Tuesday, June 30, 2026

दिल कह रहा है, तुझसे ये रिश्ता जोड़ लूँ...


 रिश्ता तो जुड़ चुका था। हम शिलॉन्ग पहुंचे। एक दिन में जैसे न जाने कितने दिन जी लिए थे हमने। कोई दिन ऐसे होते हैं कि ख़त्म न हों और हम दिनों को आस से देखते हैं बिना कुछ कहे, और कभी कभी वो हमारी आँखों की सुन लेते हैं। यह ऐसा सा ही दिन था। और अभी तक ख़त्म नहीं हुआ था। कमरे पर पहुंचे तो चाय की जबर्दस्त तलब लगी, और जब चाय होगी तो पकौड़े तो लाज़िमी हुए। कुछ देर आरामदेह बिस्तर में धँसे हुए ज़िंदगी किसी रील सी घूमने लगी। 

रत्ती भर जीने के लिए कितना ज्यादा मरना पड़ता है। अपनी ही ख़्वाहिशों को पहचानने में एक उम्र गुज़र जाती है। कहाँ जानती कि मुझे धूप के सिक्कों से मोहब्बत है, कहाँ जानती थी मुझे बारिशों का स्वाद बेपनाह पसंद है कि मैं भीगना ही नहीं चाहती बारिशें पी जाना चाहती हूँ, कई बार लगता है बारिश हो जाना चाहती हूँ। कहाँ जानती थी कि खुद को महसूस करने के लिए खुद के साथ कुछ दूरी तय करना कितना ज़रूरी है। पिछले कुछ बरसों की छुटपुट यात्राओं के दौरान पाया कि जिस अंजान सी तलाश में भटक रही थी वो तो ये है। कुदरत से शदीद मोहब्बत। इंसानी मोहब्बत आपका दिल दुखा सकती है लेकिन कुदरत आपको कभी अकेला नहीं छोड़ती। हमेशा साथ चलती है कभी धूप बनकर कभी छाया बनकर। 

स्मृतियों के दरीचे खुले हुए थे जबकि वर्तमान अपनी सोंधी ख़ुशबू लिए सामने खड़ा था। चाय, पकौड़े सामने थे और हम आराम की मुद्रा में बिस्तर से निकले बगैर वहीं खाने की इच्छा से जूझते हुए। आखिर बिटिया ने वहीं बिस्तर पर चाय दी और पकौड़े भी। एक जरा सी ख़्वाहिश कोई बिना कहे समझ ले और पूरी कर दे तो कैसा तो पानी हो जाता है मन। ज़िंदगी भर कितने पकौड़े तले होंगे, कितनी चाय बनाई होगी कोई हिसाब नहीं लेकिन यूं इस सुकून से इस तरह इनका होना कमाल है। सोचो तो, मर्दों के लिए जो सुख रोज का है, जिस पर उनका ध्यान भी नहीं जाता वो हम औरतों को कितनी मेहनत से कमाना पड़ता है। 

पकौड़े अच्छे थे साथ ही लाल चाय भी। खाने के बाद कुछ देर और बिस्तर में दुबक गई तो आलस के एक झोंके ने पीठ सहला दी। सच्ची बड़ा आराम आया। घड़ी ने आठ बजाए तो हम माँ बेटी ने एक दूसरे को देखा और कुछ देर का टाइम खुद के लिए और ले लिया।  कुछ देर बाद उठे तो शरीर और मन दोनों ताजादम हो चुके थे। हम दिन का आखिरी हिस्सा जी भर के जीने के लिए तैयार थे। अब तक यह सर्च की जा चुकी थी कि कहाँ पर कौन सा खाना बेस्ट मिलता है। फिलहाल खाना हमारे लिए प्रियोरिटी था भी नहीं, हमें शिलोंग की रात देखनी थी। 

