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Thursday, December 7, 2017

समय था सपने भी थे-गीता गैरोला


वो सितम्बर के अन्त की कोई उलझी हुई सी शाम थी। दिन छोटे और रातें बड़ी होने ही तरफ जा रही थी। मौसम में ठण्ड की हल्की सी खुनकी अपने आने का अहसास दिला रही थी। कई बार ऐसे दिन उदास लगते हैं। मुझे पहाड़ों की खुद लगने लगी। खेतों में धान की बाली झूम—झूम के अपनी खुशबू लुटा रही होंगी। झंगोरे—मंडुवे की बाल गबार (पकने) बैठी होंगी। और बस तय किया कि अब तो ऑफिस के, घर के, मन के सारे झंझटों से निकलना ही है और तुरन्त बात कर कमल के साथ बस यूं ही आवारागर्दी की योजना बन गई। सोचा इस बार हर्षिल जायेंगे। वैसे ही कहीं पर पैदल, कहीं जो भी सवारी मिल जाये। इस बार कुछ अच्छा सा एक साथ बैठकर पढ़ने की योजना बनी— उपन्यास, कहानी, कविता। घर में कोई था नहीं जिसे कोई सफाई देती। ऑफिस के लोगाें को कहा छुट्टी लेनी है, मन ऊब रहा है। कमल देहरादून ही था और बस हम दोनों ने तय किया कि 8 बजे उत्तरकाशी रोडवेज वाली बस में मिलेंगे। मैंने अपने पिट्ठू में कुछ खाने—पीने का सामान साथ रख लिया।
ये दिन कमल के लिए मुश्किल दिन होते थे। बदलते मौसम में ट्टदमा’ उसे बहुत परेशान करता था। अब उसे दमे की रोकथाम के लिए स्टेराइड लेने जरूरी हो गये थे। मैंने अपने सामान के साथ कामायनी, नवीन जोशी की लिखी दावानल और अज्ञेय की नदी की हीप भी रख ली। दावानल नवीन जोशी ने चिपको आन्दोलन के बारे में लिखी है और मुझे इस उपन्यास ने बहुत प्रभावित किया था। रोडवेज स्टैण्ड में हमें बस के बदले शेयर टैक्सी मिल गई। चलो जल्दी उत्तरकाशी पहुँच जायेंगे ये सोचकर हमने टैक्सी में सीट घेर ली। हालांकि कमल को इस तरह ठुंस कर टैक्सी में बैठना पसन्द नहीं आता। और एक बात— उसके पास पत्रकार होने के नाते रोडवेज की बस में प्रQी सफर करने का पास हमेशा रहता था। फिर भी मेरा मन रखने को कमल टैक्सी में चलने को तैयार हो गया। टैक्सी सीट भरते ही चल दी। महिला होने के नाते मुझे खिड़की वाली सीट पर कब्जा करने का मौका मिल गया। इस बात से कमल को बहुत चिड़ लगती थी, कहता था तू हमेशा अपना औरतपना दिखा देती है, वैसे समानता की बात करेगी।

सबसे खुशी की बात तो ये थी कि टैक्सी मसूरी होते हुए जाती है, तो रास्ता खुशनुमा हरा—भरा दिखने वाला था। मैंने कमल की बात अनसुनी कर दी और खिड़की के बाहर देखने लगी। बरसात के बाद सारा आलम धुला—धुला, खिला—खिला गहरी हरियाली से भरा था। असामन में बादलों के चट्ठबच्चे अठखेलियाँ कर रहे थे। सूरज पूरी ताब से दमक रहा था। हवा में सितम्बर की खुनकी तैर रही थी। टैक्सी सुवाखोली पार करती रौंतू की बेली होते हुए अलमस पार करने लगी थी। यहाँ पर जंगलों का घनापन खत्म हो जाता है। बरसात के बाद पहाड़ों पर हरियाली बरकरार है पर पेड़ बहुत कम हैं। अलमस के बाद मौर्याणा के लिए चढ़ाई शुरू हो जाती है और बांज—बुरांश के जंगल शुरू हो जाते हैं। मैंने जोर से सांस भरी। खेत अनाजों के पकने की महक से गहमहा रहे थे। मौर्याणा से चढ़ाई खत्म और उतराई शुरू होते ही टिहरी झील दिखाई दी। ओह ये झील मुझे कितनी डरावनी लगती है। इसने कितने गाँव कितने खेत निगल लिए और आज भी लगातार गाँव खेतों को निगल रही है। मेरी आँखें भर आई और मैंने झील की तरफ से मुँह फेर लिया। टिहरी झील के प्रति मेरी भावनाओं को कमल अच्छी तरह समझता है। उसने धीरे से मेरा हाथ दबा कर मुझे ये बताया कि वो समझ रहा है। चिन्याली सौड़ के अधिकांश खेत मकानों की भेंट चढ़ गये और पूरा सौड़ (मैदान) जिसमें एक समय उड़द की दाल की इतनी फसल होती थी कि चिन्याली उड़द की दाल की मण्डी समझा जाता था, एयरपोर्ट की भेंट चढ़ गया। फिर भी सड़कों के दोनों तरफ खेत धान, झंगोरों से लहलहा रहे थे। 

हम सवा दो बजे के लगभग उत्तरकाशी पहुँच गये थे। वरुणावत पर्वत की लैण्ड स्लाइड होने के बाद उत्तरकाशी का मिजाज बहुत धूल भरा हो गया है। जरा सी भी बारिश हो जाने पर पूरा बाजार कीचड़ भरा हो जाता है। गनीमत हुई कि तब बारिश नहीं हुई। यहाँ पता चला कि भटवाड़ी से आगे जाने का रास्ता टूटा हुआ है पर वहाँ पर काम चल रहा है, शायद खुल गया हो। हमने तय किया जहाँ तक जाया जा सकता है जायेंगे। खाना खाने को लेकर हर बार कमल और मेरे बीच तनाव हो जाता था। वो केवल पीली दाल और रोटी खाना पसन्द करता था और मैं ककड़ी, दही की माँग भी कर देती थी या स्थानीय सब्जियों की भी। कमल का कहना था दाल फिर भी सही रहती है बाकी चीजों का कोई ठिकाना नहीं होता कि कैसे बनी है। ख्ौर, जब तक साथ रहेंगे तब तक ये झगड़ा चलने वाला था। यहाँ से भी हमने शेयर टैक्सी ले ली और 3 बजे करीब चल पड़े। कमल बोला आज तो शायद रास्ते में ही रुकना पड़ेगा। देखा जायेगा वाले मूड में मैंने सिर हिला दिया।
पहाड़ी लोग सफर में अक्सर उल्टी करते हैं। सो टैक्सी चलते ही दो महिलाएँ और बच्चे शुरू हो गये। टैक्सी गंगोरी होते हुए गणेशपुर का पुल पार करने लगी। मुझे 1991 के भूकम्प के बाद का बुरी तरह टूटा पुल याद आ गया। रास्ते में खेत फसलों से भरे लहलहा रहे थे। नदी पार कई गाड—गदेरे, झरने अपनी पूरी आन से झाग उंडेलते बह रहे थे। हम नैटाला हिना पार कर मनेरी पहुँच गये। डिडसारी गाँव देख कर मुझे फिर भूकम्प वाली स्थिति याद आई। मैंने कमल को याद दिलाया—याद है बेलक वाली ट्रैकिंग में हमें डिडसारी की महिलाएँ मिली थी। कमल का चेहरा यादों से मुस्कराने लगा। सैंज— लाता पार करते हुए मल्ला भड़वाली पहुँच गये। सूरज अपना रोज का रास्ता पार कर अपने घर जाने को तैयार था। धूप का पीलापन मध्यम हो रहा था। हल्की लालिमा लिए धूप धीरे—धीरे ढल रही थी। भटवाड़ी में हमें पता चला कि अभी रास्ता साफ नहीं हुआ। कमल टैक्सी ड्राइवर के पास जा कर बोला कि यार दोस्त जब तक रास्ता साफ होता है हम पैदल आगे निकल जाते हैं, जब तुम आगे मिलोगे तो हम फिर तुम्हारी गाड़ी में बैठ जायेंगे। टैक्सी को भुक्की तक ही जाना था। टैक्सी वाले को किराया देकर हम दोनों ने अपने पिट्ठू लादे और चल पड़े। कमल बोला इस बार जूते ठीक हैं न, मैं बस मुस्करा दी। ठण्डी हवा के झोकों के साथ पैदल चलने में बहुत मजा आ रहा था। हम बातें करते—करते उस जगह पहुँच गये जहाँ पर सड़क टूटी थी। गाड़ियों की लम्बी लाइन दोनों तरफ लगी थी। हमने सोचा जब तक हमारी टैक्सी वाला यहाँ तक आयेगा हम आगे निकल जायेंगे। हमने लगभग चार किलोमीटर का रास्ता पार कर लिया था। हालांकि मौसम में ठण्ड बढ़ रही थी पर हमें चलने से पसीना आने लगा। दूर गदेरों में सांझ उतरने लगी थी। पौन पंछी शोर मचाते अपने घरों की तरफ लौट रहे थे। तभी टैक्सी वाला आ गया, हमारी सीटें खाली ही थी। हम बैठ गये। ये तो तय था कि आज की रात हमें भुक्की में गुजारनी होगी।
भुक्की पहुँचते अंधेरा हो गया। वहाँ पर उस समय बिजली भी नहीं आ रही थी। हमने सबसे किनारे वाले छोटे से ढाबे में अपने पिट्ठू उतारे और चाय की फरमाइश लगा दी। ढाबे वाला प्रौढ़ सा व्यक्ति था (अब मुझे उसका नाम याद नहीं है) वो बड़े से चूल्हे में दो मोटे—मोटे लकड़ी के तने जलाकर अपने खाने की तैयारी कर रहा था। अब यहाँ पर बारी कमल की थी, अब तक कमल ढाबे वाले भ्ौया से चाय के साथ खाने की जुगत भी लगा चुका था। मैंने चारों तरफ मोमबत्ती की रोशनी में नजर घुमाई। ढाबे के अन्दर एक चारपाई और बिस्तर भी पड़ा था। यहाँ बिजली कब से नहीं आई? तीन दिन हो गये साब! उत्तराखण्ड बनने के ग्यारह साल बाद भी गंगोत्तरी जाने वाली मुख्य सड़क में दी जाने वाली सुविधाओं के ये हाल हैं। देख के निराशा होती है। गरमा—गरम चाय पीने के बाद कमल ने बातें बना कर अपने रहने का इन्तजाम भी वहीं कर दिया। ढाबे वाला बोला बिस्तर तो है नहीं साब, आप होटल में चले जाओ। कमल ने उसे आश्वस्त किया कि हमें बिस्तर की जरूरत नहीं, हमारे पास अपने स्लीपिंग बैग हैं। हम जब भी ऐसी यात्राओं पर होते होटल में रुकने को महत्व नहीं देते थे। स्थानीय लोगों के साथ मिलना—जुलना उनसे बातें करना, उनकी बातें सुनना यही हमारी यात्राओं का मूल था। ढाबे में रहने की बात सुन कर कमल को लगा कहीं मेरा पारा हाई तो नहीं हो रहा है। उसने मेरी तरफ देखा और सब सामान्य स्थिति देखते हुए अपनी आदत के अनुसार जोश में आकर दाहिनी हथेली पर बांयी हथेली को जोर से मारते हुए बोला डन— और उस दिन हम उसी ढाबे वाले के यहाँ जमीन पर बिछी चटाई के ऊपर अपने स्लीपिंग बैग तान कर सो गये। 

