Saturday, February 27, 2021

मारीना- ऐसे भी कोई जाता है क्या

हफीज़ किदवई युवा रचनाकार, संन्कृतिकर्मी और जन पैरोकार हैं. वो हमेशा मुद्दों के भीतर से मानवीय पक्ष खोज कर लाते हैं, उनकी हिमायत करते हैं. हफीज़ की कलम में एक ख़ुशबू है, एक रौशनी है. वो अल्फाजों के सहारे दुनिया को रोशन करना चाहते हैं और महकाना चाहते हैं. उनकी खासियत यह है कि वो सिर्फ कलमकार नहीं हैं सड़कों पर उतरकर, लोगों के घरों तक पहुंचकर उधड़े हुए समय और समाज को रफू करने के प्रयास वो निरन्तर करते हैं. मारीना पर उनकी यह टिप्पणी जो सोशल मीडिया पर है उसे प्रतिभा की दुनिया में सहेज रही हूँ- प्रतिभा  

अरे ऐसे भी कोई जीता है, अरे यार ऐसे भी कोई मर सकता है, यही तो निकला था मुँह से मारीना को पहली बार पढ़ते हुए । इस किताब को आपको ज़रूर पढ़ना चाहिए । यह किताब दो कवयित्रीयों के बीच बातचीत का अनूठा काम है । एक बहुत पहले अपनी कविता कह गए,एक आज अपनी कविता अपने दिल में सँजोए हुए हैं । एक को हमने नही देखा,मगर जिसको हमने देखा,उसने उसे हमे दिखा दिया,जिसे हमने नही देखा था । यह किताब अद्भुत है ।

एक तरफ रूस की महान कवियत्री मारीना त्स्वेतायेवा हैं, जिनकी यह जीवनी है, दूसरी तरफ हैं हमारे लखनऊ की कवियत्री प्रतिभा कटियार,जिन्होंने इसे सलीके से हिंदी में गढ़ा है । यह किताब ऐसे लगता है कि मारीना ख़ुद प्रतिभा से कहकर लिखवा रही हों । कोई लेखक कैसे किसी दूसरे लेखक के दिल की धड़कन,चेहरे की शिकन और शरीर की थकन के बीच प्रेम की ताज़गी को ढूंढ सकता है । यह तो तब तक सम्भव नही है, जब तक लिखने वाले शरीर में लिखे जाने वाले कि आत्मा न उतर आए,यह अद्भत घटना प्रतिभा कटियार की कलम में घटित हुई है ।
मैंने बहुत धैर्य से उस किताब को पढ़ा, यह महीने भर से थी मेरे पास,मैं उसे रोज़ पढ़ना चाहता था । चाहता था कि किताब खत्म न हों,क्योंकि मारीना का अंत पता था,और चाहता था कि किताब लम्बी होती चली जाए,यही प्रतिभा जी ने भी किया होगा । वह भी किताब खत्म नही करना चाहती होंगी,वह भी अभी भी मारीना के साथ रहना चाहती होंगी,मगर यह नही हो सका,क्योंकि हमारी सीमाएं निर्धारित हैं।

फिल्मों में,वीडियोज़ में बहुत बार भावुक पल आने पर तो आंसू आते हैं मगर किताब पढ़ने पर इनका निकलना बहुत ही अलग बात है और मारीना पढ़ने पर कई दफा आँसू आए । कई दफा मन भारी हुआ,यह कहिए कि यह किताब पढ़ी जितनी जाएगी,उससे कहीं ज़्यादा ही जी भी जाएगी ।

हम किताब के कंटेंट में नही जाएँगे, यह आप खरीदकर पढ़िए,अमेज़न या किसी बुक शॉप से लीजिये । हम तो इस किताब को सिर्फ इसके एक बुकमार्क के लिए खरीद सकते थे,जो फ़ोटो में मौजूद हैं । ऐसे बहुत से बुकमार्क किताब में हैं, यह एक बेहतरीन परम्परा लेखिका ने डाली है, जिसे हम सबको बढ़ाना भी है ।

