Tuesday, June 11, 2019

जब भी तू आये जगाता हुआ जादू आये...



चाँद एकदम ठीक से सज गया है खिड़की में. न कम न ज्यादा, न रत्ती भर दाएं, न रत्ती भर बाएं खिड़की के ठीक सामने। सामने वाले पेड़ के कोने से झांकता. मैं उसे देख सुकून की सांस लेती हूँ. भीतर की सूखी नदी को नमी महसूस होती है. भागते-भागते थक चुके पैरों पर उभर आये छालों को जैसे मरहम मिला हो. तेज़ हवा का झोंका करीब आकर बैठ गया है. बीती हुई शाम की खुशबू मोगरे के फूलों में बसी हुई है. मोगरे जो पास ही कहीं खिले हैं. वो दिख नहीं रहे, महसूस हो रहे हैं. इश्क़ की तरह.

गोमती के किनारे से गुजरते हुए नदी में पांव डालकर बैठने की जिस इच्छा को पाला पोसा था उसे हरिद्वार में गंगा में पांव डालकर घंटों बैठकर पूरा होते देखना सपना नहीं था. सोचती हूँ कि सपना क्या था आखिर. मेरी आँखें छलक उठती हैं कि मेरा कोई सपना नहीं था. न है. बस कि नन्हे नन्हे लम्हों को शिद्द्त से जीने की इच्छा थी. बारिशों को पीने की, समंदर के किनारों पर घंटों पड़े रहनी की इच्छा जो अवचेतन में ही पड़ी रही होगी शायद। कि जब बारिश ने मुझे अपनी गिरफ्त में लिया तब मुझे अपनी इच्छा का इल्म हुआ, जब समंदर ने किनारे से उठाकर भीतर फेंक दिया तब समझी कि आह यह भी कोई इच्छा थी भीतर.

हमेशा जीकर ही जाना है अपनी इच्छाओं को, जी चुकने के बाद या कभी-कभी जीते हुए भी. जीने से पहले किसी इच्छा को जाना होता तो उसका पीछा किया होता. सपने खूब देखने चाहिए कहते हुए भी खुद के सपनों का पता नहीं लगा सकी.

आज फिर ऐसी ही किसी अनजानी इच्छा के भीतर हूँ. उसके भीतर होते हुए, उसे जीते हुए उसे जीने के लिए जूझते हुए, थकते हुए, निढाल होते हुए यूँ चाँद देखने का सुख मेरा सपना तो नहीं था. फिर क्योंकर मैं ऐसी घर की तलाश में भटक रही थी जिसकी खिड़की से चाँद दिखता हो.

वो सपने जो डरकर हम देखते नहीं वो अपना तिलस्म गढ़ लेते हैं, वो बैकडोर इंट्री लेते हैं. मैं इन दिनों ऐसे ही किसी अनदेखे सपने की जद में हूँ. वो सपना जो मेरा नहीं था लेकिन जिसमें होने का सुख मेरा ही है.

मेंहदी हसन को सुनना इस सपने का उन्वान है. गहरी ख़ामोशी है आसपास, 'जब भी तू आये जगाता हुआ जादू आये... अरसे बाद यह आवाज कानों में घुल रही है. यह चुराया हुआ लम्हा है, या बहुत मेहनत से उगाया हुआ. यह लम्हा बहुत छोटा है लेकिन इसने मुझे थाम लिया है. मुझे अपने खुद के पास वापस लौटने की इच्छा वापस जागती हुई नज़र आ रही है. खुद को छूकर देखती हूँ. कोई सिसकी फूटती है... कितनी दूर निकल गयी हूँ खुद से. कोई नहीं कहता कि 'लौट आओ, मत जाओ... ' फिर मैं दूर जाती ही जाती हूँ किसी रोबोट की तरह.. लेकिन ये चाँद मेरा रास्ता रोके खड़ा है आज. मेरी खिड़की के ठीक सामने टंगा चाँद। मेरे कमरे से नज़र आता चाँद.

मैं बहुत रोना चाहती हूँ. बहुत सोना चाहती हूँ. थोड़ा सा जीना चाहती हूँ बहुत सारा मरना चाहती हूँ. कि मेरी हथेलियों में कोई लकीरें नहीं, मेरी आँखों में कोई ख्वाब नहीं बस कि माथे पर चाँद का टीका है...

