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Friday, May 9, 2025

शिक्षा और सम्मान पर तो सबका बराबर हक़ है- संगीता फ़रासी



उत्तराखंड के श्रीनगर शहर की एक ख़ूबसूरत पहाड़ी पर एक स्कूल है, राजकीय प्राथमिक विद्यालय बहड़। इस स्कूल में एक कहानी लिखी जा रही है। लिख रही हैं स्कूल की शिक्षिका संगीता फ़रासी। शिक्षा और सम्मान इस कहानी के मुख्य पात्र हैं। यह कहानी है शहर में भीख माँगकर गुज़ारा करने वालों की बस्ती की। दो वक़्त की रोटी की जुगाड़ को भटकते इस समुदाय की ज़रूरतों में शिक्षा सपना ही रही। फिर इस समुय पर चोरी, पॉकेटमारी जैसे आरोप भी लगे। उनकी चुनौतियों को समझने, और उनका भरोसा हासिल करने की। साथ ही यह कहानी है बच्चों का हा]थ थाम स्कूल तक लाने, उन्हें राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं तक पहुँचाने, और पढ़ने-लिखने में रुचि पैदा करने वाली शिक्षिका और आत्मविश्वास से भरे बच्चों की।

‘‘स्कूल में विविध सामाजिक-आर्थिक रूप से वंचित समूहों (जैसे— प्रवासी समुदाय, निम्न आय वाले परिवार, असहाय परिस्थिति में रहने वाले बच्चे, बाल तस्करी के शिकार, अनाथ, भीख माँगने वाले बच्चे); अलग-अलग सांस्कृतिक-सामाजिक पहचान (जैसे— अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक, महिला व ट्रांसजेंडर); विविध धार्मिक अस्मिताओं; और भाषाई व भौगोलिक पहचान (जैसे— गाँव, क़स्बे, विशेष आवश्यकता वाले); आदि विभिन्न परिवेश से आने वाले हर बच्चे को स्कूल उसकी अपनी प्रिय जगह महसूस हो।” एनसीएफ़एसई 2023


समावेशन को समझने और उसपर काम करने के लिए जिन दो मुख्य बातों की ज़रूरत है, उन दोनों पर संगीता मैडम लगातार काम करने का प्रयास कर रही हैं। पहली बात समावेशन की ज़रूरत को समझना, यानी उन मुद्दों को देख पाना जो बहिष्करण का कारण बनते हैं, समाज में भी और स्कूल में भी। दूसरी बात है प्रक्रिया। समावेशन इतने सहज ढंग से हो कि किसी को कुछ पता ही न चले, और तमाम विविध अस्मिताएँ अपनी पहचान के साथ आपस में घुल-मिलकर रहें। दस बरस पहले जब संगीता मैडम ने इस दिशा में क़दम उठाया था तो उन्हें नहीं पता था कि सफ़र कितना लम्बा चलेगा, कितना बदलाव आएगा। समावेशन के लिए उनके प्रयासों को दो हिस्सों, सामाजिक बदलाव और अकादमिक प्रयास, के रूप में देखा जा सकता है:


सामाजिक बदलाव
सन्दर्भों को समझना: किसी भी समस्या का निवारण जितना ज़रूरी है, उतना ही ज़रूरी है उसके कारणों को समझना। संगीताजी ने यही किया। तब उनके सामने खुली एक ऐसी बस्ती की दुनिया, जहाँ तिरस्कार, शोषण और अन्याय से उपजी ग़रीबी के लिए अभिशप्त लोग भीख माँगकर गुज़ारा करके रहते हैं। मैडम को बात समझ में आई कि जिनके लिए मूल प्रश्न अपना पेट भरने और पहचान का हो, उनसे शिक्षा की बात करने से पहले बहुत कुछ करना होगा। कुछ ऐसा जिससे यह समुदाय अपनी बदहाली के कारणों को समझे और हमपर भरोसा कर सके।

भरोसा जीतना: समुदाय का भरोसा जीतना बहुत चुनौतीपूर्ण था। संगीताजी ने समुदाय की ज़रूरत को समझा और कहा, “आप सबके बच्चे जितना दिनभर में भीख माँगकर कमाते हैं, उतनी आर्थिक मदद आप सबकी करूँगी। आप अपने बच्चों को स्कूल भेजना शुरू करो।” और संगीताजी ने बच्चों के अभिभावकों को राशन देना शुरू किया। यह उन्होंने अपने निजी बजट से किया। यह सब करने से पहले मैडम ने बस्ती में रोज़ जाकर उनकी समस्याओं को सुना, समझा, और कुछ हद तक उन्हें हल करना शुरू किया।
 

नियमितता एक अड़चन: बच्चों का मैडम के पास नियमित आना अभी भी समस्या थी। वे बार-बार भीख माँगने चले जाते थे। कुछ आदत के चलते और कुछ अभिभावकों के दबाव के चलते। इस समस्या पर मैडम ने दो तरह से काम किया। पहला, जिसका बच्चा नियमित स्कूल आएगा उसकी माँ को ‘बेस्ट मॉम अवॉर्ड’ दिया जाएगा। इस अवॉर्ड में राशन और कपड़े भी दिए जाएँगे। यह सब खर्च संगीताजी खुद वहन कर रही थीं। दूसरे, उन्होंने सब इंस्पेक्टर संध्या को अपनी समस्या के बारे में बताया। उपाय के तौर पर सब इंस्पेक्टर संध्या को जब भी बच्चे भीख माँगते दिखते, वे उन्हें प्यार से समझाकर मैडम के पास भेज देतीं।

इन उपायों से बच्चों की नियमितता बढ़ी। ज़ाहिर है, इसका बहुत असर उनके अच्छा पढ़ने-लिखने और अन्य बातें सीखने के अवसरों पर भी पड़ा। बेस्ट मॉम का पहला अवॉर्ड मिला था अंकुल की माँ को। अंकुल अब हाई स्कूल की परीक्षा दे रहा है और बस्ती के बाक़ी बच्चों को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करने के साथ ही उनकी मदद भी करता है।

स्कूल के लिए तैयारी: बच्चों का नियमित आना अभी मैडम के घर तक ही था। यहाँ मैडम बच्चों के साथ कुछ खेल खेलतीं, कहानियाँ सुनातीं, पढ़ने-लिखने के मायने समझातीं। स्कूल जाने का सिलसिला अभी शुरू नहीं हुआ था। स्कूल जाने की तैयारी में उन्हें आपस में व शिक्षकों बात और व्यवहार करना सिखाना। उनके लिए स्कूल ड्रेस, बस्ता, किताबें, जूते, आदि की व्यवस्था की जानी थी। इनमें सामान की व्यवस्था करना अब आसान होने लगी थी क्योंकि शहर के कुछ लोग इस मुहिम में साथ देने आगे आने लगे थे। मुख्य दिक़्क़त थी व्यवहार की, भाषा की। बातचीत में गाली देना सामान्य बात थी क्योंकि बच्चे इसी माहौल में पले-बढ़े थे। बड़ों से कैसे बात करनी होती है नहीं जानते थे। चिंता यह भी थी कि अगर यह सब बदला नहीं तो स्कूल में जो बाकी बच्चे आ रहे हैं, उन्हें और उनके अभिभावकों को परेशानी भी हो सकती है। संगीताजी बताती हैं, “मेरे पास इसके लिए दो ही चीज़ें थीं— एक धैर्य और दूसरा प्रेम। मैं जानती थी इस बदलाव में वक़्त लगेगा। हालाँकि कई बार मैं भी कमज़ोर पड़ जाती थी, लेकिन फ़िर मासूम चेहरे याद आ जाते और मुझे ऊर्जा मिलती।”

 कुछ तो लोग कहेंगे: एक तरफ़ चुनौती थी बच्चों को स्कूल लाना, पढ़ाना, इसके लिए उन्हें तैयार करना, उनके घर वालों की मुश्किलें समझना, समाधान निकालना और भरोसा जीतना। दूसरी तरफ़ चुनौती थी लोगों का यह कहना, “यह तो पागलपन है।” संशय करना, “ज़रूर इनाम लेने के लिए कर रही होंगी, ज़्यादा दिन नहीं करेंगी”; ‘‘घर से पैसे लगाकर कितने दिन कर पाएँगी’’ “इसके पीछे ज़रूर कोई और मंशा होगी”; आदि। ऐसा भी नहीं कि संगीताजी पर इसका कोई असर न पड़ता हो, वो उदास न हुई हों, टूटी न हों, लेकिन उनका साथ दिया उनके परिवार ने। वे मन-ही-मन सोचतीं, “कुछ तो लोग कहेंगे”, और मुस्कुराकर बस्ती की तरफ़ चल पड़तीं...।

बच्चों को नए अनुभव देना: पढ़ना सिर्फ़ स्कूल में नहीं होता है, न सिर्फ़ किताबों से? संगीताजी इस बात को जानती थीं, और उन्होंने बच्चों की ज़िन्दगी में नए अनुभवों को शामिल करना शुरू किया। ऐसे अनुभव जो उनके जीवन में अब तक नहीं थे। मसलन, आसपास की जगहों को देखने जाना, उनके बारे में बच्चों से बातचीत करना, कार में बैठकर घूमना, मेज़-कुर्सी पर बैठकर खाना, टीवी देखना, आदि। ऐसे ही अनुभवों में एक अनुभव था बच्चों को कुछ खिलाने के लिए होटल ले जाना। जिस होटल के दरवाज़े के बाहर से ही भगा दिए जाते हों, वहाँ निडरता से जाना, टेबल पर मिल-बैठकर खाना, पार्टी करना एक नई दुनिया के खुलने जैसा था। वो बताती हैं, “उस दिन मैं बच्चों के साथ एक होटल में थी। तेज़ बारिश हो रही थी। एक बच्चा होटल के शीशे के इस पार से बारिश देख रहा था। एकदम चुप, एकटक। मैंने उससे पूछा, ‘इतने ग़ौर से क्या देख रहे हो?’ उसने भरी-भरी आँखों से मुझे देखा और कहा, “आज आपकी वजह से हम यहाँ हैं। बारिश में जब सारा शहर भीग रहा है, हम नहीं भीग रहे। कोई और दिन होता तो हमें सिर छुपाने के लिए भी कोई यहाँ खड़ा भी नहीं होने देता। हर कोई हमें डाँटकर भगा देता है। लेकिन आज हमें भगाने वाले ख़ुद भीग रहे हैं ।” उस बच्चे की आँखों में क्या था, पता नहीं। लेकिन संगीता मैडम की आँखें आज भी उस घटना के ज़िक्र होने-भर से छलक पड़ती हैं।
 


अकादमिक प्रयास
स्कूल जाने से पहले, स्कूल से आने के बाद: बच्चे संगीताजी से हिल-मिल गए थे, अभिभावक भी उनपर भरोसा करने लगे थे, लेकिन इतना-भर काफ़ी नहीं था। बच्चों की स्कूल जाने की तैयारी भी होनी थी। तो कभी बस्ती में जाकर और कभी बच्चों को घर बुलाकर उनकी पढ़ाई-लिखाई शुरू हुई। इस मुहिम में रेखा और अनिल नाम के युवाओं ने साथ दिया, और शांतिजी ने न सिर्फ दिया, हौसला भी दिया। संगीताजी ने बताया “हम लोग बच्चों को रोज़ थोड़ी देर पढ़ाते थे। कोशिश यह होती कि इस पढ़ाई-लिखाई से उन्हें ऊब न हो। कभी उनकी पसन्द के खेल होते, कभी गाने होते, खाना-पीना होता, लेकिन साथ में होतीं किताबें। कहानियों और कविताओं से बात शुरू होती और अक्षर पहचान व रोज़मर्रा के जीवन में इस्तेमाल होने वाले गणित से जा जुड़ती। बच्चों के लिए यह मज़ेदार था कि किसने किसको कितने धक्के मारे, किसने कितनी रोटी खाईं, यह भी गणित है ।” बच्चों का जीवन बदलने लगा था। स्कूल की यूनिफ़ॉर्म में तैयार बच्चे मैडम द्वारा लगाई गई मोटरगाड़ी में बैठकर स्कूल जाते, दिनभर स्कूल में खेलकूद, पढ़ाई, और वापस मैडम के घर जहाँ मिलता बढ़िया भात। ये सिलसिला बरसों से ऐसे ही चल रहा है। अब भी बच्चे स्कूल के बाद मैडम के घर में देखे जाते हैं, जहाँ खाना खाते हैं, पढ़ाई होती है, खेलते हैं, टीवी देखते हैं। बच्चों के बस्ते मैडम के घर पर ही रहते हैं। यहीं से सुबह फिर बच्चे बस्ते लेकर गाड़ी में बैठकर स्कूल जाते हैं।

