Saturday, January 12, 2019

जरा तुम अपना हाथ देना


सखि, जरा तुम अपना हाथ देना
तुम भी, अरे तुम भी
अम्मा तुम भी, ताई तुम भी
मौसी तुम भी, चाची तुम भी
बहना तुम भी, सासू माँ तुम भी
देवरानी प्यारी तुम भी
जेठानी हमारी तुम भी
जरा अपना हाथ देना.

मैडम जी आप भी देना तो जरा
अरी कमला, विमला तुम भी
घर के काम छोड़ो न कुछ देर को
बस जरा तुम अपना हाथ देना
ओ नन्ही गुड़िया तुम भी दो न अपना हाथ
मैडम एमएलए जी,
एनजीओ वाली मैडम/दीदी
बाद में बताना समाज कैसे बदलेगा वाली बात
अभी अपना हाथ दो न जरा.

कलक्टर मैडम आप भी
अरी ओ छोरियों
ब्वायफ्रेंड से लड़ लेना बाद में
अभी तो जरा आपना हाथ देना
ओह,सुनीता दर्द में हो तुम बहुत
तो हम आयेंगे तुम्हारे हाथ में अपना हाथ देने
आँखों में भरे हैं तुम्हारे आंसू
तो उन्हें उठाएंगे अपनी पलकों पर
बस कि तुम्हारी हथेलियों का
हमारी हथेलियों में होना जरूरी है इस वक़्त

कोई बहुत बड़ी लड़ाई नहीं है ये
एक दूसरे की हथेलियों में हथेलियाँ देकर
महसूस करना है अपनी ताकत
यह साथ में होना
है हमारे होने की बात
अपने ख्वाबों को एक-दूसरे की हथेलियों में
सुरक्षित रख लेने की बात

ईश्वर तो एक बहाना है
असल में तो खुद को पाना है...

#सबरीमाला

Thursday, January 3, 2019

एक लम्हे में अपना बना लेता है उदयपुर


दिन इतनी तेज़ी से भाग रहे थे कि भागते-भागते हांफने लगे थे. दो घड़ी ठहरकर सांस लेने लगते तो रफ्तार कम हो जाती और लगता कि कितना कुछ छूट गया है. कोई काम, कोई जिम्मेदारी मुंह बिसूरने लगती. ऐसे ही भागते दौड़ते दिनों में कानों से टकराया था उदयपुर का नाम. जैसे जेठ की चिलचिलाती धूप में ठंडी हवा का एक झोंका छूकर गुजरा हो. न किसी ने मुझे पहले से उदयपुर के किस्से सुनाये थे, न मैंने साहित्य के किसी टुकड़े को पढ़ते हुए इस शहर से राब्ता बनते महसूस किया था. इतिहास पढ़ते हुए शायद गुजरा था यह नाम बिना किसी एहसास के सिर्फ एक चैप्टर की तरह. फिर क्या था ऐसा उस रोज इस नाम में कि दिल की धडकनों को थोड़ा सुकून आया. हालाँकि यह कोई यात्रा नहीं थी, सिर्फ गुजरना भर था वहां से होकर लेकिन जाने क्या था कि दिल को राहत मिल रही थी. जैसे कोई अजनबी इंतजार में हो, जैसे किसी अनकहे में भरा हो जीवन भर का कहा, जैसे किसी के काँधे पर टिककर आ जाये एक टुकड़ा बेफिक्र नींद. एक बार एक दोस्त ने कहा था कि मैं हर आने वाले लम्हे का उत्सुकता से इंतजार करता हूँ कि न जाने उसमें मेरे लिए क्या हो. मुझे भी अब ऐसा ही लगने लगा है. उदयपुर की पुकार को सहेजा और निकल पड़ी सफर में.

न कोई वहां इंतजार में था, न कोई जल्दी थी कहीं पहुँचने की. पूरे इत्मिनान के साथ सफर कटता रहा. रास्ते में मानव कौल के कहानी संग्रह ‘प्रेम कबूतर’ से दो कहानियां पढ़ीं. किस कहानी को कहाँ पढ़ा जाना है यह भी वो कहानी खुद तय करके रखती हो शायद. इतने दिनों से सिरहाने रखे रहने के बाद महीनों बैग में घूमने के बाद आखिर इन कहानियों ने चुना हवा में उड़ते हुए पढ़ा जाना. कहानियां अपने साथ उड़ा ले जाने में कामयाब थीं. इति और उदय, प्रेम कबूतर दोनों कहानियां. प्रेम कबूतर का असर लिए उदयपुर पहुंचना हुआ.

