो सचमुच जिन्दा हैं .
वो अपनी मृत्यु की कल्पना करती है और कहती है - मुझे अभी भी लगता है कि जब मैं मर रही हूँगी तो वह मेरे पास आएगा. (रिल्के)
मुझे ऐसा लग रहा है कि मैं मर रही हूँ . एक दिन मैं खत्म हो जाउंगी और कोई मुझे नहीं ढूंढेगा. न ढूंढ पायेगा .
हो सकता है कई बरसों बाद कोई बेहतर कल हो लेकिन तब मैं नहीं रहूंगी.
इस जगह पर मुझे महसूस होता है जैसे कि मैं हूँ या नहीं हूँ. और फिर 31अगस्त 1941 के एक पहर हुआ यूँ कि ज़िंदगी के एक-एक लम्हे के लिए लड़ने वाली , जीवन और कविता में गहरी आसक्ति रखने वाली, कविताएं जिसके लिए जीवन का एक उत्सव थीं वो मरीना जीवन की दुश्वारियों के आगे हताश हो घुटने टेक देती है स्वयं को सब चिंताओं से मुक्त कर आगे बढ़ स्वयं मृत्यु का वरण करती है , पर अपने वतन की मिटटी में दफ़न होने को दो गज ज़मीन भी नसीब नहीं होती किसी अनजान- अपरचित जगह में दफ़ना दी जाती है पर- 'तारूसा के कब्रगाह में नहीं जहां मीठी स्ट्राबेरी फलती हो ' बल्कि येलबुगा की किसी अनाम कब्रगाह मैं जिस के निशां उनकी बहन अनस्तासिया भी नहीं खोज पाई .


शब्दों की डोर से बंधी मारीना , शब्दों का जादू उसे छोटी उम्र में ही लुभाने लगा था उनकी बहन अनस्तासिया लिखती हैं -' उसके लिखे हुए को पढ़ना संगीत सुनने जैसा मालूम होता था .' जीवनी में एक पूरा युग धड़कता है. 
पढ़ी गई किताब कभी खत्म नहीं होती वो आपके व्यक्तित्व का एक हिस्सा बन जाती है जो कई बार कई और दरीचे खोल देती है. मारीना को इतिहास व साहित्य से प्रेम था . उसके कमरे की दीवारों पर नेपोलियन की तस्वीरें लगी होती थीं जिसे वो अपने सपनों में देखती थी वो नेपोलियन के प्रेम में थी इसीलिए उसे पेरिस लुभाता था . पुश्किन की ' टू द सी' कविता पढ़कर उनकी कविताओं के सम्मोहन में बंधी मारीना का समंदर से एक रिश्ता जुड़ गया गया जो ताउम्र बना रहा . जिसे चाहती पूरे मन से चाहती वो प्रेम के समंदर से लबालब भरी थी उसके जीवन में 7 - 8 बार प्रेम ने दस्तक दी अपने पूरे वेग और रचनात्मकता के साथ वो सफर निलेन्द्र , सेर्गेई, कवि आसिप मांदेलश्ताम , निकोदिम , सेर्गेई वोलकोस्की , रिल्के , पास्तरनाक. पर इन सब के बावजूद मारीना ने जीवन के अंतिम क्षण तक सबसे अधिक अपने पति को प्रेम किया . मारीना अपनी कविता मैं लिखती है -
चुनौती की तरह
स्वीकार की मैंने उसकी अंगूठी
मैं पत्नी हूँ उसकी
सदा - सदा के लिए
पर रिल्के और पास्तरनाक के प्रति उसके प्रेम और दीवानगी को क्या नाम दूँ जिनसे वो कभी मिली ही नहीं , एक अपरिभाषित सा ,प्लुटोनिक रिश्ता हाँ मृत्यु से पूर्व पास्तरनाक से एक मुलाकात का ज़िक्र मिलता है . रिल्के मारीना के पहले पत्र का कितना खूबसूरत जवाब देते हैं - " मारीना त्स्वेतायेवा .... क्या सचमुच तुम हो ? क्या तुम यहां नहीं हो ? अगर तुम यहां हो तो मैं कहाँ हूँ ? "

बक़ौल लेखिका मारीना अंत तक रिल्के के एक - एक शब्द से प्रेम करती रही . रिल्के की मृत्यु के बाद 1930 में उसने एक जगह रिल्के को लेकर लिखा है - ' मुझे अभी भी यही लगता है जब मैं मर रही हूँगी तो वह मेरे पास आएगा, वह मेरा अनुवाद करेगा .'
मारीना लम्बे लम्बे ख़त लिखा करती थी 1922 में उसने पास्तरनाक को लिखा - , संवाद करने के लिए मेरे पास दो ही तरीके हैं एक ख्वाब में बात करना और दूसरा ख़त लिखना और जिन लोगों से उसने सपने में मुलाकात की उनमें सबसे ख़ास थे पास्तरनाक . वह अपने बेटे मूर को बोरिस पास्तरनाक के सम्मान में बोरिस के नाम से बुलाना चाहती थी , पर पति ने मना कर दिया . पास्तरनाक के बारे में लिखते हुए कहती हैं - ' मुझे तुम्हारा हाथ चाहिए जिसे थाम कर मैं पूरी दुनिया को जी सकूँ .' उसके जीवन का एक दौर वह भी था जब उसका समस्त जीवन रिल्के और पास्तरनाक के इर्दगिर्द ही सिमट आया था. वो जब जिसके प्रेम में थी पूरी ईमानदारी से थी उनपर कभी पर्दादारी नहीं की उन पर लिखी कविताओं को जीवन और काव्य संग्राहों में शामिल किया .

