Saturday, September 18, 2021

एक व्यक्ति की नहीं पूरे समाज की जीवनी है मारीना- वीरेंद्र यादव


‘मारीना’ को पढ़ते हुए पाठक सिर्फ मारीना की जीवन यात्रा में ही शामिल नहीं होते बल्कि वो लेखिका प्रतिभा की विकास यात्रा को भी देख पाते हैं. सचमुच यह किताब हिंदी के पाठकों के लिए प्रतिभा का बड़ा योगदान है. इस काम की खासियत यह है कि यह पूरी तरह से मौलिक काम है. यह किताब एक व्यक्ति का जीवन भर नहीं है, यह एक सामाजिक जीवनी है. पहले और दूसरे विश्व युद्ध का वह समय और उस वक्त का समाज सब इस किताब में खुलता नजर आता है. वह पूरा दौर, बहुत सी अनकही और अनससुलझी बातें जो हमारी सोच, हमारी चेतना का हिस्सा नहीं थीं वो इस जीवनी के माध्यम से सामने आई हैं.

मारीना जिस समय के उथल-पुथल के दौर की उपज थी वह रूसी क्रांति से पहले का समय था. जारशाही के समय उसके शासन के दौरान जो आन्दोलन चल रहे थे मारीना बचपन से ही उन आंदोलनों, उन हलचलों के बीच रही. यह एक बड़ी बात है कि कोई किताब जो जीवनी के रूप में आ तो गयी साथ ही ढेर सारी उलझन भी लायी. अगर आप विचार पध्धति से जुड़े हैं तो कोई किताब आपको झकझोर दे, आपको सोचने पर मजबूर करे तो यह मामूली बात नहीं है.


इस किताब में लेखिका की झिझक भी दिखती है. एक तरीका यह हो सकता था कि बहुत निर्णायक तरह से उस दौर को उकेरते हुए उस समूचे दौर को सवालों के घेरे में रखने का प्रयास किया जाता. लेकिन इस किताब में प्रतिभा स्वयं एक असमंजस से गुजरती हुई मालूम होती हैं. वो असमंजस प्रतिभा का असमंजस नहीं है वो असल में मारीना का असमंजस है. मारीना का पति अगर व्हाइट आर्मी के साथ जुड़ा हुआ है तो उससे निर्विकार कैसे रह सकती थी मारीना. मारीना खुद जार के समय था उसके शासन की पक्षधर नहीं है. इस बात को समझने के लिए पाठक खुद उस समय में खुद को ढाल पायें उस समय से खुद को जोड़कर देख पायें तो बात समझ में आती है कि परिवर्तन का, क्रांति का दौर ऐसा गुजर रहा है जो कि बहुत साफ़ नहीं है. उस दौर को उस दौर का बुध्धिजीवी फैसलाकुन तरह से समझ नहीं सकता है. जबकि एक बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है. ये लोग देश छोड़कर जा रहे हैं. चाहे चेकोस्लोवाकिया में हो, जर्मनी में हो, फ़्रांस में हो बड़ी संख्या में पलायन हो रहा है. तो एक ऐसा दौर मारीना की निर्मिति का दौर है. मारीना का वह निर्माण काल सिर्फ मारीना का ही नहीं है इसके बहाने उस पूरे दौर के असमंजस को, उहापोह को समझा जा सकता है. अच्छी बात यह है कि निर्णायक स्वर न देते हुए भी उस दौर की जो जटिलतायें हैं उन जटिलताओं को किताब में उजागर किया गया है. मुझे लगता है कि अब बेबाकी के साथ हमें सवालों से टकराना चाहिए. इस तरह की जो किताबें होती हैं वो हमसे ईमानदार आत्मावलोकन की मांग करती हैं. मुझे लगता है इस किताब के साथ उस आत्मावलोकन की शुरुआत हो सकती है. बहुत मुखर न हो, मौन ही हो लेकिन शुरुआत तो हो.
 
मारीना के प्रेम को लेकर भी बात होती है कि न जाने कितने लोग उसके जीवन में आये और उसने मुक्त प्रेम की युक्ति अपनाई. यह युक्ति एक व्यक्तित्व की निर्मिति थी और इस संदर्भ में प्रतिभा ने परिशिष्ट में जो लिखा है, ’मेरी समस्या यह है कि मैं ऐसे हर मिलने वाले के जीवन में अविलम्ब प्रवेश कर जाती हूँ जो किसी कारण मुझे अच्छा लगता है, मेरा मन उसकी सहायता करने को कहता है. मुझे उस पर दया आती है कि वह डर रहा है कि मैं उससे प्रेम करती हूँ या वह मुझसे प्रेम करने लगेगा और उसका पारिवारिक जीवन तहस-नहस हो जाएगा. यह बात कही नहीं जाती पर मैं यह चीखकर कहना चाहती हूँ कि महोदय, मुझे आपसे कुछ नहीं चाहिए, आप जा सकते हैं, फिर आ सकते हैं, फिर जा सकते हैं, फिर कभी नहीं भी लौट सकते हैं. मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. मैं समझ, सहजता और स्वछन्दता चाहती हूँ. किसी को पकड़कर नहीं रखना चाहती और न ही कोई मुझे पकड़कर रखे.'

