Friday, August 28, 2026

फिल्म “बंदर” के तीन बंदर ...


-ज्योति नंदा
फिल्म “बंदर” के तीन संवाद फिल्म की आत्मा है। मेरे लिए फिल्म इनहीं तीन बिंदुओं पे “तीन बंदरों’ की
तरह टिकी है.
पहला, “हमसब अपने ही जीवन के सर्कस के बंदर हैं।“
दूसरा, “हमसब सेक्सुअली रिप्रेसएड हैं”
तीसरा है तब आता है जब झूठे केस में फंसे समर (बॉबी देओल) स्वीकार करते हैं कि “मैं उस सीचुएशन
को ठीक से हैंडल नहीं कर पाया”
लेकिन इन तीनों बिन्दुओ में से सिर्फ फिल्म की टैग लाइन “हमसब अपने ही जीवन के सर्कस के बंदर
हैं।“ को ठहरने का मौका दिया गया है. बाकी दोनों को शब्दों में बाँध के हवा में छोड़ दिया गया
है।
“हमसब अपने ही जीवन के सर्कस के बंदर हैं।“ इस संवाद के गहरे अर्थ है। जिसे आप जीवन के
सूत्रवाक्य की तरह, जीवन की जटिलताओं को डिकोड करने में मददगार की तरह और सबसे ज्यादा
कठिन समय में खुद को संभालने के लिए थाम सकते हैं. इस लिहाज से ये महत्वपूर्ण कथन है. बिल्कुल
उसी तरह जैसे “सब किस्मत का खेल है, हमारे हाथ में क्या है?” सबकुछ हाथ से छूट जाने की स्थिति
में ये सूत्र हमे थमा दिया गया है। पीड़ा की असहनीय स्थिति से जीवन में वापिस लौट आने के लिए.

जहाँ कारणों और तर्कों की जगह नहीं बचती. ये कथन भी इस फिल्म में ऐसी ही स्थिति को बयां करता
दिखाया गया है। ऐसी बहुत सी कहानियां, फिल्मे होती हैं जिनमें कोई समाधान या द एंड जैसा नहीं हो
सकता. बंदर भी वही फिल्म है।

फिल्म के दूसरे हिस्से यानि मध्यांतर के बाद की फिल्म सिस्टम की खामियों को दर्शाती है. जेल के
सड़े हुए भयानक माहौल में, दुर्दांत अपराधियों के बीच उस इंसान को रख दिया जाए जिसने अब से पहले
छोटा-मोटा अपराध भी ना किया हो. और जो गलती हुई उसके बारे में जरा- सा भी आभास ना हो कि वो
भी कोई गलती थी. ऐसे में वो निश्चित ही पागलपन का शिकार हो जाएगा है। फिल्म के एक सीन में
समर (बॉबी दयोल ) की बहन वकील के साथ जेल में मिलने आती है।वे उससे सारी जानकारियाँ लेना
चाहते हैं जिससे की केस मजबूत हो सके। लेकिन अकल्पनीय परिस्थितियों का मारा समर सिर्फ रोता है
कुछ भी ठीक से नहीं बता पाता। वकील पूछता है “तुम्हारा भाई बेवकूफ है क्या?” बहन भी, जो भाई की
व्यवहारिक मासूमियत को हमेशा से जानती है बोल देती है “हाँ”. कहानी में यहाँ कुछ मिसिंग सा लगता
है। जिसे उसी कथन “हम सब अपने जीवन.... “ से समझाने की कोशिश की गई सी लगती है. बेहतर
होता की इस बात की कुछ और परतें खोली जातीं.

ऐसा ही दूसरा बिन्दु संवाद के रूप में है जो मेरी नजर में इस कहानी का केन्द्रबिन्दु है “वी आल आर
सेक्सुअली रिप्रेसएड” लेकिन ये डायलॉग परदे पर इतनी सरसरी तौर पर आता और चला जाता है की
समझ में ही नही आता कि दर्शक इससे क्या समझे?, ऐसा क्यों कहा गया? खासकर तब जबकि
निर्देशक अनुराग कश्यप हैं।