मारीना की ज़िंदगी की स्लेट पर कोई सीधी रेखा थी ही नहीं सारा जीवन उतार चढ़ाव व संघर्ष से भरा रहा कविताओं की फ़ाख़्ता के पंख युद्ध, वर्षों पति का लापता होना, भूख, गरीबी, अभावों,अपनों को खो देने की असहनीय पीड़ा से झुलसते रहे पर कविता लेखन नहीं रुका वो प्राण पाती है उनसे न लिख पाने की पीड़ा उसे त्रस्त करती है . कई रातें, महीने उसने जागते काटे हैं अपनी पीड़ा को वह रिल्के को लिखे ख़त में साझा करती लिखती है - 'राइनेर, तुम्हें पता है, मैं सदियों से जाग रही हूँ . मानो नींद का और मेरा कोई रिश्ता ही न हो . बंद आँखों में भी जागती रहती हूँ. जाने क्यों लगता है राइनेर कि तुमसे मिलूंगी तो सदियों की नींद को ठिकाना मिलेगा . तुम्हारे कंधों पर अपन उम्र , अपना अकेलापन सब टिका दूंगी. तुम संभाल लोगे न सब , मेरे प्यारे राइनेर.बस मुझे वहीं सुला लेना .' इस पत्र का जवाब तो नहीं आता. पर ताबूत की आख़िरी कील सी रिल्के की मौत की ख़बर उस तक पहुंचती है इस दुःख से वह कभी उबर नहीं पाई .

मारीना एक समृद्ध और शिक्षित परिवार में जन्मी थी, पर फिर भी कैसा तक़लीफ़देह जीवन , निर्वासन , जगह - जगह भटकना, अनाथालय में छोटी बेटी की भूख से मृत्यु , खुद खाने को मोहताज़ ,फ़टे कपड़ों, नंगे पावों का बदहाल उनींदा सफ़र , एक भटकाव भरी दुखद जीवनयात्रा , उम्र भर एक सुरक्षित घर और छत की तलाश में भटकती रही . ये सब तब था जब सब मारीना के नाम और काम से परिचित थे , वह उस वक़्त के प्रतिष्ठित लोगों को जानती थी बहुत से दोस्तों ने सहायता भी की पर वो नाकाफ़ी थी . दूसरे विश्वयुद्ध में स्टालिन के दौर के असामान्य हालात में बरसों बाद मास्को लौटना भी उसकी दुश्वारियों को कम न कर सका ,ज़िंदगी ने हर कदम पर मारीना के कदमों और हौसलों की मजबूती नापी है 1939 में वह देश तो लौट आई पर ज़िंदगी को उस पर रहम नहीं आया इसी बीच मास्को को भी खाली करने के हालात पैदा होने पर वह एक और निर्वासन झेलने को अभिशप्त हो बेटे मूर के साथ येलबुगा पहुंचती है. भूख , गरीबी , संघर्ष और उस पर न लिख पाने की पीड़ा उसका हर कदम मानो मौत की तरफ़ बढ़ रहा था , उसकी खूबसूरत उदास आँखों में एक गहरे डर का भाव था ,अंत में हर पल अपने बेटे मूर का हाथ मजबूती से थामे रहने वाली मारीना ज़िंदगी का ही साथ छोड़ मौत के हाथों को थाम लेती है. मारीना का सारा जीवन खुली किताब सा है जो उसके उस दौर में लिखे गए लम्बे ख़तों , डायरी और कविताओं में झलकता है उसकी कविताएं मानो उसके जीवन का अक़्स हैं ।

ताज्जुब और फ़ख्र होता है लेखिका के हौसलों पर सच है प्यार की शिद्द्त जो न करवा दे, मारीना का बिखरा- उलझा जीवन जीवनी के रूप में हमारे सामने है जिसमें दोनों का एक रिश्ता सा बन जाता है पाठकों को हर अध्याय के अंत में आए बुकमार्क के पड़ाव का इंतज़ार सा रहता है जिसमें लेखिका और मारीना के बीच के सदियों के फ़ासले सिमट जाते हैं और अपनेपन का एक रिश्ता सा बन जाता है. हमारे सामने बीता वक़्त और मारीना की पूरी जीवन-यात्रा उभर आती है आरम्भ से अंत तक . मारीना का बचपन , युवावस्था , निर्वासन , मास्को वापसी से पुनः निर्वासन की पीड़ा येलबुगा की ओर , हताश जीवन के अंतिम लम्हे से मारीना के जीवन की मास्को में पुनर्स्थापना तक.
मारीना के जीवन को समेटने , उनकी कविताओं, गद्य , पत्रों के चयन में लेखिका की मेहनत स्पष्ट झलकती है सबको मानो एक सूत्र में पिरो दिया है . मारीना ने लम्बे ख़त और कविताएं लिखीं जिनको यहां लिखना सम्भव नहीं उसके लिए तो आपको जीवनी पढ़नी ही पड़ेगी . कविताओं और पत्रों की कुछ सतरें जो याद रहीं -
निंदा नहीं कर सकोगे तुम मेरी
होठों के लिए पानी है मेरा नाम .
जीवन और मृत्यु की छुअन से जन्मी मेरी कविताएं दरअसल मेरा न पढ़ा गया जीवन है .
मेरी कविताएं संभाल कर रखी गई सुरा की तरह हैं मैं जानती हूँ कि इनका भी वक़्त आएगा .
क्या करूं मैं अपने असीम का
सीमाओं के इस संसार में .
तुम्हारी आवाज़ किसी स्पर्श सी लगती है .
हर वह जगह, जहां इंसान को इंसान के तौर पर नहीं देखा जाता, वर्गों-नस्लों में बांट कर देखा जाता है, मेरे लिए उसका कोई महत्त्व नहीं है .
जीवन जिया मैंने
जीवन जिया मैंने
कहूंगी नहीं यह मरते हुए .
यह वक़्त है मखमली बिछावन छोड़ने का
यह वक़्त है नए शब्दों को ढूँढने का
यह वक्त है नए दियों को फूंकने का
जीवन से दूर निकल जाने का .
अंत में एक बात, एक प्रश्न, एक शंका मन में उठती है कि मारीना के एकाधिक प्रेम प्रसंगों पर उनके पति की क्या प्रतिक्रिया रही लेखिका इस पर ख़ामोश क्यों रहीं, जीवनी पढ़ते हुए जब ठहर कर सोचने लगते हैं तो महसूस होता है कि मारीना अपनी निजी अंतरंग संसार में इतनी खोई है कि उसका अपने समाज और परिवेश से कोई जैविक नाता ही नहीं बन पाता. समाज की विसंगतियों, लोगों से उनके रिश्तों की कोई स्पष्ट तस्वीर भी नहीं उभरती.
संवेदनशील कवियत्री अपने समय की हलचलों और सामाजिक परिस्थितियों से निरपेक्ष कैसे रह सकती है उसकी तकलीफ़ों ,परेशानियों ,अभावों ,काली रातों का ज़िक्र है पर जिस क्रांति ,विश्वयुद्ध की वजह से एकाधिक बार निर्वासन झेलना पड़ा इस पर एक संवेदनशील कवयित्री तटस्थ,निरपेक्ष, ख़ामोश कैसे रह सकती है !! ये पक्ष भी उजागर होता तो उन की ज़िंदगी की एक मुक़्क़मल तस्वीर और समग्र जीवनगाथा उभर कर सामने आती. अगर प्रतिभा कटियार की नज़र इस तरफ़ भी गई होती तो हमारे सामने मारीना की ज़िंदगी का एक ओझल हिस्सा भी उसी शिद्द्त से सामने आता जैसे वॉनगॉग, दोस्तोवस्की, मुक्तिबोध की कई जीवनियां हैं. किताब में मारीना के जीवन से संबंधित कुछ चित्र भी होते तो उसकी दस्तावेज़ी अहमियत में और इज़ाफ़ा हो जाता . प्रतिभा कटियार मुबारकबाद की हक़दार निःसंदेह है।

