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Thursday, November 3, 2016

ख्वाहिश की लंदन डायरी - 6


डर्डल डोर- आखिर वो दिन आ गया जब मैं अपनी फेवरेट जगह जाने वाली थी यानी डर्डल डोर। यह जगह लंदन से 2 घंटे की दूरी पर था। मामा मामी के दोस्तों को मिलाकर हम करीब दस लोग वहां एक साथ जा रहे थे। गाड़ी में हम खूब मस्ती करते हुए हम डर्डल पहुंच गये लेकिन मेरी आंखें खुली की खुली रह गईं जब मामा ने बताया कि डोर तक पहुंचने के लिए हमें तीन पहाडि़यां पैदल चलनी पड़ेगी। गाडि़यां पार्क करके हमने चढ़ना शुरू किया। आधी पहाड़ी चढ़ते हुए हमें यह लगने लगा कि आगे क्या होने वाला है। जैसे-तैसे हंसी मजाक करते हुए हम लोगों ने दो पहाडि़यां पार कीं। तीसरी पहाड़ी पर असल में चढ़ना नहीं उतरना था। मुझे उतरते हुए काफी घबराहट हो रही थी क्योंकि ढलान काफी ज्यादा थी।
लेकिन उतरने में ज्यादा वक्त नहीं लगी और हम पहाड़ी पार कर गये। इसके बाद जब हम सीढि़यों से उतरे तो एक बहुत ही प्यारा नजारा हमारे सामने था। नीला समंदर और उसमें एक प्यारा सा प्राकतिक रूप से बना हुआ चट्टान का दरवाजा। जो कि बहुत विशाल था। थोड़ी देर हमने वहां के ठंडे पानी में छप छप करी, तस्वीरें खींची और खिंचवाई। थोड़ी देर वहां बैठकर हम समंदर को देखते हुए बातें करते रहे इसके बाद हम वापस उन्हीं पहाडि़यों से चढकर और उतरकर दूसरे समंदर के नजारे देखने को चल पड़े। वो समंदर भी वहां से पंद्रह मिनट की दूरी पर ही था। जब हम वहां पहुंचे तो वहां कई प्रकार के मजेदार म्यूजिकल इंस्टूमेंट्स थे जिनको बजाते हुए मैं गुजर रही थी। थोड़ी देर सुकून से हमने समंदर को देखा और फिर हमने महसूस किया कि हमें भूख लग रही है। इसके बाद हमने इंडियन रेस्टोरेंट को गूगल किया और उसकी खोज करते हुए वहां पहुंचे। वहां पहुंचकर हमने भरपेट खाना खाया और वापस घर की ओर चल पड़े। मन कर रहा था कि मैं सो जाउं लेकिन घर पहुंचने का रास्ता अभी काफी दूर था। रात के एक बजे के करीब हम घर पहुंचे और पहंुचते ही नींद ने हमें घेर लिया।
अगला दिन हमने खूब आराम किया क्योंकि सब बहुत थके हुए थे। अगले दिन हमें इंडिया वापस लौटना था तो हम सब घर पर साथ में रहकर गप्पे लगाना चाहते थे। यह लंदन में हमारा आखिरी दिन था। सारा दिन हमने एक-दूसरे से गप्पे लर्गाईं रात में मामा ने देर तक गिटार पर खूब सारे गाने बजाये। किसी का उठने का मन नहीं था। लेकिन जब रात काफी हो गई तो सबको सोने जाना ही पड़ा।

जब अगले दिन हम उठे तो मम्मी सामान समेट रही थीं। मम्मी ने नाश्ता बनाया दीदी और मामी हमें बाय कहकर अपने काम पर चले गये। हमने मम्मी का बनाया हुआ गर्मागर्म नाश्ता खाया, और उसके बाद मामा के साथ खूब सारी बातें की और टीवी पर एनिमेशन फिल्में देखीं। मामा ने हमारे लिए खाने में दाल बाटी बनाई। खाना खाने के बाद हमने कुछ देर आराम किया और फिर एयरपोर्ट के लिए निकल पड़े। हमारा मन उदास था, जाने का मन नहीं कर रहा था लेकिन इंडिया की याद भी आ रही थी।

लंदन का हमारा सफर पूरा हो चुका था। लंदन की बहुत सारी यादें लेकर हम भारत की ओर लौट रहे थे। 

समाप्त.

