Wednesday, September 30, 2026
जा रहा है सितम्बर...
Monday, September 28, 2026
मुख़्तर सी बात है...
जागी आँखों में कोई ख़्वाब आ गया था। तमाम पहरेदारी, तमाम बाड़ेबंदी के बाद भी। जाने कैसे। जागी आँखों के ख़्वाब सोई आँखों के ख़्वाब से मुख़्तर होता है। नींद में कोई बुरा ख़्वाब देखो तो आँख खुलने पर राहत होती है कि चलो ख़्वाब था, बीत गया। अगर अच्छा ख़्वाब देखो तो जागने पर अच्छा महसूस होता है, चेहरे पर मुस्कुराहट खेलती रहती है।
जागी आँखों के ख़्वाब अगर चुभने लगें तो वो अपना रंग नहीं बदलते, न तासीर बदलते हैं। फिर वो चुभते ही रहते हैं, सोते जागते।
सितम्बर महीना जाने कैसी सी फितरत लिए आता है। कुछ जागी आँखों के ख़्वाब सोई आँखों के ख़्वाबों से टकराते फिरते हैं। धरती से लेकर आसमान तक फूलों ही फूल खिले हैं और दिल है कि जाने कैसे वसवसों में गुम है।
दिल की दिमाग से कभी बनी ही नहीं। इन दिनों दिल, दिमाग और देह की आपस में बनती नहीं। सब अपनी अपनी धुन में हैं। कोई मेरी नहीं सुनता। मैं भी किसी की नहीं सुनती। यूं भी तो चल ही जाता है दुनिया का कारोबार।
Sunday, September 20, 2026
सितम्बर की सुबह और मदर मैरी
सितम्बर महीने से जाने कैसा रिश्ता है। थोड़ा ख़ुश ख़ुश, थोड़ा उखड़ा-उखड़ा सा। ऐसा लगता है जीवन के सुख का स्वाद सबसे पहले सितम्बर में ही चखा और फिर उन सुखों से विरत होने का अभ्यास भी सितम्बर से ही शुरू हुआ। फिर भी कभी शिकायत वाला रिश्ता नहीं रहा।
सितम्बर के इस तीसरे इतवार की सुबह है। देहरादून के मौसम में सर्दियों के आने का सुर लगना शुरू हो चुका है। हथेलियां एक साथ नरम धूप और हरसिंगार के फूलों से भर उठती हैं।
खुद से नाराज़ रहती हूँ इन दिनों। उलझी रहती हूँ। जीवन का सुर साधने की कोशिश में बार-बार भटक जाती हूँ। आज सुबह उठी तो बरसों बाद सितार उठाया। सिर्फ उठाने भर के सुख ने दिल को थोड़ी राहत दी। मैंने प्यार से उसे देखा, छुआ, तार मिलाए और मालकोश बजाने की कोशिश की...सिर्फ कोशिश। उस कोशिश भर ने मुझमें थोड़ी ऊर्जा भरी। फिर मैंने अरुंधति रॉय की किताब को उठाया और उसे देर तक देखती रही। इन दिनों पढ़ने का सुर भी बिखरा हुआ है इसलिए हिम्मत नहीं हुई कि एक और किताब शुरू करूँ और अधूरी छोड़ दूँ।
हाथ में किताब लिए सामने खड़े हरसिंगार को देखती रही। ठहरी हुई सुबह में एक एक-कर झरते हरसिंगार देखना मेरी सुबहों का हासिल होता है। हर हल्के से हवा के झोंके के साथ कुछ फूल शाख से उतरते हैं और ज़मीन चूमने को व्याकुल हो उठते हैं। हवा के झोंके से पास रखी किताब के पन्ने उड़ने लगे। जिस लाइन पर नज़र पड़ी, वो थी...She chose September, that most excellent month, to make her move...
