Monday, October 19, 2026

ऋषिकेश : हसरतों का शहर



ढलते-ढलते शाम रात के काँधों से आ लगी थी। रात के कांधे से टिकी शाम देखी है कभी? वो भी मौसम की उस दहलीज़ पर जब एक मौसम ने विदा ली न हो और दूसरे मौसम की आमद घुंघरुओं सी बज उठी है। नवेली दुल्हन सी वो शाम बस रात में घुल जाने को आतुर। कुछ रातें अपने भीतर ढेर सारा उजास सहेजे होती हैं। यह उजास चाँद के आने-जाने के हिसाब से परे होता है। कल की रात भी ऐसी ही उजास भरी रात थी। ज़र्रर्रर्र से गुज़रते दिन का हाथ थाम शाम ने ऋषिकेश के रास्ते पर रख दिया था। सदा का प्यारा ऋषिकेश। वही ऋषिकेश जहां न जाने कितना समय बिताया। कोने-कोने से वाक़िफ़ियत रही। यहीं आधी रात को भीगते हुए सड़कों पर चक्कर काटे, गाने गाये, मुस्कुराए। यहीं उदासियों और बेचैन मन की शांति और सुकून से अदला बदली भी हुई। और यहीं मिले मेरे उपन्यास के नायक अनुभव, नायिका तृप्ति सहित तमाम किरदार और उनकी ज़िन्दगी के किस्से।

फिर यह शहर छूट गया। या शायद रूठ गया। इसे मनाने की तमाम कोशिशें नाकाम रहीं। मैंने बस इंतज़ार किया, कि जब इज़ाजत देगा तो गले से लगा लूँगी, वरना ड्योढ़ी पर बैठकर इंतज़ार करूंगी। शहर इन्सानों से बेहतर होते हैं, बिन मनाए भी मान जाते हैं, हाथ थाम लेते हैं, गले से लगा लेते हैं। मुझे मालूम था यह झूठी नाराज़गी है, प्यार तो अब भी वैसा ही है। शहर में दाखिल होते ही मन मुस्कुराया, आखिर फिर से आ ही गई न तेरे पास। शहर ने अपनी गर्वीली गर्दन झटकते हुए कहा, 'और मैंने आने दिया।' मैंने कहा, हाँ, चल यही सही। तू जीता मैं हारी कहते हुए शहर के भीतर प्रवेश किया। ठंडी हवाओं ने शरीर को छुआ तो सिहरन हुई। गंगा में डुबकी लगाकर आई इस हवा को मैं पहचानती हूँ। गालों को छूकर गुज़रे उस हवा के झोंके ने कहा, 'शरारती तो अब भी मैं वैसा ही हूँ।' मैंने उसके गाल थपथपा दिये।

गंगा को ऋषिकेश में देखना उसे हरिद्वार में देखने से अलग है। बनारस में देखने से अलग है और गंगोत्री में देखने से भी अलग ही है। गंगा वही है बस शहर से गुजरते हुए उस शहर का मिज़ाज अपनाती चलती है। ऋषिकेश की गंगा की बाहें खुली हुई हैं। यह सिर्फ आस्था की नदी भर नहीं लगती यहाँ बल्कि किसी सखी सी भी लगती है। ऐसी राजदार दोस्त जो आपके मन के तमाम उलझे कोनों को सुलझा दे। किसी भी घाट पर बैठकर या बिना किसी घाट के ऐसे ही किनारे पर बैठकर उससे अपना सुख दुख कह लो, सुलझी और समझदार यह गंगा आपको आज़ाद कर देगी। इस दोस्ती के लिए न अगरबत्ती चाहिए हाथ में, न घंटी न घड़ियाल। बस कि साफ मन चाहिए।

यहाँ एक किनारा गोवा बीच के नाम से जाना जाता है। टेढ़े-मेढ़े से रास्ते से होते हुए वहाँ पहुंचकर बमुश्किल सहेजी उमर छूटती सी लगी। भीतर का उच्छशृंखल मन हँसता, खिलखिलाता बौराया हुआ सा इस कोने से कोने को छू लेने को बेताब। शांति ऐसी कि लहरों और हवाओं की जुगलबंदी से बना संगीत रूह में घुल जाये। ऐसा लगे कि कुछ बोलना हो तो जरा फुसफुसाकर ही बोलो वरना शांति का यह जादू टूट जाएगा।

