Sunday, February 5, 2023

तितली- जीवन की धूप-छाँव के रंग



तितली उपन्यास एक सांस में पढ़ लिया था ऐसा कह सकते हैं लेकिन कुछ भी कहने की बजाय मौन में रहना ज्यादा भला लगा. उपन्यास पढ़ने के बाद जो पहला ख्याल आता है वो यह कि यह उपन्यास मृत्यु के बारे में है लेकिन जाने क्यों मुझे लगा कि असल में यह ज़िन्दगी का उपन्यास है. ज़िन्दगी को थाम के रखने की उस जिजीविषा का जिसमें अवसाद, पीड़ा, बेचैनी शामिल होने लगती है.

तितली उपन्यास को पढ़ते हुए मुझ मारीना बहुत याद आई. नाय्या, मारीना...कार्ल, इरिना.

कोई बात अधूरी छूट जाय तो बहुत दिक करती है यह उपन्यास उसी अधूरी छूटी हुई बात के बारे में है. वो बात जो असल में जिन्दगी थी पूरी.

जीवन क्या है, कितना है. कब कोई जीवन पूरा होता है और कब वो अधूरा रह जाता है. क्या इसका उम्र से कोई लेना-देना है. नहीं जानती, लेकिन इतना जानती हूँ बीच राह में यूँ ही अचानक बिछड़ गए लोग छूट गए लोगों के जीवन में इस कदर रह जाते हैं कि उनका जीवन सच में बहुत मुश्किल हो जाता है.

नाय्या की पीड़ा मारीना की पीड़ा एक जैसी ही तो थी. पीडाएं सहचर होती हैं. वो सच्ची दोस्त की मानिंद साथ हो लेती हैं. किसी भी देश, काल, व्यक्ति की पीड़ा कांधे से आकर टिककर बैठ सकती है. अपने दुःख से, पीड़ा से रिहा होने में कई बार दूसरे की पीड़ा को अपना लेना काम आया है. 

तितली को पढ़ते हुए कई जख्म खुलने लगते हैं, कुछ भरने भी लगते हैं. उपन्यास का पहला हिस्सा दूसरे हिस्से की तैयारी सरीखा है. पूरे वक़्त लगता है कि काफ्का आसपास हैं कहीं. हालाँकि वो उपन्यास में कहीं नहीं है. उपन्यास में बहुत सारे लेखकों का जिक्र है, उनके मृत्यु के बारे में लिखे कुछ अंश हैं. कुछ धूप छाँव सा समां बनता है जैसे जीवन की तैयारी हो रही हो. या शायद मृत्यु की. या शायद लम्हों की. मेरे जेहन में हमेशा से मृत्यु की बाबत सबसे पहले काफ्का का लिखा ही उभरता है फिर कामू फिर नीत्शे लेकिन तितली पढ़ते हुए यह विस्तार बढ़ता जाता है. पढ़ना और जीना दो अलग शय हैं. कुछ भी पढ़ना, किसी का भी लिखा पढ़ना जीने की तैयारी नहीं हो सकता लेकिन जिया हुए का स्वाद पढ़ने के संग जब मिलता है तब समझ तनिक और साफ़ होती है.

मुझसे कोई पूछे कि तितली उपन्यास कैसा लगा तो मैं सिर्फ चुप ही रहूंगी. ‘अच्छा लगा’ कहना मुझे अच्छा तो नहीं लगेगा. हालाँकि यह जरूर है कि इसे पढ़ना अपने भीतर के उन अंधेरों में झांकना है जिन्हें हमने छुपा दिया था. उन जख्मों को तनिक मरहम लगाना है जिसे हम इग्नोर किये बैठे थे. सामना करना है जीवन का, उसके हर रूप का. यह उपन्यास उस एहसास का मीठा स्वाद है जो दूर देश में बैठा कोई व्यक्ति महसूस कर पाता है. एक लेखक जब पाठक होता है और अपने प्रिय लेखक की पीड़ा को अपने भीतर समेट लेता है, उससे मिलने का ख़्वाब उसकी आँखों में दिपदिप करने लगता है.