इन बच्चों के स्कूल आने से पहले स्कूल में बच्चों की संख्या 11 थी और अब 23 है। लेकिन यहाँ बात नामांकन बढ़ने से आगे की है। बच्चों में कोई भेदभाव नहीं है, अभिभावकों को भी कोई परेशानी नहीं है, सब मिलकर प्रेम से खेलते हैं, पढ़ते हैं।

सन्दर्भ से जोड़कर पढ़ाना: मैडम हर बच्चे को गले लगाती हैं, सिर पर हाथ फेरती हैं, और उनका हौसला बढ़ाती हैं। हाँ, यही है उनकी शिक्षण विधि का पहला हिस्सा। यही है उनका अपनी पेडागोजी के लिए बालमित्र वातावरण बनाना। बच्चे मैडम से अपनापन महसूस करने लगे हैं कि उनके द्वारा सीखने-सिखाने के लिए करवाई जा रही हर गतिविधि में उत्साह से भागीदारी करने लगे हैं।

जब तक बच्चों के सन्दर्भों को नहीं समझेंगे, सीखने-सिखाने के बीच एक दूरी रहेगी ही। इसका एहसास मुझे उस रोज़ स्कूल पहुँचकर हुआ। दो कमरे और एक छोटे से बरामदे वाले स्कूल में बच्चे व्यवस्थित ढंग से अलग-अलग समूहों में पढ़ रहे थे। संगीताजी बच्चों के बीच बैठी हुई थीं। उनके चारों तरफ़ अलग-अलग घेरे थे। ये अलग-अलग दक्षता स्तर के बच्चे थे, और वो सबके साथ, बारी-बारी से काम कर रही थीं। मैंने बच्चों से दोस्ती की, कुछ बच्चे शरमाए, लेकिन जल्दी ही दोस्त बन गए। मैं कक्षा 1 के बच्चों के उस समूह के पास बैठ गई जो अभी वर्णों से शब्द बनाना और शब्दों में वर्ण पहचानना सीख रहे थे। सोचा, जो ये पढ़ रहे हैं उसी के बारे में क्यों न बात की जाए! मैंने पूछा, “अच्छा, ‘ब’ से और क्या-क्या होता है?” बच्चों ने ज़रा भी देर किए बिना बताना शुरू किया... बारिश, बकरी, बेकार, बकबक, बदबू, बेर। फिर ‘क’ से कबूतर कहीं जा उड़ा, और जो शब्द आए वो थे... कूड़ा, कचरा, काना, कल्लू, कचूमर, कद्दू। बच्चों को उनके सन्दर्भ से जोड़कर पढ़ाया जाना ज़रूरी है, यह सन्दर्भ यहाँ ठीक-ठीक खुल रहा था। फिर कुछ देर गणित के मौखिक सवालों पर काम किया जिससे बच्चे जोड़-घटाना समझ सके। बाद में बच्चों से पूछा, “तुम्हें खाने में क्या पसन्द है?” बच्चों ने कहा... दाल, चावल, भात, दाल, दाल-भात, खिचड़ी... बस इतना ही।

 टीएलएम का उपयोग और एक दूसरे से सीखना: संगीता मैडम बच्चों के मन को समझने की कोशिश करतीं जिससे उन्हें पढ़ना अच्छा लगे। उन्होंने खेल गतिविधियाँ, खिलौने और साथ में टीएलएम आदि का इस्तेमाल करना शुरू किया। कुछ जोड़ना था, कुछ घटाना था, कुछ शब्दों के खेल खेलने थे, कहानियाँ सुननी थीं, सुनानी थीं और लिखने-पढ़ने की ओर बढ़ना था। प्रोत्साहन का जादू ख़ूब चल रहा था। एक बच्चा कुछ सीखता तो उसे वही बात दूसरे को सिखाने को कहतीं। उन्होंने ऐसे समूह बनाए जिनमें अलग-अलग दक्षता वाले बच्चे भी थे जो एक दूसरे से सीख रहे थे। पढ़ना और लिखना बोझ न लगे, मज़ेदार लगे, इसका पूरा ध्यान उन्होंने रखा। तमाम समस्याओं के बीच अब बच्चों को सहजता से लिखना-पढ़ना आने लगा है।

स्कूल संसाधन और प्रबन्धन सब बच्चों के हवाले: स्कूल में दो कमरे हैं। एक कमरा मिला-जुला रीडिंग रूम व लाइब्रेरी का है जिसमें आयु समूह अनुसार बच्चों के लिए विविध रोचक किताबें हैं। यहाँ बच्चों के पढ़ने के लिए अच्छी बैठक व्यवस्था है। लाइब्रेरी का संचालन बच्चे ही करते हैं। दूसरे कमरे में हिन्दी, अँग्रेज़ी, गणित, ईवीएस, आदि विषयों के तरह-तरह के टीएलएम, प्रोजेक्ट, मॉडल हैं जिन्हें बच्चों ने मैडम के साथ मिलकर बनाया है। बच्चे इनके बारे में विस्तार से बात कर लेते हैं, और बता पाते हैं कि किस प्रोजेक्ट का मतलब क्या है। इस कमरे में एक कम्प्यूटर है जिसका उपयोग बच्चे ही करते हैं। उन्हें पता है किस लिंक पर कौन-सी कहानी मिलेगी, और कहाँ सवालों के बारे में बात होगी। वे पूरे आत्मविश्वास से कम्प्यूटर चलाते हैं, और डेटा के लिए मैडम का फ़ोन ले आते हैं। मैडम का फ़ोन तो जैसे बच्चों का अधिकार क्षेत्र है। मैडम भी ख़ुशी-ख़ुशी अपना फ़ोन उन्हें दे देती हैं। और हाँ, बच्चों की पढ़ाई बाहर बरामदे में होती है क्योंकि वहाँ रोशनी बेहतर है।

इस तरह आपसी समन्वय से यहाँ शिक्षण भी होता है और खेल भी। यही वजह है कि स्कूल के 4 बच्चे राज्य स्तरीय खेलों में प्रतिभाग करने जा रहे हैं। समाज में भले ही तरह-तरह के भेदभाव का व्यवहार हो, लेकिन स्कूल में इसकी कोई जगह नहीं है। सारे बच्चे एक दूसरे के साथ खेलते हैं, पढ़ते हैं और खाते हैं। वे एक दूसरे की सीखने में मदद करते हैं। इसके लिए मैडम ने बच्चों के अलग-अलग समूह बनाए हैं। इनमें सारी अस्मिताओं के बच्चे शामिल हैं। पढ़ाई के समूह खेल के समूहों से अलग हैं। महत्त्वपूर्ण है कि स्कूल के वातावरण में भेदभाव की कोई गुंजाइश ही नहीं। बच्चे कहने से ज़्यादा देख समझकर सीखते हैं, और इसे यहाँ बख़ूबी देखा जा सकता है।

“यहाँ एक बगिया है जिसे बच्चों ने बनाया है”, बताते हुए संगीताजी ने मेरे सामने लाल चाय का गिलास बढ़ा दिया। “इसमें बच्चों के लगाए पेड़ का नींबू है”, कहते हुए मैडम की आँखें मुस्कुरा रही थीं, और सामने मुस्कुरा रहा था बच्चों के हाथों से रोपा और सहेजा गया नींबू का पेड़।



हर बच्चे का सम्मान है: ‘ये बच्चे’, ‘इनके घर वाले’, ‘इनसे’, ‘ये लोग’ जैसे सम्बोधन बच्चों या उनके घरवालों के लिए करना ठीक नहीं। बच्चे कहते कुछ नहीं, लेकिन सुनते तो हैं, और उन्हें इस बात का बुरा भी लगता है। इस तरह के सम्बोधन उन्हें अलग तरह से श्रेणीबद्ध करते हैं। संगीताजी इस तरह के सम्बोधनों का न तो ख़ुद उपयोग करती हैं न किसी को करने देती हैं। बच्चों के सम्मान में ज़रा-सी भी कमी उन्हें एकदम सहन नहीं।

पढ़ने-लिखने में अलग से सहयोग: पढ़ने-लिखने का सफ़र भी आसान नहीं रहा। लेकिन ये बच्चे किसी से कम नहीं हैं यह बात समझना भी ज़रूरी था। मैंने लोगों के साथ मिलकर बच्चों को अलग से पढ़ाना शुरू किया। इस पहल ने ब्रिजिंग का काम किया। धीरे-धीरे बच्चों का सीखना गति पकड़ने लगा। जब कोविड आया तो लगा अब यह सिलसिला टूट जाएगा। लेकिन भरोसे की हिम्मत से कोविड में भी सारे नियमों का पालन करते हुए बच्चों का पढ़ना-लिखना जारी रहा।

जो शहर बहुत कुछ कहता था: संगीताजी कहती हैं, “शहर जो मेरे काम को एक पागलपन का नाम दिया करता था, या कुछ को लगता था कि ये सब ज़्यादा दिन नहीं चलेगा, या मैं यह सब वाहवाही लेने या पुरस्कार पाने के उद्देश्य से कर रही हूँ, लेकिन धीरे-धीरे इन सारी ग़लतफ़हमियों से पर्दा हटता गया, और जो लोग सन्देह करते थे अब साथ देने लगे हैं। बच्चों ने मुझे इतना प्यार दिया है, मुझ पर इतना भरोसा किया है कि मेरी आँखें भीग जाती हैं। एक बार मैं बीमार पड़ी, स्कूल नहीं जा सकी तो स्कूल के बाद बच्चों ने मेरा खूब ध्यान रखा। कोई जूस निकालकर ला रहा था, कोई फल काटकर खिला रहा था, और कोई मेरे लिए चाय बना रहा था।” लोगों के मन में सवाल आ सकता है कि अपने पास से पैसे खर्च करके, अपना समय और ऊर्जा लगाकर कोई क्यों काम करेगा भला लेकिन मुझे जो संतुष्टि मिलती है बच्चों को पढ़ते देख वो बेशकीमती है। मेरे लिए यह आसान नहीं होता अगर मेरा परिवार मेरा साथ न देता। साथ देते हैं स्कूल के बाकी साथी भी। प्रिंसिपल ललित मोहन बिष्ट कहते हैं, ‘मैडम बहुत अच्छा काम कर रही हैं। मैं जितना संभव हो उनके प्रयासों में साथ देने का प्रयास करता हूँ’।

 


कुछ अफ़सोस, कुछ उम्मीद: सब ठीक चल रहा है, लेकिन अभी बहुत कुछ ठीक होना बाक़ी है। आसपास के स्कूल इन बच्चों को अपने यहाँ दाख़िला नहीं देते। अभी और बच्चे हैं जिनका स्कूल जाना बाक़ी है। टुकड़ों में मदद करना या प्रशंसा करना अलग बात है, लेकिन बच्चों को दिल से अपनाना ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है। उसमें अभी कमी है। मेरे पास बच्चे पाँचवीं तक ही तो पढ़ सकते हैं, लेकिन उनका सफ़र तो लम्बा है। सबको यह बात समझना ज़रूरी है कि शिक्षा उनका अधिकार है। मुझे बहुत अफ़सोस है कि मेरे स्कूल का एक बच्चा, अंकुल, किसी और स्कूल में दाख़िला न मिलने के कारण दसवीं की प्राइवेट परीक्षा दे रहा है, जबकि उसे किसी भी स्कूल में दाख़िला मिलना चाहिए था।

मैं चाहती हूँ कि अंकुल की पढ़ाई पूरी हो, उसे नौकरी मिले जिससे इस समुदाय को भरोसा हो कि इस दुनिया में उनका भी उतना ही हिस्सा है जितना बाक़ी सबका। सम्मान की रोटी कोई ख़्वाब नहीं है। अभी तो शुरुआत है, यह सफ़र अभी लम्बा है...

