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Monday, October 13, 2025

विसंगतियों को रूपायित करता उपन्यास


जितेन ठाकुर जी की टिप्पणी राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित हुई है। आभार!
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प्रतिभा कटियार का सद्य प्रकाशित उपन्यास जातीय दंश से अभिशप्त एक ऐसी युवती की कथा है जिसमें सामाजिक संरचना के विकृत स्वरूप को नकारने और छोटा साबित कर पाने के नैसर्गिक गुण मौजूद हैं। विषम पारिवारिक परिस्थितियों, अपमानित और तिरस्कृत करने वाली सामाजिक वर्जनाओं और हतोत्साहित कर देने वाले परिवेश में भी उसकी अदम्य इच्छाशक्ति सारे अवरोधों और बाधाओं पर भरी पड़ती है। नकारात्मकता को नकार देने वाला उसका मानसतंत्र सकारात्मकता का एक ऐसा सुदृढ़ कवच गढ़ लेता है जो विषमताओं और विसंगतियों को सहज ही ध्वस्त करता चला जाता है। पर नियति के कुचक्र का शिकार होकर वह उसी कारा में कैद रह जाती है, जिसमें युगों से सम्भावनाएं दम तोड़ती आई हैं।
 
अपनी इस यात्रा में मिले अनेक पात्र उसे जीवन मूल्य समझाते और आगे बढ्ने का हौसला देते हुए भी दिखलाई देते हैं। पर सामाजिक संरचना में लुके छुपे अनेक ऐसे कारण भी समय-समय पर प्रकट होते हैं जो समाज में फैले जातीय गरल की विभीषिका को स्पष्ट करते हैं। ये कारण हमारी नागरिक चेतना को आहत भी करते हैं और लांछित भी। टूट जाने की संभावनाओं के बावजूद विद्रूप का यह पाश पूर्ववत ही जकड़ा रह जाता है और आकाश में टिमटिमाने की कामना लिए हुए एक सितारा अनजान, अपरिचित खला में खो जाता है। यहीं पर उम्मीद के टूट जाने का दंश पाठक को भी त्रस्त करता है।

लेखिका ने बहुत ही सरल, सहज शैली में काव्यात्मक स्पर्श देते हुए इस उपन्यास को रचा है। उपन्यास में यथार्थवाद नहीं केवल यथार्थ है, इसलिए यह उपन्यास एक बदली हुई रचनाशीलता का एहसास देता है। इस उपन्यास में अमानवीय मानसतंत्र के कुछ ऐसे त्रासद विवरण मौजूद हैं जो परिवर्तनकामी घोषणाओं का शंखनाद करके गाल बजाने वाले समाज को मुंह चिढ़ाते हुए प्रतीत होते हैं। उपन्यास अपने समय की विसंगतियों को रूपायित भी करता है और त्रासदी को रेखांकित भी करता है। कहा जा सकता है कि यह उपन्यास अपने समय को विश्लेषित करने वाले एक विचारशील रचनकर का ऐसा रचनाकर्म है जो समाज की तमाम भयावहता और बेचैनियों को वहन करते हुए पाठक को अपने समय को समझाने की दृष्टि देता है।

उपन्यास की चेतना, कथा के स्तर पर जिस प्रकार हमें दंशित करती है और हमारी संवेदनाओं को विगलित करती है, उसके लिए प्रतिभा कटियार बधाई की पात्र हैं परंतु अपेक्षा के अनुरूप कारायी साँचा न टूट पाने की पीड़ा पाठक को आहात करती है। उम्मीद की जानी चाहिए कि अगले प्रयास में लेखिका इस साँचे को तोड़ पाने का यत्न करती हुई पुनः दिखलाई देंगी।

पुस्तक का नाम- कबिरा सोई पीर है (उपन्यास)
लेखिका- प्रतिभा कटियार
प्रकाशक- लोकभारती प्रकाशन
मूल्य- 300 रुपए

Monday, October 6, 2025

बेहद ज़रूरी रचना है कबिरा सोई पीर है- हृषिकेश सुलभ




ऋषिकेश सुलभ जी की स्नेह भरी यह चिट्ठी मिली है। जिनको पढ़ते हुए लिखना सीखा उनसे अपने लिखे पर यह पढ़ना विनम्र सुख और संकोच से भर देता है। बहुत शुक्रिया हृषिकेश जी।
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प्रतिभा,
आपका पहला उपन्यास “कबिरा सोई पीर है” कुछ ही दिनों पहले पढ़ा! अपने कथ्य को लेकर यह उपन्यास एक बेहद ज़रूरी रचना है। इसका कथ्य समय-सापेक्ष है और अपने गर्भ से अग्नि की ज्वाला को जन्म देता है। यथार्थ की ऐसी अनुभूति जिसे भूलना कठिन है, इस उपन्यास में अभिव्यक्त है। जाति व्यवस्था से पैदा हुए दंश की पीड़ा के अकथनीय मर्म को आपने रचा है! आपकी भाषा में सहज प्रवाह और अभिव्यक्ति की क्षमता है। उपन्यास के कहन में भी सहजता है, जिससे कई दुर्लभ मार्मिक क्षण रचे जा सके हैं।

हृषीकेश सुलभ

Saturday, September 27, 2025

'कबिरा सोई पीर है' की संरचना खास है- संगीता जोशी


प्रतिभा कटियार मैम का पहला उपन्यास 'कबिरा सोई पीर है' का पढ़ा जाना बहुत दिनों से पेंडिंग था ,किताबें पढ़ना पसंद है विशेष कर हिंदी की वह भी व्यस्तताओं के कारण आजकल धरा का धरा रह गया कुछ अच्छी किताबें का पता चला और उन्हें पढ़ा तो आपके साथ साझा कर रही हूं। 

