Thursday, March 12, 2026

क्या मुझे नींद आएगी


कई रोज से एक ख़ुशबू को थामे चल रही हूँ। उगते सूरज की ख़ुशबू। नई कोंपले फूटने की ख़ुशबू। सड़कें झरे हुए फूलों से भर उठी हैं। जिन रास्तों से गुजरती हूँ मेरे सर पर आसमान के साथ-साथ फूलों का एक सैलाब सा छाया होता है। मेरे दायीं तरफ फूलों की कतारे हैं और बाईं तरफ आम, लीची की बौर। पूरा शहर फिर से नये उगने की ख़ुशबू में डूबा है।

सारे दिन शहर का मौसम मुझे देश दुनिया के मौसम से, ख़बरों से बचाए रहता है। शाम होते-होते सब बिखरने लगता है। ख़बरों के छींटे कानों में पड़ते हैं और कानों से खून रिसने लगता है। अंधेरा छाने लगता है आँखों के आगे। नींद आ तो जाती है लेकिन बुरे ख़्वाब के चलते टूट जाती है। सोचती हूँ ख़्वाब ज्यादा बुरा था या हक़ीकत ज्यादा बुरी है।

नानी की कहानी में प्यार का जिक्र यूं होता था जैसे दाल में नमक का। बिना नमक की कोई दाल हुई भला, वैसे ही बिना प्यार के कोई ज़िंदगी हुई भला। सम्मान और प्यार हर इंसान की जरूरत है। रोटी भी बिना सम्मान के मिले तो बुरी ही लगती है ये बात और है कि मुफ़लिसी ने सम्मान को पीछे धकेलने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

जब सबको प्यार चाहिए तो ये नफ़रत कौन परोस रहा है। इतनी नफ़रत कि इंसान को इंसान ही न समझें। दुनिया की नफ़रत के बारे में ड्राइंगरूम या सोशल मीडिया पर मोर्चा खोलने या ज्ञान देने के बाद वक़्त मिले तो यह ज़रूर सोचना चाहिए कि एक व्यक्ति के रूप में हमारे भीतर कितनी हिंसा है। हमने कितनी बार हिंसक व्यवहार किया। किसके साथ किया। हिंसा को किस तरह समझा।

एक लंबी चुप्पी, उपेक्षा, उपहास क्या कम हिंसक होती है?

हमारे भीतर जो आक्रोश है वो किसके प्रति है? Powerless के प्रति ही तो। यही सारा खेल है। इसे समझने की बजाय इसमें फँसते जा रहे हैं हम सब। नफ़रत का यह चक्रव्यूह सबको घेरता जा रहा है। ऐसा चक्रव्यूह जिससे निकलने का रास्ता कोई नहीं जानता।

इस चक्रव्यूह की गिरफ्त बढ़ती जा रही है। हम एक अंधी सुरंग में जाते जा रहे हैं। धरती पर खून के छींटे बढ़ते जाते हैं और मन पर स्याह अंधेरा घिरता जाता है।

मैं खिलती हुई कोंपलों को देख ही रही थी कि खेल के मैदान में खेलता एक बच्चा ठोकर खाकर गिर गया। तभी एक दूसरे बच्चे ने आकर उसे उठाया और उसकी धूल झाड़ी।

मैं न तो गिरने वाले बच्चे का धर्म या जाति जानती थी, न उसे उठाने वाले बच्चे की। बस उन दोनों के चेहरे की मुस्कुराहट को और साथ खेलने को देख रही थी। तेज हवा के झोंके से वोगेनवेलिया के फूल शाखों से छूटकर मेरे काँधों पर आ बैठे थे।

क्या मुझे आज कुछ अच्छी नींद आएगी?

Saturday, February 28, 2026

हम दोनों प्यार में थे




अज़ान की आवाज़ के साथ मैंने 
पार किया रास्ता 
प्रार्थना की पंक्तियों के साथ 
तुम आगे बढ़े 

हम मिले गिरजे की उन सीढ़ियों पर 
जहां न जाने कितने नाउम्मीद
लोगों के कदमों के निशान थे 
कितनी उदासियों का ठौर था 
कितने कनफेशन सर झुकाये बैठे थे 

हमने एक दूसरे को थामने से पहले 
उन तमाम नाउम्मीदियों को थामा 
हमने एक दूसरे को चूमने से पहले 
उन सीढ़ियों को चूमा 

उतरते दिन की रोशनी 
ने हम दोनों को ढँक लिया था। 

हम दोनों सजदे में थे 
हम दोनों प्यार में थे।  


Tuesday, February 10, 2026

फ़रवरी का महीना और प्यार की बातें


प्रेम के इस महीने में 
ऐसे पुरुषों से सवाल करना 
लगभग गुनाह है 
जो अपना प्रेम स्त्रियों पर उलीचने को 
लगभग बेसब्र हुए जा रहे हैं 

जो मजे से हँसकर कहते हैं 
मेरे पास बहुत प्रेम है 
और मैं सारे जमाने की औरतों में 
बांटना चाहता हूँ 
उनसे यह पूछना 
कि इस सारे जमाने में 
उनके घर की स्त्रियाँ भी शामिल हैं क्या 
प्रेम के महीने का मज़ा किरकिरा कर देगा। 

कोई लॉन्ग ड्राइव पर ले जाए 
तो मुस्कुराकर चली जाइए 
उनसे यह न पूछिये कि मुझसे पहले 
जो लड़की कार की इस सीट पर बैठी थी 
वो अब कैसी है, क्या तुम्हें मालूम है? 