मारीना की जीवनी लिखकर प्रतिभा जी ने ऐतिहासिक काम कर डाला । उन्हें खुद नही पता होगा कि मारीना से जो वह बात कर रही थीं,वह पल ऐतिहासिक थे,वह वक़्त आने वाली नस्लों को कुछ बीज देने जैसा था । जब कभी मारीना का नाम फलक पर चमकेगा और उनका लिखा हमारी दहलीज़ पर पहुँचेगा, तब पीछे पीछे प्रतिभा भी पहुँचेंगी, क्योंकि ऊँचाई में छिपे इस सितारे की चमक हम सबके सामने उन्होंने ही बिखेरी है । यह किताब अद्भुत है, बहुत बहुत धन्यवाद प्रतिभा मैम इसे लिखने के लिए,इसे सोचने केलिए,हमे पता है इसका लिखना कितनी वेदना समेटे था ।

एक आखरी बात प्रतिभा जी के लिए ,मारीना की जीवनी का चुनाव इस ज़मीन पर केवल आप ही कर सकती थीं,क्योंकि उसकी ज़िन्दगी के पड़ाव,बदलाव और माथे की शिकन के बीच अल्फ़ाज़ बुनती उँगलियों को केवल आपका संवेदनशील हृदय देख सकता था । यह किताब हमारी पीढ़ी के लिए आपका उपहार है, बहुत बहुत धन्यवाद....

किताब मंगवाने का लिंक- https://www.amazon.in/-/hi/Pratibha-Katiyar/dp/8194436206/ref=sr_1_1?dchild=1&keywords=pratibha+katiyar&qid=1614405248&sr=8-1

Tuesday, February 23, 2021

दो चाय



पीले फूलों का मौसम फिर से लौट आया था. चारों तरफ वासंती बहार थी. फ्योली के फूलों ने रास्तों को यूँ सजाया हुआ था जैसे जब प्रेम की पालकी गुजरेगी तो वो उसके संग हो लेंगे. पुलम, नाशपाती, बुरांश, पलाश और आडू के फूलों ने समूचे पहाड़ों को किसी खूबसूरत काल्पनिक से दृश्य में परिवर्तित कर दिया था. लड़की ने अपना झोला कंधे से उतारकर किनारे स्टूल पर रखा और चाय वाले दादा को चाय बनाने को कहा. दो चाय.

चाय वाले दादा इधर-उधर देखने लगे. उन्हें लगा दूसरा कोई आने वाला होगा. हालाँकि पहाड़ों पर बहुत दूर से आने वाले दिख जाते हैं कम से कम चाय बनने की देरी भर की दूरी भर तो दिख ही जाते हैं लोग. फिर भी उन्होंने दो कप चाय चढ़ा दी. लड़की देर तक सामने वाली पहाड़ी पर खिलखिला रहे आडू के गुलाबी फूलों को देखती रही. कई बरस बीत गए इस बात को जब वो इसी पेड़ के नीचे खिलखिला कर हंस रही थी और लड़के ने पेड़ की डाल को थोड़ा सा नीचे खींच के छोड़ दिया था. डाल ने लड़के की शरारत को समझ लिया था. वो मुस्कुरा दी थी. और उसने ऊपर जाते हुए ढेर सारे गुलाबी फूल लड़की पर बरसा दिए थे. बरसते फूलों से नहा उठी थी लड़की और उसकी खिलखिलाहटों से वादियाँ नहा उठी थीं. लड़का चमत्कृत सा उस दृश्य को देख रहा था.

वो मोबाईल वाले कैमरों का दौर नहीं था. सारी तस्वीरें आँखों से खिंचकर ज़ेहन की हार्डडिस्क में सेव हो जाती थीं. अपनी तमाम खुशबू समेत. ज़ेहन की इस हार्ड डिस्क में कोई डिलीट बटन भी नहीं था. और यह अच्छा ही था. लड़की ने खुद को उस दृश्य में पैबस्त कई बार देखा था. लड़के की आँखों में. लड़के ने उस सुंदर दृश्य को देखते हुए पनीली हो आई अपनी आँखों को दृश्य से हटा लिया था. वह दृश्य उन दोनों के जीवन का सबसे सलोना दृश्य था. सबसे सलोना लम्हा.

