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Sunday, June 26, 2022

प्रेम पत्रों के नाम आ रहे हैं प्रेम पत्र


- कल्पना मनोरमा
"वह चिड़िया क्या गाती होगी?" प्रतिभा कटियार की नवलोकर्पित कृति Bodhi Prakashan से कुछ समय पूर्व प्रकाशित हुई थी।

इस पुस्तक का शीर्षक प्रश्नाकुलता लिए हुए है। हम में से जो भी अपने बचपन में अति संवेदनशील रहा होगा उसने एक न एक बार ये प्रश्न हवा में उछाल कर ज़रूर पूछा ही होगा कि दूर नीम की डाल पर या घर की मुंडेर पर वह जो चिड़िया मटक मटक का चूं चूं चूं कर रही है, आख़िर वह क्या गाती होगी? पंछियों की बोली हम जान पाते तो न जाने प्रकृति के कितने रहस्यों से रू ब रू हो सकते थे।

खैर, प्रतिभा जी ने ये पत्र महामारी के घोर त्रासद समय में अपना गुबार उगलने या आसुओं को शब्दों में समेटने के दौरान लिखे हैं। इस बात को मद्दे नज़र रखते हुए जब सोचती हूं तो लगता है कि लेखिका ने चिड़िया को जीवन के प्रतीक में लिया होगा क्योंकि जिस समय लेखिका इस कृति को रच रही होगी उस समय सड़क, घर, अस्पताल, पगडंडियों और न जाने कहां कहां जीवन बेकल हो चिचिया रहा था। कहीं चिड़िया की तरह बोलते हुए जीवन को प्रश्रय भी मिला तो कहीं तड़पते हुए प्राण गंवाते हुए भी देखा गया। लेकिन जब जब उस मनहूस समय के चंगुल में जकड़े जीवन को देखा गया था तब तब मन में यही ध्वनित हुआ कि आख़िर वह जीवन क्या बोल रहा है? क्या चाहता है?

इस किताब को पढ़ते हुए मानव मन की अनंत जिज्ञासाओं और एकांत समय में मन में उठने वाली भावनाओं जिन्हें शब्द देना आसान नहीं होता लेकिन लेखिका ने अपनी सहजता में वक्त की क्रूरता को गूंथकर दुःख को सहज ही लिख दिया है। प्रारंभ से अंत तक इस कृति को पढ़ते हुए महसूस होता चला गया कि जिस प्रकार किसी व्यक्ति की किसी व्यक्ति से मित्रता होती है तो त्वरित प्रगाढ़ता नहीं बढ़ती। बल्कि धीरे धीरे मित्रतापूर्ण वार्तालाप तीव्र से तीव्रतर होता जाता है।

लेखिका ने इन पत्रों को उस दौर में लिखा है जब संसार अवसन्नावस्था में था। मानवीय संवेदनाएं सुन्न पड़ चुकी थीं। इस विचार को विचारते हुए ये कार्य बेहद कठिन लगता है कि अपनी ठोस होती संवेदनाओं को आखिर एक रचनाकार कैसे तरलता प्रदान करता है। इसे जानना हो तो प्रतिभा को पढ़िए।

हालांकि पुस्तक के आरंभ से लेखिका अकेले शब्द सफ़र तय करती है लेकिन मध्य में पहुंचते पहुंचते उसे लेखक मानव कौल और किशोर चौधरी भी सहयात्री के रूप में मिल जाते हैं। और उनसे बोलते बतियाते हुए प्रतिभा बेहद सघन विचारधारा में उतरते हुए पाठक को वैचारिक यात्रा पर ले जाती हैं। जहां हर वस्तु, विचार, आदतें, अपने, सपने और न जाने क्या क्या इस प्रकार मुखर होते हैं कि बस शब्द शब्द कहता है कि रुक जाओ मेरे पास कि दुनिया की कठोरता तुम्हें साबुत न छोड़ेगी।

"तकनीक ने तो हमें जोड़ रखा है लेकिन एक दूसरे से मन से जुड़ने की तकनीक तो हमें खुद ही ईजाद करनी होगी है न!" प्रतिभा जी के इस वाक्य को यदि किताब का धरातल माने तो गलत न होगा। हमें मानव से मानवता की दूरी को ही समेटना है। इस तकनीकी समय में ये बेहद कठिन ज़रूर है लेकिन नामुमकिन नहीं। अस्तु!!

Sunday, June 5, 2022

जीवन की लय साधते प्रेम पत्र


- प्रतिभा कटियार

‘तेरी खुशबू में बसे ख़त मैं जलाता कैसे...’ ये गज़ल किशोर वय के दिनों से दिल के करीब रही. शायद पत्रों से मोहब्बत होने की वजह भी बनी हो. मुझे पत्र लिखने का खूब शौक था.