“शिक्षा, सामाजिक न्याय और समानता प्राप्त करने का एकमात्र और सबसे प्रभावी साधन है। समतामूलक और समावेशी शिक्षा न सिर्फ़ स्वयं में एक आवश्यक लक्ष्य है बल्कि समतामूलक और समावेशी समाज निर्माण के लिए भी अनिवार्य क़दम है, जिसमें प्रत्येक नागरिक को सपने सँजोने, विकास करने, और राष्ट्र हित में योगदान करने का अवसर उपलब्ध हो।”

— नई शिक्षा नीति 2020

“संगीता फ़रासी एक मेहनती अध्यापिका हैं। उन्होंने जिस तरह अभिभावकों को विश्वास में लेकर बच्चों को मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया है वो वस्तुतः किसी संस्था के पूर्णकालिक काम के समान कहा जा सकता है। बच्चों के लिए अपने संसाधनों से स्कूल आने-जाने की व्यवस्था सुनिश्चित करना, और शाम को अपने घर पर उन्हें पढ़ाना प्रेरणा देता है। बस्ती के परिवारों से उन्होंने जो आत्मिक रिश्ता बनाया है, उनका भरोसा जीता है वो अपने-आप में विशेष है।” — अश्विनी रावत, खण्ड शिक्षा अधिकारी खिर्सू, ज़िला पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड

“संगीता मैडम ने एक मिसाल क़ायम की है। जो बच्चे पहले इधर-उधर भटकते थे अब वो स्कूल जाते हैं, पढ़ते हैं, कितना सुन्दर है ये!”

— संध्या नेगी, सब इंस्पेक्टर महिला थाना, श्रीनगर, उत्तराखंड

(प्रतिभा कटियार 14 वर्ष हिन्दी प्रिंट मीडिया में पत्रकारिता करने के बाद अज़ीम प्रेमजी फ़ाउण्डेशन के साथ जुड़कर काम कर रही हैं। इनकी 4 पुस्तकें प्रकाशित हैं और दो कहानियों पर लघु फ़िल्मों का निर्माण हुआ है। अंडमान पर लिखा यात्रा संस्मरण और कविता ओ अच्छी लड़कियो कर्नाटका के रानी चेनम्मा विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में शामिल है। इनकी कविताओं का गुजराती, मराठी और अँग्रेज़ी में अनुवाद हुआ है।)

सम्पर्क: pratibha.katiyar@azimpremjifoundation.org

Thursday, September 30, 2021

वैक्सीनेशन की प्रक्रिया में हमारी भूमिका


-प्रतिभा कटियार
अगर किसी व्यक्ति या चीज़ या काम के बारे में कोई राय बन गयी तो उस राय का बदलना आसान नहीं होता. जब हमने (अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन) एक टीम के तौर पर वैक्सीनेशन की प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए स्वास्थ्य कर्मियों के साथ मिलकर उनका साथ देना शुरू किया तो उस दौरान ऐसी ही पूर्व निर्मित धारणाओं से सामना हुआ. जैसे कुछ सामाजिक मान्यताएं पहले से पकड़ बनाये हुए मिलीं. ‘फलाने लोग तो होते ही ऐसे हैं. उन लोगों से बात करने का कोई फायदा नहीं. फलां जाति के लोग वैक्सीन लगाने के लिए राजी ही नहीं होते. फलां समुदाय के लोग तो ऐसे ही हैं, उन्हें कितना भी समझा लो सुनते ही नहीं.’

भारतीय समाज में कुछ समुदायों, जातियों, लोगों के प्रति इस तरह की धारणाओं का होना कोई नयी बात नहीं है. इन्हीं धारणाओं के बीच हम पले-बढ़े हैं. जाने-अनजाने इन्हीं धारणाओं की गिरफ्त में जकड़े हुए भी हैं. यह भी सच है कि जब हम पूर्वनिर्मित किसी धारणा के साथ कोई काम करते हैं तब नतीजे ज्यादातर धारणाओं को पोषित करने वाले आ सकते हैं. क्योंकि वो फलां व्यक्ति या समुदाय भी जानता है कि उसके बारे में कौन क्या सोचता है और वो अपने बारे में बनी धारणाओं को लेकर बेपरवाह और कभी-कभी गुस्सैल भी होने लगता है.

लेकिन अगर सच में इन फलां समुदायों, जातियों, व्यक्तियों के बारे में जानना है तो सिर्फ दो काम करने की जरूरत है. सबसे पहले अपनी पूर्व निर्मित और जड़ जमाए हुई मान्यताओं को तोड़ना होगा. दूसरा उन लोगों, समुदायों, व्यक्तियों के साथ समय बिताना होगा जिनके बारे में मान्यताएं फैली हुई हैं. यक़ीन मानिए इसके अलावा तीसरा कोई तरीका है ही नहीं हक़ीकत तक पहुँचने का.

वैक्सीनेशन के दौरान जब हमने स्वास्थ्य कर्मियों के साथ मिलकर काम करना शुरू किया तो ऐसी जड़ पकड़ी हुई मान्यताओं से टकराने का अवसर भी मिला. पहली दूसरी और तीसरी मुलाकातों में हमें यह यकीन दिला दिया गया था कि ये जो कुछ जातियां, समुदाय, लोग हैं ये बहुत पिछड़े हुए हैं, गुस्सैल हैं, और किसी भी तरह वैक्सीनेशन के लिए राजी नहीं हो रहे. हमने जब बिना किसी पूर्व धारणा या मान्यता पर ध्यान दिए उन फलां जातियों, समुदायों और व्यक्तियों से मिलना शुरू किया तो हक़ीकत को सामने आते जरा भी देर नहीं लगी. देहरादून की जिन बस्तियों, गांवों में हमने लोगों से मुलाकातें कीं उनमें शायद ही कोई ऐसा मिला हो जो वैक्सीन न लगवाना चाहता हो. जो लोग वैक्सीन लगवाने से हिचक रहे थे उनके कुछ कारण थे जो वैक्सीन को लेकर बनी भ्रांतियों के चलते थे जिस पर उनसे बात करने की जरूरत थी. हमने महसूस किया कि जब लोग आप पर भरोसा करते हैं तब वो आपकी बात मानने को भी तैयार हो जाते हैं.

इस दौरान कुछ एक ऐसी बस्तियों और गांवों में जाना हुआ जहाँ के बारे में सुना था कि पूरा गाँव ही वैक्सीन लगाने का विरोध करता है. और ये लोग काफी गुस्सैल हैं, मारपीट भी कर सकते हैं. वो लगातार गिरती बारिश वाला दिन था. हम जब उस गाँव में जा रहे थे. हमारे साथ पीएचसी के डाक्टर भी थे और आशा भी थीं. उन्होंने बताया कि एक बार यहाँ वैक्सीन लगाने के बाद एक व्यक्ति की तबियत ख़राब हो गयी थी इसलिए अब पूरी बस्ती वैक्सीन नहीं लगवाना चाहती.

हम सब तेज बारिश में अपने अपने छातों में खुद को बचाते हुए टपकते छप्पर के भीतर से झांकते एक बुजुर्ग से मिले. उन्होंने सच में वैक्सीन लगाने से मना कर दिया और कहा कि उनकी तबियत खराब है. उन्होंने दवाइयों का थैला दिखाते हुए कहा, ‘ये देखो ये दवाइयां खा रहा हूँ. ये हार्ट अटैक की दवाई है.’ फिर उनसे कुछ देर बात होती रही. घर परिवार की, सेहत की. उन्हें यक़ीन दिलाया कि यह वैक्सीन लगाने से कोरोना से बचाव होगा न कि तबियत खराब होगी. वो ना-नुकुर करते रहे लेकिन उनकी ‘न’ पिघल रही थी यह हमने महसूस किया. आखिर उन्होंने मुस्कुराकर कहा, ‘अच्छा लो, लगा लो.’ उनकी इस सहमति का असर यह हुआ कि उस समुदाय के अन्य लोगों ने भी धीरे-धीरे वैक्सीन को लेकर जो डर था उसे पीछे छोड़ा. निश्चित तौर पर इस सबमें हमारी आशा वर्कर्स की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है.

एक और अनुभव याद आता है जब एक समुदाय की महिला ने यह कहकर वैक्सीन लगाने से मना किया, ‘कि वो दूध पिलाती है’ हमारी साथी ने अपना उदाहरण देकर जब कहा ‘मैं भी तो पिलाती हूँ बच्चे को दूध और मैंने तो लगाया है वैक्सीन.’ तो उस महिला ने आश्चर्य और भरोसे वाली मिलीजुली नजर से उसे देखा और वैक्सीन लगाने को तैयार हो गयी. एक और बस्ती के बारे में हमें बताया गया था कि वहां के लोग एकदम तैयार नहीं वैक्सीन लगाने को लेकिन जब हमने वहां घर-घर में जाकर लोगों से बात की तो हक़ीकत कुछ और थी. या तो उन्हें पता नहीं चल पाता कि वैक्सीन कब लग रही है, कौन सी डोज़ लग रही है या वो काम पर गए हुए थे, या वैक्सीन लगने के समय वो बाहर गये थे लेकिन अब अपनी बारी आने का इंतजार कर रहे हैं.

जमीनी सच्चाई यह है कि वैक्सीन लगाने को लेकर लोगों के मन में नकारात्मकता नहीं है. अगर कहीं है बहुत छोटे हिस्से में तो उसके उनके पास कुछ कारण हैं. जो संवाद के जरिये दूर हो सकते हैं. हमारे सवास्थकर्मी बहुत मेहनत और प्रतिबद्धता के साथ वैक्सीनेशन के काम में जुटे हुए हैं. लेकिन कुछ काम हमारे हिस्से भी है. वैक्सीनेशन को लेकर सकारात्मक संवाद बनाने का काम. आसपास जो भी लोग हैं, खासकर छोटे कामगार लोग, घर में काम करने वाली हेल्पर हों, ड्राइवर हों, सब्जी बेचने वाले, दूध बेचने वाले, फेरीवाले उनसे जरूर पूछें कि वैक्सीन लगी या नहीं. और अगर उनके मन में कोई वहम है, कोई हिचक है तो उसे दूर करें, उन्हें मार्गदर्शन दें कि वो कब और कहाँ वैक्सीन लगा सकते हैं. और हाँ, अगर उन्हें एक दो दिन की छुट्टी लेनी पड़े बुखार आदि आने के कारण तो भी उनकी मदद करें.

यह राष्ट्रव्यापी काम है जिसमें सबके सहयोग की जरूरत है. बस अपने हिस्से की भूमिका तलाशने भर की देर है.

Wednesday, September 29, 2021

बिना संवेदना की शिक्षा के क्या अर्थ


- प्रतिभा कटियार

पिछले दिनों मैंने एक फिल्म देखी ‘इन्सेप्शन’. फिल्म लगातार मेरे ज़ेहन में चल रही है. कैसे किसी के अवचेतन में चुपके से इंट्री लेकर कोई विचार रोपा जा सकता है. फिर वह व्यक्ति वही करेगा वही सोचेगा जो उसके अवचेतन में रोप दिया गया है. और उस करने और सोचने को लेकर जिद भी करेगा, उसके लिए लड़ेगा भी. क्योंकि चेतन में वो यही समझता है कि यह उसका ही विचार है, उसका ही व्यवहार.

