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Wednesday, August 21, 2024

मीठे में कविता- जिक्रे यार चले


'रोज़ डिनर के बाद मीठे में कविता का एक टुकड़ा...अच्छा आइडिया है।'

ज़िंदगी की आपाधापियों में जब सुकून की एक लंबी सांस की दरकार होती है तब मीठे के एक टुकड़े की तरह, सूखे मन पर संतूर पर बजते शिव कुमार शर्मा के 'वॉकिंग इन द रेन' की तरह, तेज़ धूप में अमलतास के गुच्छे के आगे हथेलियाँ बिछा देने की तरह, जाते हुए प्रेमी की पीठ पर 'फिर आऊँगा' का भ्रम पढ़ते हुए, रात भर की जाग से आँखों के नीचे आए स्याह घेरों में इंतज़ार की ओस के फाहे रखने की तरह है 'जिक्रे यार चले' को पलटना। 

कभी भी, कहीं से भी। इसे पढ़ते हुए महसूस होता है मानो हवा ने चेहरे को छू लिया हो। 

ये प्यार के किस्से हैं, लव नोट्स। इन्हें एक बार में नहीं पढ़ रही, धीरे-धीरे साँसों में घुलने दे रही हूँ। इन्हें पढ़ते हुए जाने क्या-क्या खुलता है, बिखरता है। ये लड़की कौन है आखिर जो मूमल गाती है, वो लड़का कौन है जो सामने मुस्कुराता है और चुपके से रोता है। कहाँ हैं ये दोनों? यहीं आसपास। थोड़ा-थोड़ा हम में ही। हमसे ही बिछड़ गया हमारा कोई हिस्सा, कोई किस्सा इन लव नोट्स में धड़क रहा है। 

प्यार की बात होती है तो जाने क्यों लगता है प्यार के बहाने इस दुनिया को खूबसूरत बनाने की बात हो रही है। इस दुनिया में हर किसी को रोटी और रोजगार के बाद सबसे ज्यादा जरूरत प्यार की ही तो है। वो जो इश्क़ का किस्सा ज़िंदगी की किनारी से रगड़ता हुआ गुज़र गया उसे बिसरा क्यों दिया दोस्त, उसमें ही तो ज़िंदगी थी। 

कोई बात नहीं, पल्लवी ने वो तमाम किस्से सहेज लिए हैं, सहेज ली है एक बात की किसी का आना, चले जाना, वापस न आना, उदास होना इन सबसे भी कहीं आगे की बात है प्यार...कि वो बस होता है और एक खुशबू मुसलसल बिखरती रहती है। 

'ये जिस गुलमोहर के नीचे हम बैठे हैं न, उसके जन्मदिन पर मैंने उसे तोहफे में दिया था और हम दोनों ने इसे यहाँ रोपा था। मैं जानती हूँ वह भी कभी इस शहर में आता होगा तो कुछ पल इसके नीचे जरूर बैठता होगा...'अब कहो कि स्मृतियाँ सांस नहीं लेतीं... 

प्रिय पल्लवी, ये लिखते मेरे रोएँ खड़े हैं और आँखें नम हैं कि तुमने ये सुंदर किस्से हमें दिये। आओ न गले लग जाते हैं, चाय तो श्रुति ही बनाएगी...है न?