मैंने छुटपन से खूब खत लिखे. स्कूल के दिनों में जब कोई दोस्त एब्सेंट होती तो उसके लिए पत्र लिखती और उसके आसपास रहने वाले के जरिये उस तक पहुंचाती. फिर यह सिलसिला इस तरह चला कि मुझे भी दोस्तों ने खूब पत्र लिखे. स्कूल से कभी-कभी इसलिए भी नागा कर लेती कि छुट्टी में ढेर सारे पत्र मिलेंगे दोस्तों के. फिर डाकबाबू के दिन आये. हंस, उत्तर प्रदेश और अखबारों में कुछ कहानियां छपने लगीं जिनमें पता भी होता था. उस पते पर न जाने कहाँ-कहाँ से पत्र आने लगे. अनजाने लोगों के पत्र, अपनेपन की रौशनी से भरे पत्र. एक पत्र तिहाड़ जेल से एक कैदी का भी आया था. अज़ीज़ दोस्त ज्योति जब शादी के बाद बंगलौर गयी तब खूब पत्र लिखे. अन्तरदेशी में कहाँ समाती हमारी बातें. हम तो खर्रे लिखा करते थे.

मेरे पत्र मित्र जिन्हें पेन फ्रेंड कहते हैं लोग भी बने कुछ. लेकिन सबसे लम्बा सिलसिला चला कवि मित्र बसंत त्रिपाठी के संग. मुझे किसी की कोई रचना अच्छी लगती तो मैं उसे पत्र लिखती. मैंने ममता कालिया जी को पत्र लिखा, गुलज़ार को पत्र लिखा, नासिरा शर्मा जी को पत्र लिखा, कुलदीप नैयर को पत्र लिखा. मजे की बात यह हुई कि सबके जवाब आये. अगर किसी पत्र का जवाब कभी नहीं आया तो वो महबूब को लिखे पत्रों का. जाने उसने पढ़े भी या नहीं.

मैंने अपने प्रिय लेखकों के पत्रों को ढूंढ-ढूंढकर पढ़ा. हमेशा दिलचस्पी रही कि दो दोस्तों की, दो प्रेमियों की, माँ बेटे की, पिता पुत्री की पत्र में क्या बातें होती होंगी. वो जब अनौपचारिक ढंग से एक-दूसरे को पत्र लिखते हैं तब वो कितने सहज होते हैं. पत्र से मेरा जो लगाव हुआ उसके चलते मैंने दुनिया के मशहूर प्रेम पत्रों को अनुवाद भी किया.

फिर इंटरनेट का ज़माना आ गया और कागज की जगह ले ली मेलबॉक्स ने. मेल से भी खूब पत्र लिखे. न जाने कितने पत्र तो ड्राफ्ट में अब भी मौजूद हैं. लिखने की सहजता डायरी और पत्र ने मुझे खूब दी. डायरी लिखते हुए लगा यह मेरी दुनिया है, और पत्र लिखते समय उस दुनिया कोई एक प्रिय उस दुनिया में शामिल हो गया. डायरी और पत्र दोनों गोपन चीज़ें हैं, मैं विधा के नहीं अभिव्यक्ति के तौर पर देखती हूँ इन्हें. कोई बाधा नहीं, कोई नियम नहीं कोई जज किये जाने का जोखिम भी नहीं.

अच्छा समय हुआ तो पत्र लिखे, बुरा समय हुआ तो भी पत्र ही लिखे. जिसे पत्र लिखे उसके सामने होना अभिव्यक्ति में बाधा ही लगा. कल्पना ही सच है की तर्ज पर अगर देखूं तो पत्रों ने मुझे मेरे माफिक वो जगह दी जहाँ मैं अपनी तरह से जी सकूं, साँस ले सकूँ. प्रेमी का शुक्रिया कि उसने मेरे पत्रों का जवाब कभी न देकर पत्र के जवाब में लिखे गए पत्रों के इंतज़ार से बचा लिया और पत्र मेरे लिए और गहन हो गये. मेरे खुलने की जगह, मेरी साँस लेने की जगह बन गये.

