Monday, January 24, 2022

बारिश पंचम सुर में आलाप ले रही है



एक समय था जब मैं प्यार में मर जाना चाहती थी. एक वक़्त है जब मैं प्यार को पी जाना चाहती हूँ. एक वह वक़्त था जब बेज़ारी थी ज़िन्दगी से, एक ये वक़्त है जब यारी है ज़िन्दगी से. सुबहों को घंटों परिंदों से बातें करते हुए महसूस होता है मानो मेरे भी पंख उग आये हों. उनके साथ मैं भी उड़ती जाती हूँ. पंडित शिव कुमार शर्मा संतूर पर राग भैरवी बजा रहे हैं. पहाड़ियां उन मधुर लहरियों में डूबती जा रही हैं.

मुझे इन दिनों अपने आसपास कोई नजर नहीं आता, कोई महसूस नहीं होता. ज़रूरत भी नहीं महसूस होती. वह जो खाली केंद्र था न, वह अब अपनेपन की महक से भर गया है. बाहर कुछ भी नहीं, सब भीतर है. उस भीतर तक पहुँचने के लिए हम बाहर भटकते फिरते हैं. सेहरा, पहाड़, दरिया पार करते हैं, लेकिन मिलता है वो किसी पेड़ के नीचे ही, एक चम्मच खीर खाकर या किसी कुटिया में झूठे बेर खाकर.
हम सबको जूठे बेरों की तलाश है. कोई इतने प्यार से चखकर रखे तो. कोई इतने प्यार से खीर बनाकर लाये तो. वह खीर की चाह थी जिसने खीर को ज्ञान का माध्यम चुना, वो चाह जिसे दुनिया भूख कहती है. असल में हमें अपनी भूख तलाशनी है. जिन चीज़ों के पीछे भाग रहे हैं, जिनके लिए जान दे रहे हैं वह हमारी भूख हैं ही नहीं. जो भूख है वहां हम पहुंचे ही नहीं. वहां पहुँचने की यात्रा ही जीवन है. मुझे मेरी भूख मालूम है. मुझे बारिश चाहिए (बेमौसम नहीं), मुझे ढेर धूप चाहिए, अंजुरी भर सर्दी चाहिए, अमलतास चाहिए, मोगरे का गजरा चाहिए, सामने मुस्कुराती जूही और हरसिंगार की गमक चाहिए.

मुझे इंतज़ार चाहिए...यही मेरी चाह है. मेरी इस चाह को परिंदे समझते हैं. तुम भी तो परिंदे ही हो. उड़ते-उड़ते जा बैठे हो किसी और डाल पर. तुम कनखियों से देखते हो, मुस्कुराते हो. मैं पुकारती नहीं, तुम आते नहीं. दूर जाकर तुम ज़्यादा क़रीब जो आ गये हो. मेरी शामों में मेरी सुबहों में तुम घुले हुए हो. डाल कोई भी हो तुम्हारी, दिल मेरे ही पास है जानती हूँ. बारिश पंचम सुर में आलाप ले रही है, सुन रहे हो न तुम?

Sunday, January 23, 2022

कहानी- अरुणिमा


- प्रतिभा कटियार

हरसिंगार के फूल हथेलियों में भरकर अरुणिमा के ऊपर गिराने में तरुण को जितना सुख मिलता अरुणिमा को उससे ज्यादा सुख मिलता कभी ठंडा पानी, कभी बर्फ के टुकड़े तरुण पर उछालकर. जब तरुण उसे धप्पा देने के लिए उसके पीछे भागता तो आगे भागती खिलखिलाती अरुणिमा की आभा पूरे घर में बिखर जाती. दोनों की जान बसती है एक दूसरे में. बहुत प्यार करता है तरुण अरुणिमा को और अरुणिमा तरुण को. हालाँकि वो तरुण के मुकाबले थोड़ा कम प्यार करती है तरुण को ऐसा वह खुद मानती है क्योंकि उसे लगता है वह थोडा सा प्यार खुद से भी करती है यह इनके प्रेम का शुरूआती दौर नहीं है. क्योंकि शुरूआती दौर की प्रेम कहानियों में तो ऐसे ही छलकता है प्रेम यह सामान्य बात है. लेकिन तरुण और अरुणिमा की यह प्रेम कहानी है 32 बरस पुरानी. पुरानी मतलब बीत नहीं चुकी चल रही है 32 बरसों से.

पूरे दो बरस बाद अपरिमित वापस आने वाला है. हालाँकि जीवन में आये तो उसे 28 बरस हो चुके हैं. पढ़ाई के लिए ऑस्ट्रेलिया गया था दो बरस बाद घर लौट रहा है. उसकी वापसी पर होना तो ख़ुशी का माहौल था लेकिन छाई उलझन, चिंता और बेचैनी है. हालाँकि यह सब तरुण की तरफ से ही है जिसे देख अरुणिमा को गुस्सा आ रहा है कि उसे कुछ बताया भी नहीं जा रहा और मुंह टेढ़ा है अलग. यूँ दोनों बाप बेटे हमेशा दोस्तों की तरह ही रहे हैं लेकिन अब जब आमने-सामने खड़े हैं तो दोस्त नहीं बाप और बेटे ही हैं. घर का माहौल हमेशा लोकतांत्रिक रहा. हमेशा सबके विचारों की इच्छाओं की स्पेस रही. तरुण खुद आज़ाद ख्याल था. कई बार तो वो अरुणिमा से इसलिए लड़ा कि वो अपने अधिकार के लिए चुप क्यों रही. या इसलिए कि इच्छा नहीं थी किसी काम की तो खुलकर मना क्यों नहीं किया. चाहे वो प्रेम के आंतरिक क्षण ही क्यों न हों. तरुण कहता, ‘किसी को बुरा न लग जाए इस ख्याल के साथ ही रिश्तों में समर्पण और त्याग की शुरुआत होती है और धीरे-धीरे ये किसी एक को निगल जाती है. इसीलिए बहुत कम रिश्ते बराबरी की बुनियाद पर खड़े होते हैं. हालाँकि दिखते जरूर हैं अब काफी रिश्ते बराबरी जैसे. यह भी एक ट्रेंड बन गया है फैशन, आधुनिक विचारों का चोला पहनना, लोकतान्त्रिक दिखना. लेकिन दिखने और सचमुच होने में अभी काफी दूरी है.’ अरुणिमा उसकी बात को लापरवाही से सुनते हुए आसमान में कुछ ढूँढने लगती. या खिड़की के बंद शीशे के बाहर हवा में लहराते झूमते पेड़ को देखने लगती. हालाँकि वह जानती थी कि तरुण कितनी महत्वपूर्ण बात कह रहा है.

इसी तरह के समझ भरे माहौल में परवरिश हुई है अपरिमित की. अरुणिमा और तरुण दोनों अलग-अलग विश्वविद्यालय में प्रोफेसर. अरुणिमा को इतिहास में दिलचस्पी थी तो वो बच्चों को इतिहास पढ़ाने लगी तरुण को राजनीतिशास्त्र में दिलचस्पी थी तो पढ़ाने लगा राजनीतिशास्त्र.

