Sunday, May 17, 2026

जीवन में ऋषभ का होना


भीतर भीतर कुछ दरक रहा होता है, जिसे कभी ढेर सारे काम से, कभी तेज़ कदमों से, कभी संगीत से, कभी ढेर सारी मुस्कुराहटों से और कभी झूठ मूठ की खिलखिलाहटों से रिप्लेस करने की कोशिश करती रहती हूँ। उस वक़्त अपने ज़िंदगी को चकमा देने के इस हुनर पर फख्र सा होने लगता है लेकिन...वो ज़िंदगी है, चुपके से धप्पा देती है। वो इंतज़ार करती है, एक ऐसी तनहाई का जिसमें आप टूटकर बिखर ही लें। 

बिखरना, बुरा नहीं है। टूटना बुरा है। टूटन को छुपाये फिरने के खेल में हम लगातार और टूटते जाते हैं। 
कभी सब्र की नब्ज़ टटोलती हूँ। बहुत मद्ध्म मद्ध्म सी हरकत मुश्किल से ढूंढ पाती हूँ। अपने ही सब्र को गले लगाकर बैठी हूँ। आज की इस सुबह में मैं हूँ मेरा लगभग टूटा हुआ सब्र है और कुछ अगड़म बगड़म सा दिन है। 

शायद मैं लिख भी न पाती कुछ। न जाने कबसे लिखना, पढ़ना स्थगित सा है। किया नहीं है स्थगित, यह खुद दूर जाकर बैठा है। मैं इंतज़ार में हूँ कि करीब आए वो नहीं आता। मैं अपनी पसंद की किताबों के साथ उसके करीब जाती हूँ, वो मुंह घुमाकर बैठ जाता है। मैं लौट आती हूँ। हालांकि, मनुहार करना जारी है। 

मैंने पाया है कि आपके कितने ही करीबी लोग हों वो आपके दुख, सॉरी दुख नहीं उदासी का सामना नहीं करना चाहते। उस बारे में बात नहीं करना चाहते। शायद मैं भी नहीं। और इसलिए हमारे चेहरे पर मुस्कुराहटों के मुखौटे मजबूत होते जाते हैं। 

कल मैंने 3 लोगों से कहा, 'मन अच्छा नहीं है'।  2 लोगों ने पूछा, 'अरे क्या हुआ?' और 1 ने कहा, 'मेरा भी मन बहुत खराब है' मैं इन सबके साथ खुद में वापस  लौट आई। क्योंकि 'क्या हुआ' जैसा कुछ तो हुआ नहीं। लेकिन क्या नहीं हुआ जैसा तो न जाने कितना कुछ है। 

जानती हूँ कि हर कोई अपने भीतर न जाने कितना सैलाब लिए फिर रहा है। देश दुनिया के हालात ऐसे हैं कि आप इनसे अछूते रह नहीं सकते। कुछ कहकर कभी कुछ न कहकर। 

मैंने बचपन से अपना कोपिंग मैकेनिज़्म चुप रहने और घर की सफाई में पाया है। बड़ी हुई (मतलब पिछले दस बारह सालों में ) लॉन्ग ड्राइव या ट्रैवल भी कोपिंग मैकेनिज़्म की तरह पाया है। हालांकि आम जीवन में इस तरह के मैकेनिज़्म वो भी स्त्रियॉं के लिए एक लग्ज़री ही है। 

पिछले तीन दिन से घिस-घिस कर घर के कोने चमकाने, और बेमतलब के आँसू बहा चुकने के बाद आज इतवार को मैंने कुछ मना सा लिया है। इसका एक बड़ा क्रेडिट जाता है ऋषभ को। उसने एक ब्लॉग बनाया है। सिंगापूर डायरी लिखनी शुरू की है। मुझे उसने रात भेजा था। मेरी सुबह हुई उसे पढ़ने से। पढ़ते-पढ़ते लगा जैसे ठंडी हवा के झोंके ने छू लिया हो। 