Wednesday, November 2, 2016

ख्वाहिश की लंदन डायरी - 5


लीड्स - अगले दिन मुझे और मम्मी को जाना था लीड्स जो कि लंदन से कुछ ही दूर था। मैं मम्मी की एक दोस्त से मिलने लीड्स जा रही थी। उस दिन हम लोग सुबह जल्दी निकल गये। मामी ने हमें बस में बिठाया। हम लोग बहुत खुश थे कि एक और नया शहर देखने को मिलेगा। रास्ता भी खूब सुंदर था। रास्ते में मैंने मम्मी से खूब सारी बातें की और बहुत सारे विंडमिल्स देखे। बस आधी से ज्यादा खाली ही थी इसलिए मैं और मम्मी आराम से पैर पसारकर झपकी लेने लगे। जब हम उठे तो लीड्स आने वाला था। हमारी योजना वहां दो दिन रुकने की थी। जब हम कोच स्टेशन पर उतरे तो वहां पर मम्मी की दोस्त नीरा आंटी और अंकल हमारा इंतजार कर रहे थे। वो लोग हमें देखकर बहुत खुश हुए। हम लोग उनकी कार में बैठकर उनके घर चले गये। उनका शहर लीड्स शहर से दूर था। घर तक का रास्ता बहुत खूबसूरत था। जब हम उनके घर पहुंचे तो हमने देखा कि उनका घर बहुत बड़ा और खूबसूरत था। उसमें एक प्यारा सा बगीचा था जिसमें कुछ खरगोश कूदते फांदते नजर आये। नीरा आंटी ने हमें हमारा कमरा बताया और हमने उसमें अपना सामान रख दिया। मम्मी और आंटी ने एक-दूसरे से बहुत सारी बातें कीं और आंटी ने हमें बहुत लज़ीज पास्ता और गार्लिक ब्रेड बनाकर खिलाया। मजा तो तब आया जब खाने के बाद हम लोग लंबी सैर पर चले गये। उनके घर के पास ही खूब बड़े-बड़े खेत थे। तो हम उन खेतों के आसपास घूमते फिर रहे थे। वहां बहुत प्यारे-प्यारे घोड़े भी थे जिन्होंने कपड़े भी पहने हुए थे। थोड़ी देर की सैर के बाद जब हम लोग घर पहुंचे तो मैं टीवी देखने लगी और मम्मी ने खूब सारी बातें की और खाना खाकर सो गये। अगले दिन जब मम्मी ने उठाया तो उन्होंने बताया कि अंकल और आंटी हमें यॉर्क सिटी घुमाने ले जाने वाले हैं। मैं यह सुनकर बहुत खुश हुई। जल्दी से नहा धोकर मैं तैयार हो गई। गर्मागर्म नाश्ता करने के बाद हम लोग यॉर्कशायर के लिए निकल गये। 
सबसे पहले हम लोग यॉर्कमिनिस्टर चर्च और संग्रहालय देखने गये। उसका आर्किटेक्चर बहुत ही अनूठा था। उस पर बहुत बारीकी से काम किया गया होगा ऐसा लग रहा था। पास में ही एक कैसल थी हम वहां भी घूमने गये तो हमने देखा कि वो टूटा फूटा कैसल यानी किला अपने टूटन के साथ भी काफी खूबसूरत लग रहा था। कुछ देर हम वहां हरी घास पर बैठे रहे। धूप में हमने थोड़ी देर हमने आराम किया और इसके बाद हम चित्र संग्रहालय देखने चले गये जहां दुनिया भर के मशहूर आर्टिस्ट की अद्भुत पेन्टिंग्स थीं। पास में एक नदी थी जब हम उस नदी के पास से गुजर रहे थे तो हमने वहां प्यारी प्यारी ढेर सारी बतखें देखीं जो धूप में आराम फरमा रही थीं। हम लोग उसके बाद मॉल घूमने चले गये। हमने वहां कुछ खाया पिया, थोड़ी शॉपिंग की और फिर घर चले गये।
घर जाकर मैंने और मम्मी ने अपना सामान समेटा क्योंकि अगले दिन हमें सुबह जल्दी ही लंदन के लिए निकलना था। सुबह जब मम्मी ने उठाया तो मैं जल्दी जल्दी तैयार हो गई। नाश्ता करने के बाद थोड़ी बातें करीं और फिर स्टेशन के लिए हम निकल गये। आंटी ने हमारेे लिए रास्ते में खाने के लिए खूब सारा खाना रखा, उन्होंने हमें बस में बिठाया और हम वापस लंदन की ओर लौटने लगे। सुबह जल्दी उठने के कारण बस में हम दोनों को गहरी नींद आ गई। जब हमने आंखें खोलीं तो लंदन आ चुका था।