जब कोरोना ने पाँव पसारे और बाहर सब कुछ बंद हो गया तब मन की बेचैनी ने एक बार फिर पत्र लिखने की तरफ मोड़ा. मैंने पूरे लाकडाउन हर रोज पत्र लिखे. ये किसी को भेजे नहीं गए बस लिखे गए. क्यों लिखे गए ये कोई पूछे तो एक ही जवाब है मेरे पास कि न लिखती तो जी न पाती शायद. हर रोज सुबह अपनी हिम्मत को सहेजते हुए ज़िन्दगी पर भरोसे को सहेजते हुए चाय की प्यालियों के बीच मैं लगातार पत्र लिख रही थी. जैसे कोई बैठा हो इबादत में कि ‘सब ठीक हो...सब ठीक हों...’ यही धुन रहती थी लिखने के दौरान. जैसे कोई मन्त्र जप रही हूँ. प्रकृति और प्रेम के भरोसे मैं लगातार ज़िन्दगी में आस्था बनाये रखने की कोशिश में लगी रही. कई विचलन आये लेकिन हर विचलन के समय मैं लिखती रही.

किसे लिखे गए ये पत्र के जवाब इन पत्रों में ही हैं. कई बार लगा ये सब खुद के ही लिखे हैं कि प्रेमी मुझसे अलग है भी कहाँ. कई बार लगा सारे जमाने के प्रेमियों को सारे जमाने की प्रेमिकाओं की तरफ से लिख रही हूँ और कभी लगा मैं लिख कहाँ रही हूँ मैं तो सांस ले रही...इतनी सी बात है इन कठिन दिनों के प्रेम पत्रों की बाबत.

Tuesday, May 31, 2022

वह चिड़िया क्या गाती होगी...

'जो हमें पसंद हो उसका हमारे जीवन में होना क्यों जरूरी है। यह एक किस्म की लालसा है। इसमें एक तरह के स्वार्थ की बू आती है। जो चीजें हमें पसंद है, हमारे पास हो, घर में हों यह पागलपन है। जो हमें पसंद है वह वहीं रहे जहां वो है तो क्या हमारी पसंद घट जाती है ? शायद ज्यादा बची रहती है । और फिर अगर किसी रोज पसंद बदल जाए तो उस व्यक्ति का या उस सामान का क्या करें जिसे जीवन में या घर में इस कदर भर लिया था कि वो पूरा जीवन ही घेर कर बैठ गया था। अब या तो उस बदली हुई पसंद के साथ रहना होता है या उसके बगैर छूट गए ढेर सारे खाली-पन के साथ।'

via-Bikas Gupta

Friday, April 29, 2022

पत्र जो दिल को छूते हैं

प्रतिभा भारद्वाज-

आज से पहले पत्र साहित्य को एक विधा के रूप में ही पढ़ा और समझा था। परंतु पत्र पढ़ने का पहला अनुभव इतना सुखद होगा यह मैंने 'वह चिड़िया क्या गाती होगी’ पढ़कर महसूस किया और समझा कि पत्र को इस रूप में भी लिखा जा सकता है।सभी पत्र बड़ी आत्मीयता से लिखे गए हैं बिल्कुल साफ़ पानी की तरह जिसमें प्यार है, यादें ।हैं ,करुणा है, गुस्सा है। 

अगर पत्रों के समय पर ध्यान दें तो पत्र ऐसे समय के हैं जिस समय लोग सिर्फ़ अपने बारे में सोच रहे थे। उस समय के ये पत्र भावुक कर देते हैं। मन में बार-बार यही आता है कि इतनी गहराई से भी इस समय को किसी ने जिया होगा, सोचा होगा उन लोगों के बारे में जो सिर्फ़ खाने के लिए परेशान होंगे।

ये पत्र सोचने पर मजबूर करते हैं कि जिस दौर को हम भूल रहे हैं। 'जमा कर रही हूँ स्मृतियाँ' इस पत्र को मैंने कई  बार पढ़ा और उस समय को याद किया। 'वो जमा कर रहे हैं आटा,दाल, चावल,मैं जमा कर रही हूँ स्मृतियाँ'। इस पुस्तक का पहला पत्र जो आपके मन को छू जाता है और आगे पढ़ने की जिज्ञासा भी जगाता है 'मैंने मृत्यु को छुआ है’इस पत्र को पढ़ते समय मन में बहुत सारे सवाल रह जाते हैं कि ऐसे कितने लोग होते होंगे जो इस तरह अपने भावों को लिख पाते होंगे क्या किसी ना किसी रूप में हर इंसान इन समस्याओं से गुजरता होगा। पुस्तक के सभी पत्र को पढ़ते हुए महसूस होता है कि ये पत्र लिखे नहीं गए जिए गये हैं। अपने आस-पास की घटनाओं और अपने जीवन के अनुभवों को बड़े ही आत्मीयता से लिखे गये हैं जिस कारण इन पत्रों से बड़ा जुड़ाव महसूस होता है।

