हम सब किसी न किसी मंज़िल के तलबगार हैं। चल रहे हैं क्योंकि कहीं तो पहुंचना है। लेकिन जहां पहुँचना है वहाँ पहुँच जाने के बाद क्या...? पहुँचने के अपार सुख के बाद एक गहरी वीरानी घेरने लगती हैं। खालीपन सीने में साँय साँय करने लगता है। पिछले एक महीने से इस क्रूज यात्रा की बातें थीं, तैयारियां थीं, आशंकाएं थीं, उत्साह था। काम कोई भी हो हर वक़्त इस यात्रा का ख़्याल घेरे रहता था। और उस सुबह में जब यात्रा खत्म होने को थी, सब कुछ छूट रहा था का एहसास उदास कर रहा था।
जीने की एक शर्त है जीना। जीवन को बिना जिये काटा जा सकता है लेकिन जीना बिना जिये नहीं संभव है। हम जीवन में से समय चुराकर जीने आए थे। जी रहे थे लेकिन ऐसा भी महसूस हो रहा था कि जाने कितना जीना छूट रहा है। यह लालच है। मुझमें खूब सारा जीने का लालच है। जितना जीती हूँ, उतना ही और जीना चाहती हूँ। फ़िलहाल हमारा क्रूज़ गोवा के मुहाने पर देर से खड़ा था। सुबह अभी आई नहीं थी लेकिन सुबह की इंतज़ारी सँवर उठी थी।
एक और सूरज समंदर से उग रहा था। ढेर सारे लोग थे लेकिन कोई शोर नहीं था, न भीतर न बाहर। कुदरत का यही कमाल है वो आपको ख़ामोशी का वो सुर थमा देती है जिसकी तलाश में हर कोई भटक रहा है। वो सुर जो हमें हमारे भीतर ले जाता है। हमारे भीतर बिखरे कचरे को साफ करता है और एक सुंदर जीवन की, सुंदर सपनों की जगह बनाता है। हर यात्रा अपने भीतर की उथल पुथल को थामने, ज़ेहनी उलझनों से राहत देने का काम करती है। पहले से बेहतर मनुष्य बनाने की ओर अग्रसर करती है। अगर यात्राएं यह नहीं कर रही हैं तो यक़ीन मानिए आप सिर्फ दौड़ रहे हैं, तस्वीरें ले रहे हैं आप यात्री नहीं बन पाये हैं।
सूरज को हथेलियों में थामा, और क्रूज़ के इस खूबसूरत सफर को विदा कहा।
गोवा, सामने था। गोवा की पिछली तमाम यात्राएं याद आ गईं। व्यतीत का असर अगर आगम पर हो मुश्किल होती है, सो मैंने भरपूर कोशिश करके व्यतीत से हाथ छुड़ाया और खुद को गोवा के हवाले किया, इस उम्मीद से कि इस बार नया गोवा मिलेगा मुझे या गोवा को नई मैं।
हम दोनों को एक-दूसरे से बड़ी शिकायतें थीं, जिन्हें हमने सुलझाया नहीं था। मैंने इस बार भी मुंह मोड़ा उन शिकायतों से और इस समन्दर के इस किनारे से किनारे की ओर भागती फिरी। लेकिन इस बार बात थोड़ी अलग थी, झगड़े सुलझाने थे शहर को। उसने मुझे रोका और पकड़कर पास बिठाया। मैंने उसकी पूरी बात सुनी, कोई तर्क नहीं किया, कोई सफाई पेश नहीं की। बस उसे टुकुर-टुकुर देखती रही। उसकी हथेलियों में मेरी हथेलियाँ थीं...मेरी आँखों में नमकीन पानी था। नाराजगी पिघल रही थी। भीतर कुछ बदल रहा था। सामने समंदर था और मैं शहर की गोद में सर रखे आसमान के नीचे पसरे हुए लहरों का खेल देख रही थी। असल में जीवन का खेल भी जिसने हमें शायद वो बना दिया जो हम बनना भी नहीं चाहते थे। सारी उलझन लहरों के हवाले करके उठी तो भूख महसूस हुई। एक गर्म पिज्जा और ठंडी मार्गरीटा सही कॉम्बो था।
जब उलझनें सुलझ जाएँ तो नींद अच्छी आती है। उस रात मीठी नींद आई...गोवा की यह सुबह पिछली सुबहों से अलग थी। वापसी में कलाई घड़ी खोने का शगुन भी अच्छा हुआ, माँ की बात याद आई, पिछला समय बीत गया अब नया समय शुरू होगा जिस पर तुम अपनी तरह से हस्ताक्षर करो...खाली कलाई पर नए समय के उगने की बात सोचकर ही मुस्कुराहट तैर गई। हम वापस लौट रहे थे...खुश थे और तमाम उलझनों से खाली थे.



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