दुकानें धीरे-धीरे बंद हो रही थीं और शहर जाग रहा था। कितना सुंदर है न यह। चौक के पास लोग बस टहल रहे थे, घूम रहे थे, बैठे थे खड़े थे। कोई कुछ कर नहीं रहा था, बस वो वहाँ थे। न किसी को कहीं जाना था, न कुछ खरीदना था, न कुछ खाना था। मैंने महसूस किया कि लोग आपस में भी ज्यादा बात नहीं कर रहे हैं। बस वो एक-दूसरे का हाथ थामे साथ हैं। जैसे अपनेपन की कोई ख़ुशबू बिखरी हुई थी। 

हमने भी उस महकती शाम के हवाले खुद कर दिया। इधर से उधर भटकते हुए हमारे कानों में सुरीले गाने भी पड़ रहे थे। अक्सर आसपास संगीत रहता ही है लेकिन जाने क्यों यात्राओं का सुर ऐसा लगता है कि कोई गीत कोई गाना सुनने का खयाल तक नहीं आता। तो यह सुबह से कानों में पड़ा पहल गीत था। इस महकती चहकती सी शाम में यह अच्छा लग रहा था। समझ नहीं आ रहा था कि यह आवाज आ कहाँ से रही है। फिर अचानक नज़र पड़ी, कोई जिनके पास से कई बार गुज़र गए ये तो वही सज्जन गा रहे थे। चूंकि स्पीकर दूर कहीं थे तो शायद इसलिए ध्यान नहीं गया। दूसरे लोग उन्हें घेर के खड़े हों ऐसा भी नहीं था। वो अपनी धुन में बस गा रहे थे। असल में वो अपने संगीत को जी रहे थे। वो दृष्टि बाधित थे लेकिन उनके पास दुनिया एक नज़र थी खुशी को पहचानने की, सलीका था उसे सेलिब्रेट करने का। कुछ लोग उनके सामने रखे बॉक्स में पैसे भी डाल रहे थे। लेकिन वो सिर्फ गा रहे थे...कुणाल गांजावाला की आवाज़ जिसे शायद भूल ही चुकी थी, उस रात से फिर से साथ हो ली है। पहले से ज्यादा अपनाइयत के साथ। अब उस आवाज़ में और न जाने क्या क्या शामिल हो चुका है...दिल कह रहा है, तुझसे ये रिश्ता जोड़ लूँ, तेरी धड़कनों को छू लूँ... जानती हूँ अब जब भी यह गाना सुनूंगी शिलॉन्ग की वह रात जाग उठेगी। 

घूमते फिरते वहाँ ढेर सारी पान वाली दुकानें दिखीं। हमारे यहाँ जैसी होती हैं वैसी नहीं, थोड़ी अलग। छोटे से स्टूल पर पारंपरिक वेश में बैठी महिलाएं और सामने छोटी सी मेज पर करीने से सजे हुए पान। एक नॉर्थ ईस्ट की कलीग की याद आ गई वो खूब पान खाती थी, वो ताम्बूल बोलती थी। मुझे भी पान खाने का चाव तो खूब है। खासकर नए शहरों में, क्योंकि हर शहर का मिजाज वहाँ के पान में भी होता है। यहाँ के पान या ताम्बूल का मिजाज अलग था। उस वक़्त तो मैंने पैक कराया था डिनर के बाद जब उसे खोला तो पाया यह तो एकदम अलग है। पान के पत्ते पर लगा हुआ थोड़ा सा चूना और बस। साथ में सुपारी के टुकड़े और कच्चे नारियल की कतरन। सुपारी तो खाई न गई नारियल की कतरन के साथ जरूर खाया थोड़ा सा और बाकी संभाल लिया। जानती थी यह थोड़ा थोड़ा ही खाया जाएगा। यह नॉर्थ के मीठे पान से एकदम अलग था। 

किसी रात का तिलिस्म ऐसा होता है कि न हम चाहते हैं वह बीते न वह बीतती है। देर रात तक इधर से उधर घूमते हुए भूल ही गए थे कि हमें डिनर भी करना है। याद आया तो एक बेहतरीन रेस्तरां में खुद को पाया। एक अच्छा सा दिन, प्यारी सी शाम अच्छे से डिनर के साथ ही पूरा होना डिज़र्व करता है। 

हम उस प्यारे से दिन को पलकों में मूंदकर यह सोचते हुए सो गए कि अगला दिन चेरापूंजी का दिन होगा। मेरा बचपन का अनदेखा ख्वाब जो कल हक़ीक़त बनने वाला था। 

नींद सचमुच अच्छी सी आई थी...

