Monday, September 14, 2026

प्रतिरोध का उजला स्वर है श्रुति कुशवाहा की कविताओं में


यह बात उन कविताओं की बाबत है जिन्होंने मेरे अनकहे को कहा, बेचैन रातों में साथ बैठकर बातें कीं, उजले दिनों में संग मुस्कुराईं और सवाल पूछने के वक़्त पर सबसे आगे खड़ी नज़र आईं। यह बात उन कविताओं की बाबत है जिन्हें मैंने रसोई में खाना बनाते वक़्त पढ़ा, यात्राओं के दौरान कभी एयरपोर्ट के लाउंज में तो कभी फ्लाइट में और कभी आधी रात को नींद खुलने पर पढ़ा। यह बात उस कविता संग्रह के बारे में है जो न जाने कितने शहरों की यात्राओं में साथ रहा। और देखिये न फिर भी लगभग बरस बीतने को है और मैंने इसके बाबत कुछ लिखा नहीं। ऐसा नहीं कि लिखना चाहा नहीं बस कि लिख सकी नहीं। हमेशा लिखकर लगा कि ठीक से नहीं लिखा, न्याय नहीं कर पा रही हूँ, संग्रह के साथ। अब भी वैसा ही है। सोचती हूँ कि यह मेरी सामर्थ्य का मामला भी तो हो सकता है। अच्छी रचनाएँ आपको ऐसी चुनौती देती हैं। अकसर अच्छी कविता स्तब्ध करती है कि उसे सुनने के बाद आप ताली बजाना भूल जाते हैं। इस संग्रह की कविताएं ऐसी ही हैं, वे पन्नों पर ख़त्म हो जाती हैं लेकिन भीतर चल पड़ती हैं।  वैसे भी कविताओं के प्रभाव को तालियों की गूंज से नहीं, आँखों में उतर आए बादलों से या भिंची हुई मुट्ठियों से ही समझा जा सकता है।

यह सारी बात है श्रुति कुशवाहा के नए कविता संग्रह 'सुख को भी दुख होता है' के बारे में।

इन दिनों लगकर पढ़ना काफी कम हुआ है। मन की स्थिति का दोष है, व्यस्तताओं का दोष है या उन रचनाओं का जिन्हें मैंने पढ़ने के लिए चुना, कहना मुश्किल है। मैं रचनाओं को दोषमुक्त करते हुए अपने मन का ही दोष मानती हूँ क्योंकि घोर व्यस्तताओं में भी खूब पढ़ा ही है। लेकिन इस पूरे विचलन वाले समय में जब पढ़ने का सुर बिखरा हुआ है मैं श्रुति की कविताओं के पास लौटती रही। हर बार इन कविताओं ने अपने भीतर आने दिया।

यह कवि की उस समर्थता की बात है जो अपने पाठक के बिखरे भटके मन को भी सहेज ले, और कहे कि तुम अकेली नहीं हो, मैं भी हूँ तुम्हारे साथ। यही बात कवि अपने समर्पण में लिखती हैं, 'कविता शब्दविलास नहीं, जीवन में उतारने वाली बात है।' जीवन जितना विकट है उसकी तफ़्तीश इन कविताओं में मिलती है। वह साहस मिलता है जहां आवाज़ को रोके जाना असंभव है। प्रतिरोध का स्वर किसी सुर की तरह साधा है कवि ने।

कविता लिखने की तैयारी के लिए स्पष्ट नज़रिया, किसी भी तरह के पूर्वाग्रहों से मुक्ति और साहस प्राथमिक तैयारी है। यह तैयारी संग्रह भरपूर दिखती है। कवि जीवन और समाज के उन हिस्सों को चिन्हित करती हैं जहां स्याह घेरा  जमा होने लगा है, जहां शब्दों की जुगाली के खेल चले रहे हैं और सामाजिक, राजनैतिक दोगलेपन का पाखंड  फलफूल रहा है। जहां मुखौटे बड़े और मजबूत होते जा रहे हैं।