भारतीय समाज के लिए ये सिर्फ एक डायलॉग नहीं मानसिक बीमारी है। उस पर थोड़ा तो ठहरना बनता
था। कुछ गांठें खुलती तो समर मेहरोत्रा के भीतर बैठा कन्डीशंड स्त्रीद्वेष ज्यादा खुल कर आता.
हालांकि कि कुछ सीन्स में दिखाने की कोशिश भी की गई है। जैसे - जब वो नई गर्लफ्रेंड के साथ बैठा
है और एक्स गर्लफ्रेंड का मैसेज आते ही बहुत आसानी से, सहजता से झूठ बोलता है की प्रोड्यूसर का
फोन है। फोन पर गर्लफ्रेंड को स्टॉक करना। लेकिन ये सीन इस तरह से नहीं फिल्माए गए हैं की पुरुषों
की मानसिकता पर कोई सवाल उठ सके. ये सीन उसी तरह हैं जैसे कि “ये तो होता ही है”। एक और
अंतरंग क्षणों का सीन है समर कोई सेक्शुअल पोजीशन ट्राई करने को कहता है तो उसकी पार्टनर डर
जाती है “ऐसा करने में तो मेरा दम घुट जाएगा” जैसा की खबरों में है की इस फिल्म पर सेंसर की कैंची
चलने के बाद ही देश में रिलीज की गई। ऐसा लगता है कि सीन को दर्ज होने तक ठहरने नहीं दिया
गया. इस बात को ध्यान में रखते हुए, कह सकते हैं की फिल्म मे समर की जर्नी में उसके व्यक्तिगत
जीवन के हिस्से, खासकर सेक्शुअल बिहेवीयर वाले हिस्सों पर केची शायद ज्यादा चली। क्योंकि जो भी
दृश्य है उतना असर नहीं छोड़ पाते जितना जेल में हो रही मारकाट वाले दृश्य। कुछ इतने वीभत्स हैं कि
उनका असर तुरंत वही झटक देना चाहेंगे या नजरें हटाने पर मजबूर हो सकते हैं। जेल के माध्यम से
सीस्टम की खामियों वाला ये हिस्सा इतना लंबा है कि ऊब होने लगती है। ओटीटी प्लेटफॉर्म के दर्शकों
के लिए खासतौर पे सारे दृश्य देखे हुए से लगते हैं। जेल की क्राइम स्टोरीस ओटीटी के दर्शकों का प्रिय
विषय है।

एक दर्शक के नाते सिर्फ कयास ही लगाया जा सकता है की सेंसर की कैंची के कारण ही ऐसा हुआ
होगा। फिल्म ने देश विदेश में काफी ख्याति अर्जित की है। या फिर लेखक निर्देशक का क्राफ्ट से खेलने
के कारण भी हो सकता है, लगे की हमने तो अपनी बात कही लेकिन दर्शक वही लेकर गया जो उसे
देखना था. यानि फिल्म देख कर आपके साथ जेल की हिंसा ही ज्यादा ठहरती है। जबकि वो कहानी का
एक हिस्सा भर है। यहाँ मुझे बॉबी देओल को इस रोल के लिए चुने जाने पर भी संदेह है. लव मेकिंग
सीन में भी सपाट चेहरा और जेल में घट रहे जीवन से जो भीतर बदलाव हो रहे उसकी कोई झलक चेहरे
पर नहीं दिखती सिर्फ आखिरी सीन में एक दो सेकेंड बस.

सिनेमाहाल तक “बंदर” के पहुँचने का कारण भी फिल्म में बॉबी देओल का होना है. यहाँ ये सवाल भी उठता है कि क्या भारतीय दर्शक हर तरह का सिनेमा देखने के लिए तैयार है? जहाँ उसे स्पूनफीड ना किया जाए बल्कि उसकी समझ और ग्रहण करने की क्षमता पर छोड़ दिया जाए। वो दर्शक जो इन दिनों सिनेमाहाल में दो घंटे बिना मोबाइल में झाँके नहीं रह पाते. वो दर्शक जो बंदर फिल्म में समर से शुरुआत से ही सिमपेथि बना लेता है। झूठा केस है को तुरंत सच मान लेता है। एक सीन में आई प्रतिक्रिया से ज्यादा साफ हो जाता है -- समर के घर को अपना स्पेस समझने वाला सीन या समर पर अपना अधिकार जताने वाले दृश्य देखते हुए हाल में बैठे पुरुष नायिका पर जोर का ठहाका लगाते. लेकिन क्लाइमेक्स में जब समर का व्यवहार थोड़ा और खुलता है, और उसका कनफेशन आता है “मैं उस सीचुएशन को ठीक से हैंडल नहीं कर पाया” (वो भी नेरेटर के वॉयस ओवर के रूप में आता है, सीधे संवाद के रूप में नहीं।) तब दर्शकों (पुरुष) में सन्नाटा छा जाता है वही जो कुछ ही मिनटों पहले ठहाके लगा रहे थे, लगा जैसे ये तो अप्रत्याशित था, जबकि इसके संकेत ऊपर बताए दृश्यों में मिलते हैं अगर कोई अनबायस होकर देखे। फिर जेल में जो उसके साथ घटता है उससे वापिस सिंपथी हो जाती है। 