(जारी...)

Wednesday, June 24, 2026

तेरे लिए मौसम मंगाया है...


1998 में रिलीज हुई फिल्म 'सत्या' के एक गाने की यह लाइन कि 'मैंने तेरे लिए मौसम मंगाया है, तेरे लिए रस्ता बिछाया है...' इतनी ज्यादा अच्छी लगती थी कि ऐसा लगता काश कोई यह कहे मुझसे भी। रूमानियत वाले ऐसे ख़्वाबों की जिंदगी ने कायदे से बैंड बजाई और यह समझाया कि अपनी ख़्वाहिशों को किसी के भरोसे मत छोड़ो, खुद पकड़ो उनकी बागडोर और निकल पड़ो बस...

प्रकृति के क़रीब जाकर हमेशा यह महसूस हुआ है कि मेरे मन का वह प्रेमी और कोई नहीं यह क़ुदरत ही है। जब जितना और जैसा मौसम चाहा, भरपूर मिला। धीरे-धीरे ज़िंदगी के रास्ते भी बिछने लगे, वो रास्ते जो मेरे मन की दुनिया में जाते हैं। लेकिन उन रास्तों पर चलने से पहले या उनके मिलने से पहले हमें उन रास्तों की कितनी तलाश है यह जानना भी ज़रूरी है। पानी का पता प्यास से बेहतर कौन जानता है। और जैसा कि पहले भी कह चुकी हूँ, ज़िंदगी के लिए अपनी भूख प्यास को समझते, बूझते हुए जिंदगी ही गुज़र जाती है।

मेघालय मानो गुनगुना रहा था, 'मैंने तेरे लिए मौसम मंगाया है...' और मैं उसकी गुनगुन को सुनकर मुस्कुरा रही थी। बरसती बूंदें हथेलियों से सरकते हुए आत्मा तक पहुँच रही थीं।

रास्ता लंबा था। हमें तो भूख महसूस नहीं हुई लेकिन अब्दुल भाई की भूख ने गाड़ी रोकी। बारिश हल्की हुई। बिना छतरियों के थोड़ी सी वॉक करने के बाद खाने पहुंचे। हालांकि सच में कुछ भी खाने का मन नहीं था। मैंने छाछ और बेटू ने पेपर डोसा मंगाया और हम दोनों चुप होकर बैठ गए। हम दोनों माँ बेटी का सुर एकदम ठीक लग चुका था। यात्रा के दौरान चुप्पी का सुर। शब्द अक्सर सौंदर्य को खंडित करते हैं यह मेरा अनुभव रहा है। हम दोनों की चुप्पी का यह सुर पूरी यात्रा में लगा रहा। हमने बेहद मामूली बातें कीं और ज्यादा महसूस किया। एक दूसरे को भी और मौसम को भी।

कई बार चुपचाप खिड़की के बाहर देखते हुए हमने एक-दूसरे की हथेलियाँ थामीं, कहा कुछ भी नहीं। भाषा की चुनौती आने वाली थी क्योंकि यहाँ की भाषा से हम अनजान थे और हमारी भाषा से यहाँ के लोग। लेकिन पर्यटकों के कारण अब भाषा और भोजन काफी हद तक कॉमन होने लगा है। अङ्ग्रेज़ी और हिन्दी को तोड़-मरोड़ कर काम किया जा सकता है यह सुना था। और सच ही सुना था। 

खाने के बाद बिल देने के वक़्त हम माँ बेटी के भीतर का बचपन जाग उठा। मैंने ऑरेंज कैंडी जिसे बचपन में कंपट कहते थे लेने को हाथ बढ़ाया तो बेटू ने मैजिक पफ की तरफ। कुछ चॉकलेट और चिक्की के छोटे पाउच भी हमने लिए। खाने से ज्यादा इन चीजों को हथेलियों में भरने का सुख था। बचपन में इन्हीं ऑरेंज कैंडी, माफ कीजिये कंपट के लिए भी तो तरसे ही हुए थे हम। जिस भी उम्र में मिले छूटा हुआ जीवन उसे गले से लगा लेना चाहिए। 

