Thursday, June 11, 2026

माँ बहन : हँसाएगी नहीं चुभेगी


फ़िल्म का पहला दृश्य देखकर ही मुझे सिहरन हुई, जब एक लड़की फ़िल्म की जया आईवीएफ के लिए डॉक्टर से बात कर रही है। पति को भी बिना बताए वो पति के ही वीर्य से गर्भ धारण करना चाहती है। ठीक उसी वक़्त उसके ससुर का फोन आता है, चाय पीने के लिए बहू का इंतज़ार करते ससुर उसे कहते हैं वो किसी और के हाथ की चाय नहीं पीते।

उफ़्फ़...यह तुम्हारे हाथ का खाना, तुम्हारे हाथ की चाय....ज़िंदगी निगल रखी है इसने। वो रोटी बनाती है। बनाती जाती है, बनाती जाती है। उस घर की घड़ी में समय के पीछे से रोटी झाँकती है। कुछ दृश्यों को जान बूझकर नाटकीय बनाया गया है लेकिन वह नाटकीयता मारक है, चुभती है। हंसी नहीं आती, कुछ कचोटता है। 

दूसरा दृश्य, माधुरी दीक्षित यानि रेखा के पाँव के नीचे एक कागज आता है जिस पर लिखा है, 'क्या आप अकेले हैं?' यह अकेलेपन को मसालेदार नज़रिये से देखने और भरने वाला विज्ञापन है, जिसे वह रौंदकर आगे बढ़ जाती है। फ़िल्म की कहानी का मर्म क्या होने वाला है,  यहीं से समझ आने लगा था। 

फ़िल्म एक डार्क ह्यूमर है जो हँसाएगा कम परेशान ज़्यादा करेगा। अन्यथा यह आपको इरिटेट करेगा। यह बात सही है कि कथानक के घनत्व को फ़िल्म का ट्रीटमेंट ठीक से डिफ़ाइन करने में कई जगह चूकता है फिर भी मुझे लगता है उस चूक के बावजूद काफी कुछ कह जाता है। 

फ़िल्म के तीन मुख्य पात्र, जया सुषमा और रेखा हैं, बाद में इसमें हेमा भी जुड़ती है। सबके जीवन की व्यथा, अकेलापन, कुंठा, संघर्ष उनके हंसी ठिठोली वाले किरदारों में समाहित है। रेखा का गुनाह है उसके कपड़े, उसका बिंदास होना और सबसे ऊपर उसका स्त्री होना, जिसका आगे चलकर सिंगल हो जाना। 

समाज के तमाम संस्कारी और चरित्रवान पुरुषों का लड़खड़ाना और फिर बनाना कई नई कहानियाँ जिसमें मसाला ही मसाला है। 

स्त्री अगर अकेली है, कमजोर है तो उसे समाज रोता हुआ, असहाय और दीन हीन ही देखना चाहता है। ऐसी स्त्री जिसे तमाम कंधों की ज़रूरत हो। ताकि तमाम बेरोजगार कंधों को रोजगार मिले। लेकिन जैसे ही स्त्री कमजोर होने के बजाय लड़ना और रोने बिसूरने के बजाय खुश रहना चुनती है वह किरकिरी हो जाती है, जिसे डायन से लेकर न जाने कितने नाम दिये जाते हैं। ज़ाहिर है उसका चरित्रहीन होना तो सबसे पहले है ही। 

इन्हीं कुछ मुद्दों की तरफ ले जाती है फ़िल्म। बेटियों की मेकिंग में भी माँ की जर्नी का कसैलापन शामिल है ही। 
वह तमाम कोशिश करती है सम्मान से अपनी बेटियों को पालने के लेकिन हर बार संस्कारी और चरित्रवान समाज उसे मजा चखाता है। 

घर, दुकान तोड़े जा रहे हैं और एक अकेली माँ अपनी दो छोटी बेटियों के साथ साँप सीढ़ी खेलते हुए बच्चों का ध्यान हटाने की कोशिश करती है। यह एक मेटाफर है जो काफी असर करता है। 