अपरिमित इन दोनों की संतान जरूर है लेकिन दोनों से अलग. उसकी आदतें अलग, ख्वाहिशें अलग और सपने अलग. उसे महंगे मोबाईल, बाइक की दरकार होने लगी. अरुणिमा ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘अब ये घर, घर हुआ. अब यहाँ दुनिया की ख्वाहिशें आयीं, बाज़ार आया...तरुण हंस देता लेकिन वो अपरिमित की हर ख्वाहिश पूरी करने को मना भी करता. तरुण कहता मुझे इस पीढ़ी की यह बात बहुत अच्छी लगती है कि इन बच्चों में जेंडर को लेकर दुराव नहीं है. हमारे ज़माने में तो लड़कों का लड़कियों से बात करना बहुत बड़ी बात होती थी लेकिन ये सब कितने सहज हैं एक दूसरे से. अरुणिमा हंस देती. ‘सच कह रहे हैं यह पीढ़ी खुलेपन में बहुत आगे है लेकिन काश विचारों के खुलेपन में भी होती.’ अरुणिमा का ध्यान देश के हालात से हट नहीं पाता. ‘छात्रों को किस तरह बरगलाया है भगवा राजनीति ने उन्हें उनके ही खिलाफ करने की उनकी साजिश और वे समझ ही नहीं पा रहे.’

‘सब लोभ की राजनीति है. सब समझ पा रहे हैं. वो अपने और अपने परिवारों के भीतर पलती न जाने कितने पुरानी नफरत को साधने निकल पड़े हैं.’ तरुण को तस्वीर के पार देखना आता था.

‘लेकिन दौर कोई भी हो कोई नेता क्यों नहीं मरता?’ अरुणिमा कहती तो तरुण गांधी..सुभाष...नेहरु...लाल बहादुर शास्त्री....इंदिरा...राजीव...भगतसिंह के नाम गिनाकर उसके सवाल का मुंह बंद कर देता. अरुणिमा सोचती कि इन नामों में कलबुर्गी, दाभोलकर, गौरी लंकेश, रोहित वेमुला और बहुत से नाम भी तो जुड़ने चाहिये. उसे अर्बन नक्सल के नाम पर जेल में ठूंस दिए गए तमाम चेहरे नजर आने लगे. और याद आ गया वो किस्सा जब तरुण की कक्षा में तरुण ने गौतम नवलखा, सुधा भारद्वाज आदि को एक्टिविस्ट कहा था तब कुछ छात्र उन्हें नक्सली कहकर उग्र हो गए थे. ‘वैसे सर, आपको इतना ही प्यार है उन लोगों से तो आपको भी उन्हीं के पास भिजवा देना चाहिए.’ कहते हुए शैलेश की आँखों में जो हिंसा उभरी थी वो अब तक सिहरन पैदा कर देती है. कितनी मुश्किल से उस दिन कक्षा संभली थी. तरुण को किसी तरह बचाकर स्टाफ रूम तक लाये थे कुछ छात्र छात्राएं लेकिन उस पर स्टाफ रूम में हमले शुरू हो गए थे. तमाम प्रोटेस्ट में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेने के कारण तरुण को यूँ भी साथी प्रोफेसर ज्यादा पसंद नहीं करते थे. अरुणिमा को भी काफी अपरोक्ष टिप्पणियाँ सुननी पड़ती थीं जिनका वह मजबूती से प्रतिवाद करती. लेकिन उस दिन की घटना के बाद से अरुणिमा भी डर गयी थी.

इधर ये दोनों देश के हालात से अपनी तरह से जूझ रहे थे उधर इन दोनों का लाडला देश की राजनीति पर लानतें भेजते हुए चला गया ऑस्ट्रेलिया. अपरिमित मेडिकल की आगे की पढ़ाई के लिए ऑस्ट्रेलिया गया था. आर्थोपेडिक में एमएस करने. वहां उसे अनम मिली और अनम से उसकी दोरती बिना ज्यादा वक्त गंवाए लिवइन रिलेशनशिप में बदल गयी थी. यह बात भी अरुणिमा और तरुण से छुपी नहीं थी क्योंकि छुपाई भी नहीं थी अपरिमित ने. अपरिमित के शब्दों में अनम ब्यूटी विद ब्रेन एंड करेज है. बचपन में माँ बाप को खो चुकी अनम को उसकी मौसी ने पाला. कम ही उम्र में अनम पढाई के साथ काम करने लगी. खुद को खुद उठाया और खुद बनाया.

अरुणिमा ने अपरिमित की परवरिश में उसकी टीन एज में हुए पहले ब्रेकअप के वक्त एक ही बात कही थी, ‘जो भी रिश्ते बनाना तब बनाना जब उन्हें संभाल पाने की कूवत हो जाय. उन रिश्तों को जैसे भी जीना, उनमें कितना गहरे उतरना कितना नहीं यह सब तुम खुद तय करना लेकिन याद रहे कभी किसी कंधे की तलाश नहीं करना. यानी अपने दुःख उठाने की ताकत खुद पैदा करना. और ध्यान रखना कि किसी के दुःख की वजह तुम न बनो. एक सत्रह साल के लड़के के लिए जिसका अभी-अभी पहला ब्रेकअप हुआ हो ये सब बातें बहुत अजीब थीं. उसे ज्यादा कुछ समझ तो नहीं आया सिवाय इसके कि मम्मी पापा को उसके अफेयर से कोई प्रॉब्लम नहीं है.

अपरिमित आकर तरुण के पाँव छूने झुका तो तरुण ने उसे हमेशा की तरह लपक कर सीने से लगाने की बजाय रूखा सा ‘खुश रहो’ भर कहा. अरुणिमा ने सीने से लगा लिया अप्पू को पीठ पर हाथ फेरते हुए बिना यह जाने कि गड़बड़ क्या है उसके कान में फुसफुसाकर कहा, ‘सब ठीक हो जाएगा.’ एक अबोला घर में डोलने लगा हालाँकि सब आपस में बात कर रहे थे फिर भी. जब तक कोई बात जो केंद्र में हो उस पर बात नहीं होती सारी बातें फिलर जैसी ही लगती हैं.

अरुणिमा जानती है कि फिलर्स कई बार बहुत कीमती होते हैं. तरुण और अरुणिमा जब शुरूआती दिनों में मिला करते थे, दुनिया भर की बातें किया करते थे सिवाय प्रेम के. राजनीति, समाज, धर्म, खबरें जाने क्या क्या. और घंटों बातें करने के बाद भी प्यासे ही लौट जाते थे. एक रोज अरुणिमा ने ही खिसियाकर कहा, ‘मुझे नहीं करनी ये सब बातें’ और वो रुआंसी हो आई थी. तरुण समझ तो गया था लेकिन अनजान बनते हुए बोला, ‘तो तुम बताओ कौन सी बात करनी है...’ अरुणिमा ने अपनी बड़ी-बड़ी आँखें तरुण की आँखों में धंसा दीं. ‘तुम्हें नहीं पता?’ वो बोली. तरुण ने ढीठ बनते हुए मुस्कुराकर कहा, ‘नहीं’. अरुणिमा गुस्सा होकर चल दी, ‘तो ठीक है फिर मैं जा रही हूँ.’ तरुण ने उसे रोक लिया था, रुको एक कविता सुनाता हूँ उसके बाद जाना..’