Tuesday, February 1, 2022

धूप से गुनगुनाते प्रेम पत्र




-जयंती रंगनाथन 
मैं उसी की तरह, उसी जैसा बन कर कुछ कहना चाहती हूं:
मैं धूप हूं
तुम्हारे हिस्से की,
अपने हिस्से की भी
और उस बुलबुल के हिस्से की भी
जो इन दिनों रोज आती है
मेरी छत पर बने वर्टिकल गार्डन में
वो गाना गाती है
मुझे झूले पर बैठा देख, रुक जाती है
कहना चाहती है
तुम मेरे हिस्से का धूप जी रही हो
और जिंदगी भी…
तो प्रतिभा, क्या तुम्हारे कठिन दिनों के प्रेम पत्र, वह चिड़िया क्या गाती होगी, पढ़ने के बाद मैं तुम्हारी तरह कुछ बन सकी?
इन दिनों मौसम भी कुछ वैसा सा है, जैसा प्रतिभा चाहती होंगी। इसी मौसम में लिखे गए अपनों के लिए अपने से प्रेम पत्र और कविताएं कितना सुकून दे रही हैं, कैसे कहूं…
ये वो सबकुछ है, जो आप कहना चाहते हैं, किसी बेहद अपने से। कह नहीं पाए। बानगी देखिए: देखो, खुशबू उगी है। तुम बो गए थे इंतजार के जो बीज वो खिल रहे हैं। महक रहे हैं। यह खुशबू मुझसे हर वक्त बात करती है। हर वक्त मैं इस खुशबू को ओढ़े फिरती हूं। कल एक चिड़िया खिड़की पर आई, देर तक मुझे देखती रही। मैं उससे पूछा, क्या देख रही हो। वो हंस कर उड़ गई।
2
जब याद आती है
तब सिर्फ याद आती है…
3
अच्छा लगना, कितना अच्छा होता है?
4
एक सड़क मिली मुझे
जो कहीं नहीं जाती थी
एक मौसम मिला
जो अपने तमाम वैभव के बावजूद
मुस्कराहट गुमा आया था कहीं
तो ये है संवेदनाओं से भरपूर, प्यारी और बेहद संजीदा प्रतिभा कटियार। मैं उसे पता नहीं कितने बरस से जानती हूं। उसकी बातों में अजब सी धूप है, वो कुछ कहती है, फिर देर तक याद आती रहती है। उससे पिछले दिनों इंदौर लिट फिस्ट में मिली थी। हम शायद पहली बार मिले थे, पर ये जो धूप का रिश्ता था, वो अड़ गया। हम वही थे, जो हमारी बातों में थे। उस लड़की की यह किताब सच में बहुत निराली है। ना कहानी है ना किस्से हैं, बस यादों से पगे, उलझे-सुलझे से लॉकडाउन के दौरान उपजे नामालूम से खत हैं, जो कभी कहीं नहीं पहुंचे।
मैंने पढ़ लिया प्रतिभा और मन में बिठा भी लिया। अब तुमसे बात करूंगी। बहुत प्यार इन शब्दों और संवेदनाओं के लिए, जो मुझे लग रहा है मेरे लिए लिखे गए हैं।

किताब: वह चिड़िया क्या गाती होगी: कठिन दिनों के प्रेम-पत्र
प्रकाशक: बोधि प्रकाशन
कीमत: 150 रुपए
किताब खरीदने का लिंक- https://www.amazon.in/CHIDIYA-GAATI-HOGI-KATHIN-PATRA/dp/B09PJB1PR2/ref=sr_1_1?crid=6EL89QIKBIG8&keywords=pratibha+katiyar&qid=1643724814&sprefix=pratibha+katiyar%2Caps%2C509&sr=8-1

Monday, January 24, 2022

बारिश पंचम सुर में आलाप ले रही है



एक समय था जब मैं प्यार में मर जाना चाहती थी. एक वक़्त है जब मैं प्यार को पी जाना चाहती हूँ. एक वह वक़्त था जब बेज़ारी थी ज़िन्दगी से, एक ये वक़्त है जब यारी है ज़िन्दगी से. सुबहों को घंटों परिंदों से बातें करते हुए महसूस होता है मानो मेरे भी पंख उग आये हों. उनके साथ मैं भी उड़ती जाती हूँ. पंडित शिव कुमार शर्मा संतूर पर राग भैरवी बजा रहे हैं. पहाड़ियां उन मधुर लहरियों में डूबती जा रही हैं.