बहुत दिनों बाद ऐसा कुछ पढ़ रही हूं जिसका तिलिस्म खींच रहा लगातार और बार-बार ऐसा जादू बरकरार रहा कि एक ही बैठकी में पूरी किताब 'कबिरा सोई पीर है' पढ़ डाली। काबिलेगौर है कि लेखिका स्त्रीवादी, साहित्य आलोचना के साथ-साथ शानदार पत्रिका 'पाठशाला भीतर और बाहर' का संपादन भी कर रही हैं। स्त्री अध्ययन पर इनका गंभीर लेखन इस बात को विशेष रूप से रेखांकित करता है कि स्त्रीवाद, साहित्य और विचार को लेकर इनके पास व्यापक अनुभव है।समृद्ध बुद्धि से सज्जित प्रतिभा कटियार के पास वे तमाम औजार और दृष्टि संपन्नता मौजूद है जिससे किसी कृति की मीमांसा या आलोचकीय विश्लेषण किया जाता है।

'कबिरा सोई पीर है' समाज और संवेदना का आईना है इस उपन्यास को पढ़ते हुए बार-बार लगा जैसे में ऋषिकेश की वादियों में चल रही हूं, गंगा की लहरें , त्रिवेणी घाट की आहट,, मरीन ड्राइव की हलचल और पहाड़ों की हरियाली, लेखिका ने इन्हें आत्मीय और गहन ढंग से पिरोया है कि पूरा वातावरण सजीव हो पड़ता है। कहानी का सबसे बड़ा आकर्षण यह है कि इसमें समाज की जातिगत जटिलताओं और स्त्री के साथ होने वाले अन्यायों को बहुत सच्चाई से दिखाया गया है। वे छोटी सी लगने वाली घटनाएं जिन्हें अक्सर मामूली समझ कर अनदेखा कर देते हैं यहां पूरी मार्मिकता के साथ सामने आती हैं और यह एहसास कराती हैं कि जिनके साथ यह हो रहा होता है वह जीवन बदल देने वाले क्षण होते हैं। 

यह उपन्यास इंसान के भीतर छिपे दोहरेपन उसकी कमजोरी उसके लालच और एडियलपन के साथ-साथ उसकी जीवटता और मानसिक संघर्षों को भी बारीकी से उजागर करता है। अलग-अलग कथाओं के माध्यम से समाज का असली चेहरा खुल कर सामने आता है और पाठक हर दृश्य का साक्षी सा बन जाता है। यह उपन्यास संवेदनाओं, संघर्षों और प्रेम के अनूठे संयोजन के रूप में सामने आता है इसमें व्यक्तिगत रिश्तो के साथ-साथ सामाजिक संदर्भ भी उतनी ही गहराई से उभरते हैं यही इसे एक प्रभावशाली और शानदार रचना बनता है। 

उपन्यास की संरचना भी बहुत खास है। हर खंड किसी शेर से शुरू होता है और अंत उसी शेर की पूर्णता के साथ। इस तरह पूरा उपन्यास कई हिस्सों में बंटकर भी एक सुंदर और गहरी कड़ी के रूप में पाठक से जुड़ती है। खोखले आदर्शों में कैसे पूरा मध्यवर्ग जीवन गर्व के साथ गुजरता है यह उपन्यास इसका एक रोचक दस्तावेज है, बहुत कुछ लिखा जा सकता है इस पर लेकिन इसके आगे के लिए आपको खुद ही पढ़ना पड़ेगा।

प्रतिभा मैम बहुत-बहुत शुभकामनाएं आपने अपनी कलम से दिल उतार दिए पन्नों पर कमाल का लेखन है,,बहुत बधाई व शुभकामनाएं!

Thursday, September 18, 2025

मानसिक द्वन्द्वों का ताना-बाना है 'कबिरा सोई पीर है' उपन्यास

कोई जब आपके लिखे को इस तरह डूबकर पढ़ता है तो लिखा हुआ सार्थक हो उठता है। सुनीता जी सुधि पाठक हैं, प्रेमिल और संवेदनशील इंसान हैं। उनकी पारखी नज़र में 'कबिरा सोई पीर है' का ठहरना सुख देता है। शुक्रिया सुनीता जी।


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- सुनीता मोहन 
'कबिरा सोई पीर है', को पूरा पढ़ लेने के बाद जैसे मैंने प्रतिभा कटियार जी को और क़रीब से जाना है, जिनके भीतर मैं उस संवेदनशीलता को हमेशा महसूस करती हूं, जो हमारे इंसान होने की पहली ज़रूरत है, इसीलिए उनके प्रति बहुत आदर है मन में।

इस उपन्यास ने जितनी साफ़गोई से समाज में रची बसी जातिगत विकृति को उकेरा है, उतनी ही स्पष्टता से स्त्री के साथ होने वाले सामाजिक दुर्व्यवहार पर भी चोट की है। छोटी छोटी घटनाएं, जो सामान्य वर्ग को अति सामान्य लग सकती हैं, उन घटनाओं को जीने वालों के लिए कैसे वो जीवन मरण का सवाल होती हैं, बहुत मर्म के साथ वो घटनाएं कहानी में पिरोई गई हैं।

मेरी नज़र में ये उपन्यास, इंसान के दोगलेपन, उसकी कमजोरियों, उसके लालच और उसके दुराग्रह के साथ उसकी जीवटता और मानसिक द्वंद्वों का तानाबाना है, जो अलग अलग चरित्रों के बहाने समाज के असल चरित्र की, ओर से छोर तक की चिंदियां बड़ी ख़ूबसूरती से उघेड़ता है।

इस पूरी कहानी में, मैं लगभग हर जगह ख़ुद को विटनेस के तौर पर देखती रही। हां, ऐसा ही तो होता है! कहीं कोई अतिश्योक्ति नहीं, कहीं कोई छुपाव नहीं! सब वही जो सिर्फ़ संविधान के डर से पर्दे के पीछे घटता है, वरना ठोक बजा के हो रहा होता!