प्रतिभा की ‘मारीना’

नवीन जी मेरे पहले सम्पादक हैं. पहली नौकरी शुरू की नवीन जी के साथ भी और उन्हीं की वजह से. पत्रकारिता में मेरा आना भी उन्हीं की वजह से हुआ कि पत्रकारिता का चस्का जो लगा दिया उन्होंने. काम करने का सुख, हर रोज कुछ नया सीखने का सुख मिलने लगा था. सिविल सर्विस में जाने का सपना जो पापा का था धीरे-धीरे मेरे खुद के सपने में तब्दील होने लगा और मुझे पक्का यकीन हो गया कि यही काम मैं करना चाहती हूँ. इसी में मन लगता है. इसी से सामाजिक बदलाव की कोई राह भी खुले शायद. नवीन जी ने मेरी पहली किताब पर स्नेहासिक्त सा कुछ लिखा. उसे पढ़ते हुए मन 22 बरस पुरानी गलियों में विचरने लगा. यह भावुक पल है मेरे लिए. नवीन जी को पढ़ते हुए लिखना सीखने की कोशिश किया करते थे. जाहिर है उनके द्वारा लिखी यह टिप्पणी मेरे लिए किसी अनमोल खजाने से कम नहीं. थैंक यू सो मच सर. आपके पहाड़ों से आपको शुक्रिया भेज रही हूँ.- प्रतिभा 

- नवीन जोशी 
किताब तो जनवरी में दिल्ली के पुस्तक मेले से खरीद लाया था लेकिन तत्काल पढ़ना हो नहीं पाया। फिर अपना उपन्यास पूरा करने में लग गया। उससे मुक्त हुआ तो ‘मारीना’ प्रतीक्षा कर रही थी। प्रतिभा कटियार की किताब है और उसकी पहली ही है, इसलिए पढ़ना ही था। पुस्तक अच्छी होगी, यह उम्मीद प्रतिभा को जानने के कारण थी ही लेकिन ‘मारीना’ इतनी अच्छी निकली कि लगा जिस प्रतिभा को जानता था, वह उससे बहुत आगे निकल गई है। शाबाश, प्रतिभा।

वे 1996-98 के दिन थे। ‘स्वतंत्र भारत’ पत्रकारिता की अपनी सम्पन्न विरासत खो चुका था तो भी हम कुछ लोग उसकी स्मृतियां पकड़े हुए वहां अटके हुए थे। उन्हीं दिनों प्रतिभा कटियार नाम की लड़की कभी-कभार फीचर या लेख लेकर आती। प्रकाशन के साथ-साथ उसका आग्रह यह बताए जाने का होता था कि इसे और अच्छा कैसे बनाया जाए या और क्या अच्छा लिखा जा सकता है। उसकी लगन देखकर हमने उसे अपनी टीम में शामिल किया। क्रमश: विपन्न होते अखबार के एक दड़बे में फीचर की छोटी-सी टीम थी। अनुभवी विनोद श्रीवास्तव के अलावा हमारा ‘वीर बालक’ था- गज़लगो विवेक भटनागर। उसी में प्रतिभा भी शामिल हुई। उसके आगे-पीछे अनुजा शुक्ला आई। रचनात्मक ऊर्जा और सपनों से भरे युवा। प्रतिभा में सीखने और निरंतर अच्छा करने की ललक थी। कभी वह गुलजार का इंटरव्यू कर लाती, कभी जावेद अख्तर की शायरी पर लिखती। वह बड़ा आत्मीय और रचनात्मक साथ था। हम मिलकर अजब-गजब प्रयोग करते, कुछ बहुत अच्छे बन जाते कुछ हास्यास्पद। खाली समय में पहाड़ (मेरा प्रिय विषय) और समंदर और कविताओं की बातें होतीं। 


डेढ़-दो साल में हम अलग-अलग राहों पर चल पड़े। प्रतिभा नौकरियां बदलती रही लेकिन निरंतर सम्पर्क में रही। अपना लिखा पढ़ाती और पढ़ने को किताबें ले जाती (अब भी कुछ किताबें उसके पास होंगी) ‘हिंदुस्तान’ में भी उसने हमारे साथ कुछ समय काम किया। फिर ‘आई-नेक्स्ट’ के पेजों में उसकी मेहनत अक्सर दिखाई दे जाती। कुछ अलग-सा करती तो फोन पर बताना नहीं भूलती थी कि बताइए कैसा रहा और क्या कमी रही।

एक दिन उसने फोन किया कि ‘अज़ीम प्रेमजी फाउण्डेशन’ के लिए एप्लाई किया है और आपका नाम ‘संदर्भ व्यक्ति’ के रूप में दे दिया है। मुझे पता था, उसका चयन हो जाएगा। कुछ समय बाद देहरादून से उसका खिलखिलाता फोन आया था- ‘मैं आपके पहाड़ों पर पहुंच गई हूं।’ फिर अपनी पहाड़ यात्राओं के बारे बहुत खुश होकर बताती। कुछ वर्ष पहले देहरादून यात्रा में मैं उसके घर खाना भी खा आया लेकिन तब जान नहीं पाया था कि वह पहाड़ों से प्रेम करते-करते प्रेम के कितने समंदर पार कर गई है।

