अंत में मंगलसूत्र जिंदाबाद, आज़ाद लड़कियों का कैरेक्टर एसेसनेशन, उन्हें ओब्जेक्टीफाई करना। प्यार और रिश्तों पर लंबे लंबे दार्शनिक लेक्चर जिनका कोई अर्थ नहीं।
Saturday, June 20, 2026
कॉकटेल-2 : मिसोजिनी से भरपूर घटिया मसाला
अंत में मंगलसूत्र जिंदाबाद, आज़ाद लड़कियों का कैरेक्टर एसेसनेशन, उन्हें ओब्जेक्टीफाई करना। प्यार और रिश्तों पर लंबे लंबे दार्शनिक लेक्चर जिनका कोई अर्थ नहीं।
Tuesday, June 16, 2026
पहली मुलाक़ात का तिलिस्म
गुवाहाटी एयरपोर्ट की सबसे खूबसूरत बात यह लगी कि न कोई ज्यादा भीड़ न आपाधापी। संभवतः हमारी फ्लाइट सुबह की थी इसलिए भी ऐसा हो। एक सुकून, एक ख़ामोशी और तसल्ली सी दिखी। हर एयरपोर्ट की अपनी कुछ अलग सी पहचान होती ही है। और अगर हम पहली बार उस एयरपोर्ट पर होते हैं तो तस्वीरों का मोह भी होना लाज़िम है। एयरपोर्ट पर जो सज्जा थी उसमें असम ज्यादा था या मेघालय यह नहीं पता लेकिन उसमें एक बारीकी और तरतीब थी।
गुवाहाटी एयरपोर्ट से हमें शिलॉन्ग जाना था। एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही गर्मी से सामना हुआ। ये अपेक्षित तो बिलकुल भी नहीं था। देश की राजनैतिक गर्मी का असर यहाँ के मौसम पर भी पड़ रहा है शायद सोचते हुए हम माँ बेटी कैब के भीतर दुबक गए। सफर की थकान और तेज़ चिलकती धूप का असर था शायद बिटिया तुरंत सो गई और कुछ देर में मैं भी।
छोटी सी झपकी के बाद आँख खुली तो मौसम बदलने लगा था। 'वेलकम टू मेघालय' का बोर्ड बारिश की फुहारों के बीच ही दिखा। यह हमारा मेघालय में स्वागत था। बरसता भीगता मौसम। ऐसी चिहुँक उठी मन में। मन बावरा हो उठा। फाइनली मैं मेघालय में हूँ।
उमियम झील : मेघालय आने की योजना में मेरे मन में कोई योजना नहीं थी। मुझे सिर्फ बादल और बारिशों से मिलना था और उनके हाथों में हाथ डालकर घूमते फिरना था। फिर भी योजनाओं की बाढ़ चारों तरफ थी। ये देखना वो देखना। रील्स से लेकर चैट जीपीटी तक सक्रिय थे। साथ ही सक्रिय थे वो लोग जो आकर गए थे। इस सक्रियता से यह हुआ कि मुझे कुछ जगहों के नाम पता चल गए। वहाँ जाऊँगी या नहीं यह पक्का तय नहीं था। लेकिन उमियम झील रास्ते में ही पड़ती थी और पानी वाली सारी जगहों के लिए तो हमेशा हाँ ही होती है।
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हमारे ड्राइवर अब्दुल भाई ने उमियम के सामने से सर्रर्र से गुजरते हुए बताया कि ये है वो झील। मैंने सोचा क्या ऐसे देखते हैं झील। मुझे लोनावला का ब्रिज याद आया हम बस गुजरे उधर से, ठहरकर निगाह भर देखा भी नहीं। वो हुड़क अभी तक फंसी हुई है।
मैंने अब्दुल भाई से कहा, जरा रुकिए कुछ देर। वो बोले बारिश है मैडम कहाँ जाएंगी। मैंने आप फिकर न करिए, आप बस रुकिए। वो थोड़ा आगे जाकर रुक गए। बिटिया के बैग से दो छतरियाँ निकलीं। हमने छतरियाँ और पैरासीटामॉल सबसे पहले रखे थे। हम जानते थे छतरियाँ ज्यादा देर टिकेंगी नहीं और उसके बाद पैरासीटामाल ही काम आएगी। खैर, अभी तो छतरी ही काम आई। हम दोनों बरसते मौसम में आधे भीगते आधे झूठ-मूठ में खुद को बचाते उमियम के किनारे टहलने लगे। झील पर बारिश होते देख 'समंदर पर बारिश' की याद हो आई। एक ही बारिश के कितने रूप हैं, पहाड़ू पर अलग, जंगल पर अलग, झीलों पर अलग, समंदर पर अलग और सड़कों पर एकदम अलग। मुझे फूलों पर गिरती बारिश की याद भी ताजा हो आई।