(अगली कड़ी और अंतिम में डरडल डोर और भारत वापसी - जारी )

Monday, October 31, 2016

ख्वाहिश लंदन डायरी- 4


स्कॉटलैण्ड- सुबह जैसे ही आंख खुली तो देखा कि घर में हड़बड़ी मची हुई थी क्योंकि मैं तो भूल ही गई थी कि आज हमें सुबह पांच स्कॉटलैण्ड के लिए निकलना था। मैं भी जल्दी से उठकर तैयार हो गई और मम्मी, मैं, मामा, मामी निकल पड़े घर से ट्रेन पकड़ने के लिए। जब हम लोग टेªन में बैठे तब एक राहत की सांस ली। वहां की ट्रेन में सफर करना भी एक अलग अनुभव था। वहां ट्रेन में बैठकर मुझे यहां की ट्रेन और भारतीय ट्रेन में कुछ खास अंतर तो नहीं लगा बस यह था कि इन ट्रेनों की गति बहुत तेज थी और ये साफ सुथरी थीं। हर अनुभव के बाद मैं यही सोचती थी कि कब मैं अपनी दोस्तों से मिलकर अपनी अविस्मरणीय अनुभव बाटूंगी। सर थोड़ा-थोड़ा अधूरी नींद के कारण चकरा रहा था इसलिए टेªन में एक छोटी सी झपकी मार ली और आधा सुंदर रास्ता छूट गया। वहां पर जब मैंने इतने बड़े बड़े खुले हुए हरे मैदान देखती थी तो कुछ ऐसा लगता था कि या तो यहां के लोगो को जमीन का उपयोग करना नहीं आता या फिर प्रकति के प्रति सर्वाधिक प्रेम है।
चार घंटे के उस सफर के बाद हम पहुंच गए एडिनबरा। यह स्कॉटलैण्ड की राजधानी है। किसी ने अपना एक खाली फ्लैट हमें दो दिन के लिए रेंट पर दिया था। स्टेशन से पहले से बुक किये गए फ़्लैट की तरफ जाते हुए दूध और ब्रेड लिया और चल दिए। दो कमरे के इस फ्लैट में पहुंचकर हमें लगा कि हम घर में ही आ गए हों। शाम को हम घूमने निकले लेकिन उस शाम सिर्फ सड़कें ही छानीं। इंडियन रेस्टोरेंट की तलाश में इधर-उधर घूम रहे थे और जब तक खाना खाया तब तक काफी रात हो चुकी थी और हम वापस फ्लैट की तरफ लौटे। वहां पहुंचकर मामा मामी ने बताया कि उन्होंने हमारे लिए एक बस टूर बुक किया है जो हमें पूरा दिन एडिनबरा की सुंदर कंट्रीसाइड घुमायेगा क्योंकि वो लोग एक बार पहले ही यह सब घूम चुके थे तो वो लोग हमारे साथ नहीं गए. सुबह-सुबह मामा ने हमें बस में बिठाया. तकलीफ यह थी कि मुझे यह डर था कि मुझे कहीं बस में चक्कर न आयें। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। जब वहां के हरे-भरे पहाड़ और इनमें से गुजरते बादल देखे तो मेरी तो आंखें खुली की खुली रह गईं। रास्ता बहुत ही खूबसूरत था। पहली जगह जब बस रुकी तो आधे घंटे मे हमें घूमकर वापस आना था। पास में ही एक ब्रेकफास्ट और गिफ्ट
शॉप थी जहां लोग व्यस्त थे लेकिन मैंने और मम्मी खाने को प्राथमिकता नहीं दी और आधे घंटे का सही उपयोग करते हुए आसपास घूमने लगे। वहां पर दो याक दिखे जो कि जाली के पीछे थे। जिनमें से एक भूरे रंग का याक था जो मस्ती से घास चर रहा था। मम्मी की वह बात हमेशा याद आती है कि जैसे ही एडिनबरा की बातें होती थीं मममी हमेशा कहती थीं कि वह दिन एकदम एक अनदेखा सपना प्रतीत होता था। मम्मी की फोटोग्राफी खूब चल रही थी ऐसा लग रहा था कि मम्मी इसी नजारे का इंतजार कर रही थीं। मम्मी वहां के हर नजारे का अपने कैमरे की पोटली में छुपाने में लगी थीं। मैं बेचारी बच्ची मम्मी के कैमरे के कपड़े यानी कैमरे का कवर संभालने में लगी थी जब मम्मी कहती थी कि बेटा जरा फोटो खिंचाओ तो मुस्कुरा के खड़ी हो जाती या फिर उनकी खींचने लगती। यह सब चलता रहता था। हम लोग फिर जाकर बैठ गये रास्ते भर मेरी और मम्मी की वार्तालाप में सौ बार आह शब्द का प्रयोग हुआ। हमारा बस ड्राइवर बहुत ही चुनिंदा और खूबसूरत
