Wednesday, May 20, 2026

मैं मिलने जाऊँगी

 


पिछले बरस मेरे जन्मदिन पर चमोली में मित्र ने एक पौधा लगाया था। सुना है वह पौधा अब बड़ा हो गया है।
एक रोज मैं उस पौधे से मिलने जाऊँगी। उस शहर में एक नदी बहती है,जो मेरी सहेली है। मैं उस नदी से मिलने जाऊँगी। उस शहर के मौसम ने मेरे गाढ़े दुखों में गुलाबी फूल खिलाये थे, मैं उस मौसम से मिलने जाऊँगी।

जिस मित्र ने मेरे नाम के पौधे को न सिर्फ लगाया उसे साल भर सहेजा, बड़ा किया मैं उसे मित्र से मिलने जाऊँगी।

एक दिन मैं स्नेह से भरे हर व्यक्ति से मिलने जाऊँगी।

Tuesday, May 19, 2026

आवाज़ भी एक जगह है


कल जन संस्कृति मंच ने देहरादून में मंगलेश जी की स्मृति में एक कार्यक्रम का आयोजन किया। सच कहूँ अरसे बाद किसी कार्यक्रम से इतना तृप्त होकर लौटी हूँ। तृप्ति का केंद्र मैंने खुद के लिए जिन चीजों में पाया है वे हैं स्नेह, सम्मान और अब तक जाने हुए में तनिक इज़ाफ़ा। कल की शाम इन तीनों से लबरेज़ रही।

आशुतोष, रविभूषण, ज़हूर आलम, दिगम्बर और राम जी राय (जी का सम्बोधन सबके साथ माना जाय) को सुनना सुखद था। कविता की लेयर्स को देखना, टटोलना, उसके भीतर और भीतर झांकना और कविता के मर्म तक पहुंचना सुखद था। जानना हमेशा ही कम होता है। हर बार लगता है, कितना तो कम जानते हैं हम। कल भी ऐसा ही सा दिन था।

इतने सारे कवियों ने इतना सुंदर सुवावस्थित कविता पाठ किया, आनंद हुआ। भरोसा हुआ कि हालात से बैचेन लोग कम भी नहीं हैं। प्रेम शंकर और मृत्युंजय ने क्या ही गज़ब का संचालन किया। यह उस संचालन की ही खूबी थी कि कार्यक्रम में इतने वक्ताओं के वक्तव्य और 20 कवियों के कविता पाठ से रचा बसा कार्यक्रम समय पर शुरू हुआ और समय पर खत्म हुआ।

न किसी कवि ने माइक पकड़कर पकड़े ही रहने की जिद की और ऐसा भी नहीं लगा कि बहुत हड़बड़ी हुई। तो यह संतुलन ख़ूबसूरत था। मदन चमोली शांति से सब संभाले भी रहे और लगने भी नहीं दिया कि कोई कुछ संभाल रहा है।

इब्बार रब्बी जी को पहली बार सुना, क्या ख़ूब हैं वो। क्या उत्साह, क्या बेबाक़ी और क्या ही कमाल का पाठ। नाम लेकर हर कवि के बारे में लिखूँगी तो कई किलोमीटर की पोस्ट हो जाएगी बस इतना ही कि हर कवि अपने होने में कमाल था। इतने सारे कवियों को एक साथ सुनना और एक मिनट के लिए भी कविता से ध्यान न हटना इस बात की तसदीक़ है।

श्रोताओं की संख्या भी सुख का एक कारण था। इतने सारे लोग समय पर आ गए और लगातार बने रहे, यह कम महत्वपूर्ण बात नहीं। प्रतिरोध के स्वर में इतने सारे साथियों का होना सुख तो है ही।

मंगलेश जी से जुड़े इतने स्नेहिल किस्से सुनने को मिले कि ऐसा लगा नहीं हैं वो हमारे बीच नहीं हैं। दैहिक रूप से वे हमारे साथ भले नहीं हैं लेकिन हम सबके भीतर वो हैं और रहेंगे। कार्यक्रम की शुरुआत में उनके कविता पाठ की रिकॉर्डिंग सुनना भी कम सुंदर अनुभव नहीं था।