थकान और ठण्डा मौसम होने के कारण करीब सुबह सात बजे मेरी नींद खुली। हमें दूर जाना होता तो जोशी जी पाँच बजे से ही तिकतिकाने लगते पर हमें बस थोड़ी ही दूर जाना था। इसलिए सात बजे तक सोने के लिए माफी मिल गयी। ढाबे वाले भाई ने चाय बनाई और कमल ने अपना मनपसन्द फैन भी मांग लिया। करीब आठ बजे हम पिट्ठू उठा ही रहे थे कि एक 14—15 साल की लड़की के साथ एक प्रौढ़ व्यक्ति जिसकी आयु लगभग 35—40 साल तक रही होगी, ढाबे में चाय पीने आये। लड़की दुबली पतली सी साड़ी, कुर्ती और वास्केट पहने थी। उसके गले में लटका तिमणियां (तीन साने के गोलों की लाल दानों वाली माला) बता रहा था कि उसका ब्याह हो गया। मेरा उस बच्ची को देखकर पता नहीं क्यों दिल भर आया। मैंने पिट्ठू जमीन पर रख दिया और गौर से उसे देखने लगी। तभी मेरा दिल बड़ी जोर से धड़का अरे ये बच्ची तो कम से कम चार पाँच महीने की गर्भावस्था में लग रही है। मुझे यकीन नहीं हुआ और मैंने इशारे से उसे अपने पास बुलाया। उसके साथ वाला व्यक्ति कुछ काम से ऊपर बाजार की तरफ चला गया था। मुझे लगा उससे बात करने का ये अच्छा मौका है। यहाँ आ बेटा बैठ जा, कितने बरस की है तू? दिदी 15 बरस की— मैंने उसके पेट की तरफ इशारा किया ब्याह कब हुआ तेरा— दिदी तीन बरस हो गये। ओह तो 12 बरस में लड़की का सत्यानाश कर दिया था उसके माँ—बाप ने। मेरा दिल गुस्से और नाराजी से भर गया। अब कितने महीने हंै? चार पूरे होते हैं दिदी। ये तो मेरा दूसरा बच्चा है। पिछले साल एक बच्चा हो के मर गया। ओह हम तो अपनी 14—15 साल की बच्ची को माहवारी में पैड तक लगा कर देते हैं और एक ये बच्ची है 15 बरस की उम्र में दूसरे बच्चे की माँ बनने वाली है। साथ में तेरे पिताजी हैं क्या, मैंने सोचा आज उस आदमी का दिमाग जरा ठीक करती हूँ। नहीं दिदी वो मेरा आदमी है— हे माँ मैं जोर से बोली कैसा मरा तेरे बाप का, ये क्या किया उसने। दिदी हम बहुत गरीब हंै। मेरा बाबा भी क्या करता। वो धीरे से मेरे पास सरकी और हाथ की आड़ बनाकर कान में बोली— मैंने तो देखना भाग जाना है, रहना थोड़ी है मैंने इसके लिए। जब ये बच्चा हो जायेगा न तब इसे छोड़ कर भाग जाना है मुझे। कहाँ जायेगी! मैंने डर कर पूछा— जाऊंगी न देश। एक लड़का है वो मुझसे ब्याह करेगा। ओह अभी सपने देखने शुरू ही किये हैं इसने। तभी वो बोली मेरे आदमी ने दो ब्याह किये थे पर बच्चे नहीं हुए। तब मुझसे ब्याह किया। बहुत गन्दा है ये, बहुत परेशान करता है। मैंने रहना ही नहीं है इसके लिए। उसने अपने नन्हे सपनों को विश्वास से मुझे शेयर किया। तभी वो आदमी आता दिखा। मैंने उसका नाम पूछा— सुमली और वो अपने सपनों की पोटली मुझे थमा कर बस में बैठकर चल दी।
मैंने कमल से पूरी बात कही, वो भी द्रवित हो गया। मैं सोचती रही— कहाँ जायेगी ये भाग कर। कौन देगा इसका साथ। कहीं किसी ने बेच दी तो? और मेरी सांस अटकने लगी। इतनी प्यारी बच्ची, इतनी छोटी— ये है हमारे देश में औरतों की वास्तविक जगह कि बच्चा पैदा करने के लिए एक प्रौढ़ 12 साल की बच्ची को खरीद लेता है और अपनी गरीबी को दो—चार महीने दूर करने के लिए एक बाप 12 साल की बच्ची को बच्चे पैदा करने के लिए बेच देता है। कहाँ है हमारे महिला विकास के दावे। हम लगातार उस बच्ची और उसकी परिस्थितियाँ, उसके सपनों की बातें करते रहे और उसके भविष्य के लिए डरते भी रहे। हम हर्षिल पहुँच गये थे पर मेरा मन बहुत उदास था। हमने सोचा था दो दिन हम केवल कुछ लिखेंगे उसको एक दूसरे को पढ़ायेंगे, सुधारेंगे। किसी उपन्यास पर गहन बात विमर्श करेंगे और एक नई मानसिक ऊर्जा लेकर लौटेंगे। पर सुमली की स्थिति देख कर उदासी छा गई।
मुझे याद आया कि 16 जनवरी 1986 को मैं और कमल पहले भी हर्षिल आये थे। उस बार हम एस.पी.एफ. (स्पेशल पुलिस फोर्स) के मेहमान बने थे और विल्सन हाउस में रहे थे। मेरे पिताजी पी.ए.सी. में ही पोस्टेड थे इसलिए मैं एस.पी.एफ. के कैम्पस में गई और उनकी वी.आई.पी. मेहमान बनी थी। अब विल्सन हाउस जल गया है। दो बड़ी—बड़ी चट्टानें वैसे ही शान से खड़ी थी जैसे तब विल्सन हाउस के पास खड़ी थी। विल्सन ब्रिटिश आर्मी का भगोड़ा सिपाही था। वो हर्षिल आया और उसने पहली बार टिहरी के राजा से लीज पर देवदार के जंगलों का सौदा किया। भागीरथी में स्लीपर बहाकर उसने हजारों देवदार के पेड़ ब्रिटिश राज्य को बेचे। उसने हर्षिल गाँव की ही एक महिला लाली से शादी की। जंगल से हजारों की संख्या में मोनाल पक्षी मारे और उनके रंग—बिरंगें परों का अंग्रेजों को व्यापार कर अमीर बन गया। मोनाल के परों को अंग्रेज महिलाएँ अपने हैट में लगाया करती थी। विल्सन ने मसूरी में भी एक घर बनाया। हर्षिल में सेव के बगीचों की शुरूवात भी विल्सन ने ही की थी। स्थानीय लोग उसे हूल साब कह कर बुलाते थे। उसी विल्सन के देवदार की लकड़ी से बने आलीशान घर में हम 1986 में रह चुके थे। और ठीक 25 साल बाद मैं और कमल फिर हर्षिल में थे। तब हर्षिल छोटा सा हुआ करता था। अब काफी फैलाव हो गया है। यहाँ भी हमने एक छोटे से ढाबे जैसे होटल में अपने रहने का इन्तजाम किया और बसन्ती दीदी से जो हर्षिल में ही रहती है मिलने चल दिए। पता चला बसन्ती दीदी अभी घर पर नहीं है।
बसन्ती दीदी से मेरी पहचान उत्तराखण्ड आन्दोलन के दौरान हुई थी। दीदी यहाँ की बहुत सक्रिय महिला हैं। वो गाँव की महिलाओं के संगठन की अध्यक्ष थी। उनके घर पर न मिलने के कारण हम बागोरी गाँव की तरफ चल दिये। यहाँ पर ठण्डा मौसम था। सेव की फसल टूट गई थी। हर्षिल बाजार में अधिकांश हरे सेबों की पैकिंग चल रही थी। यहाँ की मुख्य फसल राजमा से खेत लदे हुए थे। चौलाई की लाल—लाल बालें हरीतिमा के साथ गजब का मेल बना रही थी। तभी मेरेे कटे हुए बालों को देख कर एक लड़का हमसे आकर बातें करने लगा। मैडम जानती हंै यहाँ राम तेरी गंगा मैली की शूटिंग हुई थी। चलिए आपको उस लोकेशन पर ले जाता हूँ जिस झरने में मन्दाकिनी नहाई थी। मैंने मुस्करा कर मना कर दिया पर कमल तो चीज ही कुछ और है। उस लड़के के कंधे पर हाथ रखते हुए बोला यार दोस्त जब मन्दाकिनी यहाँ आई थी तब तो तू पैदा भी नहीं हुआ होगा और हम यहीं के हंै दोस्त, परदेशी नहीं हैं। लड़का झेंप गया और बोला ठीक है भाई साहब फिर आप यहाँ क्या करने आये। दोस्त हम दोनों आवारा हैं और आवारागर्दी करने आये हैं। हमने छोटा सा लकड़ी का पुल पार कर बागोरी गाँव में प्रवेश किया। वहाँ पर लगे झण्डे बता रहे थे कि ये बुद्धिस्टों का गाँव है। यहाँ पर जाड़ लोग निवास करते हैं। 1962 से पूर्व इनके चीन और तिब्बत से व्यापारिक सम्बंध थे। ये अपनी लद्दू बकरियों पर सामान लाद कर व्यापार करते थे परन्तु अब कुछ नौकरी पेशा हैं, कुछ ऊन का काम करते हैं।
जाड़ों के दिनों में इस गाँव के अधिकांश लोग डुण्डा चले जाते हैं। इधर के सालों में इस गाँव के अधिकांश परिवार डुण्डा में ही बस गये हैं। या तो उन्होंने गाँव छोड़ दिया है या कभी—कभी बागोरी आते हैं। हम चलते—चलते गाँव के ऊपर एक समतल जगह में बैठ गये। कमल अपनी ट्रैकिंग वाली पानी की बोतल में पानी भर लाया। हमने बाजार से खरीदे सेव खाये। इसी बीच मैंने नवीन जोशी का लिखा उपन्यास दावानल निकाल लिया और कमल से बोली आज इस पर बात करेंगे। सबसे पहले कमल ने मोबाइल निकाल कर नेटवर्क देखा और तुरन्त नवीन जोशी को फोन लगाया। उन्हें बताया कि दावानल की बहुत बड़ी फैन मेरे पास बैठी है और आज हम दोनों इस पर विस्तृत बात करने वाले हैं। वास्तव में दावानल की स्थानीयता, चिपको आन्दोलन से जुड़े मेरे स्नेही परिचित पात्रों ने मुझे उपन्यास से सबसे अधिक आत्मीय बनाया। मैंने उपन्यास के कुछ अंश पढ़ कर सुनाये। दावानल की शुरूवात रतन सिंह रीठा गाड़ी द्वारा गाये एक लोक गीत भंवर उड़ाला बलि से होती है और उपन्यास का अन्त भी इसी गीत से होता है।