इस उपन्यास को पढ़ते हुए मेरे साथ एक अजीब सा एहसास रहा, लेखिका जब जब ऋषिकेश की सुंदर हसीन पहाड़ियों में ले जाती हैं, त्रिवेणी घाट से लेकर, मरीन ड्राइव तक गंगा की लहरें दिखलाती हैं, चाय की प्याली में रातरानी की खुशबू घोलती हैं, तो पता नहीं क्यों, मेरे ख़यालो में बनारस आता रहा! उपन्यास में बार बार ऋषिकेश का स्पष्ट चित्र खींचा जाता है, पर मैं पहाड़ का हरापन महसूस ही नहीं कर पाई, सिर्फ गंगा की तरावट महसूस हुई, वो भी बनारस के घाट वाली! ये तब है, जबकि ऋषिकेश शहर हमारा सबसे नज़दीकी पड़ोसी है और बनारस मैने देखा तक नहीं, लेकिन शायद बनारस को स्क्रीन और किस्से कहानियों में इतना पी चुकी हूं कि उसका तिलिस्म तोड़े नहीं टूटता। इसका एक दूसरा कारण ये भी रहा शायद, कि, कुछ एक जगह संवादों में पूर्वांचल का लहज़ा है, जो यहां की आम बोलचाल में कम ही सुनने को मिलता है।

उपन्यास में केदारनाथ अग्रवाल की कविता को जितनी जगह दी गई है, समझ आता है, कि लेखिका कितने गहरे उनके अर्थों में डूबी होंगी!

इस उपन्यास में भी प्रतिभा जी ने 'मारीना' की तरह अद्भुत प्रयोग किया है। उपन्यास के जिस भाग को, जिस शेर से शुरू किया गया है, उसका अंत उस पूरे शेर के साथ होता है, इस तरह उपन्यास को कई ख़ूबसूरत शेरों के साथ अलग अलग हिस्सों में बांटा गया है, और हर हिस्सा ख़ुद में पूरा लगता है।

कबीर दास के जिस दोहे से इस उपन्यास को नाम मिला है, वो इंसानियत की परिभाषा है और ये उपन्यास उसी इंसानियत को समर्पित है-
"कबिरा सोई पीर है, जो जाने पर पीर,
जो पर पीर न जानई, सो काफ़िर बेपीर!"

प्रतिभा जी को इस ख़ूबसूरत सृजन के लिए फिर से बहुत बहुत बधाई
दुआ यही कि, मुहब्बत, मेहनत और मनुष्यता सदा आबाद रहें!
सुनीता मोहन।

Monday, August 25, 2025

संवेदनात्मक दृष्टि का परिचायक है उपन्यास 'कबिरा सोई पीर है'


- ममता सिंह 
इस किताब को पढ़ते हुए कई पन्नों पर दृष्टि रुक गई,उन्हें दुबारा,तिबारा पढ़ा..गले में जैसे कुछ अटक सा गया..क्या था वह?

वह थी समाज की सच्चाई जिसे बड़ी चालाकी से यह कहकर टाल दिया जाता है कि अजी यह सब पिछले ज़माने की बातें हैं,अब कहां है जाति पांति की ऊंच नीच..अब तो सब बराबर हैं..जबकि हक़ीक़त में आज भी कोई बड़े से बड़ा अधिकारी हो या छोटे से छोटा कर्मचारी उसके आते ही पहले उसकी जाति देखी जाती है,प्रेम भी इससे अछूता नहीं होता(अपवादों की बात छोड़ दें तो)

प्रतिभा जी का यह उपन्यास महज मनोरंजन का विषय न होकर उनकी उस संवेदनात्मक दृष्टि का परिचायक है जो सामाजिक,आर्थिक,पारिवारिक समस्याओं की न केवल पड़ताल करती है बल्कि उसे हमारे सामने नग्न रूप में प्रस्तुत भी करती है जिससे हमें समाज की समता,समानता को लेकर बरती जा रहीं चालाकियों और क्षुद्रता के बारे में पता चलता है..इनके बीच में मुहब्बत एक ऐसी तरल तरंग के रूप में आती है जो हमें सुखांत कल्पना की ओर मोड़ती है किंतु इसका अंत यथार्थ के कठोर किंतु आत्मसम्मान पूर्ण धरातल पर होता है..