यह बताया ‘मारीना’ ने। प्रतिभा के ही शब्दों में ‘यह मारीना पर किताब लिखना नहीं है, खुद मारीना हो जाना है।‘ एक शताब्दी से अधिक समयांतर के बावजूद इस पुस्तक में यह कायांतरण, प्रतिभा से मारीना और मारीना से प्रतिभा की आवा-जाही अद्भुत रूप में है। यह प्रेम के पहाड़, रेगिस्तान और समंदर पार किए बिना सम्भव नहीं था। पिछले बीसेक साल में प्रतिभा की कहानियां और कविताएं पढ़ने को मिलती रहीं, जिनमें प्रेम के बहुतेरे शेड्स होते थे। प्रेम उसका प्रिय विषय रहा है। इस सृष्टि की प्रत्येक वस्तु से प्रेम और प्रेम से भी अपार प्रेम। उसकी फेसबुक पोस्टों से भी खुशबूदार प्रेम झरता है जैसे चीड़ वन में हवा में महकता है पराग।

मारीना त्स्वेतायेवा (1892-1941) रूस की ऐसी कवयित्री थी जिसने एक तूफानी और हर चीज के अतिरेक से भरा जीवन जीया। बाल्यकाल की अमीरी और किशोरावस्था से मृत्युपर्यंत दर-दर की ठोकरें, निर्वासन और भुखमरी के हालात तक जिन दो चीजों का दामन उसने नहीं छोड़ा वह थे लेखन और प्रेम। लेखन में मारीना ने कई प्रयोग किए जो सराहे भी गए और खारिज भी खूब किए गए। उसने जो जीया वही लिखा और कभी कोई समझौता नहीं किया। उसने खूब प्रेम किए, प्रेम पाया और उतनी ही उपेक्षा भी। उसके जीवनकाल में उसकी कविताओं का विशेष नोटिस नहीं लिया गया। रूस से निर्वासन (एक तरह से आत्मनिर्वासन) के लम्बे दौर में यूरोप में उसे कुछ समझा गया, कहीं-कहीं सराहना भी मिली लेकिन अधिकतर वह उपेक्षित ही रही। अपने अंतिम दिनों में उसकी रूस वापसी की दास्तान हृदय विदारक है। तो भी उसने कभी लिखना नहीं छोड़ा। छोटी बेटी मर रही थी तब भी, बड़ी बेटी मरणासन्न थी तब भी और फंदे पर लटकने का फैसला करके बेटे के लिए सुरक्षित भविष्य की कामना करते समय भी वह लिखती रही थी। मारीना को रूस में 1960 के बाद क्रमश: सराहना और मान्यता मिल पाई।

हिंदी में मारीना की यथा सम्भव प्रामाणिक कहानी लिखना इसलिए बहुत चुनौतीपूर्ण था क्योंकि उस पर जो भी सामग्री है वह रूसी में है या फ्रेंच और जर्मन में। अंग्रेजी में भी बहुत कम चीजें उपलब्ध हैं। बिना रूसी, फ्रेंच या जर्मन भाषाएं जाने मारीना की विश्वसनीय कथा कहने की चुनौती प्रतिभा ने स्वीकार की तो सिर्फ इसलिए कि किशोरावस्था में पिता की पुस्तकों के बीच मारीना के बारे में कुछ पढ़ कर वह उससे प्रेम कर बैठी थी। कहा जाता है न कि सच्चे प्रेम में भाषा की क्या बाधा! सो, प्रतिभा ने मारीना तक की यात्रा प्यार-मुहब्बत के सहारे तय की और उससे संवाद भी किए। यह कैसे सम्भव हुआ, यह किताब पढ़कर ही जाना जा सकता है। यह किताब मारीना की कविताओं के बारे में नहीं है, उसके जीवन के बारे में है लेकिन फिर मारीना का जीवन ही उसकी कविताएं हैं।
हिंदी में ‘मारीना’ का प्रकाशन बड़ी उपलब्धि है। अपनी टिप्पणी में डॉ वरयाम सिंह ने बिल्कुल सही लिखा है कि ‘यह शोध-ग्रंथ नहीं है, यह प्रेम है।’

यह पुस्तक पढ़ कर ही जान पाया कि वर्षों से प्रतिभा जो प्रेम-प्रेम जपती रही है, उस समर्पण एवं साधना का फल कितना संतोषदायक है। हिंदी के युवा लेखकों के लिए यह एक सीख भी है।

प्रतिभा से हम भविष्य में और बड़े कामों की उम्मीद पाल सकते हैं। उसके कविता संग्रह की भी प्रतीक्षा है।

Friday, October 2, 2020

क्या सचमुच लोग प्रेम को समझ पाते हैं- मारीना


कमल सिंह सुल्ताना- 

मारीना के जीवन से गुजरना ठीक ऐसा है जैसे निर्जीव और शांत वन में अचनाक कोई सतरंगी सुर छेड़ दे । किशोर चौधरी जी से इस पुस्तक के विषय मे ज्ञात हुआ लेकिन मिलने पर किशोर जी ने बताया कि वह ये पुस्तक किसी को मुझसे पहले दे चुके है ।लेकिन मुझे ऐसा बिल्कुल नहीं लगता कि मैंने मारीना को महसूसा नही है । चाहे किशोर जी के रिव्यू हो या आप के और देवयानी जी के मारीना के जीवन पर लाइव सेशन हो । मैंने मारीना को जिया है । मारीना के दुःख को महसूसा है ।मारीना के प्रेम को अनुभूत किया है । मारीना को सुनते वक़्त जो मुझसे बन पड़ा वो लिख दिया । हालांकि ये केवल सुनी- सुनाई बातों पर आधारित है पुस्तक को दुर्भाग्य से न पढ़ पाया हूँ अब तक । 

प्रतिभा से होकर गुजरता हूँ एक तस्वीर आंखों में ठहर जाती है । मन अगर झरने लगे तो मारीना की तस्वीर बना देता है । प्रतिभा की इस पुस्तक को हालांकि मैं पढ़ नही पाया हूँ लेकिन फिर भी मुझे लगता है की इसे मैंने अनुभूत किया है । मारीना के विषय मे बताते समय प्रतिभा संवेदित दिखती हैं । उनका प्रेम छलक पड़ता है ।कभी-कभी तो प्रतिभा और मारीना एकमेक हो जाती हैं।

ओ मेरे प्यारे देश रूस
मत शर्मिंदा हो
हमारे नंगे पैर देखकर
परियां हमेशा नंगे पैर ही होती हैं
बूट पहनकर तो राक्षस आते हैं
जो भी नंगे पैर नहीं है
वह असहनीय है.

