Monday, August 10, 2026

मसूरी घुमक्कड़ी : इस बारिश में


उदास आँखों को उस रोज़ धुंध से भरी एक सड़क पर रख दिया था। वही सड़क जिसे दूर से टुकुर-टुकुर देखा करती थी। वही सड़क जो अक्सर ख़्वाबों में आती थी और हाथ पकड़कर उठाकर ले जाती थी।

आखिर एक रोज़ धुंध से भरी उस सड़क पर पाँव रख दिये। ख़्वाब में दिखने वाली सड़क पर जब हक़ीक़त में पाँव रखे तो जैसे दिल के सीले कोनों को तनिक रोशनी मिली हो।

उम्र का कुछ न कहिए ये न जाने कितने परतों में रूप बदल बदल कर रहती है। अचानक से मैंने खुद को किसी नन्ही बच्ची में तब्दील होते देखा, फिर कुछ देर में एक किशोरी वय में पर असल उम्र वाली मैं तो असल में कहीं नहीं थी। या शायद यही असल है कि जो जीवन हमसे जीने से छूट जाता है, वह फिर फिर लौटकर आता जरूर है। जैसे मुझसे बिना जिये बचपन छूट गया, जवानी भी छूट गई और अब इस अधेड़ सी उम्र में वह सारा कुछ क़रीब आकर बैठ जाता है।

सोचती हूँ, हमें इन गिरहों से आज़ाद कौन करता है, हम खुद ही तो।

उस रोज़ भी ऐसे ही एक बैकपैक लिया, जूते के तस्मे कसे और धुंध भरी सड़क का सदका उतारने चल पड़ी। हथेलियों में कोई प्लान नहीं था बस वीकेंड की छोटी सी फुर्सत थी । सामने दिखती पहाड़ों की रानी मसूरी और ढेर सारे डर, ट्रैफिक जाम में अटक जाने के, लैंडस्लाइड होने के और सबसे बड़ा डर मसूरी की आपाधापी में, भीड़ में खोने का। 14 बरस हो गए देहरादून में रहते, न जाने कितनी ही बार गई भी हूँ लेकिन मालरोड की भीड़ में खोई खोई मसूरी न मुझसे मिली, न मैं उससे मिल पाई।

पहाड़ों का असल सुख बारिशों में है, लेकिन खतरे भी हैं। तो इस बार जोखिम लिया। जोख़िम से याद आया, ज़िंदगी के सब सुख इस जोख़िम का दरवाजा खटखटाने के बाद ही हिस्से आए हैं। 2011 का अगस्त ही तो था जब ज़ीरो आत्मविश्वास और ढेर सारी डिप्रेशन की दवाइयों की पोटली लिए देहरादून आई थी। बिना घर पर किसी को बताए कितने ही चक्कर मसूरी के लगाये। कभी यूं भी हुआ कि चाय पीने निकले और मसूरी जाकर चाय पी। तब मसूरी पर पर्यटकों का इतना दबाव नहीं था। यहाँ आने पर कितनी बार ऐसा भी होता किघास की किनारियों पर अटकी बूंदें सूरज की किरणों को गला लगाए बैठी होतीं और अपनी ऊष्मा जड़ित बूंदों से अप्रतिम आभा बिखेर रही होतीं थीं। और मैं अपलक देखती जाती। ऐसे मासूम से दृश्य ज़ेहन अपने रंगों और ख़ुशबू समेत बसते हैं, देखिये न 2011 की उस स्मृति की ख़ुशबू कैसी बिखरी हुई है।

ओह, भटक जाने की ये आदत भी न, मैं तो जोख़िम की बात कर रही थी न। तो शुभचिंतकों की तमाम सलाहों को बैकपैक की बाहर वाले हिस्से में संभाल के रखा और चल पड़ी।

