Saturday, February 7, 2026

पापा अब ठीक हो रहे हैं


सुबहें फिर से नज़र आने लगी हैं। रातों का अंधेरा अब डरा नहीं रहा। दूरियों के कारण रुकती हुई सांसें अब बेहतर हैं, जब पिता की कलाई हाथ में है। पापा अब ठीक हो रहे हैं। वो ठीक हो रहे हैं तो बिखरा हुआ जीवन सम पर लौट रहा है। शुभचिंतकों की शुभकामनाएं और डॉक्टर्स के एफर्ट्स मिलकर काम कर रहे हैं।

एक सप्ताह हुआ। हाँ, पिछले शनिवार यानि 31 जनवरी की शाम, पापा को हार्ट अटैक आया। एक ही पल में सब उलझ गया। उदास या परेशान होने का समय कहाँ होता है उस वक़्त, उस वक़्त तो बस संभालने का समय होता है। परेशान होना का जिम्मा उन्हें मिलता है जो दूर होते हैं। देहरादून से लखनऊ पहुँचने का समय इतना लंबा कभी नहीं लगा। राहत थी कि भाई है, सब ठीक कर लेगा, बड़ी राहत यह भी कि वो अकेला नहीं है उसके दोस्तों की पूरी फौज है उसके साथ, राहत थी कि माँ अकेली नहीं है इस गाढ़े वक़्त में। राहत कि भाभी मुझसे पहले पहुँच चुकी थी। इन तमाम राहतों ने हौसला दिया और पापा के पास पहुँचने तक का समय तनिक आसान किया।

पापा के दोस्तों ने साहस दिया, साथ दिया।

अब पापा ठीक हो रहे हैं। घर आ गए हैं। बड़ी मुसीबत आई थी...लेकिन अब जबकि सब ठीक होने की तरफ है, सोचती हूँ, तो पापा की मुस्कुराहट हौसला देती है और उनका वो सर्जरी के बाद चेतन होते ही किताब और चश्मा मांगना भी गुदगुदाता है।

हम सब असल में पापा की हिम्मत से बने हैं, उनके ही हौसले से चलते हैं। पापा के शीघ्र स्वास्थ्य लाभ के लिए आप सब की शुभकामनाएँ लगातार चाहिए।

इस दौरान जिन लोगों के फोन नहीं उठा सके उनसे क्षमा, उम्मीद है समझेंगे आप।

Saturday, January 24, 2026

नानी कहती थीं...


नानी कहती थीं कि बिटिया 
कुछ बातों के बारे में लोग बात करेंगे नहीं 
कुछ बातों के बारे में बात कर नहीं पाएंगे   
और जिन बातों के बारे में बात करेंगे  
वो लगभग निरर्थक होंगी 
जो बातें निरर्थक होंगी 
वो सबसे ज्यादा सुनी जायेंगी।  

सबसे पीड़ित व्यक्ति 
अपनी पीड़ा की बात नहीं सुनेगा 
उसके सामने दूसरे की पीड़ा को 
मनोरंजन बनाकर परोस दिया जायेगा  
वो अपनी भूखी अंतड़ियों को 
बांधकर
हिंसा के दृश्यों में उगाये गए 
आनंद के सागर में गोते लगाएगा।   

वो यह नहीं समझ पाएगा कि वो जो दूसरा है 
जिसकी पीड़ा में ढला मनोरंजन उसे 
गुदगुदा रहा है 
वो और कोई नहीं, वो खुद है 

नानी कहती थीं  कि 
देखना, बाज़ार में सबसे ज्यादा दुख बिकेगा 
लेकिन दुख टिकेगा नहीं 
दुख की कमी सरकार पड़ने नहीं देगी 
दुख को मनोरंजन में बदलने का काम 
संसद तक जा पहुंचेगा। 

देखना एक दिन मनुष्य की पीड़ा चुटकुला हो जाएगी 
और चुटकुला सुनते हुए लोगों को देखना दुख होगा। 

नानी कहती थीं...  

