Friday, April 3, 2026

जीवन के पास क्या मरहम है?


खरगोशों की उदुक-फुदक दिन के उगने से पहले धरती को संवार रही है। अरसे बाद बालकनी से लटक कर लगभग कांधे से आ लगने को आतुर अशोक धरती को शोक मुक्त करने की प्रार्थना में मानो आँखें मूँदें खड़े हैं। धूप के कुछ कतरे इधर-उधर बिखरना शुरू हो चुके हैं।

इस सुबह में कल रात का कलरव भी दाखिल है। पूर्णमासी का चाँद मानो सुबह के करीब रखे चाय के कप को जरा सा सरकाकर बैठा ऊंघ रहा हो। मैं नन्हे अचंभे से चाय के कप को देख रही हूँ, जिसके दाहिनी तरफ सुबह की किरनें हैं और बायीं तरफ पूर्णमासी के चाँद की धज।

सुबह के वैभव को देखती हूँ तो खुशी गालों पर छलक़ने को आतुर होती है। ठीक उसी वक़्त कोई मध्धम सी सिसकी जो भीतर ही भीतर न जाने कबसे पल रही है आँखों के रास्ते बाहर आने का रास्ता ढूंढ लेती है। सिसकियाँ बेआवाज होती है, उन्हें भीड़ से डर लगता है। उन्हें आईने से भी डर लगता है। वे एकांत की फिराक में रहती हैं। वे फिराक में रहती हैं कि कब मैं भीड़ से तनिक हाथ छुड़ाऊँ और खुद के करीब आऊँ।

इस गहरी सिसकी में जमाने भर की औरतों की वेदना घुली है। इसमें मेरी बेबसी घुली है। जब्त है, आक्रोश है। मैं इससे आँखें नहीं चुरा सकती।

नन्हा सा सुख भी किसी कर्ज़ सा लगता है।

इस सुबह में प्यार है। साथ ही एक गुहार है। ईश्वर से प्रार्थना है, कि तुम हो, तो हो न यार। सारे पत्थर दिलों को मोम कर दो न। सारे हथियारों को फूलों में बदल दो न। सारे बस्तों में सपने भर दो, इस दुनिया को कुछ तो जीने लायक बना दो।

तो क्या मैं इतनी निराश हो चुकी हूँ कि किसी चमत्कार.का इंतज़ार करने लगी हूँ। मैं खबरें छुपाती फिरती हूँ, या खबरों से छुपती फिरती हूँ पता नहीं लेकिन जानती हूँ बच तो बिलकुल भी नहीं पाती।

अशोक के पेड़ों की कतारें जिस तरह प्रार्थनामय हैं मेरे हाथ अपने आप जुड़ गए हैं, ओ जीवन, जरा सा मरहम बन जा, जा जख्मी दिलों को गले से लगा ले। सामने ख़रगोश कुलांचे मार रहे हैं, सुबह पूरी तरह धरती पर बिखर चुकी है, लेकिन क्या अंधेरा पूरी तरह गायब हो चुका है।

Thursday, March 19, 2026

दिल से दस तक


ऐसे रास्ते पर चलना जिसमें कोई होड़ न हो। जिस पर चलने वालों को कहीं पहुँचने की हड़बड़ी न हो। किसी को किसी से बेहतर साबित करने का कोई दबाव ही न हो। बस सुख हो साथ चलने का। हाँ, यह रास्ता है कविता कारवां का। कुछ कविता प्रेमियों ने सपना देखा किसी ढलती शाम में किसी पहाड़ी, किसी नदी किसी जंगल के तीरे बैठकर अपने दिल के बेहद क़रीब रहने वाली कविताओं को एक-दूसरे से साझा करने का। कवितायें भी अपनी नहीं, अपने प्रिय कवियों की। तो बस 2016 की एक शाम देहरादून के जसवंत मॉडल स्कूल में पहली बैठक हुई। तब से आज तक यह सिलसिला देश दुनिया में लगातार चल रहा है।

दिल ने कविता की देहरी पर दस्तक दी थी और कार्यक्रम की शुरुआत हुई थी। आज वह दिल की दस्तक दस वर्ष का सफर तय कर चुकी है।