देहरादून से मसूरी मात्र एक घंटे की दूरी पर है, पहुँचने की कोई जल्दी नहीं थी क्योंकि इस बार रास्तों से ही मिलना था मंज़िल का ऐसा था कि वो कहीं भी हो सकती थी, जहां मन कहे रुक जाओ, वहीं रुककर मंज़िल बना लें । मसूरी जाना है या लैंडोर यह भी तो तय नहीं था, तय था तो बस इतना कि रास्ते में उड़ते बादलों से रुक-रुक कर गपियाना है। बारिश होते हुए भी देखना है और बारिश के बाद रूई से उड़ते बादलों को पलकों पर सहेजना भी है।


सुबह की चाय के लिए पहुंचे झड़ीपानी फॉल वाले रास्ते पर मिलने वाले नर्सरी कैफे में। खूबसूरत सी नर्सरी के बीच में बैठने के सुंदर ठिकाने थे। कैफे अभी अंगड़ाई ही ले रहा था। बढ़िया बन मक्खन और चाय से दिन की शुरूआत हुई। जाने क्यों मन में यह वहम सा है कि अगर सुबह की पहली चाय अच्छी और सुकून से पीने को मिल जाये तो दिन का अच्छा शगुन होता है। सो शगुन तो हो गया था।

इन दिनों ‘मुसाफिर कैफे’ के चलते झड़ीपनी कैसल की भी काफी हाइप हो गई है तो सोचा जरा दर्शन करते चलते हैं। लेकिन इतराये शरमाये मियां कैसल अपने रौब में थे, किसी की इंट्री नहीं, सिर्फ रहने वालों के लिए। सोचा, चलो देख लेते हैं, ठीक लगा तो एक रात यहीं सही। सुंदर तो है यह जगह कोई शक नहीं लेकिन उफ़्फ़ कीमतें...हमने मुस्कुराकर टाटा किया और 19th सेंचुरी कैफे का रुख किया। यह एक खूबसूरत ठीहा है। बारिश हो रही थी इसलिए इनका आउटडोर बंद था और यही मेरे लिए ईनाम था। कुछ देर में बारिश रुकी और बादलों ने हमला ही बोल दिया। जैसे कह रहे हों, लो कितने बादल चाहिए तुम्हें। मैंने हँसकर कहा, बहुत सारे...और बादलों का गुच्छा मेरे सर से होकर गुज़र गया। मेघालय की याद ताज़ा हो गई।

ऐसा सुंदर एहसास कि खुद को खुद की ही ख़बर न रहे।

बादलों से गुफ़्तगू का दौर चलता रहा, चलता रहा...दूर से मसूरी को देख मुस्कुरा कर कहा, आ रही हूँ, जरा ठहरो तो सही।

पहाड़ों की रानी से मिलना :

हाथों की लकीरों में कुछ नहीं रखा। उन्हें तो न जाने कितनी नदियों, झरनों और समंदरों में एक एक कर गिरा आई हूँ। अब जो हथेलियों में दिखती हैं वो बस उन बहाई जा चुकी लकीरों की परछाईंया हैं। उस रोज बरसते मौसम में जब हथेलियों को बूंदों के आगे किया तो मन के भीतर कोई ख़ुशबू सी दाखिल हुई। यह कुछ नया उगने की आहट थी। क्या मेरी हथेलियों में कोई नई लकीर उग रही है, मैंने ध्यान से देखा, वहाँ कुछ भी नहीं था, बरसती बूंदों में एक बूंद और जा मिली, पलकों में अटकी बदलियों की रिहाई का वक़्त था शायद।

‘ओ मसूरी, तुम तो इतने करीब थी फिर भी इतनी देर क्यों लगाई गले से लगाने में।’ मैंने गिरती हुई बारिश की लड़ियों से लाड़ लड़ाते हुए पूछा। उसने मुस्कुरा कर जवाब दिया, ‘मैंने तो तुम्हें कई बरस पहले ही गले लगा लिया था, याद करो...बस तुम्हें स्पर्श के उस लम्स को महसूस करने में इतना वक़्त लग गया।’