इस तरह प्रारम्भ और अन्त ने मेरे अन्तरमन को छू लिया था। हमने इस बात पर बहुत बहस की कि चिपको आन्दोलन कैसे विश्व राजनीति का हिस्सा बन कर केवल पर्यावरण का आन्दोलन बन कर रह गया। आन्दोलन की आत्मा में स्थानीय लोगों की स्थानीय संसाधनों पर निर्भर आजीविका का जो सवाल था वो बड़े—बड़े प्रश्नों के पीछे खो गया। उसके बाद जल—जंगल—जमीन से जुड़े हर आन्दोलन जिसमें स्थानीय लोगों की आवाज शामिल होती है वो ग्लोबलाइजेशन के पीछे खोते जा रहे हैं। ये हमारी चिन्ता का विषय था। कमल और मैं इसमें क्या कर सकते थे। ये हमने तय किया कि हम अपनी भावी पीढ़ी के लिए जीने लायक स्थितियों को बनाने के लिए हर संघर्ष में साथ रहेंगे। उसके बाद मैंने कामायनी के दो सर्ग पढ़ कर सुनाये और कमल सुनता रहा। उसे दुख हुआ कि उसने अब तक कामायनी को गम्भीरता से क्यों नहीं पढ़ा। कमल ने कामायनी को अपनी लोकगाथाओं से जोड़ने की कोशिश की और गरूड़—गरूड़ी की लोक कथा सुनाई। हम कामायनी और गरूड़—गरूड़ी की कथा के जल—प्लावन का जोड़ बनाते रहे। इतिहास में मानव जन्म को ढूंढते रहे और सूरज ने कहा अब बस अपने ठिकाने लौट जाओ। एक बेहतर समाज में जीने लायक परिस्थितियाँ बनाने के सपने ले कर।

जारी...

और आखिरी बार भिलंगना- गीता गैरोला


जिन महिलाओं के साथ मैंने कई वर्षों तक काम किया, अपने दिन रात गुजारे, दुःख—सुख लगाया, उनके आँसुओं के साथ रोये और उनके सुखों के साथ हँसे। वो महिलाएँ जिन्हें लोग अशिक्षित, अनपढ़ गंवार बोलते हैं और जो मेरा असली स्कूल है। इन्हीं गंवार निरक्षर औरतों ने मुझे जीने का सलीका सिखाया। जीवन के असली अर्थों को मेरे सामने रखा। मुझे भिलंगना ब्लॉक की इन्हीं बहनों की बहुत याद आ रही थी। इन बहनों से अलग हुए मुझे पाँच साल हो रहे थे। महिला समाख्या कार्यक्रम ने 1995 में मुझे पौड़ी जिले में महिलाओं को संगठित करने की जिम्मेदारी दी थी। इसीलिए मैं अपने शुरूआती दौर के काम के दौरान जुड़ी इन बहनों से मिल नहीं पा रही थी।

