सुबह की आमद से बहुत पहले क्रूज के सबसे ऊपरी हिस्से पर पहुँच गई थी। मुझसे पहले भी कई लोग थे वहाँ। अंधेरे में रोशनी की चाह लिए लोग खुद भी किसी रोशनी से कम तो नहीं थे। रोशनी किसको नहीं चाहिए बस कि रोशनी के अर्थ सबके लिए अलग खुलते हैं। यूं सूरज के इंतज़ार में फिरना अच्छा लग रहा था।
इंतज़ार के भीतर बसी एक लंबी सिसकी की याद भर से सिहर उठी। 'इंतज़ार में होना इबादत में होना है' इंतिहाई इश्क़ के जमाने की मेरी फेवरेट लाइन हुआ करती थी। यूं लगता है पूरा जीवन ही कोई इबादत है, पूरा जीवन ही इंतज़ार है। नमकीन हवाओं से बातें करते हुए मैंने खुद को आज़ाद करना चाहा। क्या मैं अब तक खुद से रिहा नहीं हो पाई हूँ। लगने तो लगा था। लग तो रहा था कि मैं संभल चुकी हूँ। क्या सचमुच? इसी सवाल से भागती फिरती हूँ।
सोचती हूँ यह जो खुश होने का आवरण पहनकर दुनिया के सामने मजबूत होने का भ्रम बोया हुआ वह कहीं टूट न जाय। यहाँ कौन है जो मुझे जज करेगा, अजनबियत एक जादू होता है, वह आपको बिखर लेने की आज़ादी देता है। सूरज के इंतज़ार में खोये हुए मैंने खुद को पाना शुरू किया। मेरा खुद क्या है सिवाय एक लंबी न टूटने वाली उदासी के। मैं इस उदासी को पहचानती हूँ। बड़ी अपनाईयत है इससे। दोस्तों ने भी मुझे मेरे साथ होने के लिए अकेले छोड़ दिया था, रहम किया था।
क्रूज की उस छत पर सब हैरान परेशान घूम रहे थे कि सूरज किधर से निकलेगा। रात में हमारे कैप्टन ने क्रूज को किस दिशा में मोड़ा है कोई नहीं जानता। बस सब इंतज़ार में थे। मैं भी। लेकिन मन में यह बात भी चल रही थी कि रोशनी के लिए यह तलब हम सबके भीतर है। अंधेरा किसको चाहिए, रोशनी ही सबको चाहिए। लेकिन क्या सूरज निकलने से सबके अंधेरे दूर हो जाते हैं? काश कि हो जाते! धीरे-धीरे सूरज निकला। उसके आने से पहले आसमान में मानो किसी अल्हड़ युवती ने अपना सिंदूरी दुपट्टा फैला दिया हो। ऐसा मनमोहक दृश्य था वो। अंधेरे की विदाई और रोशनी की आमद का दृश्य। आसमान की सुंदरता समंदर में झांक रही थी मानो अपना मेकअप दुरुस्त कर रही हो। हाँ, सब ठीक ठाक है कहकर जैसे ही वो खूबसूरती सूरज की ओर मुड़ी नटखट प्रेमी सा सूरज बादलों में छुप गया था। उसका बादलों की ओट से झांकना दृश्य को और भी ज्यादा खूबसूरत बना रहा था।
अपने गालों पर कुछ रेंगते हुए महसूस किया था। यह सम्पूर्ण सुख नहीं था। सुख होते होते कुछ रह जाने की कसक थी। हथेलियों में हवा और पलकों में दृश्य को कैद किया। सूरज से बस इतना कहा, हर अँधियारे मन तक पहुँचो, हिम्मत बनकर, ताक़त बनकर। सूरज ने पलकें झपकाईं और हम वापसी को मुड़े। चाय की इच्छा आसमान पर ऊंचे जा टिके सूरज से अब पंगा नहीं ले पा रही थी।
सूरज देखने का चाव था, रील बनाने का चाव था या भीतर की खुशी पता नहीं लेकिन लोग बहुत खुश थे। मैंने भी न जाने कहाँ-कहाँ से सनराइज़ देखा है। सबसे ज्यादा पहाड़ों पर। लेकिन यूं समंदर के ठीक बीच में उसी सूरज को उगते देखना जिसे कल इसी में डूबकर बुझते देखा था अलग ही अनुभव था।