एक कंपट मुंह में रखा और स्कूल के बाहर ठेले पर कंपट बेचने वाले भैया की धुंधली तस्वीर कौंध गई, और कौंध गयी 25 पैसे का सिक्का तलाशते हाथ और न मिलने पर मायूस होती आंखें। इसी स्मृति के साथ वो दिल के आकार वाले काँच के ज़ार में रखे केक और क्रीम रोल भी याद आ गए जिन्हें खरीद पाना ख़्वाब ही रहा बस ललचाई नज़र से देखते ही रहे। हंसी आती है यह सोचकर कि अब जब भी क्रीम रोल मिलता है चाव से खाती हूँ, असल में उसे खाते हुए बचपन का छूटा हुआ हिस्सा जीती हूँ। 

अभी बचपन की इन बचपने से भरपूर स्मृतियों के साथ खिलवाड़ चल ही रहा था कि सामने एक विशाल सा हरा समंदर दिखा। हम शिलोंग पहुँच चुके थे। यह शिलोंग का पोलो ग्राउंड था। इतना हरा कि बस आँखें ठहर जाएँ। 
लेकिन इतनी बारिश में कैसे घूमेंगे यहाँ के सवाल के साथ बिटिया ने मेरी तरफ देखा। मैंने हँसते हुए कहा, 'अरे मौसम अपनी बात मानता है, अभी बारिश रुकवाते हैं। ओ सुनो जरा, थोड़ी देर को रुकना तो बरसने से...' ड्रामेबाजी से भरे अंदाज में कहकर मैं खूब हंस पड़ी। बिटिया भी हंस पड़ी। लेकिन कुछ ही देर में सचमुच बारिश रुक गई। और ऐसा पहली बार नहीं हो रहा था जब मौसम मेरे मन के मुताबिक अपने रंग बदल रहा था। अब तो दोस्तों में यह बात मशहूर ही है बल्कि दोस्तों ने ही मशहूर की है कि ये अपने मौसम साथ लिए चलती हैं....बेटू ने भी चिहुँककर कहा, 'आपके मौसम ने आपकी बात मान ली'। हम दोनों खुश-खुश उस हरे समंदर के भीतर डूबने के लिए निकल गए। 

नीले गुलमोहर जिसका बोटिनिकल नाम जेरकेंडा है की छटा देखते ही बन रही थी। अभी बरस कर थमी बूंदों को पत्तियों ने अपनी हथेलियों पर सहेजा हुआ था। घास के मुहाने पर अटकी बूंदें जैसे किसी जौहरी ने अपनी कला का नायाब नमूना बनाते हुए घास के सिरों को हीरे सी बूंदों से जड़ दिया हो। और हीरे की कनी से सजी बूंदों को न कोई गुमान न घास को। हवा का एक झोंका आता और घास इतराते हुए उन हीरे सी बूंदों को ऐसे झटक देती मानो निर्विकार ही हो किसी भी सज्जा से। और यही उस सज्जा का सबसे सुंदर पहलू था। 

हम माँ बेटी तितलियाँ हो गयी थीं। उस हरे समंदर में उड़ती फिर रही थीं। हम मछलियां हो गई थीं, डुबकियाँ लगातीं और गहरे उतर जाने को बेताब। बरसने के बाद का खुला मौसम पूरे ग्राउंड में खिल खिला रहा था। और सबसे सुंदर बात यह थी कि यहाँ लोग कम थे। जो थे वो बेहद इत्मीनान से या तो बैठे हुए थे, या घूम रहे थे। ऐसे सौंदर्य पर खामोशी की संगत हो तो कमाल होता है। इतनी शांति कि अपनी साँसों की आवाज़ सुनाई दे, ऐसी चमक कि अपनी आत्मा का हर हिस्सा चमक उठे। 