हर बरस लड़की इस मौसम में इस दृश्य को इन खिलते हुए गुलाबी फूलों के आसपास तलाशती है. फूल खुद मानो उस वैभव को तलाशते हों हर बरस. लड़की के सामने रखी चाय में गुलाबी फूलों की परछाईं गिर रही थी. स्कूल जाते बच्चों ने लपककर उन फूलों की एक छोटी टहनी तोड़ ली थी. कुछ दूर जाकर उन्होंने वह फेंक दी थी कि उनका मन भर गया था शायद उस टहनी के वैभव से. लड़की का मन क्यों नहीं भरा इतने बरसों में. लडकी ने लपककर उस फूलों से भरी टहनी को उठाया और अपने साथ ले आई. चाय के कप के पास अब वह टहनी रखे हुए मुस्कुरा रही थी. टहनी उठाकर लौटते वक़्त लड़की ने सड़क पर झरकर गिरे फ्योली के फूल उठाकर जुड़े में सजा लिए थे. गुलाबी और पीले फूलों की जुगलबंदी में चाय की खुशबू बिखर रही थी. लड़की ने स्मृतियों की शाख से अपना मनपसन्द लम्हा उतारकर सामने सजा लिया था.

वह बारी-बारी से दोनों कप से चाय पी रही थी. चायवाले दादा ने पूछा,'बिटिया कोई और आने वाला है?' लड़की मुस्कुराई. 'नहीं दादा, जो आने वाला था वो वहीं गया है जहाँ उसे जाना चाहिए था.' दादा को कुछ समझ नहीं आया उन्होंने 'अच्छा' कहकर फिर से दूसरे ग्राहकों की चाय चढ़ा दी.

अख़बार में ख़बर थी, आपदा में बचाव के लिए गए लोगों का कोई पता नहीं...अख़बार कई बरस पुराना था या शायद नया ही. खबर बदली नहीं थी. लड़की की उदास आँखों ने चाय को देखा, और गटक लिया. पहाड़ पर पहाड़ सी आपदा आई. फिर न जाने कितने घर उदास हुए...लड़की ने चाय के दोनों कप रखते हुए दादा को पैसे दिए और फूलों से कहा, 'इस बरस ज्यादा खिलना है तुम्हें, कि उदास है मन का मौसम.' वो चलने को हुई तभी एक फूल उसके काँधे पर आहिस्ता से आकर बैठ गया. लड़की ने महसूस किया इस जहाँ या उस जहाँ...जहाँ भी है वहां लड़का जरूर मुस्कुराया है.

Friday, February 19, 2021

और अंत में अंतिमा


जैसे मुझे पता था कि वहां पहुँचते ही सब खत्म हो जायेगा. इसलिए मैं उस जगह से बस कुछ कदम दूर पर ही रुक गयी. यह रुकना फिर देर तक रुके रहना बनता गया. मैंने इस तरह के सुख को कभी महसूस नहीं किया था. यह कित्ता बड़ा सुख था कि जहाँ पहुंचने की शदीद इच्छा है उस जगह के मुहाने पर पहुंचकर ठहरे हुए होना. आश्वस्ति यह कि बस दो कदम बढ़ाये और पहुँच गए. लेकिन उसके बाद क्या? उसके बाद फैला एक निर्जन सन्नाटा और कुछ उदासी कि अब इस तरह कुछ कदम बढ़ाकर पहुँचने की जगह कोई नहीं बची. इसी उहापोह में अंतिमा के अंत के दरवाजे पर खुद को रख दिया. बहुत सारे काम के सैलाब से गुजरते हुए अंतिमा को थामे रखना मानो सुख हो. एक रोज़ ऋषिकेश के त्रिवेणी घाट पर भी पलट लिए कुछ पन्ने. लेकिन पढ़े नहीं.
 