उमियम का विस्तार खूब बड़ा है। ऐसा लग रहा था वो हल्की रिमझिम की चादर ओढ़े कच्ची सी नींद में है। किनारे कुछ लोग छतरियाँ लगाए शायद मछ्ली पकड़ने की फिराक में थे। पल पर से गाडियाँ गुजर रही थीं लेकिन कोई शोर नहीं था। झील के ठीक सामने पहाड़ियों पर बादलों की धमाचौकड़ी मची हुई थी। बावरा मन सब कुछ को पी लेने को आतुर था। सारा सौन्दर्य, सारी छुअन, सारे बादल, सारे पानी। और शायद हम पी भी रहे थे। इसीलिए तो भीतर का सारा कचरा झाड़कर आए थे कि भीतर हर कोने में मौसम की जगह हो।
हम लगभग पूरी झील का चक्कर काटने की फिराक में थे। उन्हीं रास्तों पर फिर फिर लौटना, फिर फिर दृश्यों को आँखों में समेट लेना जारी था। पूरे रास्ते में उँगलियों की पोरों पर, हथेलियों में बारिश समेटने को बेताब रही। ऐसा लग रहा था हर बूंद मेरी सूखी रूह पर मरहम है।
बारिशें मुझे हमेशा से बेहिसाब चाहिए थीं...बस उस बेहिसाब होने में बेमौसम की बरसात और किसी का घर तबाह करने वाली बरसात हरगिज़ नहीं थी।
फ़िलवक्त बूंदों ने लाड़ लड़ाते हुए कहा, मेघालय आई हो, सुखी होकर ही जाओगी। और सुख मेरी देह पर रेंगने लगा था।
(जारी...)
Sunday, June 14, 2026
दर्द, प्रतिकार और अस्मिता का दस्तावेज है ‘कबिरा सोई पीर है'

जाति, स्त्री अस्मिता, प्रतिरोध और समाज की परतों को संवेदनशील तरीके से सामने लाता है है ये उपन्यास. (Image NDTV)
‘कबिरा सोई पीर है' उपन्यास को खोलते ही आप आप किताब का समर्पण पाठक को अपने पास रोकता है. यह समर्पण “जो अपनी राख से हर बार जन्म लेती रही और लगातार संघर्ष में है ऐसी अस्मिताओं के नाम” यूं ही किसी के जेहन में नहीं आ सकता. इसके लिए एक सुलझी हुई सामाजिक राजनैतिक समझ, परिपक्वता और पक्षधरता की जरूरत होती है. इस समर्पण से उपन्यास और लेखिका का पक्ष स्पष्ट होता है.
जातिभेद की जकड़नें, सामाजिक रूढ़ियाँ, स्त्री अस्मिता की छटपटाहट इस उपन्यास के केंद्र में है. स्त्रियों के मन के भीतर छुपे दर्द, पीड़ा, कसक, दबे हुए सालते हुए दुख, जीवन जीने के ढंग, प्रतिरोध से जुड़े अनुभव बहुत मजबूती से उपन्यास में आए हैं.
मेरी आदत है कि कोई किताब पढ़ते हुए जो हिस्से मुझे अच्छे लगते हैं मैं उन्हें रेखांकित करता जाता हूँ. इस उपन्यास के साथ भी ऐसा ही किया. लेकिन उपन्यास के अंत तक आते-आते मैं हैरान रह गया यह देखकर कि लगभग आधा उपन्यास ही रेखांकित हो चुका है. उपन्यास में इतने सुगठित वाक्य हैं, हिस्से हैं कि पाठक वहाँ लौट कर आता है, ठहरता है और सोचने पर मजबूर होता है.

प्रेम कुमार, इस पुस्तक के समीक्षक
सवर्ण और दलित परिवारों का परिवेश, बुनावट, स्थितियां, मानसिकता, मनोविज्ञान, द्वंद्व विविध पात्रों और घटनाओं के माध्यम से खुलते हैं. इतने सारे पात्रों, घटनाओं और उनके भीतर की गहन यात्रा को एक उपन्यास में साधना आसान नहीं होता. लेकिन लेखिका ने पूरे कौशल के साथ यह किया है. उनका प्रस्तुति का अंदाज और सलीका प्रभावित करता है.