किताब की कुछ झलकियां
"कमलेश जी की नौकरी लग तो गई लेकिन जैसे अब तक ज़िन्दगी गले में अटकी रही, वैसी ही नौकरी भी अटक गई। बड़े बाबू शंखधर तिवारी और चपरासी विनोद श्रीवास्तव दोनों उन्हें साँस तक लेते देखकर खार खाते हों जैसे। विनोद का बर्ताव कमलेश जी के साथ वैसा ही था जैसे शीरे में डुबोकर कोई सुई चुभोए। तरीके ऐसे कि शब्दों पर जाएँ तो उन्होंने कुछ गलत कहा ही नहीं, 'अरे आप लोगों का जमाना है अब। हम लोग क्या हैं कीड़े-मकोड़े। देखिए कोई गलती-उलती हो जाए तो माफ कर दीजिएगा कमलेश बाबू। आप लोगों की बड़ी सुनी जाती है आजकल ।' या कोई जाति विरोधी वाट्सप फॉरवर्ड वीडियो को तेज आवाज़ में सुनना और मुस्कुराना।
कमलेश जी को सब समझ में आता है लेकिन वो चुप्पी को अपना एकमात्र हथियार बनाकर जीना सीख लिए हैं। उन्होंने मान लिया है कि सम्मान है ही कहाँ उनका। उनका जन्म अपमान सहने के लिए ही हुआ है। हालाँकि वो चाहते थे कि जो उन्होंने झेला वो उनके बच्चों को न झेलना पड़े। दलित राजनीति का हश्र जो भी हुआ हो लेकिन अरसे से वंचित, इस देश के एक बड़े वर्ग की आँखों में छोटे-छोटे सपने तो बोए ही हैं। हालाँकि अगड़ों की राजनीति उन इबारतों को मिटा देने पर भी आमादा है जहाँ दलित और पिछड़े वर्ग को जरा-सी राहत है। समानता-समानता की रट लगाकर गरीब सवर्णों को भी आरक्षण मिलना चाहिए का शोर मचानेवालो ये समझने को तैयार ही नहीं कि समता भी एक चीज होती है। उसके बिना समानता भी एक फरेब ही बनकर रह जाएगी। एक गरीब ब्राह्मण की सामाजिक स्थिति एक मध्यवर्गीय दलित से हमेशा ऊँची रहती है, यह बात वे जानते हैं लेकिन इसके बारे में कोई बात नहीं करना चाहते।
इन्हीं उलझावों के बीच कमलेश जी ने शिक्षा के महत्त्व को बखूबी समझ लिया था। उन्होंने अपने तीनों बच्चों को स्कूल पढ़ने भेजा। हालाँकि वो जानते थे कि इन बच्चों का जन्म गलत घर में हो गया है और इन्हें जीवन-भर अपमान तो सहना ही पड़ेगा। वो चाहते तो थे कि बच्चों को जातिगत अपमान न सहने पढ़ें लेकिन हक़ीक़त से भी वो वाक़िफ़ थे ही, इसलिए उनकी कोशिश होती कि बच्चों को अपमान सहने की आदत पड़ जाए।"

* * * *
"लड़ाई का सबका अपना तरीका होता है। मैं लड़ ही तो रही हूँ। मेरी पढ़ाई ही मेरी लड़ाई है। कुछ बन जाऊँगी तो बहुतों की आवाज बन पाऊँगी। वरना ऐसे ही गृह कलेश में जीवन बिताना पड़ेगा। तुझे एक बात बताऊँ, मुझे माँ-पापा किसी से शिकायत नहीं। उनसे क्या शिकायत करो, जो खुद विक्टिम हैं यार। मम्मी का बड़बड़ाना जिस दिन बन्द हो जाएगा न, माँ मर जाएगी। इसी बड़-बड़ में वो अपने भीतर की कड़वाहट को निकालती रहती है। मुझे तो लगता है ज्यादातर औरतों की बड़-बड़ में उनका फ्रस्टेशन ही निकल रहा होता है, जिसका लोग उपहास बनाते हैं।'
 
* * * *
"तुम अभी उस सवाल से तो नहीं जूझ रहे कहीं कि तुम्हारे प्रेम में सद्भाव ज़्यादा है?' कनिका ने अपने मोह के धागों को तोड़ते हुए तृप्ति और अनुभव पर फोकस किया।
'हरगिज नहीं। लेकिन देखो यह सवाल आया न तुम्हारे मन में। अगर मैं तुमसे प्यार करता तो भी क्या यह सवाल आता? नहीं न? बस यही लड़ाई है। बराबरी-बराबरी के शोर में ही कितनी गैर बराबरी है, यह हमें खुद ही नहीं पता चलता।' अनुभव एकदम स्पष्ट था। अपने भावों को लेकर भी और विचारों को लेकर भी।
'पता है कनिका ! जब मैं कॉलेज की डिबेट में इन मुद्दों पर बोलता था और जीतकर ट्रॉफी लेता था तो अन्दर से रुलाई फूटती थी। लोग हैं वो। हमने उन्हें, उनकी समस्याओं को मुद्दा बनाकर इस्तेमाल करना सीख लिया है, राजनीति में हो या कॉलेज की डिबेट में या एग्जाम में आनेवालो निबन्ध के विषय में क्या फर्क है।' आवाज़ बिखरने लगी थी अनुभव की और गला भर्राने लगा था।
'इतना भी मत परेशान हो यार, होगा एक दिन सब ठीक। हम मिलकर करेंगे न?' कनिका ने उसके कन्धे को धीरे से दबाते हुए आश्वस्ति देनी चाही।"

पुस्तक ...कबिरा सोई पीर है
लेखक ...प्रतिभा कटियार
प्रकाशक ...लोकभारती प्रकाशन
मूल्य ...299 रुपए

Sunday, August 10, 2025

पाठकों को बांधता है 'कबिरा सोई पीर है'


- केवल तिवारी 
जीवन रूपी रंगमंच में न जाने कितने किरदारों का हमें सामना करना पड़ता है। हम खुद भी तो अनेक तरह का नाटक करते हैं। लेकिन जब अच्छा होने का दंभ भरने वाला भी ‘नाटकबाज़’ निकले और सचमुच एक अच्छे इंसान को ग़लत साबित करने में दुनिया लग जाए, तो क्या हो? उपन्यास ‘कबिरा सोई पीर है’ में ऐसे ही ताने-बाने की बुनावट है। लेखिका हैं प्रतिभा कटियार। अलग-अलग शीर्षक से कहानीनुमा अंदाज़ में लिखा गया यह उपन्यास एक नया प्रयोग है। हर कहानी का पूर्व और बाद की कहानी से संबंध है। हर कहानी के बाद उसके कथानक से मेल खाती एक शायरी होती है— किसी मशहूर शायर की।