फिर एक रोज़ रातरानी की खुशबू ने अंतिमा के पन्ने पलट दिए और मैं एक साँस में सब पढ़ गयी. जैसे चाय पीते हैं अंतिम घूँट. पीने का सुख और खत्म हो गयी की उदासी एक साथ महसूस करते हुए. आखिरी पन्ने के सामने बैठी ही थी कि कबूतर का जोड़ा घर में आ गया. मैंने चोरी से एक निगाह उन पर डाली और वापस पढ़ने लगी. रोहित, पवन, बंटी सबके चेहरे आपस में टकराने लगे. अब यह बंटी कहाँ से आ गया. यह तो दूर बहुत दूर बैठा था. अंतिमा मुझे शुरू से जानी पहचानी लग रही थी इसलिए उसने चौंकाया नहीं. किसी उपन्यास के खत्म होने के बाद खुद को एक असीम शांति से भरते हुए महसूस करती हूँ. उस शांति में चाय पीना सुख है. मैंने अंतिमा की ओर मुस्कुराकर देखा और चाय चढ़ा दी. मैंने तीन कप चाय क्यों चढ़ाई? एक मेरी, एक अंतिमा की और तीसरी कैथरीन की. आईने में देखा तो खुद के चेहरे में जंग हे का चेहरा उगता मालूम हुआ. वो जंग हे जिन्हें मैंने देखा नहीं. मुझे कुछ ही देर में लगा मैं जंग हे हूँ और मेरे सामने सोफे पर अंतिमा और कैथरीन खामोश बैठी हैं. कैथरीन का चेहरा कितना ज्यादा चमक रहा है और अंतिमा थोड़ी सी नींद में लग रही है. दोनों एक-दूसरे से बात करने की इच्छा में मौन से भर गयी हैं. अब टेबल पर तीन कप चाय है. और मैं वहां कहीं नहीं हूँ. जंग हे कहती हैं, ‘तुम दोनों बहुत प्यारी हो.’अंतिमा मुस्कुरा देती है जैसे कह रही हो कि वह जानती है कि वह खूबसूरत है. जबकि कैथरीन चुपचाप चाय की सिप लेते हुए अपने मौन में कहती है कि उसे इस बात से कुछ फर्क नहीं पड़ता. देर तक चुप्पी से थक कर जंग हे यू लर्न कविता पढने लगती हैं. मिसेज वर्मा किसी के ख्याल में नहीं हैं रोहित भी नहीं, पवन भी नहीं, दुष्यंत भी नहीं. अरु को समझ में नहीं आ रहा कि यह हो क्या रहा है तभी कबूतरों का जोड़ा फुर्र से उड़ जाता है. वो दिन में सुस्ताती रातरानी की बेल के पास बैठकर एक-दूसरे की गर्दन पर गर्दन रख देते हैं. उनकी गर्दन का चमकता नीला अंतिमा की ड्रेस के जैसा नीला है कैथरीन की आँखों के जैसा नीला और जंग हे की अंगूठी में जड़ें नीलम जैसा.
मैं 'अंतिमा‘ पढ़ चुकने के बाद उदास नहीं हूँ. क्योंकि अब मेरे हाथ में ‘चलता फिरता प्रेत है...’