ये अक्टूबर 1998 की बात हैं। मैं टिहरी के भिलंगना विकास खण्ड जाने के लिए साथ ढूंढ रही थी। गाँव को समझने, उसकी बदली परिस्थितियों को जानने के लिए कमल जोशी से अच्छा कोई साथी नहीं था। सो मैंने बीना के पास अपने बेटे गोलू को छोड़ा, घर की व्यवस्थाएँ की और कमल के साथ टिहरी की तरफ चल दी। ये वही समय था जब टिहरी बाँध को बनाने के लिए टिहरी को खाली किया जाना शुरू हो गया था। टिहरी को बार—बार देखना और वहाँ रह कर उस शहर को महसूस करने का लालच भी साथ ही बना हुआ था। हम कोटद्वार से चल कर ऋषिकेश पहुँचे और टिहरी जाने की बस में बैठ गये। सोचा थोड़ी देर टिहरी में रूक कर भिलंगना की बस मिल ही जायेगी। टिहरी पहुँच कर हमने पिट्ठू बस स्टैण्ड में एक प्रैस में रखे और विघासागर नौटियाल जी से मिलने चल दिये। इत्तेफाक से नौटियाल जी घर पर नहीं मिल पाये। हमने अपने आने का सन्देश पर्ची में लिख कर उनके घर में छोड़ा और बस स्टैण्ड आ गये। वहाँ पर घनसाली जाने के लिए बस लगी थी। ये तय था कि जहाँ तक भी जा सकेंगे, वहीं पर रात को रूक जायेंगे।
घनसाली से एक ट्रक सामान ले कर बूढ़ा केदार जा रहा था। कमल ने ट्रक वाले से बात की और वो हमें बूढ़ा केदार तक छोड़ने को तैयार हो गया। टिहरी से चलते ही बाँध का डूब क्षेत्र शुरू हो गया जो उन दिनों और आज भी हमारी संवेदनात्मक कमजोरी रही है। ये डूब क्षेत्र का पूरा इलाका टिहरी जिले का सबसे उपजाऊ खेती वाला इलाका था। गडोलिया के सेरे, गडोलिया से नीचे थुनगुली गाँव के सेरे सब डूब जायेंगे, सोच के दिल भर गया। नदी आर—पार के जंगल सब डूब जायेंगे। गडोलिया से लगे असेना गाँव की गाड से पत्थर निकालने के कारण पूरा वातावरण धूल से भरा था। पत्थर ढोते ट्रकों ने सड़क में इतने गड्ढे बना दिए थे कि घनसाली चमियाला जाते हुए हमारा ट्रक में बैठना मुश्किल हो रहा था। थाती पहुँचते हमें रात के 7ः30 बज गये। सरजू का घर तो अपना ठिकाना था ही, उसके अलावा बालमी दीदी या धर्मानन्द नौटियाल जी के घर भी आराम से रह सकते थे पर हमें रास्ते में सरजू मिल गई और हमने तय किया कि सरजू के घर ही रहेंगे।
अगले दिन से हमारी पैदल यात्रा शुरू होने वाली थी। सोचा सुबह नहा—धोकर निकल जायेंगे, तो बाकी दिन जैसे भी गुजरे। सरजू और मैं साथ ही काम करते थे। वो हरिजन परिवार की अविवाहित महिला है और पता नहीं क्यों उसने किसी साधू से दीक्षा लेकर सन्यास ले लिया था। उस इलाके में सरजू का बड़ा सम्मान है। ऐसे ही बालमी दीदी भी है जिन्होंने सन्यास ले लिया है। बालमी दीदी महिला समाख्या की सखी (गाँव की समन्वयक) थी। जैसे ही गाँव की महिलाओं को पता चला कि मैं आई हूँ, धीरे—धीरे सब मुलाकात के लिए आने लगी। पहाड़ के आम गाँवों में हरिजनों के घर पर ठाकुर, ब्राह्मण परिवार के लोग नहीं जाते पर इस गाँव की तो बात ही कुछ और है। यहाँ पर लोक जीवन विकास भारती नाम की संस्था काम करती हैं जिसको बिहारी लाल जी संचालित करते हैं। बिहारी लाल जी के पिताजी भरपूरू नागवान, धर्मानन्द नौटियाल जी और थाती के ही बहादर सिंह जी सर्वोदयी थे। भरपूरू नागवान, धर्मानन्द नौटियाल और बहादर सिंह जी ने थाती में एक सर्वोदय परिवार बनाया था। एक ठाकुर, एक ब्राह्मण और एक हरिजन परिवार एक साथ एक घर में रहते थे। बच्चे एक साथ खाते—पढ़ते, थाती गाँव उपजाऊ सेरे वाली खेती के लिए आज भी प्रसिद्ध है। तीनों परिवार की महिलाएँ एक साथ खेती करती, अनाज एक साथ रखा जाता। तीन परिवार एक चूल्हे में खाना बनाते—खाते। ये कहानी मुझे 1994 में असकोट—आराकोट अभियान के दौरान जब हम इसी क्षेत्र में पदयात्रा कर रहे थे तब कमल ने सुनाई थी।
अभियान के सभी यात्री उस समय भी इन तीनों परिवारों से मिल कर गये थे। तब तक ये सर्वोदय परिवार के लोग पुनः अपने—अपने परिवारों के साथ अलग रहने लगे थे। सर्वोदयी संस्था लोक जीवन विकास भारती के अध्यक्ष लस्याल गाँव के दिलीप सिंह जी थे। बूढ़ा केदार मन्दिर में हरिजन प्रवेश के लिए हुए सत्याग्रह में धर्मानन्द नौटियाल जी, बहादर सिंह जी और सुन्दरलाल बहुगुणा जी ने पुरोहितों की मार खाई थी। नौटियाल जी के सिर पर चोट आई थी। सर्वोदयी प्रभाव के कारण ही इस गाँव में हरिजन परिवार के घर में महिलाओं का आना—जाना होता रहता है।
सरजू की बहन और माँ हमारे लिए भोजन की व्यवस्था करने लगी। मैं और कमल तो महिलाओं के साथ बतियाने ही आये थे इसलिए खूब गप्पें लगने लगी। महिलाओं ने ट्टवैष्णव जन तो तैने कहिये’ गाया और साथ ही ट्टजब बन ही गया बहनों का संगठन’ भी गाया। 1989 से 1998 तक के समय अन्तराल के बाद महिलाओं के साथ बात करके बहुत मजा आ रहा था। हम सब लोगों ने मिल कर ट्टन काटा न काटा, त्यौं डाल्यूं न काटा’ गीत गाया। तभी बालमी दीदी हमारे लिए पिण्डालू के पत्तों के पत्यूड़ बना कर ले आई।
उस दिन पता नहीं कितने दिनों के बाद बहुत ही गहरी और चैन की नींद आई। कमल बोला ऐसे ही गाँवों में घूमते मौत आ जाये तो मेरी जिन्दगी सफल हो जायेगी। दूसरे दिन सुबह ही बालमी दीदी के साथ हम आगर की तरफ चल दिये। इन दिनों पहाड़ों में खेत फसलों से खाली हो जाते हैं। ककड़ी पीली—लाल हो कर सूखी बेलों से लटकती रहती है। छतों, खल्याणों(खलिहान) में धान—झंगोरा, मण्डुवा, दालें, मिर्चे सूखती रहती हैं। छतों की धुरपली में लाल कद्दू की कतारें लगी रहती हैं। महिलाएँ जाड़ों के लिए सूखा घास और लकड़ी काट कर जमा करती हैं। पहाड़ी गाँवों में काम हमेशा से जरा कम हो जाता है। घर—घर में पीले नींबू, नारंगी लगे दिखाई देते हैं। आगर गाँव में कमल हमारे साथ 1991 के भूकम्प में तथा 1994 में असकोट—आराकोट अभियान के दौरान भी आ चुका था। 1991 के भूकम्प में आगर गाँव में बहुत नुकसान हुआ था और प्रधान जी की किशोरी बेटी की मलबे में दबने से मृत्यु हो गई थी। उसी साल रामलीला में प्रधान जी की बेटी सीता बनी थी। उस इलाके में ये पहली बार हुआ था कि सीता की भूमिका एक लड़की ने निभाई थी। 1991 तक भिलंगना ब्लॉक के गाँवों में हमें साक्षरता शिविर चलाने के लिए आठवीं पास लड़की मिलनी मुश्किल थी। और प्रधान जी की बेटी नवीं में पढ़ती थी।
थाती से आगर तक की चढ़ाई चढ़ते कमल जोशी ने अपनी ट्रैकिंग की भरपूर योग्यता दिखाई और लमालम चढ़ाई चढ़ गये। बालमी दीदी भी आदी थी पर मैं हाँफती—कांपती धीरे—धीरे चढ़ती रही। पीठ में पिठ्ठू तो था ही। गाँव के नीचे ही कमल हमारा इन्तजार करता मिल गया। घास काटती महिलाएँ मुझे पहचानने की कोशिश कर रही थी। मैं सबसे नमस्ते बोलती जाती आओ दीदी घर आओ हमें भूख लगी हैं। खाना तुमने ही खिलाना है ट्टमैं मजाक करती पर वास्तव में ये मजाक नहीं होता’ हम अपने रात्रि निवास और भोजन की व्यवस्था के लिए माहौल बना रहे होते। प्रधान जी को अपना परिचय दिया तो वो पहचान गये। सात साल बीत जाने के बाद भी उनकी पत्नी मुझे और बालमी दीदी को देखते ही अपनी बेटी की याद में रो पड़ी। हमें देख कर गाँव के अन्य लोग भी प्रधान जी के घर में जमा हो गये। हमने भूकम्प कि बात करते हुए काम का जायजा लेने की कोशिश की। जो घर टूट गये थे वहाँ पर टीन की छत वाले घर खड़े थे। जिन घरों में दरारें छोटी थी मरम्मत के बाद भी दरारें चौड़ी दिखाई दे रही थी। लोग सरकार द्वारा किये गये राहत के कार्यों से बहुत असन्तुष्ट थे। गाँव के स्कूलों में लड़कियों की संख्या बढ़ गई थी। गाँव की युवा बहुएँ मुझे देख कर प्रभावित थी और बुजुर्ग महिलाओं को मैं आज भी पहले जैसे बेचारी लग रही थी। मुझे उनका खुद के लिए बेचारी शब्द कहना अन्दर तक गुदगुदा देता है। सच में उन कर्मठ महिलाओं के सामने हम शहरों में रहने वाली औरतें बेचारी तो हैं ही। कुछ घरों में छोटे बच्चे चुलू के ढेले (बीज) फोड़ रहे थे। चुलू की गिरी का तेल इस इलाके में खाने के काम भी लाते हैं। यहाँ चुलू के पेड़ों से जंगल भरे पड़े हैं। तेल के लिए ये बहुत अच्छा संसाधन हैं। गाँव में अभी लोगों का पलायन नहीं दिखाई दे रहा था। पुरुष, युवक नौकरी करने जाते हैं पर वापिस गाँव लौट आते हैं। इस पूरे इलाके में मुख्य दीवाली के ठीक एक महीने बाद वाली बग्वाल (जिसे रिख बग्वाल कहतें हैं) धूमधाम से मनाई जाती है। सारे गाँव के नौकरी पेशा उसी बग्वाल में घर आते हैं। बातचीत के दौरान कमल ने खाने की फरमाइश कर दी। मैंने आँख दिखाई तो बोला यार भूख लगी है तो माँगने में क्या बुराई है। प्रधान जी बोले सही बात है भ्ौजी।
हमारे लिए फौरन भोजन की व्यवस्था हो गई, दाल—भात के साथ घी से भरा कटोरा देख कर मेरे होश उड़ गये। इतना सारा घी खाने की मैं कल्पना भी नहीं कर सकती थी। उधर जोशी जी ने आधी कटोरी घी अपने भात पर पलट दी। अपने चिर परिचित अन्दाज में हाथ मलते हुए बोले यार खा ही लेता हूँ, आगे चलने के लिए ताकत बनी रहेगी। गाँव की बहनें बहुत जिद करने लगी कि आज की रात हम उनके गाँव में ही रुकें, पर हमें तो अगले गाँव भी जाना था सो सबसे गले मिल कर बहनों को भरी आँखों से विदा दी और चल दिए। कमल ने मुन्डी के साथ ही हाथ भी हिलाया और बोला यार दुनिया में औरतें ही हैं जो कहीं भी एक दूसरे से जुड़ जाती हंै और रो कर एक दूसरे को विदा करती हंै। इन्हीं के स्नेह और सम्वेदनाओं से दुनिया जिन्दा है। मैं और बालमी दीदी कमल के मुँह से एक सही बात सुनकर एक दूसरे की तरफ देखकर मुस्करा दिये।