उस समय की यह कविता जब रूस अपने सबसे विकट समय से गुजर रहा था । मारीना भी खुद को इससे विलग नहीं रख पाती ।मारीना कविताएँ जीते हुए लिखती है वे चाहती है कि कविता का हर एक शब्द स्वेद से सींचकर लिखा जा सके । गहरी आत्मानुभूति व भयावह मनःस्थिति के बीच का ये दौर रहा होगा जब मारीना ये कविता लिख रही होंगी । ये कविता मारीना की जिजीविषा व संघर्ष दर्शाती है । मारीना विचलित नहीं दिखती।किसी भी छोर से देखकर मारीना के देश प्रेम पर सवाल नहीं उठाए जा सकते । मास्को में जन्म लेकर जब वे निर्वासन की पीड़ा भोग रही थी या यूं कहे की वे कविताओं के निकट जा रही थी ठीक उसी दौर के दौरान । 

मारीना जीवन को आत्मीय मानती है वह जीवन के विषय मे अक्सर ही प्रसन्नचित और आभारी प्रतीत होती है । अपनी हर प्रतीति का वे बेहद सौम्य और मनहर वर्णन भी करती है । वे लिखती है कि 'जीवन में मुझे मुलाकातें अच्छी नहीं लगतीं. माथे टकरा जाते हैं. जैसे दो दीवारें. मुलाकातें मेहराब होनी चाहिए.'- मारीना

एक अन्य जगह वे लिखती है कि ' हर वो जगह, जहाँ इंसान को इंसान के तौर पर नहीं देखा जाता, वर्गों नस्लों में बाँट कर देखा जाता है. मेरे लिए उसका कोई महत्व नहीं है " - मारीना

मारीना का जीवन विषद अनुभूति का क्षेत्र है वो किसी दर्शन या साहित्य का क्षेत्र होने से कहीं पहले दुख व विषाद का साक्षात्कार है । मारीना के जीवनी में प्रतिभा लिखती है कि मारीना जब भुखमरी से अत्यंत क्षुब्ध थी । एक ऐसे समय से वह गुजर रही थी जब उसके पास उदर - पालन का भी सामर्थ्य नही था । वे कविताएँ नही त्यागती । वे अनवरत और अथक लिखती है । प्रतिभा बताती है कि मारीना की दशा इस कदर खराब थी कि वह अपनी दोनों पुत्रियों को इस आशा में अनाथ आश्रम छोड़ देती है कि कम से कम आश्रम में पर्याप्त भोजन तो प्राप्त होगा । लेकिन कुछ समय बाद मारीना अपनी एक पुत्री को स्वास्थ्य खराब होने से पुनः घर ले आती है किन्तु इसी बीच हृदय विदारक खबर मिलती हैं कि उसकी दूसरी पुत्री का निधन हो चुका है ।मारीना अपनी पुत्री के अंतिम संस्कार में भी सम्मिलित नहीं हो पाई क्योंकि उस समय उसकी दूसरी पुत्री तेज ज्वर से तप रही थी । 

तारों और गुलाबों की तरह
बड़ी होती जाती हैं कवितायें
सौन्दर्य की तरह वे होती हैं अवांछनीय
मुकुटों और प्रशस्तियों के बारे में
एक ही उत्तर है मेरे पास
कि मुझे क्योंकर मिलेंगे?
सोये होते हैं हम जब
अंगीठी के पास से
प्रकट होता है चार पंखुरियों वाला दिव्य अतिथि
ओ मेरी दुनिया, समझने की कोशिश कर
सपनों में अनावृत किये हैं गायक ने
तारों के नियम और सूत्र फूलों के
- 14 अगस्त1918

मारीना अपने पत्र व्यवहार में अक्सर खुल के बताती है वे लिखती हैं कि 'मैं अपनी भावनाओं के अंतिम छोर पर खड़ी हूं। न मुझे अब अंदर से कुछ महसूस होता है न बाहर से। अगर संक्षेप में कहूं तो मैं एक पुरानी घिस चुकी किसी स्वचालित मशीन के जैसी हो चुकी हूं। रोजमर्रा की जरूरतों की फेहरिस्त ने मेरे दिमाग को खत्म कर दिया है। मैं मेयुडन और विज्नोरी में एक आम गृहिणी की जिंदगी जी ही चुकी हूं। घर के सारे काम करना, अब भी वही कर रही हूं। घर के सारे काम जो मुझे आते हैं, मुझे नहीं आते हैं सब। जो मुझे एकदम पसंद नहीं। हर वक्त घर के कामों में, चिंताओं में उलझे रहना, सुबह से रात तक बस खटते रहना...मैं यह सब कर रही हूं। चाहते न चाहते...मेरे पास कोई विकल्प नहीं है। बस जो काम मैं नहीं कर पा रही हूं वो यह कि मैं हफतों कुछ लिख नहीं पाती हूं....लेकिन कौन इसे जरूरी काम समझता है...कौन...'
- मारीना त्स्वेतायेवा की डायरी, 1931


नितांत एकांत और आत्मीयता मारीना में इस कदर थी कि वह हर एक विषय के विषय मे गहरा चिंतन और स्वतः संवाद पसन्द करती थी । वह किसी भी तरह से मुलाकातों से बचने का प्रयास करती है । मारीना साहित्य के विषय मे लिखती है कि ''जो बहुत पढ़ चुका है, वह सुखी नहीं रह सकता. क्योंकि सुख हमेशा चेतना से बाहर रहता है, सुख केवल अज्ञानता है. मैं अकेली खो जाती हूं, केवल पुस्तकों में, पुस्तकों पर...लोगों की अपेक्षा पुस्तकों से बहुत कुछ मिला है. मैं विचारों में सब कुछ अनुभव कर चुकी हूं, सब कुछ ले चुकी हूं. मेरी कल्पना हमेशा आगे-आगे चलती है. मैं अनखिले फूलों को खिला देख सकती हूं. मैं भद्दे तरीके से सुकुमार वस्तुओं से पेश आती हूं और ऐसा मैं अपनी इच्छा से नहीं करती, किये बिना रह भी नहीं सकती. '
- मारीना की डायरी से


ओह मारीना! कितना नुकसान होता है
आसमान का टूटकर गिरे तारों से
हम भरपाई नहीं कर सकते उसकी
चाहे जहां दौड़ें उनमें बढ़ोत्तरी के लिए
जोड़ के किस तारे की तरफ जाएं
सभी की तो गिनती हो चुकी है पहले से ही
वह भी नहीं कर सकता भरपाई
जो गिराता है उस पवित्र तारे को...