ज़िंदगी ने मेरा हाथ थामा और पूछा, 'तुम्हें मुझसे बड़ी शिकायतें थीं न?' मैंने उसके कांधे पर सर रखते हुए कहा, 'तुमसे ही तो प्यार भी है न?' 
हम दोनों मुस्कुरा दिये....मेरी हथेलियों में घास से टूटकर गिरी ओस की बूंदें थीं। हाँ, हथेलियों से जबसे लकीरें झरकर गिर गईं, या मैंने गिरा दीं तबसे हथेलियाँ सूरज की किरणों से, ओस की बूंदों से, फूलों की ख़ुशबू से लबरेज रहती हैं। मैंने अपनी हथेलियों को अपनी दोनों पलकों पर रखा, और पूरे चेहरे को हथेलियों में रख दिया। जैसा दुआ पढ़ने के बाद पलकों पर रखते हैं हथेलियाँ। 

होंठ बुदबुदा रहे थे, शांति हो, प्यार हो, ख़्वाब  हों और ख़्वाबों की ताबीर हो... 

(जारी...)

Sunday, June 21, 2026

स्वाद एक कारा है


                                                        तस्वीर इन्टरनेट से साभार

 यह इतवार की सुबह है। जाने कहाँ से इतना सारा तनाव आ गया है। लंबे समय से एक चिड़चिड़ाहट तारी है जिसे फुल इगनोर करने पर लगी हूँ। यह चिड़चिड़ाहट रसोई से है, घर के कामों से है। 


बचपन से रोज सुबह आँख खुलते ही किचन में काम करते हुए माँ को ही देखा था। मैं ठीक से जग भी नहीं पाती थी कि आधा खाना बन चुका होता था। चूंकि मेरी माँ भी वर्किंग रही हैं, उनकी घड़ी और उनकी गति के बीच समायोजन के बीच ही मेरे बचपन की शुरुआत हुई। जब वो डेली पैसेंजर थीं और सुबह की ट्रेन से दफ्तर जाती थीं तो सुबह 6 बजे सारे घर का काम निपटाकर, खाना बनाकर, गमलों में पानी डालकर रेडी होकर स्टेशन को निकल जाती थीं। 

फिर लखनऊ में उन्हें उसी शहर में जाना होता था तब यह राहत सुबह के 6 बजे से खिसक कर 8.30 बजे पर आ गई। लेकिन तब तक काम भी काफी बढ़ चुका था। और इन दिनों कोई हाउस हेल्प नहीं हुआ करती थी। तो जैसे जैसे मैं बड़ी हुई खुद को माँ कि हेल्प के लिए हाथ बँटाना शुरू किया। धीरे-धीरे माँ के हाथ के काम अपने हाथ में लेते गई। कॉलेज, पढ़ाई, घर के काम...यह सब सामान्य है। 

घर के काम कभी बोझ नहीं लगे, खाना बनाने में मजा आता था। नई चीज़ें बनाना खिलाना और तारीफ़ें बटोरना। माँ को देखकर हुआ या जीवन की गति ही ऐसी मिली कि काम करने की गति काफी तेज़ रही। फटाफट खाना बनाना, फटाफट पोछा लगा लेना। सब कुछ फटाफट। बाद मुद्दत समझ आया कि मैं तो एक ट्रैप में हूँ।  

सलाद और होता तो मजा आ जाता है, पकौड़े बन जाएँ तो मजा आ जाय। तुम पालक पनीर बहुत अच्छा बनाती हो, और पाव भाजी, और... चाय तो तुम्हारे ही हाथ की पिएंगे जैसे जुमलों वाला ट्रैप। और अपनी खुशी से एक पैर पर नाचते हुए लोगों के स्वाद पर खुद को निछावर करने की खुशी महसूस करने वाला ट्रैप। 

कोई साथ की लड़की जब यह कहे कि उसे खाना बनाना नहीं आता, या बनाने में ऊब लगती है तो उसे जज करने या उसे नसीहत देने वाला ट्रैप, असल में उस बात को न समझ पाने वाला ट्रैप। 