उपन्यास में दर्ज कहानी की नायिका तृप्ति की धीर-गंभीरता काबिल-ए-गौर है, लेकिन आखिरकार वह भी तो इंसान ही है। ऐसी लड़की, जिसे कदम-कदम पर दंश मिलता है— सामाजिक, आर्थिक और शारीरिक। शायद इसीलिए वह ज़्यादा सोचने लगी है। उधर, अनुभव बहुत कोशिश करता तो है ‘हीरो’ बनने की, लेकिन इस ‘खतरनाक’ समाज में कहां संभव है यह सब। सीमा तो जैसे आदर्श लगती है। लेकिन उसके साथ रिश्ते में भाई लगने वाले ने क्या किया? सही रिपोर्ट तो होती है क्राइम ब्यूरो की, जिनका लब्बोलुआब होता है— ‘किस पर करें यक़ीन?’

चलचित्र की तरह आगे बढ़ती कहानी पाठक को बांधे रखती है। पाठक की कल्पनाओं के घोड़े दौड़ते हैं, लेकिन कहानी की जिज्ञासा तब और बढ़ जाती है, जब उसकी धारा दूसरी दिशा में बह निकलती है। यह ताकीद करते हुए कि ‘अब कहां होता है ऐसा’, मत बोलिए। सिर्फ कहना आसान है कि ‘अब तो सब ठीक है।’ कहानी के पात्रों से यह भी तो साफ होता है कि हर कोई एक जैसा नहीं होता। गंगा की लहरों, रातरानी की सुगंध और फूल-पंछियों का मानवीकरण ग़ज़ब अंदाज़ में किया गया है।

एक बेहतरीन लेखक की यही पहचान है कि उसका पाठक रचना को पढ़ने पर भी तृप्त न हो। इस उपन्यास की कहानी भी खत्म होते-होते पाठक कुछ ढूंढ़ता है। सुखांत ढूंढ़ने की हमारी फ़ितरत यहां भी कुछ समझ नहीं आती—सिवा इसके कि तृप्ति फिर उठ खड़ी होगी और इस उपन्यास का दूसरा भाग भी आएगा।

पुस्तक : कबिरा सोई पीर है लेखिका : प्रतिभा कटियार प्रकाशक : लोकभारती पेपरबैक, प्रयागराज पृष्ठ : 168 मूल्य : रु. 299.

Monday, April 21, 2025

मेरे भीतर पाखंड भरा है



'मैं ख़ुद के भीतर चल रही इस उलझन को समझ नहीं पा रहा हूँ तृप्ति। मुझे लगता था मैं काफी लिबरल हूँ, लेकिन इस एक घटना ने मेरी अब तक अपने बारे में बनाई गई राय को खंडित कर दिया। मुझे महसूस हुआ कि मेरे भीतर काफी पाखंड भरा है, लिबरल होने का पाखंड। मैं आम आदमी ही हूँ, आम पुरुष, बल्कि उनसे भी बुरा। क्योंकि मैंने अपने भीतर लिबरल होने का झूठ पाल रखा है।'
 
कबिरा सोई पीर है • प्रतिभा कटियार
#साथजुड़ेंसाथपढ़ें #लोकभारतीप्रकाशन

Wednesday, April 16, 2025

कबिरा सोई पीर है- सामाजिक विषमताएं उभरती हैं पात्रों के अंतर्द्वंद्व में


- सुरेखा भनोट 

इंतजार के बाद आ ही गया 'कबिरा सोई पीर है' मेरे हाथों में भी। और एक ही दिन में चार बार शांत वातावरण ढूंढकर इस बेहद सुंदर कृति को पढ़ लिया। पूरा दिन तृप्ति ,अनुभव ,सीमा, कनिका,उनके परिवारजन, उनके संघर्ष, अन्तर्द्वन्द महसूस करती रही। प्रतिभा, तुमने प्रत्येक पात्र जो विविध मानसिकता, विभिन्न परिस्थितियों में जी रहे हैं, अपने संघर्ष, अन्तर्द्वन्द के साथ, उनके आपसी संबंधों को कुछ ऐसा गढ़ा है कि हम हर पात्र को बिना किसी मूल्यांकन के समझ पाते हैं। इन पात्रों के माध्यम से तुमने बेबाक उभारा है जाति का दंश, दंभ, पितृसत्ता की साजिश, स्त्री की निरहिता , सामाजिक विषमताएं। 

भाषा बहुत सुंदर ,सरल कवितामय है।  हर प्रसंग एक उपयुक्त शेर से शुरू होता है, अंत में पूरा शेर। यह शैली मुझे बहुत रास आई। ऋषिकेश शहर, उसमे बहती गंगा का विवरण और उसका सबके साथ एक अपना ही प्यार सा रिश्ता है जो भी मन को छू जाता है। 

प्रतिभा का कवि मन, उसकी कल्पना, प्रकृति के साथ तादात्म्य झलकता है पूरे उपन्यास में। कनिका और तृप्ति की दोस्ती स्वयं प्रतिभा के अनन्य लोगो के साथ खूबसूरत दोस्ती की झलक है। ये किताब तो बार-बार, कोई भी पृष्ठ खोलकर स्वयं को , समाज को सुंदर, भरोसेमंद बनाने के लिए प्रेरित करेगी, मार्गदर्शन देगी। 