मैं इस किताब को अङ्ग्रेज़ी में पढ़ रही हूँ। और यह इस इतवार की मेहरबानी है कि एक सांस में 4 चैप्टर पढ़ चुकी हूँ। पहले भी इस किताब को शुरू किया था लेकिन तब बीच में अटक गयी थी। उम्मीद है इस बार ऐसा नहीं होगा और इस किताब के बहाने कम से कम पढ़ने की आदत का छूटा हुआ सुर तो लग ही जाएगा।
Monday, September 14, 2026
प्रतिरोध का उजला स्वर है श्रुति कुशवाहा की कविताओं में
यह सारी बात है श्रुति कुशवाहा के नए कविता संग्रह 'सुख को भी दुख होता है' के बारे में।
इन दिनों लगकर पढ़ना काफी कम हुआ है। मन की स्थिति का दोष है, व्यस्तताओं का दोष है या उन रचनाओं का जिन्हें मैंने पढ़ने के लिए चुना, कहना मुश्किल है। मैं रचनाओं को दोषमुक्त करते हुए अपने मन का ही दोष मानती हूँ क्योंकि घोर व्यस्तताओं में भी खूब पढ़ा ही है। लेकिन इस पूरे विचलन वाले समय में जब पढ़ने का सुर बिखरा हुआ है मैं श्रुति की कविताओं के पास लौटती रही। हर बार इन कविताओं ने अपने भीतर आने दिया।
यह कवि की उस समर्थता की बात है जो अपने पाठक के बिखरे भटके मन को भी सहेज ले, और कहे कि तुम अकेली नहीं हो, मैं भी हूँ तुम्हारे साथ। यही बात कवि अपने समर्पण में लिखती हैं, 'कविता शब्दविलास नहीं, जीवन में उतारने वाली बात है।' जीवन जितना विकट है उसकी तफ़्तीश इन कविताओं में मिलती है। वह साहस मिलता है जहां आवाज़ को रोके जाना असंभव है। प्रतिरोध का स्वर किसी सुर की तरह साधा है कवि ने।
कविता लिखने की तैयारी के लिए स्पष्ट नज़रिया, किसी भी तरह के पूर्वाग्रहों से मुक्ति और साहस प्राथमिक तैयारी है। यह तैयारी संग्रह भरपूर दिखती है। कवि जीवन और समाज के उन हिस्सों को चिन्हित करती हैं जहां स्याह घेरा जमा होने लगा है, जहां शब्दों की जुगाली के खेल चले रहे हैं और सामाजिक, राजनैतिक दोगलेपन का पाखंड फलफूल रहा है। जहां मुखौटे बड़े और मजबूत होते जा रहे हैं।
मुझे इस संग्रह की कविताओं ने इसलिए ज्यादा मोहित किया क्योंकि इसमें शैलीगत कोई सनसनाहट की बजाय सादगी की ऐसी तुरपाई दिखती है जो उधड़े मन को सहेज दे।
ये कविताएं आत्मा के उस हिस्से से मुठभेड़ करती हैं जिसे दुनिया समाज और राजनीति के डर से हम सबने थोड़ा चाहे अनचाहे छुपा दिया है या। कविताएं झिंझोड़ती हैं कि उठो और सामना करो। इन कविताओं में सीला मन है, प्रतिरोध है और उजास की लालसा भी है।
चाहूँ तो कितनी ही कविताओं पर कितना कुछ लिख सकती हूँ लेकिन फिलवक़्त कुछ कविताओं का जिक्र भर कर रही हूँ यह समझते हुए भी कि जैसे लिखने वाले की एक यात्रा होती है वैसे ही पढ़ने वाले की भी एक यात्रा होती है। तो यह मेरी पाठकीय यात्रा की बात है।
अक्षरज्ञान से पहले मैंने माँ की ख़ुशबू पहचानी
और पिता की गोद में सुनी
संसार की सबसे सुंदर प्रेम कवितायें
मेरी तुतलाहट के प्रत्यत्तर में उनकी मुस्कान
आज भी मेरी भाषा की सबसे विश्वसनीय कवितायें हैं।
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रात बंद ताले सी न होगी स्त्री के लिए
उसी के पास होगी उसकी सारी चाबियाँ
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सब सुख में पगा था
सब सुख में डूबा
मैंने इस सुख को मोड़कर सहेज लिया
कि अचानक सुख ने उचककर बाहर झाँका
फिर जाने क्या हुआ
मैंने बहुत कोशिश की
लेकिन सुख तब से लगातार रो रहा है
सुख को भी दुख होता है।
नींद इतनी जरूरी है कि
इसके लिए ईज़ाद हुई दवा
ग्यारह दिन न सोएँ तो हो सकती है मौत
यहाँ आप ‘दिन’ को रात ही समझिएगा
बिलकुल उसी तरह
जैसे कई लोग सरकार को राष्ट्र समझते हैं
वो सुनिश्चित करती है कि सोई रहे जनता
सोए हुए लोग ख़तरा नहीं होते
इसलिए जगह-जगह खोल दिये हैं लोरी सेंटर
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कोयले का नाम फ़ूल
चीख का नाम संगीत
भूख का नाम रोटी
भय का नाम भक्ति
और तानाशाही का नाम लोकतन्त्र
दुष्कर्म में तब्दील हुआ प्रेम
घुट्टी में पिलाई जाने लगी अफ़ीम
चीख को अब संगीत का दर्ज़ा मिला
और सबसे खतरनाक अपराधियों को राजनीति में संरक्षण
किसी की मदद करने पर तय हुआ जुर्माना
प्यासे को पानी पिलाना 'रेयर ऑफ द रेयरेस्ट' क्राइम माना गया।
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जितनी एलर्जी मुझे हिन्दू मुसलमान करने वालों से है
उतनी ही स्त्रीद्वेषी लोगों से भी
स्त्री को देवी और स्त्री को जूती समान मानने वाले समान हैं
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आत्महत्याओं की ख़बरों के बीच
तानाशाह सुना रहा है जीवन के उपदेश
लोग तालियाँ बजा रहे हैं।
मान को ललाट पर
स्त्री का हृदय हमेशा घायल रहा
और जीवन भर दुखता रहा माथा
मानिनी स्त्री को राई भर प्रेम मिला...