जब कहीं कोई इंतजार नहीं कर रहा होता तो अक्सर हम वक़्त पर या वक़्त से पहले पहुँच जाते हैं. उदयपुर भी वक़्त से थोड़ा पहले ही पहुँच गयी. सलीम भाई कैब के ड्राइवर थे. उनसे बात करते हुए राजस्थान की खुशबू ने घेर लिया. शहर को मैं हसरत से देख रही थी, इस उम्मीद से कि जाने वो मुझसे दोस्ती करेगा या नहीं. हवा में हल्कापन था, हालाँकि देहरादून से जिस्म पर लदकर गयी जैकेट बेचारी बड़ा अजीब महसूस कर रही थी कि यहाँ तो ठीक ठाक गर्म था मौसम. शहर की हवा आपको बता देती है कि उसका आपको लेकर इरादा क्या है और मुझे इस शहर की हवाओं का मिज़ाज़ आशिकाना लगा. एयरपोर्ट से होटल पहुँचने के बीच मैं रास्तों से बातें करती रही, खुद को उदयपुर की हवाओं के हवाले करती रही. इस बीच सलीम भाई बात करते रहे. वो उदयपुर के दीवाने लगे मुझे. सारे रस्ते जिस मोहब्बत से वो उदयपुर के बारे में बताते रहे सुनकर बहुत अच्छा लग रहा था. यह जानकर कि मैं यहाँ पहली बार आई हूँ शायद उन्होंने इस बात की जिम्मेदारी ले ली थी कि वो मेरी दोस्ती उदयपुर से करवा ही दें. उन्होंने बताया कि यह शहर बनास नदी के किनारे बसा है. यहाँ बहुत सारी झीलें हैं, बहुत सारे महल. उन्होंने महाराज उदय सिंह के किस्से भी सुनाये जिन्होंने इस शहर को बसाया था. सलीम भाई की गाड़ी मानो सडक पर नहीं झील में नाव की तरह चल रही हो और उनकी बातें लहरों सी. कि यह शहर जादू करता है, जो यहाँ आ जाता है यहीं का हो जाता है. कि यहाँ के लोगों को किसी बात की हड़बड़ी नहीं, सब तसल्ली से जीते हैं. कि यहाँ भीड़ नहीं है, जनसंख्या भी तो बस 30 लाख ही है. सब पता है सलीम भाई को. वो चाहते हैं कि मैं पूरा उदयपुर देखूं, खूब दिन यहाँ रुकूँ और यहाँ का खाना खाऊं. होटल पहुँचने तक मैं सलीम भाई की जुबानी जिस उदयपुर से मिल चुकी थी, उसे अपनी नजर से देखने की इच्छा बढती जा रही थी. खाना खाने में वक़्त जाया न हो कि मेरे पास वक़्त ही बहुत कम है इसलिए खाने की इच्छा और भूख दोनों को इग्नोर किया और चल पड़ी अकेले फ़तेह सागर झील से मिलने. सलीम भाई जाते-जाते बता गये थे कि किस तरह सुखाडिया सर्कल जहाँ हम रुके थे से सिर्फ दस रूपये में मैं फतेह सागर पहुँच सकती हूँ. चलते समय कुछ दोस्तों ने फतेह सागर झील के लिए संदेशे भेजे थे उन संदेशों को साथ लिया और चल पड़ी. सुखाड़िया सर्कल से महज दस रूपये देकर विक्रम में बैठकर तेज़ आवाज में राजस्थानी संगीत सुनते हुए फतेह सागर झील के किनारे जा पहुंची. थोड़ा रास्ता पैदल का था जो अतिरिक्त सुख था. यह पैदल चलना मेरा खुद का चुनाव था. यह सुख लेना मैंने लन्दन की सड़कों पर घूमते हुए सीखा है. किसी भी शहर से दोस्ती करनी हो तो पहले उस शहर की सड़कों को दोस्त बनाना होता है. पैदल चलते हुए शहर जितना करीब आता है, कैब में बैठकर नहीं आता.

झील के किनारे पहुंचकर सबसे पहली अनुभूति हुई सुकून की, ठहराव की. मैंने झील को आदाब कहा उसने पलके झपकाकर, मुस्कुराकर करीब बिठा लिया. हम दोनों के बीच लम्बा मौन रहा. इस सुकून की मुझे कबसे तलाश थी. यह ठहराव, कबसे चाहिए था. भागते-भागते पाँव में छाले पड़ चुके थे लेकिन उन्हें देखने की फुर्सत तक नहीं थी. झील की ठंडी हवाओं ने उन तमाम जख्मों को सहलाया तो मेरी पलकें नम हो उठीं. जैसे बाद मुद्दत मायके लौटी बेटी को माँ की गोद मिली हो. जैसे प्रेमी ने माथा चूमते हुए और सर पर हाथ रखकर कहा हो ‘मैं हूँ न’. मैं अपलक उस शांति में थी. घूँट घूँट उस शांति को पीते हुए. इस पार से उस पार झील के किनारे धीर-धीरे चलते हुए मैंने खुद को पूरी तरह समर्पण की स्थिति में पाया.

अब तक निशांत आ पहुंचा था. निशांत हमारा देहरादून का साथी है. ‘क’ से कविता का साथी. वो उदयपुर में गांधी फेलोशिप कर रहा है. उससे मिलने के बाद मुझे लगा कि उदयपुर पहुँचने के बाद से अब तक जो मेरे साथ हो रहा है, निशांत भी उसी गिरफ्त में है. एकदम इश्कियाना. निशांत पूरे वक़्त उदयपुर की तारीफ में था. उसने पुराने उदयपुर से लेकर नए तक सब घुमाया. यहाँ के लोग, यहाँ की संस्कृति, मौसम, मिजाज़, खाना, चाय, सुबह, शाम, पंछी, ऊँट, झीलें, महल सबके सब निशांत की बातों में बनारस के पान की तरह घुले थे. मैं उस पान का स्वाद ले रही थी, मुस्कुरा रही थी. ‘मैम यहाँ की शाम बहुत अच्छी होती है, यहाँ शांति बहुत है. बहुत सुकून है यहाँ. यहाँ के लोगों को कोई जल्दी नहीं होती किसी बात की. कोई हड़बड़ी नहीं. लोग इत्मीनान से जीते हैं यहाँ. यहाँ लोगों ने अपनी संस्कृतियों को खूब सहेजा हुआ है. रोज शाम को कुछ न कुछ तो जरूर हो रहा होता है. यहाँ का खाना बहुत अच्छा होता है, थोड़ा तीखा होता है लेकिन स्वादिष्ट भी. यहाँ के जैसी चाय तो मैंने कहीं पी ही नहीं. यहाँ रह जाने का जी करता है...’ वो लगातार उदयपुर की तारीफ में था. सच कहूँ तो उसकी बाइक पर बैठकर उदयपुर घूमते हुए मुझे एक पल को भी नहीं लगा कि वो कुछ रत्ती भर भी ज्यादा तारीफ कर रहा है. उसकी बातों में जो उदयपुर था और मेरे सामने जो उदयपुर था दोनों ने मिलकर मुझे अपने इश्क की गिरफ्त में ले लिया था. निशांत मुझे सिटी पैलेस और पिछोला झील देखने के लिए छोड़कर चला गया शाम को फिर मिलने आने के लिए.

मैं अब सिटी पैलेस में थी. महलों की भव्यता में एक किस्म का गर्वीलापन शामिल रहता है. बड़े-बड़े किले, महल मुझे ज्यादा रास नहीं आते, उनकी बजाय मुझे नदियों, तालाबों के किनारे बैठना और ठेली पर चाय पीना ज्यादा पसंद है. लेकिन सिटी पैलेस की भव्यता में एक किस्म की सादगी भी दिखी मुझे. यह भव्यता आपको आक्रांत नहीं करती, आपसे दोस्ती करती है. मैं महल में घूमती फिर रही थी. यहाँ के दरो-दीवार से मुखातिब. कोई जल्दी नहीं थी. किसी के मूड का ख्याल नहीं रखना था. कहीं भी बैठ जाती थी, देर तक बैठी रहती फिर चल पड़ती. मैं असल में हवा को महसूस कर रही थी. अरसे से इस सुकून की तलाश में थी.

