Sunday, June 14, 2026

दर्द, प्रतिकार और अस्मिता का दस्तावेज है ‘कबिरा सोई पीर है'

स्त्री प्रतिरोध और समाज की परतों को खोलता उपन्यास:  प्रतिभा कटियार द्वारा लिखे उपन्यास 'कबिरा सोई पीर है' में हर कदम पर कवि उपस्थित है. इस कवि ने उपन्यास के हर हिस्से को बहुत सुंदर बना दिया है. लेखिका पत्रकार, कवि और कथाकार हैं. उनकी इस त्रयी ने उपन्यास को पठनीयता और गहनता दोनों लिहाज से समृद्ध किया है.

- प्रेम कुमार


जाति, स्त्री अस्मिता, प्रतिरोध और समाज की परतों को संवेदनशील तरीके से सामने लाता है है ये उपन्यास.  (Image NDTV)

‘कबिरा सोई पीर है' उपन्यास को खोलते ही आप आप किताब का समर्पण पाठक को अपने पास रोकता है. यह समर्पण “जो अपनी राख से हर बार जन्म लेती रही और लगातार संघर्ष में है ऐसी अस्मिताओं के नाम” यूं ही किसी के जेहन में नहीं आ सकता. इसके लिए एक सुलझी हुई सामाजिक राजनैतिक समझ, परिपक्वता और पक्षधरता की जरूरत होती है. इस समर्पण से उपन्यास और लेखिका का पक्ष स्पष्ट होता है.

जातिभेद की जकड़नें, सामाजिक रूढ़ियाँ, स्त्री अस्मिता की छटपटाहट इस उपन्यास के केंद्र में है. स्त्रियों के मन के भीतर छुपे दर्द, पीड़ा, कसक, दबे हुए सालते हुए दुख, जीवन जीने के ढंग, प्रतिरोध से जुड़े अनुभव बहुत मजबूती से उपन्यास में आए हैं.
मेरी आदत है कि कोई किताब पढ़ते हुए जो हिस्से मुझे अच्छे लगते हैं मैं उन्हें रेखांकित करता जाता हूँ. इस उपन्यास के साथ भी ऐसा ही किया. लेकिन उपन्यास के अंत तक आते-आते मैं हैरान रह गया यह देखकर कि लगभग आधा उपन्यास ही रेखांकित हो चुका है. उपन्यास में इतने सुगठित वाक्य हैं, हिस्से हैं कि पाठक वहाँ लौट कर आता है, ठहरता है और सोचने पर मजबूर होता है.
 

प्रेम कुमार, इस पुस्तक के समीक्षक 

सवर्ण और दलित परिवारों का परिवेश, बुनावट, स्थितियां, मानसिकता, मनोविज्ञान, द्वंद्व विविध पात्रों और घटनाओं के माध्यम से खुलते हैं. इतने सारे पात्रों, घटनाओं और उनके भीतर की गहन यात्रा को एक उपन्यास में साधना आसान नहीं होता. लेकिन लेखिका ने पूरे कौशल के साथ यह किया है. उनका प्रस्तुति का अंदाज और सलीका प्रभावित करता है.

उपन्यास में हर कदम पर कवि उपस्थित है. इस कवि ने उपन्यास के हर हिस्से को बहुत सुंदर बना दिया है. लेखिका पत्रकार, कवि और कथाकार हैं. उनकी इस त्रयी ने उपन्यास को पठनीयता और गहनता दोनों लिहाज से समृद्ध किया है.
 