हमारी ये यात्रा लोगों के साथ मिलने—जुलने और अपने पहाड़ों को जीने के लिए थी इसलिए हम बिना कोई अतिरिक्त काम का बोझ लिए गाँवों के साथ, वहाँ के लोगों के स्नेह के साथ, जंगलों, खेतों, पहाड़ों के साथ खुल कर जी रहे थे। रास्ता कहीं उतार, कहीं चढ़ाई, कहीं सीधा था। जंगल में हरे पेड़ों के पत्ते हल्के पीले हो कर झड़ने को तैयार थे। घास कहीं हरी कहीं पिंगलाई मन को मोह रही थी। जहाँ धूप नहीं थी वहाँ पर पाले से गीला और ठण्डा भी था। बालमी दीदी ने मुझे तेजी से कदम बढ़ाने की सलाह दी। उनका कहना था कि हमें उजाले—उजाले गाँव में पहुँच जाना चाहिए। मेड़ मारवाड़ी और निबाव गाँव भिलंगना ब्लॉक के अन्तिम गाँव हैं। यहाँ के लोग गर्मी शुरू होते ही अपने जानवरों को लेकर छानों में चले जाते हैं और ठण्ड शुरू होते ही वापस गाँव लौट आते हैं। ठण्ड की शुरूवात हो रही थी इसलिए गाँवों में चहल—पहल मिल सकती थी। हमने तय किया कि आज टिहरी के अन्तिम गाँव मेड़ में रहेंगे। इस गाँव की अधिकांश छाने गंगोत्तरी से केदारनाथ जाने वाले पुराने पैदल मार्ग में पंगराणा तथा बेलक नामक जगहों में है। बेलक के एक तरफ टिहरी तथा दूसरी तरफ उत्तरकाशी जिलों के गाँव है। खेतों का काम खतम हो गया था। दिन ढलने को तैयार था इसलिए खेतों में महिलाएँ घर जाने की तैयारी में थी।

कमल ने रास्ते में चलती महिलाओं को नमस्कार दीदी बोला और गढ़वाली में बात करने लगा। पहाड़ों में हर पाँचवें किलोमीटर पर बोली का फर्क हो जाता है। यहाँ तो कमल चमोली में बोली जाने वाली गढ़वाली बोल रहा था। वो दोनों महिलाएँ हँसने लगी। उन्हें ये तो लगा कि ये अंग्रेज जैसा दिखाई देने वाला आदमी पहाड़ी बोल रहा है पर बोली समझ में नहीं आई। यही हाल मेरा भी था। मैं पौड़ी में बोली जाने वाली गढ़वाली बोलती हूँ। फिर भी टिहरी—पौड़ी की बोली मिलाकर समझाने लायक बात कर लेती थी। मैंने बोला दीदी आज रात को हम आपके घर रहेंगे। ये सुनकर एक महिला तो चुप हो गई पर दूसरी बहुत खुश हुई और बोली हाँ हाँ चलो—चलो। कमल को लगा चलो इतनी बातें बनाने के बाद रहने खाने की व्यवस्था हो गई तो खुश होकर लबर—लबर बातें बनाने लगा।
बालमी दीदी ने उस बहन से नाम पूछा तो बोली पुलमा नाम है मेरा। मुझे ये नाम बहुत ही अच्छा लगा, इत्तेफाक ऐसा हुआ कि हम जिस छेणी दीदी के घर रहने वाले थे ये महिला उनकी पड़ोसी निकली। छेणी देवी इस पूरे इलाके के महिला मंगल दलों की अध्यक्ष थी और उनका इलाके में बड़ा सम्मान था। लोक जीवन विकास भारती संस्था जो भी काम महिलाओं के साथ करती उसमें छेणी दीदी का ही नेतृत्व रहता था। एक बार दीदी ने इस पूरे इलाके में अखरोट के पेड़ों का रोपण करवाया था। गाँव तक पहुँचते—पहुँचते हम तीन से आठ हो गये। इतने लम्बे अन्तराल के बाद वो बहनें मुझे पहचान नहीं पाई थी और कमल तो हर जगह कौतुहल का विषय रहता ही है। चश्मे की दोनों कमानी पर लटकती डोरी, दाड़ी से भरा मुँह, गले में लटकता कैमरा पता नहीं कितनी जेबों वाली पैन्ट, जैकेट और पीठ पर पिट्ठू बाँधे दुबला—पतला सा लमा—लम लम्बे—लम्बे डग भरता पहाड़ों को चढ़ता ये अजूबा लोगों को बहुत आकर्षित करता, खास तौर पर महिलाओं और बच्चों को। जब वो कमल के मुँह से गढ़वाली सुनते तो उन्हें यकीन ही नहीं होता कि ये व्यक्ति गढ़वाली है।
रात गहराने से पहले झुटपुटे उजाले में हम मेड़ गाँव पहुँच गये। पूरे गाँव के घरों से उजाले की झिरियाँ झांक रही थी। बिजली के बारे में उतनी दूर दराज बात करने का कोई अर्थ नहीं था। घरों से धुएँ की लकीरों के साथ साग छौंकने की अलग—अलग खुशबुएँ आ रही थी, जो पूरे वातावरण को जीवन्त कर रही थी। कुत्ते भौंक कर अपने होने को सिद्ध कर रहे थे। बच्चों के रोने चिल्लाने की आवाजें अंधेरे के साथ घुल मिल रही थी। हम छेणी दीदी के घर पहुँचते इससे पहले ही उन तक सन्देशा पहुँच गया था कि कुछ देशी लोग आपके घर आ रहे हैं। कितनी अजीब बात है न आप पहाड़ों में कहीं भी चले जाइये आपको रहने खाने का ठिकाना आराम से मिल जायेगा और चार छह लोग बातचीत करने वाले हमेशा मिल जायेंगे। महिलाएँ और बच्चों के आकर्षण का केन्द्र अजनबी होते ही हैं।
ठण्ड बढ़ गई थी। हमें बाँज के कोयलों से दहकती अंगीठी के पास बैठने में मजा आ रहा था। होंठ को चिपकाने वाली चीनी डली चाय जिसमें पानी कम और दूध की बहुतायत थी, कमल को डरा रही थी। उसे कम चीनी वाली चाय पीने की आदत है। पर मुझे वो चाय अमृत की तरह लग रही थी सो मैंने सड़ासड़ पूरी गिलास चाय झट से पी ली। आस—पास के घराें से तीन लोग हमें देख कर बैठने आ गये। छेणी दीदी बुजुर्ग महिला थी पर मुझे एकदम पहचान गई और गले लगा कर प्यार किया। बालमी दीदी का तो वो इलाका अपना ही था। दीदी ने मेरे बेटे की खुश खबर ली। खूब बड़ा हो गया होगा न, तब तो छोटा सा था— कहा, और प्रताप नगर, जाखणीधार, जखोली की ढेर सारी बहनों के नाम लेकर, उनको याद करती रही। इसी बात की तो मुझे खुद लगी थी। यही लगाव मुझे खींचकर यहाँ लाया था। मैंने दीदी से कहा कि इस बार केवल आप लोगों से मिलने आ गई हूँ, आपकी याद आ रही थी। दीदी मेरा सिर सहला कर रोने लगी। कमल जोशी जी हमारा स्नेह लगाव और बात—बात पर आँसू ढरकाने को देखकर अभिभूत से बैठे थे। रात को ढेर सारी बातें होती रही अब मेड़ गाँव की लड़कियाँ स्कूल जाती हैं। स्कूल में दो मास्टर हंै पर स्कूल में बच्चों को पढ़ाने के लिए रहते अब भी एक ही हैंं। एक महीने बहन जी रहती हैं और अगले महीने मास्टर जी। 1994 में भी यही बात कही थी गाँव वालों ने। टिहरी जिले के उस अन्तिम गाँव में आज भी शहर में रहने वाली औरतों के बारे में जानने की जिज्ञासा थी। आज भी वो मुझे ट्टहे राम तुम बेचारी त’ बोल कर गुदगुदा रही थी। रात, ठण्ड और थकान हमें सोने को उकसा रहे थे।