मारीना प्रेम में पज़ेसिव नहीं है कि वो अपने प्रेमी को प्रेम में जकड़कर रखे. प्रेम का जो सूत्र उसके पास है उसे उसके इस कहे से समझा जा सकता है कि ‘मैं समझ, स्वतन्त्रता और स्वछंदता चाहती हूँ’ यह उसके प्रेम का सूत्र है. प्रेम की जो एक पारम्परिक तरह की अवधारणा है या प्लेटोनिक प्रेम की जो अवधारणा है मुझे लगता है प्रेम की उन अवधारणाओं से अलग यह एक नया आयाम है. मारीना को समझने के लिए जो हमारे बने-बनाये ढाँचे हैं उन्हें तोड़ना होगा. उन ढांचों को भारतीय परिस्थितियों को समझना आसान नहीं है. उस समय का जो यूरोपीय समाज है उसके मद्देनजर देखना होगा.

यह देखिये कि उसका जीवन कितना त्रासद है. उसकी त्रासदी उसके जीवन की व्यक्तिगत त्रासदी नहीं है वो उस दौर के सामाजिक, राजनैतिक जीवन की उपज है. सवाल यह है कि अगर इतनी बड़ी बौध्धिक स्त्री, कवयित्री अगर एक जोड़ी जूते मांग रही है, कि वो उन जूतों के अभाव में कहीं जा नहीं पा रही है तो यह राजनीति से परे बात नहीं है. भले ही वह खुद को अराजनैतिक कहती है लेकिन वो है नहीं अराजनैतिक. कोई हो भी नहीं सकता है. बुकमार्क में लेखिका ने इस बात को बहुत अच्छे ढंग से उठाया है. असल में मारीना राजनीति का शिकार है. कितना त्रासद है यह सब. इस किताब को पढ़ते हुए हम अवसादग्रस्त होते जाते हैं. उसका पति जासूसी के आरोप में फंसता है, वो भी जेल जाता है, बेटी भी जेल जाती है. बेटा भी उत्पीड़ित है. यह सब उस दौर की राजनीति के कारण ही तो हो रहा है.

यह किताब उस दौर की राजनीति के बारे में निस्पृहता से विचार करने के लिए हमें प्रेरणा देती है. वो दौर उथल-पुथल का दौर था. स्टालिन ने 1935 में पेरिस में होने वाली कांफ्रेस में भाग लेने के लिए पास्तेरनाक को भेजा. जिस पास्तेरनाक को एंटी फासिस्ट कांफ्रेंस में भाग लेने के लिए भेजा यानी पास्तेरनाक पर उसे भरोसा था वही पास्तेरनाक बाद में उसी राजनीति के विक्टिम बने.

गोर्की बड़े नायक थे. उस समय की राजनीति की जो संरचना थी उसके अंतर्गत गोर्की भी मारीना की सहायता उस तरह से नहीं करते हैं. त्रासदी मरीना के हिस्से ज्यादा ही आई. तो सवाल यह है कि क्या नजरिया अपनाया जाय कि जो उस दौर में बहुत से साम्राज्यवाद के समर्थन का नजरिया अपना रहे थे या पूरी वैचारिक राजनीति में उथल-पुथल थी. एक कवियित्री की जीवनी के माध्यम से कितने रग-रेशे खुल रहे हैं. इसका दायित्व के साथ निर्वहन करना आसान नहीं था. यह काम बहुत परिपक्वता की मांग करता है और प्रतिभा ने उस परिपक्वता का परिचय दिया.