जगहों पर बस रोक देता था। सामने झील का नजारा और पहाड़ होते। वो कहता कि आप लोग जल्दी से फोटो खींचकर आ जाइये। अगली जगह जहां बस रुकी वहां मुझे और मम्मी को बहुत ज्यादा भूख लग रही थी। पर खाना लेने में डर इस बात का था कि कहीं नॉनवेज न मिल जाये क्योंकि वहां के लोग तो मछली को भी वेजीटेरियन ही मानते थे और गाय के मास को भी। आखिर में सोच विचार के बाद हम लोगों ने एक टुकड़ा केक और कोल्ड डिंक की बोतल ली और शांति से एक पत्थर के उपर बैठकर हमने खाना खाया। भूख पूरी तरह से मिटी तो नहीं थी लेकिन एक बात की तसल्ली थी कि हम जो भी खा रहे थे वो वेजीटेरियन था। बस ड्राइवर द्वारा थोड़ी देर में अनांउसमेंट हुई तो हम लोग बस में जाकर बैठ गये । हम लोगों ने वहां की मशहूर लेक लॉकनेस के लिए टिकट बुक करवा ली. थोड़ी देर बाद जब हम लॉकनेस के पास उतरे तो मौसम खूब अच्छा हो चुका था और धीमी धीमी बारिश हो रही थी। हम लोग टिकट लेकर वहां पर बोट का इंतजार करने लगे। थोड़ी देर बाद छोटा क्रूज वहां आया। उस क्रूज के उपरी हिस्से में हम पहुंचकर बैठ गये। वह लेक बहुत सुंदर थी। एकदम साफ और नीली। आसपास पहाड़ थे। जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते गये हमें वहां का मशहूर एडिनबरा का किला दिखने लगा।
हम वहां उतरे नहीं लेकिन हमारा क्रूज एकदम कैसल यानी किले के करीब जाकर खड़ा हो गया। वो किला जो अब किसी खंडहर में बदल चुका था। वहां कई सारे पीले रंग की झाडि़यां थीं और तकरीबन एक घंटे की लॉकनेस की घुमाई के बाद हम बस में वापस लौट आये। इसी के साथ हमारा वापसी का सफर शुरू हुआ। हम वापस वहीं पहुंचे जहां से सुबह सफरªª शुरू किया था। मामा और मामी हमारा इंतजार कर रहे थे। हम बहुत थक चुके थे और भूखे थे। हमने वहां एक पुर्तगाली रेस्टोरेंट में पीटा ब्रेड और हमस खाया, बर्गर भी खाये। खाने के बाद हम लोग पैदल चलते हुए अपने फलैट तक पहुंचे जो हमने यहां बुक किया हुआ था। उस रात हम लोग बहुत जल्दी सो गये। दिन भर की यादें और थकावट लेकर हम गहरी नींद में सो गये। अगले दिन मौसम ने हमारा एकदम साथ नहीं दिया। बहुत बारिश हो रही थी इसलिए हम कहीं घूमने नहीं जा पाये। उसी दिन हमारी शाम की लंदन वापसी की ट्रेन थी। हमने दो बजे उस जगह को जहां हम रुके थे छोड़ दिया और धीमी-धीमी बारिश में ही स्टेशन की ओर चल दिए। हमने बहुत सारी तस्वीरों को अपने कैमरे में भर लिया था। वापसी के समय हमने ट्रेन में एक बड़ा सा रेनबो देखा। बल्कि डबल रेनबो जो खूब बड़ा सा था। रेनबो के सारे रंग उभरकर आ रहे थे। इतना बड़ा और क्लियर रेनबो मैंने पहले कभी नहीं देखा था। हम चारों रास्ते भर बातें करते रहे और पता ही नहीं चला कि सफर कब खत्म हो गया। हम लोग रात में लंदन पहुंचे। स्वाति दीदी ने हमारे लिए पहले से ही छोले पूड़ी बनाकर रखे थे. हम स्वादिष्ट छोले पूड़ी खाकर सो गये।

(अगली कड़ी में लीड्स की सैर....जारी )