Thursday, February 4, 2021

गुमनाम कवयित्री की जीवनी

-वीरेन्द्र यादव

रूस की लगभग अलक्षित और लंबे समय तक गुमनाम रही लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण कवयित्री मारीना त्स्वेतायेवा की युवा लेखिका प्रतिभा कटियार द्वारा लिखित जीवनी 'मारीना' को पढ़ते हुए यह तथ्य बार बार उद्वेलित करता है कि चमकदार दिखते और लुभाते इतिहास के पीछे कितने अदीठ अंधेरे छिपे होते हैं.मुझे लगता है कि 'मारीना' की इस जीवनी का टेक्स्ट जितना महत्वपूर्ण है उससे कम महत्वपूर्ण नहीं है इसका सबटेक्स्ट. मारीना रिल्के और बारिस पास्तरनाक की प्रेमिका थी तो गोर्की की प्रशंसिका. पुश्किन की कविता उसकी प्रेरणा थी तो मैन्डेलस्ताम और अख्मातोवा उसके प्रिय समकालीन . सोवियत क्रांति की उथलपुथल ने उसे जिस त्रासद नियति का शिकार बनाया उसे आज भी पढ़ना अवसादकारी है. वह अपने वतन रुस से क्रांति पूर्व और पश्चात की परिस्थितियों के चलते उस दौर के अन्य रुसी बौद्धिकों की तरह देशबदर होने के लिए अभिशप्त थी. कविता व साहित्य उसकी प्राणवायु थी और प्यार उसकी सांस. प्यार में वह समझ, सहजता और स्वच्छंदता की कायल थी.वह रुसी क्रांति की गायक नहीं थी और क्रांति से उपजी अराजकता के प्रति अपनी कविताओं में आलोचनात्मक थी, लेकिन रुस से उसे अगाध प्रेम था. विडम्बना यह थी कि 'उस दौर में रुस से प्रेम के सीधे अर्थ नहीं थे. कोई इसे बोल्शेविक नजरिये से देख रहा था तो कोई राजशाही के समर्थन के नजरिये से'. मारीना न बोलशेविक समर्थक थीं और न राजशाही की. फिर भी उसे अपने देश से आत्मीयता के बजाय दुराव व हताशा ही मिली. वह गोर्की की प्रशंसक थी उन्हें काबिल, विनम्र और इंसानियत का पैरोकार मानती थी लेकिन गोर्की की दृष्टि में वह संदेहास्पद और गैर भरोसेमंद थी. पास्तरनाक से वह प्रेम में थी, लेकिन वे भी उसके मददगार नहीं सिद्ध हुए. उसके जीवन में एक दौर ऐसा भी था कि वह एक जोड़ी कपड़े और जूते की मोहताज थी.

एक बेटी की देखभाल करती मारीना दूसरी बेटी की अंत्येष्टि में शामिल होने से वंचित रही. स्टालिन की गुप्तचर एजेंसी ने उसके पति, बेटी और बेटे को अलग अलग समय पर गिरफ्तार किया. अंततः मारीना को अपने देश की नागरिकता तो मिली लेकिन उसके जीवन का त्रासद अंत उसकी आत्महत्या में हुआ. उसकी आत्महत्या के सूत्र मायकोवस्की और एसेनिन के आत्मघात से भी कहीं न कहीं जुड़ते हैं. मारीना को दफ्न किए जाने की जगह का पता तो नहीं चल सका लेकिन प्रतिभा कटियार ने उसे अपनी इस किताब द्वारा हिंदी पाठकों के समक्ष जीवित कर दिया है.मारीना की यह जीवनी जिस समर्पित भाव और बिना किसी निर्णायक मुद्रा के प्रतिभा ने लिखी है उसके लिए वह बधाई की पात्र हैं. इस जीवनी का महत्व यह भी है कि यह राजनीति और साहित्य के कई अनुत्तरित प्रश्नों को एक बार फिर शिद्दत के साथ प्रस्तुत करती है. इसका पढ़ना कई तरह से अवसादग्रस्त और बेचैन करने वाला है. हमारे शहर की लेखिका प्रतिभा कटियार का इसका निमित्त बनना सुखद है. एक बार फिर प्रतिभा कटियार को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ.
संवाद प्रकाशन , मेरठ से प्रकाशित इस पुस्तक का मूल्य 300 रु. है.

लखनऊ में ‘मारीना’