फिल्म के निर्देशक क्रिस्टोफर नोलन ने क्या कमाल की फिल्म बनाई. जो बात मुझे हमेशा से लगती है कि हम नहीं जानते कि ‘हम नहीं जानते’ यह स्थिति सबसे मुश्किल होती है. क्योंकि इसमें बेहतर होने की, खुद को पलटकर देखने की संभावना कम से कमतर होती है. और जहाँ खुद को देखने की संभावना नहीं होती वहां बेहतर होने की, ग्रो करने की समझ को विकसित करने की संभावना भी कम ही होती है.

समाज की जो संरचना है उसमें इसके मजबूत तार हैं. फलां समुदाय ऐसा ही होता है. फलां वर्ग को ऐसा ही करना चाहिए. अच्छे बच्चे ऐसे होते हैं. अच्छे लोग वैसे होते हैं. नैतिकता, संस्कार, परम्पराएँ, मान्यताएं ये सब सदियों से हमारे अवचेतन में सेंध लगाकर हमारे व्यवहार को नियंत्रित कर रहे हैं. और हम ख़ुशी-ख़ुशी हो भी रहे हैं. क्योंकि हम जानते ही नहीं कि जिसे अपनी बात समझकर हम लड़ने-भिड़ने, हिंसक तक होने को व्याकुल हो उठ रहे हैं वो असल में हमारा है ही नहीं.

शिक्षा का यह काम होना था कि उसे इन बेवजह के लबादों से मुक्त होना सिखाना था. अपने खुद को खोजना शुरू करना सिखाना था. बने बनाये रास्तों पर चलना सिखाने की बजाय सिखाना था नए रास्ते खोजना. बताई हुई, सिखाई हुई बातों को सीधे-सीधे मान लेने की बजाय उन्हें खुद परखकर देखना सिखाना था. लेकिन हम हिंदी अंग्रेजी गणित सिखाने और सीखने की रेस में दौड़ पड़े. यह इसी रेस का नतीजा है शायद कि वाट्स्प यूनिवर्सिटी ने अच्छी-अच्छी यूनिवर्सिटी से अच्छे नम्बर लेकर पढ़े लोगों को अपनी गिरफ्त में ले लिया है. कैसे पढ़े-लिखे लोगों की भीड़ किसी निहत्थे, कमजोर व्यक्ति को घेरकर क्रूरता से मार देती है. फिर बहुत सारे पढ़े-लिखे लोग उस घटना को देखते हुए सुनते हुए उसे ठीक भी ठहराते हैं. यह हमारे दिमाग में घुसकर किसी खास वर्ग, समुदाय के प्रति रोपी गयी नफरत का नतीजा है. हमारे जन्म से पहले ही हमारा व्यवहार, हमारी प्रतिक्रियाएं, ख़ुशी, गुस्सा, नफरत तय करने वाला समाज हमें कठपुतली की तरह नचाता है, नचा रहा है और हम नाच रहे हैं.

कोई जज जब किसी खास वर्ग के प्रति अटपटे फैसले सुनाता है, कोई नेता जब बेहूदा हिंसक बयान देते हैं तब मूल सवाल शिक्षा पर उठता है. क्योंकि हैं तो ये सब शिक्षित ही. यानी शिक्षा ने वो किया ही नहीं जो उसका मूल उद्देश्य था. बेहतर संवेदनशील मनुष्य बनाना.

तो क्या शिक्षक समुदाय इस बात को समझ पाए? क्या वो खुद को तमाम पूर्वाग्रहों से मुक्त कर पाए? क्या वो खुद यह देख या समझ भी पाए कि उनके भी पूर्वाग्रह हैं कुछ. और अगर वो उन पूर्वाग्रहों के साथ कक्षा में जा रहे हैं, बच्चों से संवाद कर रहे हैं तो यकीनन वो सारे पूर्वाग्रह, मान्यताएं, व्यवहार बच्चों को सौंप रहे हैं. नतीजतन पीढ़ी दर पीढ़ी सामजिक विभेद, हिंसा, नफरत अवचेतन में ट्रांसफर हो रहे हैं. कक्षा में बच्चे गणित के सवाल ठीक से लगाना तो सीख ले रहे हैं लेकिन उनके मन में अपने गुरु जी को देखकर किसी खास समुदाय, वर्ग के प्रति उफनाती नफरत भी जगह बना रही है. यह घर में भी हो रहा है लेकिन स्कूल में ऐसा होना ज्यादा खतरनाक है. क्योंकि स्कूल वह जगह है जहाँ इन तमाम मान्यताओं की दीवार को ढह जाना होता है. समाज की हर समस्या की जड़ में शिक्षा ही नजर आती है. वह शिक्षा जो हमें एक-दूसरे के व्यवहार से मिलती है. अगर हम खुद संवेदनशील नहीं हैं तो अपने आसपास के तमाम लोगों को वैसा ही बनाने में किसी न किसी रूप में कोई न कोई भूमिका निभा ही रहे हैं.

शिक्षा के दस्तावेज (चाहे एनसीएफ़ 2005 हो या नयी शिक्षा नीति) तो मानवीय सरोकारों की पैरोकारी कर रहे हैं लेकिन उसे अभी स्कूलों में ठीक तरह से आना बाकी है. और सिर्फ प्रारम्भिक शिक्षा ही क्यों उच्च शिक्षा में भी इसका शामिल होना जरूरी है. लेकिन सबसे ज्यादा जरूरी है व्यक्ति के तौर पर हमें शिक्षा के इस मूल मूल्य को समझना कि इसके बिना सब अधूरा ही है, अधूरा ही रहेगा. क्या होगा उन 100 में से 100 नम्बरों का जिसके सीने में अपने पड़ोसी की मुश्किल में आँख न नम हो, मदद को दौड़ पड़ने की व्याकुलता न हो. किसी भी समाज का मुख्य संस्कार है संवेदना. इन्सान को इन्सान समझना. वही नहीं तो क्या होगा डिग्रियों के ढेर से. अच्छी नौकरी तो मिल जाएगी. ऐशो आराम के साधन भी जुटा लेंगे लेकिन वो जो हर वक़्त डर-डर के जीना है, अपने बच्चों की सुरक्षा का सवाल है, बेटियों के वक़्त पर घर न लौटने पर बढ़ती हुई धड़कनें हैं, चारों तरफ से आती चीखो-पुकार है उसका क्या? अगर हमें एक शांत, खूबसूरत, सुरक्षित समाज चाहिए तो संवेदना के सूत्र को किसी मन्त्र की तरह आत्मसात करना होगा.

ये जो हमारे अवचेतन पर कब्जा करके हमारे सपनों को, हमारे व्यवहार तक को हाइजैक कर लिया गया है सदियों सदियों से उस चक्र से अब बाहर तो निकलना ही होगा. 

Monday, April 27, 2020

पढ़ने की आदत से क्या होता है



- मोनिका भंडारी

दैनिक जीवन मे पढ़ने लिखने की आदत निजी और पेशेवर तौर पर आज की टेली कान्फ्रेंस की बातचीत इसी पर आधारित थी और इस बातचीत को हमारे बीच रखने के लिए दो उम्दा शख्सियतें आई थी. प्रतिभा कटियार जी और रेखा चमोली जी. बातचीत की शुरुआत अशोक जी ने की तथा आज की बातचीत का संदर्भ रखा. इसके बाद श्वेता जी ने दोनों लेखिकाओं का स्वागत किया. श्वेता ने कहा कि पढ़े लिखे शिक्षक होने के साथ साथ पढ़ते लिखते शिक्षक होना जरूरी है. इसके बाद दोनों लेखिकाओं के परिचय के लिए जाने माने साहित्यकार एवं शिक्षक मनोहर चमोली मनु को आमंत्रित किया गया. मनु सर ने प्रतिभा जी का परिचय देते हुए बताया कि ये गंगा जमुनी संस्कृति को जीने वाली लेखिका हैं. वर्तमान में अजीम प्रेमजी फाउंडेशन से जुड़ी हुई हैं. ये हिंदी, इंग्लिश दोनों भाषाओं की कलम कार हैं. ये डायरी, ब्लॉग लिखती हैं तथा संपादन भी करती हैं. ये विचारवान हैं तथा दुनिया को संवारना चाहती हैं.
वहीं रेखा जी का परिचय देते हुए मनु सर ने कहा कि वे कर्णप्रयाग में जन्मी हैं तथा इनकी लेखनी मे मिट्टी, पानी, पहाड़ का यथार्थ झलकता है. ये वर्तमान में नौनिहालों के बीच उत्तरकाशी मे बहुत बढ़िया काम कर रही हैं.
परिचय को समेटते हुए मनु सर ने कहा कि दोनों ही अपने क्षेत्र में संवैधानिक मूल्यों के साथ खड़ी हैं बराबरी और समानता के सपने बुनती हैं और साकार करना चाहती हैं.
परिचय सत्र के बाद प्रतिभा जी सबसे मुखातिब हुईं. लगभग 92 लोग इस कॉन्फ्रेंस मे शामिल थे.4:30 बजे से शुरू हुई ये बातचीत अब प्रतिभा जी आगे बढ़ा रही थी. प्रतिभा जी ने अपनी बातचीत आज के चुनौती पूर्ण समय को लेकर शुरु की. उन्होंने कहा कि आज के लॉक डाउन के समय में पढ़ने लिखने पर बातचीत करना एक अच्छा विषय है. लेकिन वो कहती हैं की पढ़ने लिखने की बातचीत अलग से क्यों की जाए? यह तो हमारे जीवन का हिस्सा होना चाहिए. सबसे जरूरी है कि हम क्या और कैसे पढ़ते हैं? उन्होंने कहा कि आजकल उन्होंने फिर से पहले पढ़ी हुई किताबें पढ़ी हैं और हर बार उन्हे पिछली बार से अलग लगता है अपना पढ़ा हुआ. उनका मानना था कि पढ़ने से हर बार कुछ नया महसूस होता है. प्रतिभा बड़ी गहरी बात कहती हैं कि पढ़ना हर बार खुद को जानने और तराशने जैसा है. प्रतिभा की विशेषता है कि वो बहुत गहरी बात भी सहजता से कह जाती हैं. कहती हैं कि हर शब्द की एक अलग यात्रा है. उन्होंने जोड़ा कि आजकल मदद, परोपकार, संवेदना जैसे शब्द प्रचलन मे बहुत हैं लेकिन इसका अर्थ सिर्फ एक हाथ देने वाला तथा एक हाथ लेने वाला सा लगता है. यह सिर्फ आर्थिक मसला नही है, क्यों नहीं हम उनके साथ खड़े हो जाते? प्रतिभा कहती हैं ये संवेदना भी साहित्य पढ़ने से आती है. साहित्य हमें बदलना सिखाता है. पाठक के तौर पर साहित्य हमे समृद्ध करता है. प्रतिभा का मन प्रकृति मे भी रमता है जब हम उनको पढ़ते हैं तो हम महसूस कर सकते हैं कि वो प्रकृति के बहुत करीब हैं. नदी, बारिश, पेड़, सब उनके दिल से होकर गुजरता है. वे कहती हैं कि हमारे अंदर जो नदी है साहित्य उसे सूखने नहीं देता. कहती हैं साहित्य और प्रकृति कभी भेद nhi करती. शिक्षा मे भी भेद नहीं होने चाहिए. उन्होंने लाल बहादुर वर्मा जी का जिक्र करते हुए कहा कि उनकी एक बात उन्हे बड़ी अच्छी लगी कि धरती उन शिक्षकों को ज्यादा प्यार करती है. जो धरती से प्यार करते हैं क्योंकि जो बच्चे इन शिक्षकों के बीच से होकर गुजरेंगे वो सही मायनों मे मनुष्य होंगे.
साहित्य पढ़ने की आदत कैसे हो इस बात पर प्रतिभा जी ने कहा कि आजकल कई लोगों को फेसबुक और whatsaap पर पढ़ना पसंद होता है लेकिन वो कहती हैं कि ये पसंद का क्षेत्र होता है. कुछ और कहीं पढ़ने मे मजा आता है कहीं नहीं भी आता.ये चस्का लगने जैसा है कहती हैं मुझे विरासत मे अपने पापा से पढ़ना लिखना मिला है और कई लोग हैं जिनको पढ़ने की आदत मे शामिल करने के लिए हाथ बढ़ाने की जरुरत है. उन्होंने अपना अनुभव बताया कि उनके पापा किताबें घर पे लाया करते थे. कोई रूसी किताब और पिता के पत्र पुत्री के नाम जैसी किताबें बचपन में पढ़ ली थी और उनके पिता उन किताबों पर बातचीत किया करते थे. वो मानती हैं कि यही बात जरूरी है कि बच्चों के साथ बातचीत करें, सवाल जवाब करें.पढ़ने के बाद यदि बच्चे हमें कहीं पर गलत साबित करते हैं तो ये बहुत अच्छा है. वो कहती हैं कि किताबों से प्यार करना जरूरी है. उनको साहित्य से प्यार था और आज तक चल रहा है.
वो ये भी कहती हैं कि किताबें हमें बदलती है. साहित्य हमें नजरिया देता है. चित्रलेखा किताब का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि ये सबको पढ़नी चाहिए. यदि हम किसी चीज को नहीं मानते तो उसको ना मानने के जो कारण हैं उसको जानने के लिए हमें और ज्यादा उसे पढ़ना पड़ेगा.उन्होंने उन शिक्षकों के बारे मे भी बात की जो अपनी कक्षाओं मे साहित्य के साथ शिक्षण कर रहे हैं. और बच्चों को प्यार के साथ सिखा रहे हैं. यहीं पर प्रतिभा जी ने अपनी बात समाप्त की और रेखा जी को अपनी बात रखने के लिए कहा.