फ़िल्म के अंत में गुप्ता जी की पत्नी सब कुछ जानने के बाद पति को लेकर चुपचाप चली जाती है, यह खटक सकता है लेकिन मुझे खटकता नहीं, सच लगता है, यही हक़ीक़त है। स्त्रियों के पास न तो ज़्यादा च्वाइस है, न हिम्मत। बस उनकी गृहस्थी बनी रहे, बच्चों की ठीक से शादी हो जाये, सब ढंका मुंदा रहे। 

फ़िल्म तमाम पहलुओं को सामने लाती है, हालांकि यह बात सही है कि फ़िल्म और बेहतर हो सकती थी। लेकिन यह संभावना तो हमेशा रहती ही है। मास्टरपीस नहीं है फ़िल्म लेकिन देखी चाहिए और ठीक से देखी जानी चाहिए। 

फ़िल्म का गाना 'खोल पिंजरा' फ़िल्म का एसेंस है। 

Wednesday, May 27, 2026

कौन जात हो भाई- बच्चा लाल उन्मेष


एक लम्बी गहरी चुप, सदियों से दबी हुई सिसकी, शोषण की लम्बी और लगभग सामान्य मान ली गई परिपाटी को तोड़ने की कोशिश में लहूलुहान होती कवितायें हैं बच्चा लाल उन्मेष के संग्रह 'कौन जात हो भाई' में। ये कवितायें आपके सुख चैन में सुराख करेंगी, बेचैन करेंगी। जिस जीवन को हमने सामान्य मान कर स्वीकार कर लिया है उस स्वीकार्यता को खंडित करेंगी। ये कवितायें शोषण की लम्बी दास्तान का वह दस्तावेज़ है, जिसे झुठलाने में पूरा समाज और सरकार न जाने कबसे लगी है।

बच्चा लाल के पास कहन की जो बेबाकी है वह इन कविताओं की ताक़त है। वो दलित शोषण की बात को पूरी ताक़त से कहते हैं लेकिन इसमें कोई बेचारगी नहीं है। एक झुंझलाहट है, पीड़ा है जिसने अब गुस्से का, प्रतिकार का रूप ले लिया है।

कविताओं को पढ़ते हुए दोतरफा युद्ध नज़र आता है। एक दलितों के भीतर का संघर्ष। उन्हें यह समझना कि उनका पीड़ित होना नॉर्मल नहीं है, वे भी मनुष्य हैं और उन्हें भी जीवन जीने के समस्त अधिकार मिलने चाहिए। और दूसरा युद्ध है इसी बात को बाकी समाज को बताने का। इस बताने पर मिलने वाले उपहास, प्रताड़ना और अपमान के बावजूद अपने हक़ के लिए लड़ने का। इस लड़ाई में जो ज़ख्म मिलें, चाहे देह पर या मन पर उनसे टूटने की बजाय उसे अपनी ताक़त बनाने का काम बच्चा लाल ने अपनी कविताओं के ज़रिये किया है।

ये कवितायें पढ़ते वक़्त कुछ मांग करती हैं। मांग करती हैं कि आप जातिगत उच्चता की आलीशान पोशाक उतार कर इन्हें पढ़ें। इन्हें पढ़ते समय महसूस करें इसमें दर्ज शोषण की उस दास्तान को जो कविता कहानी में दर्ज होने भर से काफी ज्यादा गहरी है लम्बी है। और बात सिर्फ जातीय भेदभाव की भी नहीं है, बात है हर उस वजह की जो शोषण की बुनियाद बनती है।

इस समय में जब कुछ भी बोलना एक खास किस्म के राजनैतिक, सामाजिक खांचे में धकेल दिए जाने का जोखिम हो, इन कविताओं की सच्चाई, बेबाकी सहेजे जाने वाली वह आवाज है जिसमें से मद्ध्म सी उम्मीद झाँकती है।

कुछ टुकड़े जो मैंने अपनी किताब में अंडरलाइन किए-

रईसों ने बख़्श दी है जान, इतना काफी नहीं?
दे रहा आश्वासन है निज़ाम, इतना काफी नहीं?
('आश्वासन' से)