फिर पिछोला झील का किनारा मिला. शान्ति का चरम था यह. न कोई भीड़, न कोई हल्ला. सामने लहराती खूबसूरत झील और किनारे असीम शान्ति. देर तक उसे निहारती रही. फिर वहीँ बैठ गयी पहले कुर्सी पर फिर जमीन पर. ठंडी हवा के झोंके मन की थकन भी मिटा रहे थे. जो कभी नहीं हुआ वो पिछोला झील ने कर दिखाया कि थपकी देकर अपने काँधे पर सर रखकर सुला लिया. दिन में यूँ बाहर अकेले अनजाने लोगों के बीच अनजानी जगह मैं सो भी सकती हूँ कभी सोचा नहीं था. कब नींद आई पता ही नहीं चला. जब नींद खुली तो खुद को थकन से आज़ाद पाया. मैं पिछोला को देख मुस्कुराई, तुम्हें पता था न मुझे क्या चाहिए था. पिछोला के पानी ने छोटी सी उछाल ली और कहा, खुश रहो.

वहां से लौट रही थी बिलकुल ताज़ा और तनाव मुक्त होकर. शाम निशांत के इश्क के किस्सों के नाम और उदयपुर की स्पेशल चाय के नाम रही. आलू के पराठों के नाम भी. निशांत फिर से उदयपुर के किस्से सुना रहा था. यहाँ ये बहुत अच्छा है, यहाँ वो बहुत अच्छा है. आप रुकतीं तो वहां ले जाता आपको, वहां ले जाता. वो जहाँ ले जाना चाहता था उन जगहों के विवरण और उनसे उसका लगाव मुझे वहां ले जा चुका था, यह वो नहीं जानता था. जैसे कोई आशिक अपनी महबूबा के बारे में हर वक़्त बात करना चाहता है और बात करते हुए उसके चेहरे पर जो ख़ुशी होती है वैसी ही खुशी थी निशांत के चेहरे पर. उत्तराखंड के अगस्त्यमुनि की सुंदर वादियों में पला बढा, देहरादून में अपनी वैचारिकी निखारता यह लड़का आखिर उदयपुर के इश्क़ में यूँ ही तो नहीं पड़ा होगा. ‘मैम रात में उदयपुर बहुत खूबसूरत लगता है.’ वो बोल रहा था और मैं उदयपुर के इश्क में गिरफ्तार हुई जा रही थी.

यात्राओं में अक्सर अच्छी चाय न मिलना बेहद अखरता है. ज्यादातर अच्छी चाय के नाम पर ढेर सारा दूध, और शकर वाली चाय मिल जाती है लेकिन यहाँ कुल्हड़ में जो मिली स्वादिष्ट चाय तो दिल खुश हो गया. एक के बाद एक 3 चाय पी हमने. खूबसूरत रात, हल्की झरती ठंड जिसके लिए सिर्फ गुलाबी शाल काफी था के साये में पैदल घूमना...दिन बीत गया था. सुबह अल्लसुबह हमें सिरोही के लिए निकलना था. लेकिन सच यह है कि मैं अब भी उदयपुर में ही हूँ. उन्हीं गलियों में कहीं, वहीँ फतेह सागर झील के किनारे बैठी हुई, सिटी पैलेस में टेक लगाये हुए, पिछोला झील के किनारे सोई हुई या चाय की गुमटी पर चाय पीती हुई...

(फेमिना जनवरी 2019 अंक में प्रकाशित)

Monday, December 31, 2018

वो कोई बरहमन तो नहीं था फिर भी..


कोई साल कहीं नहीं जाता कोई याद कभी नहीं बीतती. जो बीत जाती होतीं यादें तो दिल में कुछ कसकता सा क्यों रहता. हर्ष के उल्लास के शोर में क्या छुपाना चाहते हैं सब. क्या यह महज कैलेंडर बदलने का शोर है या सचमुच कुछ बदल रहा है. क्या कल के सूरज में कुछ नया होगा, क्या हर दिन के सूरज में कुछ नया नहीं होता. नया क्या होता है आखिर. मुझे नहीं मालूम. ये सब बहुत बड़े बड़े सवाल लगते हैं मुझे. मैं सवालों मेंं उलझना नहीं चाहती, बस जीना चाहती हूँ. पिछले बरस कुछ यूँ चाहा था अपना नए कैलेंडर वाला बरस...

खुद के लिए लम्हे चुराउंगी
बनूँगी थोड़ी और मुंहफट
जिंदगी को गले लगाकर खिलखिलाऊँगी
करुँगी खूब सारी यात्राएं
दोस्तों से और करुँगी झगड़े
बिखरे हुए घर को मुंह चिढ़ाऊंगी
नींदों से ख्वाब चुरा लूंगी
समंदर किनारे दौड़ लगाउंगी
नदी की बीच में धार में खड़े होकर
पुकारूंगी तुम्हारा नाम
इस बरस... 

और सचमुच किया यही सब. मुन्नार की यात्रा से शुरू हुआ नए कैलेंडर का सफर तो कोच्चि के समन्दर से होते हुए गोवा के समन्दर तक ले गया. दोस्ती ने नये मुकाम हासिल किये, खोलीं कुछ और गिरहें जो अवचेतन में पैबस्त थीं कहीं. बरसों एक टुकड़ा नींद को तरसी आँखों पर नींद की रहमत हुई. कुछ दोस्तों के पास न पहुँच पाने का अफ़सोस है कि उन्हें मेरी जरूरत थी, या मुझे होना था उनके मुश्किल वक़्त में. फिर भी मन रहा उन दोस्तों के पास ही. इस बार के कैलेंडर पर कोई इंतजार नहीं लिख रही, सिर्फ बहार लिख रही हूँ. कुछ जंगल, कुछ नदियाँ लिख रही हूँ, ढेर सारा प्यार थोड़ी सी तकरार लिख रही हूँ. बहुत सारी नींद लिख रही हूँ बस कि अब मुझे नींद आने भी लगी है. जिसने कहा था कि ये साल अच्छा है वो बरहमन तो नहीं था...लेकिन यकीनन अच्छा था ये साल...