कितनी बड़ी त्रासदी है की मारीना ने आत्महत्या की लेकिन आत्महत्या के बाद उसे कहाँ दफन किया गया यह कोई नहीं जानता. उसकी कब्र कहाँ है आज तक किसी को नहीं पता. लोग ढूँढने गये लेकिन किसी को कोई ख़बर नहीं मिली. उस समय के लोग परिवार, लेखक समाज किसी ने उसे चिन्हित नहीं किया. किसी को नहीं पता वो कहाँ दफन है. कोई बताने वाला नहीं. इससे भी आप देखेंगे कि हालात कैसे थे और वो किस कदर उपेक्षित थी. मरीना का बेटा जो अपनी माँ की आत्महत्या को सही ठहराता है वो कहता है जिन हालात में माँ थी उन हालात में उसके पास कोई चारा नहीं था आत्महत्या के सिवा. वो कहता है ‘मेरी माँ ने सही किया.’ वो गवाह है उन स्थितियों का. वो सब देख रहा था. वो कहता है कि माँ ने जो किया यही उचित था किया जाना. कितनी बड़ी त्रासदी है कि बेटा माँ की आत्महत्या में ही उसकी मुक्ति देख रहा है. इन सारी परिस्थितियों का जो ताना-बाना बहुत उलझा हुआ है और उसमें उलझा है मारीना का जीवन.

रिल्के, पास्तेरनाक, अन्ना अख्मातोवा आदि के नाम हैं उस दौर में लेकिन मैं ईमानदारी से कहूँगा की मारीना मेरी स्मृति में नहीं थी. मैंने उस समय के कुछ सोवियत कलेक्शन निकाले उसमें मारीना को ढूँढा. वर्ल्ड सोशलिस्ट पोयट्री का एक बहुत अच्छा पोयट्री कलेक्शन है और वो करीब 30 साल पहले का है पेंग्विन ने उसे प्रकाशित किया था जिसमें दुनिया भर के कवि हैं जिसमें पाब्लो नेरुदा भी हैं उसमें भी मारीना कहीं नहीं मिली. एक सोवियत पोयट्री का बहुत अच्छा कलेक्शन है उसमें भी मरीना को तलाशा मैंने उसमें स्टालिनवाद के समय के सब लोग हैं उसमें येसेनिन भी हैं मायकोवस्की भी हैं लेकिन यह नाम वहां भी नहीं है. प्रतिभा ने उस लिहाज से मारीना को उपस्थित भी किया है. हिंदी के पाठको के लिए तो यह है ही कि क्योंकि किताब हिंदी में है लेकिन इसके माध्यम से चर्चा आगे भी जा सकती है क्योंकि यह एक जीवनी भर नहीं है, एक खोज है. प्रतिभा ने इसको खोजा, इसको इस रूप में प्रस्तुत किया. यह आगे जाने वाला काम है. टिकने वाला काम है. जब भी इस तरह की कोई चर्चा होगी तब मारीना को खोजा जाएगा. इस काम को दूर तक जाना चाहिए.
 (जनवरी 2021 में लखनऊ में हुए एक कार्य्रकम में दिया गया वक्तव्य)
 पुस्तक- मारीना (जीवनी)
लेखिका- प्रतिभा कटियार 
मूल्य- 300 रूपये
प्रकाशक- संवाद प्रकाशन, 
पुस्तक अमेजन पर भी उपलब्ध है. अमेजन का लिंक- https://www.amazon.in/-/hi/Pratibha-Katiyar/dp/8194436206/ref=sr_1_1?dchild=1&keywords=pratibha+katiyar&qid=1631940830&sr=8-1

Thursday, September 2, 2021

मौन में बात


सुनना
कोलाहल के समन्दर के बीच
अपनी धड़कनों की
कलियों के चटखने की
पत्तियों के गिरने की
मोगरे की खुशबू की
दिल के टूटने की
उदास आँखों में उगती उम्मीद की
आवाज़ को सुनना
सुनने का अभ्यास है,


एकांत
अकेले रहना नहीं होता
एकांत में होना
भीड़ में, कोलाहल में भी
बुना जा सकता है
अपने लिए एकांत का सुंदर बाना
जैसे ढेर सारे शब्दों और वाक्यों के बीच
बचाया जा सकता है
मौन का नन्हा सा बीज
जिसे सींचा जा सकता है
आत्मा के पानी से
जिसकी छांव में हम
सुस्ता सकें एक रोज
दुनियादारी की भागमभाग से थककर.


देखना
दृश्य जो झिलमिलाते हैं
वो दिखते हैं लेकिन दिखते नहीं
दृश्य जो कचोटते हैं
वो उस कचोट की यात्रा नहीं दिखाते
दृश्यों में डूबते-उतराते अक्सर
छूट जाता है हमसे देखना
क्योंकि देखना दृश्य भर नहीं होता.