क्या जीवन की इस ऊबड़-खाबड़ डगर पर
घनी धूप में मेरे साथ चलोगी
क्या तुम धारधार बारिश में
जीवन भर मेरे साथ भीगोगी
क्या तुम सर्द रातों में
जीवन के अलाव की आंच बढ़ाने को
अपने साँसों का ईंधन खर्च करोगी
मैं तुम्हारे जूड़े में अमलतास लगाना चाहता हूँ
तुम पर हरसिंगार बरसाना चाहता हूँ
तुम्हारे साथ गुलमोहर का एक पौधा रोपना चाहता हूँ
जो तब भी खिले जब हम न रहे...
बोलो क्या तुम मेरे साथ वो पौधा लगाओगी?


वो कविता नहीं थी अरुणिमा की जिन्दगी थी. उसकी आँखें डबडबा आई थीं. उस कविता का असर यह हुआ कि गुलमोहर का पौधा घर के बाहर खिलखिला रहा है और अपरिमित प्यार जीवन में लहक रहा है.

लेकिन अभी अरुणिमा को यह जानना था कि साहबजादे ने ऐसा क्या कर दिया कि तरुण इस कदर गुस्से में है. ‘तुम्हें पता है अनम प्रेग्नेंट है ?’ गुस्से में उफनते हुए तरुण ने कहा. 28 साल का मैच्योर लड़का ऐसी फूहड़ गलती कैसे कर सकता है’ तरुण ने दांत भींचते हुए कहा.

अरुणिमा को अब जाकर मामला समझ में आया.
उधर अपरिमित सोच रहा था कि कैसे बताये पापा को कि प्रिकाशन लिया था उसने, फेल हो गया. साले कंडोम कम्पनी वालों पर केस करना चाहिए. इनके चक्कर में न जाने कितनी फटे हुए कंडोम की औलादें जन्म ले रही हैं.

‘ह्म्म्म तो यह बात है, अब इस समस्या का समाधान एक ही हो सकता है शादी.’ अरुणिमा ने अपनी ख़ुशी को जज्ब करते हुए कहा. हालाँकि अरुणिमा को शादी को हल के रूप में देखना खुद भी अजीब लग रहा था. शादी न भी हो तो भी क्या लिव इन लीगल है भाई. बस क्लियर हो जाओ और रहो साथ. लेकिन रहना साथ. यह जरूरी है. लिव इन को लाइटली लेकर निकल मत लेना बीच से.

अनम बच्चा अबौर्ट करने को राजी नहीं है. अपरिमित ने कहा.
‘हाँ तो क्यों अबौर्ट करना है?’ अरुणिमा को इस बात का कोई तुक ही समझ में नहीं आया.
‘यानी वो तुम पर शादी का दबाव बना रही है? क्यों? समाज के डर से ही न? वो सिर्फ तुम्हें धमका रही है. ब्लैकमेल कर रही है.’ तरुण ने अपना तमाम अनुभव विश्लेष्ण में पिरो दिया.
‘नहीं पापा, अनम शादी की बात इसलिये नहीं कह रही है कि सोसायटी से डरती है वो. वो बहुत हिम्मती है. वो शादी करना चाहती है क्योंकि वो मुझसे सच में प्यार करती है, और मुझसे ज्यादा तो उसे मेरा फैमली पसंद है. खासकर मम्मा. शी वांट्स अ फैमली’ कहते हुए अपरिमित के भीतर की तरलता उसकी आवाज में घुल गयी.
अरुणिमा इतनी खुश हुई यह सुनकर, ‘अनम मुझे बहुत पसंद है अगर वह बहू बनती है तो इससे अच्छा क्या होगा भला.’ उसने कहा.
तरुण ने गुस्से में कहा,’ तुम बिना कुछ जाने रिश्ते मत बनाने लगो.’
‘तो बताओ मुझे कि असल समस्या क्या है?’

‘अप्पू को आये चार दिन हो गए आप लोग कोई बात ही नहीं कर रहे. सस्पेंस खत्म करो और बताओ मुझे कि क्या चल रहा है तुम दोनों के दिमाग में जो मैं नहीं जानती.’ अरुणिमा ने चाय टेबल पर रखते हुए कहा. बाहर गुलमोहर अपनी रंगत पर इतरा रहा था. भीतर तनाव पसरा हुआ था.
‘क्या बताऊँ? ऐसा फंसा दिया है साहबजादे ने?’ तरुण ने चश्मा उतारकर टेबल पर रखा और चाय उठाई.
‘पापा मैं भी तो फंस गया हूँ मैं क्या करूँ. हो गयी गलती.’
‘तो मैं बता रही हूँ, अप्पू और अनम की शादी करा दो बस बात खत्म’ मैं दादी बनने वाली हूँ इस बात की कोई ख़ुशी भी नहीं मनाने दे रहा.’ अरुणिमा ने हंसते हुए माहौल को सहज करते हुए कहा.
‘यार वो लड़की मुसलमान है, पाकिस्तान से है कैसे होगी शादी?’ तरुण ने शब्दों को चबा चबाकर कहा. अरुणिमा को झटका लगा तरुण के मुंह से यह सुनकर. हालाँकि अनम मुसलमान है पाकिस्तानी है यह बात नहीं पता थी अरुणिमा को लेकिन तरुण ‘इस बात’ से परेशान है इस बात का झटका लगा अरुणिमा को.
‘क्या? इस बात से परेशान हो तुम? तुम तरुण?’ अरुणिमा ने बेहद हैरत से कहा. उसे लगा वो इस तरुण को जानती ही नहीं है. तरुण ने अपनी निगाहें खिड़की के बाहर टिका दीं.
‘तुम जरूर मजाक कर रहे हो यह वजह नहीं हो सकती तुम्हारी चिंता की. सच बात बताओ.’ अरुणिमा की नायकीनी बढ़ती ही जा रही थी.
‘मैं कोई मजाक नहीं कर रहा.’ तरुण ने खिड़की के बाहर नजर टिकाये हुए ही कहा.
‘तुम तो हमेशा ऐसी बातों की खिलाफत करते रहे. सारी जिन्दगी प्रोटेस्ट किया, हिन्दू मुस्लिम एकता की बातें की. हिंदुस्तान पाकिस्तान के बीच दोस्ताना संबंधों की बात करते रहे, छात्रों को एकता के पाठ पढ़ाते रहे. आज जब घर में प्यारी सी बहू और पोता या पोती आने को है तुम यह कह रहे हो? यह बात?‘ अरुणिमा ‘यह बात’ पर केन्द्रित थी. यह ‘यह बात’ यूँ तो कॉमन है समाज में खासकर इन हालात में लेकिन तरुण ऐसी बात कहेगा यह अरुणिमा के लिए आश्चर्यजनक और असहनीय हो रहा था.

‘एक तो तुम पहले ये बहू और पोता पोती की बात करना बंद करो मम्मी.’ यह अपरिमित का स्वर था. एकदम चिढ़ा हुआ. अब अरुणिमा हैरत से बेटे को देख रही थी.

‘पापा, मुझे धोखा दिया है उस लड़की ने. मैं आपसे कह रहा हूँ आप सुनते क्यों नहीं मेरी बात?’
अरुणिमा को लग रहा था वो अजनबी लोगों के बीच है.