Wednesday, December 26, 2018

'ओ अच्छी लड़कियो' की गोवा यात्रा


शुभा मुद्गल जी की आवाज में ढला 'अली मोरे अंगना' सुनती थी तो रिपीट मोड में सुनती ही जाती थी. उनकी आवाज में ढला हर गीत जो एक बार साथ हुआ, तो उससे कभी साथ छूटा ही नहीं. रेनकोट का गीत 'पिया तोरा कैसा अभिमान' तो दिल में शुभा जी की तरह ही बेहद ख़ास जगह रखता है. वही शुभा मुद्गल अगर कहें कि, 'प्रतिभा जी, आपकी कविता को संगीत में ढालना चाहती हूँ' तो मेरी क्या स्थिति होगी, समझा जा सकता है.

उन्होंने और अनीश प्रधान जी ने 'ओ अच्छी लड़कियों' को गोवा में होने वाले Serendipity Arts Festival 2018 के लिए चुना. 15 से 22 दिसम्बर तक आठ दिन तक चलने वाले इस फेस्टिवल में सातवां दिन हिंदी कविताओं के नाम रहा जिन्हें संगीतबद्ध किया अनीश प्रधान और शुभा मुद्गल जी ने, और जिन्हें अपनी खूबसूरत, दिलकश आवाज से सजाया ओमकार पाटिल और प्रियंका बर्वे ने. कविताओं के इस गुच्छे को Maverick Playlist का नाम मिला जिसमें केदारनाथ सिंह, नज़ीर अकबराबादी, मीराबाई, पल्टूदास, शुभा मुद्गल और प्रतिभा कटियार यानी मेरी कविता को चुना गया.

मेरे लिए गोवा की यह यात्रा असल में कविता यात्रा ही थी, इस जिज्ञासा के साथ कि किस तरह ढलेगी यह कविता संगीत में और कैसे कोई गायेगा इसे. शुभा जी और अनीश जी ने बहुत मोहब्बत से तमाम कविताओं को संगीत दिया और ओमकार तथा प्रियंका ने उतनी ही शिद्दत और मोहब्बत से इन्हें आवाज दी.

वह एक जादुई शाम थी जब शुभा जी से जी भर के गले लगते हुए मेरी आँखें सुख से छलक पड़ी थीं. पूरे कार्यक्रम में वो मेरे करीब बैठी थीं और पूछती जा रही थीं कि ठीक बना है न संगीत? उन्होंने मुझे बैकस्टेज ही बता दिया था कि उन्हें यह कविता इतनी पसंद है कि इसी से कार्यक्रम का समापन किया जायेगा.

शुभा जी के करीब बैठकर कविताओं को सुरों में ढलते देखने की यह जादुई शाम थी. सभी कवितायें संगीत में रच-बसकर और खूबसूरत हो उठी थीं. मैं जैसे किसी जादुई लम्हे में थी. ओमकार बेहद शानदार कलाकार हैं. उनकी जिन्दादिली और मीठी आवाज ने कविता को जिस अपनेपन से गया उसे सुनकर ही महसूस किया जा सकता है.

शुभा जी, अनीश जी, आपसे मिला मान और स्नेह कीमती पूँजी हैं, जिसे उम्र भर संभाल कर रखूंगी. ओमकार, तुम्हारी आवाज बस गयी है दिल में. तुम जादूगर हो सच में. दोस्त अजय गर्ग, अगर आप साथ न होते तो इन लम्हों को मैं किस तरह अकेले समेट पाती भला! प्यारी प्रेरणा, तुम्हारे बगैर कुछ भी कहाँ संभव था...!

यह प्यार बना रहे...संगीत, कला, साहित्य और लहरों का साथ बना रहे!
दोस्त बने रहें!

Friday, December 14, 2018

कहानी- इंतजार के पार


- प्रतिभा कटियार

बादल बरसते-बरसते थक चुके थे. थककर ऊंघने लगे थे. हालाँकि उन्होंने बरसना बंद नहीं किया था लेकिन बरसते-बरसते जो थकान आ गयी थी उससे उनकी गति थोड़ी-धीमी हो गयी थी. थके हुए बादलों को देखना भला लग रहा था. घर में दूध था, आटा था, नमक था इसलिए बरसना बहुत अखर नहीं रहा था. चाय बनने का इंतजाम हो, नमक और आटा हो तो घर से बाहर जाए बिना काफी दिन मजे में निकाले जा सकते हैं. दूर्वा ने मन ही मन सोचा और मुस्कुराई. वो इन बादलों के रुकने की प्रतीक्षा में नहीं है, इनके जी भरके बरस लेने का इंतजार में है. बरसने की इच्छा को बचाकर रखना बहुत मुश्किल होता है. बरसने को न मिले जिन बारिशों को वो फिर बाढ़ बन सकती हैं, तबाही ला सकती हैं. बेहतर है कि उन्हें वक्त पर बरस लेने दिया जाय. हाथ बढ़ाया तो बारिश उँगलियों को छूते हुए कमरे तक चली आई. कुहनी से टपकती हुई बूँदें फर्श भिगोने लगी. दूर्वा ने महसूस किया अब उसके जीवन में किसी भी तरह की कोई प्रतीक्षा नहीं है न भीतर, न बाहर.

यूँ प्रतीक्षाएं हमेशा रही हैं उसके जीवन में. ठीक उसी तरह जैसे वो हर किसी के जीवन में रहती हैं. कुछ प्रतिक्षाएं पूरी हो जाती हैं, कुछ बूढी हो जाती हैं, उनके चेहरे पर हाथों पर झुर्रियां पड़ जाती हैं, उनकी आवाज कांपने लगती है. कुछ प्रतीक्षायें असमय मौत की शिकार हो जाती हैं जिनकी विदाई कुछ दिन के आंसुओं और उदासी से हो जाती है. कुछ प्रतीक्षाएं अजीब होती हैं. वो बार-बार भ्रम देती हैं कि वो अब नहीं हैं, लेकिन वो रहती हैं शाश्वत. और कुछ की आपस में अदला-बदली होती रहती है. जैसे कुछ देर पहले चाय पीने की इच्छा का इस वक़्त बारिश में भीग लेने की इच्छा से अदला-बदली होना.