मुझे इन दिनों अपने आसपास कोई नजर नहीं आता, कोई महसूस नहीं होता. ज़रूरत भी नहीं महसूस होती. वह जो खाली केंद्र था न, वह अब अपनेपन की महक से भर गया है. बाहर कुछ भी नहीं, सब भीतर है. उस भीतर तक पहुँचने के लिए हम बाहर भटकते फिरते हैं. सेहरा, पहाड़, दरिया पार करते हैं, लेकिन मिलता है वो किसी पेड़ के नीचे ही, एक चम्मच खीर खाकर या किसी कुटिया में झूठे बेर खाकर.
हम सबको जूठे बेरों की तलाश है. कोई इतने प्यार से चखकर रखे तो. कोई इतने प्यार से खीर बनाकर लाये तो. वह खीर की चाह थी जिसने खीर को ज्ञान का माध्यम चुना, वो चाह जिसे दुनिया भूख कहती है. असल में हमें अपनी भूख तलाशनी है. जिन चीज़ों के पीछे भाग रहे हैं, जिनके लिए जान दे रहे हैं वह हमारी भूख हैं ही नहीं. जो भूख है वहां हम पहुंचे ही नहीं. वहां पहुँचने की यात्रा ही जीवन है. मुझे मेरी भूख मालूम है. मुझे बारिश चाहिए (बेमौसम नहीं), मुझे ढेर धूप चाहिए, अंजुरी भर सर्दी चाहिए, अमलतास चाहिए, मोगरे का गजरा चाहिए, सामने मुस्कुराती जूही और हरसिंगार की गमक चाहिए.

मुझे इंतज़ार चाहिए...यही मेरी चाह है. मेरी इस चाह को परिंदे समझते हैं. तुम भी तो परिंदे ही हो. उड़ते-उड़ते जा बैठे हो किसी और डाल पर. तुम कनखियों से देखते हो, मुस्कुराते हो. मैं पुकारती नहीं, तुम आते नहीं. दूर जाकर तुम ज़्यादा क़रीब जो आ गये हो. मेरी शामों में मेरी सुबहों में तुम घुले हुए हो. डाल कोई भी हो तुम्हारी, दिल मेरे ही पास है जानती हूँ. बारिश पंचम सुर में आलाप ले रही है, सुन रहे हो न तुम?

Thursday, January 13, 2022

ज़िन्दगी के सुरों का रियाज़


- प्रतिभा कटियार

सरगम का ‘स’ साधने जैसा ही होता है जीवन साधना. जीवन में मिठास को सहेजने के लिए जो सिर्फ एक ‘स’ भर ही ठीक से लग जाये एक जीवन में तो वह भी कम नहीं. सारा जीवन बस उस एक सुर के ठीक से लग जाने का रियाज़ ही तो है. ये पत्र जिंदगी का वही रियाज़ हैं. कभी छलकी कभी, रुकी हुई उदासी, कभी कोई मीठा लम्हा जो कसैली ज़िंदगी की हथेली पर आ गिरा हो, कभी कोई गुनगुनाती धुन कभी कोई सुबह गुमसुम.

मार्च 2020 को हुई कुछ घोषणाओं के साथ पूरी दुनिया विषाद में घिर गयी. पूरी दुनिया घरबंदी में घेर दी गयी. कोरोना नामक वायरस जाने कैसा था कि इसने एक-दूसरे से मिलने पर ही रोक लगा दी. इस दौरान उन सबको याद किया जिनकी याद व्यस्तता की आड़ से छुपकर फुर्सत मिलने की इंतजार तक रही थी. अब तमाम यादें, बातें, स्मृतियां बाकायदा पाँव पसारे बैठी थीं. एक तरफ भीतर की दुनिया खुल रही थी. दूसरी तरफ बाहर की दुनिया जूझ रही थी.

एक वायरस जिसने खांचों में लड़ी जा रही तमाम लड़ाइयों को एक कर दिया था जीवन जीने की जीवन को बचाने की लड़ाई. यह वायरस हिन्दू मुलसमान, अमीर गरीब, स्त्री पुरुष का भेद नहीं कर रहा था. एक डर जिसने समूचे विश्व को एक सूत्र में बाँधा. अवसर था ज्यादा मनुष्य होने का. लेकिन क्या हम हो पाए?

शुक्रगुजार हूँ कुदरत की कि इस मुश्किल वक्त में यह राह खुली. जब बाहर की यात्राएँ बंद हुईं तब भीतर की यात्रा की टिकट हाथ में थमाकर मानो प्रकृति ने कहा हो, ‘जाओ घूम आओ कुछ दिन.’ यह लिखते हुए मेरी आँखे नम हैं कि इन बुरे दिनों ने मुझे बहुत मांजा है भीतर से. मन-जेहन की जमीन पर उग आये खर-पतवार बीनने का समय मिला कुछ.