‘धोखा दिया है?’ ये क्या बात कर रहे हो? क्या हुआ है बताओगे मुझे भी. मैं भी रहती हूँ न इसी घर में. कोई मुझे कुछ बतायेगा.’ अरुणिमा लगभग चीख पड़ी थी.
‘मम्मा उसने मुझे बताया ही नहीं कि वो मुसलमान है. लिव इन में आने के साल भर बाद मुझे पता चला जब उसकी मासी आईं उससे मिलने. उसे देखकर कोई कह ही नहीं सकता वो मुसलमान है.’
‘क्या....क्या बात कर रहा है ये लड़का. कोई बताता है क्या कि वो मुसलमान है? क्या कोई लड़की किसी लड़के से मिलने से पहले मैं मुसलमान हूँ का टैग लगाकर जायेगी. उसे देखकर लगता नहीं का क्या मतलब है. पता चला का क्या मतलब है और अगर है तो फर्क क्या पड़ता है.’ अरुणिमा बौखला गयी थी एकदम. तरुण की बात अप्प्पू की बात. एक पति है, दूसरा बेटा है.
जिन्दगी भर सेकुलर दिखने वाला पति कह रहा है वो मुसलमान है, पाकिस्तान से है कैसे होगी शादी?’ और मुक्त लोकतान्त्रिक परिवेश में पले बढ़े साहबजादे कह रहे हैं, ‘उसने मुझे धोखा दिया यह न बताकर कि वो मुसलमान है.’
‘फर्क पड़ता है...’ अप्पू और तरुण दोनों ही एक साथ बोले.
‘तुम उसे बोल दो कि तुम्हारे पैरेंट्स नहीं मान रहे?’ तरुण ने अप्पू को समझाते हुए कहा.
‘पापा आप समझ नहीं रहे हैं. मैं खुद उससे शादी नहीं करना चाहता. मैं एक पाकिस्तानी से शादी कैसे कर सकता हूँ. लिबरल होने का यह अर्थ तो नहीं कि मैं मुसलमान बच्चे पैदा करूँ’. अपरिमित ने अपना पक्ष स्पष्ट कर दिया.
‘अरे वाह, फिर तो मामला क्लियर है’ तरुण के चेहरे पर ख़ुशी के भाव आ गए.
‘नहीं है क्लियर मामला क्योंकि वो अबार्शन के लिए राजी नहीं है.’ अप्पू ने कहा. और अगर उसने बच्चे को जन्म दिया जो वो देगी ही क्योंकि वो बहुत जिद्दी है और खुद मुख़्तार भी तो जीवन भर दिल में फांस रहेगी कि मेरा एक बच्चा है जिसकी माँ मुसलमान है. लिव इन से हुए बच्चे भी लीगल राईट रखते हैं न अब तो.’
अपरिमित बोले जा रहा था. अरुणिमा को चक्कर से आने लगे थे. उफ्फफ कितना कुछ सोच चुका है वो. इतनी घृणा उससे जिससे प्रेम किया जिसकी कोख में इसका बच्चा है? और घृणा का कारण देश और धर्म. तरुण जो हमेशा कहता था ‘बच्चे हिन्दू मुसलमान पैदा नहीं होते’ वो इस बात पर इतना खुश कि अप्पू शादी नहीं करना चाहता उससे.
‘मैं तो यह सोचकर आया था कि मम्मा शायद अनम से बात करें तो वो मान जाए. मम्मा को बहुत पसंद करती है वो. उन्हें बहुत एप्रीशिएट भी करती है...’ अप्पू ने रुक रुक कर कहा.
‘क्या?’ अरुणिमा के चौंकने का सिलसिला लगातार चले ही जा रहा था. शाम अब रात का रूप धरकर घर के भीतर घुस आई थी. अरुणिमा को लगा घर के भीतर ही नहीं जीवन के भीतर भी घुस आई है रात.
‘मुझे लगा था मुझे तेरे पापा को मनाना है तेरी शादी के लिए लेकिन मुझे तो अनम को मनाना है एबार्शन के लिए..?’ अरुणिमा लगभग रो पड़ी थी कहते-कहते.
‘तो इसमें प्रॉब्लम क्या है. कुछ बातें प्रैक्टिकल होकर सोचनी ही पड़ती हैं.’ तरुण ने अरुणिमा की ओर देखते हुए कहा.
अरुणिमा को अनम का चहकता हुआ चेहरा याद आने लगा. ‘प्रॉब्लम’ कहाँ है समझ ही तो नहीं पायी मैं तरुण’. कोई दुःख चीरता हुए नसों में उतर गया अरुणिमा के.
‘धोखा अनम ने तुम्हें नहीं दिया बेटा धोखा तो मुझे मिला है.’ अरुणिमा ने कहा तो तरुण ने मानो सुना ही नहीं.
टेबल पर रखा अपरिमित का फोन बज उठा. अनम का फोन था. अरुणिमा ने कहा ‘उठा ले अप्पू तू चाहता था न मैं उससे बात करूँ ला मैं करती हूँ बात.’ अरुणिमा के यह कहते ही तरुण और अपरिमित दोनों के चेहरे पर राहत सी आ गयी. अप्पू ने फोन उठाकर अरुणिमा को दे दिया,
‘हैलो आंटी..’ अनम ने बोला तो सुनते ही अरुणिमा की आँखें छलछला आयीं. वो भीगी हुई आँखों से अनम को देखती रही. स्त्री जब गर्भ से होती है तो एक अलग ही आभा दिपदिपाती है उसके चेहरे पर. वही आभा थी अनम के चेहरे पर जिसमें अपरिमित की बोई अवसाद की लकीरें भी शामिल थीं.
‘अनम, कैसी हो तुम? अपना ख्याल तो रख रही हो न?’
‘जी आंटी. आप कैसी हैं?’ अरुणिमा सोचने लगी कि वो कैसी है और गीली सी हंसी चेहरे पर बिखेर कर उसने कहा’ अच्छी हूँ. बहुत अच्छी हूँ.’ उधर तरुण और अपरिमित इस प्रेमिल वार्तालाप को ध्यान से सुन रहे थे कि उन्हें इस वार्तालाप में से आती उम्मीद की धुन सुनाई दे रही थी.
‘अनम, तुम अपना और बच्चे का ख्याल रखना. चिंता एकदम न करना.’ ‘अनम का चेहरा खिल उठा उसे लगा उसकी शादी फैमिली से और अपरिमित से अप्रूव हो गयी है हालाँकि वो क्यों इस अप्रूवल का इंतजार कर रही थी उसे भी पता नहीं. वो अपरिमित से अक्सर कहा करती थी ‘मैंने अपनी माँ को नहीं देखा लेकिन आंटी को देखकर मुझे लगता है काश वो मेरी माँ होतीं.’ जब वो यह कहा करती थी तब शादी और प्रेगनेंसी की बात दूर-दूर तक नहीं थी.
‘मैं जानती थी आंटी अपरिमित को आप जरूर समझा सकेंगी. वो मान गया न?’ अरुणिमा ने मोबाईल के स्क्रीन से नजर उठाकर अपरिमित के सपाट चेहरे की ओर देखा. ‘सॉरी अनम, मैं किसी को कुछ नहीं समझा सकी. खुद ही समझ गयी हूँ कुछ बातें.’ यह कहते हुए अरुणिमा ने बारी-बारी से तरुण और अप्पू को उदास गुस्से के साथ देखा.
अनम की आँखें डबडबा आई थीं. अरुणिमा की आँखों में भी कोई धार फूट पड़ने को थी. और ये बरसने को व्याकुल आंसू कमजोरी की निशानी हरगिज़ नहीं थे.
‘अनम मेरा एक काम करोगी प्लीज़?’ अरुणिमा ने मानो मन ही मन कोई फैसला कर लिया हो.
‘जी आंटी बताइए न’ अनम के कहने में अपनापन छलक रहा था.
‘मेरा एक एयर टिकट करा दो अपने पास आने का. मैं जल्दी से तुम्हें गले लगाना चाहती हूँ.’ यह कहते हुए रुकी हुई धार अरुणिमा की आँखों से बह चली.
‘हाँ, जरूर’ कहते ही अनम का दुःख का रोना सुख के रोने में बदलकर मोबाईल स्क्रीन पर मोतियों की तरह बिखरने लगा.
तरुण और अपरिमित किसी पराजित सैनिक की तरह सर झुकाए बैठे थे.