उस जादू को वैसे का वैसा सहेजकर हम वहाँ से उठे तो रात के कांधे से आ लगी शाम का सौंदर्य खिलने लगा था। शहर जगमग करने लगा था। जाती हुई साँझ को मानो रात ने हाथ पकड़कर बिठा लिया हो ठीक वैसे ही जैसे बिठा  लेते हैं प्रेमी उठकर जाती प्रेमिकाओं को। बस वो दो लम्हों का रोका जाना उम्र भर रुके रहने पर भारी पड़ता है। उन दो लम्हों के रुकने में जीवन खिल उठता है, कोई चाहता है रोकना, यह बात रुके रहने से ज़्यादा रूमानी है। असल में सारा खेल चाहना का ही तो है। वो कहते हैं न कि तुम न आ पाओ तो कोई बात नहीं, लेकिन आना चाहना बचाए रखना।
आकाश सिंदूरी हो उठा था। रोशनी के झरोखे खिलने लगे थे। आधा चाँद आसमान पर टंगा था और ऐसा लग रहा था आज खूब तैयार होकर आए हैं जनाब। इन सबके दरम्यान विंटर लाइन का अलौकिक दृश्य नमूदार हुआ। मानो क़ुदरत आज जमकर मेहरबान थी। विंटर लाइन अक्सर मसूरी से देहरादून वाले रास्ते में ही देखी है। यह पहली बार था कि ऋषिकेश में यह दृश्य सामने था। चुपचाप इस अलौकिकता के जादू में खोये हुए हम वापस आना भूलने ही लगे थे। मन ऐसा बावरा है कि उसे जितना सुख दो, उसकी उतनी ही भूख बढ़ती है। वापसी को उठे लेकिन उठ न सके। बड़ी मशक्कत से उठे तो फिर चल पड़े कोलाहल से दूर एक नए ठीहे की तलाश में जहां चाय पी जा सके और गंगा जी से थोड़ा और वार्तालाप किया जा सके।

जैसे ही लक्षमण झूला पुल के पास पहुंचे, पता चला पुल तो बंद है। हम हँसे, हमें वहाँ जाना भी नहीं बस कि इसी पार कुछ देर अपनी सखी के पास बैठना है। इधर सीढ़ियाँ उतर रही थी, उधर मन में चल रहा था कि यहीं कहीं होंगे शायद तृप्ति और अनुभव भी। और हैरत की बात कि सबसे पहली नज़र जिस जोड़े पर पड़ी बेसाख्ता मुंह से निकला 'अरे ये दोनों तो यहाँ हैं।' ये दोनों जिन्हें खुद की कोई ख़बर ही नहीं। प्यार है लेकिन यह पता भी नहीं, कैसे और क्या कहें यह जानते भी नहीं कि बस साथ होने की ख़्वाहिश लिए देर तक नदी किनारे बैठे हुए उस पर टिमटिम करती रोशनी की कतारों को देखते हुए जीवन का सारा सुख सोख लेने को आतुर। 

परवीन शाकिर की गज़ल के उस शेर को आज की रात तनिक बदलकर करके गुनगुनाने का दिल किया,' पूरा दुख और आधा चाँद हिज़्र की शब और ऐसा चाँद...' क्यों न इसे आज ऐसे गाऊँ कि 'पूरा सुख और आधा चाँद।' देखो न परवीन, इस लम्हे में कोई दुख नहीं, कोई इच्छा नहीं, कोई सपना नहीं, कोई हसरत नहीं। इस लम्हे में बस चाँद है, गंगा है और सुकून है।

दूर से नदी को देखना, दूर से नदी का देखना ही होता है। और वो अभागे ही होंगे जो नदी के किनारे से उसमें भीगे बिना चले जाएँ, बारिशों को देखने छतरियाँ लेकर निकले लोगों से अभागे, बिना जिये बस सांस लेते हुए दौड़ते भागते से अभागे, सामान बटोरने को जीवन का हासिल समझते से अभागे। हम वो अभागे बिलकुल भी नहीं हैं। हाथ में चाय का कुल्हड़ लिए पानी में छप छप करते हुए खुद को दूर से देखा तो मेरा ही अधूरा बचपन मुझे देख  मुस्कुरा दिया। 