मुझे इस संग्रह की कविताओं ने इसलिए ज्यादा मोहित किया क्योंकि इसमें शैलीगत कोई सनसनाहट की बजाय सादगी की ऐसी तुरपाई दिखती है जो उधड़े मन को सहेज दे।

ये कविताएं आत्मा के उस हिस्से से मुठभेड़ करती हैं जिसे दुनिया समाज और राजनीति के डर से हम सबने थोड़ा चाहे अनचाहे छुपा दिया है या। कविताएं झिंझोड़ती हैं कि उठो और सामना करो। इन कविताओं में सीला मन है, प्रतिरोध है और उजास की लालसा भी है।

चाहूँ तो कितनी ही कविताओं पर कितना कुछ लिख सकती हूँ लेकिन फिलवक़्त कुछ कविताओं का जिक्र भर कर रही हूँ यह समझते हुए भी कि जैसे लिखने वाले की एक यात्रा होती है वैसे ही पढ़ने वाले की भी एक यात्रा होती है। तो यह मेरी पाठकीय यात्रा की बात है।

अक्षरज्ञान से पहले मैंने माँ की ख़ुशबू पहचानी
और पिता की गोद में सुनी
संसार की सबसे सुंदर प्रेम कवितायें
मेरी तुतलाहट के प्रत्यत्तर में उनकी मुस्कान
आज भी मेरी भाषा की सबसे विश्वसनीय कवितायें हैं।
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एक दिन
रात बंद ताले सी न होगी स्त्री के लिए
उसी के पास होगी उसकी सारी चाबियाँ

एक दिन हम मनुष्य होना सीख जाएँगे। 
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सब सुख में पगा था
सब सुख में डूबा
मैंने इस सुख को मोड़कर सहेज लिया
कि अचानक सुख ने उचककर बाहर झाँका
फिर जाने क्या हुआ
मैंने बहुत कोशिश की
लेकिन सुख तब से लगातार रो रहा है

मैं एक बात जान पाई हूँ
सुख को भी दुख होता है।

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छूटना अगर कोई नियम है तो
मैं चाहती हूँ मुझसे ये नियम छूट जाए।
नींद इतनी जरूरी है कि
इसके लिए ईज़ाद हुई दवा
ग्यारह दिन न सोएँ तो हो सकती है मौत
यहाँ आप ‘दिन’ को रात ही समझिएगा
बिलकुल उसी तरह
जैसे कई लोग सरकार को राष्ट्र समझते हैं

सरकार अब नींद को लेकर काफ़ी सजग है
वो सुनिश्चित करती है कि सोई रहे जनता
सोए हुए लोग ख़तरा नहीं होते
इसलिए जगह-जगह खोल दिये हैं लोरी सेंटर
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अब वहाँ दिन का नाम रात है
कोयले का नाम फ़ूल
चीख का नाम संगीत
भूख का नाम रोटी
भय का नाम भक्ति
और तानाशाही का नाम लोकतन्त्र

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इस व्यवस्था में हथियार खिलौने बन गए
दुष्कर्म में तब्दील हुआ प्रेम
घुट्टी में पिलाई जाने लगी अफ़ीम
चीख को अब संगीत का दर्ज़ा मिला
और सबसे खतरनाक अपराधियों को राजनीति में संरक्षण
किसी की मदद करने पर तय हुआ जुर्माना
प्यासे को पानी पिलाना 'रेयर ऑफ द रेयरेस्ट' क्राइम माना गया।
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जितनी एलर्जी मुझे हिन्दू मुसलमान करने वालों से है
उतनी ही स्त्रीद्वेषी लोगों से भी
स्त्री को देवी और स्त्री को जूती समान मानने वाले समान हैं
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आत्महत्याओं की ख़बरों के बीच
तानाशाह सुना रहा है जीवन के उपदेश
लोग तालियाँ बजा रहे हैं।
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उसने प्रेम को हृदय में रखा
मान को ललाट पर
स्त्री का हृदय हमेशा घायल रहा
और जीवन भर दुखता रहा माथा

मानिनी स्त्री को राई भर प्रेम मिला...