Thursday, January 20, 2022

कौन जात हो भाई?



दलित पीड़ा और विक्षोभ को स्वर देने वाली कविता किस तरह दबाई जाती है, प्रियदर्शन जी की एक टिप्पणी जो  ndtv.in पर प्रकाशित हुई है. 

इसलिए ज़रूरी है इस कविता पर पाबंदी!
 
कौन जात हो भाई?
“दलित हैं साब!”
नहीं मतलब किसमें आते हो? /
आपकी गाली में आते हैं
गन्दी नाली में आते हैं
और अलग की हुई थाली में आते हैं साब!
मुझे लगा हिन्दू में आते हो!
आता हूँ न साब! पर आपके चुनाव में।
 
जब कोई जान जाता है कि वह हमारी गाली, नाली और अलग की हुई थाली में आता है और इसे बड़ी सहजता से कह देता है तो क्या होता है? हमारे भीतर हमारी सोई हुई शर्म कुछ देर के लिए जाग जाती है। अपने-आप से आंख मिलाते हुए कुछ देर के लिए असुविधा होती है। एक दलित पीड़ा जैसे सवर्ण अहंकार या विनम्रता दोनों से अपना हिसाब मांगने लगती है, दोनों को कठघरे में खड़ा कर डालती है। लेकिन जिन पंक्तियों से यह टिप्पणी शुरू हुई है, उनका इस चुनावी दौर में एक राजनीतिक आशय भी निकल आता है- कि हिंदू हितों की बात करने वाले लोग दलितों को तभी हिंदू मानते हैं जब चुनाव आते हैं।
 
यहीं से यह सच ख़तरनाक हो उठता है। इस पर कुछ लोगों को पाबंदी ज़रूरी लगती है। इस कविता को रोकने का काम शुरू हो जाता है। दरअसल इस कविता का उल्लेख करने की ज़रूरत इसलिए है कि इसे इंस्टाग्राम पेज पर डाला गया था और फिर आधे घंटे के भीतर इसे हटा लिया गया। किसी ने इसकी शिकायत कर डाली। यह जानकारी देते हुए हमारे प्रबुद्ध मित्र महेश मिश्र ने यह पूरी कविता भेजी।

ये पंक्तियां एक नामालूम से युवा दलित कवि बच्चा लाल 'उन्मेष' की हैं। पूरी कविता का नाम है 'छिछले प्रश्न गहरे उत्तर'। बच्चा लाल 'उन्मेष' इतने नामालूम हैं कि पहले यह जानने की ज़रूरत महसूस हुई कि यह कवि है कौन। इसके लिए मैंने बाक़ायदा अनिता भारती और रजनी अनुरागी जैसी सुख्यात लेखिकाओं से संपर्क किया।
कविता निस्संदेह हमें छीलती है। समाज में जिस अमानवाीय अन्याय का हम सदियों से पोषण कर रहे हैं, उसे यह कविता बिल्कुल सामने ला देती है। कविता की अगली पंक्तियां हैं-

क्या खाते हो भाई?
“जो एक दलित खाता है साब!”
नहीं मतलब क्या-क्या खाते हो?
आपसे मार खाता हूँ
कर्ज़ का भार खाता हूँ
और तंगी में नून तो कभी अचार खाता हूँ साब!
नहीं मुझे लगा कि मुर्गा खाते हो!
खाता हूँ न साब! पर आपके चुनाव में।

यह सिर्फ शब्दों का खेल नहीं है। कविता शब्दों का खेल होती भी नहीं। इसमें सदियों की हूक है, उपेक्षा का अनुभव है, शोषण की स्मृति है और कमाल यह है कि यह सब कुछ इस तरह कहा गया है जैसे कवि इस पूरी पीड़ा से निकल कर एक आईना खोज लाया है जिसमें हमारी सभ्यता का बेडौल-विरूप चेहरा दिखाई पड़ रहा है। यह वर्चस्ववाद के ख़िलाफ़ एक कार्रवाई है और इस लिहाज से जुर्म है। इसे निषिद्ध किया जाना है। यह लोकतंत्र के उस चुनावी खेल पर भी चोट करती है जिसमें दमन के सामाजिक यथार्थ पर प्रलोभन का राजनीतिक लेप चढ़ाया जाता है। कविता आगे कहती है-

क्या पीते हो भाई?
“जो एक दलित पीता है साब!
नहीं मतलब क्या-क्या पीते हो?
छुआ-छूत का गम
टूटे अरमानों का दम
और नंगी आँखों से देखा गया सारा भरम साब!
मुझे लगा शराब पीते हो!
पीता हूँ न साब! पर आपके चुनाव में।

असल पेच यहां खुलता है। नंगी आंखें अब भरम देखने में सक्षम हैं। होने-खाने-पीने के बेहद मामूली लगते सवालों के ये गैरमामूली लगते जवाब फिर से हमारा और हमारी तथाकथित सभ्यता का मज़ाक उड़ाते हैं- हमारे राजनीतिक पाखंड का भी। कविता चुनाव पर भी चोट करती है। फिर इस पर रोक तो लगेगी ही। अब आगे देखिए- कविता के 

अगले सवाल-जवाब-
क्या मिला है भाई
“जो दलितों को मिलता है साब!
नहीं मतलब क्या-क्या मिला है?
ज़िल्लत भरी जिंदगी
आपकी छोड़ी हुई गंदगी
और तिस पर भी आप जैसे परजीवियों की बंदगी साब!
मुझे लगा वादे मिले हैं!
मिलते हैं न साब! पर आपके चुनाव में।

यहां से हमला तीखा होता जाता है। उनकी जिल्लत भरी ज़िंदगी में हमारे हिस्से की गंदगी भी शामिल है और हमारी परजीविता भी। चाहें तो आप इसे एक समाजशास्त्रीय सच्चाई की तरह पढ़ सकते हैं। याद कर सकते हैं कि इस देश के जो सबसे ज़रूरी काम हैं- बिल्कुल बुनियादी स्तर के- हर तरह की साफ-सफ़ाई के- वे अब तक उनके भरोसे चल रहे हैं। और उनके सामने ये हक़ीक़त खुली हुई है। कविता का अंतिम हिस्सा इसी काम पर है-