मैं चुप की गलियों में गुम चुकी थी। सच ही तो है, मेरे सबसे गाढ़े मुश्किल वक़्त में कितनी बार सर पर हाथ फिराया तो था मसूरी ने, बस मैं ही समझी नहीं। शायद टूरिस्ट की भीड़, लंबे-लंबे ट्रैफिक जाम और रास्ते में होने वाले लैंड स्लाइड के चलते मैंने एक दूरी बना ली थी।
 
दिल चाहा मसूरी को आगे बढ़कर गले लगा लूँ।

बहरहाल, हम दोनों गले मिले। मैंने पूछा, ‘चाय पियोगी?’ अपनी बौछार मुंह पर फेंकते हुए उसने कहा ‘हाँ जरूर।’ बाल्कनी में बैठकर चाय पीते हुए देह पर सुकून और आलस को फिसलते महसूस किया। नींद की चादर ओढ़ी और नरम बिस्तर में लुढ़क गई।

नींद खुली तो वादियों में बादलों की मटरगश्ती चल रही थी। धुंध से कोई मीठी सी धुन उठ रही थी और मैं निर्मल वर्मा को याद करके मुस्कुरा दी। शहर की तमाम हलचल से दूर हमारे इस ठिकाने पर सिर्फ चिड़ियों की आवाज़ें सुनाई देती थीं, या पत्तों के सरसराने की। खुद का सिरा गुमाकर आई एक लड़की के लिए यह सब ऐसा था जैसे किसी की मेरे लिए मांगी गई कोई दुआ कुबूल हो गई हो।

शाम की चाय के बाद एक लंबी सैर के लिए निकली तो बारिश के बाद वाले मौसम की खुनक तारी थी। हरे के इतने शेड्स बिखरे पड़े थे कि कुदरत के चित्रकार के सजदे में झुकने को जी चाहा। पहाड़ियाँ जंगली फूलों से खिली हुई थीं। अपनी बालकनी में खिले एक छोटे से फूल को देखकर चिहुँकने वाले हम लोग कितने गरीब हैं कुदरत के इन नज़रों के सामने।

जगह-जगह उगी फर्न की पत्तियाँ पत्तियाँ अपने हुनर में माहिर थीं। पेड़ों पर झूमती जंगली लताएँ, उनके तनों पर उगे फर्न जैसे पेड़ों को सजाने की जादूगरी सीखी हो। कई जगहों पर तो काई भी ऐसे उगी थी मानो कह रही हो, जो हिस्सा रह जायेगा उसे मैं सजाऊँगी, दीवारें हों, रास्ते हों या पेड़। शॉल को देह पर कसते हुए मैंने सोचा ऐसे ही मौसम को तो कहते हैं न मौसम का गुलाबी होना। भला हुआ किसी राजनीति से नहीं जुड़ा यह गुलाबी। वैसे कुछ भी हो हरे की दीवानी मैं आज गुलाबी ही पहनकर घूमने निकली थी। मौसम का जादू मेरे बालों में अटके बिना कैसे रहता।

जिस जगह जाने से हमेशा डरती हूँ, वह है माल रोड। कारण है भीड़। लेकिन आज इस बिना योजना वाली छोटी सी ट्रिप का सिरा मेरे हाथ में था ही नहीं और मैंने कुछ ही देर में खुद को माल रोड पर चलते हुए पाया। सिर्फ एक चाय पीने की इच्छा लिए हम माल रोड पर लंबी वॉक पर चलते गए चलते गए।

चाय की प्यालियों में खुशगवारी की मिठास काफी थी।

बादलों में मानो कोई होड़ थी एक-दूसरे से आगे निकलने की । मंत्रमुग्ध सी मैं उनके खेल को देख रही थी। जिस मसूरी को देहरादून से दूर से देखती रहती हूँ आज वहीं से देहरादून को जगमग करते हुए देख रही थी। कुदरत के इश्क़ का इत्र चारों तरह बिखरा पड़ा था।