शाबाश, बधाई, प्यार प्रतिभा इतना सुंदर उपन्यास लिखने के लिए! 🥰

(सुरेखा जी बिट्स पिलानी की प्रोफेसर रही हैं। सेवानिवृत्ति के बाद सामाजिक कार्यों से जुड़ी हैं।)

Monday, April 14, 2025

बेहद प्रासंगिक है 'कबिरा सोई पीर है'



- श्रुति कुशवाहा 
(पत्रकार, कवि)
आजकल एक ट्रेंड सा चल पड़ा है…आप किसी मुद्दे को उठाइए और कई लोग मंत्र की तरह जपने लगेंगे ‘अब ऐसा कहा होता है’ ‘दुनिया बदल गई है’ ‘आप किस ज़माने की बात कर रहे हैं’ ‘ये सब गुज़रे समय की बात हो गई’। मुद्दों को डाइल्यूट/डिस्ट्रेक्ट/डायवर्ट करने का ये सबसे आसान तरीका है।
 
आपके घर में..आपके मोहल्ले में..आपकी सोसाइटी में या आपके आसपास का माहौल बदल जाने भर का अर्थ ये नहीं कि सारी दुनिया बदल गई है। दुनिया उतनी रंगीन नहीं है..जितनी आपके चश्मे से दिखाई देती है।
दुनिया आज भी बेतरह चुनौतीपूर्ण, संघर्षों और समस्याओं से भरी हुई है..जिसे Pratibha Katiyar के उपन्यास ‘कबिरा सोई पीर है’ में पूरी मुखरता से दर्शाया गया है।

‘जाति’ पर बात करना आज के समय में कुछ आउटडेटेड मान लिया गया है। बार-बार वही जुमला सुनाई देता है…’अब कहा होता है भेदभाव’ ‘अब तो *उनको* सारी सुविधाएं मिला हुई हैं, रिजर्वेशन है, हम *उनके* हाथ का खा भी लेते हैं, *उनके* घर आना-जाना भी है*’। लेकिन इन सबमें ये जो “उनके” है न…यही भेदभाव है। आज भी रिजर्वेशन के नाम पर कितने लोग मुँह बिचकाते हैं..कभी गौर किया है आपने ?

‘कबिरा सोई पीर है’ उपन्यास में इस विषय पर बहुत गहनता से गौर किया गया है। एक प्रेम-कहानी है जिसके इर्द-गिर्द वास्तविक दुनिया कितनी प्रेम-विहीन और निष्ठुर है..ये उकेरा गया है। यकीन मानिए प्रेम की भी राजनीति होती है। प्रेम भी समय और समाज के कलुष से अछूता नहीं रह पाता। चाहे जितना प्रगाढ़ हो..प्रेम पर भी कुरीतियों के कुपाठ का प्रभाव पड़ता है।

प्रतिभा जी के उपन्यास को पढ़ते हुए मन बार-बार व्यथित होता है। मैंने कई बार चाहा कि पन्ना पलटने के साथ काश कोई जादू हो जाए। लेकिन ये चाहना वास्तविकता से मुँह फेरना ही तो है। और उपन्यास वास्तविकता से बिल्कुल भी मुँह नहीं फेरता है। इसमें कई मुद्दों को छुआ गया है लेकिन जाति व्यवस्था मूल विषय है। यहाँ कोई लागलपेट नहीं है..कोई छद्म आडंबर नहीं है..शब्दों की चाशनी नहीं है..भाषा का खेल नहीं है..सौंदर्य का कृत्रिम आवरण नहीं है। 

इस उपन्यास में आपको खरा सच मिलेगा..और सच से आँख मिलाने की कठिन चुनौती भी।
बहुत सुंदर कविताएँ और कहानियाँ लिखने वालीं प्रतिभा कटियार जी का ये पहला उपन्यास है जिसमें सरोकार, ईमानदारी और बेबाकी के साथ इस गंभीर मुद्दे को उकेरा गया है। ये उपन्यास आपकी संवेदनाओं को झकझोरता है और कई प्रश्नों के साथ छोड़ जाता है। इसे पढ़ने के बाद कोई भी संवेदनशील व्यक्ति बेचैनी से भर जाएगा। जब तक मनुष्य को जाति के पैमाने पर तौला जाता रहेगा..इस उपन्यास की प्रासंगिकता बनी रहेगी। और आज के विद्रूप होते समय में ये उपन्यास बेहद प्रासंगिक है।

‘कबिरा सोई पीर है’ पढ़ा जाना चाहिए और इसमें उठाए सवालों पर मनन होना चाहिए।

Saturday, April 12, 2025

समाज की सच्चाई की परतें खुलती हैं कबिरा सोई पीर है में



- जयंती रंगनाथन 
(वरिष्ठ पत्रकार, लेखक )

प्रतिभा कटियार बेहद अजीज है, सालों का रिश्ता है। अंदर-बाहर से बेहद प्यारी। हम कम मिले हैं, पर जब भी मिले हैं, झूम कर, प्यार से और ऐसे कि कोई बेहद पुराना सा रिश्ता हो।
प्रतिभा बहुत प्यारी और गहरी कविताएं लिखती हैं। उसका पहला उपन्यास आया है कबिरा सोई पीर है, लोकभारती पेपरबैक्स से। बिलकुल प्रतिभा की ही तरह है उसका उपन्यास, बोलता हुआ और बहुत कुछ कहता हुआ। जितना लिखा है, उससे भी गहरा।