क्या किया है भाई?
“जो दलित करता है साब!
नहीं मतलब क्या-क्या किया है?
सौ दिन तालाब में काम किया
पसीने से तर सुबह को शाम किया
और आते जाते ठाकुरों को सलाम किया साब!
मुझे लगा कोई बड़ा काम किया!
किया है न साब! आपके चुनाव का प्रचार..।

फिर पूछने की इच्छा होती है कि क्या इस कविता पर पाबंदी लगनी चाहिए? और यह जानने की ज़रूरत महसूस होती है कि इस कविता की शिकायत किन लोगों ने की होगी? क्या सोशल मीडिया की भी कथित लोकतांत्रिकता पर उन्हीं वर्चस्ववादी ताक़तों ने क़ब्ज़ा कर लिया है जिनकी ठकुरसुहाती को कभी हर शाम सलाम चाहिए होता था?
यह वह राजनीतिक समय है जब हर कोई अंबेडकर का नाम लेता है- वे भाजपाई भी जिन्हें पता नहीं है कि अंबेडकर ने हिंदुओं को बहुत सख़्ती से बीमार समुदाय की संज्ञा दी थी और कहा था कि उनकी बीमारी देश के दूसरे समुदायों की भी सेहत और खुशहाली पर असर डाल रही है। यह वह सामाजिक समय है जो सदियों के पाखंड को अब भी ढोता है। इस समय में अपनी राजनीतिक मजबूरियों का मारा कोई रविकिशन दलितों के घर खाना खाने जाता है और बाद में उनके पसीने को याद कर भन्नाता है। इसका भी वीडियो इन्हीं दिनों वायरल है।
बच्चालाल 'उन्मेष' की कविता पर पाबंदी ज़रूरी है। यह हमारे शिष्ट आस्वाद पर चोट करती है। यह उस लोकतांत्रिक सहमति को ख़ारिज करती है जिसके नाम पर पिछड़ों और दलितों की राजनीति की जाती है। और सबसे ख़तरनाक बात- यह दलितों को याद दिलाती है कि उन्होंने क्या-क्या झेला है और किनके हाथों झेला है। जिस समय इस देश की अदालत सुझाव देती है कि दलित शब्द का इस्तेमाल करने से बचना चाहिए, उस समय यह दलित संज्ञा एक चुनौती की तरह हमारे सामने आती है। सोशल मीडिया ऐसी चुनौतियों से निबटने का तरीक़ा जानता है। लेकिन वह यह नहीं जानता कि पाबंदियां रचनाओं को अतिरिक्त शोहरत दे देती हैं, कि सच्चाइयां फिर भी बाहर निकलने का रास्ता तलाश लेती हैं।

Sunday, January 16, 2022

नागरिक समाज- बसंत त्रिपाठी का कविता संग्रह



इस इतवार की तैयारी कल शाम ही हो गयी थी. तीन नयी किताबें सिरहाने रखकर सोई जो थी. इन्हें पढ़ने का मोह इस कदर था कि सुबह नींद जल्दी खुल गयी. पहली चाय के साथ अख़बार को पांच मिनट में उलट-पुलट कर रखकर सैर पर चली गयी. लेकिन कुछ था घर में जो पुकार रहा था. सैर से लौटते ही एक चाय और चढ़ाई और ‘नागरिक समाज’ उठा ली. सच कहती हूँ, अरसे बाद लगा कि कुछ मन का पढ़ा है. कुछ ऐसा जो मुझे झकझोर रहा है. कविताओं के सैलाब से गुजरते हुए शायद खो गया था ये स्वाद. मित्र कवि बसंत त्रिपाठी का यह संग्रह ज़ेहन की भूख मिटाता भी है और बढ़ाता भी है. ये कवितायें आईना हैं देश का, समाज का और हमारा. मुझे मालूम नहीं कि जैसा मैं महसूस कर रही हूँ उसे कैसे लिखूं, शायद नहीं लिख पाऊंगी, अभी सीखना बाकी है जस का तस अभिव्यक्त कर पाना.

इन कविताओं को पढ़ते हुए महसूस होता है कि कवि होना कितनी पीड़ा, कितनी बेचैनी में होना है. और यह पीड़ा यह बेचैनी उस समय और समाज को लेकर है जिससे असल में निज की निर्मिति होती है. बिना सतर्क नज़र और साफ़ नज़रिये के आप कुछ भी हो सकते हैं कवि नहीं. इन कविताओं को पढ़ते हुए अपने उस निज की पड़ताल होती है जो सुविधाभोगी घेरे में मतलब भर की वैचारिकी (जिसमें जोखिम न हो) के साथ बहस, आन्दोलन कर लेता है. ये कवितायेँ आपका हाथ पकड़कर समाज के उन स्याह कोनों, वहां के लोगों के जीवन तक ले जाती हैं जिनकी बात किये बगैर नहीं है अर्थ किसी बात का. ये कवितायेँ बार-बार पढ़े जाने वाली कवितायेँ हैं. सेतु प्रकाशन से प्रकाशित यह कविता संग्रह बसंत त्रिपाठी का चौथा कविता संग्रह है.

इन्हें पढ़ते हुए आपको सुख नहीं होगा, बल्कि आपके कम्फर्ट में खलल पड़ेगा फिर भी मैं कहूँगी कि इन कविताओं को पढ़ा जाना जरूरी है. इसी संग्रह की अलग-अलग कविताओं से कुछ पंक्तियाँ-

केवल विकास दर के बढ़ते ग्राफ से नहीं
अपहरण बलात्कार और आत्महत्याओं के तरीकों से भी
यह सदी दर्ज हो रही है इतिहास में
इतिहास के अंत के भाष्यकारों से नहीं
इतिहास में शामिल होने
और उसे बदल डालने की इच्छा से भी
आप जान सकते हैं इस सदी को....

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लड़ना तो दूर
कहीं जगह ही नहीं थी मेरी
क्यों न खुद को खत्म कर लूं
बस इस ख्याल का आना था
कि यमदूतों ने अपने भालों की नोक चुभोयी-
‘तुम्हारा समय अभी नहीं आया है मि बसंत
तुम्हें इस देश में अपने हिस्से की जिल्लत
पूरी-पूरी झेलनी है.’

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बोलना जरूरी है
कभी-कभी चीखना और झुंझलाना भी
लेकिन सिर्फ बोलने और चीखने और झुंझलाने से
ईमानदार नहीं हो जाता हर कोई
ढोल संगत देने के लिये ही नहीं
अपनी पोल छुपाने के लिए भी
बजता है कई बार
ढडंग... ढडंग...

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देशभक्त आजकल देश से गिरकर
भक्त पर अटके हुए हैं
और बाबाओं की तो अब रहने दें
वे जब तब धर्म की गंधाती व्यापारिक नाली में
गिरते ही रहते हैं
अब तो क्रांतिकारिता भी फेसबुक पर लाइक की आस में
हर सुबह गिर पड़ती है
गिरने का कारोबार उठान पर है अब
जो जितना गिरता है
उसकी आभा उतनी ही निखरती है.

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मुख्यमंत्री के चरित्र के गिरने का ग्राफ
प्रधानमंत्री जैसा नहीं होता
न उनके सचिव एक जैसे गिरते हैं
और मंत्रियों का तो कहना ही क्या
उनका चेहरा क़दमों पर इतना गिरा होता
कि मंत्रित्व काल में
कभी ठीक से दिखाई नहीं पड़ता पूरा...