यह रात कभी न बीतने वाली रात में तब्दील हो चुकी थी। याद की अंगूठी में जड़े चमचमाते नगीने सी रात। हम चलते, सांस लेते, बैठते, फिर गहरी सांस लेते फिर चलते। इस रात को घूंट घूंट पी रहे थे। रात की इतराहट देखते ही बन रही थी। हम चाय से पहले वॉक करते, चाय के बाद करते, वॉक के बाद चाय पीते और फिर वॉक करते। डिनर से पहले वॉक फिर डिनर के बाद वॉक। असल में ये सारी वॉक और कुछ नहीं थीं ये थी रात के जादू को समेटने का लालच। जब वॉक करते हुए थक गए तो बालकनी से मसूरी को ताकने लगी, फिर अपने कमरे से घाटी में चल रहे जादुई खेल को देखती रही। रात और नींद का रिश्ता टूट चुका था। नींद का इंतज़ार भी नहीं था।

जाग के इस खेल में मसूरी लगातार जीत रही थी और उसकी जीत पर मैं खिलखिला रही थी। पगली, जानती ही नहीं मैं उससे जीतने नहीं, हारने ही तो आई हूँ। इस बीच देर रात या सुबह शायद थोड़ी सी नींद आई। वादी में बादल किसी अकड़ू बच्चे से पीछे हाथ बांधे टहल रहे थे। कभी धूप का कोई कतरा दिखता जिसे बादल झट से ढँक लेता। बारिश आस पास थी लेकिन अभी आई नहीं थी।

सुबह की चाय के साथ निर्मल वर्मा और मैं मुस्कुरा रहे थे। ‘हर बारिश में’ उनकी किताब हाथ में थी। न जाने कितनी बार की पढ़ी हुई किताब। सामने बारिश का इंतज़ार था और हाथ में बारिश थी।एक पोस्टबॉक्स ने अपने आसपास तमाम फूल खिला लिए थे। वो गाढ़े लाल रंग का पोस्टबॉक्स फूलों के साये में कितने सारे संदेशों को सहेजे होगा, या उन यादों को सहेजे होगा शायद जब लोग चिट्ठियाँ लिखते थे, अपनी बातें लिखकर भेजा करते थे।
 खुद को समेटकर चलने का समय हो चला था। समान पैक करने में सबसे पहले मैंने हरा समेटा, फिर समेटा इस हरे से उगा गुलाबी। फिर मैंने समेटा अपना वो बिना जिया बचपन जो ऐसे मौकों पर निकल भागता है। फिर समेटीं एक किशोर युवती की डरी सहमी आँखें जिन्होंने डर से कभी ख्वाब नहीं देखे। चलते-चलते मेरी हथेलियों को मौसम की एक शोख डाल ने थाम लिया था, मानो पूछ रही हो, ‘फिर कब आओगी?’ मैंने अपनी पलकों में अटकी बदलियों को आज़ाद करते हुए कहा, ‘अरे जरा सा तो दूर है देहरादून, कभी भी आ जाऊँगी।’ जबकि जानती हूँ मुझे आने में पूरे पंद्रह बरस का समय लगा है। चलते वक़्त की विदाई का नेग देने हमेशा की तरह बारिश आ चुकी थी...

गुलाम अली साहब सुर लगा चुके थे, ‘दिल के लुटने का सबब, पूछो न सबके सामने...’ बादलों से भरी सड़क में हम गुम होने लगे थे।

Thursday, July 30, 2026

सो काफ़िर बे पीर...