Wednesday, December 31, 2025

विनोद कुमार शुक्ल : पाठकों का प्यार और अव्यवस्था की मार



समूचा हिंदी जगत विनोद जी के जाने से उदास है, दुखी है. सब उन्हें अपनी अपनी तरह से याद कर रहे हैं। उनकी कविताएँ, ऑटोग्राफ, साथ की तस्वीरें, यादें सोशल मीडिया पर उतरा रही हैं। व्यक्ति ने कितना बड़ा जीवन जिया है यह उसके जाने के बाद और ज़्यादा समझ में आता है। लेकिन आज कुछ और कहना चाहती हूँ, वह सच जो विनोद जी के घर जाने पर देखा, सुना महसूस किया।

मैं और माया आंटी विनोद जी के घर पहुँचे। वही मौल श्री का पेड़, वही पंछियों का डेरा, वही झूला, वही कमरा लेकिन इंतज़ार करती वो आँखें कहीं नहीं थीं। मिलने पर उन आँखों की बढ़ी हुई चमक, उत्साह, ख़ुशी कहीं नहीं थी। लेकिन शाश्वत इस बार भी हमेशा की तरह दरवाज़े पर इंतज़ार करते मिले।

कमरे में विनोद जी नहीं थे, उनकी तस्वीर थी। माला चढ़ी तस्वीर। मैं उस तस्वीर को देखना नहीं चाहती थी। मैं मानना नहीं चाहती थी कि वो अब नहीं हैं। मानो मेरा न मानना सच भी हो सकता हो और वो धीरे धीरे चलकर आयेंगे और मुस्कुराकर पूछेंगे आने में कोई परेशानी तो नहीं हुई? बातें करेंगे, रोटी खाने को कहेंगे। फ़रवरी 2025 में उनसे हुई आख़िरी मुलाक़ात की स्मृति को हार चढ़ी तस्वीर से बदलना नहीं चाहती थी। पूरे वक़्त उस तस्वीर से आँखें चुराती रही लेकिन उनका न होना सुधा जी की आँखों में शाश्वत की हताशा में भी तो था ही। दुख जताना दुख बाँटना नहीं होता, यह जीकर ही जाना है इसलिए ऐसे अवसर पर कुछ समझ नहीं आता सिवाय चुपचाप करीब बैठ जाने के। चाय बनाने के बहाने रसोई में जाने के विकल्प ने फिर से सहारा दिया। लेकिन विकल्प महज़ विकल्प ही तो है। शाश्वत सच का जो रूप बयान कर रहे थे उससे दुख गुस्से में बदल रहा था।

इधर सोशल मीडिया पर लोग उनकी अच्छी सेहत की दुआ कर रहे थे, अपना प्यार जता रहे थे उधर विनोद जी हर रोज़ अस्पताल की अव्यवस्था, डॉक्टर्स की लापरवाही और उदासीनता से जूझ रहे थे. वो फेफड़ों में पानी भरने की वजह से अस्पताल ले जाए गए थे लेकिन वे अपनी बीमारी की वजह से ज़िंदगी से नहीं हारे बल्कि अस्पताल में मिली बीमारियों, अव्यवस्था और लापरवाहियों की वजह से जीवन से हार गए। कितना कष्ट है यह महसूस करने में कि अपने अंतिम समय में वे काफी कष्ट में रहे।

