खुद से इतनी शिकायतें रहती हैं कि मुंह चुराती फिरती हूँ। मानो खुश रहना कोई गुनाह हो। जब-जब रत्ती भर सुख हुआ, उसके छूटने के दुख ने इतना विचलित किया कि सुख के गाल पर मानो कोई स्क्रेच आ गया हो। वो मुझे घूर के देखता और मुंह फेर लेता। सुख को नाराज़ होते देखा है कभी?
मैं उसके नाराज़ होने से उदास तो होती हूँ लेकिन उसे मना नहीं पाती। जाने कहाँ से प्रेमी की यह आदत मुझमें छूट गई।
बाज दफा तमाम शिकायतें होती ही इसलिए हैं कि उन्हें मान मिले, उनकी परवाह की जाय। देखा है अक्सर झगड़ों की वजह इतनी मामूली होती हैं कि हैरत होती है कि भला इस बात पर कोई कैसे झगड़ सकता है लेकिन जो इश्क़ के खेल से वाकिफ हैं वो जानते हैं ये झगड़ा नहीं प्रेम है। वजह पर मत जाओ, प्यार पर जाओ। जब प्रेमी रूठे तो रूठने की वजह मत तलाशो, तर्क मत करो बस बाहों में भर लो। एक स्नेहिल स्पर्श हज़ार मर्ज की दवा होती है।
सब जानते हुए भी सुख की हथेलियाँ थाम नहीं पाती, हालांकि चाहती हूँ उसके कंधे पर सर टिकाकर बची हुई उम्र गुज़ार दूँ। प्रेम में मान बहुत होता है। सुना था मानिनी प्रेमिकाओं का माथा हमेशा उन्नत होता है और उनके चेहरे पर अलग ही चमक होती है। क्या मेरे चेहरे पर वह चमक है? आईना देखती हूँ और मुस्कुरा देती हूँ।
मेरा रूठा हुआ सुख मुझे आईने में देख अपना रूठना भूल जाता है। क़रीब आकर खड़ा हो जाता है। बिलकुल सटकर। हम दोनों साथ में अच्छे लगते हैं मैंने मन में सोचा। मेरा ऐसा सोचते ही खिड़की से हवा का झोंका कमरे में दाखिल हुआ। आईने में मेरे सिवा कोई नहीं था।
कमरे में भी कोई नहीं। घबराकर इधर-उधर देखा, वो कहीं नहीं था। वो जा चुका था। नहीं जानती थी कि फिर वापस आएगा या नहीं। एक पूरा बरस या शायद उससे ज्यादा ही बीत गया उसे गए। वो सुख था पढ़ने का सुख, लिखने का सुख, संगीत का सुख, जीने का सुख। सुबह की चाय के साथ देर तक बारिश देखने का सुख, परिंदों के खेल देखने का सुख। मैंने सबको नाराज़ कर दिया और खुद को काम में झोंक दिया।
किताबें पास होने से आप उन्हें पढ़ लेंगे यह संभव नहीं। कई बार किताबों को पलटा, कुछ पन्नों का सफर तय किया और फिर जाने कहाँ खो गई। वो किताबें अच्छी हैं, मेरा ही सुर बिगड़ा हुआ है।
आज इस सुबह में जब आबिदा को कबीर गाते सुन रही हूँ तो महसूस हो रहा है कि कोंपलें सिर्फ बाहर नहीं फूट रही हैं। शायद मेरे सुख दरवाजे पर हैं। शायद वो लौटना चाहते हैं। शायद वो भी मुझे मिस कर रहे होंगे। अजीब सा दीवानापन है इस सुबह में। थोड़ी सी हड़बड़ी भी। ज्यादा सुकून है।
सोच रही हूँ चाय का पानी पहले चढ़ाऊँ या दरवाजा पहले खोलूँ? सुबह की चाय पिये कई महीने बीत चुके हैं। आखिर दरवाजा पहले खोलते हूँ, कहने को वहाँ कोई नहीं लेकिन मैं जानती हूँ एक जीवन है जो रूप बदलकर बिना दस्तक दिये आने की फिराक में है।
चाय का पानी चढ़ा दिया है, दो कप चाय का पानी। आबिदा आपा मुस्कुराकर गा रही हैं, भला हुआ मोरी मटकी फूट गई....




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