बोलना
जब चुप थी
तब कितना शोर था भीतर
कितनी बातें

स्मृतियां कितना शोर करती हैं

चुप में रहकर जाना
कि बात के भीतर थी एक और बात थी
स्मृति के भीतर थी एक और स्मृति

सामने दिखती दीवार पर
शब्दों और वाक्यों का ढेर था
जबकि बागीचे में खिला था एक फूल
और उस पर मंडराने के बाद
पीली धूप पहनने वाली तितली ने कहा,
'जरा चुप भी हो जाओ
कि बारिश आने को है.'

बोलना
जब हम शब्दों में बोलते हैं
तब बचा रहता है थोड़ा सा मौन
थोड़ी सी चुप बची रहती है

जब हम बोलना बंद करते हैं
बहुत शोर करती है चुप्पी

मौन धीमे से मुस्कुराता है
हाँ, मौन और चुप दो अलग बाते हैं.

बंद आँखों से देखना
जब आँखें बंद होती हैं
तो खुलता है एक बड़ा सा संसार

बंद आँखों की दुनिया में
जंगल, नदियाँ पहाड़ सब होते हैं

बंद आँखों की दुनिया खुलती है
स्वप्न और स्मृति के संसार में
वहां ढेर सारे रंग खुलते हैं

बंद आँखों की खिड़की पर
बारिश की आवाज लिए बैठा होता है पंछी

प्रार्थना के लिए आँखें बंद करने पर
ईश्वर के सिवा सब दिखता है
और आँखें खोलने पर दिखती है
ईश्वर की मूर्ति

बंद आँखों से देखना एक अभ्यास है
यह आँखें बंद करने से नहीं आता.


सवाल
जवाब सवालों के नहीं होते
सवालों में होते हैं
सवाल होने पर परेशान होने से बेहतर है
सवालों से घिरे रहना
जवाब की खोज में भटकने से बेहतर है
बेहतर सवालों की खोज में निकल पड़ना.

शाख
खाली शाख
स्मृतियों से भरी होती है
ढेर सारे दृश्य टंगे होते हैं
खाली शाखों पर
हरियाली की खुशबू से तर-ब-तर
पंछियो के कलरव से झूमती
जुगनुओं से झिलमिलाती
खाली शाखों को देखने के लिए
ख़ास नजर चाहिए
खाली शाख सा दिखे कोई व्यक्ति
तो खाली मत समझना उसे
उसके भीतर छुपी हरियाली
से तनिक हरा चुन लेना.

Sunday, August 29, 2021

डुबकियाँ



एक रोज खेल-खेल में फेसबुक अकाउंट डीएक्टिवेट किया था सोचा था कुछ घंटों में वापस लौट आऊंगी और कई महीनों तक वापस लौटने का मन ही नहीं किया. यह कई बरस पुरानी बात है. फिर एक बार बिना डी एक्टिवेट किये ही कुछ दिन फेसबुक से दूर रहने का मन बनाया और ये कुछ दिन लम्बे होते गए. सुख हुआ. फिर ऐसा अक्सर होने लगा. लम्बे समय से सोशल मीडिया पर आमद सिमट रही थी. फिर एक रोज आँख में दर्द की शिकायत हुई और एकदम से स्क्रीन से मुंह मोड़ लिया. सच कहती हूँ हर बार सुख हुआ. कि एक क्लिक की दूरी पर था एक संसार बस इच्छा की देर थी. जैसे जेब में ओपन टिकट हो लेकिन मन रम जाए वादियों में कि टिकट इच्छा की राह ताकते-ताकते मुरझा जाए.
इस दौरान मैंने न पढ़ा, न लिखा कुछ. न देखा ही कुछ. न बातें की किसी से. न वाट्स्प, न फेसबुक. इस दौरान सुनना खूब हुआ. चुप की आवाज़ें, फूलों के खिलने की आवाज़ें, पत्तियों के झरने की आवाज़ें, अपने भीतर की आवाजें तो हर वक़्त साथ रहीं. बाहर के कोलाहल में घिरे-घिरे भीतर के कोलाहल का पता ही न चला था. इस दौरान स्मृतियों की आंधियां भी खूब चलीं. सोचना बढ़ा और उसने नम किया. भीतर की नदी में खूब डुबकियाँ लगायीं.
ऐसे समय बिताने के बारे में कभी सोचा नहीं था. लेकिन ये अनजाना सुख रहा. यह किसी पाबंदी से करना पड़ता तो तड़प ही पड़ती शायद लेकिन यह मैंने खुद चुना और सुख हुआ. यह समय सिर्फ बाहरी आवाजों से दूर रहने का नहीं बाहरी दृश्यों से दूर रहने का भी था. सारे फूल भीतर खिल रहे थे, सारी बारिशें भीतर थीं, सारे पंछी भीतर कलरव कर रहे थे.
ऐसा नहीं, कि बाहरी दुनिया की खबर नहीं थी. खबरों ने उदास भी किया कभी सुख भी दिया. उदासी और सुख को जज्ब करना बढ़ा. इन दिनों दोस्त साथ है. वो भी मेरे चुप के करीब बैठ जाती है.
संवाद स्थगित हों तो असल संवाद शुरू होता है
दृश्य स्थगित हों तो कितना कुछ दिखना शुरू होता है.