ईश्वर वह कर्जा है
जिसे गरीब आजीवन भरता है
सत्ता की तरह।
('सत्ता का ईश्वर' से)

तुम पूज्य नहीं हो हमारे ग्रन्थों में
तब भी नहीं थे और अब भी नहीं हो
तुम शूद्र थे, शूद्र हो और शूद्र ही रहोगे।
कुछ आएंगे तुम्हारे अपने, बुनियाद उठाने तुम्हें पढ़ाने
पर तुम हरक़त नहीं करोगे
क्योंकि तुम्हारा समाज
मंदिरों में जा-जाकर मूढ़ हो चुका है।
('क्योंकि तुम्हारी लत्त चलती है, बुद्धि नहीं' से )

तुम्हारे इंसान बनने की प्रक्रिया में जाति आड़े आ रही है
मर रही हैं संवेदनाएं और तमाम मानवीय संभावनाएं
इन्हें जगाने के लिए जाति का दंभ छोड़ना पड़ेगा
पर तुम नहीं छोड़ोगे दोस्त! दलित थोड़ी न हो।
('तुम क्यों झुकोगे दोस्त' से)

मनुष्य हो तो आगे आओ, जाति-धरम का भेद मिटाओ
संविधान में सबके लिए, बनी एक ही खाट है।
होगा तेरी लिए अफवाह, मेरा भोगा हुआ यथार्थ है।
('भोगा हुआ यथार्थ' से )

जिसने वहशी दरिंदों को एक बार भी नहीं टोका
वो मेरा भी खुदा हो, ये मुझे मंजूर नहीं।
('मुझे मंजूर नहीं' से)

हम अब भी अन्न उगाते हैं
वे अब भी अंग चबाते हैं
हैं गज़ब के भूखे लोग यहाँ
मेरा टूटा हल भी खाते हैं।
('हम तब भी अन्न उगाते हैं' से)
बच्चा लाल उन्मेष को उनकी कविताओं के लिए बधाई देते हुए मैं कामना करती हूँ कि उनकी सच कहने की, हालत से टकराने की ताक़त बची रहे।

Wednesday, May 20, 2026

मैं मिलने जाऊँगी

 


पिछले बरस मेरे जन्मदिन पर चमोली में मित्र ने एक पौधा लगाया था। सुना है वह पौधा अब बड़ा हो गया है।
एक रोज मैं उस पौधे से मिलने जाऊँगी। उस शहर में एक नदी बहती है,जो मेरी सहेली है। मैं उस नदी से मिलने जाऊँगी। उस शहर के मौसम ने मेरे गाढ़े दुखों में गुलाबी फूल खिलाये थे, मैं उस मौसम से मिलने जाऊँगी।

जिस मित्र ने मेरे नाम के पौधे को न सिर्फ लगाया उसे साल भर सहेजा, बड़ा किया मैं उसे मित्र से मिलने जाऊँगी।

एक दिन मैं स्नेह से भरे हर व्यक्ति से मिलने जाऊँगी।

Tuesday, May 19, 2026

आवाज़ भी एक जगह है


कल जन संस्कृति मंच ने देहरादून में मंगलेश जी की स्मृति में एक कार्यक्रम का आयोजन किया। सच कहूँ अरसे बाद किसी कार्यक्रम से इतना तृप्त होकर लौटी हूँ। तृप्ति का केंद्र मैंने खुद के लिए जिन चीजों में पाया है वे हैं स्नेह, सम्मान और अब तक जाने हुए में तनिक इज़ाफ़ा। कल की शाम इन तीनों से लबरेज़ रही।

आशुतोष, रविभूषण, ज़हूर आलम, दिगम्बर और राम जी राय (जी का सम्बोधन सबके साथ माना जाय) को सुनना सुखद था। कविता की लेयर्स को देखना, टटोलना, उसके भीतर और भीतर झांकना और कविता के मर्म तक पहुंचना सुखद था। जानना हमेशा ही कम होता है। हर बार लगता है, कितना तो कम जानते हैं हम। कल भी ऐसा ही सा दिन था।