पांव का दर्द टप टप कर रहा है. यह दर्द दिल के दर्द से कितना कम है. मैं न दुखी हूँ न उदास हूँ बस मैं हूँ... बाद मुदद्त।


(इश्क़ शहर, घर)

Wednesday, May 15, 2019

मेरा कोना भीग रहा है


जैसे किसी सपने में आँख खुली हो. जैसे मौन में कोई बात चली हो. खामोश बात धीमे धीमे सुबह की ओसभरी घास पर चलते हुए. मैं इस मौन को सुन रही हूँ. ठीक ठीक सुन नहीं पा रही हूँ शायद. जितना सुन पा रही हूँ उसमें असीम शांति है.

सामने लीची, आम और अनार के पेड़ भीग रहे है. मेरा शहर बरस रहा है. भीतर भी, बाहर भी. भीतर ज्यादा बरस रहा है. भीतर सूखा भी ज्यादा हो गया है. मैं बाहर झरती बारिश की आवाज में डूबी हूँ. सामने जो गार्डन है जिसकी बेंच पर रात में बैठकर कुछ देर खुद से बात करना अच्छा लगता है वो भी भीग रही है. कबूतर भीग रहे हैं और पांखें खुजला रहे हैं. झूले भीग रहे हैं. बच्चे स्कूल गये हैं. स्त्रियाँ घर की साफ सफाई में लगी हैं. ऑफिस जाने वाले ऑफिस जाने की तैयारी में लगे हैं. किसी के पास बारिश को सुनने की फुर्सत नहीं. हालाँकि सूखा सबके भीतर है. मेरी चाय के पास मेरे प्रिय कवि हैं विनोद कुमार शुक्ल 'कविता से लम्बी कविता' बनकर. जीवन से लम्बा जीवन, बारिश से ज्यादा बारिश, उदासी से ज्यादा उदासी और सुबह में ज्यादा सुबह का उगना महसूस हो रहा है.

बरसों की थकान है पोरों में. बहुत सारे सवाल हैं आसपास. ढेर उलझनें, लेकिन इस पल में कुछ भी नहीं. खुद मैं भी नहीं. स्त्री के लिए एक कोना होना जरूरी है. स्त्रियों अपने लिए, गहना, जेवर, महंगी साड़ियाँ बाद में लेना पहले माँगना या ले लेना अपना एक कोना. यह कोना जीवन है. इस कोने में हमारा होना बचा रहता है. आज जीवन के मध्य में एक सुबह के भीतर खुद को यूँ देखना मीठा लग रहा है. इस इत्ती बड़ी सी दुनिया में यह मेरा कोना है, मेरा घर. मेरा कोना बारिश में भीग रहा है...सूखा बहुत हो गया था सचमुच. यह भीगना सुखद है.

Wednesday, May 1, 2019

घर


रंग भरे जा रहे हैं दीवारों पर. दीवारें जिन पर मेरा नाम लिखा है शायद. कागज के एक पुर्जे पर लिखा मेरा नाम जिस पर लगी तमाम सरकारी मुहरें. जिसके बदले मुझे देने पड़े तमाम कागज के पुर्जे. 'घर' शब्द में जितना प्रेम है शायद वही प्रेम दुनिया के तमाम लोगों को घर बनाने की इच्छा से भरता होगा. मेरे भीतर ऐसी कोई इच्छा नहीं रही कभी. बड़े घर की, बड़े बंगले की, गाडी की, ये सब इच्छाएं नहीं थीं कभी. लेकिन इन सब इच्छाओं के न होने के बीच यह भी सोचती हूँ कि मेरी इच्छा क्या थी आखिर. जिन्दगी के ठीक बीच में आकर यह सोचना बहुत अजीब है कि मेरी कोई इच्छा ही नहीं थी. कोई सपना भी नहीं. बस इतना कि जो लम्हा है उसे भरपूर जिया जाय. जीवन में हरियाली खूब हो, आसपास कोई नदी हो, समन्दर हो, चिड़िया हो. शायद चारदीवारों वाले घर से बड़ी ख्वाहिश थी यह. हर मोहब्बत भरी आवाज मुझे मेरा घर लगने लगती थी.