सरल होना मुझे इस कदर मोहता है कि क्या कहूँ। जिस सादगी से ऋषभ लिखता है, वैसा ही वो है। इसलिए ऐसा लगा, उसने अपना लिखा भेजकर कहा हो, 'प्रतिभा जी, मैं हूँ न साथ।' 

ऋषभ, तुम्हारे लिखे का जादू देखो, दिन खिला हुआ है। मन भी। 

हम दुनिया के किसी भी कोने में हों, अपने हिस्से की मानवीयता को जीते हुए इस दुनिया को सुंदर बनाने के सपने में एक छोटा सा योगदान तो कर ही रहे हैं। कि हर रात सोने से पहले खुद से पूछना, आज किसी का दिल तो नहीं दुखाया न? 

जब जीवन का 'स' ही न सध रहा हो ऐसे में  ऋषभ का जीवन में  यूं होना ब्लेसिंग ही तो है। और इस बात को सेलिब्रेट तो करना चाहिए। है न? तो अब उठती हूँ, आज फिर से दो कप चाय बनाऊँगी। पहला कप ऋषभ का, दूसरा...आप जानते तो हैं न। 
दिन शुभ हो सबका।  

ऋषभ के ब्लॉग का लिंक- https://open.substack.com/pub/riserishabh/p/singapore-slowly-some-days-improve?utm_source=share&utm_medium=android&r=1dr9dp 

Friday, May 15, 2026

मर्मस्पर्शी उपन्यास है ‘कबिरा सोई पीर है’ : महेश पुनेठा



प्रतिभा कटियार, जिनकी मुख्य पहचान एक संवेदनशील कवयित्री के रूप में है, अपने पहले उपन्यास ‘कबिरा सोई पीर है’ के माध्यम से हिंदी साहित्य में एक सशक्त विमर्श प्रस्तुत करती हैं। यह उपन्यास जाति, लिंग, आरक्षण, सामाजिक कंडीशनिंग और मानवीय अंतर-संघर्षों की जटिलता को केंद्र में रखकर लिखा गया है। मात्र 168 पृष्ठों में लेखिका ने समाज के गहरे घावों को छुआ है, बिना किसी व्यक्ति-विशेष को दोषी ठहराए।

उपन्यास की शुरुआत सिविल सेवा की तैयारी कर रहे युवाओं के कोचिंग सेंटर से होती है। नायक और नायिका दोनों निम्न-मध्यवर्गीय परिवारों से आते हैं, लेकिन अलग-अलग जातियों से। उनकी मुलाकात और बढ़ती आत्मीयता उपन्यास की मुख्य धुरी बनती है। नायक लिबरल दृष्टिकोण वाला, जाति-लिंग संकीर्णताओं से ऊपर उठने की कोशिश कर रहा व्यक्ति है, जबकि नायिका अपने कड़वे अनुभवों के कारण शंकालु, तल्ख और पूर्वाग्रहों से ग्रस्त है,जो स्वाभाविक है। उपन्यास की संरचना उल्लेखनीय है।

उपन्यास 29 अध्यायों में लिखा गया है। हर अध्याय के अंत में एक शेर दिया गया है, जो कवयित्री प्रतिभा की पहचान को गद्य में भी जीवंत रखता है। बीच-बीच में काव्य पंक्तियों और कविताओं का आना तथा प्रकृति-चित्रण उपन्यास को काव्यात्मक गहराई प्रदान करता है।उनके प्रकृति और कविता के प्रति गहरी रागात्मकता को दिखाता है। लेखिका ने अंतर-संघर्ष को बहुत बारीकी से उकेरा है। वे दिखाती हैं कि भेदभाव अब मुख्यतः प्रत्यक्ष नहीं, बल्कि मानसिक और सूक्ष्म स्तर पर विद्यमान है — परिवार की बातचीत, दोस्तों के बीच “मजाक”, आरक्षण का ताना और योग्यता पर उठाए जाने वाले प्रश्नचिह्न। आरक्षण नौकरी दे सकता है, लेकिन सम्मान और स्वीकृति नहीं — यह कटु सत्य उपन्यास में बार-बार प्रतिध्वनित होता है।