बाद मुद्दत यह समझ आया कि यह जो रसोई है, यह स्त्रियों की नियति नहीं है, बना दी गई है। स्वाद एक जेल है, स्त्रियों की जेल। जिस जेल में तारीफ़ों की सलाखें सख्त हैं, जो अपनी ही जेल में बाखुशी कैद रखने की तैयारी है। तारीफ़ें न भी हों तो भी। 

मुझे याद नहीं पिता ने कब माँ से कहा कि, 'तुम ये चीज़ बहुत अच्छी बनाती हो' माँ की शिकायत यही रही कि कभी जो तारीफ कर दी हो। तारीफ समझने का एक तरीका माँ को यह मिला कि अगर ठीक से खा लिया या सब खत्म कर दिया बिना यह सोचे कि बाकियों के लिए कुछ बचा भी है नहीं, तो खुश हो जाओ कि अच्छा बना है, अगर छोड़ दिया थाली में तो समझो मन का नहीं बना। 

परेशानी खाना न बनाना पड़े की भी हो सकती थी समझ ही नहीं पाये, परेशानी यह हुई कि कम से कम तारीफ तो कर दिया करो। 

पहली बार जब कुक लगने की बात हुई तो घर में घोर संग्राम हुआ। हालांकि कुक लगने की बात माँ ने की भी नहीं, क्योंकि एक समय में वो भी इसके खिलाफ थीं, जाने कैसा बनाएगी, स्वाद नहीं होगा उसके हाथ में आदि आदि। पिता ने हड़ताल कर दी उसके हाथ का नहीं खाएँगे। फिर जैसे तैसे कुक लगी, तो रोज शिकायत कि उसके हाथ में स्वाद नहीं है। 

यानि जिस स्वाद पर जीवन भर चुप्पी रही, वह अब समझ आया कि, था। 

ऐसी लड़ाई शादी के बाद मैंने भी झेली, पति और सास का अबोला सहा और आखिर उन्हें कुक के लिए नहीं मना पाई। 

कुल कहानी यह है कि स्वाद एक जेल है। स्त्रियों की जेल। और स्त्रियों को ही इसे तोड़ना होगा। लेकिन तोड़ नहीं पा रही हैं। सुबह आँख खुलते ही जब खुद के लिए ही सही किचन में खुद को देखती हूँ तो सोचती हूँ यह कारा कितनी मजबूत है। 

मैं अपनी सुबह चाय और पंछियों की आवाज़ के साथ चाहती हूँ लेकिन ऐसा कम ही हो पाता है....क्यों कम हो पाता है, यह सवाल खुद से पूछती हूँ...

जो पुरुष मैं तो बना लेता हूँ, की हुंकार भरते हैं और महीने में एक दिन या हफ्ते में एक दिन अपनी मर्जी से अपने मूड के मुताबिक कभी कुकिंग कर देते हैं यह उनके लिए नहीं है। मैं उनकी कुकिंग को गिनती ही नहीं। और जो महिलाएं यह कहकर खुश हैं, कि मेरे ये तो कभी कभी चाय बना देते हैं, या मुझे अच्छा लगता है उनके लिए बनाना तो उनसे यही कहना है कि बहन, अभी तुम जेल में आनंद ले रही हो, अच्छा हो तुम्हारा भ्रम न टूटे। 

आग लगे ऐसे स्वाद को जिसने एक स्त्री को जीवन भर की रसोई की कैद में डाल रखा है।  

Saturday, June 20, 2026

कॉकटेल-2 : मिसोजिनी से भरपूर घटिया मसाला



अकसर जो चीज़ें अच्छी नहीं लगतीं उनके बारे में बात नहीं करती। देखने में टाइम वेस्ट करने के बाद उसके बारे में बात करके और टाइम क्यों वेस्ट करूँ आखिर। लेकिन हमारी फिल्मची दोस्त ज्योति नन्दा ने कहा, कुछ तो लिखो तो लिख रही हूँ।