शायद इसीलिए निर्देशक को स्टेटमेंट देना पड़ता है “ये फिल्म “एंटी मी टू” नहीं है. इस दौर के राजनीतिक समाजिक उथल-पुथल भरे माहौल में सिनेमा भी अन्य अभिव्यक्तियों की तरह अछूता नहीं है। बहुत से लेखक निर्देशक “ऐसा ही होता है” को कटघरे में खडा करने का साहस कर रहे हैं। जिनमें क्राफ्ट और कंटेन्ट में कौन ज्यादा महत्वपूर्ण है कि बहस भी लगातार जारी है. कुछ हफ्तों पहले फिल्म “माँ- बहन” आई थी. इसके क्राफ्ट पर सवाल उठाने वालों में भी इस बात पर एक राय थी कि फिल्म अपनी बात अच्छी तरह से कहने में सफल रही. फिल्म “बंदर” के बारे में ऐसा पूरे कान्फ़िडेन्स से नहीं कह सकते. इसलिए भी फिल्म देखी जानी जरूरी ही ताकि आप अपनी राय खुद बना सकें.

ज्योति नन्दा फिल्मों पर अपनी काफी स्पष्ट और बेबाक राय रखती हैं। फिल्में देखना, उनका विश्लेषण करना उन्हें पसंद है। वे कहानियां लिखती हैं, स्क्रिप्ट लिखती हैं, कुछ शॉर्ट फिल्मों का उन्होंने निर्माण भी किया है। थियेटर उनका प्यार है, कुछ महत्वपूर्ण नाटकों में उनकी भूमिकायें काफी सराही गई हैं। 

Email -jnanda1006@gmail.com

Tuesday, August 18, 2026

कबिरा सोई पीर है- हमारे समाज का आईना


नवीन जोशी- 
सघन संवेदनाओं और सामाजिक-राजनैतिक चेतना से सम्पन्न प्रतिभा कटियार कविताओं के अलावा कहानियां भी लिखती रही हैं। रूसी कवि मारीना त्स्वेतायेवा की जीवनी 'मारीना' में कविता एवं कवि-मन की उनकी समझ के साथ उनके गद्य ने भी ध्यान खींचा था। पिछले वर्ष प्रकाशित उनका पहला उपन्यास 'कबिरा सोई पीर है' भी प्रकाशन के बाद से चर्चा में है।

भारतीय समाज में गहरे पैठी वर्णाश्रमी संरचना और उससे उपजी मारक स्थितियां एवं अंतर्विरोध इस उपन्यास का केंद्रीय विषय हैं। घर-परिवार और समाज में स्त्रियों की स्थिति, पुरुष सत्ता द्वारा उनका दमन और क्रमश: उभरती स्त्री चेतना केंद्रीय विषय में गुंथे हुए हैं। प्रेम उनका प्रिय विषय है, इसलिए प्रेम कथा में इस सबको खूबसूरती से पिरोया गया है।

प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी कराने वाले एक कोचिंग संस्थान से कथा शुरू होती है। शुरूआती पृष्ठों में ही 'साला चमार कहीं का। आकर बैठ गया है सर पर', 'ब्राह्मण होकर आरक्षण का पक्ष ले रहा है तू? एक दिन यही आरक्षण तेरे सामने खड़ा होगा भूत की तरह', और 'मैं हर लड़की के, हर स्त्री के सम्मान के लिए लड़ता हूं, लड़ूंगा' जैसे वाक्यों से पाठक का सामना होता है और संकेत मिल जाता है कि यह कैसी लड़ाई का मैदान है।

समवय लड़के-लड़कियों में निश्छल दोस्ती, प्रेम, ईर्ष्या, झगड़े सब स्वाभाविक हैं। गरीब परिवारों में कोचिंग जाते बच्चे बेहतर भविष्य का सपना हैं। सपनों के अलग-अलग धरातल हैं। कोई परिवार ब्राह्मण है और कोई दलित। गरीबी बराबरी का मंच नहीं है। जाति की ऊंच-नीच उसे घोर असमान बनाती है।