सबसे मजबूत पक्ष बहु-स्तरीय भेदभाव का चित्रण है। लेखिका दिखाती हैं कि शोषक वर्ग में भी स्त्रियाँ शोषित हैं, दलित पुरुष दलित स्त्री से और सवर्ण स्त्री दलित स्त्री से खुद को बेहतर मानने का दंभ रखता है। नई पीढ़ी में बदलाव के बीज हैं, लेकिन सामाजिक संरचना इतनी जटिल है कि बाहर निकलना आसान नहीं। अनुच्छेद 370 के हटाए जाने के बहाने लोगों के मन में धर्म के नाम पर बजबजाती नफरत को भी दिखाया गया है।

अच्छी बात है कि समाज में व्याप्त भेदभाव के लिए उपन्यास किसी एक पक्ष को पूरी तरह दोषी नहीं ठहराता है। वह सोशल कंडीशनिंग को “नसों में इंजेक्ट वायरस” की संज्ञा देता है और समझने की कोशिश करता है कि भेदभाव करने वाला व्यक्ति भी पूरी तरह जिम्मेदार नहीं होता। उपन्यास इस पर सहानुभूति पूर्वक देखे जाने की अपील करता है । मार्मिक पंक्ति है — “दर्द ही उनका देश है” — जो शोषितों की सार्वभौमिक पीड़ा को रेखांकित करती है।

यथार्थ और रूमानियत का संतुलित मिश्रण, पात्रों के आंतरिक द्वंद्व का गहरा चित्रण और काव्यात्मक भाषा उपन्यास को मजबूत बनाती हैं।

उपन्यास पाठक को बेचैनी और सवालों के साथ छोड़ता है — “जब तक दिमाग ठीक नहीं, तब तक कैसे ठीक हो सकता है?” कानून सतह बदल सकता है, दिल नहीं। महत्वपूर्ण बात कही गई है।

कुल मिलाकर ‘कबिरा सोई पीर है’ एक मर्मस्पर्शी उपन्यास है, जो 21वीं सदी के भारत में जाति-लिंग के जटिल प्रश्नों को उठाता है। यह न सिर्फ पीड़ा को दर्ज करता है, बल्कि समझ, सहानुभूति और बदलाव की यात्रा पर भी जोर देता है।

प्रतिभा कटियार ने साबित किया है कि कविता की संवेदनशीलता गद्य में भी समाज को आईना दिखा सकती है। जो पीड़ा नहीं झेला, वह शायद पूरी तरह न समझ पाए — लेकिन इस उपन्यास को पढ़ने के बाद अनुभव करने का एक मौका जरूर मिलता है। यह उन सबके लिए अनिवार्य पढ़ने योग्य है जो समाज में बदलाव चाहते हैं।

कबीर की तरह — पीर वही समझता है जो सोई हुई पीड़ा को जागृत कर सके। प्रतिभा कटियार ने ठीक यही किया है। 

Thursday, April 16, 2026

अप्रैल उम्मीद है


वो जो खिलखिला रहे हैं मोगरे इन दिनों
ये अप्रैल की आहट है
ये जो सारे दरवाजे खिड़की भेदकर 
चली आती है रातरानी की ख़ुशबू 
ये अप्रैल का दीवानापन है 
ये जो आँखों से निकल भागे हैं ख़्वाब 
मटरगश्ती करते फिर रहे हैं यहाँ से वहाँ 
ये अप्रैल की शरारत है 
ये जो समन्दर की लहरों को 
अंजुरियों में समेट लेने को व्याकुल है एक लड़की 
ये अप्रैल पर भरोसा है 
ये उड़ते हुए सेमल के फाहे 
आ बैठे हैं काँधों पर 
ये अप्रैल से उम्मीद है 

Sunday, April 12, 2026

कहानियों के फूल हक़ीक़त की धरती पर खिल उठे थे


मुझे ख़्वाब देखते लोग बहुत अच्छे लगते हैं। उनके पास से अलग ही ख़ुशबू आती है। न जाने क्यों लेकिन ख़ुद ख़्वाब देखने से डरती रही। डर ख़्वाब टूट जाने का। डर मेरे ख़्वाबों का उपहास उड़ाए जाने का। 