रात बीतती जा रही थी और दिल चाह रहा था कि काश सारी उमर इसी लम्हे में कैद होकर रह जाय। कई बार उठने को हुई पर उठ न सकी। आसान कहाँ होता है पानी और प्रेमी से निगाह तोड़कर वापस लौटना। ये नज़र लौटकर फिर फिर वहीं जा अटकती है। आखिर उठना पड़ा और उठते हुए जावेद साहब की लाइन याद आ गयी, 'लो देख लो ये इश्क़ है, ये वस्ल है, ये हिज़्र...अब लौट चलें आओ बहुत काम पड़ा है...'।

चलते चलते फिर एक कप कॉफी पीने की इच्छा ने थोड़ा और रोका उसके बाद चाँद को बालों में टाँककर वापसी की राह ली। पर ये तो सिर्फ ऋषिकेश शहर जानता है, गंगा का किनारा जानता है या मेरा मन कि जो लौट रहा है वो कोई और है....जो छूट गया है उन्हीं हवाओं में, उन्हीं फिज़ाओं में वो कोई और था।

मैं अपने खुद के छूटे हुए अक्स से मिलने फिर आऊँगी कहते हुए मैंने शहर की हवाओं का दोशाला अपने जिस्म पर कस लिया।

Sunday, October 18, 2026

टू द सी

सामने समंदर ऊंघ रहा था, और इधर इंट्री गेट पर लोगों का जमावड़ा था। एक अजीब सा शोर, एक अजीब सी हलचल। मैं लोगों के चेहरे देख रही थी। बच्चे, बूढ़े, जवान सब थे। सबके भाव अलग थे। कुछ बेहद एलीट जिनके चेहरे पर व्यवस्था को लेकर असंतोष और एक हल्का सा एरोगेन्स उनके चेहरे की चमक को बढ़ा रहा था। कुछ बच्चे आपस में खेलने, चिढ़ाने में, धमाचौकड़ी करने में व्यस्त थे जिन्हें उनके पैरेंट्स चाहकर भी रोक नहीं पा रहे थे या शायद रोकना भी नहीं चाहते थे। कुछ नए ब्याहे जोड़े अपने चेहरे से टपकती रूमानियत से बेख़बर। कुछ बुजुर्ग जिन्होंने शायद अपनी उम्र के आखिरी पड़ाव की इच्छाओं वाली पोटली में रखा होगा क्रूज का सफर। कुछ दोस्तों के ग्रुप भी थे। सबसे ज्यादा हल्ला वही कर रहे थे। क्या करें, दोस्ती शय ही ऐसी है, मस्तीखोर, बेपरवाह। कुछ सोलो ट्रेवल वाले भी थे। एक लड़की जो देर से किसी से बात कर रही थी और लाइन में आगे बढ़ना भूल जा रही थी। उसके चेहरे पर थोड़ा सा तनाव था। न जाने उसकी कहानी कैसी होगी। लड़कियों का सोलो ट्रेवल लड़कों के सोलो ट्रैवल से बहुत फर्क होता है यह बात तो सच है ही। बहरहाल, यहाँ अलग-अलग कहानियाँ थीं और हर कहानी का एक सिरा जो इस समय सबको जोड़े हुए था, वह था क्रूज़ से यात्रा का रोमांच। 

फिल्म 'शिकारा' की याद हो आई। किस तरह कोई इच्छा, ज़िन्दगी की आखिरी इच्छा सी खिलती है और उस खिलती इच्छा के फूल धरती पर हमेशा खिलते रहते हैं। कोई किसी का सपना पूरा करने में खुश हो रहा होता है और कोई अपने किसी सपने को बड़ी मुश्किल से दुनिया से चुराकर जीने की कोशिश करता है। चुराकर जिये गए सपने के किनारों पर उनकी ही टूटी ही ख़्वाहिशों की उदसियों के निशान लगे रह जाते हैं। 