इस सुंदर कान्सेप्ट को किसने शुरू किया, कैसे आगे बढ़ा यह बात लगातार अर्थहीन होती गई और यही इसकी सफलता है। हर वो शख्श जो एक बार बैठक में शामिल हुआ इस आयोजन का उतना ही owner हुआ जितना शुरुआत करने वाले कभी थे। फिर यह सिलसिला बढ़ता गया, जिम्मेदारियाँ एक से दूसरे को ट्रांसफर होती रहीं। शहर-दर-शहर बैठकियां होने लगीं।

आज दसवीं सालगिरह की दहलीज़ पर खड़े हुए सिर्फ एक एहसास तारी है, कितना प्यार मिला, कितने प्यारे लोग मिले, कितना सुकून मिला। जीवन में भला और क्या चाहिए होता है।

कविता कारवां हर कविता प्रेमी का अपना कार्यक्रम है। दुनिया भर से लोग इसमें जुड़े हुए हैं। कोई कुछ चाहता नहीं है, सिर्फ देता है अपना समय, प्यार और साझेदारी। हम नहीं जानते यह दुनिया कैसे बेहतर हो सकती है, बस इतना जानते हैं कि हम जहां हैं, वहाँ से शुरुआत हो सकती है।

कविता कारवां पर नाज़ है। यहाँ कोई ईर्ष्या नहीं, द्वेष नहीं, कोई राजनीति नहीं, सिर्फ और सिर्फ प्यार है और है अपनी प्यारी कविताओं के जरिये एक ख़ूबसूरत दुनिया का सपना देखना।

तो आइये, शामिल होते हैं कविता कारवां की दसवीं सालगिरह के उत्सव में और तलाशते हैं अपनी भूमिका इस दुनिया को मानवीय और करुणा से भरा हुआ बनाने की।

हैपी बर्थडे कविता कारवाँ!

Wednesday, March 18, 2026

उसने कहा, मैं हूँ न!

लाल टिब्बा का वैभव अब ब्लोगर्स और फोटोग्राफर के हवाले हो चुका है। दुर्लभ प्राकृतिक दृश्यों से घिरी जगह की खूबसूरती को सम्पूर्ण मौन और समर्पण में ही महसूस किया जा सकता है। शुरुआती दिनों में कई बरस पहले जब आती थी तब इतनी भीड़ नहीं होती थी। ख़ासकर ऊपर जहां बड़ी सी दूरबीन से हिमालय की रेंज को देखने का सुख रखा था। हम अक्सर मौसम के खुलने का इंतज़ार करते थे हालांकि दूधिया ओढ़नी में लिपटे पहाड़ों और जंगलों के सौंदर्य में गुम होते हुए बर्फ से लदे पहाड़ों को न देख पाने का मलाल नहीं ही हुआ कभी। 

अक्सर यहाँ चाय की प्यालियों में बादल का कोई टुकड़ा रखा देखा है। चलते हुए महसूस किया है कि पाँव ज़मीन पर नहीं बादलों पर पड़ रहे हैं। कल्पना में नहीं सच में। यही बात लैढ़ोर को खास बनाती है।  

लेकिन, हम जिस सुख की तलाश में पहाड़ों पर जाते हैं उसी सुख को नष्ट करने की अभिलाषा भी साथ लिए जाते हैं। जिस डाल पर बैठे हैं उसे ही काटने में लगे लोग हैं हम। लालच इतना कि दुनिया कि हर अच्छे पर अपनी नेम प्लेट लगाने को व्याकुल। बाज़ार को दोष देना कई बार खुद को बचाना भी लगता है। 

लाल टिब्बा का वैभव इस बार लोगों की भीड़ में, खुद को अच्छे अच्छे पोज में फोटो में कैद कर लेने की हड़बड़ी में और ढेर सारा खाना पीना करने में गुम होता दिखा। वो जगह जो मेडिटेटिव हुआ करती थी अब कैफे में बदल गयी है। खाना और फोटोग्राफी की होड़ मिलकर जैसे शांत पानी में कंकड़ी मार रहे थे। 