लौटते हुए एक बुजुर्ग जोड़े से मुस्कुराहटों का आदान-प्रदान करते हुए मैंने स्त्री की मुस्कुराहट में अजीब सी कशिश महसूस की। वो एकदम नहा-धोकर तैयार होकर आयीं थीं। बड़ी ही प्यारी लग रही थीं। ज्यादा प्यारा लग रहा था उनके बालों में लगा गुलाब का फूल। मैंने उस फूल को हैलो कहा और चाय की तरफ दौड़ लगाई। नाश्ता सर्व किया जा रहा था लेकिन अभी खाने की इच्छा नहीं थी तो चाय में रोशनी डुबोकर पीने के बाद नाश्ते से कहा, रुको जरा नहाधोकर आते हैं आराम से।
क्रूज के तीन फ्लोर सिर्फ खाने पीने के नाम थे। जहां हमेशा कुछ न कुछ खाना-पीना चलता रहता था। पूरे क्रूज को इस तरह डिजाइन किया गया था कि कहीं से कहीं को भी जाइए समंदर दिखे ही।
नाश्ते के बाद पूरा दिन क्रूज़ के ग्लैमर की चकाचौंध की दुनिया में डूबने उतराने का दिन था। कहीं कसीनो, कहीं टेबल टेनिस, कहीं समन्दर के मोतियों से सजे जेवर और कुछ और ख़रीदारी के लिए चम चम करते बाज़ार और कहीं शाम की महफ़िल की तैयारी में सजाये जाते गाव तकिये।
एक शानदार प्ले का भी इंतज़ाम था। बेहद शानदार ऑडिटोरियम में एक पंजाबी शादी की कहानी को बेहद मंझे हुए थियेटर आर्टिस्ट्स, साउंड आर्टिस्ट और मंच सज्जा ने ऑडियन्स को बांध लिया था। ज़ाहिर है यह प्ले उन सामान्य जन के लिए था जिनमें से काइयों के लिए यह प्ले देखने का पहला मौका था। प्ले को उसी नजरिये से एकदम कमर्शियल तरह से तैयार किया गया था। कॉमेडी, एक्शन, गाना बजाना और भरपूर रंग। एक सामान्य सी कहानी को साज सज्जा से ऐसे संवारा गया था और इतने सारे सुपरहिट बॉलीवुड के गानों की मेडली में पिरोया गया था कि हर कोई इसका आनन्द ले रहा था।
प्ले कुछ ज्यादा ही लंबा था लेकिन अच्छा था। खतम होते-होते भूख धावा बोल चुकी थी।
यह दिन यूं ही बीता घूमते हुए खाते पीते। शायद शाम का इंतज़ार था कि कब फिर से सूरज का खेल देखने छत पर जाऊँ। समंदर के बीच खड़े होकर यूं सूरज को बुझते देखना कमाल मंज़र था। जैसे उम्र भर की आस को पूरे होते देखना। इधर सूरज डूब रहा था उधर क्रूज़ पर लोगों के उत्साह का तूफान उग रहा था। कोई कॉर्परेट ग्रुप था शायद। उनका अपना डीजे, अपनी पार्टी भी चल रही थी। लोग चलते चलते भी थिरक रहे थे।
शाम का सुरूर हर किसी की आँखों में था। ज़िन्दगी में से ज़िन्दगी चुराकर जीने वालों का हाल और भी कमाल था। लम्हों को बटोर लेने की हसरत में न जाने कितने लम्हे उनसे छूट रहे थे, बिखर रहे थे। जैसे कोई खेल हो, जैसे कोई वरदान जी रहे हों और पूरा जी न पा रहे हों। अगली सुबह क्रूज की यह यात्रा गोवा के बंदरगाह पर खत्म होनी थी। क्रूज की यह दूसरी और आखिरी रात को जीवन की सुनहरी रातों वाली गुल्लक में डालकर नींद का रुख किया। लेकिन नींद, उसे भी तो मटरगश्ती करनी थी। न जाने कहाँ घूमती फिर रही थी। मैं कमरे की खिड़की से समंदर को ताकते हुए नींद का इंतज़ार करने लगी....बाहर की लहरें भीतर की लहरों से टकरा रही थीं...आवाज़ आ रही थी...मद्ध्म मद्ध्म...हालांकि बाहर कोई आवाज़ नहीं थी...
धरती का एक तिहाई हिस्सा पानी है, शरीर का एक तिहाई हिस्सा पानी है, प्रेम भी तो पानी ही है...फिर भी दुनिया में इतना सूखा क्यों है, दुनिया में इतने सूखे मन क्यों हैं आखिर...सोचते हुए नींद का इंतज़ार जारी रहा।
नींद कब आई पता नहीं, लेकिन सुबह जल्दी ही आ गई थी...
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