जीवन क्या है, सिवाय जिये जाने के। और यह जिया जाना ही जीवन भर छूटता रहता है। कईयों को तो पता ही नहीं चलता कि वो बिना जिये ही मृत्यु की ओर बढ़ते जा रहे हैं। ज़िन्दगी सबको जीने का मौका देती भी कहाँ है। यहाँ यात्रियों के चेहरों पर उनकी मन की दुनिया का पोस्टल एड्रेस बता रहा था कि किसका सफर कितना आसान है, किसका कितना मुश्किल। मुझे सबसे प्यारे लगे बुजुर्ग जोड़े। एक-दूसरे का हाथ थामे, एक दूसरे का खयाल रखते, जीवन की डोर को साथ में थामते हुए। 

साथ...हाँ, इसी एक शब्द में ज़िन्दगी का सारा रूमान है, सारा सार। साथ मनचाहे का, या साथ खुद का। 

टीका वीका लगाकर बड़े अदब से क्रूज में लोगों का स्वागत हुआ और उत्साह का एक सैलाब बिखरने लगे। ख़ैर ख़ैर करके हमें हमारा कमरा जो कि आठवीं मंज़िल पर था, मिला। सुंदर और शांत कमरा। जैसे लंबी यात्रा और देर से चल रहे इस उत्साही शोर के बाद किसी ने ठंडा पानी दिया हो। कमरे में एक बड़ी सी खिड़की थी, जो खुलती नहीं थी लेकिन उसमें से दृश्य खुलते थे। बैठने की प्यारी सी जगह जहां बैठकर समन्दर का खेल देखते ही रहो। पूरा कमरा ऐसे बना था कि कहीं से भी निगाह में समंदर आने से छूट न जाये।  

सच में मैंने अपने होने को टटोला। मैंने यह तो नहीं चाहा था। चाहा ही नहीं था। फिर खुद पर ही हंसी आ गई, हम लड़कियां आँख भर सपने भी कहाँ देखना सीख पाती हैं। याद है एक बार मेरे प्रेमी ने मुझसे पूछा था, तेरे ख़्वाब क्या हैं? और मैंने कहा था, बारिश में खूब भीगना और फिर एक अच्छी सी चाय पीना। 'तुम्हारे साथ...' नहीं कह सकी थी। इसे मैंने भीतर रोक लिया था। जानती हूँ, साथ की कामना से बड़ी कामना कोई नहीं। और इसके हक़ में अल्लाह मियां भी खास कुछ मदद कर नहीं पाते। इसलिए वक़्त के साथ 'तुम्हारे साथ' को 'खुद के साथ' में कन्वर्ट करना सीख लिया है। 

खुद को गले लगाया और उस समन्दर वाली खिड़की के आगे पसर गई। पुश्किन की कविता 'टू द सी' की याद हो आई। उस याद की उंगली थामे क्रूज़ के सबसे ऊंचे डेक यानि दसवीं मंज़िल की तरफ गई। सूरज दूर से अपने सौंदर्य पर इठला रहा था। धीमे-धीमे चलता क्रूज़ और तेज़ चलती हवा। मानो कह रहे हों, यहाँ आए हो तो सब भूल जाओ, खुद को भी। क्योंकि जो भी है, बस यही पल है।

तेज़ हवाएँ बालों को, कपड़ों को इस कदर उड़ा रही थीं कि ऐसा लग रहा था कि कुछ देर में बाल समेत मैं भी उड़ती फिरूंगी। ये हवाएँ समन्दर के नमक में डूबी हवाएँ थीं। कभी हवा का स्वाद चखा है? चखना चाहिए, हवा के स्वाद में ज़िन्दगी का स्वाद घुला होता है, ज़िन्दगी के रंग भी। बस वो हमारे देखे जाने से छूटते रहते हैं। मैंने खुद को इतना बेफिक्र अरसे बाद पाया। कोई चिंता नहीं, कोई फिक्र नहीं बस कि दुनिया से, दुनियादारी से बहुत दूर अरब सागर के मध्य कहीं खुद की धड़कनों को सुनती अपनी ही नब्ज़ पर कान धरती। बंद आँखों के भीतर एक पूरा जीवन जर्रर्र से गुज़र गया। डरी, सहमी, अटक-अटक कर बोलती वो छोटी सी बच्ची जिसके करीब से आत्मविश्वास का आ भी नहीं गुजरा था आज दुनिया से दूर यहाँ अपने अनदेखे सपने को हथेली पर लिए खड़ी है। 