अनुभव, सीमा, माँ, पिता, तृप्ति, सुधांशु, कनिका, इंस्पेक्टर चौबे, नर्स सारे किरदार अलग-अलग तरह से अनूठे हैं. हर पात्र अपनी यात्रा और परिवेश के साथ उपस्थित है और इसको पात्रों की भाषा, शब्दावली के जरिये लेखिका ने रखा है. देशज शब्दों का प्रयोग, मुहावरों का प्रयोग अच्छा लगता है. कुछ ऐसे शब्द जो कहीं खो से गए थे उनका प्रयोग लेखिका की रेंज को दिखाता है कि उनकी भाषा पर, समाज पर कितनी बारीक पकड़ है, अवलोकन कितना सूक्ष्म है. वाक्यों में जो उपमाएँ हैं, विशेषण हैं, बिम्ब हैं सबमें एक सच है, सम्प्रेषण है. ये यूं ही सुंदर बनाने के लिए नहीं हैं, इनके बड़े अर्थ हैं.

दलित पृष्ठभूमि पर पहले भी काफी लिखा गया है. लेकिन इस उपन्यास में एक अलग सा अंदाज है, चुभन है, व्यंग्य है, क्रोध है, उबाल है लेकिन तरीका बड़ा सलीके का है. आज के परिवेश में जब एक ऐसा वर्ग खड़ा हो गया है जो यह जानने और मानने से इंकार कर रहा है कि यह भी एक सच्चाई है उसी दौर के घटनाक्रम और पात्रों के जरिये लिखा गया यह उपन्यास महत्वपूर्ण है.

उपन्यास में गांधी, अंबेडकर की घटनाओं का जिक्र भी महत्वपूर्ण है, जो लेखिका की सोच, तार्किकता, परिपक्वता को दिखाता है. यह सब एक लंबी तैयारी से ही संभव है. यह राजनैतिक उपन्यास है जिसमें समाजशास्त्रीय विवेचन घटनाओं और पात्रों के जरिये हुआ है.

यहाँ केंद्र में जाति का मुद्दा तो है ही लेकिन उसके अलावा बहुत से मुद्दे हैं जो मुद्दों की तरह नहीं रोज़मर्रा के जीवन की तरह इसमें खुलते हैं. वह हिस्सा जब छोटी बहन अपने ही भाई के द्वारा यौन शोषित होती है और किसी से कुछ कह नहीं पा रही, फिर दोनों बहनों का संवाद, उनकी सदाशयता घटना की कचोट की परतों को बहुत आहिस्ता से खोलती है. जैसे कोई ज़ख्म साफ करता हो कि दवा भी लग जाय और दर्द भी न हो.

स्त्रियों के संसार की तमाम परतें उपन्यास में खुलती हैं. जहां बड़े सुभीते से लेखिका यह बताने में सफल हैं कि ये जो एक-दूसरे के आमने सामने खड़ी स्त्रियाँ हैं असल में ये सब सताई हुई हैं और जरा सा हाथ बढ़ाने की देर है सब साथ ही हैं. स्त्रियों के हक़ की पूरी लड़ाई है लेकिन कहीं कोई लाउडनेस नहीं है.

प्रकृति के साथ जुड़ाव कदम-कदम पर इतने रूपों मे दिखता है कि आप उस जुड़ाव से जुड़े बगैर नहीं रह सकते. गंगा, गंगा पर पड़ती सूरज की किरनें, रातरानी की उचकती डाल, उसकी ख़ुशबू, चिड़िया सब आपके साथ हो लेते हैं. गंगा का किनारा, शहर ऋषिकेश उपन्यास में किसी पात्र की तरह आता है. गंगा नदी को कैसे सखि के रूप में तब्दील कर लिया है लेखिका ने जिससे कुछ भी कहा सुना जा सकता है. इसमें एक वेदना भी है और सुख है. पूरे उपन्यास में पीड़ा और प्रतिकार एक साथ चलते हैं. प्रकृति इस यात्रा में पात्रों की उदासी पोंछने और ज़ख़्मों पर फाहे रखने, कभी-कभी सपने बुनने के लिए उपस्थित रहती है. कई हिस्सों को पढ़ते हुए सुमित्रानन्दन पंत की याद हो आई.