कमल ने इस बीच हुए पंचायत चुनावों के बारे में बात की और उसमें महिलाओं को मिले 33 प्रतिशत आरक्षण के फायदे पूछे। छेणी दीदी को इस बात की जानकारी थी पर बोली ट्टद भुला हमन तब भी यूँ बणूं म घास लाखड़ू काटी और गोर बाछरू धन चैन चराई’, अब भी वही कर रहे हैं। गाँव पलायन से बचा था। नौ लोग बाहर नौकरी करते थे पर बग्वाल में घर लौटने वाले थे। आजीविका भी खेती—पशु और जंगल पर आधारित थी। सड़क बन रही है ऐसा सुना जा रहा था पर कब बनेगी, कौन बनायेगा ये नहीं पता था। औरतों बच्चों का टीकाकरण (जिसे वो लोग धोक्का कह रही थी) करने एक देशी महिला आती हैं कभी चार छः महीनों बाद। जब कोई बहुत बीमार पड़ जाता है तो डॉक्टर उन्होंने घनसाली में ही देखा है। वो किसी बडूनी डॉक्टर की दुकान की बात कर रहे थे। दो दिन पहले ही गाँव में जोंक लगने (डिहाइड्रेशन) से एक छः महीने के बच्चे की मौत हुई थी। ढेर सारी बातें जो खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी। मैं जब गाँव की महिलाओं के साथ बहुत प्यार और लगाव से बातें करती तो कमल मन्द—मन्द मुस्कराता रहता, और हमारी बातों का आनन्द लेता रहता। इस तरह की छोटी—छोटी बेमकसद की गई यात्रायें मुझे जीवनी शक्ति से भर देती हंै और मैं अपने रोज—रोज के कामों से हुई थकान और ऊब से निकल जाती हूँ। गाँवों के हालातों की वास्तविक तस्वीर भी पता चल जाती है। कमल हमेशा कहता— चाहे हम कुछ कर पायें या नहीं पर अपने लोगों तक पहुँचना और उनकी बात सुनना—समझना भी हमारे लिए एक बड़ी उपलब्धि है।

दूसरे दिन हम वापस थाती आये और बूढ़ा केदार के प्राचीन ऐतिहासिक मन्दिर में भी गये। इसी मन्दिर में हरिजन प्रवेश करवाने के लिए ये गाँव, ये पत्थर, ये रास्ते, ये लोग एक बड़े आन्दोलन के गवाह रहे हैं। यहाँ पर सर्वोदय परिवार बना कर रहने वाले वो लोग आज भी मौजूद हंै जिन्होंने समाज—जात से बाहर किये जाने की त्रासदी झेली है। मैं इस गाँव की धरती को बड़े प्यार से छूती हूँ और मेरी आँखें भर आती हैं। लोगों के प्रयासों से समाज के अन्दर कोई परिवर्तन हुआ या नहीं ये उतना महत्वपूर्ण नहीं है, पर प्रयास और जुनून हमेशा जारी रहना चाहिए जो आज भी मौजूद है और जुनून भी बना हुआ है। कमल जोशी गम्भीरता से कहते हैं। उस जुनून के साक्षी हम दोनों उन सभी लोगों को पलट—पलट के देखते हैं कि शायद फिर आना होगा भी या नहीं और लोक जीवन विकास भारती में बिहारी भाई जी से मिलने चल देते हैं और सचमुच वो हमारी भिलंगना ब्लॉक की अन्तिम यात्रा थी। भिलंगना का पानी तब भी पत्थरों से टकराता बह रहा था, आज भी बह रहा होगा। अब तो यात्राओं में कमल का साथ भी नहीं रहा।

हम अजनबियों के पैरों के निशान कहीं मिट्टी में दफन हो गये होंगे, पर हम कभी वहाँ गये थे उन रास्तों पर चले थे। हमने उन्हें जिया, यही हमारे जीवन की शाश्वत सच्चाई है। वहाँ के लोगों का प्यार आज भी आँखों को नम कर देता है.

- जारी 

Tuesday, December 5, 2017

जंगल और चमकीले तारों वाला आसमान-गीता गैरोला

फोटो- कमल जोशी 

गीता गैरोला दी ने अपने संस्मरण 'प्रतिभा की दुनिया' को नहीं दिए  असल में उन्होंने दिल दिया है प्रतिभा को. यह दिल कब चुपके से वो मुझे दे बैठीं और कब चुरा भी ले गयीं पता ही नहीं चला. अब हम पक्की गुइयाँ हैं. वो मुझसे डांट भी खाती हैं और प्यार वाली झप्पियाँ भी देती हैं. उनकी समूची वार्डरोब पर मेरा कब्ज़ा है, उनके वक़्त पर भी, उनके हर अच्छे बुरे लम्हे पर, और अब उनके लिखे पर भी. उनके इन संस्मरणों से गुजरना दिल के सबसे नाज़ुक हिस्सों को छू लेना है, एक कसक को थाम लेना है, त्वचा की सबसे अंदरूनी सतह में कुछ रेंगता हुआ महसूस करना है. इन संस्मरणों को पढ़ते हुए प्रिय मित्र कमल जोशी की यादों में डूब जाना भी है. शुक्रिया गीता दी- प्रतिभा 

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बरसात बीत रही थी। मौसम में ऊब तारी थी। कहीं दूर निकल जाने को दिल छटपटा रहा था। मैंने कमल को फोन किया, कमल दिल ऊब रहा है चलो कहीं चलते हैं पहाड़ों की तरफ। कमल सुनते ही उछल गया, हाँ हाँ क्यों नहीं। बता कब जाना है। मैं थोड़ी झिझक रही थी। जब एक मौसम से दूसरे मौसम में दिन बदलते हैं उसे अस्थमा का दौरा तेज हो जाता है। मैंने पूछा तुम ठीक हो गये क्या? मैं उन दिनों काठगोदाम में थी और कमल कोटद्वार में। बदलता मौसम उसके लिए बीमारी का मौसम होता। उसने मेरी पूरी बात नहीं सुनी और कब जाना है की रट लगा दी। शायद वो भी बीमारी से ऊब रहा था। वैसे भी पहाड़ों में घूमना उसके अस्थमा के दौरों से बाहर निकलने की अचूक दवा होती। हमने तय किया कि ये पैदल वाली ट्रैकिंग नहीं होगी। हम सुविधा अनुसार कभी गाड़ी और कभी पैदल चलेंगे।