लगभग आधी ज़िंदगी जी चुकने के बाद सहमते हुए ख़्वाबों की ओर हाथ बढ़ाना शुरू किया। चारों तरह देखते हुए कि कोई ख़्वाब देखते हुए देख न ले। कोई देखेगा तो मज़ाक ही उड़ाएगा 'आईं बड़ी, इत्ते बड़े-बड़े ख़्वाब देखने।वालीं'। 

फिर मैंने अपनी दुनिया समेट ली। लोगों से दूरी बना ली। शब्दों से, कुदरत से दोस्ती कर ली। अपनी छोटी-छोटी कहानियों में अपने तमाम सपने लिखने लगी। इन कहानियों में मैं थी, मेरा मन था। वो जंगल थे जिन्हें मैंने देखा नहीं, वो रास्ते जिनसे मैं गुजरना चाहती थी, मुक्कमल प्रेम की चाहना जो ख़्वाब में भी पूरा होने को तैयार नहीं। इन कहानियों समंदर, नदी, झरने, फूल, बादल, बारिश सब भरपूर थे। और थी इस धरती को प्यार से भर देने की इच्छा। 
मैं अपनी कहानियों में सांस लेने लगी थी, मैंने देखा मैं खुश रहने लगी हूँ। इन कहानियों से एक ख़ुशबू आती है जो मुझे टूटने से बचा लेती है।

फिर ये कहानियाँ भी जज की जाने लगीं। इनका भी उपहास किया जाने लगा। और हम सब जानते हैं कि हमारा मनोबल हमारे सबसे करीबी लोग ही तोड़ते हैं। मेरी कहानियों के फूल मुरझाने लगे, मेरी कहानी की नदियां सूखने लगीं। 

कहानियाँ लिखना बंद होने लगा। एक रोज मैंने ख़ुद को ख़ुद से बिछड़ते पाया। मैं सूखी नदी के सीने से धंस जाती और देर तक सुबकती रहती। अमावस की रात में चाँद ढूंढती फिरती। एक रोज मैंने अपने सूखे मन पर कुछ बूंदें महसूस कीं। मेरी ही कोई कहानी हक़ीक़त में मेरा हाथ थामकर मुझे लेकर चल पड़ी। मैं उसके पीछे-पीछे हैरत से, वो मेरा हाथ थामे मुसकुराते हुए।

मैं समझ गयी, मेरी कहानियाँ हक़ीक़त की ज़मीन पर उतर भी सकती हैं। वो समंदर का किनारा, वो प्रेमी के कांधे से टिककर घंटो जाते हुए सूरज को देखना, तारों की छाँव में बिना बोले बस चलते जाना और सोचना कि एक दिन यूध्ध खत्म हो जाएंगे सारे, धरती पर सिर्फ प्यार बचेगा। 

कहानी कहती, 'उस प्यार को बचाने के लिए भी युध्ध तो करना पड़ेगा। युद्ध सबको लड़ना होगा, हर किसी को। किसी से नहीं, ख़ुद से। अपने भीतर पल रही हिंसाओं से। तरह-तरह की हिंसाओं से।'

'फिर?' मैं कहानी से पूछती। 
'फिर दुनिया में कोई किसी से नफ़रत नहीं करेगा।'  कहानी मुस्कुराती। मैं उसका हाथ थामे उसके पीछे पीछे चलते हुए मासूमियत से पूछती 'लेकिन यह तो यूटोपिया है न ? 