कोई भी लेखक असल में तो पाठक ही है. तो यह उस उस पाठक के अपने लेखक के प्रति प्रेम की कहानी है. उस कहानी में सात समन्दर पार की यात्रा है, लेखक से हुईं खूबसूरत मुलाकातें हैं और जीवन है.

मुझे इस उपन्यास में शायर का किरदार किसी रिलीफ सा लगा. जैसे तेज़ धूप में पाँव जैसे ही जलने लगते हों शायर की उपस्थिति छाया कर देती हो.

मैं एक स्त्री हूँ और मैंने इसे स्त्री नजरिये से पढ़ते हुए पाया कि क्लाउस की प्रेमिका हो, शायर हो, खुद नाय्या हो कितना कुछ अनकहा रह गया है अभी. कितना कुछ सुनना बाकी है उनसे. लेखक ने उपन्यास भर का सामान जमा किया और जो छूट गया मेरा मन उसमें अटका हुआ है. क्यों समझ से भरी स्त्रियों के हिस्से कोई समझ और संवेदना से भरा पुरुष नहीं आता.

कभी-कभी लगता है कि यह उपन्यास अगर स्त्री ने लिखा होता तब यह कैसा होता? 

लेखक जिद्दी है वो अपने सपनों का पीछा करना जानता है. यह बात इस उपन्यास की ख़ास बात है. यह दो लेखकों की कहानी है, एक पाठक जो लेखक भी है का अपने प्रिय लेखक के प्रति प्रेम की कहानी है. यह कोपेनहेगन की धूप, वहां की हवा, पेड़ और भाषा की कहानी है जिसमें कॉफ़ी की खुशबू घुली हुई है. यह कहानी है इमोशनली एक्स्जास्ट होकर पस्त एक लेखक की यात्रा की. नाय्या की उपस्थिति इन सारी कहानियों का वो सुर है जिस पर सधकर ये सब कहानियां आगे बढ़ती हैं.

लेकिन जाने क्यों लगता है कि बहुत सी कहानियां शेष रह गयी हैं वो जीवन के किसी नए मोड़ पर हमारी बाट जोह रही होंगी. सोचती हूँ छत्तीसगढ़ जाऊं तो शायर से मुलाकात होगी क्या?

किताब में प्रूफ की गलतियाँ अखरती हैं. यूँ भी लगता है कि शायर के पत्रों की भाषा और शैली इतनी परिमार्जित न होती तो शायद और अच्छा होता. यह उपन्यास बहुत से सवाल ज़ेहन में छोड़ता है. इसके पूरा होते ही काफी सारा अधूरापन बिखर जाता और यही इसकी खूबसूरती है.

Monday, January 30, 2023

प्रेम- दो कवितायें



वादियाँ दूधिया कोहरे से ढंकी थीं 
और सूरज नन्ही बदलियों में छुपकर 
लुका छिपी का खेल खेल रहा था 
बसंत हथेलियों पर   
सपनों की कोंपलों खिलने को आतुर थीं 
ठंडे रास्तों पर 
जीने की ऊष्मा बिखरी हुई थी 
जैसे उनींदी आँखों पर 
बिखरा होता है इंतज़ार 
जब तुम आए  
सच में, वक़्त ठहरा हुआ था हथेलियों पर. 

भरोसा और उम्मीद 
आते हुए प्रेमी के चेहरे पर 
प्रेमिकाएं तलाशती हैं भरोसा 
और जाते हुए प्रेमी की पीठ पर 
लौट कर आने की उम्मीद.

Thursday, January 26, 2023

जब बसंत आता है...