प्रतिभा ने अपने पहले उपन्यास का विषय साहस से उठाया है, समाज का वो वर्ग, जो सालों से दबा-कुचला रहा है। उस वर्ग की दो बहनें तृप्ति और सीमा अलग-अलग तरह से अपने परिवेश और घुटन से लड़ती हैं। तृप्ति पढ़ने में होशियार, सीमा व्यवहारकुशल। सांवली और औसत दिखने वाली तृप्ति सिविल सर्विस के मुहाने पर खडी है, प्रिलिम्स क्लीयर कर चुकी है। कोचिंग क्लास का साथी सवर्ण लड़का उसे चाहता है। पर जाति की दीवार इतनी लंबी-चौंडी-संकरी है जिससे पार पाना मुश्किल। उपन्यास पढ़ते हुए कई बार मैंने पन्नों को मोड़ कर रख दिया, इस दुआ के साथ कि आगे के पन्नों पर बहनों के साथ सब अच्छा हो। भरे मन के साथ पन्ने खोलती। वहां तो सच की चादर तनी थी। एक गुस्सा सा व्याप्त होने लगा कि हम जिस जमीन पर खड़े हैं, वहां से एक गज नीचे हमने दूसरों को रहने लायक छोड़ा ही नहीं।

इस उपन्यास की कई परतें हैं। किरदारों की भी। आप अंत तक यही मनाते हैं कि सब ठीक हो जाए।
एक बात और, मैंने जो जिंदगी देखी और आसपास देख रही हूं, वहां अब जाति को ले कर इतने खूंखार मसले नहीं रहे। हमारी बिल्डिंग में ही गाड़ी साफ करने वाले आदमी को जब किसी गाड़ी के मालिक ने गाली दी, तो हंगामा हो गया। अंतत: पुलिस आई, गाली देने वाले को उठा कर ले गई और उसे माफी मांगनी पड़ी। इस चेतावनी के साथ कि आगे से वो गाली-गलौच नहीं करेगा। माली, काम वाली, क्लीनर सबके बच्चे घर आते हैं, बिल्कुल हमारे बच्चों की तरह रहते हैं। सबके बच्चे मिल कर खेलते हैं। मैंने कभी किसी माता-पिता को यह कहते नहीं देखा कि तुम माली या ... के बच्चे के साथ नहीं खेलोगे
माहौल बदल रहा है। सकारात्मक बदलाव।
इस समाज का सालों से हमें इंतजार था
बड़े पदों पर एससी एसटी काम कर रहे हैं, पूरी इज्जत के साथ।
किसकी हिम्मत है कि उनके कहे की अवहेलना करे

यह भी अहम बात है कि गांव-कस्बों में दलितों खासकर लड़कियों के साथ होने वाली नृशंस घटनाओं की खबर लगभग रोज अखबारों में छपती हैं। दिल दहलाने वाली। खून खौलता है कि कैसे उन्हें बचाया जाए
ऐसे परिप्रेक्ष्य में तृप्ति और उसके परिवार का संघर्ष पढ़ना भारी कर जाता है

पर हमारे यहां की तमाम तृप्तियों और सीमाओं को उनकी मनचाही जिंदगी जीने का हौसला मिले यही कामना है।
प्रतिभा ने कबिरा सोई पीर है में अपना दिल उडेला है, कलेजा छलनी कर देता है इसका विवरण और इसके किरदार। मन ही मन खूब दुआ तुम्हारे लिए प्रतिभा। सच को सुनना और लिखना हर किसी के बस की बात नहीं है।

Saturday, March 8, 2025

बबल को तोड़ता उपन्यास - मेघना तारे



- मेघना

दो दिन हुये उपन्यास को आये पर कुछ था जो कह रहा था कि अभी नहीं, बाद में पढ़ना, क्योंकि इसके बाद शायद काफी कुछ सोचना पड़ेगा. अपनी छोटी सी नौकरी और उसके साथ वाली रिसर्च के छोटे से दायरे में सिमटा मेरा छोटा सा विश्व (जिसे मैं अक्सर "बबल" कहती हूँ, क्योंकि इसके बाहर क्या होता है, कभी-कभार ही पता चलता है) भी "आजकल कहाँ होता है ऐसा" वाली मान्यता के हैं। देर सबेर खुद को लिबरल भी कहला ही लेती हूँ। पर यह उपन्यास दिमाग के दरवाज़े ही नहीं खोलता, पर हथौड़े के माफिक वार कर सच्चाई के सामने खड़ा करता है... 

अन्त आते आते अवसाद हुआ, रुलाई नहीं फूटी!! दो‌ या तीन मिनटों बाद आँसू रिसे, जो मुश्किल‌ से ज़ब्त‌ हुये, एक नयी तैयारी के लिये।

फिलहाल जिस मन:स्थिति में हूँ, हर दिन एक नया दिन‌ है! ये उपन्यास् एक शाम में पढ़ लेने वाला तो है, पर शायद एक बार‌ में समझ आने वाला नहीं है!! मेरी; शायद हम सभी की कंडिशनिंग ऐसी ही है... 

ज़्यादा कुछ रिवील नहीं करना चाहती, (चूँकि चाहती हूँ कि प्रतिभा जी ने जिस तरह से एक thought process को गूंथा है, आप सभी भी उससे लाभान्वित हों) पर हां प्रतिभा जी ने अपने काफी सारे निशान इसमें चिन्हित किये हैं, सुबह, फूल, खुशबू, चाय और नदी... और क्या चाहिये?

प्रतिभा जी, मेरे जैसे लोगों के लिये हो चुके एक आम विषय (जो सिर्फ खबर‌ हो गया है) को सतह पर लाने के लिये, हम सबको sensitize करने के लिये आपको साधुवाद!