कहानी मुझे हौसला देती, 'सपने देखने से न डर पगली। तू सपने लिख, क्या पता किसी दिन तेरे सपने हक़ीक़त बन खिल उठें।' यह सुनते हुए मैंने उस रोज अपने सबसे प्यारे सपने की हथेलियों को ज़ोर से अपनी हथेलियों में भींच लिया। मेरी आँखें बह निकली थीं, सुख से। सपने को सब पता होता है, उसने मुझे गले से लगा लिया। लहरों की आवाज़ कानों में घुल रही थी।

आसमान में तारे उस रोज झमककर खिले थे। सप्तऋषि मण्डल को देखते हुए हम ध्रुव तारे को ढूंढने लगे ताकि ख़्वाबों पर यक़ीन करना चाहिए इस बात पर ध्रुव तारे की मुहर लगा दी जाय। ध्रुव तारा मुस्कुरा रहा था।

अगली सुबह मैं नया ख़्वाब लिख रही थी....कि एक रोज़ धरती पर कोई किसी से नफ़रत नहीं करेगा, ईर्ष्या नहीं करेगा, कोई प्रेम से नफरत नहीं करेगा...

उस रोज चाँद आसमान से जाने को तैयार नहीं था। वो कहानी में लिखे ख़्वाब को किसी आयत की तरह  बुदबुदा रहा था। समंदर की लहरें करीब आकर बैठी थीं, एकदम शांत।

मैंने कहानी के अंत में लिखा...आमीन!

Friday, April 3, 2026

जीवन के पास क्या मरहम है?


खरगोशों की उदुक-फुदक दिन के उगने से पहले धरती को संवार रही है। अरसे बाद बालकनी से लटक कर लगभग कांधे से आ लगने को आतुर अशोक धरती को शोक मुक्त करने की प्रार्थना में मानो आँखें मूँदें खड़े हैं। धूप के कुछ कतरे इधर-उधर बिखरना शुरू हो चुके हैं।

इस सुबह में कल रात का कलरव भी दाखिल है। पूर्णमासी का चाँद मानो सुबह के करीब रखे चाय के कप को जरा सा सरकाकर बैठा ऊंघ रहा हो। मैं नन्हे अचंभे से चाय के कप को देख रही हूँ, जिसके दाहिनी तरफ सुबह की किरनें हैं और बायीं तरफ पूर्णमासी के चाँद की धज।

सुबह के वैभव को देखती हूँ तो खुशी गालों पर छलक़ने को आतुर होती है। ठीक उसी वक़्त कोई मध्धम सी सिसकी जो भीतर ही भीतर न जाने कबसे पल रही है आँखों के रास्ते बाहर आने का रास्ता ढूंढ लेती है। सिसकियाँ बेआवाज होती है, उन्हें भीड़ से डर लगता है। उन्हें आईने से भी डर लगता है। वे एकांत की फिराक में रहती हैं। वे फिराक में रहती हैं कि कब मैं भीड़ से तनिक हाथ छुड़ाऊँ और खुद के करीब आऊँ।

इस गहरी सिसकी में जमाने भर की औरतों की वेदना घुली है। इसमें मेरी बेबसी घुली है। जब्त है, आक्रोश है। मैं इससे आँखें नहीं चुरा सकती।

नन्हा सा सुख भी किसी कर्ज़ सा लगता है।

इस सुबह में प्यार है। साथ ही एक गुहार है। ईश्वर से प्रार्थना है, कि तुम हो, तो हो न यार। सारे पत्थर दिलों को मोम कर दो न। सारे हथियारों को फूलों में बदल दो न। सारे बस्तों में सपने भर दो, इस दुनिया को कुछ तो जीने लायक बना दो।

तो क्या मैं इतनी निराश हो चुकी हूँ कि किसी चमत्कार.का इंतज़ार करने लगी हूँ। मैं खबरें छुपाती फिरती हूँ, या खबरों से छुपती फिरती हूँ पता नहीं लेकिन जानती हूँ बच तो बिलकुल भी नहीं पाती।

अशोक के पेड़ों की कतारें जिस तरह प्रार्थनामय हैं मेरे हाथ अपने आप जुड़ गए हैं, ओ जीवन, जरा सा मरहम बन जा, जा जख्मी दिलों को गले से लगा ले। सामने ख़रगोश कुलांचे मार रहे हैं, सुबह पूरी तरह धरती पर बिखर चुकी है, लेकिन क्या अंधेरा पूरी तरह गायब हो चुका है।