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Tuesday, April 12, 2022

प्यार से भीगा मन, नयी आमद की ख़ुशबू


धूप अभी काम पर निकलने के लिए तैयार हो रही हो. उनींदी सड़कें फूलों की खुशबू ओढ़े हुए जाग और सोने के बीच आँखें मिचमिचा रही हैं. नन्हे बच्चों की अल्हड़ टोली सड़कों के आलस को तोड़ रही है. शरारती कबूतर एकांत को कुतरने की जुगत लगाते हुए लगातार गुटरगूं किये जा रहा है.

ज़िन्दगी ने नया लिबास पहना हुआ है. इतरा के सामने खड़ी मुस्कुरा रही है. ज़िन्दगी के ढब अक्सर समझ नहीं आते फिर भी अच्छी लगती है. अनचीन्हे लम्हों की तरफ दोस्ती के हाथ बढ़ाने का समय है. उत्सुकता और हैरानी की जुगलबंदी पर मन की संगत अभी बैठ नहीं रही. अभी सुर लगना बाकी है. ये नये सिरे से रियाज़ शुरू करने का समय है. मैं आने वाले समय की ओर निगाहें करती हूँ, बीते समय की पुकार को अनसुना करने की कोशिश करती हूँ. तभी शरारती कबूतर बीते समय की डाल से एक डंडी लेकर खिड़की पर आ बैठा है. वो घोसला बनाने की जुगत में है जिसे बीते वक्त के तिनकों से वो सजायेगा. मेरी आँखें बह निकली हैं. आने वाले लम्हों के मोह में हम कैसे बिसरा दें बीते हुए उन लम्हों को जिन्होंने अपनी आंच में पकाकर माटी को सोना किया है. अचानक बहती हुई आँखें ज़िन्दगी की तमाम मुश्किलों के आगे सज़दे में झुक जाती हैं...

तभी सर पर कोई हाथ महसूस होता है. सिसकियों को, हिचकियों को सहेजकर देखती हूँ कि कौन है...वो ख़्वाब है जो बरस रहा है...

ज़िन्दगी में जब जैसा जिया, जैसा महसूस किया उसे कहीं सहेज के धर आई थी. वो सब जिया हुआ मोती बन गया. अपनी कविताओं से, अपने लिखे से बहुत प्यार रहा हो ऐसा नहीं रहा कभी बस कि लिखने के सिवा कुछ आया नहीं सो लिखती रही. सच कहूँ कि न लिखती तो शायद मर जाती. तो जिन शब्दों ने जीवन बख्शा उन्हें यूँ समग्रता में देखना कैसा है अभी पता नहीं. महसूस करने की अलग यात्रा होती है. अभी तो बस शुक्रगुजारी है उन तमाम लम्हों की जिन्होंने ठोंका पीटा मुझे और चमकाया. शुक्रगुजारी है दोस्तों की जिन्होंने भरोसा हमेशा बनाये रखा. जिनके होते मैं बेफिक्र रही खुद से. जो मुझसे ज्यादा खुश होते हैं मेरे सुखों पर और मुझसे ज्यादा उदास मुश्किलों पर. जो हाथ पकड़कर निकाल लाते हैं वक्त की अंधी सुरंग से और हाथों में थमा देते हैं भरोसे का पीला फूल.

हाथ में लिए बैठी हूँ एक बरसता हुआ ख़्वाब जो अब सिर्फ मेरा नहीं है...

इस संग्रह का समर्पण लिखते हुए जितने चेहरे नज़रों से गुजरे उन सबके प्रति मन प्रेम से भरा हुआ है.

किताब के खूबसूरत प्रोडक्शन और सहज कम्युनिकेशन (एग्रीमेंट सहित तमाम बातों) के लिए रुद्रादित्य प्रकाशन का आभार.

Friday, June 25, 2021

ख़्वाब जो बरस रहा है



कुछ रुकी हुई रुलाइयां हैं, कुछ भिंची हुई मुठ्ठियाँ हैं, कुछ रातों की जाग है कुछ बारिशों की भागमभाग है. कुछ ख़्वाब हैं अनदेखे से कोई खुशबू है बतियाती सी. कविताओं का पता नहीं लेकिन मन की कुछ गिरहें हैं जिन्हें कागज पर उतारकर जीना तनिक आसान करने की कोशिश भर है. ये 'ख़वाब जो बरस रहा है' ये आपको भी मोहब्बत से भिगो दे यही नन्ही सी इच्छा है.

दोस्तों और पाठकों का प्यार था जिसने हौसला दिया एक जगह सहेज देने का. मन एकदम भरा हुआ है. पलकें नम हैं. प्यार ऐसे ही तो भिगोता है.