- रिल्के द्वारा मारीना के लिए कविता
(इसी पुस्तक से, अनुवाद- मनोज पटेल)

मारीना प्रेम की कवयित्री है । वह प्रेम को जीवन - बंधन समझती है । मारीना प्रेम की व्याख्या करती है । प्रेम का स्पर्श करती है और प्रेम में ही जीवन व्यतीत करती है । किसी भी व्यक्ति से अंतरतम प्रेम उसके व्यवहार की खूबी है । वह बहुत जल्दी प्रेम में पड़ने वालो में से है । उसे कई - कई बार इससे क्षति होती है किंतु मारीना प्रेम नही छोड़ती है, वह उसे सतत रखती है ।

प्रतिभा की इस पुस्तक को जब देवयानी किसी लाइव सेशन में पढ़ती है तो वो रिल्के व मारीना के प्रेम - संबंधो पर खुलकर पत्र - वाचन करती हैं । दरअसल रिल्के जर्मनी के प्रतिष्ठित लेखक थे । ये संस्मरण कुछ यूं घटित होता है कि मारीना की किसी कविता से प्रभावित होकर मारीना का एक लेखक मित्र बोरिस जो कि खुद मारीना के प्रेम में था, रिल्के को पत्र लिखता है । ये वो पहला कदम था जो रिल्के और मारीना कि तरफ बढ़ा । बोरिस रिल्के को लिखते हैं कि " मारीना एक प्रतिभा सम्पन्न विदुषी ही नही अपितु एक संवेदनशील लेखिका भी है।आपको अपनी कविताओं की पुस्तक मारीना तक पहुंचानी चाहिए" इसमें वह मारीना का पता भी सलंग्न कर देता है। जब मारीना के पास रिल्के का पत्र उसकी किताब के साथ पहुंचता है तो मारीना बहुत खुश होती गई क्योंकि रिल्के उस समय के महत्वपूर्ण व्यक्ति थे। मारीना को तो यूं भी पत्र-व्यवहार का चाव था ही वो तत्काल ही रिल्के को पत्रोत्तर लिखती है । रिल्के मारीना से प्रभावित हो जाते है । रिल्के बहुत छोटे पत्र लिखते थे । वे किसी भी गम्भीर बात को अत्यंत सुगमता के साथ बहुत छोटे से शब्दों में परिभाषित करते थे । वे लिखते हैं कि "उम्मीद है कि तुम जीवन को समझना सीख रही हो ।" रिल्के के साथ मारीना का लंबा पत्राचार चला । इस दौरान रिल्के ने उसे बताया दिया था कि यदि वह किसी व्यस्तता के चलते किसी पत्र का जवाब समय पर न दे पाए तो इसे अतिरिक्त न लिया जाए । ये कहना मारीना के लिए सन्तुष्टि के द्वार खोलने जैसा था । मारीना को रिल्के के आने के बाद और कविता के विषयों पर लंबे पत्राचारों के बाद स्वयं की कविता से सन्तुष्टि सी होती थी । वो महसूसती थी कि उसकी कविताओं में अब सुधार आ रहा है । मारीना जहां लंबे पत्रों को पसंद करती थी वहीं रिल्के शब्दों को संयम से बरतते थे । 

रिल्के मारीना से प्रभावित होकर एक पत्र में लिखते हैं कि -: 

" मारीना त्स्वेतायेवा । क्या तुम सचमुच हो?क्या तुम यहाँ नहीं हो ? अगर तुम यहाँ हो तो मैं कहाँ हूँ?"
- रिल्के, 10 मई

ये वे शब्द थे जो मारीना को रिल्के के निकट खींचते है । वो इन्हें बार-बार पढ़ती है । रिल्के के मन मे झांकने का प्रयास करती है । मन ही मन प्रसन्न होती है । रिल्के के अनुमान लगाती है । इनके कुछ समय बाद तक मारीना रिल्के को नियमित पत्र लिखती थी किन्तु उनका मिलना एक बार भी नही हो पाया था । मारीना ने एक पत्र में रिल्के से कहा कि अगली सर्दियों में हमे मिलना चाहिए । किन्तु उस पत्र का उसे उतर ही नही मिला । वो बार बार चौखट को निहारती । पोस्टमेन को आंखे खोझती । लेकिन कहीं से कुछ पता नही चला । मारीना बोरिस को पत्र लिखती है वह कहती है कि न जाने क्यो आजकल रिल्के मेरे पत्रों का जवाब नही देते। कहीं से खबर भी आई थी रिल्के अब नही रहे । वो मृत्यु के अमर-पथ पर चले गए है। किंतु यह पत्र बोरिस तक ना पहुँच सका। मारीना अत्यंत विषाद से घिर गई । मारीना ने रिल्के से प्रेम किया किन्तु कभी उनसे मिल न सकी । न जाने कितने बिंब उसकी कविताओं में रिल्के का आभास करवाते है किन्तु रिल्के सिर्फ रिल्के ही है । 

एक पत्र में वे लिखती है कि, ''मेरे सामने समन्दर है...मेरी आँखों में समन्दर है...मैं दूर तक समन्दर को देखती हूँ...लेकिन महसूस करती हूँ कि नहीं ये मैं नहीं हूँ...मेरी आंसुओं से भरी आँखों को खूबसूरत फूल दिखते हैं, जो अभी खिले नहीं हैं. मैं खुद को लहरों में पिरो देना चाहती हूँ. समन्दर की लहर हो जाना चाहती हूँ. क्यों यह संभव नहीं हो सकता. ''

''मैं जानबूझकर अनखिले फूलों को छूती हूँ. लहरों को महसूस करती हूँ. चिड़ियों से बातें करती हूँ. मैं अपने ख्यालों को जानबूझकर दूर कहीं ले जाती हूँ. लेकिन एक दुःख है जो लगातार मेरा हाथ थामे रहता है. एक दुःख जो लगातार मुझे भीतर से भिगोता रहता है. मैं खुश होने की कितनी भी कोशिश करूँ. क्या इसका अर्थ यह है कि मैं कभी खुश नहीं हो सकती...'''