इस दौरान खिले फूलों की खुशबू है इन खतों में, पंछियों का गान है, उनसे की गयी बाते हैं, देश के बड़े वर्ग के पाँव की बिवाईयों का दर्द है. इंतजार के आगे सजदा किये रहने की चाहत है, देखी हुई फिल्मों, पढ़ी गयी किताबों की बाबत कुछ बातें हैं जो प्रेम पत्र में ढलकर अपने गंतव्य तक पहुँचने की इच्छा रखती हैं. ये पत्र लेटर बौक्स में पोस्ट ही नहीं किये गये तो जिसके लिए लिखे गये उसके द्वारा पढ़ी कैसे जाते. और जो किसी एक के न हुए वो सबके हुए. आप सबके. जिसके भी हाथ में यह पुस्तक है उसके ही लिए लिखे गए हैं ये खत. माया मृग जी ने इन खतों को एक जगह समेटकर तरतीब दी और अब ये बुरे समय के प्रेम पत्र आपके हवाले हैं. प्रेम पत्रों को बुकशेल्फ में सजाये जाने की नहीं दिल में रखे जाने की चाह होती है, उम्मीद है ये आपके दिल में थोड़ी सी जगह बनायेंगे.

किताब मंगवाने का लिंक- https://www.amazon.in/gp/product/B09PJB1PR2/ref=ox_sc_act_title_1?smid=A1GRCEHOR5E0TF&psc=1

Tuesday, January 11, 2022

जीवन बहुत कीमती है

देवयानी भारद्वाज ने बहुत प्रेम से यह ख़त पढ़ा है- 

अरसे बाद सुबहों को सुन पा रही हूँ. शामों में जो एक धुन होती है न शांत सी, मीठी सी उसे गुनगुना पा रही हूँ. चाय की मिठास में पंछियों की चहचहाहट घुल रही है. वक़्त के पीछे भागते-भागते शायद हम वक्त को जीना भूलने लगे थे. आज वक्त मिला है खुद को समझने का. अपने आप से बात करने का. सोचने का कि मशीन की तरह यह जो हम भागते जा रहे थे, उसके मानी क्या थे आखिर.

जीवन बहुत कीमती है. इसे प्यार करना, लम्हों को युगों की तरह जीना, लोगों को अपने होने से बेहतर महसूस करवा सकना और क्या? यह मुश्किल वक़्त हमसे कुछ कहने आया है. इतना विनाशकारी वायरस भी हमें कुछ सिखा रहा है कि वो हमें सिर्फ मनुष्य के तौर पर पहचानता है. उसके लिए इस बात के कोई मायने नहीं कि आप किस देश के, किस राज्य के, धर्म के, जाति हैं. कौन से ओहदे पर हैं और क्या सामाजिक, आर्थिक हैसियत है आपकी? उसके लिए हमारा मनुष्य होना ही काफी है. और हम न जाने कितने खांचों में बंटे हैं. एक पिघलन सी महसूस हो रही है भीतर. जी चाहता है अपने सब जानने वालों से जोर-जोर से बोलूं कि उनसे प्यार है. सबसे माफी मांगूं कि कभी दिल दुखाया हो शायद मैंने. कहूँ कि देखो न आज गले भी नहीं मिल सकते और गले मिलने के वो सारे लम्हे जब पास थे, हमने उन लम्हों को झगड़ों में गँवा दिया.

यह वक़्त हमें वो सिखाने आया है जो सीखने को लोग न जाने कितने पुस्तकालयों की ख़ाक छानते रहे, कितने वृक्षों के नीचे धूनी जमाने को भटकते रहे. मनुष्यता का पाठ. अभी कुछ ही दिन पहले हमने दंगों की आग देखी है, बर्बर हिंसा देखी है. हिंसा बाहर बाद में आती है पहले वो भीतर जन्म लेती है. वो किसी भी बहाने बाहर फूट पड़ने को व्याकुल होती है. यह समय अपने भीतर की उस हिंसा को समझने का है, उसे खत्म करने का है. यह वक़्त गुज़र जाएगा. यक़ीनन हम वापस अपनी ज़िन्दगियों में लौट आयेंगे. सब पहले जैसा हो जायेगा. लेकिन क्या हमें सब पहले जैसा ही चाहिए? क्या हमें पहले से बेहतर दुनिया नहीं चाहिए. बाबुषा कहती है आपदा का यह समय बीत जाने के बाद यदि हम बचे रह जाएँ, और हम एक बदले हुए मनुष्य न हों तो मरना बेहतर है. सच ही तो कहती है वह. यह वक़्त अपने भीतर नमी को सहेज लेने का है, उन सबके प्रति प्रेम से भर उठने का जिनके प्रति कभी भी जरा भी रोष रहा हो. क्या होगा इस हिसाब-किताब का कि किसने क्या कहा, किसने क्या किया. अपने भीतर के विनम्रता के पौधे को, मनुष्यता के पौधे को खूब खाद पानी देने का समय है. जी भर कर रो लेने का, प्यार से भर उठने का समय है. यक़ीनन इस बार हम पहले से बेहतर मनुष्य होकर मिलेंगे. है न?