तो कुल जमा बात इतनी है कि ये माना कि अंधेरा घना है, लेकिन इस अंधेरे को तोड़ने की कोशिश करने वाले भी कम नहीं हैं, और ये अंधेरा एक दिन टूटेगा ज़रूर।

मृत्युंजय पुराने साथी हैं, उनसे अरसे बाद मिलना बड़ा ही सुखद रहा। बाकी इस कार्यक्रम में जो गुना है वो धीरे-धीरे भीतर जगह बना रहा है। धीरे-धीरे उस पर भी लिखूँगी अगर वक़्त इज़ाजत देगा। 

जिंदाबाद साथियों!

Sunday, May 17, 2026

जीवन में ऋषभ का होना


भीतर भीतर कुछ दरक रहा होता है, जिसे कभी ढेर सारे काम से, कभी तेज़ कदमों से, कभी संगीत से, कभी ढेर सारी मुस्कुराहटों से और कभी झूठ मूठ की खिलखिलाहटों से रिप्लेस करने की कोशिश करती रहती हूँ। उस वक़्त अपने ज़िंदगी को चकमा देने के इस हुनर पर फख्र सा होने लगता है लेकिन...वो ज़िंदगी है, चुपके से धप्पा देती है। वो इंतज़ार करती है, एक ऐसी तनहाई का जिसमें आप टूटकर बिखर ही लें। 

बिखरना, बुरा नहीं है। टूटना बुरा है। टूटन को छुपाये फिरने के खेल में हम लगातार और टूटते जाते हैं। 
कभी सब्र की नब्ज़ टटोलती हूँ। बहुत मद्ध्म मद्ध्म सी हरकत मुश्किल से ढूंढ पाती हूँ। अपने ही सब्र को गले लगाकर बैठी हूँ। आज की इस सुबह में मैं हूँ मेरा लगभग टूटा हुआ सब्र है और कुछ अगड़म बगड़म सा दिन है। 

शायद मैं लिख भी न पाती कुछ। न जाने कबसे लिखना, पढ़ना स्थगित सा है। किया नहीं है स्थगित, यह खुद दूर जाकर बैठा है। मैं इंतज़ार में हूँ कि करीब आए वो नहीं आता। मैं अपनी पसंद की किताबों के साथ उसके करीब जाती हूँ, वो मुंह घुमाकर बैठ जाता है। मैं लौट आती हूँ। हालांकि, मनुहार करना जारी है। 

मैंने पाया है कि आपके कितने ही करीबी लोग हों वो आपके दुख, सॉरी दुख नहीं उदासी का सामना नहीं करना चाहते। उस बारे में बात नहीं करना चाहते। शायद मैं भी नहीं। और इसलिए हमारे चेहरे पर मुस्कुराहटों के मुखौटे मजबूत होते जाते हैं। 

कल मैंने 3 लोगों से कहा, 'मन अच्छा नहीं है'।  2 लोगों ने पूछा, 'अरे क्या हुआ?' और 1 ने कहा, 'मेरा भी मन बहुत खराब है' मैं इन सबके साथ खुद में वापस  लौट आई। क्योंकि 'क्या हुआ' जैसा कुछ तो हुआ नहीं। लेकिन क्या नहीं हुआ जैसा तो न जाने कितना कुछ है। 

जानती हूँ कि हर कोई अपने भीतर न जाने कितना सैलाब लिए फिर रहा है। देश दुनिया के हालात ऐसे हैं कि आप इनसे अछूते रह नहीं सकते। कुछ कहकर कभी कुछ न कहकर। 

मैंने बचपन से अपना कोपिंग मैकेनिज़्म चुप रहने और घर की सफाई में पाया है। बड़ी हुई (मतलब पिछले दस बारह सालों में ) लॉन्ग ड्राइव या ट्रैवल भी कोपिंग मैकेनिज़्म की तरह पाया है। हालांकि आम जीवन में इस तरह के मैकेनिज़्म वो भी स्त्रियॉं के लिए एक लग्ज़री ही है। 