आज मेरा खुद का घर है एक चिड़ियों की आवाजों से भरे इस खूबसूरत शहर में. मुझे इस शहर की हवाओं से प्यार है. यहाँ की सड़कों से प्यार है. मैंने कुछ नहीं किया सच, यह इस शहर से हुए प्यार का असर ही रहा होगा जिसने पहले आवाज देकर बुलाया और फिर इसरार करके बिठा लिया. मैं ठहर गयी हूँ इस शहर में. मैं चाहती हूँ कि दुनिया के किसी भी कोने में कोई भी किसी मोहब्बत भरी आवाज को अनसुना न करे. हर पुकार कोई जवाब आना चाहिए.

भीतर कई तरह के मंथन चल रहे हैं. दीवारों पर रंग चढ़ाये जा रहे हैं. मेरी पसंद के रंग. वो मेरी पसंद का रंग कौन सा है पूछ रहे हैं कौन सा रंग मैं कहती हूँ, जंगल, नदी, सवेरा. वो मेरा मुंह देखते हैं. मैं झेंप जाती हूँ. मुझे दुनियादारी नहीं आती. जब प्यार आता है बहुत तो रोना भी आता है बहुत. दुःख में कम आता है रोना. प्यार में बहुत आता है, फूट फूटकर रोने को जी चाहता है. हालाँकि जब कोई रास्ता नहीं दिखाई देता आगे का तब भी रोना आता है, बिना आंसुओं वाला रोना. ये वाला रोना बहुत तकलीफ देता है.

आजकल कई तरह का रोना साथ रहता है. हर वक़्त. इसमें कोई भी सुख का रोना नहीं है. हालाँकि मेरा घर मेरे रंग में ढलने को तैयार है.

मैं उस घर की मोहब्बत में हूँ जो कागजों में मेरा नहीं था. लेकिन इसी घर ने मुझे सहेजा भी, सम्भाला भी. मैं एक सहमी सी नन्ही बच्ची की तरह आई थी यहाँ. एक सूटकेस लिए. इस घर में मैं बड़ी हुई. चलना सीखा, बोलना सीखा. इसकी दीवारों में मेरे आंसुओं की नमी है. एक-एक कोना मुझे हसरत से देख रहा है. यह घर मेरे जीवन का टर्निंग प्वाइंट है. जब कोई नहीं था तब इसने हाथ थामा. रोने की जगह बना, हंसने की वजह भी. अब यह घर मेरा नहीं रहेगा. इस घर की दीवारों पर मेरी पसंद के रंग भी नहीं थे. लेकिन इस घर ने मुझे बहुत दुलराया है. छूटना आसान नहीं होता. लेकिन छूटना तय होता है.

अभी उस नए घर से मेरा रिश्ता बना नहीं है. सिर्फ कागजों पर बना है रिश्ता. यह बिलकुल उसी तरह है कि ब्याह हो गया है, अभी प्यार हुआ नहीं है. उम्मीद है प्यार भी हो जायेगा. लेकिन एक प्यार जो बिना रिश्ते के हो चुका वो कभी नहीं जायेगा जीवन से. इस घर से प्यार घर जो असल में मेरा नहीं था लेकिन शायद घर भी जानता होगा कि वो मेरा ही था हमेशा से...छूटना आसान नहीं. जाने क्या क्या छूट रहा है हालाँकि रात दिन सामान पैक हो रहा है...मैं जानती हूँ कुछ भी पैक नहीं हो पायेगा. सब छूट जाएगा...