मुझे उपन्यास में आए हर छोटे बड़े पात्र की उपस्थिति ने जिस तरह सामाजिक ताने-बाने की परतों को खोला है उसने बहुत प्रभावित किया. कोचिंग चलाने वाले विक्रम त्रिपाठी हों या कोचिंग के बाहर छात्रों की बातचीत, वो माहौल. सीमा का अपने होने वाले पति से पहली बार मिलने का अनुभव, सीमा की शादी में आई औरतों का तृप्ति पर किया गया कटाक्ष, भाई का एक्सीडेंट, सीमा का मैरिटल रेप और अस्पताल की नर्स का यह कहना कि, 'घर का है करके छोड़ना मत' इंस्पेक्स्टर चौबे का गुस्सा, चाचा की दलित राजनीति में घुसने की कमजोर सी कोशिश, पापा की रोज की हालत, चपरासी विनोद के ताने और तृप्ति की चुप्पी, उसके फर्स्ट आने पर पिता का माफी मांगना और घर आकर कहना बेटा अब कभी फर्स्ट मत आना, तृप्ति और सीमा की माँ का रात दिन का बड़बड़ाना, सीमा की ससुराल में स्त्रियों का पहले अलग-थलग होना फिर एक होना, कनिका की माँ की पति द्वारा किए गए यौन शोषण की कहानी ये सब समाज की सच्चाई पर पड़े सुनहरी पर्दे को तार-तार करते हैं.


उपन्यास में एक हिस्सा कश्मीर का भी है। ऐसा लगा वो हिस्सा जैसे लाया गया है, वो न होता तो भी उपन्यास अच्छा ही चल रहा था लेकिन उस हिस्से के अंत में एक बच्चे के कोमल स्पर्श को जिस तरह लाया गया है इस हिस्से का आना अखरता नहीं बल्कि मानीखेज़ हो जाता है. एक बात यह है कि अंत में लगा कि उपन्यास को खत्म करने की जल्दी सी थी लेखिका को. प्रूफ की कुछ गलतियां भी अखरती हैं.

मैंने अरसे बाद कोई उपन्यास पूरा पढ़ा और इसका श्रेय उपन्यास को ही जाता है कि वह खुद को पूरा पढ़ा ले गया. इसे पढ़ते हुए लेखिका की पूरी तैयारी दिखती है. उनके पास समाजशास्त्रीय निगाह है, राजनैतिक समझ है और कोमल मन है. एक एक्टिविस्ट है जो समझाइश भी देता है. उपन्यास के शीर्षक बड़े ही सुंदर शेर के टुकड़े हैं जिनका उस हिस्से से जुड़ाव है. और अंत में वह पूरा शेर भी दिया गया है. यह काफी दिलचस्प है.

उपन्यास के अंतिम पेज पर प्रियदर्शन द्वारा लिखे गए ब्लर्ब की हर पंक्ति से सहमत होते हुए यही कहना चाहता हूँ कि यह एक महत्वपूर्ण उपन्यास है और इसे खूब पढ़ा जाना चाहिए, इस पर बात होनी चाहिए.

पुस्तक- कबिरा सोई पीर है (उपन्यास)
लेखक – प्रतिभा कटियार
प्रकाशक- लोकभारती प्रकाशन

लेखक परिचय : प्रेम कुमार साहित्य, समाज और संस्कृति से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय लेखन करते हैं. उनकी रुचि समकालीन हिंदी साहित्य, सामाजिक न्याय, अस्मिता विमर्श और वैचारिक बहसों में रही है. पुस्तक समीक्षा और आलोचनात्मक लेखन के माध्यम से वे साहित्यिक कृतियों को व्यापक सामाजिक संदर्भों में पढ़ने और समझने का प्रयास करते हैं.

https://ndtv.in/literature/kabira-soi-peer-hai-book-review-pratibha-katiyar-11632427

Friday, June 12, 2026

मैंने सपने में तुम्हें देखा था


मेघालय....मेघों का घर। कब बादलों से प्यार हुआ, कब बारिशों के लिए दीवानगी पैदा हुआ कुछ याद नहीं। याद है तो बस इतना ही ज़िंदगी शुरू ही काफी देर से हुई। आधी ज़िंदगी जी चुकने के बाद ज़िंदगी का एक सिरा हाथ आया और तब खुद से दोस्ती होनी शुरू हुई। अपना अच्छा बुरा दिखना शुरू हुआ। 