Saturday, October 29, 2016

ख़वाहिश की लंदन डायरी - 3

स्टेटफोर्ड अपॉन एवन- अगला दिन मेरे लिए जानकारियों से भरा हुआ था। हम लोग गए विलियम शेक्सपियर के गांव। इतना सुंदर गांव मैंने पहले कभी नहीं देखा था। यहां के लोगों ने शेक्सपियर के घर को अच्छे से संभाला हुआ था। यहां खूब सुंदर बगिया भी थी और जानकारियां भी। उस मेज पर बैठना जहां वो अपना अमूल्य समय बिताया करते थे काफी रोमांचक था। वही पलंग] वही खाने की मेज] वही कमरा...सब वैसा का वैसा। उनके सोचने का नज़रिया भी जैसे हर कमरे में झलकता था। उनके घर में खूब सारा समय बिताकर वहीं पास के एक पार्क में हम लोग जाकर बैठ गए। ठीक नदी के किनारे जहां बहुत सारे हंस और बत्तख थीं। वहीं कहीं एक बुलबुले बनाने वाली मशीन जैसा खिलौना बेचने वाला भी था। उसके पास ऐसा खिलौना था जिससे बहुत बड़े-बड़े बुलबुले बन रहे थे। मैंने भी उससे एक खिलौना खरीदा और अपने आसपास का माहौल बुलबुलों से भर दिया।

मैडम तुषाद- अगला दिन तो अब तक सबसे सुंदर दिन था। उस दिन मैं और मम्मी पहली बार खुद अकेले लंदन घूमने निकले। हमारे हाथ में मैडम तुषाद की दो टिकटें थीं और हम लोग बेकर स्ट्रीट से गुजरते हुए पहुंच गए
मैडम तुषाद म्यूजियम। वहां हम जैसे ही टिकट दिखाकर सामने अंदर पहुंचे सामने की दीवार पर कई तस्वीर खींचते मीडिया फोटोग्राफर्स की तस्वीरें लगी थीं थ्री डी में और आवाजें आ रही थीं। ऐसा महसूस करवाने के लिए जैसे हम कोई सेलिब्रिटी हों। हम अंदर जैसे ही पहुंचे चारो तरफ पुतले ही पुतले। पहले तो हमें यह लगा कि वहां इंसान ही खड़े हैं लेकिन ऐसा नहीं था। पुतले बड़े ही बखूबी बनाये गए थे। मैं तो एकदम आश्चर्यचकित हुई जब मैंने वहां कैटरीना कैफ, सलमान खान, अमिताभ बच्चन, माधुरी दीक्षित, शाहरूख खान जैसे कई हिंदुस्तानी सिनेमा के स्टार्स के पुतले देखे। हमने हर पुतलों के साथ तस्वीरें खिंचवाईं। वहां पर टॉमक्रूज का भी पुतला था। वैसे तो वहां कई नामी लोगों के पुतले थे पर सबसे अच्छा असली पुतला लग रहा था एल्बर्ट आइंस्टीन का। उसके बाद हमने वहां पर एक अच्छा सा इंडियन रेस्टोरेंट ढूंढा और खाना खाकर घर की तरफ बढ़ गए।

थेम्स नदी में सारा दिन -अगले दिन के लिए मैं थोड़ी डरी हुई थी। लेकिन शायद वह दिन मेरे दिमाग में छप गया था। अगले दिन मौसम ने कुछ खास साथ नहीं दिया। पहले हम लोग वहां के मशहूर एक्वेरियम सी-लाईफ में गये। वो काफी बड़ा भी था और मजेदार भी। मैंने वहां पर पहली बार पेंग्विन्स देखे और बहुत खुश हुई। लेकिन असली
मजा तो तब शुरू हुआ जब हम वहां से बाहर निकले और मूसलाधार बारिश शरू हो गई। हमने गीले होने से बचने के लिए टोपियां पहनीं और पुल के दूसरे छोर पर पहुंचे। जहां पर मामा खड़े थे यह बताने के लिए कि अब हमें कहां जाना है और अगली सवारी थी थेम्स बोट राइड की। हम लोग लाइन में लगकर उस छोटे से क्रूज में चले गए। मम्मी के मना करने के बाद भी मैंने जिद की और हम लोग क्रूज की छत पर चले गये। अब बारिश भी कम होने लगी थी और दो घंटे हम लोग पानी और मौसम का आनंद उठाते रहे। सच में ऐसा लग रहा था कि अभी पानी में से विशाल जलपरी निकलेगी. उस दिन की सबसे अच्छी बात यह थी कि हमने एक बार फिर से टॉवर ब्रिज को खुलते देखा।

