भीतर भीतर कुछ दरक रहा होता है, जिसे कभी ढेर सारे काम से, कभी तेज़ कदमों से, कभी संगीत से, कभी ढेर सारी मुस्कुराहटों से और कभी झूठ मूठ की खिलखिलाहटों से रिप्लेस करने की कोशिश करती रहती हूँ। उस वक़्त अपने ज़िंदगी को चकमा देने के इस हुनर पर फख्र सा होने लगता है लेकिन...वो ज़िंदगी है, चुपके से धप्पा देती है। वो इंतज़ार करती है, एक ऐसी तनहाई का जिसमें आप टूटकर बिखर ही लें।
बिखरना, बुरा नहीं है। टूटना बुरा है। टूटन को छुपाये फिरने के खेल में हम लगातार और टूटते जाते हैं।
कभी सब्र की नब्ज़ टटोलती हूँ। बहुत मद्ध्म मद्ध्म सी हरकत मुश्किल से ढूंढ पाती हूँ। अपने ही सब्र को गले लगाकर बैठी हूँ। आज की इस सुबह में मैं हूँ मेरा लगभग टूटा हुआ सब्र है और कुछ अगड़म बगड़म सा दिन है।
शायद मैं लिख भी न पाती कुछ। न जाने कबसे लिखना, पढ़ना स्थगित सा है। किया नहीं है स्थगित, यह खुद दूर जाकर बैठा है। मैं इंतज़ार में हूँ कि करीब आए वो नहीं आता। मैं अपनी पसंद की किताबों के साथ उसके करीब जाती हूँ, वो मुंह घुमाकर बैठ जाता है। मैं लौट आती हूँ। हालांकि, मनुहार करना जारी है।
मैंने पाया है कि आपके कितने ही करीबी लोग हों वो आपके दुख, सॉरी दुख नहीं उदासी का सामना नहीं करना चाहते। उस बारे में बात नहीं करना चाहते। शायद मैं भी नहीं। और इसलिए हमारे चेहरे पर मुस्कुराहटों के मुखौटे मजबूत होते जाते हैं।
कल मैंने 3 लोगों से कहा, 'मन अच्छा नहीं है'। 2 लोगों ने पूछा, 'अरे क्या हुआ?' और 1 ने कहा, 'मेरा भी मन बहुत खराब है' मैं इन सबके साथ खुद में वापस लौट आई। क्योंकि 'क्या हुआ' जैसा कुछ तो हुआ नहीं। लेकिन क्या नहीं हुआ जैसा तो न जाने कितना कुछ है।
जानती हूँ कि हर कोई अपने भीतर न जाने कितना सैलाब लिए फिर रहा है। देश दुनिया के हालात ऐसे हैं कि आप इनसे अछूते रह नहीं सकते। कुछ कहकर कभी कुछ न कहकर।
मैंने बचपन से अपना कोपिंग मैकेनिज़्म चुप रहने और घर की सफाई में पाया है। बड़ी हुई (मतलब पिछले दस बारह सालों में ) लॉन्ग ड्राइव या ट्रैवल भी कोपिंग मैकेनिज़्म की तरह पाया है। हालांकि आम जीवन में इस तरह के मैकेनिज़्म वो भी स्त्रियॉं के लिए एक लग्ज़री ही है।
पिछले तीन दिन से घिस-घिस कर घर के कोने चमकाने, और बेमतलब के आँसू बहा चुकने के बाद आज इतवार को मैंने कुछ मना सा लिया है। इसका एक बड़ा क्रेडिट जाता है ऋषभ को। उसने एक ब्लॉग बनाया है। सिंगापूर डायरी लिखनी शुरू की है। मुझे उसने रात भेजा था। मेरी सुबह हुई उसे पढ़ने से। पढ़ते-पढ़ते लगा जैसे ठंडी हवा के झोंके ने छू लिया हो।
सरल होना मुझे इस कदर मोहता है कि क्या कहूँ। जिस सादगी से ऋषभ लिखता है, वैसा ही वो है। इसलिए ऐसा लगा, उसने अपना लिखा भेजकर कहा हो, 'प्रतिभा जी, मैं हूँ न साथ।'
ऋषभ, तुम्हारे लिखे का जादू देखो, दिन खिला हुआ है। मन भी।
हम दुनिया के किसी भी कोने में हों, अपने हिस्से की मानवीयता को जीते हुए इस दुनिया को सुंदर बनाने के सपने में एक छोटा सा योगदान तो कर ही रहे हैं। कि हर रात सोने से पहले खुद से पूछना, आज किसी का दिल तो नहीं दुखाया न?
जब जीवन का 'स' ही न सध रहा हो ऐसे में ऋषभ का जीवन में यूं होना ब्लेसिंग ही तो है। और इस बात को सेलिब्रेट तो करना चाहिए। है न? तो अब उठती हूँ, आज फिर से दो कप चाय बनाऊँगी। पहला कप ऋषभ का, दूसरा...आप जानते तो हैं न।
दिन शुभ हो सबका।
ऋषभ के ब्लॉग का लिंक- https://open.substack.com/pub/riserishabh/p/singapore-slowly-some-days-improve?utm_source=share&utm_medium=android&r=1dr9dp