पिछले तीन दिन से घिस-घिस कर घर के कोने चमकाने, और बेमतलब के आँसू बहा चुकने के बाद आज इतवार को मैंने कुछ मना सा लिया है। इसका एक बड़ा क्रेडिट जाता है ऋषभ को। उसने एक ब्लॉग बनाया है। सिंगापूर डायरी लिखनी शुरू की है। मुझे उसने रात भेजा था। मेरी सुबह हुई उसे पढ़ने से। पढ़ते-पढ़ते लगा जैसे ठंडी हवा के झोंके ने छू लिया हो। 

सरल होना मुझे इस कदर मोहता है कि क्या कहूँ। जिस सादगी से ऋषभ लिखता है, वैसा ही वो है। इसलिए ऐसा लगा, उसने अपना लिखा भेजकर कहा हो, 'प्रतिभा जी, मैं हूँ न साथ।' 

ऋषभ, तुम्हारे लिखे का जादू देखो, दिन खिला हुआ है। मन भी। 

हम दुनिया के किसी भी कोने में हों, अपने हिस्से की मानवीयता को जीते हुए इस दुनिया को सुंदर बनाने के सपने में एक छोटा सा योगदान तो कर ही रहे हैं। कि हर रात सोने से पहले खुद से पूछना, आज किसी का दिल तो नहीं दुखाया न? 

जब जीवन का 'स' ही न सध रहा हो ऐसे में  ऋषभ का जीवन में  यूं होना ब्लेसिंग ही तो है। और इस बात को सेलिब्रेट तो करना चाहिए। है न? तो अब उठती हूँ, आज फिर से दो कप चाय बनाऊँगी। पहला कप ऋषभ का, दूसरा...आप जानते तो हैं न। 
दिन शुभ हो सबका।  

ऋषभ के ब्लॉग का लिंक- https://open.substack.com/pub/riserishabh/p/singapore-slowly-some-days-improve?utm_source=share&utm_medium=android&r=1dr9dp 

Friday, May 15, 2026

मर्मस्पर्शी उपन्यास है ‘कबिरा सोई पीर है’ : महेश पुनेठा



प्रतिभा कटियार, जिनकी मुख्य पहचान एक संवेदनशील कवयित्री के रूप में है, अपने पहले उपन्यास ‘कबिरा सोई पीर है’ के माध्यम से हिंदी साहित्य में एक सशक्त विमर्श प्रस्तुत करती हैं। यह उपन्यास जाति, लिंग, आरक्षण, सामाजिक कंडीशनिंग और मानवीय अंतर-संघर्षों की जटिलता को केंद्र में रखकर लिखा गया है। मात्र 168 पृष्ठों में लेखिका ने समाज के गहरे घावों को छुआ है, बिना किसी व्यक्ति-विशेष को दोषी ठहराए।

उपन्यास की शुरुआत सिविल सेवा की तैयारी कर रहे युवाओं के कोचिंग सेंटर से होती है। नायक और नायिका दोनों निम्न-मध्यवर्गीय परिवारों से आते हैं, लेकिन अलग-अलग जातियों से। उनकी मुलाकात और बढ़ती आत्मीयता उपन्यास की मुख्य धुरी बनती है। नायक लिबरल दृष्टिकोण वाला, जाति-लिंग संकीर्णताओं से ऊपर उठने की कोशिश कर रहा व्यक्ति है, जबकि नायिका अपने कड़वे अनुभवों के कारण शंकालु, तल्ख और पूर्वाग्रहों से ग्रस्त है,जो स्वाभाविक है। उपन्यास की संरचना उल्लेखनीय है।

उपन्यास 29 अध्यायों में लिखा गया है। हर अध्याय के अंत में एक शेर दिया गया है, जो कवयित्री प्रतिभा की पहचान को गद्य में भी जीवंत रखता है। बीच-बीच में काव्य पंक्तियों और कविताओं का आना तथा प्रकृति-चित्रण उपन्यास को काव्यात्मक गहराई प्रदान करता है।उनके प्रकृति और कविता के प्रति गहरी रागात्मकता को दिखाता है। लेखिका ने अंतर-संघर्ष को बहुत बारीकी से उकेरा है। वे दिखाती हैं कि भेदभाव अब मुख्यतः प्रत्यक्ष नहीं, बल्कि मानसिक और सूक्ष्म स्तर पर विद्यमान है — परिवार की बातचीत, दोस्तों के बीच “मजाक”, आरक्षण का ताना और योग्यता पर उठाए जाने वाले प्रश्नचिह्न। आरक्षण नौकरी दे सकता है, लेकिन सम्मान और स्वीकृति नहीं — यह कटु सत्य उपन्यास में बार-बार प्रतिध्वनित होता है।