- दिनेश कर्नाटक 
कबिरा सोई पीर है, जो जाने पर पीर।
जो पर पीर ना जानई, सो काफिर बे पीर।

(कबीर कहते हैं, जो दूसरे की पीड़ा को समझ सके, वही साधु- संत है, जो न समझ सके वह धर्म तथा हृदय हीन है।)
 
कबीर के दोहे की पंक्तियों से ही प्रतिभा कटियार ने अपने उपन्यास का नाम 'कबिरा सोई पीर है' रखा है, जो लोकभारती पेपरबैक्स से वर्ष 2025 में प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास में जातिवाद के नाम पर भेदभाव, अपमान, उत्पीड़न की वह पीड़ा है जो सब जगह व्याप्त है, मगर दिखाई नहीं देती। उपन्यास को पढ़ते हुए दिमाग में उत्तराखंड में पिछले दिनों पौड़ी में हुई केतन की हत्या, चंपावत में ड्राइवर के गले में जूते चप्पल की माला पहनाकर घुमाने तथा मेरठ का वह प्रसंग भी आंखों के सामने आता है, जहां रोड पर प्रदर्शन कर रहे लोगों से आगबबूला हुए एसपी साहब कैदी वैन के अंदर जाकर प्रदर्शनकारी को पीटने लगते हैं।

हम प्रायः लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि अब कहां होता है भेदभाव, अब तो सब ठीक है, मगर उसी समाज में हम, 'इन्हें तो बहुत सिर पर चढ़ा दिया गया है', आरक्षण पर गालियां तथा दुर्व्यवहार के अनेक रूप देखते सुनते रहते हैं।
उपन्यास के केंद्र में तृप्ति है जिसके पिता, भाई व बहन अपने-अपने जीवन में भेदभाव व उत्पीड़न झेलते रहते हैं। तृप्ति धैर्य व संयम से इन सब स्थितियों का सामना करते हुए कामयाब होकर सम्मान अर्जित करने का इरादा रखती है। उसे अनुभव और कनिका जैसे दोस्त मिलते हैं जो उसे हौंसला देते हैं।

उत्पीड़न का रूप जातिवाद ही नहीं है। सीमा और कनिका को स्त्री होने की वजह से दोहरी तरह का भेदभाव झेलना पड़ता है। अनुभव एक उदार और लोकतांत्रिक नौजवान है जो जातिवाद और भेदभाव के परे चीजों को देखता है, लेकिन पुरुषोचित अहं तथा सामाजिक ताने-बाने में वह बहुत आगे नहीं जा पाता। इस अंधेरे को तोड़ने की उम्मीद पैदा करते तृप्ति और अनुभव आखिरकार उसी का शिकार हो जाते हैं।

यह उपन्यास बाहर से बेहद शांत, शालीन और उदार दिखने वाले हमारे सामाजिक ताने-बाने के भीतर छिपे हुए सामंती तथा जातिवादी चेहरे को उजागर करता है। इस महत्वपूर्ण विषय पर लिखने के लिए प्रतिभा जी को बहुत-बहुत बधाई !

Thursday, July 23, 2026

इतनी नफरत, इतनी हिंसा

इतनी नफ़रत
इतनी नफ़रत
इतनी नफ़रत
आखिरी कितनी नफ़रत?

इससे नफ़रत 
उससे नफ़रत 
उससे नफ़रत 
आखिर किस किससे नफ़रत?

इतनी हिंसा 
इतनी हिंसा 
इतनी हिंसा 
आखिर कितनी हिंसा?

Thursday, July 9, 2026

यह खुशरंग दिनों की बात है

शिलॉन्ग से सोहरा की यात्रा शुरू हो चुकी थी। उत्साह, खुशी और गहरी शांति का हाथ थामे हम माँ बेटी निकल पड़े थे। यूं हम जानते तो थे कि सफ़र सुहाना होने वाला है लेकिन असल मजा उस जाने हुए के पार जाने का है। यात्राओं की सबसे सुंदर बात लगती है कि हमेशा कोई न कोई चौंकाने वाला मंजर यात्राओं के पास होता है। हमारे तमाम जाने हुए से, सोचे हुए से अलग कुछ अनोखा। जैसे कोई बंद मुट्ठी हो, जिसके खुलने का इंतज़ार हो। 