क्या यह छोटी बात है कि जिन विनोद जी का हाल देश के प्रधानमंत्री फ़ोन करके पूछते हों, उनके शरीर पर आए बेड सोर को 4 दिन तक ड्रेसिंग ही न मिले क्योंकि कोई डॉक्टर देखने वाला नहीं था। और जब ड्रेसिंग हो तो वह ग़लत हो जाय। यह क्या छोटी बात है कि उनके टेस्ट की रिपोर्ट डॉक्टर्स इसलिए कई दिन तक न देख पाते हों क्योंकि रिपोर्ट्स एक बार नहीं कई बार खो चुकी हों। सीसीयू में कोई नर्सिंग स्टाफ ही न हो हर छोटे से छोटे काम के लिए परिजनों को पीपीई किट पहनकर भीतर जाना पड़ता हो। पर्याप्त किट न होना, जूते न होने पर पैर में पॉलीथिन बांध कर जाना भी इसमें शामिल है। डॉक्टर और बाकी स्टाफ का पूरे समय मोबाइल में, रील देखने में व्यस्त रहना भी शाश्वत को इस अव्यवस्था का एक बड़ा कारण लगा। और यह हाल है एम्स का।

विनोद जी के साथ उनके अंतिम समय में हुई यह चिकित्सीय अव्यवस्था कई सवाल खड़े करती है। उनके बेहतर चिकित्सकीय प्रबंध की ज़िम्मेदारी राज्य और केंद्र सरकार की क्यों नहीं थी? शाश्वत यहाँ से वहाँ भटकते रहे, लोगों से प्रशासन से गुहार करते रहे लेकिन उनकी आवाज़ सुनी क्यों नहीं गई? स्थानीय मीडिया में, सोशल मीडिया की कुछ पोस्ट में जब मामला उछला, तब सुनवाई हुई लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी.

शाश्वत की हताश और उदास आँखें ज़ेहन से जा नहीं रहीं और उनका यह कहना कि ‘मैंने तो अपने पिता को खो दिया है लेकिन किसी और के साथ ऐसा नहीं होना चाहिए…’ रुके हुए दुख के बाँध को तोड़ ही देता है.

उनके जाने से समूचा देश उदास है, वह घर उदास है, मौलश्री का पेड़ उदास है, घर में आकर दाना खाने वाले पंछी भी उदास हैं, हम सब उदास हैं लेकिन कुछ सवाल हैं जो इस उदासी से बड़े हैं।

जवाब न जाने किसके पास हैं।

Wednesday, December 10, 2025

रियल कश्मीर फुटबॉल क्लब


मौत का ज़ायका सबको चखना है,
ज़िंदगी का ज़ायका किसी किसी को नसीब होता है...

ज़िंदगी के इसी ज़ायके को तलाश रहा है 'रियल कश्मीर क्लब'। कश्मीर का नाम आते ही ज़ेहन में तमाम मुद्दे, तल्ख अनुभव इस कदर हावी होने लगते हैं कि कश्मीरियत, इंसानियत, वहाँ की अवाम क्या चाहती है, वहाँ की खूबसूरती दरगुजर सी होने लगती है।

'रियल कश्मीर फुटबॉल क्लब' उस दरगुजर होती कश्मीर की खूबसूरती को, उस ख़ुशबू को सहेजता है। 8 एपिसोड की यह सीरीज देख लीजिये। देख लीजिये कि कश्मीर के नाम पर नफ़रत का समान बहुत परोसा गया है,  लेकिन यह प्यार है। जब-जब लगता है कि अरे, यह तो सीरीज है, ऐसा होता भी काश, तब तब ध्यान आता है कि यह सच्ची कहानी पर आधारित है। यानि हैं कुछ दीवाने लोग जो नफरत की आंधियों में मोहब्बत का दिया जलाए हुए हैं।

कहानी लिखी बहुत अच्छी गई है। जीशान अयूब और मानव कौल के अलावा भी हर पात्र ने अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है। 

फिल्म के छोटे-छोटे टुकड़ों में मानव का कश्मीर कनेक्ट आसानी से दिख जाता है। लेकिन कुछ दृश्य ऐसे हैं जो रुला देंगे और लगेगा उनकी किताब रूह के पन्ने खुल गए हैं। अपने काम में कोई खुद को इस कदर जी ले, इससे अच्छा क्या ही हो सकता है। 

