सामने समंदर ऊंघ रहा था, और इधर इंट्री गेट पर लोगों का जमावड़ा था। एक अजीब सा शोर, एक अजीब सी हलचल। मैं लोगों के चेहरे देख रही थी। बच्चे, बूढ़े, जवान सब थे। सबके भाव अलग थे। कुछ बेहद एलीट जिनके चेहरे पर व्यवस्था को लेकर असंतोष और एक हल्का सा एरोगेन्स उनके चेहरे की चमक को बढ़ा रहा था। कुछ बच्चे आपस में खेलने, चिढ़ाने में, धमाचौकड़ी करने में व्यस्त थे जिन्हें उनके पैरेंट्स चाहकर भी रोक नहीं पा रहे थे या शायद रोकना भी नहीं चाहते थे। कुछ नए ब्याहे जोड़े अपने चेहरे से टपकती रूमानियत से बेख़बर। कुछ बुजुर्ग जिन्होंने शायद अपनी उम्र के आखिरी पड़ाव की इच्छाओं वाली पोटली में रखा होगा क्रूज का सफर। कुछ दोस्तों के ग्रुप भी थे। सबसे ज्यादा हल्ला वही कर रहे थे। क्या करें, दोस्ती शय ही ऐसी है, मस्तीखोर, बेपरवाह। कुछ सोलो ट्रेवल वाले भी थे। एक लड़की जो देर से किसी से बात कर रही थी और लाइन में आगे बढ़ना भूल जा रही थी। उसके चेहरे पर थोड़ा सा तनाव था। न जाने उसकी कहानी कैसी होगी। लड़कियों का सोलो ट्रेवल लड़कों के सोलो ट्रैवल से बहुत फर्क होता है यह बात तो सच है ही। बहरहाल, यहाँ अलग-अलग कहानियाँ थीं और हर कहानी का एक सिरा जो इस समय सबको जोड़े हुए था, वह था क्रूज़ से यात्रा का रोमांच।
फिल्म 'शिकारा' की याद हो आई। किस तरह कोई इच्छा, ज़िन्दगी की आखिरी इच्छा सी खिलती है और उस खिलती इच्छा के फूल धरती पर हमेशा खिलते रहते हैं। कोई किसी का सपना पूरा करने में खुश हो रहा होता है और कोई अपने किसी सपने को बड़ी मुश्किल से दुनिया से चुराकर जीने की कोशिश करता है। चुराकर जिये गए सपने के किनारों पर उनकी ही टूटी ही ख़्वाहिशों की उदसियों के निशान लगे रह जाते हैं।
जीवन क्या है, सिवाय जिये जाने के। और यह जिया जाना ही जीवन भर छूटता रहता है। कईयों को तो पता ही नहीं चलता कि वो बिना जिये ही मृत्यु की ओर बढ़ते जा रहे हैं। ज़िन्दगी सबको जीने का मौका देती भी कहाँ है। यहाँ यात्रियों के चेहरों पर उनकी मन की दुनिया का पोस्टल एड्रेस बता रहा था कि किसका सफर कितना आसान है, किसका कितना मुश्किल। मुझे सबसे प्यारे लगे बुजुर्ग जोड़े। एक-दूसरे का हाथ थामे, एक दूसरे का खयाल रखते, जीवन की डोर को साथ में थामते हुए।
साथ...हाँ, इसी एक शब्द में ज़िन्दगी का सारा रूमान है, सारा सार। साथ मनचाहे का, या साथ खुद का।
टीका वीका लगाकर बड़े अदब से क्रूज में लोगों का स्वागत हुआ और उत्साह का एक सैलाब बिखरने लगे। ख़ैर ख़ैर करके हमें हमारा कमरा जो कि आठवीं मंज़िल पर था, मिला। सुंदर और शांत कमरा। जैसे लंबी यात्रा और देर से चल रहे इस उत्साही शोर के बाद किसी ने ठंडा पानी दिया हो। कमरे में एक बड़ी सी खिड़की थी, जो खुलती नहीं थी लेकिन उसमें से दृश्य खुलते थे। बैठने की प्यारी सी जगह जहां बैठकर समन्दर का खेल देखते ही रहो। पूरा कमरा ऐसे बना था कि कहीं से भी निगाह में समंदर आने से छूट न जाये।