बारिश में भीगने की इच्छा को सूखे रेनकोट की तरह तह करके मन के भीतर रखते हुए दूर्वा चाय पीने की इच्छा के साथ चल पड़ी. चाय के खौलते पानी में उसने चाय की पत्ती के दरदरे दानों के साथ अतीत के कुछ लम्हे भी उबलते देखे. सनी के बिना जी नहीं सकेगी लगता था, उसे लगता था कि एक रोज सनी समझेगा इस बात को. सनी समझेगा एक दिन इस प्रतीक्षा में कितने बरस बीत गए. एक दिन यह प्रतीक्षा इस प्रतीक्षा से बदल गयी कि असल में सनी को नहीं उसे खुद को समझना है. और एक दिन दूर्वा सनी की प्रतीक्षा से बाहर निकल आई.

चाय के बनते-बनते बारिश थम सी गयी और दूर्वा चाय लेकर बाहर बालकनी में आ गयी. पत्तियों पर अटकी बूँदें जैसे मन के किसी कोने पर अटका कोई इंतजार हो, खूबसूरत, दिलकश और किसी भी वक़्त टप्प से टपक जाने को व्याकुल.

13 बरस हो गये सनी से अलग हुए. हालांकि १३ सेकेण्ड भी उसकी याद मन से दूर गयी हो ऐसा उसे याद नहीं. आज सनी शहर में है. और वो उससे मिलने आना चाहता है. दूर्वा समझ नहीं पा रही कि उसे कैसा महसूस हो रहा है. वो चाय की एक-एक बूँद को भीतर जाते महसूस कर पा रही है, उसके स्वाद को जबान पर महसूस कर पा रही है लेकिन सनी के 13 साल बाद मिलने आने को महसूस नहीं कर पा रही.

कुछ ही देर को रुकी थी बारिश फिर वापस आ गयी. दूर्वा कमरे में लौटी तो मोबाईल के स्क्रीन पर मैसेज था सनी का. घर का पता पूछ रहा था वो. दूर्वा देर तक मोबाईल के उस मैसेज को देखती रही. जवाब दे न दे, पता भेजे न भेजे तय नहीं कर पा रही थी. फिर उसने पता भेज दिया और चार तकियों के गड्डे पर सर रखकर लेट गयी.

जब सनी के आने के दिन होते थे तो कैसे झूम-झूम कर घर सजाती थी वो. उसकी पसंद की खाने की चीज़ें, बेडकवर, किताबें. गिटार घर में सिर्फ इसलिए है इतने सालों से कि किसी रोज सनी ने कहा था कि उसकी इच्छा है कि उसका एक कमरा हो जिसमें गिटार हो. वो यह बात कहकर भूल गया लेकिन दूर्वा उस बात को उठा लायी. घर में गिटार रहता है तो लगता है सनी भी रहता है थोड़ा सा.

गिटार अब भी रखा है ड्राइंग रूम में हालाँकि अब वह सिर्फ एक सामान की तरह ही है बस. कई बार दिल चाहा कि हटा दें, आखिर उसे कोई बजाने वाला तो हो, म्यूजिक स्कूल है पास में वहीँ रखवा दे लेकिन जाने क्यों दूर्वा गिटार हटा नहीं पाई.

आज जब सनी आ रहा है तो घर एकदम बिखरा पड़ा है, बारिश के चलते न खाना बनाने सावित्री आ रही है, न मोहन भैया जो सफाई कर जाते थे और न ही घर में कुछ सामान है. दूर्वा को थोड़ी सी चिंता हुई, वो उठी सफाई करने को फिर न जाने क्या सोचकर वापस लेट गयी.

मौसम खूब ठंडा हो रहा है, दूर्वा ने शॉल लपेटते हुए चाय का पानी चढ़ा दिया. शायद सनी का इंतजार ही था यह पानी चढ़ाना. लेकिन यह इंतजार तो बीत गया था, फिर भी बचा रह गया क्या?

फोन घरघराया तो दूर्वा चौंकी. सनी ही था. ‘हैलो, मनु! ये माधव जनरल स्टोर से किधर को मुड़ना है, राइट या लेफ्ट?’

‘लेफ्ट, वहां से सीधा लेना फिर एक लेफ्ट उसके बाद एक राईट. बस.’

‘ओके’ कहकर सनी ने फोन काट दिया.
‘कितना लेफ्ट राइट करवा रही हो. एक ठीक सी जगह घर नहीं लिया जाता तुमसे. ऊपर से इतनी बारिश. दिमाग खराब करके रखा है.’ दूर्वा के अतीत के पन्ने खुलने लगे थे जहाँ से सनी कुछ इस तरह बडबडा रहा था.
बारिश और तेज़ होती जा रही थी. कुछ ही देर में सनी घर में था.

‘काफी बारिश हो रही है न?’ सनी ने जूते बाहर उतारते हुए कहा.
‘हाँ’ कहकर दूर्वा किचन में चली गयी पहले से चढ़ाये पानी में चीनी अदरक डालने.
लौटी तो सनी अख़बार पलट रहा था.

‘तुम क्या सारी जिन्दगी अख़बार पढ़ते हुए बिता सकते हो? इतने सालों बाद आये हो और अब भी अख़बार?’ पहले का वक़्त होता तो मुलाकात की शुरुआत इसी के साथ झगड़े से होती. लेकिन दूर्वा ने कुछ नहीं कहा.
‘एक मीटिंग थी यहाँ? उसी में आया था.’ सनी ने कहा.
दूर्वा चुप रही.
कमरे में देर तक चुप छाई रही. यह चुप इतनी बड़ी होती जा रही थी कि दूर्वा को घबराहट होने लगी. वो चाय लेने को उठी तो सनी भी उठ गया.
‘तुम बैठो, मैं ले आता हूँ चाय’ यह अतीत के पन्नों में गुम हो चुका सनी ही था.
‘कप कहाँ हैं, छन्नी कहाँ है?’ सनी ने किचन से ही ऊंची आवाज में पूछा. दूर्वा का जी चाहा जोर से चिल्लाकर बोले 13 साल बाद लौटे हो तो बैठो न मेहमान की तरह, क्यों गए किचन में. उसके भीतर रुदन उखड़ने लगा था. वो गयी और कप और छन्नी निकालकर रख आई.