Tuesday, April 30, 2019

म्यूजिक टीचर के असर में रहना


जैसे बुरे दिनों के लिए अम्मा छुपा के रखती थीं रसोई के डिब्बों में कुछ रूपये, जैसे बाबा बचा के रखते थे भीतर वाले खलीते (जेब) में गाढे वक़्त के लिए कुछ मुस्कुराहटें और ढेर सारी हिम्मत. जैसे हम बचपन में अपनी खाने की थाली में से बचाकर रख लेते थे बेसन का लड्डू फिर उसे सबके खा चुकने के बाद धीरे धीरे स्वाद लेकर खाते थे ठीक वैसे ही रखती हूँ अपने प्रिय लेखक के लिखे को. जब दिन का हर लम्हा आपस में गुथ्थम गुथ्था कर रहा होता है, जब सुबहों की शामों से एकदम नहीं बनती, जब नहीं लगता किसी काम में मन, न पढ़ा जाता है कुछ, न सूझता है कुछ भी लिखना. तब इस लेखक के लिखे को निकालती हूँ और जिन्दगी अंखुआने लगती है. लेखक यकीनन मानव कौल हैं. 'ठीक तुम्हारे पीछे' से बहुत पहले, 'प्रेम कबूतर' से भी बहुत पहले से वो मेरे प्रिय लेखक हैं. प्रिय निर्देशक भी. अब देख रही हूँ कि वो प्रिय अभिनेता भी बनने लगे हैं. इतनी लम्बी भूमिका है हाल ही में देखी उनकी फिल्म 'म्यूजिक टीचर' के बारे में कुछ कह पाने की कोशिश की.

सोचा था 19 को नेटफ्लिक्स पर रिलीज़ होते ही देखूँगी इसे, लेकिन जिन्दगी सामने आकर हंस दी यह कहते हुए कि ' तुम नहीं मैं डिसाइड करुँगी तुम कब क्या करोगी.' और मेरे पास सर झुकाने के सिवा कोई चारा नहीं था. तमाम लोग फिल्म देखकर अपनी राय देते रहे मैंने कुछ नहीं पढ़ा, किसी को नहीं. यह फिल्म मेरे लिए बुरे दिनों की खर्ची थी, इसे संभालकर खर्चना था. बेहद उलझे और निराश दिनों में उम्मीद थी कि एक फिल्म है जो मुझे डूबने से बचा लेगी. कुछ है जो बचा हुआ है. फिर एक रोज तमाम मसायलों को दूर रखकर फिल्म देखना शुरू किया. फ़ोन स्विच ऑफ  करके भी कि कोई भी व्यवधान फिल्म की रिदम तोड़ दे यह नहीं चाहती थी.

सार्थक दास गुप्ता ने बेहद खूबसूरत फिल्म बनाई है. फिल्म का पहला फ्रेम जिस तरह खुलता है वो आपका हाथ पकडकर अपने साथ एक अलग दुनिया में ले जाता है. बेनी की दुनिया में, बेनी जो झरना है, गीत है, पहाड़ है, जंगल है, पुल है, नदी है. बेनी जो संगीत का शिक्षक नहीं समूचा संगीत है. पूरी फिल्म हर दृश्य में जिस तरह प्रकृति के अप्रतिम सौन्दर्य को लेकर सामने आती है वो मंत्रमुग्ध करता है. वो पहाड़ी रास्ते वैसे ही हैं जैसा होता है जीवन. देखने में बेहद खूबसूरत लेकिन चलने में साँस फूल जाय. पर्यटक का पहाड़ वहां के रहनवासियों के पहाड़ से इतर होता है. फिल्म के पहाड़,  जंगल , धुंध में डूबी वादी पर्यटक की नहीं है वहां के रहनवासियों की है.

स्मृतियों का कोलाज बनता बिगड़ता रहता है. बेनी इस फिल्म के हीरो हैं लेकिन एक हीरो और है फिल्म में इसके सिनेमेटोग्राफर कौशिक मंडल. ओह इतने सुंदर दृश्य, इतना मीठा संगीत जैसे कोई जादू. अमृता बागची ज्योत्स्ना के रोल में और बेनी के रोल में मानव कौल बेहद इत्मिनान वाले सुंदर दृश्य रचते हैं. फिल्म में कहीं कोई हडबडी नहीं. सब इत्मिनान से चलता है. जैसे आलाप हो कोई...या कोई तान.