बचपन कोई कमाल का नहीं था, लेकिन शायद था भी। कि बचपन के खेल, सखा सहेलियों के नाम पर किताबें ही याद हैं। ओ हेनरी, चेखव, प्रेमचंद शुरुआती लेखक थे जिनसे दोस्ती हुई फिर ये लिस्ट बढ़ती गई। कुछ लेखकों के प्रति दीवानगी बढ़ती गई। इन सबके बीच कॉलेज के किस्से, ज़िंदगी के वो हिस्से जहां उम्र की अठखेलियाँ सांस लेती हैं वो सब गायब रहीं। 

पिछले एक दशक से ज़िंदगी का सिरा थामा और पाया कि ज़िंदगी तो किताबों के बाहर भी बहुत सुंदर है। लेकिन यह सुंदरता लोगों के करीब जाने पर टूटती है और प्र्कृति के क़रीब जाने पर निखरती है।  


देहरादून के मौसम ने मुझे बताया कि मेरे भीतर दीवानगी किन चीजों के लिए है, मेरी तलाश क्या है आख़िर। इस तलाश में मौसम क़रीब आता गया और लोग कम होते गए। अब जो सुख था आँखें डबडबाने के लिए काफी थे। घंटों चुपचाप आसमान देखते हुए महसूस हुआ यह ख़ामोशी मेरी तलाश थी, मुझे पता ही नहीं था। याद आया बचपन में मेहमान घर आने पर कैसी घबराहट होती थी। किसी शादी या दूसरे फङ्क्शन में जाने के नाम पर क्यों आँसू ही आ जाते थे। घर के काम करने, घंटों खाना बनाने ने मुझे लोगों से बात करने से थोड़ा तो बचाया था। 

जगजीत सिंह की गज़लें सुनते हुए पूरे घर का पोछा लगाना फेवरेट काम हुआ करता था। वह शायद मेरे बनने के दिन थे, जो ठीक से बन न सके। वरना भला मुझे कैसे पता न चला कि मुझे मौसम चाहिए, ढेर सारे मौसम। ठंड का कोहरा, बारिशों की बौछारें और तपती गरमियाँ। खुद को पहली बार तलाशा अपनी ही कहानियों में। 
प्रेम और प्रकृति की उन कहानियों में मुझे जिस कदर सुख मिलता था बताना मुश्किल है। हालांकि उन कहानियों का उपहास भी कम नहीं उड़ाया गया। लेकिन मैं कैसे बताती वो कहानियाँ मेरा जीवन हैं। न लगें किसी को अच्छी न सही, मैं जीना तो नहीं छोड़ सकती न। 

ऐसे ही उलझते बिखरते दिनों में मैंने एक रोज ट्रैवल ब्लॉग देखते हुए मेघालय का ब्लॉग देखा, कनिष्क गुप्ता का। मैं जैसे सुध बुध बिसराने लगी थी। जब भी मन उदास होता मैं उस ब्लॉग को खोल लेती और देखने लगती। देखते देखते ही याद आया कि मेघालय और चेरापूंजी के बारे में जनरल नॉलेज के सवाल के लिए पढ़ाते हुए माँ ने कितनी डांट लगाई थी। सही जवाब न देना डांट खाने कभी कभी मार खाने के लिए भी पर्याप्त वजह होती थी उन दिनों। 


इम्तिहान में शायद मैंने एक नंबर का जवाब गलत किया हो लेकिन ज़िंदगी में चेरापूंजी ठहर चुका था। जैसे अनजाने प्रेमी से प्यार होता है वैसा ही कुछ मेरा रिश्ता चेरापूंजी से बनने लगा। मुझे सपने में बादल आते, मैं उन्हें पकड़ने को हाथ बढ़ाती और ऑफिस जाने का टाइम हो गया है कहकर घड़ी आँखें दिखाती। 