ये कुछ कविताओं के अंश भर हैं। पूरे संग्रह की हर कविता कई-कई बार पढ़ने का मन करता है। पूरा संग्रह पढ़ा जाना चाहिए। संग्रह 2025 में राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है।

एक ही गुजारिश है कृपया किताबें खरीदकर पढ़ें।

Friday, September 11, 2026

मौसम का पहला हरसिंगार खिला है


खाली हथेलियों में इन दिनों हरकत होने लगी है। जैसे कुछ रेंगता फिरता हो। देखती हूँ तो कुछ भी नहीं। वहम होगा शायद, हाँ वहम ही होगा। वरना इन लकीरों से खाली हथेलियों का तकदीर से कोई रिश्ता कबका ही टूट चुका है। तकदीर का तो पता नहीं, न जानती हूँ, न मानती ही हूँ लेकिन इन दिनों पैरों की हरकत अच्छी लगती है। बस कि चल पड़ने को बेताब। कोई उदासी, कोई मुश्किल, कोई दुविधा कि बस चल पड़ो, चलते रहो। पैदल चलना खूब बढ़ा है इन दिनों। शायद इसका असर मन पर भी पड़ा है।

मुझे सुधा जी और हरि जी मिले जीवन में। बड़े प्यारे लोग। सवाल न करने वाले लोग, देह की हरारत का पूछ मन का इलाज कर देने वाले लोग। इलाज न भी हो, सब ठीक हो जाएगा, सब ठीक ही है का भरोसा देने वाले लोग। बाज़ार के इस शोर में कोई आपको सुने यह बहुत है, फिर कोई समझ भी ले, और अनकहा भी समझ ले तो यह ख़ास ही तो है। छोटी सी मुलाक़ात हुई थी उनसे, पर असर साथ ही रहता है।

जीवन अपना ही है, मन भी। बस कि कहीं कोई फूल खिलता है और खिल उठती हूँ । कहीं कोई पत्ता झरता है और हथेलियाँ बढ़ा देती हूँ। एक पूरा जीवन जी चुके और शान से शाख़ से झरते उस पत्ते के आगे सजदा करती हूँ।  सीखना चाहती हूँ, हालात कैसे भी हों, खिलना ही है का सबक़। सलीके से झरने का सबक़।

 एक रोज़ चलते-चलते बीच रास्ते में दूब के जंगल के बीच छुपा सा एक नन्हा पौधा दिखा। और उस पर मुस्कुराता प्यारा सा फूल। वो ऐसे खिला था जैसे अपनी सामर्थ्य से ज्यादा खिलने की हुड़क हो उसमें। मैं देर तक वहीं बैठी रही। उसे देखती रही, उसे प्यार करती रही।

यही है जीवन। प्यार। खिलना, खिलखिलाना, झरना वो भी शान से।

खबरों से बचती फिरती हूँ अकसर। हाँ, सच कहा तुमने, कमजोर हूँ मैं। बहुत कमजोर। दुनिया के किसी भी कोने की उदास आँखें भीतर धंस जाती हैं, उनकी उदासी सोने नहीं देती। शायद हथेलियों में वह उदासी ही रेंग रही होगी, कि कुछ ख़बरें गुजर ही जाती हैं नज़रों के सामने से। आँखें मूँदने से हक़ीक़त तो नहीं बदलती।

रात भर नींद में कोई शोर बरपा रहा। कितनी कमजोर है वो इच्छा जो दुनिया के तमाम दुख सोख लेने से महरूम रह जाती है हर बार और अपने डेली रूटीन में उलझ जाती है। सोचती हूँ, मैं अगर इतनी कमजोर हूँ तो ईश्वर कितना कमजोर होगा। उसका तो फुलटाइम काम ही यही है, अन्याय से लोगों को बचाना और वो बेचारा खुद को नहीं बचा पा रहा।

सुबह में रात की उदासियाँ शामिल ही थीं लेकिन खिड़की खोली तो मौसम बदल चुका था। मौसम का पहला हरसिंगार खिला था...नज़र भर देख चुकने के बाद मैंने हरसिंगार के साथ दुआ की सबका दुख झरे, सबकी उम्मीद खिले...आमीन !