ठीक ही कहता है मन दिनों कि, 'जीवन को गुजरने दो, उसके संगीत को सुनो और गुनो। जीवन कभी गलत नहीं होता, सही गलत तो हमारे बनाए खांचे हैं, ढांचे हैं।' जिस जीवन से बनती नहीं है, उसी के कांधे पर सर रखे हुए धीरे धीरे सूरज का समन्दर में उतरना देख रही थी। जीवन मुस्कुरा रहा था। 

सूरज धीरे-धीरे समंदर में डूबकर बुझ गया। गुलजार साहब की लाइनें याद आ गईं, 'वो बड़ी देर से आया था पर वक़्त पर आया था।' मेरे भीतर से मैं अब आज़ाद होने लगी थी। खुश होने से डरने वाला मन खुश होने की तरफ क़दम बढ़ाने को उत्सुक था। मैंने जीवन की आँखों में मुस्कुराकर देखा और कहा, 'आ चल डूब के देखें'...अब जीवन और मैं दोनों मुस्कुरा रहे थे, दोनों डूबने की तैयारी में थे।  

शाम को एक प्ले था हमारे लिए लेकिन थकान की ऐसी मार और सुकून की ऐसी चाहत कि कुछ देर लाइव म्यूज़िक सुनने के बाद डिनर करके हम कमरे में आ गए। सोने नहीं, महसूस करने। हमें मनोरंजन के तेज प्रवाह में बहना नहीं था, खुश होना कोई असाइनमेंट नहीं था। सो जो मन किया सो किया और देर तक अपने कमरे से समंदर देखते रहे। रात का समन्दर शाम के समन्दर से काफी अलग होता है। रात अमावस की थी तो रोशनी का कतरा भी न था बस लहरों की हलचल थी। आखिर मैं खुद को रोक नहीं पाई और 'टू द सी' का पाठ किया। नहीं जानती जिन दोस्तों  को यह कविता सुनाई उन्हें कितनी समझ आई, लेकिन मुझे बहुत अच्छा लगा। 

यह मेरे जीवन की पहली रात थी जब सारी दुनिया से दूर मैं समन्दर के ठीक बीच में खुद की हथेलियाँ थामे खुद की धड़कनों को सुन रही थी....इस छोर से उस छोर तक समन्दर ही समन्दर....ठीक बीच में मैं। 

(जारी...)

Friday, October 16, 2026

नदी चली थी समन्दर से मिलने

कभी ख़्वाबों के पास जाती हूँ। कभी ख़्वाबों के क़रीब आने का इंतज़ार करती हूँ। कभी यूं भी होता है कि किसी और काम की धुन में जा रही होती हूँ और अचानक कोई अनजाना, अनदेखा सा ख़्वाब टकरा जाता है। उसे  देख अचकचाती  हूँ। विस्मय से पूछती हूँ, 'तुम कौन? क्या तुम राह भटक गए हो?' वो मुस्कुराकर, सर पर हाथ फिराते हुए बोलता है 'अरी पगली,  राह नहीं भटका, तेरा ही ख़्वाब हूँ। उन तमाम ख़्वाबों में से एक जिन्हें देखने से डरती ही रही तुम। आओ न, चलो, मेरे साथ।' ना-नुकुर करती हूँ लेकिन कोई सम्मोहन खींचता है।  

'भरोसे' पर से भरोसा इस कदर उठ चुका है कि खुद की साँसों पर यक़ीन नहीं आता। अपने कदमों की चाल को शक़ की निगाह से देखती हूँ। अगर पल भर को खुश होती हूँ तो नायकीनी आँखों से बह निकलती हैं। पिछले दिनों ऐसे ही एक अजनबी ख़्वाब ने हाथ बढ़ाया तो देर तक उसका चेहरा ताकती रही और आख़िर इन्कार न कर सकी। पलकें झपकाते हुए पीछे पीछे चल पड़ी । 