प्रेम ऐसे बंधन नहीं देखता। वह असमान मंच पर पेंगें मारता झूलता रहता है। शुरू-शुरू में जो झटके आसानी से झेल जाता है प्रेम, वही खुरदुरी जमीन पर पैर रखते ही कभी जातीय ठोकर खाता है और कभी पुरुष के दम्भ की। कोचिंग सेंटर से शुरू हुआ दलित तृप्ति और ब्राह्मण अभुनव का प्रेम इसी नियति को प्राप्त होता है। 'हर लड़की का सम्मान करता हूं' कहने वाला अनुभव अपने भीतर भरे पाखण्ड को स्वीकार तो करता है लेकिन पितृसत्ता का चोला नहीं फेंक पाता। उसका प्रेम इसी बात से सूख जाता है कि तृप्ति आईएएस परीक्षा में पास हो गई लेकिन वह रह गया।

कथा सुखांत नहीं है लेकिन प्रेम में अपने प्रेमी से अधिक एक पुरुष से छली गई तृप्ति स्वाभिमान के मोर्चे पर मजबूत होती है। तमाम जिल्लत से मुक्त होने के लिए उसके पिता ने आत्महत्या का जो रास्ता चुना, वह तृप्ति का भी रास्ता बंद कर गया था लेकिन तृप्ति फिर खड़ी होती है। उसका फिर से संकल्पबद्ध होना, अफसर बन गए अनुभव के साथ संयोगवश हो गई भेंट के प्रतिरोध में ही जैसे सम्भव होता है। पुरुष दम्भ से वह ताकत ग्रहण करती है और आंसू पोछकर अगले समर के लिए कमर कसती है। यह उपन्यास का सबसे मजबूत पक्ष है।

कथा तृप्ति और अनुभव के प्रेम के इर्द-गिर्द एकरेखीय नहीं रहती। तृप्ति की बहन सीमा के वैवाहिक जीवन की भयावह स्थितियां स्त्रियों के व्यापक दर्द को स्वर देती हैं, जिसमें पत्नी से बलात्कार का विमर्श भी शामिल है। उसके भाई अंशुल की कहानी और अनुभव के पिता के दफ्तर के हालात जातीय नफरत और राजनीति के विरोधाभासों की पोल खोलते हैं। सुधांशु और कनिका का प्रेम और पारिवारिक द्वंद्व भी हमारे ही समाज का आईना है। इस तरह उपन्यास व्यापक संदर्भ और फलक ग्रहण करता है।

प्रतिभा का कवि पूरे उपन्यास पर छाया हुआ है- बीच-बीच में प्रयुक्त किए गए कवितांश, अध्यायों के शीर्षक और प्रत्येक किस्से की शुरूआत और अंत में दी गई शायरी इसका प्रमाण है। भाषा जरूर 'थोड़ा सा रोमानी हो जाएं' वाली छूट लेती है, जिसमें पहाड़ और नदी को भी साथ ले लिया गया है।

बढ़िया उपन्यास है और खूब पठनीय। प्रतिभा से भविष्य में और अच्छे उपन्यासों की उम्मीद बंधती है।
 
15 अगस्त 2026, लखनऊ।
(उपन्यास- कबिरा सोई पीर है', रचना- प्रतिभा कटियार, प्रकाशक- लोकभारती, प्रयागराज।)

Monday, August 10, 2026

मसूरी घुमक्कड़ी : इस बारिश में


उदास आँखों को उस रोज़ धुंध से भरी एक सड़क पर रख दिया था। वही सड़क जिसे दूर से टुकुर-टुकुर देखा करती थी। वही सड़क जो अक्सर ख़्वाबों में आती थी और हाथ पकड़कर उठाकर ले जाती थी।

आखिर एक रोज़ धुंध से भरी उस सड़क पर पाँव रख दिये। ख़्वाब में दिखने वाली सड़क पर जब हक़ीक़त में पाँव रखे तो जैसे दिल के सीले कोनों को तनिक रोशनी मिली हो।

उम्र का कुछ न कहिए ये न जाने कितने परतों में रूप बदल बदल कर रहती है। अचानक से मैंने खुद को किसी नन्ही बच्ची में तब्दील होते देखा, फिर कुछ देर में एक किशोरी वय में पर असल उम्र वाली मैं तो असल में कहीं नहीं थी। या शायद यही असल है कि जो जीवन हमसे जीने से छूट जाता है, वह फिर फिर लौटकर आता जरूर है। जैसे मुझसे बिना जिये बचपन छूट गया, जवानी भी छूट गई और अब इस अधेड़ सी उम्र में वह सारा कुछ क़रीब आकर बैठ जाता है।