क़रीब 5 बरस मैंने मेघालय जाने के सपने को अपनी पलकों में सहेजा है। 
और आख़िर 2026 का जून महीना उस ख्वाब की ताबीर लेकर आया। यह यात्रा कई लिहाज से अलहदा थी। यह हम माँ बेटी की पहली यात्रा थी साथ में। इसके पहले हम दोनों लंदन गए थे लेकिन तब सिर्फ जाना और आना ही अकेले था। इस यात्रा की पूरी ज़िम्मेदारी बिटिया रानी ने उठाई थी। मैं एकदम बेफिक्र थी। 

और यह कोई छोटा सुख नहीं था।
(जारी....)

Thursday, June 11, 2026

माँ बहन : हँसाएगी नहीं चुभेगी


फ़िल्म का पहला दृश्य देखकर ही मुझे सिहरन हुई, जब एक लड़की फ़िल्म की जया आईवीएफ के लिए डॉक्टर से बात कर रही है। पति को भी बिना बताए वो पति के ही वीर्य से गर्भ धारण करना चाहती है। ठीक उसी वक़्त उसके ससुर का फोन आता है, चाय पीने के लिए बहू का इंतज़ार करते ससुर उसे कहते हैं वो किसी और के हाथ की चाय नहीं पीते।

उफ़्फ़...यह तुम्हारे हाथ का खाना, तुम्हारे हाथ की चाय....ज़िंदगी निगल रखी है इसने। वो रोटी बनाती है। बनाती जाती है, बनाती जाती है। उस घर की घड़ी में समय के पीछे से रोटी झाँकती है। कुछ दृश्यों को जान बूझकर नाटकीय बनाया गया है लेकिन वह नाटकीयता मारक है, चुभती है। हंसी नहीं आती, कुछ कचोटता है। 

दूसरा दृश्य, माधुरी दीक्षित यानि रेखा के पाँव के नीचे एक कागज आता है जिस पर लिखा है, 'क्या आप अकेले हैं?' यह अकेलेपन को मसालेदार नज़रिये से देखने और भरने वाला विज्ञापन है, जिसे वह रौंदकर आगे बढ़ जाती है। फ़िल्म की कहानी का मर्म क्या होने वाला है,  यहीं से समझ आने लगा था। 

फ़िल्म एक डार्क ह्यूमर है जो हँसाएगा कम परेशान ज़्यादा करेगा। अन्यथा यह आपको इरिटेट करेगा। यह बात सही है कि कथानक के घनत्व को फ़िल्म का ट्रीटमेंट ठीक से डिफ़ाइन करने में कई जगह चूकता है फिर भी मुझे लगता है उस चूक के बावजूद काफी कुछ कह जाता है। 

फ़िल्म के तीन मुख्य पात्र, जया सुषमा और रेखा हैं, बाद में इसमें हेमा भी जुड़ती है। सबके जीवन की व्यथा, अकेलापन, कुंठा, संघर्ष उनके हंसी ठिठोली वाले किरदारों में समाहित है। रेखा का गुनाह है उसके कपड़े, उसका बिंदास होना और सबसे ऊपर उसका स्त्री होना, जिसका आगे चलकर सिंगल हो जाना। 

समाज के तमाम संस्कारी और चरित्रवान पुरुषों का लड़खड़ाना और फिर बनाना कई नई कहानियाँ जिसमें मसाला ही मसाला है। 

स्त्री अगर अकेली है, कमजोर है तो उसे समाज रोता हुआ, असहाय और दीन हीन ही देखना चाहता है। ऐसी स्त्री जिसे तमाम कंधों की ज़रूरत हो। ताकि तमाम बेरोजगार कंधों को रोजगार मिले। लेकिन जैसे ही स्त्री कमजोर होने के बजाय लड़ना और रोने बिसूरने के बजाय खुश रहना चुनती है वह किरकिरी हो जाती है, जिसे डायन से लेकर न जाने कितने नाम दिये जाते हैं। ज़ाहिर है उसका चरित्रहीन होना तो सबसे पहले है ही। 