(अगली कड़ी में स्कॉटलैंड....जारी )

Friday, October 28, 2016

ख्वाहिश की लंदन डायरी- 2

बर्किंघम पैलेस, चर्चिल हाउस, टेफल्गेर स्कॉवयर-

पहले दिन नाश्ता करने के बाद मामी ऑफिस चली गईं और हम सबका घूमने जाने का प्लान बना। हम सबकी टोली निकली लंदन की सैर करने। पहली दफा वहां की सड़कों पर चलना किसी ख्वाब जैसा था। मुझे काफी समय लगा खुद को यह समझाने में कि हां सचमुच मैं लंदन में ही हूं। यह कोई सपना नहीं है। हम सबने ट्यूब पकड़ी और पहुँच गये ग्रीन पार्क। वहां से गुजरते समय ऐसा लगा कि इतनी हरियाली है यहाँ. यही पेड़ भारत में भी तो हैं लेकिन मैंने उन्हें इस नजरिये से कभी क्यों नहीं देखा। चाहे जितनी भी तारीफ कर ली जाए लंदन की लेकिन अपने भारत की सुंदरता भी कुछ कम नहीं। 

ग्रीन पार्क से गुजरने के बाद मेरे सामने अकल्पनीय, आलीशान हवेली थी। बातचीत के दौरान मामा ने बताया कि यह रानी एलिजाबेथ-2 का महल है। हां, ये वही रानी है जिसके मुकुट में कोहिनूर हीरा जड़ा है। बहुत सुंदर थी वह हवेली। हर तरफ लंबी टोपी और वर्दी वाले सिपाही सुरक्षा में खड़े थे। अंदर जाने की किसी को अनुमति नहीं थी। भीड़भाड़ और चर्चाएं यह चल रही थीं कि रानी अभी किसी दूसरे देश में गई हैं।
लंदन की सड़कों पर चलने का भी एक अलग अनुभव था। लगभग जितना भी लंदन हमने घूमा या तो पैदल या ट्यूब में। महल से कुछ ही दूर पर यूके के पूर्व प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल की आलीशान मूर्ति थी। उस मूर्ति के साथ फोटो खिंचवाने के लिए लंबी लाइन थी। इसके बाद हमने टेफल्गेर स्कावयर का रुख किया। वहां आर्ट गैलरी भी थी जहां महान कलाकारों द्वारा बनाई हुई अद्भुत पेंटिग्स बनी हुई थीं। पेंटिंग्स में मुझे कुछ खास समझ तो नहीं आईं पर हां उनमें रंगों का खेल बहुत अच्छा था। देखते ही देखते समय कैसे बीत गया कुछ पता नहीं चला। शाम होने लगी और हम लोग घर की तरफ बढ़ गये। मुझे और मम्मी को भारतीय समय के हिसाब से जल्दी नींद आने लगती थी। घर आते ही हम दोनों सो गये। उस अद्भुत दिन के ख्वाबों में डूबने के लिए।

ग्रीनविच- एक बात इस देश की बड़ी ही अजीब थी कि गर्मियों में यहां रात के आठ बजे सूरज ढलता था। दस बजे तक तो उजाला ही रहता था। सुबह चार बजे ही फिर से सूरज दादा प्रेजेंट लगा देते थे। वहां धूप कितनी भी रहे हल्की सी हवा ठिठुरा ही देती थी। अगले दिन हमारे साथ मामी भी गईं। हम सब लोग जा रहे थे ग्रीनविच। माना जाता है कि ग्रीनविच से एक काल्पनिक रेखा गुजरती है जिसे समय का घर भी कहा जाता है। 
अंदर जाकर एक संग्रहालय था जिसमें छोटे-छोटे पुर्जों से बनी हुई कई छोटी सी मशीने थीं। एक लकड़ी से बनी दूरबीन भी थी जो कि पहले के समय में बहुत दूर तक का रास्ता दिखाती थी। सबसे सुंदर चीज वहां मुझे लगी खुले हरे-भरे मैदान। वहां कई बड़े व हरे मैदान थे जो कि सारा ध्यान अपनी ओर खींचते थे। उस दिन हमने वहां का सबसे चर्चित ब्रिज, 'टॉवर ब्रिज' देखा और एक अच्छा संयोग यह बना कि जब हम लोग वहां से गुजर रहे थे तब ही वहां उस टॉवर ब्रिज के नीचे से एक बड़ा जहाज गुजरा और अब समय था उस ब्रिज के खुलने का। ब्रिज धीरे-धीरे खुला। यह एकदम अकल्पनीय दृश्य था। मामा ने कहा की वो इतने सालों से लंदन में हैं लेकिन ऐसा नज़ारा तो उन्होंने भी कभी नहीं देखा था. उसके बाद हम लोग मामी के एक दोस्त के घर डिनर के लिए गए। वहां जाकर हमने ढेर सारी मस्ती की. 