सोचती हूँ, हमें इन गिरहों से आज़ाद कौन करता है, हम खुद ही तो।

उस रोज़ भी ऐसे ही एक बैकपैक लिया, जूते के तस्मे कसे और धुंध भरी सड़क का सदका उतारने चल पड़ी। हथेलियों में कोई प्लान नहीं था बस वीकेंड की छोटी सी फुर्सत थी । सामने दिखती पहाड़ों की रानी मसूरी और ढेर सारे डर, ट्रैफिक जाम में अटक जाने के, लैंडस्लाइड होने के और सबसे बड़ा डर मसूरी की आपाधापी में, भीड़ में खोने का। 14 बरस हो गए देहरादून में रहते, न जाने कितनी ही बार गई भी हूँ लेकिन मालरोड की भीड़ में खोई खोई मसूरी न मुझसे मिली, न मैं उससे मिल पाई।

पहाड़ों का असल सुख बारिशों में है, लेकिन खतरे भी हैं। तो इस बार जोखिम लिया। जोख़िम से याद आया, ज़िंदगी के सब सुख इस जोख़िम का दरवाजा खटखटाने के बाद ही हिस्से आए हैं। 2011 का अगस्त ही तो था जब ज़ीरो आत्मविश्वास और ढेर सारी डिप्रेशन की दवाइयों की पोटली लिए देहरादून आई थी। बिना घर पर किसी को बताए कितने ही चक्कर मसूरी के लगाये। कभी यूं भी हुआ कि चाय पीने निकले और मसूरी जाकर चाय पी। तब मसूरी पर पर्यटकों का इतना दबाव नहीं था। यहाँ आने पर कितनी बार ऐसा भी होता कि घास की किनारियों पर अटकी बूंदें सूरज की किरणों को गले लगाए बैठी होतीं और अपनी ऊष्मा जड़ित बूंदों से अप्रतिम आभा बिखेर रही होतीं थीं। और मैं अपलक देखती जाती। ऐसे मासूम से दृश्य ज़ेहन अपने रंगों और ख़ुशबू समेत बसते हैं, देखिये न 2011 की उस स्मृति की ख़ुशबू कैसी बिखरी हुई है।

ओह, भटक जाने की ये आदत भी न, मैं तो जोख़िम की बात कर रही थी न। तो शुभचिंतकों की तमाम सलाहों को बैकपैक के बाहर वाले हिस्से में संभाल के रखा और चल पड़ी।

देहरादून से मसूरी मात्र एक घंटे की दूरी पर है, पहुँचने की कोई जल्दी नहीं थी क्योंकि इस बार रास्तों से ही मिलना था मंज़िल का ऐसा था कि वो कहीं भी हो सकती थी, जहां मन कहे रुक जाओ, वहीं रुककर मंज़िल बना लें । मसूरी जाना है या लैंडोर यह भी तो तय नहीं था, तय था तो बस इतना कि रास्ते में उड़ते बादलों से रुक-रुक कर गपियाना है। बारिश होते हुए भी देखना है और बारिश के बाद रूई से उड़ते बादलों को पलकों पर सहेजना भी है।


सुबह की चाय के लिए पहुंचे झड़ीपानी फॉल वाले रास्ते पर मिलने वाले नर्सरी कैफे में। खूबसूरत सी नर्सरी के बीच में बैठने के सुंदर ठिकाने थे। कैफे अभी अंगड़ाई ही ले रहा था। बढ़िया बन मक्खन और चाय से दिन की शुरूआत हुई। जाने क्यों मन में यह वहम सा है कि अगर सुबह की पहली चाय अच्छी और सुकून से पीने को मिल जाये तो दिन का अच्छा शगुन होता है। सो शगुन तो हो गया था।