इन्हीं कुछ मुद्दों की तरफ ले जाती है फ़िल्म। बेटियों की मेकिंग में भी माँ की जर्नी का कसैलापन शामिल है ही। 
वह तमाम कोशिश करती है सम्मान से अपनी बेटियों को पालने के लेकिन हर बार संस्कारी और चरित्रवान समाज उसे मजा चखाता है। 

घर, दुकान तोड़े जा रहे हैं और एक अकेली माँ अपनी दो छोटी बेटियों के साथ साँप सीढ़ी खेलते हुए बच्चों का ध्यान हटाने की कोशिश करती है। यह एक मेटाफर है जो काफी असर करता है। 

फ़िल्म के अंत में गुप्ता जी की पत्नी सब कुछ जानने के बाद पति को लेकर चुपचाप चली जाती है, यह खटक सकता है लेकिन मुझे खटकता नहीं, सच लगता है, यही हक़ीक़त है। स्त्रियों के पास न तो ज़्यादा च्वाइस है, न हिम्मत। बस उनकी गृहस्थी बनी रहे, बच्चों की ठीक से शादी हो जाये, सब ढंका मुंदा रहे। 

फ़िल्म तमाम पहलुओं को सामने लाती है, हालांकि यह बात सही है कि फ़िल्म और बेहतर हो सकती थी। लेकिन यह संभावना तो हमेशा रहती ही है। मास्टरपीस नहीं है फ़िल्म लेकिन देखी चाहिए और ठीक से देखी जानी चाहिए। 

फ़िल्म का गाना 'खोल पिंजरा' फ़िल्म का एसेंस है। 

Wednesday, May 27, 2026

कौन जात हो भाई- बच्चा लाल उन्मेष


एक लम्बी गहरी चुप, सदियों से दबी हुई सिसकी, शोषण की लम्बी और लगभग सामान्य मान ली गई परिपाटी को तोड़ने की कोशिश में लहूलुहान होती कवितायें हैं बच्चा लाल उन्मेष के संग्रह 'कौन जात हो भाई' में। ये कवितायें आपके सुख चैन में सुराख करेंगी, बेचैन करेंगी। जिस जीवन को हमने सामान्य मान कर स्वीकार कर लिया है उस स्वीकार्यता को खंडित करेंगी। ये कवितायें शोषण की लम्बी दास्तान का वह दस्तावेज़ है, जिसे झुठलाने में पूरा समाज और सरकार न जाने कबसे लगी है।

बच्चा लाल के पास कहन की जो बेबाकी है वह इन कविताओं की ताक़त है। वो दलित शोषण की बात को पूरी ताक़त से कहते हैं लेकिन इसमें कोई बेचारगी नहीं है। एक झुंझलाहट है, पीड़ा है जिसने अब गुस्से का, प्रतिकार का रूप ले लिया है।

कविताओं को पढ़ते हुए दोतरफा युद्ध नज़र आता है। एक दलितों के भीतर का संघर्ष। उन्हें यह समझना कि उनका पीड़ित होना नॉर्मल नहीं है, वे भी मनुष्य हैं और उन्हें भी जीवन जीने के समस्त अधिकार मिलने चाहिए। और दूसरा युद्ध है इसी बात को बाकी समाज को बताने का। इस बताने पर मिलने वाले उपहास, प्रताड़ना और अपमान के बावजूद अपने हक़ के लिए लड़ने का। इस लड़ाई में जो ज़ख्म मिलें, चाहे देह पर या मन पर उनसे टूटने की बजाय उसे अपनी ताक़त बनाने का काम बच्चा लाल ने अपनी कविताओं के ज़रिये किया है।