रात अच्छी गहरी नींद सो चुकने के बाद का यह ताज़ा दिन कमाल होने वाला था। और हम पूरी तरह से तैयार थे इस दिन को जी लेने के लिए। जैसे-जैसे हम सोहरा यानि चेरापूंजी की ओर बढ़ रहे थे, मौसम बदल रहा था। वही मौसम जिससे मिलने की बेकरारी थी। मन कुलांचे मार रहा था। बाहर का मौसम मन के मौसम की ओर हाथ बढ़ा रहा था। हम एक गहरी चुप में धँसे हुए मौसमों की कारस्तानी देख रहे थे। शिलॉन्ग से सोहरा की दूरी सिर्फ 55 किमी है। टैक्सी से यह दूरी 2 घंटे के अनुमानित समय में आराम से पूरी हो जाती है जिसमें बीच में आने वाले खूबसूरत रास्तों का आनंद लेने के लिए रुकना भी शामिल करें तो ज्यादा से ज्यादा 3 घंटे। 

असल में यह रास्ता इतना ज्यादा खूबसूरत है कि हर थोड़ी देर बाद लगता है कि यहाँ रुकना चाहिए, यहीं रुके रहना चाहिए। ऊंची विस्तृत पहाड़ियों के बीच खूबसूरत हरियाली और पर मँडराते बादल, जैसे दिल की धड़कनों की रफ्तार भी मध्ध्म हो जाए। कैब ड्राइवर अब्दुल भाई को अंदाजा है कि पर्यटक कैसे बावरे हो जाते हैं यहाँ इसलिए वो खुद ही बीच बीच में कैब रोक रहे थे। सच कह रही हूँ कितने ही वीडियो देखे हों, यात्रा वृतांत पढे हों लेकिन जहां होने का सुख है वहाँ होने का ही सुख है। और यह सुख न कभी शब्दों में ढल सकता है और न ही कैमरे में कैद हो सकता है। हम सिर्फ कोशिश करते हैं वर्तमान के लम्हों को भविष्य की स्मृतियों के लिए सहेजने की। सिर्फ एक बचकानी सी कोशिश। लेकिन यह बात जीकर जानी है कि बटोरना तो असल में जीवन ही है। 

क्या आप पानी लिख सकते हैं, इस तरह कि उसे पढ़कर प्यास बुझे। शायद दुनिया भर के लेखक इसी कोशिश में हैं, इसी साधना में कि एक रोज वो इस तरह पानी लिखना सीख पाएंगे कि उसे पढ़कर पढ़ने वालों की प्यास बुझेगी। इस तरह रोटी लिख पाएंगे कि पढ़ने वालों की उसे पढ़कर भूख मिटेगी। लेकिन यह कल्पना की बातें हैं। रोटी की भूख रोटी के बारे में पढ़कर नहीं, रोटी खाकर ही मिट सकती है। ठीक वैसे ही यात्रा का सुख यात्रा करके ही जाना जा सकता है। सवाल मन में यह भी आता है कि फिर मैं क्यों लिख रही हूँ आखिर। लेकिन जवाब मुझे अच्छे से पता है, यह लिखते हुए मैं उसे जिये हुए को फिर से जी रही हूँ। यह सब मेरे लिए ही, सिर्फ मेरे लिए। कि मैं कैसे लिख पाऊँगी उन बादलों के बारे में जो अब हमारी टैक्सी में आकर हमारे बीच बैठ गए थे, मंडरा रहे थे हमारे ऊपर, हथेलियों में, बालों में, पलकों में। सड़क लगभग दिखनी बंद हो चुकी थी और हम बादलों पर ही चल रहे थे। 

शायद बादलों के इसी खेल को देखने के लिए हमने यह मौसम चुना यहाँ आने का। न सही टूरिस्ट स्पॉट देख पाने का सुख मुझे ये बादलों के खेल देखने से कब फुर्सत। हमने बीच में कुछ जगहों पर रुककर तस्वीरें लीं और यह सोचकर हंस ही दिये कि यह जानते हुए भी हम दस परसेंट भी तसवीरों में नहीं उतार पाएंगे कोशिश करते रहते हैं। एक ब्रेक में हमने भुट्टा और पाइनएप्पल लिए। यह शायद पहाड़ों पर खाने का रिवाज है या कोई और बात यहाँ भुट्टे के स्वाद का अलग ही मजा होता है। 