समन्दर से अजीब सा रिश्ता है। प्यार भी बहुत है और उदास करने वाली यादें भी कम नहीं। पहली बार समन्दर के करीब जाते हुए जिन्दगी से दूर निकलने जाने वाली मनःस्थिति थी। वो दौर बीते ज़माना हुआ। तबसे न जाने कितनी बार कितने समन्दर मिले लेकिन गोवा का समन्दर हर बार वह उदास मनःस्थिति की याद ज़रूर दिलाता है। 

मुझे याद है मेरी ट्रैवल की लिस्ट में से मैंने गोवा को लाल पेन से काट रखा है। लेकिन वो ज़िन्दगी ही क्या जो आपके सोचे हुए को उलट-पुलट करके न रख दे। सामने एक बार फिर गोवा की पुकार थी। जिसे मैं बार-बार उपेक्षित कर रही थी। इस बार गोवा अलग भेष धरकर पुकार रहा था। प्लान था क्रूज से मुंबई से गोवा जाने का। दो दिन, दो रात क्रूज पर ही रहना था। असल में गोवा इस ट्रैवल प्लान में सिर्फ पूंछ की तरह था सिर्फ इसलिए कि वापसी की फ्लाइट गोवा से पकड़नी थी। और क्रूज से यात्रा का सम्मोहन आकर्षित कर रहा था। कुछ विस्मय, कुछ उधेड़बुन कुछ असमंजस के बीच मेरी गर्दन 'हाँ' में हिल ही गई। 

क्या मैं खुश थी? नहीं जानती। थोड़ी परेशान जरूर थी। जाने कैसा होगा, क्या होगा। एक्साइटमेंट से ज्यादा दुविधा थी। इधर दोस्त ट्रैवल के प्लान फाइनल कर रहे थे, उधर मेरे मन की दशा अनमनी ही थी। एक कारण मोशन सिकनेस का भी था। मैंने इसके पहले क्रूज का एक छोटा सफर किया था अंडमान की यात्रा के दौरान और तब मुझे थोड़ी दिक्कत हुई थी। तो सारा फोकस इस पर था कि कहीं मैं सबका प्लान न खराब कर दूँ? 

रात में समन्दर की लहरें सपने में उछाल मारतीं और दिन में सी सिकनेस से बचने के उपाय खोजती फिरती। सी सिकनेस का खयाल मरीना से भी तो जुड़ता है। पुश्किन की कविता 'टू द सी' की याद। मारीना का समन्दर से प्यार और उसके पहले प्यार का समन्दर के किनारे मिलने का किस्सा। मारीना की माँ की सी सिकनेस के चलते बिगड़ती तबीयत। यह सब दिमाग के ओवरथिंकिंग वाले डब्बे में कबड्डी खेल रहा था। इसमें से सिर्फ मरीना और सेर्गेई का समन्दर के किनारे मिलने वाला किस्सा ही उत्साहित कर रहा था। ऐसा नहीं कि मुझे अपनी ज़िन्दगी में किसी सेर्गेई की तलाश है बस कि वो रूमानी खयाल गुदगुदाता रहता है। 16 बरस की मारीना समंदर के किनारे सीपियों को अपनी स्कर्ट में जमा करती हुई...उछलती कूदती। दूर से उस अल्हड़ राजकुमारी को देखता सेर्गेई। वो पहली नज़र का इश्क़। वो कच्ची उमर के प्यार की ख़ुशबू जैसे दुनिया भर के सारे समन्दर के किनारे अब तक बिखरी हो। जब भी कोई प्रेमी जोड़ा एक-दूसरे का हाथ थामे समन्दर के किनारे टहलते देखती हूँ, तो डूबते सूरज की अलौकिकता की लौ भी मध्ध्म पड़ने लगती है। 

