Friday, October 16, 2026

नदी चली थी समन्दर से मिलने

कभी ख़्वाबों के पास जाती हूँ। कभी ख़्वाबों के क़रीब आने का इंतज़ार करती हूँ। कभी यूं भी होता है कि किसी और काम की धुन में जा रही होती हूँ और अचानक कोई अनजाना, अनदेखा सा ख़्वाब टकरा जाता है। उसे  देख अचकचाती  हूँ। विस्मय से पूछती हूँ, 'तुम कौन? क्या तुम राह भटक गए हो?' वो मुस्कुराकर, सर पर हाथ फिराते हुए बोलता है 'अरी पगली,  राह नहीं भटका, तेरा ही ख़्वाब हूँ। उन तमाम ख़्वाबों में से एक जिन्हें देखने से डरती ही रही तुम। आओ न, चलो, मेरे साथ।' ना-नुकुर करती हूँ लेकिन कोई सम्मोहन खींचता है।  

'भरोसे' पर से भरोसा इस कदर उठ चुका है कि खुद की साँसों पर यक़ीन नहीं आता। अपने कदमों की चाल को शक़ की निगाह से देखती हूँ। अगर पल भर को खुश होती हूँ तो नायकीनी आँखों से बह निकलती हैं। पिछले दिनों ऐसे ही एक अजनबी ख़्वाब ने हाथ बढ़ाया तो देर तक उसका चेहरा ताकती रही और आख़िर इन्कार न कर सकी। पलकें झपकाते हुए पीछे पीछे चल पड़ी । 

समन्दर से अजीब सा रिश्ता है। प्यार भी बहुत है और उदास करने वाली यादें भी कम नहीं। पहली बार समन्दर के करीब जाते हुए जिन्दगी से दूर निकलने जाने वाली मनःस्थिति थी। वो दौर बीते ज़माना हुआ। तबसे न जाने कितनी बार कितने समन्दर मिले लेकिन गोवा का समन्दर हर बार वह उदास मनःस्थिति की याद ज़रूर दिलाता है। 

मुझे याद है मेरी ट्रैवल की लिस्ट में से मैंने गोवा को लाल पेन से काट रखा है। लेकिन वो ज़िन्दगी ही क्या जो आपके सोचे हुए को उलट-पुलट करके न रख दे। सामने एक बार फिर गोवा की पुकार थी। जिसे मैं बार-बार उपेक्षित कर रही थी। इस बार गोवा अलग भेष धरकर पुकार रहा था। प्लान था क्रूज से मुंबई से गोवा जाने का। दो दिन, दो रात क्रूज पर ही रहना था। असल में गोवा इस ट्रैवल प्लान में सिर्फ पूंछ की तरह था सिर्फ इसलिए कि वापसी की फ्लाइट गोवा से पकड़नी थी। और क्रूज से यात्रा का सम्मोहन आकर्षित कर रहा था। कुछ विस्मय, कुछ उधेड़बुन कुछ असमंजस के बीच मेरी गर्दन 'हाँ' में हिल ही गई। 

क्या मैं खुश थी? नहीं जानती। थोड़ी परेशान जरूर थी। जाने कैसा होगा, क्या होगा। एक्साइटमेंट से ज्यादा दुविधा थी। इधर दोस्त ट्रैवल के प्लान फाइनल कर रहे थे, उधर मेरे मन की दशा अनमनी ही थी। एक कारण मोशन सिकनेस का भी था। मैंने इसके पहले क्रूज का एक छोटा सफर किया था अंडमान की यात्रा के दौरान और तब मुझे थोड़ी दिक्कत हुई थी। तो सारा फोकस इस पर था कि कहीं मैं सबका प्लान न खराब कर दूँ? 