 

Tuesday, September 8, 2026

जीवन से बनती नहीं इन दिनों



कई दिनों से दिनों का कुछ पता नहीं। कई रातों से रातें भी लापता सी हैं। जीवन है कि अलसाए बच्चा सा ऊँघता हुआ पीठ पर बड़ा सा बस्ता लादे बिना मन के चला जा रहा है। मैंने खूब तलाशी ली अपनी पिछले दिनों और कुछ न मिला। न खुश होने की वजह कोई, न उदास होने की। न शिकायत किसी से। यूं यह अच्छा ही तो है कि बिना किसी तरह की खरोंच दिये कोई दिन गुज़र जाए, बिना आँखें नम किए कोई शब गुज़र जाए।

यूं खुश होने को कई बातों पर खुश हुआ जा सकता था। और न जाने कितनी ही वजहें थीं फफक फफक के रो लेने की। पर ऐसा कुछ न हुआ। ये किस कदर मुफ़लिसी के दिन हैं, कि साथ चलने को कोई उदासी भी नहीं, छूटने को कोई साथ भी नहीं। किसी ख़्वाब के टूट जाने का डर भी नहीं।

सामने खड़ा हरसिंगार खिलने की तैयारी में है। रातरानी अब भी वैसे ही महकती है। बस कि जीवन में चाय नहीं रही, आसमान से करने को कोई शिकायत नहीं, बारिशों में बहक जाने वाला मन नहीं रहा।  

ऐसा लगता है कोई मर गया है भीतर। वो जो लड़की थी जो खुश होने को मरी जाती थी। वो लड़की जो सड़कों पर नाचती फिरती थी, दरख्तों से लिपटकर गाया करती थी, जो नदियों और झरनों से बतियाया करती थी। वो लड़की अब भी उन सारी जगहों से गुजरती है, लेकिन अब वो खिलखिलाती नहीं। 

जीवन में कुछ न हो तो भी थोड़ी उदासी तो होनी ही चाहिए। ऐसी मुफ़लिसी का क्या करूँ कि जिसमें रोने की एक मुक्कमल वजह भी नहीं। 

यूं यह कमी पूरी करने में सियासतदान पूरे ज़ोरों से लगे हुए हैं, और सियासी हालात मुंह चिढ़ाते हुए कहते हैं, 'किस किस को रोओगी ...।'  

तकिये के नीचे से सूखे हुए मोगरे हटाती हूँ, उन सूखे हुए मोगरों से चिपके कुछ मुरझा चुके ख़्वाबों को भी। 

Friday, August 28, 2026

फिल्म “बंदर” के तीन बंदर ...


-ज्योति नंदा
फिल्म “बंदर” के तीन संवाद फिल्म की आत्मा है। मेरे लिए फिल्म इनहीं तीन बिंदुओं पे “तीन बंदरों’ की
तरह टिकी है.
पहला, “हमसब अपने ही जीवन के सर्कस के बंदर हैं।“
दूसरा, “हमसब सेक्सुअली रिप्रेसएड हैं”
तीसरा है तब आता है जब झूठे केस में फंसे समर (बॉबी देओल) स्वीकार करते हैं कि “मैं उस सीचुएशन
को ठीक से हैंडल नहीं कर पाया”
लेकिन इन तीनों बिन्दुओ में से सिर्फ फिल्म की टैग लाइन “हमसब अपने ही जीवन के सर्कस के बंदर
हैं।“ को ठहरने का मौका दिया गया है. बाकी दोनों को शब्दों में बाँध के हवा में छोड़ दिया गया
है।
“हमसब अपने ही जीवन के सर्कस के बंदर हैं।“ इस संवाद के गहरे अर्थ है। जिसे आप जीवन के
सूत्रवाक्य की तरह, जीवन की जटिलताओं को डिकोड करने में मददगार की तरह और सबसे ज्यादा
कठिन समय में खुद को संभालने के लिए थाम सकते हैं. इस लिहाज से ये महत्वपूर्ण कथन है. बिल्कुल
उसी तरह जैसे “सब किस्मत का खेल है, हमारे हाथ में क्या है?” सबकुछ हाथ से छूट जाने की स्थिति
में ये सूत्र हमे थमा दिया गया है। पीड़ा की असहनीय स्थिति से जीवन में वापिस लौट आने के लिए.