कुछ दृश्य हैं जो कभी नहीं भूलूंगी. एक दृश्य जिसमें ज्योत्सना, बेनी से पूछती है 'मेरे कान के झुमके कैसे लग रहे हैं? 'फिर आगे पूछती है 'मैं कैसी लग रही हूँ?' सादा से इन सवालों के जवाब में बेनी का गाढ़ा संकोच, शर्मीलापन उनके भीतर तक की सिहरन को बयां करने में कामयाब है.
एक दृश्य जहाँ किसी का अंतिम संस्कार होने के बाद बेनी की पड़ोसन गीता (दिव्या दत्त) कुछ चीज़ें जला रही है. चीज़ें कहीं नहीं है, आग भी जरा सी है लेकिन धुआं ...ओह उस दृश्य में वह धुआं हीरो है जिसके बैकग्राउंड में बेनी और गीता हैं. दुःख के उन पलों में दो उदास लोग एक बहुत घना रूमान रचते हुए. वो धुआं कितना कुछ कहता है. मारीना त्स्वेतायेवा की  'द  कैप्टिव स्पिरिट' की याद हो आती है. काफ्का की याद उन्हीं दृश्यों में घुलने लगती है. वह बेहद खूबसूरत दृश्य है.
एक और दृश्य जिसमें बेनी बहन की शादी का कार्ड पोस्टबॉक्स में डालने की न डालने की दुविधा को कुछ लम्हों में दर्शाता है. वो कुछ सेकेण्ड भीतर की पूरी जर्नी की डिटेलिंग देते हैं.

दिव्या दत्त के बारे में अलग से बात किया जाना बेहद जरूरी है कि एक तो वो मुझे प्रिय हैं हमेशा से. जिस भी फिल्म में जब भी वो हुई हैं लगता है वो उसी किरदार के लिए जन्मी हैं. इतना इकसार हो जाती हैं वो और सच कहूँ तो वो जब तक रहती हैं सबको ओवरलैप कर लेती हैं. कमाल की अदायगी. इस फिल्म में भी गीता की भूमिका में ऐसा ही असर छोड़ जाती हैं. उनके रोल पर अलग से बात हो सकती है जिसमें बहुत सारे स्त्री विमर्श के शेड्स समाहित हैं.

मानव कौल ने इस फिल्म में अच्छा अभिनय किया है यह कहना ज्यादती होगी क्योंकि मुझे ऐसा लगा कि उन्होंने अभिनय किया ही नहीं है बल्कि जिया है पूरी फिल्म को, हर दृश्य को, हर संवाद को. वो फिल्म में घुले हुए हैं. यह फिल्म मानव कौल के सिवा और कौन कर सकता था भला. यह उन्हीं की फिल्म है. हर फ्रेम में, हर संवाद में और हर मौन में मानव एकदम परफेक्ट हैं.

अमृता बागची फ्रेश हैं. वो मानव के साथ स्क्रीन शेयर करते हुए अच्छी लगती हैं और जितनी उनकी भूमिका है उसे ठीक से करने का प्रयास करने का पूरा प्रयास करती हैं.

सार्थक दासगुप्ता के और काम को देखने की इच्छा बढ़ रही है. फिल्म के तमाम और पहलुओं पर बात हो सकती है, तमाम डिस्कोर्स जो रचे बसे हैं लेकिन अभी उन पर बात करने का मन ही नहीं है. बस कि कविता सी झरती इस फिल्म के असर में रहने का मन है कुछ दिनों.


Monday, April 22, 2019

'ये कविताओं के पंख फ़ैलाने के दिन हैं '


'क' से कविता यह नाम नया है लेकिन इस भावना वाला काम तो मैं तकरीबन 60-65 सालों से कर रहा हूँ कि दूसरों की कविताओं को सुनाना. वहां भी दूसरों की कविताओं को सुनाना जहाँ मुझे आमंत्रित किया गया है मेरी अपनी कविताओं को सुनाने के लिये क्योंकि मुझे लगता है कि जो मुझसे भी अच्छी कवितायेँ लिखी गयी हैं वो भी उन सबको सुनानी चाहिए जो कविताओं से प्रेम करते हैं.' 
- नरेश सक्सेना 28 अप्रैल 'क' से कविता की दूसरी सालाना बैठक में 

'क से कविता क से क्या कहने. मेरा जो मानना है कि कविता को जन तक कैसे ले जाएँ उसका यह बहुत अच्छा उपक्रम है. जनता को कविता की समीक्षा करने का मौका मिलता है मेरे ख्याल से यह बहुत बड़ी बात है. कविता अगर जिन्दा रहेगी तो लिखने से ज्यादा ऐसे कार्यक्रमों से जिन्दा रहेगी. नये नए ज्यादा से ज्यादा लोगों का कार्यक्रम से जुड़ना ही कार्यक्रम की उपलब्धि है.
- लाल बहादुर वर्मा 28 अप्रैल 'क' से कविता की दूसरी सालाना बैठक में 