सामाजिक विभेद और प्रेम का ताना बाना है कबिरा सोई पीर है- पूरन जोशी


प्रतिभा कटियार जी का हाल में प्रकाशित उपन्यास 'कबिरा सोई पीर है' अक्टूबर में पढ़ा. तब इसको ट्रेन में देहरदून से दिल्ली जाते समय एक ही रीडिंग में पढ़ लिया था. उपन्यास को अगर एक पंक्ति में बताने को कोई कहे तो मैं कहूँगा भारतीय समाज का सदियों पुराना सच (सामाजिक भेदभाव)और उसके साथ समकालीन विमर्श युवाओं के वर्तमान संघर्ष. उपन्यास में तृप्ति है, अनुभव है साथ में पूरा जीवन है, इस जीवन के सच हैं.

उपन्यास का ज्यादातर हिस्सा ऋषिकेश नगर में घटित होता है. बहुत महत्वपूर्ण बात जो है गंगा नदी यहाँ एक नदी मात्र नहीं बल्कि एक पूरा कैरेक्टर है जो अनुभव और तृप्ति की राजदार है, उनके दुखों को सुनती है और उनको साहस भी देती है. उपन्यास के आखिर में भी एक नदी ही नायिका की दोस्त है लेकिन यहाँ वो ऋषिकेश की गंगा नहीं पहाड़ों की पिंडर उसकी सहेली उसकी राजदार है. नदियों और प्रकृति को दोस्त प्रतिभा कटियार ही बना सकती है. मुझे याद है एक बार देहरादून में उन्होंने कहा था कि अल्मोड़ा से क्या लाये तुम कोई पत्थर, कोई पत्ता कोई फूल? कुछ तो लाते!

'कबिरा सोई पीर है' हमारे समय की सामाजिक विडम्बनाओं को बेहद संवेदनशील दृष्टि से उजागर करता है। इसमें जाति-आधारित भेदभाव, वर्गीय असमानताएँ और मनुष्य की आंतरिक पीड़ाएँ सहज रूप से सामने आती हैं। यह उपन्यास परंपरागत ढंग से आगे बढ़ने वाली लंबी कथा नहीं है, बल्कि कई स्वतंत्र किंतु आपस में जुड़ी हुई कहानियों का संगठित रूप है। हर कहानी समाज के किसी अलग पहलू को सामने लाती है और पाठक को यह महसूस कराती है कि आज का मनुष्य किन-किन स्तरों पर टूटता, जूझता और उम्मीद बनाए रखने की कोशिश करता है। प्रतिभा जी की रचनायें हमेशा उम्मीद की रचनायें रहीं हैं मेरे लिए. पहली रचना उनकी 'अहा जिंदगी' पत्रिका में पढ़ी थी. तब उनसे मिला नहीं था. आज जब उनका ये उपन्यास पढ़ा , इस मध्य उनकी कविता, उनका रूसी कवि मारिना पर लिखा ग्रन्थ और भी बहुत कुछ पढ़ता रहा.

उपन्यास के प्रत्येक पाठ का अंत एक शेर के रूप में होता है जो बहुत सुंदर और अपने आप में अनूठा है. युवा मन को टोहता ये उपन्यास कई उतार चढ़ावों से गुजरता हुआ बहुत सारे सवाल छोड़ जाता है. उपन्यास में तृप्ति और अनुभव तो हैं ही एक और कहानी चलती है कनिका और सुधांशु की दोनों कहनियाँ बिलकुल अलग हैं लेकिन लोग जुड़े हैं. इसलिए ये उपन्यास एक तरफ समाजिक भेद को दिखाता है दूसरी ओर बिना रक्त सम्बन्ध के एक दूसरे से जुड़े लोगों को.

युवाओं को यह उपन्यास जरूर पढ़ना चाहिए. वैसे आजकल पढ़ने के लिए बहुत कुछ है लेकिन जिस तरह सरल,सहज शब्दों में सत्य को सामने रखने का साहस लेखिका करती है उसके लिए वे बधाई की पात्र हैं.