बिना किसी जल्दबाज़ी के धीरे-धीरे चलते हुए हम आखिर सोहरा पहुँच गए। यहाँ चेरापूंजी के नाम का कोई बोर्ड नहीं है, हर जगह सोहरा है। इसके बारे में कहते हैं कि पहले इस जगह का नाम सोहरा ही था फिर अंग्रेजों ने इसका नाम चेरापूंजी किया, क्यों किया ये तो वही जानें लेकिन फिलहाल मेघालय सरकार ने इसे सोहरा ही घोषित कर दिया है। एक तो ये शहरों के नाम बदलने की राजनीति यह बात क्यों नहीं समझती कि यह बात कितनों की भावनाओं के साथ जुड़ी हुई है। 

खैर, बादलों वाले रास्ते से लगभग उड़ते हुए हम अपने गंतव्य पर पहुँच चुके थे। एक छोटे से गाँव में एक प्यारा सा होमस्टे था हमारा ठीहा। यह होमस्टे कुछ महिलाएं ही चलाती हैं। माँ और बेटी मुख्य तौर पर। यहाँ या तो कपल, सिंगल औरतें लड़कियां या परिवार ही रुक सकते हैं। सिंगल लड़कों या लड़कों के ग्रुप के लिए यह नहीं है। बहरहाल, प्यारी सी मुस्कुराहट के साथ हमारा स्वागत किया गया। कमरा बेहद प्यार से और सलीके से सजाया गया था। बादलों में छुपा हुआ वह घर और उस घर के एक हिस्से में हम। हमने पर्दे हटाये खिड़कियाँ खोलीं और बादलों को कमरे में आने दिया। बादल भी इसी इंतज़ार में थे शायद। जरा सी देर में कमरा बादलों से भर गया। बिटिया मेरी चाय के इंतजाम में लगी थीं और मैं बादलों के संग गुफ्तगू में। 

संग बने रहिए...बादलों का यह खेल तो अभी बस शुरू ही हुआ है। 

(जारी....) 

Friday, July 3, 2026

I love Shilong


ये शिलांग की सुबह है। इस सुबह में बीते दिन की पूरी धमक है, बीती शाम की सरगोशियां हैं, चमक है। सुबह की सैर पर निकली तो चलती ही गई, मानो शिलांग को अपने कदमों से भी जीना चाहती हूँ। किसी भी शहर की सुबह में उसकी रात की कहानी का पता होता है। बस उस पते का पता पूछने वाले कम ही होते हैं। अपने चलते हुए कदमों और दृश्यों में छुपी शहर की बतकही से मुख़ातिब थी। वही चाय का उठता धुआँ, कुछ घूमने निकले जोड़े, कुछ परिवार, कुछ ब्लॉगर कैमरे की क्लिक्स का महासागर।

कुछ लोग I love Shilong के सामने फोटो खिंचा रहे थे। एक प्रेमी जोड़े की तस्वीर उसके इसरार पर मैंने भी खींची। तभी चिप्स के पैकेट को वहीं फेंककर आगे बढ़ गए अंकल जी अपनी बीवी को डांटते हुए उधर से जाने लगे। ये अभी I Love Shilong के साथ फोटो खिंचवा रहे थे। मैंने अपना माथा पीट लिया। गुस्से से उन्हें घूरना चाहा लेकिन वो अपनी बीवी को किसी बात पर डांटने में व्यस्त थे। पास खड़ी की सोलह सत्रह साल की लड़की ने मेरे चेहरे के भाव पढ़ लिए थे शायद। वो मुझे देखकर मुस्कुराई और उसने खुद जाकर वह पैकेट उठा लिया।