रात में समन्दर की लहरें सपने में उछाल मारतीं और दिन में सी सिकनेस से बचने के उपाय खोजती फिरती। सी सिकनेस का खयाल मरीना से भी तो जुड़ता है। पुश्किन की कविता 'टू द सी' की याद। मारीना का समन्दर से प्यार और उसके पहले प्यार का समन्दर के किनारे मिलने का किस्सा। मारीना की माँ की सी सिकनेस के चलते बिगड़ती तबीयत। यह सब दिमाग के ओवरथिंकिंग वाले डब्बे में कबड्डी खेल रहा था। इसमें से सिर्फ मरीना और सेर्गेई का समन्दर के किनारे मिलने वाला किस्सा ही उत्साहित कर रहा था। ऐसा नहीं कि मुझे अपनी ज़िन्दगी में किसी सेर्गेई की तलाश है बस कि वो रूमानी खयाल गुदगुदाता रहता है। 16 बरस की मारीना समंदर के किनारे सीपियों को अपनी स्कर्ट में जमा करती हुई...उछलती कूदती। दूर से उस अल्हड़ राजकुमारी को देखता सेर्गेई। वो पहली नज़र का इश्क़। वो कच्ची उमर के प्यार की ख़ुशबू जैसे दुनिया भर के सारे समन्दर के किनारे अब तक बिखरी हो। जब भी कोई प्रेमी जोड़ा एक-दूसरे का हाथ थामे समन्दर के किनारे टहलते देखती हूँ, तो डूबते सूरज की अलौकिकता की लौ भी मध्ध्म पड़ने लगती है। 

हालांकि रीलों  के तूफानों ने उस शांत एहसास को, उन रेत पर छूटते कदमों को थोड़ा धूमिल तो किया है, फिर भी हमेशा कुछ कदमों के निशान मिल ही जाते हैं जो कहते हैं, प्यार इस धरती से कभी खत्म नहीं होगा। सचमुच प्रेमियों ने इस भटकती, बिखरती दुनिया को तनिक संभाल न रखा होता तो सांस लेना कितना मुश्किल होता। 

बहरहाल, वो दिन कि जिसका वादा था, मेरी हथेलियों पर रखा था। हाथ में बोर्डिंग पास थे और पीठ पर बैकपैक। अब भी क्रूज की लग्ज़री का एक्ससाइटमेंट तो नहीं था हाँ, कुछ दिन को दुनिया से दूर ले जाने की इच्छा बहुत थी। दुनिया में रहते हुए दुनिया से दूर जाना चाहती थी। हमेशा से जानती हूँ, कि किसी के बगैर किसी की दुनिया नहीं रुकती, बस थोड़ी सी बदल जरूर जाती है। इन दिनों मृत्यु एक खयाल की तरह साथ रहती है। शायद कोविड के बाद का असर होगा, या आसपास की घटनाओं का। जीवन पर पहले भी भरोसा नहीं था अब भी नहीं है लेकिन फिर भी है तो यह जीवन ही और इसे बहुत सारा जीकर ही हराया जा सकता है। सो जीने की इच्छा बोर्डिंग पास के साथ थामी हुई थी। परिवार को पता था कि कुछ दिन नो नेटवर्क ज़ोन में रहूँगी। मुझे खुद नहीं पता था कि किस ज़ोन में रहूँगी। 

मन की हालत यूं थी कि आसपास के लोग जहाँ खुशी से बौराये जा रहे थे, मेरी भीतर की विकलता ठहरने लगी थी। शायद भीतर की नदी, समन्दर से मिलने को बेचैन हो रही होगी। 

(ज़ारी...)

Wednesday, September 30, 2026

जा रहा है सितम्बर...



जा रहा है सितम्बर 
कंधे झुके हुए हैं उसके 
आँखें मायूस  

30 दिन का यह सफर 
किसी साल सा बीतता है 
जाने कितनी सदियों का दुख 
सितम्बर के सीने में दफ्न है
 
नब्ज़ रुक रुक कर चलती रही 
बात बनते बनते बिगड़ती रही  

मुस्कुराहटों में 
अतीत की उदासियों की सीलन झलकती रही 
फूल खिलते रहे बेहिसाब फिर भी 
मन का खिलना छूटता ही गया 

हर बार बीतता है सितम्बर 
लगता है बीत जाएगा दुख भी
दिल बुदबुदाता है 'हाँ, बीत जाएगा दुख 
जैसे बीत जाता है सितम्बर...'

Monday, September 28, 2026

मुख़्तर सी बात है...