ज्योति की ही पिछली पोस्ट से बात शुरू करती हूँ। नीयत। जिसे समझ और अप्रोच भी कह सकती हूँ। फिल्म बनाने के पीछे की नीयत क्या है, और देखने वाले की नीयत क्या है। यहीं से सारी बात शुरू होती है। किसे क्या और कैसा लगता है।

कॉकटेल 2, से ज्यादा उम्मीद तो थी नहीं क्योंकि लव रंजन का अप्रोच पहले ही काफी निराश करता रहा है। कॉकटेल वन में भी उसका खासा असर था। यहाँ भी अप्रोच वही है। लव रंजन को लड़कियों से कोई खास दिक्कत लगती है। उन्हें लड़कियों को डीमीन करने के तमाम रचनात्मक तरीके आते हैं। और उनके हीरो बेचारे, पाक दामन, संस्कारी टाइप होते हैं। कोई दिक्कत नहीं कि आपका हीरो कैसा है लेकिन हीरो को आपके जैसा आदर्श हीरो होने के लिए लड़कियों को क्यों डीमीन करना है भाई।

फिल्म खूब सजा धजा, रंगा पुता कचरा है। दो लड़कियां हैं, एक लड़के पर मरती हैं। बिलो द बेल्ट तरीके आज़माती हैं लड़के को परखने को। फिर आपस में बिल्लियों की तरह लड़ती हैं। और लड़का अंत में चमचमाता हुआ संस्कारी बालक शादी शादी खेलने लगता है। वही लड़का जो शादी में विश्वास नहीं करता है।
अंत में मंगलसूत्र जिंदाबाद, आज़ाद लड़कियों का कैरेक्टर एसेसनेशन, उन्हें ओब्जेक्टीफाई करना। प्यार और रिश्तों पर लंबे लंबे दार्शनिक लेक्चर जिनका कोई अर्थ नहीं।

महंगे सेट, दमकते शूट, गाने, सब मिलकर भी कुछ नहीं कर पाते। कृति सेनन कमाल लगी हैं लेकिन उनका रोल थोड़ा डिग्निटी से लिखा जाना था।

इतना ही टाइम इस पर खर्च कर सकती हूँ। टाटा।

(नोट- फिल्म एक्स्पर्ट नहीं हूँ। यह समीक्षा भी नहीं है। बस मेरी भड़ास है।)

Tuesday, June 16, 2026

पहली मुलाक़ात का तिलिस्म

गुवाहाटी एयरपोर्ट की सबसे खूबसूरत बात यह लगी कि न कोई ज्यादा भीड़ न आपाधापी। संभवतः हमारी फ्लाइट सुबह की थी इसलिए भी ऐसा हो। एक सुकून, एक ख़ामोशी और तसल्ली सी दिखी। हर एयरपोर्ट की अपनी कुछ अलग सी पहचान होती ही है। और अगर हम पहली बार उस एयरपोर्ट पर होते हैं तो तस्वीरों का मोह भी होना लाज़िम है। एयरपोर्ट पर जो सज्जा थी उसमें असम ज्यादा था या मेघालय यह नहीं पता लेकिन उसमें एक बारीकी और तरतीब थी। 

गुवाहाटी एयरपोर्ट से हमें शिलॉन्ग जाना था। एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही गर्मी से सामना हुआ। ये अपेक्षित तो बिलकुल भी नहीं था। देश की राजनैतिक गर्मी का असर यहाँ के मौसम पर भी पड़ रहा है शायद सोचते हुए हम माँ बेटी कैब के भीतर दुबक गए। सफर की थकान और तेज़ चिलकती धूप का असर था शायद बिटिया तुरंत सो गई और कुछ देर में मैं भी। 

छोटी सी झपकी के बाद आँख खुली तो मौसम बदलने लगा था। 'वेलकम टू मेघालय' का बोर्ड बारिश की फुहारों के बीच ही दिखा। यह हमारा मेघालय में स्वागत था। बरसता भीगता मौसम। ऐसी चिहुँक उठी मन में। मन बावरा हो उठा। फाइनली मैं मेघालय में हूँ। 