रेखा जी ने अपनी बात शुरु करते हुए कहा कि प्रतिभा को सुनना किसी लंबी "प्रेम कविता "को सुनने जैसा है. उन्होंने अपनी चिर परिचित अंदाज में संवाद से जुड़ने के लिए सबका शुक्रिया अदा किया और कहा कि उन्हे प्रतिभा की बातों से सहमति है.. रेखा जी ने कहा कि एक शिक्षिका होने के नाते मै शिक्षकों के पढ़ने लिखने की बातें करूँगी.रेखा जी भी बहुत सहज शब्दों मे अपनी बातें रखती हैं जो कि हमें अक्सर अपने दिल के करीब लगता है. उन्होंने कहा कि जैसे किसी दुकान या व्यवसाय को सजाने सँवारने के लिए कुछ टूल्स की जरूरत होती है उसी तरह कक्षा शिक्षण मे भी नई चीजें, आनी चाहिए जैसे किताबें, साहित्य, जो कुछ भी देश, दुनिया मे लिखा या बुना गया है उसे बच्चों के बीच मे आना जरुरी है. वो कहती हैं कि मैं किसी विषय विशेष की नहीं बल्कि व्यापक रूप से इस बात को देखती हूँ. बच्चा हमारे पास आता है और कुछ समय बाद जब वो जाता है उस पूरी प्रकिया मे उसके बीच हम क्या करते हैं ये जरुरी है.रेखा बच्चों के साथ बहुत शिद्दत से जुड़ी हुई हैं उनकी छोटी सी बात को भी महसूस करती हैं. उन्होंने कहा कि जिस शिक्षक ने तोतोचान पढ़ी होगी, यदि उसकी कक्षा मे कोई ऐसा अलग सा बच्चा आता है तो वो उसको शरारती और बिगड़ा हुआ घोषित करने से पहले रुककर सोचेगा कि ये बच्चा क्या कहना चाहता है?. इसी तरह जिसने पहला अध्यापक पढ़ी है वो खुद से सवाल करना सीखता है. वो सीखता है कि क्या नये तरीके हैं सीखने और सिखाने के? वो सहजता से कहती जाती हैं कि जरुरी नही कि 100 लोगों द्वारा किया जाने वाला काम सही है और 10 लोगों द्वारा किया जाने वाला गलत.
कहती हैं कि आज की शिक्षा प्रणाली सही नही है कहीं ना कहीं इसमें गड़बड़ है वरना आज हम ऐसी दुनिया ना तैयार कर रहे होते. साहित्य के बारे मे उनका कहना था कि कोई शिक्षक जब पढ़ता है तो वह सवाल करना सीखता है. पढ़ना सीधे हाँ या ना को नही उसके बीच की तमाम बातों को जगह देता है. फेसबुक और सोशल मीडिया की सामग्री को एकदम से आत्मसात करने पर उन्होंने असहमति जातायी. कहा कि इस तरह की सामग्री पर सोच समझ कर विश्वास करने की जरुरत है.. वो कहती हैं की यदि हम पढ़ते लिखते शिक्षक होंगे तो कक्षा मे हमारा नजरिया बिल्कुल अलग होगा. हम चीजों, लोगों और घटनाओं को लेकर पूर्वाग्रहों से ग्रसित नहीं होंगे.
अपनी बेबाक शैली मे उन्होंने अपने अनुभव भी सुनाए. अपनी 9 वी कक्षा में पढ़ी गयी किताब अपने अपने राम का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि किसी किताब की कहानी, पात्र, कथानक का प्रभाव आपको बदल देता है. और आप पूर्वाग्रहों से मुक्त हो जाते हैं. कोई आपके बारे मे क्या सोचता है फिर आपको कोई फर्क नहीं पड़ता. आप खुद पर भरोसा करने लगते हैं. कुल मिलाकर आप एक स्वतंत्र व्यक्तित्व वाले शिक्षक बन जाते हैं. यह बात मुझे भी महत्वपूर्ण लगी. बात आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि हमारे बच्चों को पढ़ने की सामग्री और अवसर कम मिलते हैं. घरों में कोई ऐसी छपी हुई सामग्री नहीं होती जिसे वो पढ़ सकें. ऐसे में हमारी और जिम्मेदारी बन जाती है कि बच्चों को पढ़ने लिखने से जोड़ा जाए. हमें ऐसा माहौल बनाना होता है कि बच्चे खुद पढ़ने लग जाएं. बच्चों के साथ चित्र, चित्रकथा अनुभव खेल पर बात करना जरुरी है.
एक अनुभव सुनाते हुए कहा कि एक बच्ची चीनी के लिए दस रुपए ले कर आई है पर वो चुप है कि पैसे लाने पर डांट ना पड़े. लेकिन जब उससे इस बारे मे बात की तो उसे महसूस हुआ कि उसकी दस रुपए की चीनी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी किसी और की. कविता छह साल की छोकरी पर भी उन्होंने अपनी बात रखी. बोली कि बच्चों को चयन का अधिकार होना चाहिए. बच्चों को स्वतन्त्र छोड़ना जरुरी है लेकिन पहले उनसे बात करना जरूरी है. फिर वे चीजों को अपना समझते हैं और तोड़ फोड़ नहीं करते. पढ़ने के बाद प्रस्तुतिकरण भी जरूरी है. बच्चों ने क्या पढ़ा कितना पढ़ा उसे अपने साथियों से साझा करना भी जरूरी है. पढ़ने की खुशी बच्चे बांटना चाहते हैं और ये टीचर के लिए प्रेरणा हो सकते हैं. इसके बाद रेखा जी ने दीवार पत्रिका पर भी बात की. कहा कि विषय का चयन चित्र बनाना लिखना यदि बच्चे सीख गए तो बड़ी बात है. अंत मे उन्होंने अपनी बात को समेटा और कहा कि शिक्षक के काम मे निरंतरता जरूरी है.रेखा जी की बात समाप्त होने के बाद सवाल जवाब का दौर शुरू हुआ.
शिक्षक साथियों की तरफ से आये सवालों को मुदित जी ने रखा. एक प्रश्न था कि बच्चों मे पढ़ने की आदत कैसे डालें? जवाब मे रेखा जी ने कहा कि यदि हमारे घर मे खूब सारी किताबें हैं तो बच्चों को उनके साथ जोड़ा जा सकता है. उनसे बात करके किताबों के कुछ पन्ने पढ़के किताब के प्रति रुचि जगाई जा सकती है.
दूसरा प्रश्न था कि एक ही तरह का साहित्य पढ़ना सही है या नहीँ ? उत्तर था कि नही हमे अलग अलग तरह का साहित्य पढ़ना जरुरी है. प्रतिभा जी ने कहा कि हमें एक ही विचार का साहित्य ना पढ़कर बहुत तरह का पढ़ना चाहिए. जैसे यदि मुझे धर्म मे विश्वास नही तो उसको सिद्ध करने के लिए मुझे और ज्यादा पढ़ना होगा जिससे हम उन चीजों को और अच्छे से जान पाएँ. अगला प्रश्न था कि बहुत से लोग पढ़ने को एकाकी प्रक्रिया मानते हैं जबकि ये समाज मे सीखा जाता है. और हमारी जिम्मेदारी है कि हम सीखे हुए को समाज को वापिस करें तो कैसे ये समाज का हिस्सा ban सकता है? यह एक महत्वपूर्ण सवाल था लेकिन रेखा जी ने अपने धैर्य वान सहज शब्दों मे उत्तर दिया कि भले ही हम स्वयं की रुचि से एकांत में पढ़ना पसंद करते हैं लेकिन पढ़ने के बाद हम जैसे मनुष्य बनते हैं उसी सोच और समझ के साथ हम समाज मे व्यवहार करते हैं. फिर एक प्रश्न था कि पढ़ने लिखने में कैसे सब्जेक्विटी और जजमेंटल होने से बचा जा सकता है? तो रेखा जी ने जवाब दिया कि हमारी सजगता ही हमें इनसे बचा सकती है.. इसके बाद समूह मे शिक्षण पर प्रश्न पूछे गए जिनका जवाब रेखा जी ने अपने कक्षा शिक्षण के अनुभव और उदाहरण दे कर दिया. इसी रोचक बातचीत के साथ समय सीमा भी खत्म होने पर थी. सभी साथी ध्यान से संवाद सुन रहे थे. पूरी बातचीत कहीं ना कहीं दिल के करीब थी क्योंकि हम ऐसी शिक्षिकाओं को सुन रहे जो हम जैसे ही बच्चों के बीच काम कर रहीं थीं और उन्हीं चुनौतियों को बीच जो हम सबके सामने होती हैं.. आज के इन दोनों मेहमानों को सुनना बहुत सुखद रहा. पढ़ते लिखते रहना क्यों जरुरी है एक शिक्षक के तौर पर ये जान पाना मेरे और मेरे ही जैसे अनेक शिक्षकों के लिए महत्वपूर्ण रहा.
पूरी बातचीत को अंत मे जगमोहन कठैत जी ने समेकित किया.6:15 बजे तक पूरी वार्ता चली और सबने सुनी.
कठैत सर ने सबका धन्यवाद किया और कहा कि कक्षा के ये अनुभव बहुत काम के रहे.
इसी के साथ सबने विदा ली.

26 अप्रैल 2020.