उपन्यास में हर कदम पर कवि उपस्थित है. इस कवि ने उपन्यास के हर हिस्से को बहुत सुंदर बना दिया है. लेखिका पत्रकार, कवि और कथाकार हैं. उनकी इस त्रयी ने उपन्यास को पठनीयता और गहनता दोनों लिहाज से समृद्ध किया है.
अनुभव, सीमा, माँ, पिता, तृप्ति, सुधांशु, कनिका, इंस्पेक्टर चौबे, नर्स सारे किरदार अलग-अलग तरह से अनूठे हैं. हर पात्र अपनी यात्रा और परिवेश के साथ उपस्थित है और इसको पात्रों की भाषा, शब्दावली के जरिये लेखिका ने रखा है. देशज शब्दों का प्रयोग, मुहावरों का प्रयोग अच्छा लगता है. कुछ ऐसे शब्द जो कहीं खो से गए थे उनका प्रयोग लेखिका की रेंज को दिखाता है कि उनकी भाषा पर, समाज पर कितनी बारीक पकड़ है, अवलोकन कितना सूक्ष्म है. वाक्यों में जो उपमाएँ हैं, विशेषण हैं, बिम्ब हैं सबमें एक सच है, सम्प्रेषण है. ये यूं ही सुंदर बनाने के लिए नहीं हैं, इनके बड़े अर्थ हैं.
दलित पृष्ठभूमि पर पहले भी काफी लिखा गया है. लेकिन इस उपन्यास में एक अलग सा अंदाज है, चुभन है, व्यंग्य है, क्रोध है, उबाल है लेकिन तरीका बड़ा सलीके का है. आज के परिवेश में जब एक ऐसा वर्ग खड़ा हो गया है जो यह जानने और मानने से इंकार कर रहा है कि यह भी एक सच्चाई है उसी दौर के घटनाक्रम और पात्रों के जरिये लिखा गया यह उपन्यास महत्वपूर्ण है.
उपन्यास में गांधी, अंबेडकर की घटनाओं का जिक्र भी महत्वपूर्ण है, जो लेखिका की सोच, तार्किकता, परिपक्वता को दिखाता है. यह सब एक लंबी तैयारी से ही संभव है. यह राजनैतिक उपन्यास है जिसमें समाजशास्त्रीय विवेचन घटनाओं और पात्रों के जरिये हुआ है.
यहाँ केंद्र में जाति का मुद्दा तो है ही लेकिन उसके अलावा बहुत से मुद्दे हैं जो मुद्दों की तरह नहीं रोज़मर्रा के जीवन की तरह इसमें खुलते हैं. वह हिस्सा जब छोटी बहन अपने ही भाई के द्वारा यौन शोषित होती है और किसी से कुछ कह नहीं पा रही, फिर दोनों बहनों का संवाद, उनकी सदाशयता घटना की कचोट की परतों को बहुत आहिस्ता से खोलती है. जैसे कोई ज़ख्म साफ करता हो कि दवा भी लग जाय और दर्द भी न हो.
स्त्रियों के संसार की तमाम परतें उपन्यास में खुलती हैं. जहां बड़े सुभीते से लेखिका यह बताने में सफल हैं कि ये जो एक-दूसरे के आमने सामने खड़ी स्त्रियाँ हैं असल में ये सब सताई हुई हैं और जरा सा हाथ बढ़ाने की देर है सब साथ ही हैं. स्त्रियों के हक़ की पूरी लड़ाई है लेकिन कहीं कोई लाउडनेस नहीं है.
प्रकृति के साथ जुड़ाव कदम-कदम पर इतने रूपों मे दिखता है कि आप उस जुड़ाव से जुड़े बगैर नहीं रह सकते. गंगा, गंगा पर पड़ती सूरज की किरनें, रातरानी की उचकती डाल, उसकी ख़ुशबू, चिड़िया सब आपके साथ हो लेते हैं. गंगा का किनारा, शहर ऋषिकेश उपन्यास में किसी पात्र की तरह आता है. गंगा नदी को कैसे सखि के रूप में तब्दील कर लिया है लेखिका ने जिससे कुछ भी कहा सुना जा सकता है. इसमें एक वेदना भी है और सुख है. पूरे उपन्यास में पीड़ा और प्रतिकार एक साथ चलते हैं. प्रकृति इस यात्रा में पात्रों की उदासी पोंछने और ज़ख़्मों पर फाहे रखने, कभी-कभी सपने बुनने के लिए उपस्थित रहती है. कई हिस्सों को पढ़ते हुए सुमित्रानन्दन पंत की याद हो आई.