जब बसन्त आता है
तब बसन्त कहाँ आता है
वो तो आता है तब
जब आती है मिलने की आस
जब खिलते हैं मन के पलाश
जब भरोसे पर बढ़ता है तनिक और भरोसा
जब टूटने से बच जाता है कोई ख़्वाब
जब यह धरती बच्चों की खिलखिलाहट से
गूँज उठती है
जब प्रेयसी के माथे पर सजती है
सूरज की पहली किरन

जब बसंत आता है तब कहाँ आता है बसंत
वो तो आता है तब जब आती हैं 
तुम्हारे आने की आहटें...

Sunday, January 22, 2023

तितली-मानव कौल


हम अमरकंटक गए थे तितलियाँ देखने लेकिन वो मुझे मिली घर में ही. जब लौटकर आई तो देखा ड्राइंगरूम में लगे पाम के पेड़ में तितली ने जन्म लिया है. उसका नाम हमने सोना रखा. दो दिन बाद सोना ने अपने जन्म की टहनी छोड़ी और कमरे में टहलना शुरू किया. जब भी दफ्तर से लौटती वो मुझे नयी जगह पर बैठी मिलती. उसके पंख बेहद चमकीले थे और चाल ठीक वैसी ही जैसे बच्चे सीखते हैं चलना.

एक रोज जब मैं ऑफिस में थी बेटू का फोन आया. उसकी आवाज़ में चहक थी. उसने हँसते हुए बताया ‘तुम्हारी सोना उड़ गयी...’ मैंने पूछा, ‘कहाँ’ उसने कहा ‘उड़कर खिड़की से बाहर चली गयी.’ वो देर तक हंसती रही.

उस रोज जब मैं वापस लौटी तो सोना को न पाकर उदास थी. तब बेटू ने कहा, ‘वो तितली है, उसे जंगल में ही जाना चाहिए.’ मैंने इस बात को सुना और अपने भीतर सहेज लिया.

कानों में न जाने कितनी तितलियाँ पहनीं हैं मैंने, उनमें से न जाने कितनी उड़ गयीं. कलाई पर तितली का टैटू बनाने की इच्छा मन में कबसे दबाये हूँ. लेकिन इन सब बातों का कोई कनेक्शन नहीं उस तितली से जो इस वक़्त मेरे हाथ में है. मानव कौल की तितली. मानव के लिखे में भी तितली का जिक्र बार-बार पहले आता रहा है लेकिन इस तितली के रंग अलग हैं, उड़ान अलग है.  

मानव का लिखा मुझे इसलिए भर प्रिय नहीं कि वो बहुत अच्छा लिखते हैं बल्कि इसलिए कि मानव का लिखा हमेशा, हर उलझन में, हर बेचैनी में अपने भीतर आने की जगह देता है. और मेरे भीतर कुछ बदलने लगता है, कुछ सहज होने लगता है. शायद यही कारण है कि मैंने उन्हें कई-कई बार पढ़ा है, सुना है. हर बार कुछ नए की ध्वनि के साथ.

तितली उपन्यास का मुझे तबसे इंतज़ार था जब यह लिखे जाने की यात्रा में था, या शायद तबसे जब मानव इस उपन्यास के रियाज़ के लिए पहला ‘स’ साध रहे थे.

उस रोज ढेर सारे कामों वाले थके से चिड़चिडे से दिन के बाद जब कार में बैठी तो ड्राइवर ने एक पैकेट दिया. मैंने अनमने मन से पैकेट ले लिया. देखा तो हिन्द युग्म दिखा. ओह, यह तो तितली है...मन चिहुंक उठा. अचानक दिन का सारा चिडचिडापन फुर्रर हो गया.

जाने क्यों लेकिन बहुत दिनों से लग रहा था कि इस वक़्त मुझे जो पढ़ने की जरूरत है वो तो अभी लिखा जा रहा है. और अब वह लिखा हुआ मेरे हाथों में था. उस रोज दोस्तों की पार्टी थी घर में लेकिन मैं होकर भी उसमें शामिल नहीं हो पा रही थी. मैं तितली की खुशबू में थी. दोस्त ने कहा, ’इतनी खुश तो तुम अपनी किताब आने पर भी नहीं थी.’ मैं हंस दी. दोस्त सच कह रहा था.