‘बारिश की वजह से फ्लाईट काफी लेट हैं.’ सनी शायद चुप वापस न आ जाय इसलिए बोल रहा था.
‘मनु, ये वाला घर कब लिया तुमने?’
4 साल हुए. दूर्वा ने जवाब दिया.
मनु, यह नाम कितने अरसे बाद उसने यह नाम सुना अपने लिए. मनु यह नाम सनी ने ही दिया उसे. दूर्वा नाम उसे पसंद नहीं था. कहता था ‘यह कैसा नाम है, तुम घास हो क्या?’
दूर्वा कहती ‘हाँ, जंगली घास, बिना परवरिश के बढती जाती है, जितना कुचलो उतनी और बढती है.’
क्यों कुचले कोई, उन्हह. यह सब बकवास है. मुझे यह नाम पसंद नहीं. तुम मनु हो मेरी, मेरे मन की साथी. मनु. मनु नाम से उसे कोई नहीं बुलाता.
बाहर संवाद कम थे, भीतर संवादों का कोहराम मचा था.
‘मीटिंग अभी है या ख़त्म हो गयी ?’ दूर्वा ने औपचारिकता वश पूछ लिया.
‘खत्म हो गयी.’ सनी ने जवाब दिया.
‘तुम कैसी हो?’ अभी शायद पूछेगा सनी दूर्वा को बार-बार लग रहा था. लेकिन सनी ने नहीं पूछा.
‘चाय मीठी पीने लगी हो तुम?’
नहीं, तुम्हारी वजह से चीनी ज्यादा डाली थी, उसने कहना चाहा लेकिन कहा ‘हाँ’.
‘घर में कुछ खाने को नहीं है, बारिश के कारण निकलना नहीं हो पाता न? ड्राइवर भी छुट्टी पर है.’ दूर्वा ने कहा.
‘अरे तो बता देती न, कुछ लेते आता.’
‘मेरे भर का तो है’ दूर्वा ने अनमने मन से कहा.
‘अरे तो मैं अपने लिए ही ले आता. सनी ने माहौल को हल्का करते हुए कहा.’
‘मनु, तुमने अभी तक गाड़ी चलानी नहीं सीखी?’
‘कितना कुछ तो सीखा है. गाड़ी चलानी ही जरूरी है क्या?’ दूर्वा ने कहना चाहा लेकिन कहा ‘नहीं. मोहन भैया की वजह से कोई दिक्कत नहीं होती. वो आ जाते हैं जब जरूरत होती है’
‘कब तक किसी पर डिपेंड होती रहोगी?’ सनी ने कहा.
‘पता नहीं’

‘तुम कुछ खाओगे?’ दूर्वा ने बात बदलते हुए पूछा.
‘हाँ, लेकिन तुम्हारे घर में तो कुछ है नहीं, कुछ ऑर्डर करें क्या?’ सनी ने कहा.
‘इस बारिश में ऑर्डर भी क्या होगा, कौन आएगा. पिज़्ज़ा मुझे पसंद नहीं तुम जानती हो.’
‘नहीं मैं कुछ नहीं जानती.’ दूर्वा ने दृढ़ता से कहा.
घर में आटा है, आलू, प्याज है. चावल और नमक है.
‘अरे, इतने में तो पार्टी हो जाएगी. प्याज के पराठे बनायें?’ सनी, ने कहा.
दूर्वा बिना कुछ कहे किचन में गयी. पीछे से सनी भी आ गया और प्याज काटने के लिए चाकू तलाशने लगा. दूर्वा आटा माड़ने चली तो सनी ने उसे रोक दिया, मैं करूँगा ये. मुझे पता है तुम्हे आटा माड़ना पसंद नहीं.
दूर्वा चुपचाप बाहर आ गयी. सनी प्याज काटकर आटा माड़ने लगा.
अतीत के पन्नों से फिर कोई स्मृति निकलकर बाहर आ गयी छिटककर. जब वो किचन में होती थी और वो यूँ आ जाया करता था किचन में कितना मुश्किल हो जाता था खाना बन पाना. पीछे खड़े होकर वो उसे बीच-बीच में चूमता रहता था और मसाले अक्सर जल जाया करते थे.
तेज़ हवा का झोंका भीतर आया तो सिहरन से वर्तमान में लौटी दूर्वा. सनी किचन में कुछ गुनगुना रहा था. उसे देखकर लग ही नहीं रहा था कि वो तेरह बरसों का फासला पार करके आया है. अतीत की कोई सलवट नहीं है उसकी आमद में. जबकि दूर्वा बार-बार अतीत में हिचकोले खाने लग रही है.

ये हमेशा से खुद को छुपा ले जाने में माहिर रहा. इस तरह की सहजता से ये क्या बताना चाहता है कि कुछ भी नहीं बदला है? सब पहले जैसा ही है? कि यह मुझे अब भी मुझे पहले जैसे ही प्यार करता है? लेकिन ऐसा तो इसने कभी कहा नहीं था. यह हमेशा कहा कि मैं इसका सर खाती रहती हूँ. तो अब यह मेरा सर क्यों खा रहा है? क्यों आया है? दूर्वा के भीतर घमासान छिड़ा हुआ था.