कुछ दूरी आज के दिन के अख़बार के ढेर और कुछ अख़बार खरीदते और खबरों की दुनिया पर गुफ्तगू करते लोग दिखे। अख़बार पर बात करने वालों में ज़्यादातर स्थानीय लोग ही थे और इनमें महिलाएं एक भी नहीं थीं। महिलाएं कब और कहाँ कहाँ नहीं होतीं हैं, इसकी वजह पर नहीं जाऊँगी क्योंकि अगर गई तो बात जरा लंबी ही जाएगी। खैर, अख़बारों के पहले पेज पर जंतर मंतर की और अभिजीत दीपिके की तस्वीरें थीं।

शहर का कुछ पता नहीं था, किसी से पूछना भी नहीं था, गूगल से भी नहीं, तो जिधर भीड़ कम लगे और हरियाली ज्यादा दिखे उधर चल पड़ी। कुछ चर्च, कुछ लाइब्रेरी रास्ते में पड़ते गए। सड़कों की सफाई बराबर हो रही थी। सफाई कर्मचारी रात के निशान सड़कों से मिटा रहे थे। उन्हें अगले दिन के लिए तैयार कर रहे थे। तभी सड़क पर एक पिता और पुत्र पर नज़र पड़ी। पिता सड़क पर झाड़ू लगा रहा था, कूड़ा उठा रहा था और उसका छोटा सा बच्चा शायद डेढ़ या दो साल का होगा, कूड़ा उठाने के लिए थर्माकोल के डिब्बे में प्लास्टिक की खाली बोतल को फंसाकर बनाए गए कूड़ा इकट्ठा करने वाले डब्बे को खेल गाड़ी बनाकर खेलता दिखा। वह बहुत खुश था। खेलगाड़ी को खींचता, उसे गोल गोल घुमाता, उसमें कोई कूड़ा उठाकर रख देता फिर भागने लगता। उस बच्चे की मुस्कुराहट में यह सुबह डूब चुकी है।

फिलहाल मेरी हथेलियों में ख़ुशी का यह सिक्का है। इसे मैं कभी खर्च नहीं करूंगी। दुआ करूंगी कि दुनिया के सारे बच्चे यूं ही खुश हों, लेकिन कूड़ा बीनते हुए नहीं, स्कूल जाते हुए, पढ़ते हुए, खेलते हुए और इस लगभग बर्बाद हो चुकी दुनिया को थोड़ा बेहतर बनाते हुए।

सुबह की सैर में शहर का जो चेहरा दिखा वो रात के चेहरे से फर्क था कई मायनों में। रात में जिस मौज मस्ती की रवानगी थी सुबह में एक पुरसुकून ठहराव था। मैं इन सबहों की तलाश में ही तो निकली हूँ, इस पुरसुकून ठहराव की तलाश में। अपने चेहरे को आसमान की ओर करके लंबी गहरी सांस लेते हुए शहर को जज़्ब करने की कोशिश की। बारिश न जाने कहाँ थी कहाँ नहीं लेकिन ठीक उस वक़्त मेरे गालों पर एक बूंद टप्प से टपकी। कुदरत के ये करिश्मे मुझे बिखेर देते हैं। मैं उस लम्हे में वहीं बिखर गयी थी। वापस लौटते समय याद आया चाय तो पी ही नहीं, हालांकि कई जगह चाय बनती देखी थी शायद इच्छा नहीं रही थी। कमरे पर आकर कुछ देर पड़ी रही।
भीतर एक उत्साह था, आज हम चेरापूंजी जाने वाले हैं जिसे सोहरा भी कहा जाता है। एक गाना याद आया और एक लंबी शरारत भरी मुस्कुराहट चेहरे पर तैर गई, 'आज उनसे पहली मुलाक़ात होगी, फिर आमने सामने बात होगी...'

इसी गमक के साथ हम चेरापूंजी के लिए रवाना हुए। मौसम सुहाना था और सफर का इससे अच्छा सामना क्या होगा कि आपके साथ अच्छा मौसम चल पड़े और और अच्छा और अच्छा होता जाय। हम बादलों की गोद में समाने को बेताब थे....
(जारी...)