मैंने एक धुकधुकी के साथ किताब खोली और नाज़ा की वो कविता पढ़ी जो किताब की शुरुआत में है. अपनेपन की मिठास में डूबी सादी, सरल कविता. मैंने उसे एक ही बार में चार पांच बार पढ़ा. एक लेखक और एक पाठक के बीच का अपनापन, एक लेखक का दूसरे लेखक के बीच का अपनापन. कविता के शब्दों में जो तरलता है उसमें वही आकर्षण है जो झरने के पानी का होता है.

मैंने किताब सिरहाने सजाई और सो गयी. किताब मेरे साथ हर वक़्त रहने लगी. लेकिन जाने क्यों मैं उसे पढ़ नहीं रही थी. पलट रही थी. क्यों नहीं पढ़ रही थी पता नहीं. शायद पानी के किनारे बैठी थी और छलांग लगाने से हिचक रही थी. मैंने इसका पहला पैराग्राफ कम से कम 7 या 8 बार पढ़ा और उसके बाद किताब बंद कर दी.

शायद मैं जानती थी कि क्या होने वाला है, शायद मैं नहीं जानती थी कुछ भी...

शनिवार की रात देर तक मैं तितली को सिरहाने रखे उसे पढ़ना टालते हुए एक बेकार सी वेब सीरीज देखती रही. कुछ दोस्तों से बात करती रही और सोने की तैयारी करने लगी. मन उलझा हुआ था, थोड़ा उदास था तो मानव का एक पुराना इंटरवियु सुनने लगी. उसे सुनते हुए जाने क्या हुआ कि मैंने पाया कि मैं तितली खोलकर बैठी हूँ. अब मानव का इंटरवियु नेपथ्य में चला गया. तितली सामने उड़ने लगी.

मैं नाज़ा के बारे में मानव से सुन चुकी थी. नाज़ा को नेट पर सर्च किया और देर तक उन्हें खंगालती रही. कुछ किताबें ऑर्डर करने की लिस्ट बनाई. जिनमें सिमोन की A very easy death भी शामिल हुई.

किताब बेहद इंटेंस है. एक किताब में न जाने कितनी किताबें हैं. मृत्यु की बाबत बात करना जितना मुश्किल होता होगा शायद मृत्यु उतनी ही सरल होती है. जैसे देह कोई डाल हो और जीवन कोई तितली. एक रोज अचानक उठकर खिड़की से बाहर, फुर्रर्र...

मैंने मृत्यु की बाबत काफ्का का लिखा जब पढ़ा था तब ऐसा लगा था कि मृत्यु से प्रेम होने लगा है. तितली पढ़ते हुए काफ़्का बेतरह याद आ रहे हैं.

बहरहाल मध्य रात्रि तक तितली के मध्य में पहुंचकर बेमन से किताब बंद करके सोने की कोशिश करने लगी. देर तक नाज़ा, कार्ल, शायर और देवदार सपने में घूमते रहे.

ऊपर पहाड़ों पर बर्फ पड़ी है, देहरादून में मध्धम धूप उग रही है. चाय पीते हुए मैं कार्ल के बारे में सोच रही हूँ, नाज़ा के बारे में सोच रही हूँ.

इति, उदय, कैथरीन, जंग हे ऐसा लग रहा है सब मेरे साथ हैं इस यात्रा में. नाज़ा के गले से लिपट जाने की इच्छा से भर उठी हूँ और तितली को गले से लगा लेती हूँ.

तितली पढ़ना शुरू करने से पहले जो बेचैनी थी वो अब नहीं है. एक वाक्य रात भर किसी सिम्फनी की तरह बजता रहा वो इस सुबह का हासिल है. ’जो हम चाहते हैं वो एक बार पा जाएँ तो उसके बाद सारा जीवन कितना सुखद बीतेगा. पर जो चाहते हैं उसका पाना सबसे बड़ी त्रासदी है...’