(अगली कड़ी में शेक्सपियर का घर, मैडम तुषाद म्यूजियम और थेम्स में मस्ती...जारी...)

Thursday, October 27, 2016

सपनों सा सफ़र, सफर में सपने...ख्वाहिश की लंदन डायरी



जबसे पता चला था कि 2 जून 2016 को मैं अपने मामा मामी के पास मम्मी के साथ लंदन जाने वाली हूं वो भी पूरे 20 दिन के लिए मुझे यह सब एक सपने जैसा लग रहा था। मैंने यह सब बात अपनी सबसे प्रिय मित्र कोमल को बताई तो वह भी मेरे लिए बहुत खुश हुई। वह रोज मुझसे पूछती कि मेरी तैयारी कहां तक पहुंची। हर दिन मानो जैसे एक साल जितना लंबा लगता था। दिन ही नहीं कट रहे थे। दिन में कम से कम मेरी और मम्मी की लंदन जाने के बारे में  दस बार बात होती थी। सबसे ज्यादा उत्सुकता मुझे यह थी कि नया देश देखना कैसा अनुभव होता है. मेरे लिए यह सब किसी ख्वाब सा था। मम्मी को हल्की सी चिंता भी थी कि हम लोग ठीक से बिना किसी मुश्किल के मामा के पास पहुंच जायें। 

आखिर वो दिन आ ही गया जिसका इंतजार था। सफर कुछ इस तरह था कि हम पहले देहरादून से दिल्ली गये और फिर दिल्ली से लंदन। हम लोग सुबह से तैयारी करते-करते आखिरकार ट्रेन  में बैठ ही गये। रात का वक्त था। हम लोग खाना खाकर ख्वाबों के साथ सो गये। सुबह आंखें खुलीं तो मानो सूरज कह रहा हो कि बस अब उठो, दिल्ली आ चुका है। जल्दी से मैं और मम्मी ट्रेन से उतरे और जैसा कि तय हुआ था पापा हमें स्टेशन लेने आये। हम पापा के साथ मेट्रो पकड़कर सीधे एयरपोर्ट पहुंचे। पहली बार मैंने अंतरर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा देखा था। हम लोग अंदर गये और पता नहीं क्यों मुझे अजीब सा लगने लगा। जबकि यह तो पता ही था कि 20 दिन बाद वापस आना है। शायद यह पहली बार अपने देश से दूर जाने का एहसास के कारण हुआ हो। हर काउंटर पर जाकर पासपोर्ट दिखाना, जांच की औपचारिकताएं पूरी करने के बाद हम एक जगह बैठे और हमने सबको फोन करके बता दिया कि हम अब हवाई जहाज में बैठने जा रहे हैं। थोड़ी ही देर में हम हवाई जहाज के अंदर थे। 

इतना बड़ा हवाई जहाज देखकर तो मेरी आंखें खुली की खुली रह गयीं। जब मैंने यह देखा कि हमारी कुर्सियों के आगे छोटे-छोटे टीवी लगे हैं तो मैंने सोचा कि अब दस घंटे अच्छे से कटेंगे। पर मेरी तबियत कुछ खास ठीक नहीं रही। मैंने अपना सर धीरे से मम्मी की गोद में रखा और ऐसे ही सफर कट गया। मैंने रास्ते में कुछ भी नहीं खाया पिया। जब मैं उठी तो उद्घोषणा हुई कि हम लंदन में उतरने वाले हैं। मम्मी के मना करने के बाद भी कान में एयर प्रेशर कम  करने वाली एक्सरसाइज न करके कान में रूई लगाई ताकि हवा के दबाव से दर्द न हो। 