‘मनु, पराठे के साथ फिर से चाय पियोगी न?’ सनी ने किचन से ही आवाज दी.
‘हाँ’ दूर्वा ने आवाज में आई नमी को भरसक रोकते हुए कहा लेकिन वो भीगापन सनी तक पहुँच गया था. वो चाय और पराठे लेकर लौटा तो दूर्वा किचन में यह कहकर चली गयी कि शायद अचार रखा होगा. और अचार मिल गया.
‘मुझे नहीं चाहिए होता है अचार, तुम्हें पता तो है.’ चाय पराठा बेस्ट कॉम्बिनेशन.
दूर्वा बाहर देखने लगी. चाय उतनी ही बुरी बनी थी जितनी पहले सनी बनाया करता था. हर सिप अझेल हो रही थी.
यह आदमी हमेशा सिर्फ अपने बारे में क्यों सोचता है. इसे पता है इतने दूध वाली और इतनी मीठी चाय मुझे पसंद नहीं फिर भी. दूर्वा को गुस्सा आ रहा था.
सनी शायद काफी भूखा था, 4 पराठे चट कर गया.
‘होटल वाले खाने को नहीं देते क्या?’ दूर्वा ने व्यंग्य में पूछा.
सनी ने दूर्वा की प्लेट से आधा पराठा लेते हुए कहा, ‘देते हैं लेकिन प्याज के पराठे नहीं देते. और मैं बनाता भी तो अच्छे हूँ.’
फिर वही सेल्फ औब्सेसेड. हुंह. दूर्वा का गुस्सा लगातार बढ़ता जा रहा था.
‘तुमको क्या लगता है मनु, 2019 में किस करवट बैठेगा ऊँट?’
‘अरे मुझे क्या पता? क्या तुम मुझसे अबकी बार किसकी सरकार का एग्जिट पोल लेने आये हो?’ दूर्वा मन ही मन खिसिया रही थी. लेकिन मन को सामने क्यों लाना, सनी अब उसके लिए सिर्फ एक मेहमान ही तो है. सिर्फ औपचारिक संवाद ही होने चाहिए सो उसने कह दिया.
‘लगता तो है, कि लौटेगी यही सरकार’
‘यह बहुत बुरा होगा मनु, बुरा तो हो ही रहा है वैसे लेकिन...’
‘सरकार जो बुरा कर रही है उसकी चिंता है, खुद जो मेरे साथ बुरा किया उसके बारे में कोई बात नहीं.’ मनु लगातार भीतर के संवाद में थी.
मैं तो औपचारिक संवाद में हूँ लेकिन यह कहाँ से मेहमान लग रहा है. वैसे ही चपर-चपर करके खा रहा है, उँगलियाँ चाट रहा है, किचन में कब्जा जमा लिया है. इसे देख बिलकुल नहीं लग रहा कि 13 साल बाद लौटा है.

हालाँकि दूर्वा ने महसूस किया कि 13 बरसों का सफर सनी पर भी साफ़ दिख रहा है. बालों की सफेदी काफी बढ़ गयी है. दाढ़ी भी खिचड़ी सफेद हो चुकी है. चश्मा लग गया है. रंग वैसे ही मरीले से पहनता है अब भी वही ग्रे कलर आज भी पहना हुआ है जिसके कारण कितनी बार झगड़ चुकी है दूर्वा. गिरा हुआ ग्रे क्यों पहनते हो तुम? लेकिन मजाल है कि सनी ने पहनना छोड़ा हो. देखो तो इतने बरस बाद मिलने आया है तो भी वही ग्रे. जैसे चिढाने को करता हो ये सब. हालाँकि वो कहा करता था कि किसी के लिए खुद को बदलना अस्थायी है, बदलाव को भीतर से स्व्त्फूर्त आना चाहिए. मुझे जब तक खुद ग्रे से कोई दिक्कत नहीं होगी मैं तो पहनूंगा. हाँ, हो सकता है तुम्हें यह बात न पसंद आये लेकिन यह तुम्हारी दिक्कत है.

वक़्त बीत गया लेकिन चीज़ें बदली नहीं. सनी अब भी ग्रे में अटका है, हालाँकि उस ग्रे की उदासी दूर्वा के जीवन में चली आई और शायद चमक सनी के जीवन में रह गयी. ऐसा दूर्वा को लगता रहा.

‘यार, सबसे घटिया राजनीति होती है भावुकता की राजनीति. लोगों के इमोशन्स पर कब्जा. पब्लिक साली अलग पागल है, मने रोने लगते हैं लोग पागलपन में. लेकिन पब्लिक का यह चरित्र भी तो इन्हीं सालों ने गढ़ा है. सोचो मत, जैसा हम कहते हैं वैसा मानो, जब हम कहें जिस बात कर कहें उस बात पर भावुक हो. जो हम दिखाएँ वही देखो. तो भाई वही देख रही पब्लिक.’ दूर्वा के मन के भीतर चलती उथल-पुथल को सुने बिना सनी बोले जा रहा था, हालाँकि दूर्वा को लग रहा था कि वो अपने भीतर की आवाजों को अनसुना करने के लिए बाहर की आवाजों का सहारा हमेशा से लेता रहा है. जब पहली बार आया था, मिलने तब भी दुनिया भर की राजनीती का गणित समझाता रहा था. हालाँकि न वो सुन रहा था जो वो कह रहा था, न दूर्वा सुन रही थी. वो दोनों वही सुन रहे थे जो कहा नहीं जा रहा था.

‘कितनी अजीब बात है न मनु, किसी की थाली में दो रोटी थी. उसकी भूख तीन रोटी की थी. सरकार ने कहा तुम अपनी दो रोटी मुझे दो मैं चार करके वापस दूंगा. फिर उसने कहा, तुम्हारी रोटी विपक्ष खा गया, पिछली सरकार खा गयी लेकिन फ़िक्र न करो मैं तुमको तुम्हारी रोटी दूंगा. और सरकार ने लम्बे इंतजार के बाद एक रोटी दी.’ गरीब ने कहा, सरकार की जय, सरकार ने हमें रोटी दी. भूख से मरने से बचा लिया. वो भूल गए कि रोटी दी नहीं है बल्कि छीनी है. जो तुम्हें मिली वो तुम्हारी ही रोटी थी. जितनी मिली वो अपर्याप्त है. कोई नहीं सुनेगा यह बात. जो यह बोलेगा वो देशद्रोही कहलायेगा और राजा वोट कमाएगा.

अपनी जमीन, अपनी जिन्दगी, अपने खेतों की फसल के सही दामों के लिए तरस रहे हैं लोग और उन्हीं को वोट दे रहे हैं, अपने ही घर में असुरक्षित हैं लेकिन जिससे सुरक्षा को खतरा है उसी से पनाह मांग रहे हैं. यह अफीम आज नहीं चटाई गई, बरसों से यही हो रहा है.’

सनी, पराठे खाकर एकदम ऊर्जावान हो गया था और उसके भीतर का एक्टिविस्ट सक्रिय हो उठा था.
दूर्वा ने छेड़ दिया, ‘भरे पेट की बात खाली पेट की बात से अलग होती है न?’
सनी, मुस्कुरा दिया. ‘सही कह रही हो’
‘आखिर हम भी तो तमाम लग्जरी जीते हुए सिर्फ बातें ही कर रहे हैं. क्या करें समझ नहीं आता.’ सनी ने प्लेट उठाते हुए कहा.
‘तुमने खाया नहीं पराठा ?’ सनी ने दूर्वा की प्लेट देखते हुए कहा.
‘मैं देखना चाह रही थी कि भूखे पेट इन्सान को भरे पेट इन्सान की बात कैसी लगती है.’ दूर्वा ने कहा.
इस बात के जितने भी अर्थ थे सब सनी ने सुने और वो चुपचाप किचन में चला गया. प्लेट धोने की आवाज सुनकर दूर्वा किचन में गयी, ‘अब, प्लेट तो रहने ही दो धोने को.’ उसने सनी का हाथ पकड़ लिया.