सबसे मजबूत पक्ष बहु-स्तरीय भेदभाव का चित्रण है। लेखिका दिखाती हैं कि शोषक वर्ग में भी स्त्रियाँ शोषित हैं, दलित पुरुष दलित स्त्री से और सवर्ण स्त्री दलित स्त्री से खुद को बेहतर मानने का दंभ रखता है। नई पीढ़ी में बदलाव के बीज हैं, लेकिन सामाजिक संरचना इतनी जटिल है कि बाहर निकलना आसान नहीं। अनुच्छेद 370 के हटाए जाने के बहाने लोगों के मन में धर्म के नाम पर बजबजाती नफरत को भी दिखाया गया है।

अच्छी बात है कि समाज में व्याप्त भेदभाव के लिए उपन्यास किसी एक पक्ष को पूरी तरह दोषी नहीं ठहराता है। वह सोशल कंडीशनिंग को “नसों में इंजेक्ट वायरस” की संज्ञा देता है और समझने की कोशिश करता है कि भेदभाव करने वाला व्यक्ति भी पूरी तरह जिम्मेदार नहीं होता। उपन्यास इस पर सहानुभूति पूर्वक देखे जाने की अपील करता है । मार्मिक पंक्ति है — “दर्द ही उनका देश है” — जो शोषितों की सार्वभौमिक पीड़ा को रेखांकित करती है।

यथार्थ और रूमानियत का संतुलित मिश्रण, पात्रों के आंतरिक द्वंद्व का गहरा चित्रण और काव्यात्मक भाषा उपन्यास को मजबूत बनाती हैं।

उपन्यास पाठक को बेचैनी और सवालों के साथ छोड़ता है — “जब तक दिमाग ठीक नहीं, तब तक कैसे ठीक हो सकता है?” कानून सतह बदल सकता है, दिल नहीं। महत्वपूर्ण बात कही गई है।

कुल मिलाकर ‘कबिरा सोई पीर है’ एक मर्मस्पर्शी उपन्यास है, जो 21वीं सदी के भारत में जाति-लिंग के जटिल प्रश्नों को उठाता है। यह न सिर्फ पीड़ा को दर्ज करता है, बल्कि समझ, सहानुभूति और बदलाव की यात्रा पर भी जोर देता है।

प्रतिभा कटियार ने साबित किया है कि कविता की संवेदनशीलता गद्य में भी समाज को आईना दिखा सकती है। जो पीड़ा नहीं झेला, वह शायद पूरी तरह न समझ पाए — लेकिन इस उपन्यास को पढ़ने के बाद अनुभव करने का एक मौका जरूर मिलता है। यह उन सबके लिए अनिवार्य पढ़ने योग्य है जो समाज में बदलाव चाहते हैं।

कबीर की तरह — पीर वही समझता है जो सोई हुई पीड़ा को जागृत कर सके। प्रतिभा कटियार ने ठीक यही किया है। 

Thursday, April 16, 2026

अप्रैल उम्मीद है


वो जो खिलखिला रहे हैं मोगरे इन दिनों
ये अप्रैल की आहट है
ये जो सारे दरवाजे खिड़की भेदकर 
चली आती है रातरानी की ख़ुशबू 
ये अप्रैल का दीवानापन है 
ये जो आँखों से निकल भागे हैं ख़्वाब 
मटरगश्ती करते फिर रहे हैं यहाँ से वहाँ 
ये अप्रैल की शरारत है 
ये जो समन्दर की लहरों को 
अंजुरियों में समेट लेने को व्याकुल है एक लड़की 
ये अप्रैल पर भरोसा है 
ये उड़ते हुए सेमल के फाहे 
आ बैठे हैं काँधों पर 
ये अप्रैल से उम्मीद है