इतने सारे कवियों ने इतना सुंदर सुवावस्थित कविता पाठ किया, आनंद हुआ। भरोसा हुआ कि हालात से बैचेन लोग कम भी नहीं हैं। प्रेम शंकर और मृत्युंजय ने क्या ही गज़ब का संचालन किया। यह उस संचालन की ही खूबी थी कि कार्यक्रम में इतने वक्ताओं के वक्तव्य और 20 कवियों के कविता पाठ से रचा बसा कार्यक्रम समय पर शुरू हुआ और समय पर खत्म हुआ।

न किसी कवि ने माइक पकड़कर पकड़े ही रहने की जिद की और ऐसा भी नहीं लगा कि बहुत हड़बड़ी हुई। तो यह संतुलन ख़ूबसूरत था। मदन चमोली शांति से सब संभाले भी रहे और लगने भी नहीं दिया कि कोई कुछ संभाल रहा है।

इब्बार रब्बी जी को पहली बार सुना, क्या ख़ूब हैं वो। क्या उत्साह, क्या बेबाक़ी और क्या ही कमाल का पाठ। नाम लेकर हर कवि के बारे में लिखूँगी तो कई किलोमीटर की पोस्ट हो जाएगी बस इतना ही कि हर कवि अपने होने में कमाल था। इतने सारे कवियों को एक साथ सुनना और एक मिनट के लिए भी कविता से ध्यान न हटना इस बात की तसदीक़ है।

श्रोताओं की संख्या भी सुख का एक कारण था। इतने सारे लोग समय पर आ गए और लगातार बने रहे, यह कम महत्वपूर्ण बात नहीं। प्रतिरोध के स्वर में इतने सारे साथियों का होना सुख तो है ही।

मंगलेश जी से जुड़े इतने स्नेहिल किस्से सुनने को मिले कि ऐसा लगा नहीं हैं वो हमारे बीच नहीं हैं। दैहिक रूप से वे हमारे साथ भले नहीं हैं लेकिन हम सबके भीतर वो हैं और रहेंगे। कार्यक्रम की शुरुआत में उनके कविता पाठ की रिकॉर्डिंग सुनना भी कम सुंदर अनुभव नहीं था।

तो कुल जमा बात इतनी है कि ये माना कि अंधेरा घना है, लेकिन इस अंधेरे को तोड़ने की कोशिश करने वाले भी कम नहीं हैं, और ये अंधेरा एक दिन टूटेगा ज़रूर।

मृत्युंजय पुराने साथी हैं, उनसे अरसे बाद मिलना बड़ा ही सुखद रहा। बाकी इस कार्यक्रम में जो गुना है वो धीरे-धीरे भीतर जगह बना रहा है। धीरे-धीरे उस पर भी लिखूँगी अगर वक़्त इज़ाजत देगा। 

जिंदाबाद साथियों!

Sunday, May 17, 2026

जीवन में ऋषभ का होना


भीतर भीतर कुछ दरक रहा होता है, जिसे कभी ढेर सारे काम से, कभी तेज़ कदमों से, कभी संगीत से, कभी ढेर सारी मुस्कुराहटों से और कभी झूठ मूठ की खिलखिलाहटों से रिप्लेस करने की कोशिश करती रहती हूँ। उस वक़्त अपने ज़िंदगी को चकमा देने के इस हुनर पर फख्र सा होने लगता है लेकिन...वो ज़िंदगी है, चुपके से धप्पा देती है। वो इंतज़ार करती है, एक ऐसी तनहाई का जिसमें आप टूटकर बिखर ही लें। 

बिखरना, बुरा नहीं है। टूटना बुरा है। टूटन को छुपाये फिरने के खेल में हम लगातार और टूटते जाते हैं। 
कभी सब्र की नब्ज़ टटोलती हूँ। बहुत मद्ध्म मद्ध्म सी हरकत मुश्किल से ढूंढ पाती हूँ। अपने ही सब्र को गले लगाकर बैठी हूँ। आज की इस सुबह में मैं हूँ मेरा लगभग टूटा हुआ सब्र है और कुछ अगड़म बगड़म सा दिन है। 