Friday, January 14, 2022

कहानी- छुट्टी


- प्रतिभा कटियार
‘मम्मा, आज ऑफिस न जाओ. प्लीज़ मम्मा.’ बिस्तर में कुनमुनाते हुए विशु ने मंदिरा का हाथ पकड़ लिया. तेज़ी से घर के काम निपटाती मंदिरा एक पल को भरभरा के गिरने हुई जैसे. यार अब ये लास्ट मूमेंट इमोशनल क्राईसिस कैसे मैनेज करेगी वो. अभी और भी काम पड़े हैं घर के. विशु के लिए फ्रूट्स काटकर रखने हैं, अपना नाश्ता पैक करना है और हाँ बाल भी बनाने हैं अभी तो. उसने मन ही मन सोचा बालों को लपेटकर जूड़ा बना लेगी फिर ऑफिस के वाशरूम में ठीक से बना लेगी. नाश्ता भी चलो पैक कर लेगी टी ब्रेक में खा लेगी लेकिन अब विशु का वो क्या करे. अपनी तमाम अधीरता को समेटते हुए, ढेर सारा लाड़ आवाज़ में घोलते हुए उसने विशु के माथे को चूमना चाहा तो उसे उसका माथा तपता हुआ लगा. छूकर देखा तो उसे बुखार था.

मंदिरा वहीँ बैठ गयी. सब कुछ संभालने की जद्दोजहद ऐसे मौकों पर एकदम से ढह जाती है. ऑफिस की मीटिंग, उसका प्रेजेंटेशन सब फ्रीज़ हो गया एकदम से. नौ बरस के बच्चे को बुखार में छोड़कर कैसे जा सकती है वो. लेकिन एन वक्त पर ऑफिस से छुट्टी भी कैसे ले सकती है. दोनों ‘कैसे’ के बीच घड़ी की सुई मुंह चिढ़ाते हुए टिक टिक कर रही थी.

महेश को फोन मिलाया हालाँकि वो जानती है कि उसे फोन मिलाने से कोई फायदा नहीं होगा फिर भी उसने महेश का नम्बर डायल कर दिया. पहली कॉल महेश ने उठायी नहीं, दूसरी कॉल पर वो झल्ला पड़ा ‘यार सुबह से ही तुम क्यों परेशान करने लगती हो अभी ऑफिस पहुंचा हूँ, काम शुरू हुआ है. बाद में कॉल करना.’ कहकर महेश ने फोन काट दिया.

मंदिरा को गुस्सा तो बहुत आया लेकिन अभी गुस्से का समय नहीं था क्राइसिस मैनेजमेंट का समय था. उसने फिर से फोन मिलाया, ‘विशु को बुखार है महेश उसे बुखार में मेड के सहारे छोड़कर नहीं जा सकती. तुम आज छुट्टी ले लो प्लीज़’ इस बार मंदिरा ने महेश को बोलने का कोई भी मौका दिए बिना अपनी बात कह दी.

‘अरे तो तुम छुट्टी ले लो न, मुझे क्यों कह रही हो’ महेश अब भी उसी चिढ़ी हुई आवाज़ में बात कर रहा था. ‘अगर ले सकती तो तुम्हें फोन नहीं करती. नहीं ले सकती छुट्टी मैं आज. मीटिंग है ऑफिस में. मेरा प्रेजेंटेशन है.’

‘तुम कहना क्या चाहती हो, तुम्हारी मीटिंग, तुम्हारा ऑफिस इम्पोर्टेंट है और मेरा नहीं.’ महेश की आवाज़ की तेजी और रूखापन बढ़ता जा रहा था.

‘मैंने ऐसा नहीं कहा, आज मेरे ऑफिस में ऐसी स्थिति नहीं है कि मैं छुट्टी ले सकूं. मेरा होना जरूरी है वहां. हमेशा तो लेती ही हूँ.’ मंदिरा ने घर के बचे हुए कामों को तेज़ी से समेटते हुए कहा.

‘ओह हमेशा तुम छुट्टी लेती हो? यानी तुम ही सब करती हो. मैं कुछ नहीं करता? यार तुमको न ये हीरोइन बनने का कुछ ज्यादा ही शौक नहीं है. देखो मैं छुट्टी नहीं ले सकता. तुम मैनेज करो. और अब फोन मत करना.’ महेश ने फोन काट दिया लेकिन मंदिरा के पास महेश की बातों का बुरा मानने का वक्त ही नहीं था. उसने ऑफिस के ग्रुप में मैसेज किया कि बच्चे की तबियत ठीक नहीं थोड़ी देर से पहुंचेगी.

मुखर्जी आंटी को फोन लगाया, ‘आंटी आज मैं विशु को आपके यहाँ छोड़ सकती हूँ क्या? असल में उसे थोड़ा बुखार है और मैं छुट्टी नहीं ले सकती आज.’

मुखर्जी आंटी पापा के ऑफिस में काम करती थीं. अब रिटायर हो गयी हैं और अकेली रहती हैं. इस तरह के हालात में पहले भी कई बार वो काम आ चुकी हैं. मुखर्जी आंटी को उस रोज कहीं जाना था लेकिन उन्होंने मंदिरा की इमरजेंसी को देखते हुए अपना जाना स्थगित किया.

मंदिरा ने विशु को जल्दी से कपड़े बदलवाए, सामान के साथ विशु और मीना को गाड़ी में बिठाया और मुखर्जी आंटी के घर की ओर चल पड़ी. विशु को मुखर्जी आंटी के घर जाना पसंद नहीं है जानती है मंदिरा लेकिन अभी उसके पास कोई दूसरा ऑप्शन नहीं था. उधर विशु लगातार रोये जा रहा था, शिकायत किये जा रहा था, ‘मम्मा आप बहुत गंदी हो. मैंने आपको बोला आप घर पर ही रुक जाओ और आप मुझे ही घर से बाहर लेकर जा रहे हो. मैं आपसे कभी बात नहीं करूंगा.’

मंदिरा के पास विशु की बात का बुरा मानने या उसे समझाने का न समय था, न ताकत.

मुखर्जी आंटी गेट पर ही मिल गयीं. सामान की तरह मंदिरा ने विशु का हाथ मुखर्जी आंटी के हाथ में थमाया और मीना से बोला आंटी को परेशान न करना. ध्यान रखना बेबी का. विशु आंटी को तंग नहीं करना. कहकर मंदिरा ने गाड़ी मोड़ी ऑफिस की तरफ.

पूरे एक घंटे देर से पहुंची वो ऑफिस. सबकी नजरों में उसे एक अजीब सा तंज़ दिखा जिसे उसने इग्नोर किया. ‘क्या हुआ विशु को’ भावना ने फुसफुसा कर पूछा. ‘बुखार है’ मंदिरा ने भी फुसफुसा कर ही जवाब दिया और प्रेजेंटेशन के लिए लैपटॉप खोलने लगी.