हालांकि रीलों  के तूफानों ने उस शांत एहसास को, उन रेत पर छूटते कदमों को थोड़ा धूमिल तो किया है, फिर भी हमेशा कुछ कदमों के निशान मिल ही जाते हैं जो कहते हैं, प्यार इस धरती से कभी खत्म नहीं होगा। सचमुच प्रेमियों ने इस भटकती, बिखरती दुनिया को तनिक संभाल न रखा होता तो सांस लेना कितना मुश्किल होता। 

बहरहाल, वो दिन कि जिसका वादा था, मेरी हथेलियों पर रखा था। हाथ में बोर्डिंग पास थे और पीठ पर बैकपैक। अब भी क्रूज की लग्ज़री का एक्ससाइटमेंट तो नहीं था हाँ, कुछ दिन को दुनिया से दूर ले जाने की इच्छा बहुत थी। दुनिया में रहते हुए दुनिया से दूर जाना चाहती थी। हमेशा से जानती हूँ, कि किसी के बगैर किसी की दुनिया नहीं रुकती, बस थोड़ी सी बदल जरूर जाती है। इन दिनों मृत्यु एक खयाल की तरह साथ रहती है। शायद कोविड के बाद का असर होगा, या आसपास की घटनाओं का। जीवन पर पहले भी भरोसा नहीं था अब भी नहीं है लेकिन फिर भी है तो यह जीवन ही और इसे बहुत सारा जीकर ही हराया जा सकता है। सो जीने की इच्छा बोर्डिंग पास के साथ थामी हुई थी। परिवार को पता था कि कुछ दिन नो नेटवर्क ज़ोन में रहूँगी। मुझे खुद नहीं पता था कि किस ज़ोन में रहूँगी। 

मन की हालत यूं थी कि आसपास के लोग जहाँ खुशी से बौराये जा रहे थे, भीतर की विकलता ठहरने लगी थी। शायद भीतर की नदी, समन्दर से मिलने को बेचैन हो रही होगी। 

(ज़ारी...)

Wednesday, September 30, 2026

जा रहा है सितम्बर...



जा रहा है सितम्बर 
कंधे झुके हुए हैं उसके 
आँखें मायूस  

30 दिन का यह सफर 
किसी साल सा बीतता है 
जाने कितनी सदियों का दुख 
सितम्बर के सीने में दफ्न है
 
नब्ज़ रुक रुक कर चलती रही 
बात बनते बनते बिगड़ती रही  

मुस्कुराहटों में 
अतीत की उदासियों की सीलन झलकती रही 
फूल खिलते रहे बेहिसाब फिर भी 
मन का खिलना छूटता ही गया 

हर बार बीतता है सितम्बर 
लगता है बीत जाएगा दुख भी
दिल बुदबुदाता है 'हाँ, बीत जाएगा दुख 
जैसे बीत जाता है सितम्बर...'

Monday, September 28, 2026

मुख़्तर सी बात है...

जागी आँखों में कोई ख़्वाब आ गया था। तमाम पहरेदारी, तमाम बाड़ेबंदी के बाद भी। जाने कैसे। जागी आँखों के ख़्वाब सोई आँखों के ख़्वाब से मुख़्तर होता है। नींद में कोई बुरा ख़्वाब देखो तो आँख खुलने पर राहत होती है कि चलो ख़्वाब था, बीत गया। अगर अच्छा ख़्वाब देखो तो जागने पर अच्छा महसूस होता है, चेहरे पर मुस्कुराहट खेलती रहती है। 

जागी आँखों के ख़्वाब अगर चुभने लगें तो वो अपना रंग नहीं बदलते, न तासीर बदलते हैं। फिर वो चुभते ही रहते हैं, सोते जागते। 

सितम्बर महीना जाने कैसी सी फितरत लिए आता है। कुछ जागी आँखों के ख़्वाब सोई आँखों के ख़्वाबों से टकराते फिरते हैं। धरती से लेकर आसमान तक फूलों ही फूल खिले हैं और दिल है कि जाने कैसे वसवसों में गुम है। 

दिल की दिमाग से कभी बनी ही नहीं। इन दिनों दिल, दिमाग और देह की आपस में बनती नहीं। सब अपनी अपनी धुन में हैं। कोई मेरी नहीं सुनता। मैं भी किसी की नहीं सुनती। यूं भी तो चल ही जाता है दुनिया का कारोबार।