शायद मैं लिख भी न पाती कुछ। न जाने कबसे लिखना, पढ़ना स्थगित सा है। किया नहीं है स्थगित, यह खुद दूर जाकर बैठा है। मैं इंतज़ार में हूँ कि करीब आए वो नहीं आता। मैं अपनी पसंद की किताबों के साथ उसके करीब जाती हूँ, वो मुंह घुमाकर बैठ जाता है। मैं लौट आती हूँ। हालांकि, मनुहार करना जारी है। 

मैंने पाया है कि आपके कितने ही करीबी लोग हों वो आपके दुख, सॉरी दुख नहीं उदासी का सामना नहीं करना चाहते। उस बारे में बात नहीं करना चाहते। शायद मैं भी नहीं। और इसलिए हमारे चेहरे पर मुस्कुराहटों के मुखौटे मजबूत होते जाते हैं। 

कल मैंने 3 लोगों से कहा, 'मन अच्छा नहीं है'।  2 लोगों ने पूछा, 'अरे क्या हुआ?' और 1 ने कहा, 'मेरा भी मन बहुत खराब है' मैं इन सबके साथ खुद में वापस  लौट आई। क्योंकि 'क्या हुआ' जैसा कुछ तो हुआ नहीं। लेकिन क्या नहीं हुआ जैसा तो न जाने कितना कुछ है। 

जानती हूँ कि हर कोई अपने भीतर न जाने कितना सैलाब लिए फिर रहा है। देश दुनिया के हालात ऐसे हैं कि आप इनसे अछूते रह नहीं सकते। कुछ कहकर कभी कुछ न कहकर। 

मैंने बचपन से अपना कोपिंग मैकेनिज़्म चुप रहने और घर की सफाई में पाया है। बड़ी हुई (मतलब पिछले दस बारह सालों में ) लॉन्ग ड्राइव या ट्रैवल भी कोपिंग मैकेनिज़्म की तरह पाया है। हालांकि आम जीवन में इस तरह के मैकेनिज़्म वो भी स्त्रियॉं के लिए एक लग्ज़री ही है। 

पिछले तीन दिन से घिस-घिस कर घर के कोने चमकाने, और बेमतलब के आँसू बहा चुकने के बाद आज इतवार को मैंने कुछ मना सा लिया है। इसका एक बड़ा क्रेडिट जाता है ऋषभ को। उसने एक ब्लॉग बनाया है। सिंगापूर डायरी लिखनी शुरू की है। मुझे उसने रात भेजा था। मेरी सुबह हुई उसे पढ़ने से। पढ़ते-पढ़ते लगा जैसे ठंडी हवा के झोंके ने छू लिया हो। 

सरल होना मुझे इस कदर मोहता है कि क्या कहूँ। जिस सादगी से ऋषभ लिखता है, वैसा ही वो है। इसलिए ऐसा लगा, उसने अपना लिखा भेजकर कहा हो, 'प्रतिभा जी, मैं हूँ न साथ।' 

ऋषभ, तुम्हारे लिखे का जादू देखो, दिन खिला हुआ है। मन भी। 

हम दुनिया के किसी भी कोने में हों, अपने हिस्से की मानवीयता को जीते हुए इस दुनिया को सुंदर बनाने के सपने में एक छोटा सा योगदान तो कर ही रहे हैं। कि हर रात सोने से पहले खुद से पूछना, आज किसी का दिल तो नहीं दुखाया न? 

जब जीवन का 'स' ही न सध रहा हो ऐसे में  ऋषभ का जीवन में  यूं होना ब्लेसिंग ही तो है। और इस बात को सेलिब्रेट तो करना चाहिए। है न? तो अब उठती हूँ, आज फिर से दो कप चाय बनाऊँगी। पहला कप ऋषभ का, दूसरा...आप जानते तो हैं न। 
दिन शुभ हो सबका।  

ऋषभ के ब्लॉग का लिंक- https://open.substack.com/pub/riserishabh/p/singapore-slowly-some-days-improve?utm_source=share&utm_medium=android&r=1dr9dp