ये कवितायें पढ़ते वक़्त कुछ मांग करती हैं। मांग करती हैं कि आप जातिगत उच्चता की आलीशान पोशाक उतार कर इन्हें पढ़ें। इन्हें पढ़ते समय महसूस करें इसमें दर्ज शोषण की उस दास्तान को जो कविता कहानी में दर्ज होने भर से काफी ज्यादा गहरी है लम्बी है। और बात सिर्फ जातीय भेदभाव की भी नहीं है, बात है हर उस वजह की जो शोषण की बुनियाद बनती है।

इस समय में जब कुछ भी बोलना एक खास किस्म के राजनैतिक, सामाजिक खांचे में धकेल दिए जाने का जोखिम हो, इन कविताओं की सच्चाई, बेबाकी सहेजे जाने वाली वह आवाज है जिसमें से मद्ध्म सी उम्मीद झाँकती है।

कुछ टुकड़े जो मैंने अपनी किताब में अंडरलाइन किए-

रईसों ने बख़्श दी है जान, इतना काफी नहीं?
दे रहा आश्वासन है निज़ाम, इतना काफी नहीं?
('आश्वासन' से)

ईश्वर वह कर्जा है
जिसे गरीब आजीवन भरता है
सत्ता की तरह।
('सत्ता का ईश्वर' से)

तुम पूज्य नहीं हो हमारे ग्रन्थों में
तब भी नहीं थे और अब भी नहीं हो
तुम शूद्र थे, शूद्र हो और शूद्र ही रहोगे।
कुछ आएंगे तुम्हारे अपने, बुनियाद उठाने तुम्हें पढ़ाने
पर तुम हरक़त नहीं करोगे
क्योंकि तुम्हारा समाज
मंदिरों में जा-जाकर मूढ़ हो चुका है।
('क्योंकि तुम्हारी लत्त चलती है, बुद्धि नहीं' से )

तुम्हारे इंसान बनने की प्रक्रिया में जाति आड़े आ रही है
मर रही हैं संवेदनाएं और तमाम मानवीय संभावनाएं
इन्हें जगाने के लिए जाति का दंभ छोड़ना पड़ेगा
पर तुम नहीं छोड़ोगे दोस्त! दलित थोड़ी न हो।
('तुम क्यों झुकोगे दोस्त' से)

मनुष्य हो तो आगे आओ, जाति-धरम का भेद मिटाओ
संविधान में सबके लिए, बनी एक ही खाट है।
होगा तेरी लिए अफवाह, मेरा भोगा हुआ यथार्थ है।
('भोगा हुआ यथार्थ' से )

जिसने वहशी दरिंदों को एक बार भी नहीं टोका
वो मेरा भी खुदा हो, ये मुझे मंजूर नहीं।
('मुझे मंजूर नहीं' से)

हम अब भी अन्न उगाते हैं
वे अब भी अंग चबाते हैं
हैं गज़ब के भूखे लोग यहाँ
मेरा टूटा हल भी खाते हैं।
('हम तब भी अन्न उगाते हैं' से)
बच्चा लाल उन्मेष को उनकी कविताओं के लिए बधाई देते हुए मैं कामना करती हूँ कि उनकी सच कहने की, हालत से टकराने की ताक़त बची रहे।

Wednesday, May 20, 2026

मैं मिलने जाऊँगी

 


पिछले बरस मेरे जन्मदिन पर चमोली में मित्र ने एक पौधा लगाया था। सुना है वह पौधा अब बड़ा हो गया है।
एक रोज मैं उस पौधे से मिलने जाऊँगी। उस शहर में एक नदी बहती है,जो मेरी सहेली है। मैं उस नदी से मिलने जाऊँगी। उस शहर के मौसम ने मेरे गाढ़े दुखों में गुलाबी फूल खिलाये थे, मैं उस मौसम से मिलने जाऊँगी।

जिस मित्र ने मेरे नाम के पौधे को न सिर्फ लगाया उसे साल भर सहेजा, बड़ा किया मैं उसे मित्र से मिलने जाऊँगी।

एक दिन मैं स्नेह से भरे हर व्यक्ति से मिलने जाऊँगी।