जगह की कमी थी और लोग इंतज़ार की लाइन में थे। सूरज अपने पूरे वैभव के साथ डूब रहा था और लोग अपनी कॉफी, अपने खाने का ऑर्डर करने में बिज़ी थे। 

वहाँ जमा तमाम लोगों में मुझे एक भी ऐसा नहीं दिखा जो प्र्कृति इस अनमोल लम्हे के सजदे में हो, जो इस सुख को आत्मसात करते हुए छलक पड़ा हो, जिसने अपने भीतर कुछ पिघलते हुए महसूस किया हो। 

जिस जगह बैठकर कभी सुख से छलक पड़ा करती थी आज उस जगह के खो जाने का दुख तारी होने लगा था। एक बार फिर यह बात पुख्ता हुई कि टिकट कटाकर निकल पड़ने से आप यात्रा का सुख ले पाएंगे यह बात अधूरी है। यात्रा की तैयारी पहले भीतर करनी होती है। वरना सोशल मीडिया तो अपडेट हो जाएगा लेकिन जीवन अपडेट नहीं हो पाएगा। 

मन की इस उथल-पुथल और बेचैनी को कौन सुनता वहाँ सिवाय मौसम के। सो ठंडी हवा के झोंके ने कंधे सहलाते हुए कहा, 'परेशान न हो मैं हूँ न।' मैंने चलना शुरू कर दिया...ठंड ने गाल सहलाये तो साथ लाई हुई शाल मुस्कुरा उठी।   

जारी...

Tuesday, March 17, 2026

उसने मेरा हाथ थाम लिया था

सूरज ढलते ढलते उदास शाम का सिरा थमा गया था। दिन के जाने और रात के आने के बीच का यह छोटा सा वक्फ़ा अपने भीतर न जाने कितनी उथल पुथल समेटे होता है। किसी के जाने और आने के बीच का वो हिस्सा जिसमें न जाने कितने संशय सांस ले रहे होते हैं। विगत की हथेलियाँ छूट नहीं रही होतीं और आगत की आहट का कोई पता नहीं होता। 

देवदार के घने जंगलों के बीच रोशनी और अंधेरे के रंग खेल खेल रहे थे। यह आँख मिचौली का खेल नहीं था, यह खेल था सांस के आने और जाने के बीच जरा सा सुस्ता लेने का। लैंढ़ोर न जाने कितनी बार आई हूँ लेकिन आने और आने में फर्क होता है। इस बार का आने खुद से ख़ुद को रिहा करने के लिए जरूरी था। मैं उन रास्तों पर चलते हुए जीवन की उन पगडंडियों की स्मृतियों को भी पार कर रही थी जिन पर चलकर मेरा वजूद बना है। 

जंगल की ख़ुशबू को थाम लेने को व्याकुल हथेलियाँ ख़ुद पर हंस रही थीं। ख़ुशबू को भला कोई थाम सकता है? क्या उसकी कोई तस्वीर ली जा सकती है? नहीं, ख़ुशबू को सिर्फ जिया जा सकता है। एक जगह बैठकर मैं देवदार और आसमान की गुफ्तगू को होते हुए देख रही थी। मेरे पीछे जीवन और मृत्यु का मंत्र बुदबुदा रही थीं कब्रें। उन कब्रों में सोये हुए लोग सुकून में तो होंगे शायद। 

जब सब कुछ इतना फ़ानी है तो झगड़ा किस बात का है आखिर। झगड़े का संसार हमारा बनाया हुआ है। झगड़ा कितना बेवजह यह बताने को कुदरत हमेशा तैयार रहती है। टट्टू पर बैठा खिल खिल करता बच्चा, उसके साथ चलता पिता, फोटो का ठीक ठीक एंगल ढूंढती माँ की खुशी, जीवन पर भरोसा है। वह भरोसा जिसे दुनिया भर के समझदार लोग लगातार तोड़ने पर लगे हैं। 