सच में मैंने अपने होने को टटोला। मैंने यह तो नहीं चाहा था। चाहा ही नहीं था। फिर खुद पर ही हंसी आ गई, हम लड़कियां आँख भर सपने भी कहाँ देखना सीख पाती हैं। याद है एक बार मेरे प्रेमी ने मुझसे पूछा था, तेरे ख़्वाब क्या हैं? और मैंने कहा था, बारिश में खूब भीगना और फिर एक अच्छी सी चाय पीना। 'तुम्हारे साथ...' नहीं कह सकी थी। इसे मैंने भीतर रोक लिया था। जानती हूँ, साथ की कामना से बड़ी कामना कोई नहीं। और इसके हक़ में अल्लाह मियां भी खास कुछ मदद कर नहीं पाते। इसलिए वक़्त के साथ 'तुम्हारे साथ' को 'खुद के साथ' में कन्वर्ट करना सीख लिया है।
खुद को गले लगाया और उस समन्दर वाली खिड़की के आगे पसर गई। पुश्किन की कविता 'टू द सी' की याद हो आई। उस याद की उंगली थामे क्रूज़ के सबसे ऊंचे डेक यानि दसवीं मंज़िल की तरफ गई। सूरज दूर से अपने सौंदर्य पर इठला रहा था। धीमे-धीमे चलता क्रूज़ और तेज़ चलती हवा। मानो कह रहे हों, यहाँ आए हो तो सब भूल जाओ, खुद को भी। क्योंकि जो भी है, बस यही पल है।
तेज़ हवाएँ बालों को, कपड़ों को इस कदर उड़ा रही थीं कि ऐसा लग रहा था कि कुछ देर में बाल समेत मैं भी उड़ती फिरूंगी। ये हवाएँ समन्दर के नमक में डूबी हवाएँ थीं। कभी हवा का स्वाद चखा है? चखना चाहिए, हवा के स्वाद में ज़िन्दगी का स्वाद घुला होता है, ज़िन्दगी के रंग भी। बस वो हमारे देखे जाने से छूटते रहते हैं। मैंने खुद को इतना बेफिक्र अरसे बाद पाया। कोई चिंता नहीं, कोई फिक्र नहीं बस कि दुनिया से, दुनियादारी से बहुत दूर अरब सागर के मध्य कहीं खुद की धड़कनों को सुनती अपनी ही नब्ज़ पर कान धरती। बंद आँखों के भीतर एक पूरा जीवन जर्रर्र से गुज़र गया। डरी, सहमी, अटक-अटक कर बोलती वो छोटी सी बच्ची जिसके करीब से आत्मविश्वास का आ भी नहीं गुजरा था आज दुनिया से दूर यहाँ अपने अनदेखे सपने को हथेली पर लिए खड़ी है।
ठीक ही कहता है मन दिनों कि, 'जीवन को गुजरने दो, उसके संगीत को सुनो और गुनो। जीवन कभी गलत नहीं होता, सही गलत तो हमारे बनाए खांचे हैं, ढांचे हैं।' जिस जीवन से बनती नहीं है, उसी के कांधे पर सर रखे हुए धीरे धीरे सूरज का समन्दर में उतरना देख रही थी। जीवन मुस्कुरा रहा था।
सूरज धीरे-धीरे समंदर में डूबकर बुझ गया। गुलजार साहब की लाइनें याद आ गईं, 'वो बड़ी देर से आया था पर वक़्त पर आया था।' मेरे भीतर से मैं अब आज़ाद होने लगी थी। खुश होने से डरने वाला मन खुश होने की तरफ क़दम बढ़ाने को उत्सुक था। मैंने जीवन की आँखों में मुस्कुराकर देखा और कहा, 'आ चल डूब के देखें'...अब जीवन और मैं दोनों मुस्कुरा रहे थे, दोनों डूबने की तैयारी में थे।
शाम को एक प्ले था हमारे लिए लेकिन थकान की ऐसी मार और सुकून की ऐसी चाहत कि कुछ देर लाइव म्यूज़िक सुनने के बाद डिनर करके हम कमरे में आ गए। सोने नहीं, महसूस करने। हमें मनोरंजन के तेज प्रवाह में बहना नहीं था, खुश होना कोई असाइनमेंट नहीं था। सो जो मन किया सो किया और देर तक अपने कमरे से समंदर देखते रहे। रात का समन्दर शाम के समन्दर से काफी अलग होता है। रात अमावस की थी तो रोशनी का कतरा भी न था बस लहरों की हलचल थी। आखिर मैं खुद को रोक नहीं पाई और 'टू द सी' का पाठ किया। नहीं जानती जिन दोस्तों को यह कविता सुनाई उन्हें कितनी समझ आई, लेकिन मुझे बहुत अच्छा लगा।
यह मेरे जीवन की पहली रात थी जब सारी दुनिया से दूर मैं समन्दर के ठीक बीच में खुद की हथेलियाँ थामे खुद की धड़कनों को सुन रही थी....इस छोर से उस छोर तक समन्दर ही समन्दर....ठीक बीच में मैं।
(जारी...)