इन दिनों ‘मुसाफिर कैफे’ के चलते झड़ीपनी कैसल की भी काफी हाइप हो गई है तो सोचा जरा दर्शन करते चलते हैं। लेकिन इतराये शरमाये मियां कैसल अपने रौब में थे, किसी की इंट्री नहीं, सिर्फ रहने वालों के लिए। सोचा, चलो देख लेते हैं, ठीक लगा तो एक रात यहीं सही। सुंदर तो है यह जगह कोई शक नहीं लेकिन उफ़्फ़ कीमतें...हमने मुस्कुराकर टाटा किया और 19th सेंचुरी कैफे का रुख किया। यह एक खूबसूरत ठीहा है। बारिश हो रही थी इसलिए इनका आउटडोर बंद था और यही मेरे लिए ईनाम था। कुछ देर में बारिश रुकी और बादलों ने हमला ही बोल दिया। जैसे कह रहे हों, लो कितने बादल चाहिए तुम्हें। मैंने हँसकर कहा, बहुत सारे...और बादलों का गुच्छा मेरे सर से होकर गुज़र गया। मेघालय की याद ताज़ा हो गई।

ऐसा सुंदर एहसास कि खुद को खुद की ही ख़बर न रहे।

बादलों से गुफ़्तगू का दौर चलता रहा, चलता रहा...दूर से मसूरी को देख मुस्कुरा कर कहा, आ रही हूँ, जरा ठहरो तो सही।

पहाड़ों की रानी से मिलना :

हाथों की लकीरों में कुछ नहीं रखा। उन्हें तो न जाने कितनी नदियों, झरनों और समंदरों में एक एक कर गिरा आई हूँ। अब जो हथेलियों में दिखती हैं वो बस उन बहाई जा चुकी लकीरों की परछाईंया हैं। उस रोज बरसते मौसम में जब हथेलियों को बूंदों के आगे किया तो मन के भीतर कोई ख़ुशबू सी दाखिल हुई। यह कुछ नया उगने की आहट थी। क्या मेरी हथेलियों में कोई नई लकीर उग रही है, मैंने ध्यान से देखा, वहाँ कुछ भी नहीं था, बरसती बूंदों में एक बूंद और जा मिली, पलकों में अटकी बदलियों की रिहाई का वक़्त था शायद।

‘ओ मसूरी, तुम तो इतने करीब थी फिर भी इतनी देर क्यों लगाई गले से लगाने में।’ मैंने गिरती हुई बारिश की लड़ियों से लाड़ लड़ाते हुए पूछा। उसने मुस्कुरा कर जवाब दिया, ‘मैंने तो तुम्हें कई बरस पहले ही गले लगा लिया था, याद करो...बस तुम्हें स्पर्श के उस लम्स को महसूस करने में इतना वक़्त लग गया।’

मैं चुप की गलियों में गुम चुकी थी। सच ही तो है, मेरे सबसे गाढ़े मुश्किल वक़्त में कितनी बार सर पर हाथ फिराया तो था मसूरी ने, बस मैं ही समझी नहीं। शायद टूरिस्ट की भीड़, लंबे-लंबे ट्रैफिक जाम और रास्ते में होने वाले लैंड स्लाइड के चलते मैंने एक दूरी बना ली थी।
 
दिल चाहा मसूरी को आगे बढ़कर गले लगा लूँ।

बहरहाल, हम दोनों गले मिले। मैंने पूछा, ‘चाय पियोगी?’ अपनी बौछार मुंह पर फेंकते हुए उसने कहा ‘हाँ जरूर।’ बाल्कनी में बैठकर चाय पीते हुए देह पर सुकून और आलस को फिसलते महसूस किया। नींद की चादर ओढ़ी और नरम बिस्तर में लुढ़क गई।

नींद खुली तो वादियों में बादलों की मटरगश्ती चल रही थी। धुंध से कोई मीठी सी धुन उठ रही थी और मैं निर्मल वर्मा को याद करके मुस्कुरा दी। शहर की तमाम हलचल से दूर हमारे इस ठिकाने पर सिर्फ चिड़ियों की आवाज़ें सुनाई देती थीं, या पत्तों के सरसराने की। खुद का सिरा गुमाकर आई एक लड़की के लिए यह सब ऐसा था जैसे किसी की मेरे लिए मांगी गई कोई दुआ कुबूल हो गई हो।

शाम की चाय के बाद एक लंबी सैर के लिए निकली तो बारिश के बाद वाले मौसम की खुनक तारी थी। हरे के इतने शेड्स बिखरे पड़े थे कि क़ुदरत के चित्रकार के सजदे में झुकने को जी चाहा। पहाड़ियाँ जंगली फूलों से खिली हुई थीं। अपनी बालकनी में खिले एक छोटे से फूल को देखकर चिहुँकने वाले हम लोग कितने गरीब हैं कुदरत के इन नज़ारों के सामने।