जागी आँखों में कोई ख़्वाब आ गया था। तमाम पहरेदारी, तमाम बाड़ेबंदी के बाद भी। जाने कैसे। जागी आँखों के ख़्वाब सोई आँखों के ख़्वाब से मुख़्तर होता है। नींद में कोई बुरा ख़्वाब देखो तो आँख खुलने पर राहत होती है कि चलो ख़्वाब था, बीत गया। अगर अच्छा ख़्वाब देखो तो जागने पर अच्छा महसूस होता है, चेहरे पर मुस्कुराहट खेलती रहती है। 

जागी आँखों के ख़्वाब अगर चुभने लगें तो वो अपना रंग नहीं बदलते, न तासीर बदलते हैं। फिर वो चुभते ही रहते हैं, सोते जागते। 

सितम्बर महीना जाने कैसी सी फितरत लिए आता है। कुछ जागी आँखों के ख़्वाब सोई आँखों के ख़्वाबों से टकराते फिरते हैं। धरती से लेकर आसमान तक फूलों ही फूल खिले हैं और दिल है कि जाने कैसे वसवसों में गुम है। 

दिल की दिमाग से कभी बनी ही नहीं। इन दिनों दिल, दिमाग और देह की आपस में बनती नहीं। सब अपनी अपनी धुन में हैं। कोई मेरी नहीं सुनता। मैं भी किसी की नहीं सुनती। यूं भी तो चल ही जाता है दुनिया का कारोबार। 

Sunday, September 20, 2026

सितम्बर की सुबह और मदर मैरी

सितम्बर महीने से जाने कैसा रिश्ता है। थोड़ा ख़ुश ख़ुश, थोड़ा उखड़ा-उखड़ा सा। ऐसा लगता है जीवन के सुख का स्वाद सबसे पहले सितम्बर में ही चखा और फिर उन सुखों से विरत होने का अभ्यास भी सितम्बर से ही शुरू हुआ। फिर भी कभी शिकायत वाला रिश्ता नहीं रहा।

सितम्बर के इस तीसरे इतवार की सुबह है। देहरादून के मौसम में सर्दियों के आने का सुर लगना शुरू हो चुका है। हथेलियां एक साथ नरम धूप और हरसिंगार के फूलों से भर उठती हैं। 

खुद से नाराज़ रहती हूँ इन दिनों। उलझी रहती हूँ। जीवन का सुर साधने की कोशिश में बार-बार भटक जाती हूँ। आज सुबह उठी तो बरसों बाद सितार उठाया। सिर्फ उठाने भर के सुख ने दिल को थोड़ी राहत दी। मैंने प्यार से उसे देखा, छुआ, तार मिलाए और मालकोश बजाने की कोशिश की...सिर्फ कोशिश। उस कोशिश भर ने मुझमें थोड़ी ऊर्जा भरी। फिर मैंने अरुंधति रॉय की किताब को उठाया और उसे देर तक देखती रही। इन दिनों पढ़ने का सुर भी बिखरा हुआ है इसलिए हिम्मत नहीं हुई कि एक और किताब शुरू करूँ और अधूरी छोड़ दूँ। 

हाथ में किताब लिए सामने खड़े हरसिंगार को देखती रही। ठहरी हुई सुबह में एक एक-कर झरते हरसिंगार देखना मेरी सुबहों का हासिल होता है। हर हल्के से हवा के झोंके के साथ कुछ फूल शाख से उतरते हैं और ज़मीन चूमने को व्याकुल हो उठते हैं। हवा के झोंके से पास रखी किताब के पन्ने उड़ने लगे। जिस लाइन पर नज़र पड़ी, वो थी...She chose September, that most excellent month, to make her move...