धागा है प्रेम का



- संज्ञा उपाध्याय 

दिन कैसे भी हों, हर हाल में दोस्तों का हाल पूछना प्रतिभा कभी नहीं भूलती। टिंग की आवाज़ और मेरे इनबॉक्स में उसका लिखा चमकता है—“सुनो!” फिर हम अपने सुख-दुख-सपने सब कह देते हैं।
2020 में जब हम तरह-तरह की क़ैद में जा रहे थे, उन दिनों में उसने दोस्तों की ही नहीं, सबकी ख़ैरियत पूछने का एक नायाब ढंग निकाला। वह ख़त लिखने लगी। फ़ेसबुक पर। और फिर एक दिन इनबॉक्स में बताया कि ये ख़त इकट्ठे होकर किताब के रूप में आ रहे हैं, तुम एक टिप्पणी लिख दो इनके लिए।
आज वह किताब आयी। आज यहाँ कई दिन की बरसात के बाद धूप खिली है।
मैंने जो लिखा था, वह किताब में तो है ही, यहाँ भी साझा कर रही हूँ :

ऐसा समय, जब सामने दिखते दोस्त से उमगकर गले नहीं मिल सकते। हुलसकर हाथ बढ़ा देने वाली पड़ोस की बच्ची को गोद में नहीं उठा सकते। घर पहुँचने की उम्मीद में सड़कों पर सैकड़ों मील पैदल चले जा रहे मजदूरों को कोई दिलासा नहीं दे सकते। अघटित घट जाने के ख़याल को चले आने से चाहकर भी रोक नहीं सकते...

ऐसे बुरे समय को काटने के क्या तरीके हो सकते हैं? बीते दिनों की सुंदर यादों में खोये आहें भरते रहें। या आने वाले बेहतर समय के उम्मीद भरे ख़्वाब सँजोयें। याद और ख़्वाब दोनों के ही सिलसिले आज के उस बुरे वक़्त से शुरू होते हैं। अब आप इधर चले जायें या उधर।

लेकिन रचनात्मक मन कुछ और करता है। प्रतिभा ने वक़्त की इस कटाई में अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों की महीन कताई से ख़त बुने हैं। और धागा है प्रेम का।

ज़िंदगी हरदम तालों की चाबी खोजती है। नहीं मिलती, तो बना लेती है। बंद घर की एक खिड़की खुली हो, तो आसमान दिखता है। आसमान, जो हमेशा खुला ही होता है। तालेबंदी वाले दिनों में ये प्रेमपत्र लिखती प्रतिभा ने अपनी उसी खिड़की पर बैठ चाय पीते हुए बिलकुल नज़दीक खिड़की के पल्ले पर बैठी धूप सेंकती तितली को, उससे ज़रा आगे पंछी को डाल पर झुलाते पेड़ को, उससे कुछ आगे पहाड़ में खो जाती सर्पिल नदी को, और उससे बहुत आगे धरती के कान में गुनगुनाते आसमान को देखा है। इस देखने में ही ख़ुद से होकर कहीं दूर किसी सड़क पर अपने बच्चे को बगल में उठाये, सिर पर पोटली धरे चली जाती एक अजनबी उदास स्त्री तक की यात्रा तय की है. बरसे तो सुख सबके आँगन बरसे की दुआ पढ़ी है।

प्रतिभा की दुनिया प्रेम की दुनिया है। मनुष्य, परिंदे, चरिंदे, पेड़, हवा, फूल, नदी, बारिश, संगीत, किताब, फिल्म, चाय...सबसे प्रेम की दुनिया। लेकिन सिर्फ सुख-सपनों में डूबे प्रेम की नहीं। इसमें दुख है। उदासी है। करुणा है। रुदन है। प्रतीक्षा है। शिकायत है। तकलीफ है। साहस है। विचार है। यह प्रेम उलाहने का बाना छोड़ निजता की पगडंडी से होता राजमार्गों की अनगिन भीड़ के बीच सवाल बन व्यवस्था के सामने जा पहुँचता है।

ये प्रेम पत्र किसे लिखे गये हैं? एक पत्र पढ़ते हुए लगेगा—हमें ही! और अगला पत्र पढ़ते ही लगेगा कि अरे, यह पत्र तो हम लिख रहे हैं! अपने उसी प्रिय को, जिससे हम बेझिझक मैगी खाने की अपनी इच्छा जैसी दिनचर्या की हर सामान्य बात से लेकर अपने ही देश के नागरिकों के विरुद्ध जंग छेड़ देने जैसी अमानुषिकता तक किसी भी मसले पर संवाद कर सकते हैं।