हम राजजात जाने वाले रास्ते पर दुबारा जाना चाहते थे। नन्दा देवी राजजात बीते दो वर्ष हो गये थे। वही रास्ते, वही लोग, वही जगहें दोबारा देखने को मन था। जिन लोगों से राजजात के दौरान मुलाकात हुई उनसे दुबारा मिलना रोमांच पैदा कर रहा था और हम 20 सितम्बर 2002 को पहाड़ों से ऊर्जा लेने अपनी रूटीन जिन्दगी की ऊब खतम करने निकल पड़े। बारिश कम हो गई थी, रास्ते थोड़े कम टूटे होंगे ऐसा अनुमान था। कमल कोटद्वार से चल कर श्रीनगर पहुँचेगा और मैं देहरादून से श्रीनगर। क्योंकि ये जाने पहचाने रास्तों में गाँवों को पार करती ट्रैकिंग थी इसलिए पिट्ठू में स्लीपिंग बैग के अलावा कुछ जरूरी सामान रखे। जूतों का विशेष ध्यान रखा क्योंकि एक बार ट्रैकिंग के दौरान नये जूते मुझे परेशान कर चुके थे। करीब 2 बजे जब मैं श्रीनगर पहुँची तो कमल जोशी जी उमस और पसीने से लथपथ मेरा इंतजार कर रहे थे। हमने तय किया कि जहाँ तक की बस मिलेगी वहीं पर आज का बसेरा होगा। ठीक सामने ग्वालदम जाने वाली बस खड़ी थी। हम दोनों बिना कुछ सोचे बस में चढ़ गये। जगह भी मिल गई। पांच मिनट के अन्तराल के बाद बस चल पड़ी। गर्मी से बेहाल हमने चैन की सांस ली।
अब मैंने कमल की तरफ देखा। मेरा आशय समझ कर वो बोला कि ये बस हमें नारायण बगड़ में छोड़नी होगी। वास्तव में हम गलती से भ्रमवश नारायण बगड़ उतर गये थे। अब कुलसारी जाने के लिए कोई साधन मिल गया तो ठीक नहीं तो देखेंगे। जिस समय हम नारायण बगड़ पहुँचे शाम की परछाइयाँ गदेरों में पसर रही थी पर चोटियों में उजास बाकी था। दिन छोटे होने लगे थे, वहाँ उतर कर हमने एक दुकान में अपना परम्परागत खाजा बन और चाय ली। सामने दो ट्रक खड़े थे। ट्रक के ड्राइवर भी वहीं पर चाय पी रहे थे। देर शाम दो अजनबी लोगों को देख कर उन्हें जिज्ञासा होना स्वाभाविक था। एक ने कमल से पूछा भाई जी कहाँ से आये, कहाँ जाना है। कमल तो गप्पें मारने को हमेशा तत्पर रहता है बोला यार जाना तो कुलसारी था पर अब यहाँ से जाने के लिए क्या मिल सकता है। इत्तिफाक था कि वो ट्रक का कन्डक्टर था और वो लोग सामान लेकर थराली, चैपड़ों तक जाने वाले थे। मेरी तरफ सवालिया नजरों से देखते हुए कमल ने खुश होकर अपने दोनों हाथ जोर से रगड़े और बोला यार भुला तुम लोग अपने ट्रक में हमें कुलसारी तक ले जा सकते हो। ट्रक में जाने की बात को लेकर उसने सहमति के लिए मेरी तरफ देखकर सिर हलाया हाँ या ना। मैंने धीरे से सिर हलाकर अपनी सहमति जताई। हालांकि ट्रक ड्राइवर को देख कर मुझे लग रहा था कि बन्दा या तो अभी से मस्त है या रास्ते में हो जायेगा।
जब हम कुलसारी में उतरे तो शाम खूब गहरा गई थी। आसमान से तारों के झुण्ड अपनी रोशनी से हमें रास्ता दिखाने की कोशिश कर रहे थे। हमने तय किया कि हम कुलसारी नन्दा देवी मन्दिर से लगे मठ में रहने वाली माई जी के साथ रहेंगे। सन 2000 में राजजात जाते समय मैं माई जी के साथ रुकी थी। अंधेरे में अपने दरवाजे पर दो अजनबियों को इतनी रात खड़े देख माई जी जोर से बोली कौन है— मैंने कहा माई जी नमो नारायण, मैं हूँ राजजात के समय आप से मिली थी। आज रात आपका आसरा चाहिए। माई जी ने एक औरत की आवाज सुन कर दरवाजा खोला और पहचानने की कोशिश करने लगी। मैं फिर बोली माई जी बड़ी आस लेकर आये हैं आपके द्वार, अरे आ जा बेटा भीतर आ जा। जूते बाहर ही उतार कर हम अन्दर गये। भूख थी पर झिझक भी थी। सोचा रात गुजार देते हैं, माई जी को परेशान नहीं करेंगे। पर माई जी ने नमक डली मोटी—मोटी घी लगी रोटी और दूध का गिलास हम दोनों को दिया। माई जी ने मुझे अपने पास बुलाया और बातें करने लगी।
आज का पूरा दिन सफर की हड़बड़ी में ही गुजर गया। सुबह पाँच बजे चल देंगे यहाँ से, अंधेरे में कमल की आवाज आई। मैंने उसकी बात अनसुनी कर दी, अभी तो माई जी से बात करनी बाकी थी। मैं सुबह की उजास होते ही पिन्डर में नहाने के लिए चली गई। आने पर जोशी जी मुँह फुलाये माई जी के पास बैठे चाय सुड़क रहे थे। कुलसारी में त्रिमुखी शिव और दक्षिण काली का मन्दिर है। काली का श्रीयंंत्र भूमिगत है। प्रत्येक राजजात में बलि देने के बाद श्रीयंत्र को निकाल कर पूजा करने का नियम है। पर दो हजार की राजजात में बलिप्रथा पर प्रतिबंध होने के कारण श्रीयंत्र को नहीं निकाला जा सका था।

माई जी अपने साफ सुथरे मठ में अपने आसन पर बैठी हमसे बातें करने लगी। मुझे पता था कि माई जी कहीं पौड़ी की रहने वाली हैं। मैं उनसे गढ़वाली में बात करने लगी। पता चला माई जी रिखणीखाल ब्लॉक की रहने वाली हैं। 1962 में 22 साल की उम्र में उन्होंने सन्यास ले लिया। चार साल भ्ौरवगढ़ी के मन्दिर में रहकर 1966 अप्रैल से कुलसारी में हैं। 22 साल की भरपूर यौवनावस्था में दीक्षा लेकर घर छोड़ने के पीछे कोई बड़ा कारण रहा तो होगा। पहाड़ों में युवा महिलाओं के पति की मृत्यु हो जाने पर महिलाओं की जोगिन बन जाने की घटनाएँ उस समय बहुत आम हुआ करती थी। मैंने माई जी को कुरेदने की कोशिश की। मैतो गौं कख च माई जी। अरे बाबा जोगी का कोई गाँव, कोई मैत, कोई घर नहीं होता। माई जी अपने गंजे सिर पर हाथ फिराते हंसते हुए बोली। मेरा सब यही कुटिया है। बात खतम करने के आशय से माई जी ने चाय के गिलास उठा लिए। कुछ तो बताइये अपनी कहानी माई जी मैंने बात बढ़ाई। अरे क्या बात अर क्य छ्वीं। बस जब औरतों के सारे सहारे खतम हो जाते हैं तो वो सन्यास न लें तो कहाँ जायें। मुझे माई जी की इस बात से सारी कहानी समझ में आ गई। कोई भी औरत स्वेच्छा से दुनियादारी क्यों छोड़ेगी, कुछ तो सामाजिक दुष्कारियां रही होंगी। हमारे समाज में औरतों की जगह ही कहाँ होती है। पता चला माई जी के पति चल बसे थे। ससुराल का दरवाजा बंद हुआ तो मायके आ गई। मायके पर बोझ बनी तो जोगन बन गई। औरतों की इतनी कम जगह होती है हमारे समाज में, कितनी बिडम्बना है।

माई जी अब तक तीन राजजात देख चुकी हैं। 1968, 1987 तथा 2000 की। कमल ने पूछा कि तीनों जातों में आपको क्या फर्क लगा। माई जी बोली 1968 की जात में ज्यादा से ज्यादा 200 लोग रहे होंगे। जात वही जाते थे जिनकी आस्था बलवान होती। 2000 की जात में लोगों के साथ सैलानियों की संख्या बढ़ गई, लगभग 3000 लोगों ने जात में भाग लिया। 1987 वाली जात में कमल भी भाग ले चुका था। उस समय उसने माई जी को नहीं देखा था पर 2000 की जात में जब मैं राजजात में गई तब हम माई जी से मिले थे, खूब बातें की थी। पहले पूरी जात लोक आधारित होती थी। 1987 से प्रशासन व्यवस्थाएं करने लगा है। 2000 की जात में तो स्थानीय प्रशासन ने यात्रियों के रहने की भी व्यवस्थाएँ की थी। हम माई को प्रणाम कर अपने पिट्ठू पीठ में लादे कुलसारी गाँव में आ गये। आसमान में बादलों की चहल कदमी के बीच धूप झांक रही थी। खेत धान—मक्के, ककड़ी और सब्जियों से लकदक थे। सड़क कुलसारी गाँव के बीच से निकलती है। पिण्डारी ग्लेशियर से निकल कर बड़े—बड़े पत्थरों से टकरा कर गरजती पिण्डर नदी के किनारों पर बसे गाँव जंगलों से भरपूर थे। महिलाओं के लिए घास—लकड़ी की समस्या नहीं होगी इन गाँवों में। गाँव के बीच मुझे दो महिलाएँ सड़क पर दिखाई दी। बड़ी उम्र की महिला को दीदी नमस्ते आदतन कहा। दोनों में एक महिला गंगा कुलसारी की बेटी थी और दूसरी उसकी भाभी थी। और उसका नाम नन्दा था। इस इलाके में हर तीसरी लड़की का नाम नन्दा होता है। गंगा का ससुराल ग्वालदम के पास किसी गाँव में था। गाँव में नन्दा देवी की पूजा थी इसलिए गंगा अपने मायके आई थी। मैंने संवाद बढ़ाया। दीदी इस पूरे इलाके में लड़कियों को स्कूल भेजते हैं कि नहीं भेजते। भुलू सब भेज रहे हैं। आठ पास स्कूल तो सब जगह नजदीक हो गये, तो आठ तो पढ़ा ही लेते हैं। बाकी तो जिसके पास साधन है आगे भी पढ़ा लेते हैं। और शादी कितने बरस में करते हैं? दोनों हंस पड़ी—ज्वान होकर, आजकल कौन करता है जल्दी शादी। सब ज्वान होकर करते हैं। इतने में उनकी गाड़ी आ गई और हम चैपड़ों की तरफ चल दिये। उन दोनों को इस बात का बहुत आश्चर्य था कि सड़क होते हम पैदल क्यों जा रहे हैं। शायद हमें बेवकूफ समझ रही होंगी।