व्यस्तताओं के तूफ़ान में घिरी मंदिरा को पहली फुर्सत तब मिली जब उसे वाशरूम जाने की जरूरत महसूस हुई. वाशरूम में पहुँचते ही उसे जोर से रोना आया. आईने में उसने अपनी शक्ल देखी तो याद आया कि उसने तो ठीक से बाल भी नहीं बनाये थे जूड़ा कसा था कि ऑफिस में ठीक से बनाएगी. तभी पेट में ऐंठन महसूस हुई. उसे ध्यान आया कि उसने ब्रेकफास्ट भी नहीं किया है. फोन देखा तो विशु के ढेर सारे कॉल पड़े थे. मुखर्जी आंटी के कॉल भी थे. उसने मुखर्जी आंटी को उसने फोन किया तो उन्होंने गुस्से में कहा, ‘बहुत लापरवाह हो मंदिरा तुम. तुमने विशु को खाली पेट ही दवा खिला दी थी. उसे उल्टियाँ हो रही हैं. कितना रो रहा है वो. और तुम फोन भी नहीं उठा रही.’ उन्होंने गुस्से में फोन काट दिया.

मंदिरा को समझ नहीं आ रहा था कि कैसे संभाले सब कुछ. काश महेश छुट्टी ले लेता आज सोचते हुए उसे रोना आ गया. जब वो बच्चा प्लान कर रहे थे तो महेश हमेशा यही कहता था, ‘तुम चिंता मत करो एकदम. मैं पालूंगा बच्चे को. तुम्हें कोई परेशानी नहीं होगी. देखना कैसे सब सम्भाल लूँगा.’

मीटिंग का लंच ब्रेक होने को था उसने सोचा बोल देगी बॉस को कि बेटा बीमार है आज हाफ डे लेगी वो. हाफ डे का सोचते ही उसे जैसे सांस आई. सांस आते ही विशु के चेहरा घूम गया आँखों के सामने, ‘मम्मा आज ऑफिस मत जाओ’ की उसकी गुहार कानों में तैर गयी. उसकी गिल्ट गहरी होने लगी.

‘सर, मैं लंच के बाद मीटिंग में नहीं रह पाऊंगी. बेटे की तबियत ठीक नहीं जाना होगा मुझे.’ मंदिरा ने अश्विनी को बोला तो अश्विनी की त्योरियां चढ़ गयीं. ‘मंदिरा ऐसे कैसे चलेगा. तुम्हारे प्रेजेंटेशन पर बात होगी लंच के बाद और तुम ही नहीं होगी. बी प्रोफेशनल.’ अश्विनी का स्वर एकदम सख्त था.

सर, जाना पड़ेगा.’ मंदिरा ने दो टूक कहा और निकल गयी. रास्ते से ही उसने मुखर्जी आंटी को फोन किया तो उन्होंने बताया कि उलटी होने के बाद थोड़ा हल्का महसूस कर रहा है विशु. अभी नाश्ता कराकर सुला दिया है उसे. मंदिरा सोचने लगी, जब विशु ने कहा, मम्मा आज ऑफिस मत जाओ तो उसके पास महसूस करने का वक़्त भी नहीं था. बुखार के कारण उपजी चिंताओं पर ध्यान ज्यादा था बुखार पर सबसे कम. कैसी हो गयी है वो. विशु करवट भी बदलता था तो भागकर पहुँचती थी वो उसके पास. क्या उसे नौकरी छोड़ देनी चाहिए? क्या वो एक करियर वुमन हो गयी है और लापरवाह माँ? उसके भीतर अपराधबोध बढ़ता जा रहा था तभी फोन घनघनाया. मीनल का फोन था.

‘यार, सिंगल पैरेंटिंग बहुत मुश्किल काम है. आज रिया के स्कूल में एक्सिबिशन थी और मैं वहां जा ही नहीं पायी. बड़ा बुरा लग रहा है.’ मीनल ने छूटते ही कहा. मंदिरा ने कहना चाहा कि सिंगल पैरेंटिंग से भी बुरे हालात हैं उसके. सिंगल हो तो कम से कम पता होता है कि सब आपको ही करना है कोई आपको तानों की बौछार से भिगोता नहीं है. लेकिन मंदिरा चुप रही. मीनल और मंदिरा बचपन के दोस्त हैं हर सुख दुःख के साथी. उसने मीनल से इतना ही कहा, ‘हो सके तो टाइम निकालकर हो लेना एग्जिबिशन में वरना गिल्ट से मर जाओगी.’

‘हाँ यार हर वक्त गिल्ट ही तो रहती है साथ. कभी यह भी लगता है कि शुभम से अलग न होती तो ठीक होता शायद.’ मंदिरा ने धीमे से बस इतना कहा, ‘ऐसा कुछ नहीं है.’

गाड़ी मुखर्जी आंटी के घर के सामने आ गयी थी उसने मीनल से कहा, ‘यार बाद में बात करती हूँ’

विशु का बुखार उतर चुका था. वो सो रहा था. मंदिरा ने उसके माथे पर हाथ फेरा तो उसने आँखें खोल दीं, ‘मम्मा, अब आप नहीं जाओगी न?’ मंदिरा ने कहा ‘हाँ बेटा अब मैं तुम्हें छोड़कर नहीं जाऊंगी. तुम आराम से सो जाओ, मम्मा यहीं है. थोड़ी देर में हम घर चलेंगे फिर.’ दवा का असर माँ के स्पर्श के साथ मिलकर अच्छी नींद में बदल गया और विशु फिर से सो गया लेकिन इस बार उसकी नन्ही हथेलियों ने माँ की हथेलियों को थामा हुआ था.

मुखर्जी आंटी ने मंदिरा को उसे इशारे से बुलाया और कॉफ़ी दी.

शाम के तीन बजे दिन की पहली कॉफ़ी पीते हुए मंदिरा का शरीर बिखरने को हुआ हो जैसे. आंटी कुछ खाने को दीजिये साथ में सुबह से कुछ खाया नहीं है. शायद मीना ने सुन लिया था मंदिरा को कहते हुए वो टिफिन में रखे पराठे गर्म करके ले आई थी.

‘सोच रही हूँ नौकरी छोड़ दूं?’ पराठे का पहला टुकड़ा मुंह में धकेलते हुए मंदिरा ने कहा.

‘नहीं, ऐसा हरगिज मत करना’ मुखर्जी आंटी ने उसे कहा तो मीना भी बोल पड़ी, ‘दीदी आप मुझे समझाती हो कि औरतों को काम जरूर करना चाहिए और खुद ऐसी बात कर ही हो.’ कभी कभी होता है न ऐसा तो, मैं और आंटी जी संभाल लेंगे. लेकिन आप नौकरी मत छोड़ना वरना बड़े होकर यही बच्चे कहेंगे कि तुमने कुछ किया क्यों नहीं.’ मुखर्जी आंटी मीना को प्रशंसा भरी नज़रों से देख रही थीं.

‘लेकिन आंटी बहुत गिल्ट होता है, बच्चे के पास होना चाहिए था मुझे और मैं कहाँ थी.’

‘बच्चे के पास तो महेश को भी होना चाहिए था, वो कहाँ है. उसे गिल्ट है क्या?’ मुखर्जी आंटी ने कहा तो मंदिरा चुप हो गयी.

घर आकर मंदिरा ने अगले दिन की भी छुट्टी लगाईं और विशु के बगल में आकर लेट गयी.
‘मम्मा, आप जॉब मत छोड़ना. मैं आपको परेशान नहीं करूँगा’ विशु ने मंदिरा के सीने में दुबकते हुए कहा तो दिन भर के भरे हुए उदास बादल मंदिरा की आँखों से छलक पड़े.

(14 जनवरी को नवजीवन में प्रकाशित)