-कौशल किशोर
‘मारीना’ कवि-कथाकार-पत्रकार प्रतिभा कटियार की हिन्दी के पाठकों के लिए खोज है। यह उस कवि की तलाश है जो अपने देश रूस से बेइन्तहां प्यार करती थी। पर उसके देश ने क्या दिया? विस्मृति। उसे भुला दिया और उसकी याद भी आई तो मरने के बाद। यह कृति रूस की महान कवयित्री मारीना त्स्वेतायेवा के युग और जीवन पर केन्द्रित है। पिछले साल 2020 में संवाद प्रकाशन, मेरठ से आई। इसमें प्रतिभा की प्रतिभा छलछलाती हुई दिखती है।
मरीना को जो जीवन मिला, वह त्रासदी से भरा था। लगातार एक शहर से दूसरे शहर, एक जगह से दूसरी जगह, एक देश से दूसरे देश। यह न थमने वाला सिलसिला था। इसमें संघर्ष ही संघर्ष था। इसमें रोटी के जुगाड़ से लेकर जिन्दगी की छोटी से छोटी जरूरतें शामिल थीं। यह तो शब्द और कविता थी जिसने उसे सहारा दिया। खत और डायरी का साथ मिला। उसके दो प्रिय शगल थे - ख्वाबों से बात करना और खत लिखना। यह न होता तो वह कब की खत्म हो गई होती।
मृत्यु हमेशा उसके पास रही, साथ रही। मृत्यु में ही उसने जीवन देखा और उसे जीवन के कैद में महसूस किया। लोग अपना जन्मदिन मनाते हैं, सुखमय जीवन की कामना करते हैं। पर यहां कहानी उलटी है। वह अपने स़त्रहवें जन्मदिन पर मृत्यु की कामना करती है। 14 साल की उसकी उम्र थी जब मां गई। पिता का साथ 25 वें साल में छूटा। सबसे दर्दनाक मौत अपनी छोटी बेटी का देखने को मिला। विडम्बना यह कि उसकी मौत के बाद उससे वह मिल भी न पाई। वह बड़ी बेटी को नहीं छोड़ सकती थी जो जीवन और मृत्यु के बीच थी।
मरीना की दुनिया प्रेम से भरी थी। कह सकते हैं कि वह प्रेम के लिए ही बनी थी। उसे लगता कि प्रेम ही उसे बचा सकता है। उसका प्रेम पुश्किन से था। नेपोलियन के प्रति उसका आकर्षण था। पहला प्रेम किशोरावस्था में हुआ। सर्गेई से पिता की इच्छा के विरुद्ध जाकर शादी की। यह प्रेम विवाह था। उसे निभाया। उस पर कविता लिखी। प्रेम की उसकी दुनिया में रिल्के हैं, बोरिस पास्तरनाक हैं और भी कई हैं। प्रेम उसके यहां बहती नदी है।
मारीना की कविताई का दौर 13 साल की उम्र से शुरू हुआ। मां चाहती थी कि वह पियानो सीखे। उसका लगाव संगीत से हो लेकिन उसका प्रेम तो शब्दों से था। 17 साल की उम्र में पहला संग्रह ‘द इवनिंग एल्बम’ आया। ‘द फ्रेंड’, ‘पोयम फॉर यूथ’, ‘साइकिल’ जैसी कविता श्रृंखला से लेकर ‘द जार और मैडम’ जैसी अनगिनत कृतियों से उसने साहित्य की दुनिया को समृद्ध किया। रूस के लोकजीवन और लोक संस्कृति से उसका भावनात्मक लगाव था। वह कविता को देश के पार, भाषा के पार जाकर देखती थी। कवि को वह बन्धनमुक्त देखना चाहती थी। उसकी काव्य प्रतिभा से लगता है कि वह इस दुनिया की नहीं बल्कि इसके पार की है।
मारीना का समय दुनिया का सबसे हलचल, उथल-पुथल, उलझाव से भरा था। उसमें उसने विस्थापन, निर्वासन झेला। 17 साल अपने देश से बाहर रहना पड़ा। इतिहास के बारे में बातें करना और इतिहास जीना दो अलग चीजें हैं। वह इतिहास मारीना का वर्तमान था। वह ऐसा था जहां उसके लिए मृत्यु में ही मुक्ति थी। उसने यही चुना और परिदृश्य से ओझल हो गयी। वह इस तरह ओझल हुई कि पता ही नहीं कि उसे किस कब्रिस्तान में दफनाया गया। उसे मृत्यु के कई बरस बाद जाना गया, उसकी कविता को पहचाना गया। वह प्रतिष्ठित हुई। उसका मूल्यांकन करते हुए यहां तक कहा गया कि वह तो नोबल पुरस्कार की हकदार थी। उसका जीवन और संघर्ष और अन्त में मृत्यु का आलिंगन उस वक्त की राजनीति और सत्ता व संस्कृति की संरचना पर भी टिप्पणी है।