इन खुले ख़तों को पढ़ते-पढ़ते हमारे भीतर के न जाने कितने-कितने बंद खुल जाते हैं।
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प्यारी प्रतिभा, इन ख़तों को इस सुंदर लिफ़ाफ़े में हम तक पहुँचाने का शुक्रिया

Thursday, January 6, 2022

एक नर्म खुशबू के घेरे में हूँ





दिल की धड़कनें इतनी तेज हैं कि लगता है अभी दिल उछल कर बाहर आ जायेगा. नब्ज़ थमी सी है. आँखें नम हैं. सारी रात नींद नहीं आई. भूख भी गुल है. पेट में चक्का सा घूम रहा है. क्या किताब आने पर ऐसा होता है?

कैसा मीठा सा अनुभव है जो संभल नहीं रहा. बिटिया हाथ थामे बैठी है. बिटिया की प्रति आ गयी है. मेरी लेखकीय प्रति अभी रास्ते में है. मैं उसे देर तक देखने के बाद हौले से छूती हूँ तो रुकी हुई रुलाई और रुकने से इंकार कर देती है.

किताबें दोस्तों तक पहुँचने लगी हैं. दोस्तों का कहना है किताब को देखते ही जाने को जी करता है इतनी सुंदर है यह. मैं सब सुनकर कहीं छुप जाना चाहती हूँ. छलक पड़ती हूँ.

जब लिखे जा रहे थे ये खत तब क्या पता था कि इस तरह सहेज लिए जायेंगे. जब लिख रही थी तब इसलिए लिख रही थी कि लिखना सांस लेने के लिए जरूरी था. अब जब ये संकलित होकर सामने रखे मुस्कुरा रहे हैं तब दिल की धड़कनें बेकाबू हो रही हैं. ऐसी हरारत, ऐसी बेचैनी तो महबूब से मिलने के वक़्त भी न हुई...
प्रकाशक ने कठिन दिनों के प्रेम पत्रों को प्रेम से ही सहेजा है और यह भी उनकी खूबी है कि किताबें अपने चाहने वालों के घर के पते की ओर तुरंत निकल पड़ी हैं...

मुझे तो कुछ सूझ नहीं रहा कि सहमे हाथों से छूती हूँ किताब को, टटोलती हूँ लिखे गए पत्रों को जैसे बाद मुद्दत अपना ही चेहरा टटोल रही हूँ...यह एहसास कितना अद्भुत है...किताब की ख़ुशबू में तर-ब-तर दिल की धड़कनों को समेट लूं जरा, तब तक आप अपनी प्रतियों का इंतज़ार करिए. पहुँचती होंगी...

Wednesday, January 5, 2022

नई किताब-वह चिड़िया क्या गाती होगी


नई किताब
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क़रीब 100 बरस पहले वर्जीनिया वुल्फ़ ने लिखा था, "Look within and life it seems is far from being like this." भीतर देखो और पाओगे कि जीवन उससे काफ़ी अलग है जो दिखता है।
जब बाहर सब कुछ बंद था, तब प्रतिभा कटियार ने अपने भीतर देखने के अपने प्रिय काम को कुछ और समय दिया। उसका नतीजा है- बिना किसी को संबोधित किए लिखी गईं ये चिटि्ठयां - कुछ डायरी, जैसी, लेकिन ज़्यादा ख़तों जैसी। इन चिटि्ठयों को पढ़ते हुए लेखिका के भीतर का कोमल संसार तो खुलता ही है, बाहर पसरी दुनिया को भी एक नई-तरल आंख से देखने की इच्छा पैदा होती है। 'मारीना' जैसी किताब लिखने के बाद प्रतिभा ने फिर साबित किया है कि वे भाषा की उंगली पकड़ कर मन के बीहड़ कोनों में घूमना जानती हैं और कभी अपनी पीड़ा से, कभी अपने प्रेम से, कभी अपनी स्मृति से, कभी अपने अकेलेपन से और कभी पूरे पर्यावरण के संग विहंसती हुई सामूहिकता से जीवन के उन कोनों को प्रकाशित कर डालती हैं जो शायद हम सबके भीतर होते हैं लेकिन जिन्हें देखना-पढऩा-खोजना हम भूल जाते हैं- भूल चुके हैं। यह किताब सुंदर गद्य से नहीं, उजली मनुष्यता से बनी है।- प्रियदर्शन
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