उमियम झील : मेघालय आने की योजना में मेरे मन में कोई योजना नहीं थी। मुझे सिर्फ बादल और बारिशों से मिलना था और उनके हाथों में हाथ डालकर घूमते फिरना था। फिर भी योजनाओं की बाढ़ चारों तरफ थी। ये देखना वो देखना। रील्स से लेकर चैट जीपीटी तक सक्रिय थे। साथ ही सक्रिय थे वो लोग जो आकर गए थे। इस सक्रियता से यह हुआ कि मुझे कुछ जगहों के नाम पता चल गए। वहाँ जाऊँगी या नहीं यह पक्का तय नहीं था। लेकिन उमियम झील रास्ते में ही पड़ती थी और पानी वाली सारी जगहों के लिए तो हमेशा हाँ ही होती है। 


हमारे ड्राइवर अब्दुल भाई ने उमियम के सामने से सर्रर्र से गुजरते हुए बताया कि ये है वो झील। मैंने सोचा क्या ऐसे देखते हैं झील। मुझे लोनावला का ब्रिज याद आया हम बस गुजरे उधर से, ठहरकर निगाह भर देखा भी नहीं। वो हुड़क अभी तक फंसी हुई है। 

मैंने अब्दुल भाई से कहा, जरा रुकिए कुछ देर। वो बोले बारिश है मैडम कहाँ जाएंगी। मैंने आप फिकर न करिए, आप बस रुकिए। वो थोड़ा आगे जाकर रुक गए। बिटिया के बैग से दो छतरियाँ निकलीं। हमने छतरियाँ और पैरासीटामॉल सबसे पहले रखे थे। हम जानते थे छतरियाँ ज्यादा देर टिकेंगी नहीं और उसके बाद पैरासीटामाल ही काम आएगी। खैर, अभी तो छतरी ही काम आई। हम दोनों बरसते मौसम में आधे भीगते आधे झूठ-मूठ में खुद को बचाते उमियम के किनारे टहलने लगे। झील पर बारिश होते देख 'समंदर पर बारिश' की याद हो आई। एक ही बारिश के कितने रूप हैं, पहाड़ू पर अलग, जंगल पर अलग, झीलों पर अलग, समंदर पर अलग और सड़कों पर एकदम अलग। मुझे फूलों पर गिरती बारिश की याद भी ताजा हो आई। 



उमियम का विस्तार खूब बड़ा है। ऐसा लग रहा था वो हल्की रिमझिम की चादर ओढ़े कच्ची सी नींद में है। किनारे कुछ लोग छतरियाँ लगाए शायद मछ्ली पकड़ने की फिराक में थे। पल पर से गाडियाँ गुजर रही थीं लेकिन कोई शोर नहीं था। झील के ठीक सामने पहाड़ियों पर बादलों की धमाचौकड़ी मची हुई थी। बावरा मन सब कुछ को पी लेने को आतुर था। सारा सौन्दर्य, सारी छुअन, सारे बादल, सारे पानी। और शायद हम पी भी रहे थे। इसीलिए तो भीतर का सारा कचरा झाड़कर आए थे कि भीतर हर कोने में मौसम की जगह हो। 


हम लगभग पूरी झील का चक्कर काटने की फिराक में थे। उन्हीं रास्तों पर फिर फिर लौटना, फिर फिर दृश्यों को आँखों में समेट लेना जारी था। पूरे रास्ते में उँगलियों की पोरों पर, हथेलियों में बारिश समेटने को बेताब रही। ऐसा लग रहा था हर बूंद मेरी सूखी रूह पर मरहम है। 

बारिशें मुझे हमेशा से बेहिसाब चाहिए थीं...बस उस बेहिसाब होने में बेमौसम की बरसात और किसी का घर तबाह करने वाली बरसात हरगिज़ नहीं थी। 

फ़िलवक्त बूंदों ने लाड़ लड़ाते हुए कहा, मेघालय आई हो, सुखी होकर ही जाओगी। और सुख मेरी देह पर रेंगने लगा था। 

(जारी...)