''एक बूंद एकांत को तरस रही हूं. कितना मुश्किल है यह. बहुत बुरा लग रहा है. अजीब-अजीब से ख्याल आ रहे हैं. एक मामूली से व्यंग्य लिखने वाले को या स्तंभकार को भी (जो संभवत: अपने लिखे को दोबारा पढ़ता तक नहीं के पास भी) लिख पाने का समय और सहूलियतें हैं. और मेरे पास यह एकदम नहीं. दो मिनट तक की खामोशी भी नहीं. हर समय लोगों से घिरी हुई हूं.''

''जीवन जैसा है, वह मुझे पसंद नहीं. मेरे लिए वह कुछ अर्थ रखना तभी शुरू करता है, जब वह कला या साहित्य में रूपान्तरित होता है. इसके बिना जीवन का कोई महत्व नहीं. अगर मुझे कोई सागर के किनारे ले जाये, या फिर स्वर्ग में ही क्यों न ले जाए और लिखने की मनाही कर दे तो मैं दोनों को अस्वीकार कर दूंगी. मेरे लिए इन चीजों का कोई महत्व नहीं है.'' 

''बहुत सारे लोग हैं, चेहरे हैं, मुलाकातें हैं. लेकिन सभी सतही. कोई भी व्यक्ति प्रभाव नहीं छोड़ता. सब चेहरे एक-दूसरे से टकराते हैं. शोर-शराबे के बीच, लोगों की भीड़ के बीच एकदम अकेली हूं. जीना एकदम अच्छा नहीं लग रहा है.'' 

मारीना के ये पत्र मारीना की संवेदना के हस्ताक्षर है । मारीना कहती है कि जीवन मे उसे सिर्फ दो ही चीजें सुहाती है । जिनमे वे अपने जीवन का दर्शन पाती है । पहली चीज है ख्वाब और दूसरी है लंबे- लंबे पत्र लिखना । मारीना को लिखना हमेशा से ही सुहाता रहा है । मारीना जीवन- पर्यंत लेखन से जुड़ी रही । मारीना ने अपने जीवन भयावह व्याधि व निर्वासन के दिनों में भी लिखना नही छोड़ा । मारीना अपने समकालीन लेखकों से पत्राचार करती ही रही । ये पत्राचार साहित्य की अक्षय पूंजी के रूप में विद्यमान है । बरहलाल मारीना के जीवन की कल्पना लेखन के अतिरिक्त नही की जा सकती । मारीना को पढ़ते वक्त लगेगा कि कोई बहुत प्यासा आदमी है जिसे कुंआ मिल गया हो । मारीना की सांस लेखन से ही चलती रही ।

पढ़िये मारीना का यह बेहद खास पत्र, 'क्या लोग सचमुच प्रेम को समझ पाते हैं?''

''यह मेरा उदास बसंत है. पेड़ों से जब पत्ते झरते हैं, तो लगता है कि मेरा मन भी झर रहा है. तो क्या किसी नई शुरुआत के लिए ऐसा हो रहा है. क्योंकि पेड़ों पर तो नई कोपलें फूट रही हैं. काश ऐसा सच होता है तो मैं इस उदास बसंत का स्वागत बाहें पसार कर करती. हालांकि अब भी, जबकि मैं जानती हूं कि उम्मीद की कोई कोपल फिलहाल नहीं फूटने वाली है, मुझे बसंत से कोई शिकायत नहीं है. मैं अब भी इसे प्यार करती हूं. ''

''कल मास्को से एक मेहमान आये थे. उनसे पता चला कि बोरीस पास्तेनार्क ने अपनी पत्नी से तलाक ले लिया है क्योंकि वह किसी दूसरे से प्रेम करने लगे हैं. मैं बोरीस के लिए दुखी हूं. मुझे उसके लिए डर लग रहा है. इन दिनों कवियों, लेखकों में यह बीमारी कुछ ज्यादा ही देखने में आ रही है. एक पूरी सूची तैयार की जा सकती है जिसमें बड़े-बड़े नाम शामिल होंगे.''
 

''क्या ये लोग सचमुच प्रेम को समझ पाते हैं? मुझे तो यह किसी नई मुसीबत को न्योता देने जैसा लगता है. जितना मैं बोरीस को जानती हूं, वो सुखी नहीं रहेगा. उसकी नई पत्नी बहुत सुंदर है. बोरीस उसकी सुंदरता की आग में जलता रहेगा. जबकि उसे शांति चाहिए. वो खुद को समझ ही नहीं पा रहा है. प्रेम का अर्थ संतप्त होना नहीं होता जबकि उसके लिए इसका यही अर्थ है.'' 

''1926 की गरमियों के वे दिन मुझे अब तक याद हैं. मेरी अंत की कविता पढ़कर वो कदर मेरा दीवाना हो गया था. किस कदर बेचैन था पास आने को. मैंने कितनी मुश्किल से उसे समझाया था कि मैं अपनी जिंदगी में इतनी बड़ी मुसीबत को न्योता नहीं दे सकती. मैं जानती हूं कि प्रेम और विवाह व्यक्तित्व को ध्वस्त कर देते हैं. लेकिन मैंने उसकी भावनाओं का अनादर नहीं किया. न जाने क्यों मन में यह विश्वास था कि कभी मैं उससे जरूर मिलूंगी. सोचती थी कि अपने जीवन के सबसे मुश्किल वक्त में मैं बोरीस के पास जाऊंगी. शायद अंतिम सांस लेने के लिए. उसकी भावनाओं की आंच मुझे रोशन करती रही है. लेकिन अब ऐसी कोई उम्मीद भी नहीं बची है.''