बरसों बाद का स्पर्श शायद दोनों को सहन नही हुआ. सनी ने तुरंत प्लेट छोड़ दी और बाहर आ गया, दूर्वा की पलकें नम हो गयीं.
‘तुम लोग यार कितनी ही बड़ी-बड़ी बातें कर लो फेमिनिज्म की लेकिन अब भी कामों को जेंडर लेंस से देखना छोड़ नहीं पाई पूरी तरह.’ सनी ने भीतर की सनसनाहट को भीतर धकेलते हुए कहा.
‘ऐसा कुछ नहीं है.’ दूर्वा ने कहा.
‘तुम अब भी चाय बनाना नहीं सीखे’ दूर्वा ने बात बदलने के लिहाज से अपने कप में छोड़ी हुई चाय को देखते हुए कहा.
‘कुछ भी कहाँ बदलता है मनु’ सनी ने कहा. यह कहते हुए उसका स्वर इतना स्थिर था कि दूर्वा ठिठक गयी. सनी बाहर देखने लगा जहाँ एक चिड़िया ने बारिश से बचने की तमाम कोशिशों के बाद आखिर भीगना ही चुन लिया था. सनी का दिल चाहा एक छाता लेकर जाए और चिड़िया के ऊपर लगा दे. जब मनु को जीवन की आँधियों और बारिशों से बचने के लिए प्रेम का छतरी चाहिए था, तब तो वह नहीं था. यह सोचकर सनी की आंखें गीली हो गयीं. उसे लगा वो भीगती चिड़िया मनु है और सनी जिसे छतरी होना चाहिए था वो बारिश हो गया है, वही वजह है उसके इस तरह भीगने की.
‘अंकिता कैसी है?’ दूर्वा ने पूछा.
‘अच्छी है, खूब शैतान. इतना बोलती है क्या बताऊँ.’ सनी की आवाज में खनक आ गयी थी.
दूर्वा उस चमक के भीतर उदास होने लगी.
‘और रश्मि?’ दूर्वा ने अपने पाँव के नाखून पर नज़रें टिकाये हुए पूछा.
‘वो बहुत अच्छी है. अपना काम शुरू किया है बुटीक का. अच्छा चल रहा है. खुश रहती है.’ सनी ने जैसे रटी हुई स्पीच उगल दी हो और उसके बाद राहत की सांस ली हो.
‘और तुम?’ यह दूर्वा के पास सनी के लिए अंतिम प्रश्न था.
‘तुम्हारे सामने हूँ हट्टा-कट्टा. मरा नहीं हूँ तुम्हारे बिना. हा हा हा’ सनी ने गंभीरता को सहजता में बदलने की कोशिश की.
‘सामने होने से कुछ नहीं होता. होना और सामने होना दो अलग बाते हैं.’ दूर्वा धीरे से बुदुदाई.

‘तुम कैसी हो?’ सनी ने पूछा.
‘तुम्हारे सामने हूँ. हट्टी कट्टी मरी नहीं हूँ तुम्हारे बिना.’ दूर्वा ने उसी का जवाब कॉपी पेस्ट कर दिया.’
सनी उदास हो गया.
‘हाँ, क्यों मरना यार. जब लोग भूख से मर रहे हों ऐसे में प्यार में मरने की बात करना लग्जरी ही तो है. हालाँकि न मरना जीना ही है यह कहना मुश्किल है. ‘
बादलों की गडगडाहट तेज़ होती जा रही थी. शायद बिजली गिरी है कहीं. बारिश लगातार तेज़ होती जा रही थी.
‘गाड़ी ठीक है?’ सनी ने पूछा.
‘हाँ. क्यों?’ जाना था कहीं काम से. कुछ देर को. चाबी दोगी?’
दूर्वा ने गाड़ी की चाबी टेबल पर रख दी.
दो घंटे हो गए हैं सनी ने अब तक उसे छुआ तक नहीं. पहले किस तरह बेसब्र हुआ करता था. चाय रखे रखे ठंडी हो जाती थी. चुम्बनों की बौछार होती थी उस पर. कितना नशा था उस स्पर्श का. उसकी बेसब्री किस कदर मोहती थी दूर्वा को. लेकिन 13 बरस का फासला सब बहा ले गया.
‘मैं आता हूँ कुछ देर में? कुछ लाना है? दवाई वगैरह?’
‘नहीं सब है मेरे पास.’ कहते हुए दूर्वा ने सुना कि कुछ भी तो नहीं है मेरे पास क्या-क्या ला सकोगे?
सनी चला गया.

दूर्वा अतीत और वर्तमान के बीच हिचकोले खाती रही. कोई वजह नहीं थी उन दोनों के बीच इस दूरी की. कोई भी वजह नहीं थी फिर भी फासले उगते गये. मनु, कितने बरसों बाद इस नाम से पुकारा जाना अच्छा लग रहा था दूर्वा को. शायद इस तरह का अच्छा लगने का अभ्यास छूट गया था उसका.
दूर्वा अब ज्यादा खामोश हो गयी है. हालाँकि उसके भीतर काफी शोर भर गया है. सनी अब खूब बोलने लगा है लेकिन शायद वो भीतर कहीं मौन हो गया है. बारिश इन दोनों की धुन को समझती है.

सनी लौटा तो उसके दोनों हाथों में सामान था. सब्जियां, फल, राशन का ज़रूरी सामान, मैगी दूध वगैरह.
दूर्वा यह देख चौंककर बोली , ‘यह सब क्या है? इसकी कोई कोई जरूरत नहीं थी.’
‘जो जरूरत है, वो मैं पूरी कहाँ कर पाता हूँ मनु,’ सनी की आवाज़ एकदम भीग चुकी थीं. भीगी पलकें छुपाने के लिए उसने चेहरा घुमा लिया.
बाहर बारिश की धुन और तेज़ हो गयी थी, लॉन में लगी घास बारिश में डूब चुकी थी...

(फेमिना 2018 के नवम्बर अंक में प्रकाशित)