जहाँ कारणों और तर्कों की जगह नहीं बचती. ये कथन भी इस फिल्म में ऐसी ही स्थिति को बयां करता
दिखाया गया है। ऐसी बहुत सी कहानियां, फिल्मे होती हैं जिनमें कोई समाधान या द एंड जैसा नहीं हो
सकता. बंदर भी वही फिल्म है।

फिल्म के दूसरे हिस्से यानि मध्यांतर के बाद की फिल्म सिस्टम की खामियों को दर्शाती है. जेल के
सड़े हुए भयानक माहौल में, दुर्दांत अपराधियों के बीच उस इंसान को रख दिया जाए जिसने अब से पहले
छोटा-मोटा अपराध भी ना किया हो. और जो गलती हुई उसके बारे में जरा- सा भी आभास ना हो कि वो
भी कोई गलती थी. ऐसे में वो निश्चित ही पागलपन का शिकार हो जाएगा है। फिल्म के एक सीन में
समर (बॉबी दयोल ) की बहन वकील के साथ जेल में मिलने आती है।वे उससे सारी जानकारियाँ लेना
चाहते हैं जिससे की केस मजबूत हो सके। लेकिन अकल्पनीय परिस्थितियों का मारा समर सिर्फ रोता है
कुछ भी ठीक से नहीं बता पाता। वकील पूछता है “तुम्हारा भाई बेवकूफ है क्या?” बहन भी, जो भाई की
व्यवहारिक मासूमियत को हमेशा से जानती है बोल देती है “हाँ”. कहानी में यहाँ कुछ मिसिंग सा लगता
है। जिसे उसी कथन “हम सब अपने जीवन.... “ से समझाने की कोशिश की गई सी लगती है. बेहतर
होता की इस बात की कुछ और परतें खोली जातीं.

ऐसा ही दूसरा बिन्दु संवाद के रूप में है जो मेरी नजर में इस कहानी का केन्द्रबिन्दु है “वी आल आर
सेक्सुअली रिप्रेसएड” लेकिन ये डायलॉग परदे पर इतनी सरसरी तौर पर आता और चला जाता है की
समझ में ही नही आता कि दर्शक इससे क्या समझे?, ऐसा क्यों कहा गया? खासकर तब जबकि
निर्देशक अनुराग कश्यप हैं।