''कितना अजीब लग रहा है कि जो भावनाएं कभी मेरे लिए थीं, वही अब दूसरे के लिए हैं. पुरुष के लिए उन क्षणों में जब वह प्रेम करता है, प्रेम ही सब कुछ होता है. शायद इसीलिए वो उतनी ही आसानी से उससे मुक्त भी हो लेता है. संतप्ति और विरक्ति...मुझे गलत मत समझना. मुझे बोरीस से ईर्ष्या नहीं हो रही है. नाराजगी भी नहीं है. कोई तीव्र पीड़ा भी नहीं है. बस एक खालीपन है....मन के सारे पत्ते झर रहे हैं...''

(20 मार्च 1931 को अन्ना अन्तोवना को पेरिस से लिखे पत्र का एक हिस्सा...)

मारीना के इस पत्र में प्रेम की सूक्ष्म व्याख्या है ।मारीना अपने जीवन मे प्रेम को हमेशा ही बंधन मानती रही । मारीना जानती थी कि बोरिस उसके प्रेम में है किंतु वह इस बात का भी ध्यान रखती है कि रिल्के से उसका प्रेम भी बोरिस की देन है । यह भी जानती थी कि बोरिस ही वह पुल है जिससे कि वह रिल्के तक पहुंची है । रिल्के और मारीना का प्रेम अद्भुत रहा । वे कभी प्रत्यक्ष मिल नहीं पाए । केवल पत्र व्यवहार चला ।

दरअसल ये मारीना का व्यक्तित्व ही था कि वह उम्र भर प्रेम की खोज में रही । जीवन के विकट दौर के में जब मारीना ने प्रेम विवाह के पश्चात भी आने समय के दो सबसे प्रतिष्ठित लेखकों से प्रेम किया ।जिनमें एक थे रिल्के और दूसरे थे बोरिस पास्तरनाक। इस प्रेम के अलग-अलग रूप थे जिसमें ईमानदारी थी। वह दोनों को ही पत्र लिखती है। बोरिस के संवाद यदि हम देखें तो हम पाएंगे कि बोरिस भी मारीना से प्रेम में था । रूसी साहित्य का यह त्रिकोणीय प्रेम अद्भुत है जिसमें बोरिस लिखते हैं कि, ''प्रिय मारीना,आज में तुमसे वह कहना चाहता हूँ जिसे मैं लम्बे समय से अपने भीतर छुपाया हूँ,उन शब्दो को तुम्हे सौंपना चाहता हूँ जिनकी आग में मैं न जाने कब से झुलस रहा हूँ, मारीना तुम्हारे ख्याल का मेरे आस-पास होना मुझे क्या से क्या बना देता है ।तुम नही जानती मैं तुम्हारे पास होना चाहता हूं।तुम्हारे साथ रहना चाहता हूँ हमेशा के लिए ।तुम निशंकोच होकर मुझे अपनी भावनाओं के बारे में बताना क्योंकि मैं तुम्हारे कारणों को समझने की योग्यता रखता हूँ । निकट भविष्य में तुमसे मिलने की इच्छा रखता हूँ ।जब तुम कहो, जहां तुम कहो ।
तुम्हारा
बोरिस पास्तरनाक"
30 अप्रैल 1926

बोरिस एक अन्य पत्र मई में लिखते हैं कि, "यह तुमने क्या किया,क्यो किया और कैसे कर पाई तुम।कल रिल्के से मिले पत्र ने मुझे तुम्हारे और इनके के मध्य में सब कुछ बता दिया है ।मैं इस बात कि कल्पना भी नहीं कर सकता कि तुम्हारी जैसी प्यारी खूबसूरत दिल रखने वाली स्त्री जिसका जन्म समय के बाद मुहब्बत का राग आने के लिये हुआ है वह कैसे ऐसा बेसुरा राग छेड़ सकी मुझे नहीं पता ।अपनी जिंदगी में मैंने इससे पहले कब इतना गुस्सा और दुख एक साथ महसूस किया था । " बोरिस ने उसी दिन एक और पत्र लिखा कि "मैं इस बारे में रिल्के को कुछ भी नहीं लिख रहा हूं मारीना क्योंकि मैं उन्हें भी तुमसे कम प्रेम नहीं करता तुम यह सब क्यो न देख पाए मारीना मेरे दो प्रिय लोगों को तुमने मुझसे छीन लिया ।"

बोरिस के ये पत्र मारीना से प्रेम को दर्शाते हैं किंतु मारीना जब एक साथ दो प्रेम जी रही थी तो ऐसे समय में वह किसी एक को भी खोना नहीं चाहती थी। "सुनो रिल्के ! ना जाने मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि मैं बहुत बुरी हूँ बहुत ही बुरी पिछले दिनों की लंबी खामोशी मेरी इसी अहसास के चलते थी।बोरिस पास्तरनाक को लगता है कि मैंने तुम्हें पपत्र लिखकर और उससे करीबी का अहसास पाकर उसे कोई धोखा दिया है ।राइनेर मैं सचमुच बुरी हूँ मैंने उसका दिल दुखाया है और पिछले पत्र मैं तुमसे इस बात का जिक्र भी नही किया ।असल में मैं जब तुमसे बात करती हूँ तो मैं तुम्हे और खुद को एक एकांतिक माहौल में रखना चाहती हूं। जहां हमे किसी और का कोई ख्याल कोई और बात जो भी न सके लेकिन यह तो ठीक नहीं है । राइनेर तुम्हारे और मेरे बीच सब कुछ पानी की तरफ साफ होने चाहिए इसलिए तुम्हे आज ये पत्र लिख रही हूँ । मैं अपनी जिंदगी में झूठ के लिए कोई जगह नही रखना चाहती हालांकि मेरे हिस्से बहुतों के झूठ है फिर भी रिश्तों की ईमानदारी और सच्चाई पर विश्वास रखती हूं ।उम्मीद है तुम अपनी मारीना को समझ सकोगे ।
तुम्हारी
मारीना

मारीना की ये दुखांतिका अविश्वसनीय  है । मारीना सम्पूर्ण जीवन झूठ से दूर रही । वो मुक्त कंठ से इस सच्चाई को स्वीकारती भी है ।

(एक दूर देश में बैठे पाठक ने मारीना को तलाशा और कुछ लिख भेजा. यह आत्मीय टिप्पणी है जिसे मारीना से स्नेह हो गया. पाठकों तक मारीना को ले जाना ही इस किताब का उद्देश्य था. कमल जी का शुक्रिया )