Sunday, July 25, 2021

औरतें सपने देख रही हैं


खेतों की कटाई में, धान की रुपाई में
रिश्तों की तुरपाई में लगी औरतें सपने देख रही हैं

बच्चों को सुलाते हुए, उनका होमवर्क कराते हुए 
गोल-गोल रोटी फुलाते हुए 
औरतें सपने देख रही हैं 

ऑफिस की भागमभाग में, प्रोजेक्ट बनाते हुए 
बच्चों को पढ़ाते हुए, मीटिंगें निपटाते हुए 
औरतें सपने देख रही हैं 

घर के काम निपटाते हुए, पड़ोसन से बतियाते हुए 
टिफिन पैक करते हुए 
आटा लगे हाथ से आंचल को कमर में कोंचते हुए 
औरतें सपने देख रही हैं 

बेमेल ब्याह को निभाते हुए 
शादी, मुंडन जनेऊ में शामिल होते 
हैपी फैमिली की सेल्फी खिंचवाते हुए 
आँखें मूंदकर सम्भोग के दर्द को सहते हुए
सुखी होने का नाटक करते हुए 
औरतें गीली आँखों के भीतर सपने देख रही हैं 

कि एक दिन वो अपने हिस्से के सपनों को जी लेंगी 
एक दिन वो अपने लिए चाय बनाएंगी 
अपने साथ बतियायेंगी 
खुद के साथ निकल जायेंगी बहुत दूर 
जहाँ उनके आंसू और मुस्कान दोनों पर
नहीं होगी कोई जवाबदेही 
बहुत आहिस्ता से जाना उनके करीब 
चुपचाप बैठ जाना वहीं, बिना कुछ कहे 
या ले लेना उनके हाथ का काम ताकि 
औरतें सपने देखती रह सकें 
और उनके सपनों की खुशबू से महक उठे यह संसार.

Saturday, July 24, 2021

चेहरा


काम पर जाती हुई औरतें
घर पर रहकर काम करने वाली औरतों से अलग नहीं होतीं

दोनों ही संभालती हैं घर और बाहर की दुनिया
दोनों ही जूझती हैं भीतर बाहर की लड़ाइयों से
दोनों के ही जीवन में है काम का भंडार
और उस पर से मिलने वाले ताने अपार

दोनों को निपटाने होते हैं समय रहते सारे काम
बुलट ट्रेन की स्पीड फिट होती है उनके हाथों में
दोनों के पास नहीं होता अपने लिए वक़्त

काम पर जाती औरतें ऑफिस में निपटाती हैं फाइलें
घर पर रहते हुए काम करती औरते कसती हैं गृहस्थी के नट बोल्ट
काम पर जाती औरतें कुछ रोज ब्रेक लेकर घर पर रहना चाहती हैं
घर पर काम करती औरतें कुछ दिन बाहर जाकर
काम करने का सपना आँखों में पालती हैं

दोनों एक-दूसरे को हसरत से देखती हैं
दोनों को ही नहीं देखता कोई
दोनों से कोई खुश नहीं रहता

काम पर जाती औरतें ही घर पर काम करती औरतें हैं
घर पर रहकर काम करती औरतें ही काम पर जाती औरतें हैं
दोनों के चेहरे आपस में गड्डमगड्ड हैं

ये एक-दूसरे के साथ बैठकर चाय पीने के इंतज़ार में 
रसोई से लेकर ट्राम तक ये भागती जा रही हैं

ऑफिस में फ़ाइल निपटानी हो, घर की रसोई समेटनी हो
या करना हो मेम साब के घर का झाड़ू, बर्तन, पोछा या मजदूरी 
ये सारी औरतें एक ही हैं

फेसबुक विमर्श से दूर अपनी ही डबडबाई आँखों में
उतराते अपने कच्चे सपनों को देखती हैं

एक रोज निकालकर तनिक सी फुरसत
छोड़कर कुछ जरूरी काम
जब ये एक-दूसरे के गले लगकर हिलगकर रो लेंगी
तब सूख जायेंगे इन्हें बांटने के इरादे से बोये जाने वाले तमाम बीज

जब तक ये निपटा रही हैं अपने काम
तब तक ही चल पायेगा इन्हें बांटने का कारोबार.