ये कुछ कविताओं के अंश भर हैं। पूरे संग्रह की हर कविता कई-कई बार पढ़ने का मन करता है। पूरा संग्रह पढ़ा जाना चाहिए। संग्रह 2025 में राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है।
एक ही गुजारिश है कृपया किताबें खरीदकर पढ़ें।
Friday, September 11, 2026
मौसम का पहला हरसिंगार खिला है
मुझे सुधा जी और हरि जी मिले जीवन में। बड़े प्यारे लोग। सवाल न करने वाले लोग, देह की हरारत का पूछ मन का इलाज कर देने वाले लोग। इलाज न भी हो, सब ठीक हो जाएगा, सब ठीक ही है का भरोसा देने वाले लोग। बाज़ार के इस शोर में कोई आपको सुने यह बहुत है, फिर कोई समझ भी ले, और अनकहा भी समझ ले तो यह ख़ास ही तो है। छोटी सी मुलाक़ात हुई थी उनसे, पर असर साथ ही रहता है।
जीवन अपना ही है, मन भी। बस कि कहीं कोई फूल खिलता है और खिल उठती हूँ । कहीं कोई पत्ता झरता है और हथेलियाँ बढ़ा देती हूँ। एक पूरा जीवन जी चुके और शान से शाख़ से झरते उस पत्ते के आगे सजदा करती हूँ। सीखना चाहती हूँ, हालात कैसे भी हों, खिलना ही है का सबक़। सलीके से झरने का सबक़।
एक रोज़ चलते-चलते बीच रास्ते में दूब के जंगल के बीच छुपा सा एक नन्हा पौधा दिखा। और उस पर मुस्कुराता प्यारा सा फूल। वो ऐसे खिला था जैसे अपनी सामर्थ्य से ज्यादा खिलने की हुड़क हो उसमें। मैं देर तक वहीं बैठी रही। उसे देखती रही, उसे प्यार करती रही। यही है जीवन। प्यार। खिलना, खिलखिलाना, झरना वो भी शान से।
खबरों से बचती फिरती हूँ अकसर। हाँ, सच कहा तुमने, कमजोर हूँ मैं। बहुत कमजोर। दुनिया के किसी भी कोने की उदास आँखें भीतर धंस जाती हैं, उनकी उदासी सोने नहीं देती। शायद हथेलियों में वह उदासी ही रेंग रही होगी, कि कुछ ख़बरें गुजर ही जाती हैं नज़रों के सामने से। आँखें मूँदने से हक़ीक़त तो नहीं बदलती।
रात भर नींद में कोई शोर बरपा रहा। कितनी कमजोर है वो इच्छा जो दुनिया के तमाम दुख सोख लेने से महरूम रह जाती है हर बार और अपने डेली रूटीन में उलझ जाती है। सोचती हूँ, मैं अगर इतनी कमजोर हूँ तो ईश्वर कितना कमजोर होगा। उसका तो फुलटाइम काम ही यही है, अन्याय से लोगों को बचाना और वो बेचारा खुद को नहीं बचा पा रहा।
सुबह में रात की उदासियाँ शामिल ही थीं लेकिन खिड़की खोली तो मौसम बदल चुका था। मौसम का पहला हरसिंगार खिला था...नज़र भर देख चुकने के बाद मैंने हरसिंगार के साथ दुआ की सबका दुख झरे, सबकी उम्मीद खिले...आमीन !