Sunday, April 26, 2020

किताबें बदलती हैं हमारे जीवन को

ऑनलाइन सेमिनार: प्रतिभा कटियार एवं रेखा चमोली के साथ*********************
-मनोहर चमोली ‘मनु’
आज की बातचीत की औपचारिक शुरूआत अशोक प्रसाद जी एवं जगमोहन कठैत जी ने की । जैसे-जैसे साथी जुड़ते रहे, साथी सभी का स्वागत करते रहे। आरम्भ से पहले ही 64 साथी जुड़ गए थे। श्वेता जी ने सन्दर्भ रखा। कहा, ''दैनिक जीवन में पढ़ने-लिखने की आदत को विकसित करने और बच्चों में कैसे पढ़ने की आदत विकसित करें? इस पर बात करेंगे। पढ़े लिखे शिक्षक और पढ़ते-लिखते शिक्षक दोनों की आवश्यकता है।''

दोनों के परिचय के बाद प्रतिभा जी हमारे सामने आई। प्रतिभा जी ने कहा,‘‘यह माध्यम हमें एक अवसर के साथ मिला है कि हमारे भीतर सीखने की ललक रहे। मैं आज भी बहुत कुछ सीखकर जाऊँगी। पढ़ना क्यों जरूरी है? जब इस सवाल को साझा करती हूं तो पता चलता है कि जवाब ऐसे आता है। पढ़ा है। पर ज़रूरी तो नहीं कि साहित्य सभी पढ़ें। हर दिन लगता है कि क्या पढ़ना है? कैसे पढ़ना है? सालों से पढ़ रहे हैं पर क्या हमें पता है कि हमें कैसे पढ़ना है? यह भी क्या हमें सुनना आता है? क्या हम अच्छे पाठक हैं? जब मैं अठारह-उन्नीस साल की थी तब शेखर एक जीवनी पढ़ा। अब दोबारा पढ़ रही हूं तो लगता है कि जाने हुए को और जानना है। फिर से पढ़ना लगता है कि नए तरीके से पढ़ना हो रहा है। मैं जो सोचती हूँ क्या मैं लिख पाती हूं। आजकल हम देख रहे हैं कि हम खूब मदद करते हैं। कृपा, मदद खूब हो रही है। क्या हैं ये शब्द। साहित्य को बरतना ज़रूरी है। मदद करना,कृपा करना होना चाहिए कि साथ में खड़ा होना चाहिए? मैं फिर कह रही हूं कि क्या हम पढ़ना जानते हैं। मैं तो पढ़ना सीख रही हूं। हम सबके भीतर एक नदी है। साहित्य हमें सूखने नहीं देता। साहित्य हमारे भीतर के जंगल को,हरे-भरे को सूखने नहीं देता। हमें मरने नहीं देता। साहित्य जो करता है, प्रकृति जो करती है शिक्षा जो करती है उनका स्वभाव क्या है? पूरी दुनिया का साहित्य क्या करता है? सबके लिए है न? कोरोना के समय में पूरी दुनिया इस बीमारी से लड़ रही है। पूरी दुनिया एक हो गई है। साहित्य भी भेद नहीं करता।''
कवयित्री प्रतिभा कटियार जी ने कहा,‘‘हम मनुष्य होंगे। समाज को क्या चाहिए? साहित्य और शिक्षा क्या करती है। शिक्षक खास है। वह सबको जोड़ता है। पढ़ने की आदत कैसे हो? हमें समझना होगा कि जहां मज़ा आता है तो क्यों? नहीं आता है तो क्यों? मुझे घर में पढ़ने की आदत मिली। जिन्हें घर से यह आदत नहीं मिली उन्हें हाथ बढ़ाना पड़ता है। यह स्वाद है। लत है। चस्का है। यदि इसकी शुरुआत हो जाए तो फिर छूटेगी। हमें यह आदत नहीं मिली तो हम बच्चों को यह आदत तैयार कर सकते हैं। ऐसे में शिक्षक की बड़ी जिम्मेदारी है। वह इसे करते हैं। कर सकते हैं।’’ प्रतिभा कटियार जी ने कहा,‘‘मैं बचपन को याद करती हूँ तो पाती हूं कि पापा बहस कराते थे। सवाल करने और जूझने की आदत बढ़ाई उन्होंने। क्या हम बच्चों के साथ कर सकते हैं। बच्चों से बात करें। बहस में शामिल हों। बच्चों से सवाल-जवाब करने चाहिए। हमें बच्चे गलत साबित करते हैं तो समझिए कि वे सही जा रहे हैं। घर में बच्चे जब टोकते हैं तो समझिए कि सही जा रहा है। यही तो चाहते हैं हम। घर में भी और स्कूल में भी। हिन्दी की किताबें देखें तो वह बहुत खूबसूरत हैं। भाषा की किताबों के सारे पाठ इतने खास हैं। यदि इसे ही बरत लें,सहेज लें तो बात बने। शिक्षक को ही यदि किताबों से प्रेम नहीं है तो कैसी विरासत बना रहे होंगे हम? क्या स्कूल में बच्चे संवाद करते हैं? सवाल उठाते हैं? मैंने साहित्य में ज़्यादा पढ़ाई नहीं की। पीजी के समय में मैंने देखा कि साहित्य को पढ़ाने वाले शिक्षक मुझे रुला देते थे। ऐसे साहित्य पढ़ा जाता है? पढ़ाया जाता है? एक शिक्षक के पास कितने बच्चे आते हैं। वे बच्चे यदि मनुष्य हो जाएं तो दुनिया कितनी खूबसूरत हो जाए। मैं कक्षा 4 में पढ़ती थी। पुस्तकालय में एक किताब मिली। सार यह है कि नक्सली मूवमेंट में युवक पड़ गया। पकड़ा जाना और पुलिस की कार्रवाई में 5 साल निकल गए। मैंने इसे पढ़ा। कैसे किताब हमारे जीवन को बदलती है? साहित्य हमें नज़रिया देता है। परखने का अवसर देता है। चित्रलेखा पढ़ी। जिन शिक्षकों को साहित्य से प्रेम है उनकी कक्षाओं में कुछ अलग होता है। यू ंतो सभी शिक्षक अपनी कक्षाओं में कुछ न कुछ होता है। शिक्षक का व्यवहार कक्षाओं में जाएगा। बच्चों के जीवन में जाएगा।''

प्रतिभा कटियार जी ने कहा,‘‘शिक्षक होना, बच्चों से प्यार करना। बच्चों को सवालों को तैयार करना अपने आप में अनूठा है।’’ पांच बजकर दस मिनट पर रेखा चमोली जी ने अपनी बात शुरू की। रेखा चमोली जी ने कहा,‘‘प्रतिभा को सुनना लंबी प्रेम कविता को सुनना जैसा है। प्रतिभा जी से सहमति ज़ाहिर करते हुए मैं यह कहना चाहती हूँ कि यह मेरी ही बात है। मैं जानती हूं कि जो इस संवाद में शामिल हैं वह भी अपनी कक्षा में खूब बेहतर काम कर रहे हैं। शिक्षकों के पढ़ने-लिखने की बात पर बात आगे बढ़ाते हैं। मुझे लगता है कि हर व्यवसाय में कुछ खास होता है। शिक्षा में भी किताबें ज़रूरी हैं। हमें किताबें एक औजार के तौर पर दिखाई देती हैं। विषयवार शिक्षक और विषय की किताबों से नहीं पूरी प्रक्रिया में हमें बच्चों के सारे पढ़ाई के दिनों के तौर पर देखना होगा। जैसे जिस शिक्षक ने तोत्तोचान पढ़ी होगी। वह किसी भी तरह का शिक्षक है किसी भी विषय का शिक्षक है। वह बच्चों की उलझनों को समझेगा। पहला अध्यापक किताब भी शिक्षक के व्यवहार को दिखाती है। किताबें सवालों को सुनने-समझने का माध्यम बनती हैं। किताबों और किताबों में निहित शिक्षा प्रणाली के बारे में हम सही-गलत पर सवाल किए जा सकते हैं। मतलब यह है कि कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ हो रही है। जो भी गड़बड़ हो रही है हमारी कक्षाओं में कुछ गड़बड़ है। देखा जाए तो अब तो नियमित कक्षाएं चल रही हैं। यदि कोई शिक्षक किताबें पढ़ता है तो उसके भीतर का मनुष्य सवाल करता है। हां या नहीं वाला नहीं होता। शिक्षक का पढ़ना जरूरी है। व्हाट्स एप या फेसबुक में चीजें जो आ रही हैं। जिसे एक तरह से पढ़ना माना जाए तो क्या हम उस पर सवाल करते हैं। सही-गलत पर विचार करते हैं? हम फाॅरवर्ड कर देते हैं। यदि हमने किताबें पढ़ी हुई होती तो शायद हम सोचते। क्या करना है क्या नहीं करना चाहिए। हमें पढ़ना चाहिए। देर से ही सही पर पढ़े। यदि हम शिक्षक हैं। पढ़ते-लिखते शिक्षक है तो हमारी कक्षा कैसी होगी। मुझे लगता है कि ऐसे शिक्षक के पूर्वाग्रह नहीं होंगे। मैं अपना उदाहरण देती हूं। अपने-अपने राम। ये भगवान सिंह जी किताब है। बचपन में पढ़ी थी। मुझे वह तर्कपूर्ण किताब लगी। पाठकों का नजरिया बदल देती है किताब। आप जो पढ़ने से पहले होते हैं पढ़ने के बाद बदलते हैं। शिद्दत से पढ़ाने वाला शिक्षक संकोची नहीं होता। उसकी कक्षा में वह निडरता से पढ़ा रहा होता है। वह सवालों का जवाब देता है। घर में यदि बच्चों को माहौल मिलता है तो असर होता ही है। हमारे स्कूलों में जो भी बच्चे आ रहे हैं उनके पास घर में पढ़ने के लिए स्कूली किताबों से इतर बहुत कुछ नहीं होता। छपी हुई चीज़ों से वे दूर हैं। ऐसे माहौल में हमारी ज़िम्मेदारी बढ़ जाती है। उन बच्चों को खुद से पढ़ने के लिए तैयार करने के लिए किताबें चाहिए। जिन बच्चों को पढ़ने के लिए किताबें मिलती हैं तो उन्हें घर में अलग से पढ़ाना सिखाना नहीं करता। हम शिक्षक कक्षा में चित्रों में बात कर रहे होते हैं। घरेलू बातें होंगी। घर जैसी बातें होंगी।’’


रेखा चमोली ने कहा,‘‘एक ओर हम कहते हैं कि बच्चे रुपए लेकर नहीं आने हैं। एक बच्ची के बैग में दस रुपए निकलते हैं। बच्चों को सुना जाता है तो पता चलता है कि बच्ची घर के लिए 10 रुपए की चीनी लेकर जाएगी। जब यह पता चलता है तो कितनी बातें,अनुभव मिलते हैं। एक शिक्षक की बात और एक बच्ची की बात दोनों महत्वपूर्ण है। इसी तरह जब हम किसी कक्षा में कुछ पढ़ा रहे होते हैं तो हम सिर्फ भाषण नहीं होता। कहानी नहीं होता। कहानी के चित्रों,चरित्रों पर बात होती है। हमारे व्यवहार करने पर भी बहुत सारे मूल्य स्वतः आ जाते हैं।’’

रेखा चमोली जी ने छःह साल की छोकरी कविता पर खूब बात की। बहुत सारी सामग्री यानि छपी सामग्री जब बच्चों को पढ़ने के लिए दी जाती है तो बात आगे बढ़ती है। कक्षा के नियम होते हैं। पर यदि हम बच्चों से अच्छे बात करते हैं तो सामग्री बच्चे संभालते हैं। बच्चे अपने मन से चयन करते हैं। पढ़ते हैं। पढ़ने के मौके देते हैं। हम स्वयं भी पढ़ें। बच्चों को समय देना पड़ता है। बच्चे पढ़े हुए या सुने हुए पर बात करें। उन्हें मौका दिया जाना चाहिए। बच्चों का पढ़ा हुआ सुना जाए। वे खुश होते हैं। सुनना,बोलना और पढ़ना का अवसर देते हैं और हम बच्चों को लिखने के लिए प्रेरित करते हैं तो उसके लिखे हुए पर रुचि दिखाते हैं तो अलग बात है। बच्चों का रुझान बढ़ता है। प्रातःकालीन सभा में वह बोलते हैं तो बात ही अलग होती है। दीवार पत्रिका में उनके साथ शामिल होना बड़ी बात है। दीवार पर चिपकने के बाद नहीं। दीवार पत्रिका के शुरू होने,बनाने में तो वह प्रेरित करने वाला काम है। बच्चे मिलकर जो खोजते हैं,पढ़ते हैं लिखते हैं। यह बड़ा काम है। समझकर पढ़ना-लिखना आ गया तो बच्चे भूलते नहीं हैं। शिक्षक को भरोसा हो जाए कि वह सही दिशा में काम कर रहा होता है तो वह करता है। वह अपना काम करता रहता है।