मुझे उपन्यास में आए हर छोटे बड़े पात्र की उपस्थिति ने जिस तरह सामाजिक ताने-बाने की परतों को खोला है उसने बहुत प्रभावित किया. कोचिंग चलाने वाले विक्रम त्रिपाठी हों या कोचिंग के बाहर छात्रों की बातचीत, वो माहौल. सीमा का अपने होने वाले पति से पहली बार मिलने का अनुभव, सीमा की शादी में आई औरतों का तृप्ति पर किया गया कटाक्ष, भाई का एक्सीडेंट, सीमा का मैरिटल रेप और अस्पताल की नर्स का यह कहना कि, 'घर का है करके छोड़ना मत' इंस्पेक्स्टर चौबे का गुस्सा, चाचा की दलित राजनीति में घुसने की कमजोर सी कोशिश, पापा की रोज की हालत, चपरासी विनोद के ताने और तृप्ति की चुप्पी, उसके फर्स्ट आने पर पिता का माफी मांगना और घर आकर कहना बेटा अब कभी फर्स्ट मत आना, तृप्ति और सीमा की माँ का रात दिन का बड़बड़ाना, सीमा की ससुराल में स्त्रियों का पहले अलग-थलग होना फिर एक होना, कनिका की माँ की पति द्वारा किए गए यौन शोषण की कहानी ये सब समाज की सच्चाई पर पड़े सुनहरी पर्दे को तार-तार करते हैं.
मैंने अरसे बाद कोई उपन्यास पूरा पढ़ा और इसका श्रेय उपन्यास को ही जाता है कि वह खुद को पूरा पढ़ा ले गया. इसे पढ़ते हुए लेखिका की पूरी तैयारी दिखती है. उनके पास समाजशास्त्रीय निगाह है, राजनैतिक समझ है और कोमल मन है. एक एक्टिविस्ट है जो समझाइश भी देता है. उपन्यास के शीर्षक बड़े ही सुंदर शेर के टुकड़े हैं जिनका उस हिस्से से जुड़ाव है. और अंत में वह पूरा शेर भी दिया गया है. यह काफी दिलचस्प है.
उपन्यास के अंतिम पेज पर प्रियदर्शन द्वारा लिखे गए ब्लर्ब की हर पंक्ति से सहमत होते हुए यही कहना चाहता हूँ कि यह एक महत्वपूर्ण उपन्यास है और इसे खूब पढ़ा जाना चाहिए, इस पर बात होनी चाहिए.
पुस्तक- कबिरा सोई पीर है (उपन्यास)
लेखक – प्रतिभा कटियार
प्रकाशक- लोकभारती प्रकाशन
लेखक परिचय : प्रेम कुमार साहित्य, समाज और संस्कृति से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय लेखन करते हैं. उनकी रुचि समकालीन हिंदी साहित्य, सामाजिक न्याय, अस्मिता विमर्श और वैचारिक बहसों में रही है. पुस्तक समीक्षा और आलोचनात्मक लेखन के माध्यम से वे साहित्यिक कृतियों को व्यापक सामाजिक संदर्भों में पढ़ने और समझने का प्रयास करते हैं.
https://ndtv.in/literature/kabira-soi-peer-hai-book-review-pratibha-katiyar-11632427
Friday, June 12, 2026
मैंने सपने में तुम्हें देखा था
Thursday, June 11, 2026
माँ बहन : हँसाएगी नहीं चुभेगी
उफ़्फ़...यह तुम्हारे हाथ का खाना, तुम्हारे हाथ की चाय....ज़िंदगी निगल रखी है इसने। वो रोटी बनाती है। बनाती जाती है, बनाती जाती है। उस घर की घड़ी में समय के पीछे से रोटी झाँकती है। कुछ दृश्यों को जान बूझकर नाटकीय बनाया गया है लेकिन वह नाटकीयता मारक है, चुभती है। हंसी नहीं आती, कुछ कचोटता है।


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