जगह-जगह उगी फर्न की पत्तियाँ पत्तियाँ अपने हुनर में माहिर थीं। पेड़ों पर झूमती जंगली लताएँ, उनके तनों पर उगे फर्न जैसे पेड़ों को सजाने की जादूगरी सीखी हो। कई जगहों पर तो काई भी ऐसे उगी थी मानो कह रही हो, जो हिस्सा रह जायेगा उसे मैं सजाऊँगी, दीवारें हों, रास्ते हों या पेड़। शॉल को देह पर कसते हुए मैंने सोचा ऐसे ही मौसम को तो कहते हैं न मौसम का गुलाबी होना। भला हुआ किसी राजनीति से नहीं जुड़ा यह गुलाबी। वैसे कुछ भी हो हरे की दीवानी मैं आज गुलाबी ही पहनकर घूमने निकली थी। मौसम का जादू मेरे बालों में अटके बिना कैसे रहता।

जिस जगह जाने से हमेशा डरती हूँ, वह है माल रोड। कारण है भीड़। लेकिन आज इस बिना योजना वाली छोटी सी ट्रिप का सिरा मेरे हाथ में था ही नहीं और मैंने कुछ ही देर में खुद को माल रोड पर चलते हुए पाया। सिर्फ एक चाय पीने की इच्छा लिए हम माल रोड पर लंबी वॉक पर चलते गए चलते गए।

चाय की प्यालियों में खुशगवारी की मिठास काफी थी।

बादलों में मानो कोई होड़ थी एक-दूसरे से आगे निकलने की । मंत्रमुग्ध सी मैं उनके खेल को देख रही थी। जिस मसूरी को देहरादून से दूर से देखती रहती हूँ आज वहीं से देहरादून को जगमग करते हुए देख रही थी। कुदरत के इश्क़ का इत्र चारों तरह बिखरा पड़ा था।

यह रात कभी न बीतने वाली रात में तब्दील हो चुकी थी। याद की अंगूठी में जड़े चमचमाते नगीने सी रात। हम चलते, सांस लेते, बैठते, फिर गहरी सांस लेते फिर चलते। इस रात को घूंट घूंट पी रहे थे। रात की इतराहट देखते ही बन रही थी। हम चाय से पहले वॉक करते, चाय के बाद करते, वॉक के बाद चाय पीते और फिर वॉक करते। डिनर से पहले वॉक फिर डिनर के बाद वॉक। असल में ये सारी वॉक और कुछ नहीं थीं ये थी रात के जादू को समेटने का लालच। जब वॉक करते हुए थक गई तो बालकनी से मसूरी को ताकने लगी, फिर अपने कमरे से घाटी में चल रहे जादुई खेल को देखती रही। रात और नींद का रिश्ता टूट चुका था। नींद का इंतज़ार भी नहीं था।

जाग के इस खेल में मसूरी लगातार जीत रही थी और उसकी जीत पर मैं खिलखिला रही थी। पगली, जानती ही नहीं मैं उससे जीतने नहीं, हारने ही तो आई हूँ। इस बीच देर रात या सुबह शायद थोड़ी सी नींद आई। वादी में बादल अकड़ू बच्चों की तरह पीछे हाथ बांधे टहल रहे थे। कभी धूप का कोई कतरा दिखता जिसे बादल झट से ढँक लेता। बारिश आस पास थी लेकिन अभी आई नहीं थी।

सुबह की चाय के साथ निर्मल वर्मा और मैं मुस्कुरा रहे थे। ‘हर बारिश में’ उनकी किताब हाथ में थी। न जाने कितनी बार की पढ़ी हुई किताब। सामने बारिश का इंतज़ार था और हाथ में बारिश थी।एक पोस्टबॉक्स ने अपने आसपास तमाम फूल खिला लिए थे। वो गाढ़े लाल रंग का पोस्टबॉक्स फूलों के साये में कितने सारे संदेशों को सहेजे होगा, या उन यादों को सहेजे होगा शायद जब लोग चिट्ठियाँ लिखते थे, अपनी बातें लिखकर भेजा करते थे।
 खुद को समेटकर चलने का समय हो चला था। समान पैक करने में सबसे पहले मैंने हरा समेटा, फिर समेटा इस हरे से उगा गुलाबी। फिर मैंने समेटा अपना वो बिना जिया बचपन जो ऐसे मौकों पर निकल भागता है। फिर समेटीं एक किशोर युवती की डरी सहमी आँखें जिन्होंने डर से कभी ख्वाब नहीं देखे। चलते-चलते मेरी हथेलियों को मौसम की एक शोख डाल ने थाम लिया था, मानो पूछ रही हो, ‘फिर कब आओगी?’ मैंने अपनी पलकों में अटकी बदलियों को आज़ाद करते हुए कहा, ‘अरे जरा सा तो दूर है देहरादून, कभी भी आ जाऊँगी।’ जबकि जानती हूँ मुझे आने में पूरे पंद्रह बरस का समय लगा है। चलते वक़्त की विदाई का नेग देने हमेशा की तरह बारिश आ चुकी थी...