5 बजकर 38 मिनट पर सवालों का सिलसिला आरम्भ हुआ। अशोक जी ने मुदित जी की सहायता से सवालों का समेकन किया। कक्षा कक्ष से जुड़े हुए सवालों से इतर भी सवाल आए। सवालों के जवाब में पहले रेखा जी ने कहा,‘‘यदि घर में बहुत सारी किताबें हैं तो बच्चों को पढ़ने के लिए कहा जा सकता है। बच्चों को प्रेरित किया जा सकता है। बच्चों के साथ पढ़ी जाएं तो बच्चे पढ़ते हैं। अभिभावक किताबें ले आएं। बच्चे खुद पढ़े। सहजता से हो। दबाव में नहीं पढ़ाया जा सकता। माहौल दें बस। पढ़ने-लिखने से तार्किकता का जो मामला है तो किताबें जगाती हैं। जब हम देखते,सुनते और समझते हैं। माना किसी गांव का उपन्यास पढ़ रहे हैं तो हमें गांव का जीवन,रहन-सहन समझ में आता है। किताबें हमारा भ्रम भी तोड़ती हैं। जब हम बहुत सारे संदर्भों को पढ़ते हैं तो एक ताना-बाना बुनते हैं। फिर हम किसी एक पक्ष पर ही अपनी समझ नहीं बनाते। हमारे अनुभव और दूसरो के अनुभव से हम अपना रास्ता खोजते हैं। सोचने का नया आयाम मिलता है। फिर हम किसी का कहा हुआ यूं ही नहीं मान लेते। हमारा सोचना और मानना बनता है।’’


अन्य सवाल के जवाब में रेखा चमोली जी ने कहा,‘‘एक ही तरह का पढ़ना संकुचित बना सकता है। लेकिन एक ही विषय पर अलग-अलग किताबें पढ़ंे तो समझ विस्तारित हो सकती है। लेखन के लिए कोई सलाह क्या हो सकती है? जब भीतर से सलाह आती है कि अब लिखना ही है तो लिखना हमारे विचार,भावानाएं और दर्द सामने आते हैं। शिक्षक के तौर पर लिखना तो अलग है। हम अपने शिक्षण को लिखें। हमारी सोच और समस्याएं रेखांकित हो सकती है। वह काम आती हैं। मुझे लगता है कि बच्चों को उनकी उम्र और रुचि के हिसाब से किताबें देनी चाहिए। फिर धीरे-धीरे चयन का अधिकार बच्चों को मिलना चाहिए। बच्चे बड़े की किताब भी पढ़ सकते हैं। पढ़ने की ललक पैदा हो चुकी है तो बड़ों की किताबें पढ़ी जा सकती हैं। पढ़ना-लिखना एकाकी प्रक्रिया भले ही है पर पढ़ने के बाद जब हम खुद में बदलाव महसूस होता है। हमारा पूरा बना हुआ इंसान जब सामने आता है तो समाज में हम जाते हैं तो हमारा व्यवहार बदला हुआ होगा। सकारात्मक होगा। फर्क तो आएगा ही। पढ़ते-लिखते हैं तो समाज के साथ व्यवहार में परिलक्षित होता है।’’

एक घण्टा पैंतीस मिनट के बाद भी आ रहे सवालों के जवाब देने की प्रक्रिया चलती रही। रेखा चमोली जी ने कहा,‘‘शुरू में लेखन में पढ़े हुए से प्रभाव रहता है लेकिन जैसे-जैसे हम पढ़ते जाते हैं तो हमारे लेखन में स्वतंत्रता आती है। समूह में पढ़ने की बात करते हैं तो हम कक्षा में इसलिए भी करते हैं कि बच्चे जब समूह में पढ़ते हैं तो वे एक-दूसरे की मदद करते हैं। पढ़ने-लिखने की प्रक्रिया में कक्षा में छूना,देखना क्यों प्रतिबंधित है? यदि समूह में वे बच्चे काम करें तो उसकी बात ही कुछ ओर है। बच्चे दो में छोटे-छोट समूह में पढ़ सकते हैं। चीज़ें बनाते हैं। समूह में पढ़ने के कई तरीकों से वह तेजी से पढ़ना और पढ़कर अपनी बात सुनाने की गति तेजी से सीखते है। अभिभावकों की गलतफहमी है कि साहित्य बच्चों की कोर्स को बाधित करता है। साहित्य कहीं न कहीं बच्चों की समझ को बढ़ाता है। पाठ्यक्रम को सीखने-समझने और विस्तार देने में मदद ही करता है साहित्य। किसी भी बच्चे का जो व्यक्तित्व बनता है तो स्कूली किताबों से ही नहीं बनता। किताबों का महत्व नकारा नहीं जा सकता।’’

एक घण्टा बयालीस मिनट की बातचीत के बाद रेखा जी ने अपनी कक्षाओं के अनुभव भी साझा किए। सवालों के जवाब में रेखा जी ने कहा,‘‘एकांत में मौलिक लेखन नहीं होता। हम जो बोलते,सुनते,लिखते हैं वह समाज का ही हिस्सा होता है। किसी बात को अपने तरीके से लिखना शायद मौलिक है। मैं निडरता के साथ जो लिखती हूं वह मौलिक कहलाया जाएगा। बच्चों को जानवरों से प्यार होता है। बच्चे अपनी प्रकृति को जानते हैं। कल्पनाशीलता में खिलौनों से बात होती है। जमीन को चोट कैसे लगती है। बाल मनोविज्ञान कल्पना के घोड़े दौड़ाने को सही मानता है। बच्चों को साहित्य में भी वह सब देना चाहिए जो उसके समाज में है। डायरी में बच्चों की मात्र दिनचर्या कैसे बदली जाए? लगातार और धीरे-धीरे प्रयास किए जाएं तो डायरी में दिनचर्या के साथ भाव भी आएंगे। यह बड़ों के साथ भी होता है। निरन्तर अभ्यास से यह आएगा।

अंत में प्रतिभा जी कनेक्ट हुई। उन्होंने जोड़ा,‘‘यह बात सही है कि एक ही विचार का साहित्य नहीं पढ़ना चाहिए। किसी के विरोध में या असहमति में जाने के लिए ज़्यादा पढ़ना होगा वह भी किसी पूर्वाग्रह के। हमें खुलेपन से चीज़ों को पढ़ना चाहिए। समझना चाहिए। हर तरह के साहित्य को पढ़ने से हम और खुलते हैं। माना कि मैं धर्म पर विश्वास नहीं करती तो मुझे समझना होगा कि मुझे धर्म की कितनी जानकारी है? तभी हम मुक्त होते हैं। किताबें अन्तिम नहीं होतीं। हम जीवन को भी तो पढ़ रहे होते हैं। हम सही साहित्य की ओर बढ़ते हैं हमारा जीवन भी तो है जिससे हम समझ रहे होते हैं।’’ 1 घण्टा 54 मिनट की बातचीत में अंत तक 94 साथी लगातार बने रहे। अंत में जगमोहन कठैत जी ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

Friday, March 15, 2019

लोक के आख्यानों पर भी केन्द्रित हो हमारे व्याख्यान- जगमोहन चोपता


जगमोहन चोपता सामजिक सरोकारों से जुड़े युवा हैं. पहाड़ में रचे-बसे हैं. उनकी पैनी नजर और संवेदनशीलता नजरिये को विस्तार देती है. चूंकि वो जिया हुआ ही लिखते हैं इसलिए उनके लिखे में उनका जिया, महसूस किया हुआ आसानी से देखा और महसूसा जा सकता है. उनका यह आलेख 'सुबह सवेरे' अख़बार में थोड़ा सा सम्पादित होकर प्रकाशित हो चुका है. 'प्रतिभा की दुनिया' में यह समूचा लेख सहेजते हुए ख़ुशी है. - प्रतिभा 

हम संभवतः गांव की उन आखिरी पीढ़ी में से हैं जिन्होंने अपने बुजुर्गों से खूब सारे किस्से कहानी सुने हैं। हर मौके के लिये हमारे बजुर्गों के खजाने में ऐसे ही आख्यान भरे पड़े होते थे। ये आख्यान पिण्डर नदी के गोल पत्थरों की तरह खूब भारी, चमकीले और सुगढ़ होते हैं। ऐसे पत्थर जिन्होंने पिण्डर नदी के अथाह पानी को बहते देखा है। वर्षों से विपदाओं-आपदाओं से घिसटते-घिसटते जैसे ये पत्थर गोल हो गये हैं वैसे ही लोक की मौखिक परम्पराओं से आते-आते लोक अख्यान भी सुगढ़ और खूबसूरत हो गये हैं। इनमें जीवन जीने का सार है। ये किसी महादेश के संविधान की धाराओं, उपधाराओं, अधिकार, कर्तव्य और निति निर्देशक तत्वों की तरह लगते हैं। 

बस एक फर्क रहता है कि इन आख्यानों के खिलाफ जाने पर कोई दण्ड या अवमानना नहीं होती। लेकिन प्रकृति समय-समय पर अपना दण्ड किसी न किसी प्राकृतिक आपदा के रूप में जरूर देती रहती है। और तब-तब ये आख्यान अपनी सार्थकता और महत्व की ओर याद दिलाते हैं।

आज भी अचानक किसी घटना को देखते हुए ये मुझे लोक के आख्यान याद आ जाते हैं। ये आख्यान मुझे प्रकृति को देखने, समझने और उससे अतःक्रिया की तमीज देते हैं। इनका साथ होना चीजों को देखने समझने के नजरिये को भी देते हैं। ऐसे ही कुछ आख्यानों को आप से साझा कर रहा हूं।

गोपेश्वर से ऋषिकेश आते-जाते ऑल वेदर रोड़ का निर्माण कार्य को देखते रहता हूं। बड़े-बड़े बुल्डोजर पहाड़ को काटकर खूब चौड़ी रोड़ बना रहे हैं। पहाड़ की कटान से आये मलबे को जगह-जगह डंपिग जोन बनाकर डंप किया जा रहा है। आप अगर गौर करेंगे तो देखेंगे कि रोड़ की कटान से निकला अधिकांश मलबा ऐसे बरसाती गदेरों में उड़ेला जा रहा है। जिनमें आजकल बहुत कम पानी या कुछ जगह तो सिर्फ नमी बाकी है। लेकिन जब बरसात में इनमें रवानगी पर होते हैं तो इनमें खूब पानी होता है, तब क्या होगा? जब-जब में सड़क किनारे डंपिग 
जोन के बोर्ड देखता हूं तो मुझे कड़ाकोट चोपता क्षेत्र के बजुर्गों से सुनी कहानी याद आती है। 