चलते-चलते पूरी धरती नाप लेना चाहती हूँ। इन दिनों पाँव थकते नहीं हैं। असल में जितना चलती हूँ मन को उतनी रिहाई मिलती है। चलना रास्तों से रिश्ता बनाना है, ख़ुद के करीब लाता है। चलते हुए चुप रहना किसी ध्यान में होने जैसा होता है। यह हाल ही में जाना है। अपने हाल में जाने हुए को मुट्ठियों में कैद कर लेना चाहती हूँ। फिर ख़ुद की बेवकूफी पर हंस देती हूँ। जो कुछ भी दुनिया में अच्छा है उस पर कब्जेदारी की हमारी फितरत। 

यह मेरा जाना हुआ है, यह व्यक्ति मेरा है, यह जगह मेरी है, यह घर मेरा है...सारा झगड़ा मैं का है। ख़यालों के गहरे समंदर में डूबे हुए मैं अपने भीतर धँसती जा रही थी। भीतर धँसते जाने का अर्थ है अपने भीतर छुपा कर रखी उस क़ीमती शय जिसका नाम उदासी है को छू लेना। 

मेरी आँखें बह निकली थीं और इस बात की खबर गालों के अलावा किसी को नहीं थी। लैंढ़ोर की हवा मरहम सी बन चुकी थी। भीतर का अंधेरा खाली हो रहा था और बाहर उगा रहा ताजा अंधेरा रोशनी बनकर भीतर प्रवेश कर रहा था। 

युवा खिलखिलाहटों का सैलाब उधर से गुजरा तो लगा ढेर सारे फूल खिले हों। उनकी हंसी से एक फूल चुराकर मैंने अपने बालों में टाँक लिया था...

लैढ़ोर ने हाथ थाम लिया था। 

(जारी...) 

Monday, March 16, 2026

लैढ़ोर- ख़्वाब का खुलता सिरा



चलते-चलते अचानक पाँव अचानक मुड़ गया। मीठे दर्द की लहर सी उठी। टीस देह में उतर गयी। जिस वक़्त यह हुआ सूरज दिन के रजिस्टर पर अपनी दिहाड़ी पूरे होने के सिग्नेचर कर रहा था। देवदार के पेड़ अपनी गर्दन उठाए कुछ इस गलतफहमी को जी रहे थे मानो वो सामने खड़े हिमालय से ज़्यादा ऊंचे हों। हालांकि उनकी लहराती झूमती शाख़ों को ऐसा कोई गुमान नहीं था, वे बस अपने होने में ही खुश थीं। ढेर सारे टूरिस्ट पहाड़ी की ओट में जाते सूरज को अपने-अपने मोबाइल में कैद करने की जुगत लगा रहे थे। इस जुगत लगाने में उनका उस लम्हे को जीना लगभग छूटा जा रहा था।

मेरे पाँव के मुड़ने की ख़बर मेरे क़रीब खड़े मेरे दोस्त को नहीं हुई लेकिन उफ़क में अटके सूरज को हो गई। उसके घर जाने की स्पीड में ब्रेक लग गया। उसने पलकें झपकाकर पूछा, 'क्या हुआ?' 
मैं हंस दी। 'कुछ नहीं' कहकर वहीं उसी पहाड़ी के किनारे बैठ गई।
सूरज नाराज़ होकर बदली में छुप गया।

मैं जानती हूँ इसके ये खेल, मैंने दर्द को घूंटते हुए कहा, 'तुझे कुछ देर और रोकना था, बस इसलिए। देख, तू रुक गया न?' बदली से झाँकते हुए उसने अपनी नाराज़गी को कुछ यूं लपेटा, जैसे पड़ोस वाली आंटी ने शाल लपेटा।

मैंने उस हँसकर दिखाया, देख मैं ठीक हूँ। उसने मेरी पीठ पर धौल देते हुए कहा, 'मुझसे न छुपा, मैं सब जानता हूँ।
अब संभलकर घर जा, आराम कर।'

'पहले तू तो जा। देख कितने सारे लोग तेरे जाने को देखने को व्याकुल हैं'। वो हंसकर चल दिया। जाते-जाते अपनी रोशनी मेरे दर्द पर रख दी थी उसने।

दर्द में थोड़ी राहत तो आई थी।