भारतीय समाज के लिए ये सिर्फ एक डायलॉग नहीं मानसिक बीमारी है। उस पर थोड़ा तो ठहरना बनता
था। कुछ गांठें खुलती तो समर मेहरोत्रा के भीतर बैठा कन्डीशंड स्त्रीद्वेष ज्यादा खुल कर आता.
हालांकि कि कुछ सीन्स में दिखाने की कोशिश भी की गई है। जैसे - जब वो नई गर्लफ्रेंड के साथ बैठा
है और एक्स गर्लफ्रेंड का मैसेज आते ही बहुत आसानी से, सहजता से झूठ बोलता है की प्रोड्यूसर का
फोन है। फोन पर गर्लफ्रेंड को स्टॉक करना। लेकिन ये सीन इस तरह से नहीं फिल्माए गए हैं की पुरुषों
की मानसिकता पर कोई सवाल उठ सके. ये सीन उसी तरह हैं जैसे कि “ये तो होता ही है”। एक और
अंतरंग क्षणों का सीन है समर कोई सेक्शुअल पोजीशन ट्राई करने को कहता है तो उसकी पार्टनर डर
जाती है “ऐसा करने में तो मेरा दम घुट जाएगा” जैसा की खबरों में है की इस फिल्म पर सेंसर की कैंची
चलने के बाद ही देश में रिलीज की गई। ऐसा लगता है कि सीन को दर्ज होने तक ठहरने नहीं दिया
गया. इस बात को ध्यान में रखते हुए, कह सकते हैं की फिल्म मे समर की जर्नी में उसके व्यक्तिगत
जीवन के हिस्से, खासकर सेक्शुअल बिहेवीयर वाले हिस्सों पर केची शायद ज्यादा चली। क्योंकि जो भी
दृश्य है उतना असर नहीं छोड़ पाते जितना जेल में हो रही मारकाट वाले दृश्य। कुछ इतने वीभत्स हैं कि
उनका असर तुरंत वही झटक देना चाहेंगे या नजरें हटाने पर मजबूर हो सकते हैं। जेल के माध्यम से
सीस्टम की खामियों वाला ये हिस्सा इतना लंबा है कि ऊब होने लगती है। ओटीटी प्लेटफॉर्म के दर्शकों
के लिए खासतौर पे सारे दृश्य देखे हुए से लगते हैं। जेल की क्राइम स्टोरीस ओटीटी के दर्शकों का प्रिय
विषय है।

एक दर्शक के नाते सिर्फ कयास ही लगाया जा सकता है की सेंसर की कैंची के कारण ही ऐसा हुआ
होगा। फिल्म ने देश विदेश में काफी ख्याति अर्जित की है। या फिर लेखक निर्देशक का क्राफ्ट से खेलने
के कारण भी हो सकता है, लगे की हमने तो अपनी बात कही लेकिन दर्शक वही लेकर गया जो उसे
देखना था. यानि फिल्म देख कर आपके साथ जेल की हिंसा ही ज्यादा ठहरती है। जबकि वो कहानी का
एक हिस्सा भर है। यहाँ मुझे बॉबी देओल को इस रोल के लिए चुने जाने पर भी संदेह है. लव मेकिंग
सीन में भी सपाट चेहरा और जेल में घट रहे जीवन से जो भीतर बदलाव हो रहे उसकी कोई झलक चेहरे
पर नहीं दिखती सिर्फ आखिरी सीन में एक दो सेकेंड बस.

सिनेमाहाल तक “बंदर” के पहुँचने का कारण भी फिल्म में बॉबी देओल का होना है. यहाँ ये सवाल भी उठता है कि क्या भारतीय दर्शक हर तरह का सिनेमा देखने के लिए तैयार है? जहाँ उसे स्पूनफीड ना किया जाए बल्कि उसकी समझ और ग्रहण करने की क्षमता पर छोड़ दिया जाए। वो दर्शक जो इन दिनों सिनेमाहाल में दो घंटे बिना मोबाइल में झाँके नहीं रह पाते. वो दर्शक जो बंदर फिल्म में समर से शुरुआत से ही सिमपेथि बना लेता है। झूठा केस है को तुरंत सच मान लेता है। एक सीन में आई प्रतिक्रिया से ज्यादा साफ हो जाता है -- समर के घर को अपना स्पेस समझने वाला सीन या समर पर अपना अधिकार जताने वाले दृश्य देखते हुए हाल में बैठे पुरुष नायिका पर जोर का ठहाका लगाते. लेकिन क्लाइमेक्स में जब समर का व्यवहार थोड़ा और खुलता है, और उसका कनफेशन आता है “मैं उस सीचुएशन को ठीक से हैंडल नहीं कर पाया” (वो भी नेरेटर के वॉयस ओवर के रूप में आता है, सीधे संवाद के रूप में नहीं।) तब दर्शकों (पुरुष) में सन्नाटा छा जाता है वही जो कुछ ही मिनटों पहले ठहाके लगा रहे थे, लगा जैसे ये तो अप्रत्याशित था, जबकि इसके संकेत ऊपर बताए दृश्यों में मिलते हैं अगर कोई अनबायस होकर देखे। फिर जेल में जो उसके साथ घटता है उससे वापिस सिंपथी हो जाती है। 

