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Wednesday, July 1, 2020

वैधानिक गल्प- चन्दन पांडे


मुझे वो लोग, वो बातें, वो घटनाएँ बहुत अच्छी लगती हैं जो मेरे अब तक के जाने हुए से मुझे आगे ले जाती हैं, अब तक के सोचे हुए को गलत साबित करती हैं. मैं हमेशा उत्सुक, जिज्ञासु और तत्पर रहती हूँ खुद के अब तक के जाने और सोचे हुए को ख़ारिज होते देखने को.

इन दिनों ऐसा ही दौर आया हुआ है. अभी कुछ दिन पहले ही लग रहा था कि कहानियों और उपन्यासों से दोस्ती कम हो चली है शायद. लेकिन मैं गलत साबित हुई. चंदन पांडे का उपन्यास वैधानिक गल्प एक सांस में पढा ले गया. (इसके पहले सुजाता का एक बटा दो भी ऐसे ही पढ़ा था.) इस एक सांस को तमाम कामों समेत 18 घंटे का समय माना जाय.अफ़सोस हुआ कि क्यों चन्दन पांडे को इतनी देर से पढ़ा.

पहली पंक्ति से यह उपन्यास पाठकों पर पकड़ बना लेता है और घसीटते हुए भीतर ले जाता है. कहानी में कितनी कहानियां हैं, किस्सों में कितने किस्से. कोई पूर्वाग्रह नहीं किसी किरदार का. अर्चना और अनुसूया के बहाने स्त्रियों के बीच ईर्ष्या से इतर एक सार-सहेज और चिंता फ़िक्र वाला रिश्ता देख मन भीगने लगता है. यही दूरी तय करनी तो बाकी है हम स्त्रियों को. कितनी आसानी से अर्जुन की पत्नी अर्चना अर्जुन की पूर्व प्रेमिका रह चुकी और फिलवक्त मुश्किल में फंसी अनुसूया की चिंता में इस कद्र द्रवित है कि तुरंत पति को भेजने को न सिर्फ कहती है बल्कि जल्दी पहुँचने का इंतजाम भी करती है. पति को यथासंभव मदद पहुँचाने का प्रयास करती है, हौसला बंधाती है और अनुसूया से भी बात करते हुए उसे हिम्मत देने की कोशिश करती है. हालात बिगड़ने पर पति को आदेश देती है कि उसे इस हालत में वहां छोड़कर मत आना उसे साथ लेकर आना. अर्चना का किरदार मुझे उपन्यास का बहुत मजबूत किरदार लगता है. यूँ अनुसूया भी कम साहसी नहीं कि पहले प्रेम के नाकाम होने के बाद तमाम घरवालों के खिलाफ जाकर मुसलमान से ब्याह करने की हिम्मत रखती है वह.

उपन्यास में जितने भी स्त्री किरदार हैं सब सुलझे हुए, मजबूत और लड़ते, जूझते हुए हैं. ऐसा कम ही देखने को मिलता है. वैधानिक गल्प के डिफरेंट शेड्स के बीच नायक अर्जुन की कमजोरियों के जो टुकड़े आये हैं वो भी एक ईमानदार स्वीकारोक्ति के तौर पर अच्छे लगते हैं. एक कमजोर, कायर प्रेमी. प्रेमी के तौर पर अक्सर टूट जाते, कमजोर पड़ जाते पुरुषों में ये स्वीकारोक्तियां अभी आनी बाकी हैं. अनुसूया का अर्जुन के लिए कहा देखिये तो, 'तुम्हें तो अपनी जाति में कोई चाहिए थी. यह बात तुम्हें सात-आठ सालों में समझ में आई लेकिन मुझे बहुत पहले ही समझ में आ गयी थी. तुम्हारी हरकतों ने मुझे सब कुछ सिखलाया. तुममें मना करने का साहस नहीं था इसलिए तुम खींचते रहे. बहाने-बहाने से मुझे डिमौरलाइज करते रहे और जानते हो तुमसे अलग हुई तो मम्मी कसम कोई अतिरिक्त दुःख न हुआ....'

प्रेम में स्त्रियाँ हमेशा से ज्यादा मजबूत रही हैं, प्रेम में ही क्यों जीवन में भी. उपन्यास में भी अर्चना, अनुसूया, जानकी...सब अपनी चमक लिए हैं लेकिन वो चमक दैवीय नहीं है. यही बात उन्हें विशेष बनाती है.

पत्नी के कहने पर पूर्व प्रेमिका की मदद को निकल पड़े नायक के मन मस्तिष्क में चलने वाली स्मृतियों की बूंदाबांदी के तूफ़ान बनने की संभावनाओं को कभी रुकते कभी उफनते देखना, उसके लापता पति को ढूंढते हुए समूचे सिस्टम की परतों को खुलते देखना, उन परतों में उलझना भी, फिर समझना भी.

लव जिहाद कहानी में इस तरह आएगा इसका अंदाजा भी नहीं लगता, प्रीडेक्टेबल नहीं है कहानी. अपने अंत पर पहुंचकर बताती है कि ये वही कहानी है जिसे तुमने टीवी में देखा था, अखबारों में पढ़ा था. लेकिन वो कितना कम था.

रफीक और नियाज के अलावा अमनदीप और जानकी तो फ्रंट में हैं लेकिन जो बैकग्राउंड में है एक पूरा सिस्टम, सिपाही, फेक वीडियो, झूठे फोन, झूठे समारोह, सम्मान वो सब कहानी के किरदार हैं. किरदार हैं रफीक की डायरी के वो पन्ने जिन्हें जैसे तैसे अनुसूया ने बचाया और उस बचाने में वो भीगे, गले, कुछ शब्द बह गये कुछ रह गये, जो कमरे भर में बिखरे, सूखने के इंतजार में, रफीक के मिलने के इंतजार में. चन्दन की कहन बहुत कमाल की है, वो किताब को छोड़ने नहीं देती. ऐसी पठनीयता से गुजरते हुए मुझे नाना जी देर रात तक चलती जाने वाली कहानियां याद आती हैं.

यह मेरी कमजर्फी ही है या जिन्दगी की बेदिली कि उसने मेरे कई बरस निचोड़ लिए, जीने का मौका ही न दिया पढने का मौका कैसे देती भला. यही वजह है कि मैंने चन्दन पाण्डेय का लिखा पहली बार कुछ पढ़ा है. हालाँकि अब बाकी किताबें भी ऑर्डर की जा चुकी हैं.

मुझे समीक्षा जैसा लिखने का न तो शऊर है, न मन है. बस इतना कहने का मन है कि बहुत सुंदर उपन्यास पढ़ा मैंने.आपने अगर न पढ़ा हो तो जरूर पढ़िए...