जब वो कहें कि 'तुम्हारी बहुत याद आती है' 
तब उनसे यह पूछना अभद्रता होगी कि 
यह मैसेज अभी-अभी तुमने कितनों को भेजा है 

जब वो आपको प्रेम भरी निगाहों से देख रहे हों 
आपकी हथेलियों को थामकर 
दूर तक साथ चलने के वादे कर रहे हों 
आप यह पूछने की गुस्ताखी कैसे करेंगी 
कि जिसे जीवन भर साथ चलने के वादे के साथ 
घर लाये हो, उसका क्या?

जब वो रिश्ते में ईमानदार होने की बात कहें 
तो बस मुस्कुराइये यह सोचते हुए कि 
उनका आपके साथ होना
उनकी बेईमानी का पहला सुबूत है

आखिर यह प्रेम का महीना है 
प्रेम के महीने में सवाल नहीं पूछे जाते 
प्रेम किया जाता है। 

लेकिन, यह सबकुछ क्या सचमुच प्रेम है 
हमेशा और प्रेम के इस महीने में भी  
यह सवाल सिर्फ खुद से पूछना मेरी जान। 

Saturday, February 7, 2026

पापा अब ठीक हो रहे हैं


सुबहें फिर से नज़र आने लगी हैं। रातों का अंधेरा अब डरा नहीं रहा। दूरियों के कारण रुकती हुई सांसें अब बेहतर हैं, जब पिता की कलाई हाथ में है। पापा अब ठीक हो रहे हैं। वो ठीक हो रहे हैं तो बिखरा हुआ जीवन सम पर लौट रहा है। शुभचिंतकों की शुभकामनाएं और डॉक्टर्स के एफर्ट्स मिलकर काम कर रहे हैं।

एक सप्ताह हुआ। हाँ, पिछले शनिवार यानि 31 जनवरी की शाम, पापा को हार्ट अटैक आया। एक ही पल में सब उलझ गया। उदास या परेशान होने का समय कहाँ होता है उस वक़्त, उस वक़्त तो बस संभालने का समय होता है। परेशान होना का जिम्मा उन्हें मिलता है जो दूर होते हैं। देहरादून से लखनऊ पहुँचने का समय इतना लंबा कभी नहीं लगा। राहत थी कि भाई है, सब ठीक कर लेगा, बड़ी राहत यह भी कि वो अकेला नहीं है उसके दोस्तों की पूरी फौज है उसके साथ, राहत थी कि माँ अकेली नहीं है इस गाढ़े वक़्त में। राहत कि भाभी मुझसे पहले पहुँच चुकी थी। इन तमाम राहतों ने हौसला दिया और पापा के पास पहुँचने तक का समय तनिक आसान किया।

पापा के दोस्तों ने साहस दिया, साथ दिया।

अब पापा ठीक हो रहे हैं। घर आ गए हैं। बड़ी मुसीबत आई थी...लेकिन अब जबकि सब ठीक होने की तरफ है, सोचती हूँ, तो पापा की मुस्कुराहट हौसला देती है और उनका वो सर्जरी के बाद चेतन होते ही किताब और चश्मा मांगना भी गुदगुदाता है।

हम सब असल में पापा की हिम्मत से बने हैं, उनके ही हौसले से चलते हैं। पापा के शीघ्र स्वास्थ्य लाभ के लिए आप सब की शुभकामनाएँ लगातार चाहिए।

इस दौरान जिन लोगों के फोन नहीं उठा सके उनसे क्षमा, उम्मीद है समझेंगे आप।

Saturday, January 24, 2026

नानी कहती थीं...


नानी कहती थीं कि बिटिया 
कुछ बातों के बारे में लोग बात करेंगे नहीं 
कुछ बातों के बारे में बात कर नहीं पाएंगे   
और जिन बातों के बारे में बात करेंगे  
वो लगभग निरर्थक होंगी 
जो बातें निरर्थक होंगी 
वो सबसे ज्यादा सुनी जायेंगी।  

सबसे पीड़ित व्यक्ति 
अपनी पीड़ा की बात नहीं सुनेगा 
उसके सामने दूसरे की पीड़ा को 
मनोरंजन बनाकर परोस दिया जायेगा  
वो अपनी भूखी अंतड़ियों को 
बांधकर
हिंसा के दृश्यों में उगाये गए 
आनंद के सागर में गोते लगाएगा।   

वो यह नहीं समझ पाएगा कि वो जो दूसरा है 
जिसकी पीड़ा में ढला मनोरंजन उसे 
गुदगुदा रहा है 
वो और कोई नहीं, वो खुद है 

नानी कहती थीं  कि 
देखना, बाज़ार में सबसे ज्यादा दुख बिकेगा 
लेकिन दुख टिकेगा नहीं 
दुख की कमी सरकार पड़ने नहीं देगी 
दुख को मनोरंजन में बदलने का काम 
संसद तक जा पहुंचेगा। 

देखना एक दिन मनुष्य की पीड़ा चुटकुला हो जाएगी 
और चुटकुला सुनते हुए लोगों को देखना दुख होगा। 

नानी कहती थीं...