(मेघना बिट्स पिलानी में एसोसिएट प्रोफेसर हैं)

Friday, February 14, 2025

कबिरा सोई पीर है



मूलतः एक संवेदनशील कवयित्री के रूप में अपनी पहचान बनाने वाली प्रतिभा कटियार का यह पहला उपन्यास अपनी पठनीयता और अपने सरोकार दोनों वजहों से लगभग चकित करता है। खास बात यह है कि यह उपन्यास बड़ी सहजता से लिखा गया है। सरोकार और संवेदना के नाम पर हिंदी में जिस भारी-भरकम और लगभग समाजशास्त्रीय रूखेपन को छूते लेखन की उम्मीद की जाती है, उससे अलग यह उपन्यास अपने छोटे कलेवर में एक बड़ा वृत्तांत रचता है।

उपन्यास की कहानी एक कोचिंग सेंटर से शुरू होती है जहां अलग-अलग वर्गों के छात्र एक सी महत्वाकांक्षा के साथ पहुंचते हैं। मगर वहां भी छात्रों की पसंद-नापसंद, उनकी मैत्री और उनके संबंधों में एक स्पष्ट भेदभाव चला आता है। उपन्यास में ऐसे किरदार हैं जो इस भेदभाव को तोड़कर आगे बढ़ते हैं और बताते हैं कि दुनिया इन खानों से बड़ी है। जाहिर है, यह प्रेम और आपसी समझ के रसायन से बनी मनुष्यता है जो सामाजिक चाल-चलन पर भारी पड़ रही है। लेकिन दरअसल उपन्यास अगर इसी दिशा में बढ़ कर एक सुखांत पर खत्म हो जाता तो तो शायद वह बराबरी की कामना का एक रूमानी बयान होकर रह जाता। यहां लेखिका साबित करती हैं कि उनके लहजे में चाहे जितनी रूमानियत हो, यथार्थ की उनकी समझ बहुत खरी है। वे घर परिवार और समाज के सारे पूर्वग्रह और पाखंड जैसे तार-तार कर देने पर तुली हैं। वे एक पल के लिए भी इस बात को ओझल नहीं होने देतीं कि यह समाज बहुधा कुछ लोगों के प्रति बहुत अमानुषिक व्यवहार करता है और अगर यह भी न हो तो अपनी उदारता के चरम लम्हों में भी वह उनके अवसर छीनने में कोई कोताही नहीं करता, कोई हिचक नहीं दिखाता।

उपन्यास की नायिका दलित समाज से आती है और बचपन से ही देखती है कि उसकी प्रतिभा दूसरों की आंख का कांटा बनी हुई है। उसकी सफलता भी उसका अभिशाप है। जब उसे कोचिंग सेंटर में ऐसा दोस्त मिलता है जो बराबरी पर भरोसा करता है और उससे प्रेम करने लगता है तब वह कुछ बदलती दिखती है। लेकिन अंत में क्या होता है? क्या वह जीवन के इम्तिहानों और अपनी प्रतियोगिता परीक्षाओं में एक साथ पास कर पाती है? क्या वह अपने लक्ष्य और अपना प्रेम हासिल कर पाती है? इन सवालों के जवाब के लिए उपन्यास पढ़ना होगा।

इसमें संदेह नहीं कि यह उपन्यास एक सांस में पढ़ा जा सकता है, लेकिन उसके बाद जिस गहरी और लंबी सांस की ज़रूरत पड़ती है, वह कहीं हलक में अटकी रह जाती है। कई किरदारों और स्थितियों के बीच रचा गया यह उपन्यास हमारे समय की एक बड़ी विडंबना पर उंगली रखता है।

- प्रियदर्शन
 वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार

Wednesday, February 5, 2025

कबिरा सोई पीर है- पहला उपन्यास



वसंत हाथ थामे साथ चल रहा है। सचमुच। ट्रेन में हूँ, देहरादून लौट रही हूँ। पूरे रास्ते सरसों के खेतों की बहार छाई हुई है। बहार को देखते हुए अपने दिल की धड़कनों से कहती हूँ, जरा आहिस्ता चलो, दोस्तों से एक ख़बर साझा करनी है। कि मेरा पहला उपन्यास 'कबिरा सोई पीर है' लोकभारती प्रकाशन से प्रकाशित होकर आ गया है। आज यानि 3 फरवरी से पुस्तक मेले में राजकमल प्रकाशन समूह के स्टॉल पर उपलब्ध है।

मनोज पांडेय का शुक्रिया उन्होंने मेरे लिखे को सुंदर ढंग से सहेज दिया है। अशोक भौमिक मेरे प्रिय हैं, उनका चित्र आवरण पर होना सम्मान की बात है।

प्रियदर्शन जी ने उपन्यास पढ़कर जब मुझे फोन किया था, मुझे लगा जैसे मेरा रिजल्ट आने वाला है। लेकिन जब उन्होंने कहा, 'यह उपन्यास एक सांस में पढ़ा जाने वाला उपन्यास है’ तो काफी देर लगी इस बात को जज़्ब कर पाने में। फिर उन्होंने इसी बात को ब्लर्ब में कुछ इस तरह लिखा, ‘इसमें संदेह नहीं कि यह उपन्यास एक सांस में पढ़ा जा सकता है, लेकिन उसके बाद जिस गहरी और लंबी सांस की ज़रूरत पड़ती है, वह कहीं हलक में अटकी रह जाती है। कई किरदारों और स्थितियों के बीच रचा गया यह उपन्यास हमारे समय की एक बड़ी विडंबना पर उंगली रखता है।‘
बहरहाल, पहला उपन्यास है। और पहले का एहसास कितना अलग होता है, आप सब जानते ही हैं। उम्मीद है जैसे आप सबने अब तक मेरे लिखे को स्नेह दिया है, इस उपन्यास को भी देंगे।
तो, ‘कबिरा सोई पीर है’ अब आपके हवाले है...