गुलाम अली साहब सुर लगा चुके थे, ‘दिल के लुटने का सबब, पूछो न सबके सामने...’ बादलों से भरी सड़क में हम गुम होने लगे थे।

Thursday, July 30, 2026

सो काफ़िर बे पीर...


- दिनेश कर्नाटक 
कबिरा सोई पीर है, जो जाने पर पीर।
जो पर पीर ना जानई, सो काफिर बे पीर।

(कबीर कहते हैं, जो दूसरे की पीड़ा को समझ सके, वही साधु- संत है, जो न समझ सके वह धर्म तथा हृदय हीन है।)
 
कबीर के दोहे की पंक्तियों से ही प्रतिभा कटियार ने अपने उपन्यास का नाम 'कबिरा सोई पीर है' रखा है, जो लोकभारती पेपरबैक्स से वर्ष 2025 में प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास में जातिवाद के नाम पर भेदभाव, अपमान, उत्पीड़न की वह पीड़ा है जो सब जगह व्याप्त है, मगर दिखाई नहीं देती। उपन्यास को पढ़ते हुए दिमाग में उत्तराखंड में पिछले दिनों पौड़ी में हुई केतन की हत्या, चंपावत में ड्राइवर के गले में जूते चप्पल की माला पहनाकर घुमाने तथा मेरठ का वह प्रसंग भी आंखों के सामने आता है, जहां रोड पर प्रदर्शन कर रहे लोगों से आगबबूला हुए एसपी साहब कैदी वैन के अंदर जाकर प्रदर्शनकारी को पीटने लगते हैं।

हम प्रायः लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि अब कहां होता है भेदभाव, अब तो सब ठीक है, मगर उसी समाज में हम, 'इन्हें तो बहुत सिर पर चढ़ा दिया गया है', आरक्षण पर गालियां तथा दुर्व्यवहार के अनेक रूप देखते सुनते रहते हैं।
उपन्यास के केंद्र में तृप्ति है जिसके पिता, भाई व बहन अपने-अपने जीवन में भेदभाव व उत्पीड़न झेलते रहते हैं। तृप्ति धैर्य व संयम से इन सब स्थितियों का सामना करते हुए कामयाब होकर सम्मान अर्जित करने का इरादा रखती है। उसे अनुभव और कनिका जैसे दोस्त मिलते हैं जो उसे हौंसला देते हैं।

उत्पीड़न का रूप जातिवाद ही नहीं है। सीमा और कनिका को स्त्री होने की वजह से दोहरी तरह का भेदभाव झेलना पड़ता है। अनुभव एक उदार और लोकतांत्रिक नौजवान है जो जातिवाद और भेदभाव के परे चीजों को देखता है, लेकिन पुरुषोचित अहं तथा सामाजिक ताने-बाने में वह बहुत आगे नहीं जा पाता। इस अंधेरे को तोड़ने की उम्मीद पैदा करते तृप्ति और अनुभव आखिरकार उसी का शिकार हो जाते हैं।

यह उपन्यास बाहर से बेहद शांत, शालीन और उदार दिखने वाले हमारे सामाजिक ताने-बाने के भीतर छिपे हुए सामंती तथा जातिवादी चेहरे को उजागर करता है। इस महत्वपूर्ण विषय पर लिखने के लिए प्रतिभा जी को बहुत-बहुत बधाई !

Thursday, July 23, 2026

इतनी नफरत, इतनी हिंसा

इतनी नफ़रत
इतनी नफ़रत
इतनी नफ़रत
आखिरी कितनी नफ़रत?

इससे नफ़रत 
उससे नफ़रत 
उससे नफ़रत 
आखिर किस किससे नफ़रत?

इतनी हिंसा 
इतनी हिंसा 
इतनी हिंसा 
आखिर कितनी हिंसा?