शायद इसीलिए निर्देशक को स्टेटमेंट देना पड़ता है “ये फिल्म “एंटी मी टू” नहीं है. इस दौर के राजनीतिक समाजिक उथल-पुथल भरे माहौल में सिनेमा भी अन्य अभिव्यक्तियों की तरह अछूता नहीं है। बहुत से लेखक निर्देशक “ऐसा ही होता है” को कटघरे में खडा करने का साहस कर रहे हैं। जिनमें क्राफ्ट और कंटेन्ट में कौन ज्यादा महत्वपूर्ण है कि बहस भी लगातार जारी है. कुछ हफ्तों पहले फिल्म “माँ- बहन” आई थी. इसके क्राफ्ट पर सवाल उठाने वालों में भी इस बात पर एक राय थी कि फिल्म अपनी बात अच्छी तरह से कहने में सफल रही. फिल्म “बंदर” के बारे में ऐसा पूरे कान्फ़िडेन्स से नहीं कह सकते. इसलिए भी फिल्म देखी जानी जरूरी ही ताकि आप अपनी राय खुद बना सकें.

ज्योति नन्दा फिल्मों पर अपनी काफी स्पष्ट और बेबाक राय रखती हैं। फिल्में देखना, उनका विश्लेषण करना उन्हें पसंद है। वे कहानियां लिखती हैं, स्क्रिप्ट लिखती हैं, कुछ शॉर्ट फिल्मों का उन्होंने निर्माण भी किया है। थियेटर उनका प्यार है, कुछ महत्वपूर्ण नाटकों में उनकी भूमिकायें काफी सराही गई हैं। 

Email -jnanda1006@gmail.com

Tuesday, August 18, 2026

कबिरा सोई पीर है- हमारे समाज का आईना


नवीन जोशी- 
सघन संवेदनाओं और सामाजिक-राजनैतिक चेतना से सम्पन्न प्रतिभा कटियार कविताओं के अलावा कहानियां भी लिखती रही हैं। रूसी कवि मारीना त्स्वेतायेवा की जीवनी 'मारीना' में कविता एवं कवि-मन की उनकी समझ के साथ उनके गद्य ने भी ध्यान खींचा था। पिछले वर्ष प्रकाशित उनका पहला उपन्यास 'कबिरा सोई पीर है' भी प्रकाशन के बाद से चर्चा में है।

भारतीय समाज में गहरे पैठी वर्णाश्रमी संरचना और उससे उपजी मारक स्थितियां एवं अंतर्विरोध इस उपन्यास का केंद्रीय विषय हैं। घर-परिवार और समाज में स्त्रियों की स्थिति, पुरुष सत्ता द्वारा उनका दमन और क्रमश: उभरती स्त्री चेतना केंद्रीय विषय में गुंथे हुए हैं। प्रेम उनका प्रिय विषय है, इसलिए प्रेम कथा में इस सबको खूबसूरती से पिरोया गया है।

प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी कराने वाले एक कोचिंग संस्थान से कथा शुरू होती है। शुरूआती पृष्ठों में ही 'साला चमार कहीं का। आकर बैठ गया है सर पर', 'ब्राह्मण होकर आरक्षण का पक्ष ले रहा है तू? एक दिन यही आरक्षण तेरे सामने खड़ा होगा भूत की तरह', और 'मैं हर लड़की के, हर स्त्री के सम्मान के लिए लड़ता हूं, लड़ूंगा' जैसे वाक्यों से पाठक का सामना होता है और संकेत मिल जाता है कि यह कैसी लड़ाई का मैदान है।