किताब के बारे में तफसील से लिखूंगी बाद में अभी तो खुद को सहेज रही हूँ इसे पढ़ते हुए. यूँ लग रहा है कि बस बिखरने ही वाली थी कि किसी ने हाथ बढ़ा दिया है...

Monday, January 16, 2023

जीने की तलब


हथेलियाँ फैलाई थीं तो आसमान का एक टुकड़ा उतर आया था हथेलियों पर. धूप और बारिश ने मिलकर आसमान के उस सुनहरे टुकड़े को और भी निखार दिया था. लड़की उसे देर तक देखती रही. उसने हथेलियाँ बंद कर लीं, और लम्बी सांस ली. आसमान के उस टुकड़े को मुठ्ठियों में भींचे वो चल पड़ी थी. 

पास बहती नदी ने उसे देखा और पूछ बैठी, 'आसमान हथेली में लिए हो फिर भी उदास हो?' लड़की ने अपनी गीली हंसी को छुपाते हुए कहा, 'हाँ क्योंकि मुझे आसमान का टुकड़ा नहीं पूरा आसमान चाहिए...' यह कहकर लड़की जोर से हंसी. इतनी जोर से, इतनी जोर से कि क़ायनात घबराकर उसे देखने लगी. पेड़ों से पत्ते झरने लगे, परिंदे आसमान में उड़ते-उड़ते ही ठहरने को हो आये उन्होंने अपनी रफ्तार इतनी धीमी कर ली कि इस हंसी में डूब सकें. 

नदी समझ गयी. उसने लड़की को पास बिठाया, उसे गले से लगाया. उसके सूखे होंठों पर थोड़ी नमी रखी और कहा,'जानती हूँ तेरी ख्वाहिश, तू बहुत जीना चाहती है न?' लड़की ने सर झुकाकर कहा, 'शायद मर ही जाना चाहती हूँ इतना...' इतना कहते-कहते लड़की के होंठों पर मुस्कान तैर गयी थी.

बिना जिए कौन मरता है पगली. देह का जीना क्या और मरना भी क्या. वो तो संसार का चक्र है.

लड़की ने नदी में पाँव डाले हुए ही मुठ्ठी में बंद आसमान से कहा, 'तुम्हें घर ले चलूं? सिरहाने रखूंगी. भाग तो न जाओगे?' लड़की की नर्म हथेलियों में रखे-रखे आसमान ऊंघने लगा था. उसकी बात सुनकर मुस्कुरा उठा और बोला, 'वहीं जहाँ, मोगरे की खुशबू, सावन की बरसातें, पलाश की दमक, सरसों की खिलखिल, राग भैरवी,आम की बौर रखी है...?

लड़की ने हैरत से उसे देखा, 'तुझे ये सब कैसे पता..?

'मैं तेरे हिस्से का आसमान हूँ, मुझे कैसे पता नहीं होगा.' आसमान ने मुस्कुराकर कहा. सामने जो सरसों की पीली चादर बिछी थी वो लहरा उठी. स्कूल जाते बच्चे लड़की को देखकर हाथ हिलाने लगे. नदी की आवाज़ में लड़की की तमाम उदासी गुम होने लगी.

तभी लड़की ने महसूस किया कि किसी ने उसकी आँखें मूँद ली हैं. उसकी बंद आँखों ने सुना, 'मैं तुम्हारा आसमान हूँ, हमेशा तुम्हारे साथ.'

लड़की की रुलाई फूट गयी...यह सुख की रुलाई थी इसमें मौसम की खुशबू थी. खिलने वाले पलाश और आने वाले बसंत की आहट थी. उसकी जीने की तलब और बढ़ गयी थी.

सूरज उस रोज जरा देर से आया था...