मैं इस किताब को अङ्ग्रेज़ी में पढ़ रही हूँ। और यह इस इतवार की मेहरबानी है कि एक सांस में 4 चैप्टर पढ़ चुकी हूँ। पहले भी इस किताब को शुरू किया था लेकिन तब बीच में अटक गयी थी। उम्मीद है इस बार ऐसा नहीं होगा और इस किताब के बहाने कम से कम पढ़ने की आदत का छूटा हुआ सुर तो लग ही जाएगा। 

Monday, September 14, 2026

प्रतिरोध का उजला स्वर है श्रुति कुशवाहा की कविताओं में


यह बात उन कविताओं की बाबत है जिन्होंने मेरे अनकहे को कहा, बेचैन रातों में साथ बैठकर बातें कीं, उजले दिनों में संग मुस्कुराईं और सवाल पूछने के वक़्त पर सबसे आगे खड़ी नज़र आईं। यह बात उन कविताओं की बाबत है जिन्हें मैंने रसोई में खाना बनाते वक़्त पढ़ा, यात्राओं के दौरान कभी एयरपोर्ट के लाउंज में तो कभी फ्लाइट में और कभी आधी रात को नींद खुलने पर पढ़ा। यह बात उस कविता संग्रह के बारे में है जो न जाने कितने शहरों की यात्राओं में साथ रहा। और देखिये न फिर भी लगभग बरस बीतने को है और मैंने इसके बाबत कुछ लिखा नहीं। ऐसा नहीं कि लिखना चाहा नहीं बस कि लिख सकी नहीं। हमेशा लिखकर लगा कि ठीक से नहीं लिखा, न्याय नहीं कर पा रही हूँ, संग्रह के साथ। अब भी वैसा ही है। सोचती हूँ कि यह मेरी सामर्थ्य का मामला भी तो हो सकता है। अच्छी रचनाएँ आपको ऐसी चुनौती देती हैं। अकसर अच्छी कविता स्तब्ध करती है कि उसे सुनने के बाद आप ताली बजाना भूल जाते हैं। इस संग्रह की कविताएं ऐसी ही हैं, वे पन्नों पर ख़त्म हो जाती हैं लेकिन भीतर चल पड़ती हैं।  वैसे भी कविताओं के प्रभाव को तालियों की गूंज से नहीं, आँखों में उतर आए बादलों से या भिंची हुई मुट्ठियों से ही समझा जा सकता है।

यह सारी बात है श्रुति कुशवाहा के नए कविता संग्रह 'सुख को भी दुख होता है' के बारे में।

इन दिनों लगकर पढ़ना काफी कम हुआ है। मन की स्थिति का दोष है, व्यस्तताओं का दोष है या उन रचनाओं का जिन्हें मैंने पढ़ने के लिए चुना, कहना मुश्किल है। मैं रचनाओं को दोषमुक्त करते हुए अपने मन का ही दोष मानती हूँ क्योंकि घोर व्यस्तताओं में भी खूब पढ़ा ही है। लेकिन इस पूरे विचलन वाले समय में जब पढ़ने का सुर बिखरा हुआ है मैं श्रुति की कविताओं के पास लौटती रही। हर बार इन कविताओं ने अपने भीतर आने दिया।

यह कवि की उस समर्थता की बात है जो अपने पाठक के बिखरे भटके मन को भी सहेज ले, और कहे कि तुम अकेली नहीं हो, मैं भी हूँ तुम्हारे साथ। यही बात कवि अपने समर्पण में लिखती हैं, 'कविता शब्दविलास नहीं, जीवन में उतारने वाली बात है।' जीवन जितना विकट है उसकी तफ़्तीश इन कविताओं में मिलती है। वह साहस मिलता है जहां आवाज़ को रोके जाना असंभव है। प्रतिरोध का स्वर किसी सुर की तरह साधा है कवि ने।

कविता लिखने की तैयारी के लिए स्पष्ट नज़रिया, किसी भी तरह के पूर्वाग्रहों से मुक्ति और साहस प्राथमिक तैयारी है। यह तैयारी संग्रह भरपूर दिखती है। कवि जीवन और समाज के उन हिस्सों को चिन्हित करती हैं जहां स्याह घेरा  जमा होने लगा है, जहां शब्दों की जुगाली के खेल चले रहे हैं और सामाजिक, राजनैतिक दोगलेपन का पाखंड  फलफूल रहा है। जहां मुखौटे बड़े और मजबूत होते जा रहे हैं।

मुझे इस संग्रह की कविताओं ने इसलिए ज्यादा मोहित किया क्योंकि इसमें शैलीगत कोई सनसनाहट की बजाय सादगी की ऐसी तुरपाई दिखती है जो उधड़े मन को सहेज दे।