मुझे कार्यक्रम में आकर बहुत अच्छा लगा. मैं देहरादून का हूँ कविता के कार्यक्रम में इतने लोगों का जमा होना, बराबर बने रहना है यह बड़ी बात है. कार्यक्रम का कंटेंट, संचालन, पूरी बुनावट में जो तारतम्यता थी वो कमाल की थी. इसे जिस सादगी जिस सहज भाव से चलाया जा रहा है इसे ऐसे ही चलने दें.'
- हमाद फारुखी 28 अप्रैल 'क' से कविता की दूसरी सालाना बैठक में 

कविता प्रेम, सच्चाई, मनुष्यता की ओर ले जाती है. हम सबको मिलकर स्कूलों में कॉलेजों में इस तरह के कार्यक्रम को जाना चाहिए और हम सबको छात्रों को इससे जोड़ने का प्रयास करना चाहिए.-
इन्द्रजीत सिंह 28 अप्रैल 'क' से कविता

एक बेहद सादा सा, सुंदर सा भाव था मन में कि कोई ऐसा ठीहा हो जहाँ दो घड़ी सुकून मिले. रोजमर्रा की आपाधापी से अर्ध विराम सा ठहरना हो सके. जहाँ होड़ न हो, जहाँ तालियों का शोर न हो, जहाँ छा जाने की इच्छा न हो, बस हो मिलना अपनी प्रिय कविताओं से और कविता प्रेमियों से. (अपनी कविता के प्रेमियों से नहीं).और संग बैठकर पीनी हो एक कप चाय. इस विचार ने बहुत मोहब्बत के साथ कदम रखा शहर देहरादून ने 23 अप्रैल 2016 को और दो साल पूरे होते होते यह उत्तरकाशी, श्रीनगर, हल्द्वानी, रुद्रपुर, खटीमा, टिहरी, रुड़की, पौड़ी, अगस्त्यमुनि, गोपेश्वर, लोहाघाट (चम्पावत), पिथौरागढ़,बागेश्वर और अल्मोड़ा तक इसकी खुशबू बिखरने लगी. 

कब सुभाष लोकेश और प्रतिभा पीछे छूटते चले गए और रमन नौटियाल, भास्कर, हेम,पंत शुभंकर, ऋषभ, मोहन गोडबोले निशांत, प्रमोद, विकास, राजेश, नीरज नैथानी, नीरज भट्ट, सिद्धेश्वर जी, प्रभात उप्रेती, अनिल कार्की, महेश पुनेठा, मनोहर चमोली, गजेन्द्र रौतेला, भवानी शंकर, पियूष आदि इस कारवां को आगे बढ़ाने लगे पता ही न चला. गीता गैरोला दी तो सबकी प्यारी लाडली दी हैं उन्होंने इसकी मशाल जिस तरह थामी कि मोहब्बत की आंच थोड़ी और बढ़ गयी. 

देहरादून में नूतन गैरोला, राकेश जुगरान, नन्द किशोर हटवाल, नीलम प्रभा वर्मा दी ने लगातार अपने प्रयासों से और स्नेह से इसे सींचा. कल्पना संगीता, कान्ता, राकेश जुगरान, नन्द किशोर हटवाल, सतपाल गाँधी, सुरभि रावत, स्वाति सिंह, नन्ही तनिष्का सहित सैकड़ों लोग नियमित भागीदार बनते गये. कार्यक्रम की सफलता असल में शहर की सफलता है. देहरादून को अब बारिशें ही नहीं कवितायेँ भी सींच रही हैं. उत्तराखंड के अन्य शहरों को भी.

इस कार्यक्रम को व्यक्ति का नहीं, समूचे शहर का होना था. व्यक्तियों को इसमें शामिल होना था. कहीं पहुंचना नहीं था, कुछ हासिल नहीं करना था बस कि हर बैठकी का सुख लेना था, लोगों से मिलने का सुख, सुकून से दो घड़ी बैठने का सुख, प्यारी कविताओं को पढने का सुख, सुनने का सुख.