समवय लड़के-लड़कियों में निश्छल दोस्ती, प्रेम, ईर्ष्या, झगड़े सब स्वाभाविक हैं। गरीब परिवारों में कोचिंग जाते बच्चे बेहतर भविष्य का सपना हैं। सपनों के अलग-अलग धरातल हैं। कोई परिवार ब्राह्मण है और कोई दलित। गरीबी बराबरी का मंच नहीं है। जाति की ऊंच-नीच उसे घोर असमान बनाती है।

प्रेम ऐसे बंधन नहीं देखता। वह असमान मंच पर पेंगें मारता झूलता रहता है। शुरू-शुरू में जो झटके आसानी से झेल जाता है प्रेम, वही खुरदुरी जमीन पर पैर रखते ही कभी जातीय ठोकर खाता है और कभी पुरुष के दम्भ की। कोचिंग सेंटर से शुरू हुआ दलित तृप्ति और ब्राह्मण अभुनव का प्रेम इसी नियति को प्राप्त होता है। 'हर लड़की का सम्मान करता हूं' कहने वाला अनुभव अपने भीतर भरे पाखण्ड को स्वीकार तो करता है लेकिन पितृसत्ता का चोला नहीं फेंक पाता। उसका प्रेम इसी बात से सूख जाता है कि तृप्ति आईएएस परीक्षा में पास हो गई लेकिन वह रह गया।

कथा सुखांत नहीं है लेकिन प्रेम में अपने प्रेमी से अधिक एक पुरुष से छली गई तृप्ति स्वाभिमान के मोर्चे पर मजबूत होती है। तमाम जिल्लत से मुक्त होने के लिए उसके पिता ने आत्महत्या का जो रास्ता चुना, वह तृप्ति का भी रास्ता बंद कर गया था लेकिन तृप्ति फिर खड़ी होती है। उसका फिर से संकल्पबद्ध होना, अफसर बन गए अनुभव के साथ संयोगवश हो गई भेंट के प्रतिरोध में ही जैसे सम्भव होता है। पुरुष दम्भ से वह ताकत ग्रहण करती है और आंसू पोछकर अगले समर के लिए कमर कसती है। यह उपन्यास का सबसे मजबूत पक्ष है।

कथा तृप्ति और अनुभव के प्रेम के इर्द-गिर्द एकरेखीय नहीं रहती। तृप्ति की बहन सीमा के वैवाहिक जीवन की भयावह स्थितियां स्त्रियों के व्यापक दर्द को स्वर देती हैं, जिसमें पत्नी से बलात्कार का विमर्श भी शामिल है। उसके भाई अंशुल की कहानी और अनुभव के पिता के दफ्तर के हालात जातीय नफरत और राजनीति के विरोधाभासों की पोल खोलते हैं। सुधांशु और कनिका का प्रेम और पारिवारिक द्वंद्व भी हमारे ही समाज का आईना है। इस तरह उपन्यास व्यापक संदर्भ और फलक ग्रहण करता है।

प्रतिभा का कवि पूरे उपन्यास पर छाया हुआ है- बीच-बीच में प्रयुक्त किए गए कवितांश, अध्यायों के शीर्षक और प्रत्येक किस्से की शुरूआत और अंत में दी गई शायरी इसका प्रमाण है। भाषा जरूर 'थोड़ा सा रोमानी हो जाएं' वाली छूट लेती है, जिसमें पहाड़ और नदी को भी साथ ले लिया गया है।

बढ़िया उपन्यास है और खूब पठनीय। प्रतिभा से भविष्य में और अच्छे उपन्यासों की उम्मीद बंधती है।
 
15 अगस्त 2026, लखनऊ।
(उपन्यास- कबिरा सोई पीर है', रचना- प्रतिभा कटियार, प्रकाशक- लोकभारती, प्रयागराज।)