ये कविताएं आत्मा के उस हिस्से से मुठभेड़ करती हैं जिसे दुनिया समाज और राजनीति के डर से हम सबने थोड़ा चाहे अनचाहे छुपा दिया है या। कविताएं झिंझोड़ती हैं कि उठो और सामना करो। इन कविताओं में सीला मन है, प्रतिरोध है और उजास की लालसा भी है।

चाहूँ तो कितनी ही कविताओं पर कितना कुछ लिख सकती हूँ लेकिन फिलवक़्त कुछ कविताओं का जिक्र भर कर रही हूँ यह समझते हुए भी कि जैसे लिखने वाले की एक यात्रा होती है वैसे ही पढ़ने वाले की भी एक यात्रा होती है। तो यह मेरी पाठकीय यात्रा की बात है।

अक्षरज्ञान से पहले मैंने माँ की ख़ुशबू पहचानी
और पिता की गोद में सुनी
संसार की सबसे सुंदर प्रेम कवितायें
मेरी तुतलाहट के प्रत्यत्तर में उनकी मुस्कान
आज भी मेरी भाषा की सबसे विश्वसनीय कवितायें हैं।
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एक दिन
रात बंद ताले सी न होगी स्त्री के लिए
उसी के पास होगी उसकी सारी चाबियाँ

एक दिन हम मनुष्य होना सीख जाएँगे। 
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सब सुख में पगा था
सब सुख में डूबा
मैंने इस सुख को मोड़कर सहेज लिया
कि अचानक सुख ने उचककर बाहर झाँका
फिर जाने क्या हुआ
मैंने बहुत कोशिश की
लेकिन सुख तब से लगातार रो रहा है

मैं एक बात जान पाई हूँ
सुख को भी दुख होता है।

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छूटना अगर कोई नियम है तो
मैं चाहती हूँ मुझसे ये नियम छूट जाए।
नींद इतनी जरूरी है कि
इसके लिए ईज़ाद हुई दवा
ग्यारह दिन न सोएँ तो हो सकती है मौत
यहाँ आप ‘दिन’ को रात ही समझिएगा
बिलकुल उसी तरह
जैसे कई लोग सरकार को राष्ट्र समझते हैं

सरकार अब नींद को लेकर काफ़ी सजग है
वो सुनिश्चित करती है कि सोई रहे जनता
सोए हुए लोग ख़तरा नहीं होते
इसलिए जगह-जगह खोल दिये हैं लोरी सेंटर
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अब वहाँ दिन का नाम रात है
कोयले का नाम फ़ूल
चीख का नाम संगीत
भूख का नाम रोटी
भय का नाम भक्ति
और तानाशाही का नाम लोकतन्त्र

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इस व्यवस्था में हथियार खिलौने बन गए
दुष्कर्म में तब्दील हुआ प्रेम
घुट्टी में पिलाई जाने लगी अफ़ीम
चीख को अब संगीत का दर्ज़ा मिला
और सबसे खतरनाक अपराधियों को राजनीति में संरक्षण
किसी की मदद करने पर तय हुआ जुर्माना
प्यासे को पानी पिलाना 'रेयर ऑफ द रेयरेस्ट' क्राइम माना गया।
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जितनी एलर्जी मुझे हिन्दू मुसलमान करने वालों से है
उतनी ही स्त्रीद्वेषी लोगों से भी
स्त्री को देवी और स्त्री को जूती समान मानने वाले समान हैं
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आत्महत्याओं की ख़बरों के बीच
तानाशाह सुना रहा है जीवन के उपदेश
लोग तालियाँ बजा रहे हैं।
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उसने प्रेम को हृदय में रखा
मान को ललाट पर
स्त्री का हृदय हमेशा घायल रहा
और जीवन भर दुखता रहा माथा

मानिनी स्त्री को राई भर प्रेम मिला...

ये कुछ कविताओं के अंश भर हैं। पूरे संग्रह की हर कविता कई-कई बार पढ़ने का मन करता है। पूरा संग्रह पढ़ा जाना चाहिए। संग्रह 2025 में राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है।

एक ही गुजारिश है कृपया किताबें खरीदकर पढ़ें।