बोलने और लिखने की होड़ के इस समय में यह पढ़ने और सुनने की बैठकी बनी. लेखकों की नहीं पाठकों की बैठकी. शहरों ने इस कार्यक्रम को अपने लाड़ प्यार से सींचा. जो लोग बैठकों में शामिल होने आये थे वो इसके होकर रह गए. अब घर हो या दफ्तर कुछ भी प्लान करते समय महीने के आखिरी इतवार की शाम पहले ही बुक कर दी जाने लगी. बच्चे, युवा, साहित्यकार, बिजनेसमैन, गृहणी, शिक्षक सब शामिल हुए. सबने अपनी प्रिय कवितायेँ पढ़ीं, कितनों ने पहली बार पढ़ीं. कितनों ने ही यहाँ आकर समझा पढने का असल ढब. सुना कि किसी को कोई कविता क्योंकर अच्छी लगती है आखिर.

यह कोई नया विचार नहीं था क्योंकि बहुत से लोग मिले जिन्होंने कहा कि ऐसा तो हम सालों से कर रहे थे. कुछ बैठकों में शामिल भी हुए हम कुछ के बारे में सुना भी. महेश पुनेठा पिथौरागढ़ में 'जहान-ए-कविता' चला ही रहे थे. भास्कर भी ऐसे तमाम प्रयोग करते रहे थे. हेम तो हैं ही प्रयोगधर्मी. फिर क्या ख़ास है इन बैठकों में. खास हुआ सबका जुडना. एक नयी जगह में बैठकी की सूचना परिवार में नए सदस्यों की आमद सा लगता.

उत्तराखंड ने इन बैठकों को अलग ही ऊँचाई दी. यहाँ हमें 'मैं' से दूर रहने वाली बात पर ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी. जो साथी शामिल हुए वो सब स्वयं 'मैं' से बहुत दूर थे दूर हैं. न शोहरत की तलाश, न पीठ पर किसी थपथपाहट की उम्मीद बस कि हर बैठक के बाद होना थोडा और समृद्ध, होना थोड़ा और मनुष्य, और तरल, और सरल.

इन बैठकों में शामिल लोग नाम विहीन से हो जाते थे, चेहरा विहीन. बिना तख्ती वाले लोग इतना सहज महसूस करते कि बैठकों का इंतजार रहने लगा. शहर ने बाहें पसारीं और कार्यक्रम को अपना लिया. हमें न कभी जगह की कोई परेशानी हुई न चाय की. जबकि न हमने चंदा किया न किसी से फण्ड लिया. सब कैसे इतनी आसानी से होता गया के सवाल का एक ही जवाब था प्रेम, कविताओं से प्रेम.

देहरादून में 28 अप्रैल को हुई दूसरी सालाना बैठक असल में राज्य स्तरीय बैठक न हो पाने के बाद आनन-फानन में मासिक बैठक से सालाना बैठक में बदल दी गयी. फिर न पैसे थे न इंतजाम कोई और न ही वक़्त. ज्यादातर साथी शहर में ही नहीं थे. लेकिन जब शहर किसी कार्यक्रम को अपना लेता है तो आपको ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ती. और यह किसी कार्यक्रम की किसी विचार की सबसे बड़ी सफलता होती है कि उसे व्यक्तिपरक होने से उठाकर समाज से जुड़ जाए. शहर के सारे लोग इसकी ओनरशिप लेते हैं. सबकी चिंता होती है कि कोई कमी न रह जाए. सब मिलकर काम करते हैं, सब मिलकर एक-दूसरे के होने को सेलिब्रेट करते हैं. मेहमान कोई नहीं होता, मेजबान सब. कोई मंच नहीं, माल्यार्पण नहीं, मुख्य अतिथि नहीं, दिया बाती नहीं, किसी का कोई महिमामंडन नहीं. जेब में चवन्नी नहीं थी लेकिन दिल में हौसला था तो निकल पड़े थे सफर
में और देखिये तो कि आज दो बरस में पूरा उत्तराखंड कविता की इन भोली बैठकियों से रोशन है.

क' से कविता की दूसरी सालाना बैठक में लोग मुम्बई से भी आये थे, दिल्ली से भी लखनऊ से भी और उत्तरकाशी से भी. कबीराना थी शाम...फक्कड़ मस्ती, गाँव दुआर पे कहीं बैठकर, चौपाल में, कुएं की जगत पर खेत के किनारे मेड पर बैठकर भी जैसे कबीरी हुआ करती होगी वैसी हो चलीं हैं कविताओं की ये बैठकियां.