प्रतिभा की किताब इसी ‘मारीना’ की कथा है। यह जीवनी मात्र नहीं है। यह उसकी संघर्ष कथा, त्रासदी कथा, स्वप्न कथा, प्रेम कथा, काव्य कथा, आत्मकथा सबको समेटती है। बीच बीच में ‘बुक मार्क’ के रूप में टिप्पणियां कृति को जीवन्त है और पाठ को रोचक बनाती हैं। मरीना में प्रतिभा समाहित है। वह जिस तरह मारीना से इश्क करती है, यह उसकी दास्तां है। वह मारीना में अपने को पाती है, उसे रचती है, उससे बतियाती है, बहसती है, सवाल करती है और उसमें समा जाती है। इसीलिए यह अनूठी कृति बन पाई है। यह हिन्दी के उन पाठकों के लिए अनुपम भेंट है जिनकी विश्व साहित्य को जानने, समझने व पढ़ने की रूचि है।
 24 जनवरी के खुशगवार शाम में प्रतिभा के इस ‘मारीना’ से उसके अपने शहर लखनऊ के लोगों की मुलाकात हुई। आसमान साफ था। कई दिनों के बाद धूप खिली थी। इस अवसर पर प्रतिभा की इस कृति की सात साल की रचना यात्रा के संग-साथी शामिल थे। उसकी दोस्त ज्योति थी तो मम्मी भी थी जिन्होंने पल-पल का ख्याल रखा। बेटी ख्वाहिश इस पूरे लम्हे को अपने मोबाइल कैमरे में कैद कर लेने में जुटी थी। ‘मारीना’ के विमोचन का यह कार्यक्रम मानस नगर, हजरतगंज के एक खुले परिसर में सम्पन्न हुआ। अध्यक्षता आलोचक वीरेन्द्र यादव ने की। संचालन किया कवि व जसम उत्तर प्रदेश के कार्यकारी अध्यक्ष कौशल किशोर ने। वक्ता थे इप्टा के राष्ट्रीय महासचिव राकेश, आलोचक नलिन रंजन, कवि व पत्रकार सुभाष राय, कवि भगवान स्वरूप कटियार, कवयित्री विमल किशोर व सीमा सिंह और तारा कटियार। इस मौके पर कवि-कथाकार शालिनी सिंह, कवि-कथाकार तरुण निशान्त, युवा लेखक हाफिज किदवई आदि कई लोग मौजूद थे। आयोजन जन संस्कृति मंच का था।
प्रतिभा कटियार ने अपने शहर लखनऊ में ‘मारीना’ को पाकर बेहद खुश थी। उसने बताया कि उसने कैसे मरीना को जाना और कैसे जानती चली गई। उसने सात साल की लम्बी रचना प्रक्रिया की दास्तां सुनाई। मम्मी ने कैसे ख्याल रखा। मित्रों के साथ व सुझाव को भी याद किया। सर्वोपरि डा वरयाम सिंह के प्रेरक सहयोग के बारे में बताया कि अगर उनका साथ न मिला होता तो मारीना तक पहुंचना असंभव था। वे ही थे जिसकी वजह से यह संभव हो पाया। उन्होंने जितेन्द्र रघुंवशी, अशोक पाण्डेय सहित कई रचनाकारों के सहयोग-सुझाव को याद किया। कार्यक्रम के बाद प्रतिभा कटियार ने सोशल मीडिया पर लिखा भी ‘मारीना ने मेरे कान में चुपके से कहा- तुम्हारे शहर के लोगों ने समझा, मुझे प्यार किया। उन्हें शुक्रिया कहना। मैंने उससे हंसकर कहा कि हां, मैंने उन्हें शुक्रिया कहा है। हालांकि शुक्रिया नाकाफी होता है ऐसे अवसरों पर।’
तो यह कहानी है प्रतिभा कटियार की ‘मारीना’ की। जैसा पहले ही कहा कि इसमें प्रतिभा की ‘प्रतिभा’ प्रस्फुटित होकर सामने आई है। ऐसी कृति के लिए प्रतिभा को हार्दिक बधाई, दिली मुबारकबार वह शुभकामनांए। प्रतिभा की अगली किताब का बेसब्री से इंतजार रहेगा।