जब मैं 2000 की राजजात में आई थी तब सड़क की स्थिति ठीक थी, डामर वाली सड़क थी। डामर अभी भी थी पर जगह—जगह गड्ढे बन गये थे। मुझे अपने शासन—प्रशासन की व्यवस्थाओं पर हँसी आई। कमल समझ गया और बोला अरे अगली जात तक सड़क बन जायेगी चिन्ता मत करो। गाँव से लगभग एक किलोमीटर के बाद हमें रास्ते में दो व्यक्ति मिले जो अपनी रिश्तेदारी में जा रहे थे। कमल ने नमस्कार जी जोर से बोला। वो लोग भी हमारी जोरदार नमस्कार सुन कर मुस्करा दिये। तभी पता चला कि वो तेरहवीं में जा रहे हैं। कमल ने अपने और मेरी राजजात में जाने की बात कही तो वो स्नेह दिखाने लगे। रास्ते में सड़क के किनारे एक लड़का छोटी सी दुकान लगाये चाय बना रहा था। हम चारों वहीं चाय पीने बैठ गये। इस बहाने बात भी होने लगी। चाय पीने के बाद हम पैसे देने लगे तो उनमें से एक व्यक्ति ने कान पर हाथ लगाते कहा— अजी तुम कैसी बात करते हो, हमारे मेहमान हो। घर पर मिलते तो खाना खिलाते, यहाँ पर चाय तो पिलाने दो। पैसे देकर हम पर पाप मत लगाओ। मुझे याद है जब हम जात में आये थे, तब छोटी से छोटी चीज को पैसा देकर लिया था हमने। ये फर्क है 
जब हम बाजार साथ लेकर चलते हैं और जब हम केवल पहाड़ी व्यक्ति बन कर पहाड़ों में जाते हैं।

दिन चढ़ने के साथ धूप ने अपने तेवर दिखाने शुरू कर दिये। मैं सड़क किनारे छाया में बैठी दो लड़कियों के पास पिट्ठू खेत की मेड़ पर टिका कर खड़ी हो गई। दोनों स्कूल से घर लौट रही थी। दीना और सुरमा नाम थे उनके। धूप से दोनों के गाल लाल हो रहे थे। उन्हें अभी रास्ते में पड़ने वाले अपने खेत से घास काटकर ले जाना था। इसलिए शर्माती हुई जल्दी से चलने को तैयार हो रही थी। गर्मी से मुझे नीचे तेजी से शोर मचाती बहती नदी में नहाने का मन करने लगा था। अपने मन की बात उन पर थोपती बोली— तुम लोग तो खूब नहाती होंगी न नदी में। अब तक हम लोगों में जरा दोस्ती हो रही थी। उन्हें मेरे कटे हुए बाल और पीठ में लगा पिट्ठू आकर्षित कर रहा था। दीना मेरे पिट्ठू को छूते हुए बोली— अरे नहाने कौन जाता है दीदी— किसे फुर्सत है, हाँ कभी—कभी कोई औरत फाल देने जरूर चली जाती है। मेरा दिल जोर से धड़का। मैंने आश्चर्य से उसे देखा, नदी में कूद कर आत्महत्या करने की करुणा को कितनी सहजता से कह गई लड़की। इतना हरा—भरा घास, लकड़ी, जंगल, खेती, अनाज से सम्पन्न इलाका है, तब भी कौन से कारण हंै कि औरतें आत्महत्या कर लेती हंै। हमने पिण्डर नदी के ऊपर बना पुल पार किया और थराली बाजार पहुँच गये। थराली में काफी बाजार बन गया है। बरसात में आम तौर पर पहाड़ी कस्बों की गंदगी बह जाती है पर थराली के पूरे बाजार में गंदगी बिखरी पड़ी थी। हमने वहाँ से थोड़े सेब खरीदे और जल्दी जल्दी चैपड़ों की तरफ चल दिए।

लो भई चैपड़ो आ गया। हम दोनों ही थक रहे थे और भूख से भी बेहाल थे। राजजात के समय मैं गाँव में नारायण सिंह साह जी के नये बने घर में रुकी थी। हमने चैपड़ो के एक ढाबे में खूब मिर्ची वाली दाल और रोटी खाई। मैंने दही की माँग की तो जोशी लार टपकाते हुए मुझसे आधी दही मांगने लगे। सन् 2000 में जब मैं नारायण शाह जी से मिली थी तब उनके युवा पुत्र की मृत्यु हुई थी और वो लोग बहुत शोक विह्वल थे। इस बार गाँव में उनके घर जाने पर वो खुद तो नहीं मिले पर उनकी पत्नी से मुलाकात हुई, याद दिलाने पर मुझे पहचान भी गई। वो नाराज हुई कि हम होटल से खाना खा के क्यों आये। उन्होंने हमें चाय पिलाई और हम अगले पड़ाव के लिए निकल पड़े।
सड़क पर हमें एक छोटा ट्रक मिल गया जो सीधे मुन्दोली गाँव जा रहा था। ट्रक में हमारे अलावा खिलाफ सिंह भी बैठे थे। सड़कें जगह—जगह टूटी और गड्ढों से भरी थी। चारों तरफ बरसात की गहन हरियाली अपना आंचल फैलाये मन मोह रही थी। अब तक की यात्रा में कमल कम ही बोला था। अस्थमा की दवाइयाँ खाने के बाद बोलने में उसकी जीभ लटपटाती है और सांस भी विषम हो जाती है, वो बस सफर का मजा ले रहा था। बोलने—बात करने की जिम्मेदारी मुझ पर थी। मैंने घने जंगल देख के पूछा— भाई यहाँ पर जंगलों को बचाने के लिए वन पंचायतें भी हैं। खिलाफ सिंह ने बताया हाँ है न। केवल कोट गाँव में सात गाँवों की फोरेस्ट पंचायत है और ये वन पंचायत 1947 में बन गई थी। सन् 2000 के बाद वहाँ जे.एफ.एम. (ज्वाइन्ट मैनेजमेंट) लागू हो गया है, लोग जे.एफ.एम. के बारे में नहीं जानते पर उससे गाँव में पैसा आयेगा ये उन्हें पता है। मैंने सोचा बस अब इनके हाथ से जंगल गया। बातें करते हम मुन्डोली पहुँच गये। मुन्दोली समुद्र तट से 2050 मीटर की ऊंचाई पर बसा घने जंगलों से घिरा खूबसूरत गाँव है। यहाँ तक कच्ची सड़क बन पाई है। दो साल पहले राजजात में भी ये सड़क कच्ची ही थी। यहाँ पर हमें मिलिट्री से रिटायर सुबेदार जी के घर में बैठ चाय—पानी के बाद रात को रूकने का निमंत्रण भी मिल गया।

मुन्दोली से 2 किमी. चढ़ाई पर लोहाजंग गाँव है, पर हमें मुन्दोली में ही रूकना था। मुझे याद आया कि जब हम राजजात में इस गाँव में आये थे तब प्रशासन द्वारा खाने रहने के रेट तय किये गये थे पर गाँव के किसी भी व्यक्ति ने रहने का कोई पैसा नहीं लिया था। मुन्दोली घनी आबादी वाला साफ सुथरा गाँव है।

शाम ढल रही थी, मौसम खूब सुहाना और ठण्डा था। अजनबी लोग खास कर महिला देख कर कुछ महिलाएँ, लड़कियाँ, बच्चे भी आ गये। वो लोग जिस तरह की बोली बोल रहे थे उसमें गढ़वाली—कुमाउंनी दोनों मिक्स थी और मुझे अच्छी गढ़वाली आने के बावजूद समझने में परेशानी हो रही थी। फिर भी मैं सबसे गढ़वाली में ही बात करती रही। कमल को इस बात का एडवांटेज मिल रहा था कि वो चमोली का रहने वाला है। सुबेदार साहब के परिवार वाले बहुत स्नेही थे। मुन्दोली नन्दा देवी राजजात का पड़ाव है। यहाँ पर भूम्या जैपाल देवता का मन्दिर है जिसमें नन्दा देवी की कटार रखी हुई है। गाँव के सभी घरों में लोग रहते हैं। गाँव के कुछ लोग नौकरी करते हैं पर अभी प्रवास से बचा हुआ गाँव है। गाँव की चार महिलाएँ टीचर बन गई हैं? लड़कियाँ घर के कामकाज के साथ स्कूल भी जाती हैं। पर सामान्य तौर पर घर—खेती का काम सम्भालती है? गाँव की महिलाओं ने नन्दा देवी के जागर भी सुनाये। ये हमारी यात्रा का आखिरी पड़ाव था। रात को बादलों की गड़गड़ाहट के साथ तेज बारिश शुरू हो गई, पर हम निश्चिन्त थे कि अब कल हमें वापिस जाना है।

(युगवाणी पत्रिका में प्रकाशित)

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