कुछ ही समय के बाद हम लंदन के हीथ्रो हवाई अड्डे पर थे। वहां पर इमिग्रेशन कराने के बाद सामान लेकर हम बाहर निकले। सामने ही मामा खड़े नजर आए जो कि हमें लेने आए थे। हम लोग जैसे ही उनसे मिले मामा ने मम्मी के पैर छुए और मुझे गले लगा लिया। हम बाते करते हुए टैक्सी तक पहुंचे। वहां की ठण्ड देखकर मानो ऐसा लग रहा था कि भारत की सारी ठण्ड यही लोग चुरा लाए हों। दांत भी किटकिटा रहे थे। हम लोग टैक्सी की खिड़की के बाहर आश्चर्य से देख रहे थे। भारतीय समय के हिसाब से रात के 1 बजे थे इसलिए आंखों से नींद झलक रही थी। सब कुछ एक सुंदर सपना लग रहा था और ऐसा महसूस हो रहा था कि अभी मम्मी जोर से आवाज देंगी और सपना टूट जायेगा। लेकिन इस बार ऐसा कुछ नहीं हुआ। हां, मैं हकीकत में लंदन में थी। हम जैसे ही मामा के घर पहुंचे मेरी मामी और स्वाति दीदी ने हमारा स्वागत किया। इतने लंबे सफर के बाद मामी का बनाया हुआ स्वादिष्ट खाना खाकर मुझे बहुत मजा आया। क्योंकि मैंने रास्ते में कुछ नहीं खाया था इसलिए मेरी भूख भी खूब बढ़ी हुई थी। 

हमें नींद भी बहुत आ रही थी। हमने खाना खाने के बाद कुछ बातें की फिर सो गई। और फिर जेटलेग के हिसाब से हम सुबह पांच बजे उठ गये इसके बाद शुरू हुई हमारी घुम्मकड़ी...

(अगली कड़ी में बर्किनघम पैलेस, चर्चिल हाउस, ट्रेफ्लेगर स्क्वॉयर और, ग्रीनविच...)

Wednesday, October 26, 2016

ख्वाहिश का पहला लेख- लंदन यात्रा


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ख्वाहिश १३ बरस की हैऔर घुम्मकड़ी की शौक़ीन है. कब वो चुपके-चुपके अपनी डायरियों में अपने अनुभव लिखने लगी मुझे पता नहीं. पहली बार दो बरस पहले उसने खुद बताया था कि वो डायरी लिखती है लेकिन चाहती है उसकी डायरी कोई न पढ़े. जाहिर है मेरी जिम्मेदारी उसकी इस प्राइवेसी को बचाने की भी हो गयी. उसकी डायरियां भरने लगीं. मैंने यह ज़रूर महसूस किया कि उसे डायरी में एक बेस्ट फ्रेंड मिल गया है. एक बार जब उसकी डायरी गुम गयी थी, वो बेहदउदास हुई थी अपनी बेस्ट फ्रेंड के बिछड़ने से. तब जाना कि लिखना उसकी भी ज़रुरत है शायद, ऐसी जगह जहाँ उसे रिलीफ मिलती है. 

बहरहाल वो लिखती है, अपने लिए. लिखकर खुश रहती है. उसे पढने का भी कम शौक नहीं...लेकिन उसकी पढने की किताबें मेरे जाने बूझे से काफी अलग है...मैं उससे हर दिन सीखती हूँ. पिछले दिनों मैं और ख्वाहिश अपनी पहली विदेश यात्रा पर थे. ख्वाहिश ने इस यात्रा को भी अपनी डायरी में दर्ज किया. सुभाष राय अंकल ने जब उससे उन डायरी के कुछ पन्ने प्रिंट करने को मांगे तो उसने संकोच के साथ दे दिए...यह पहली बार था जब मैं अपनी बेटी की डायरी को पढ़ रही थी...जाहिर है उसकी इज़ाज़त से. मेरी पलकें नम थीं...उसकी भाषा, उसकी अभिव्यक्ति, और भाषा पर पकड़...सब कितना अनायास कितना सहज. माँ हूँ, ज़ाहिर है मेरे लिए ये पल ख़ास है...जब उसे पढ़ रही हूँ शब्दों में भी...लोगों को उसे पढ़ते हुए देख रही हूँ...

बहरहाल सुभाष अंकल की रिक्वेस्ट मानकर ख्वाहिश ने अपने नानू को तो खुश किया ही इस बहाने मुझे मेरी ही बेटी के भीतर छुपे कुछ नए अंदाज़ देखने, सुनने का मौका भी मिला. ख्वाहिश ने अपनी लंदन डायरी को प्रिंट करने की इज़ाज़त दे दी है...आज पहली बार प्रतिभा की दुनिया में प्रतिभा की ख्वाहिश का स्वागत करते हुए बहुत खुश हूँ...उसकी लंदन यात्रा के तमाम पन्ने एक सिलसिले की रूप में यहाँ लगातार सहेजती जाऊंगी...

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