एक पहाड़ी गदेरा जो बरसात में विशाल नदी की तरह हो गया है। बड़े अक्कड़ के साथ पिण्डर नदी से अपने बेटे के लिये रिश्ता मांगने जाता है। उसक रौद्र रूप और पानी की विशालता से पिण्डर नदी थोड़ा सकुचाती है। फिर सोचती है कि अभी अगर मना किया तो यह गदेरा उसको तहस-नहस कर सकता है। हां कर दूं तो ऐसे घमण्डी और बरसाती गदेरे के साथ उसकी बेटी कैसे रह गुजर करेगी। काफी सोच-विचार कर पिण्डर नदी कहती है कि आजकल तो बहुत पानी बरस रहा है और फुर्सत ही नहीं है इसलिये आप जेठ के महीने में आइयेगा। शादी खूब धूमधाम से करेंगे। जेठ में जब सारे बरसाती गदेरे सूख जाते हैं या उनका पानी इतना कम हो जाता है कि उनको गदेरा कहना ही बेकार है। ऐसे में जेठ आते ही गदेरा अपना सूखा सा मुंह लिये पिण्डर को ताकते रह जाता है। 

अब आप सोच रहे होंगे मैंने ये कहानी क्यों सुनाई। मैं चाहता हूं कि देशभर के जितने भी इंजिनियरिंग संस्थान हैं वहां के छात्रों को इस कहानी को जरूर सुनाना चाहिए। मेरी माने तो उनके कोर्स में इसको जितना जल्दी हो सके शामिल कर दीजिए। ताकि वे इसके मर्म को समझ पायें कि कोई भी बरसाती गदेरा बरसात में किसी नदी से ज्यादा विकराल हो सकते हैं। जब उन्हें ऐसे पहाड़ी इलाकों में कोई योजना तैयार करनी हो तो वे बरसाती गदेरे की ताकत का आंकलन कर अपनी योजना तैयार करें। अभी आप देख ही रहे होंगे कि ऑल वेदर रोड़ का पूरा मलबा ऐसे ही बरसाती गदेरों में डंप किया जा रहा है। इसका खामियाजा आने वाली बरसात में नदी और उसके किनारे के रहवासियों को भुगताना होगा। तब इसको प्राकृतिक आपदा नाम दिया जायेगा। जबकि यह लोक के उन आख्यानों की अवमानना का दण्ड है जो प्रकृति के नियमों के विपरीत आचरण के लिये मिलेंगे।

कुछ महीनों पहले मैं साथी ठाकुर नेगी के साथ फूलों की घाटी घूमने गया। खड़ी चढ़ाई हमको एक अलग दुनिया की ओर ले जा रही थी। वहां पेड़ों से छट कर आ रही धूप सहलाती रही थी। पेड़ों पर भांति-भांति की पक्षियों का कलरव रोमांचक संगीत जैसा था। पहाड़ी गदेरे से तेजी से बह रहे पानी से उपजा गीत हमको अलग लोक में होने का अहसास दिला रहा था। हम खड़ी चढ़ाई चढ़ते-चढ़ते इसका आंनद उठा ही रहे थे कि हैलीकैप्टर की गर्जना ने इस पूरे माहौल को ध्वस्त कर दिया। ऐसा लगा जैसे पूरी भ्यौंडार घाटी में कोई युद्ध हो रहा हो। ऐसे में हॉलीवुड की फिल्मों के तमाम दृश्य याद आ रहे थे। लगातार आज जा रहे इन दैत्याकार हैलीकैप्टर की गर्जना में हम ठगे से कहीं गुम हो गये।

वहां पर्यटकों और स्थानीय जनों से बातचीत की तो पता लगा कि इस तरफ किसी का ध्यान ही नहीं है कि इन गर्जना करने वाले यातायात के मंहगे साधन हैलीकैप्टर से यहां के जीव-जन्तुओं, पहाड़ों पर क्या प्रभाव पड़ रहा है। हां उनके अनुभव जरूर कहते हैं कि अब इस घाटी में पहले की तुलना में पक्षियों का दिखना तेजी से साल दर साल घटता जा रहा है। पहले आपको खूब सारे जंगली जानवर पहाड़ी या गदेरों के किनारे पानी पीते दिख जाते थे जो अब काफी कम ही दिखता है।

ऐसे में मुझे अपने बजुर्गों से सुना किस्सा रह रह कर याद आता है। बुजुर्ग कहते थे कि जंगल में ज्यादा तेज आवाज में बोलना या गाना नहीं चाहिए। ऐसा करने से आंछरी (परियां) हरण कर लेती है। अपनी मौत के डर से जंगलों में चारा-पत्ती या जलावन के लिये जा रही महिलायें और पुरूष को धीरे-धीरे बातचीत या गीत गुनगुनाते थे। इस बात के पीछे जंगल की आंछरियों वाले डर को यदि छोड़ लिया जाय तो इस बात के मूल में जंगलों पर निर्भर इस समाज को वहां की जैविक संपदा और जंगल के पशु पक्षियों की फिक्र ज्यादा दिखती है। आदमियों की चीख पुकार से वे डर सकते थे। जंगल में पशु-पक्षियों का डरना उस क्षेत्र से पलायन का कारण हो सकता था। जिससे फूलों के परागण, नये बीज का इधर उधर बिखेरने की प्रक्रिया बाधित हो सकती है। इससे जंगल बनने और बढ़ने की पूरी व्यवस्था भंग हो सकती थी।
इस किस्से को उन तमाम निर्माण कंपनियों के लिये तैयार हो रहे युवाओं को जरूर सुनाना चाहिए। ताकि वे बड़े-बड़े विस्फोटक से पहाड़ों को खत्म करने से पहले सोच पायें। उन तमाम हेली कंपनियों को अनुमति देने वाले अधिकारियों को जरूर सुनाना चाहिए ताकि वे बर्फिले या जैव विविधता वाले जंगलों के बीच स्थित चार धाम में हेलीकैप्टर की गर्जना के बजाय सहज और सुलभ यातायात का कुछ और रास्ता निकाल पायें।

आप कभी फूलों की घाटी घूमने जाओ तो रास्ते में भ्यूडार नदी के किनारे नदी के मलबे से दबे गांव को देख सकते हैं। किसी दौर में सौ सवा सौ घरों वाले इस गांव में हजार पन्द्रह सौ लोग रहते थे। नदी की बाढ़ के मलबे से यह आधा गांव दब गया। इस भयावह हादसे के बाद गांव के लोग दूसरी जगहों पर बसने को मजबूर हुए। 

क्या आप सोच रहे हैं कि इसको लेकर भी मैंने अपने बुजुर्गों से कुछ सुना है। यदि आप ऐसा सोच रहे हैं तो आप सही हैं। बुजुर्ग जब-तब कहते थे नदी का बासा कुल का नाशा। यानि नदी के किनारे बसना मतलब अपने कुल का नाश करना। पहाड़ में रिवर बेड ढ़ालदार होने के चलते नदियों का बहाव बहुत अधिक होता है। ऐसे में बरसात के समय नदियों का पानी बढ़ते ही वे किनारे की ओर अंधाधुंध कटाव करती है। नदियों के इस व्यवहार को देखकर ही पहाड़ के बुजुर्गों ने यह लोकोक्ति गढ़ी होगी। इस लोकोक्ति के गढ़ने और हम तक पहुंचने तक की यात्रा में न जाने कितने पहाड़ी गावों के तबाह होने के दर्दनाक अनुभव इसके अंदर समाहित हैं।

नदियों के किनारे अव्यवस्थित बसाहटों के चलते ही उत्तराखण्ड में हर साल हजारों की संख्या में लोग प्रभावित होते हैं। अगर इस आख्यान को हमारे नीति नियंताओं और हमारे राजनेताओं ने सुना और इस पर मनन किया होता तो वे केदार नाथ से लेकर पूरे पहाड़ की नदियों के किनारे बसने पर सख्त रोक लगाते। अगर वे ऐसा करते तो आपदा में केदारनाथ सहित पूरे पहाड़ में हजारों लोगों की जान को बचाया जा सकता था।

भौगोलिक चिंतन का इतिहास को देखे तो इसमें प्रकृति के साथ अन्तःकरण को लेकर तमाम विचार और विचारधाराओं की बात की जाती है। इनमें मुख्य रूप से तीन वाद दिखते है। मनुष्य जब प्रकृति के सानिध्य में था वह उसकी हर घटना के अनुरूप चलता था जिसे विद्यानों ने निश्चयवाद नाम दिया। मानव ने धीरे धीरे तकनिकी विकास के जरिये प्रकृति को अपने वश में करने की। इस कोशिश का परिणाम यह रहा कि उसने प्रकृति का अंधधुध दोहन किया और उसके दुष्परिणाम आज पूरा विश्व भुगत रहा है। आज भी इस तरह की कोशिशे जारी है। 

ऐसे दौर में भूगोलवेता ग्रिफिथ द्वारा सुझाए गए नवनिश्चयवाद का विचार दिया जिसे पर्यावरणीय निश्चयवाद भी कहा जाता है। पूर्णतः आश्रित और अंधाधुध दोहन के बीच नवनिश्चयवाद आज ज्यादा कारगर लगता है। यह सड़क के नियम की तरह रूको, देखो और जाओ जैसी बात है। यानि प्रकृति के साथ समन्वय जहां प्रकृति के विरोध में लग रहा है वहां रूक जाओ और जहां-जहां संभव हो और जो प्रकृतिसम्मत हो वहां काम करो। जिसमें प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर विकास की बात की जा रही है। ऐसा विकास जिसके केन्द्र में सिर्फ मानव नहीं है बल्कि उसके परिवेश में विद्यमान जीव जन्तु और वनस्पति भी है। 

आप इन तमाम आख्यानों को सुनने के बाद कहेंगे कि मेरा ये व्याख्यान तो विकास विरोधी है। पहाड़ को विगत दो दशकों से देखने समझने के अनुभव के आधार पर मैं इन बातों को कहने की कोशिश कर रहा हूं। मैं इस बात को कहने की कोशिश कर रहा हूं कि देश के हर गांव में विकास की किरण पहुंचनी ही चाहिए। लेकिन उस किरण को पहुंचने के रास्ते, साधन और प्रक्रिया क्या हो इस पर सोचा जाना चाहिए। यदि हम विकास को लेकर एंकाकी सोच में फंसे रहे और अन्य जगहों के विकास का मॉडल संवेदनशील पहाड़ों पर भी थोपते हैं तो आप विकास नहीं विनाश के बीज बो रहे हैं।

सामाजिक विज्ञान के विद्यार्थी होने के नाते में पूर्णविश्वास से कहता हूं कि लोक में व्याप्त इन आख्यानों को यदि हम अपने व्याख्यान या सीखने-समझने की प्रकियाओं का हिस्सा बनाना ही होगा। यदि हम ऐसा करते हैं तो हम आदिवासियों को उनकी जमीनों से खदेड़ने से पहले ठिठक पायेंगे। हम पहाड़ों को रौंदने वाले इस भवाहव विकास के पहिये को रोकर प्रकृति के साथ सामंजस्य करने वाले अन्य साधनों की ओर देख पायेंगे या खोज पायेंगे। ऐसा करना समय के साथ-साथ इस धरती और यहां के रहने वाले तमाम जीवधारियों के हित में होगा। वरना हम विकास के ऐसे शिखर पर होंगे जहां मानव तो होंगे लेकिन मानवता कहीं नहीं दिख रही होगी।

Thursday, October 4, 2018

उम्मीद यहीं कहीं है



उस रोज मैं देहरादून के एक इंटर कॉलेज के प्रिंसिपल के साथ कुछ बातचीत कर रही थी. दूरस्थ इलाके के इस इंटर कॉलेज में बच्चे कई कई किलोमीटर की पहाड़ियों से उतर कर आते हैं और प्रिंसिपल सर इस बात के मर्म को समझते हैं इसलिए भरपूर कोशिश करते हैं कि बच्चों की पढ़ने की इच्छा के चलते इतने दूर चलकर आने को ज्यादा से ज्यादा सम्मान कैसे दिया जाय, कैसे बच्चों के समय व पढ़ने की इच्छा को भरपूर खुराक दी जाय. इसी बाबत यहाँ शिक्षक साथियों के साथ हर महीने अकादमिक चर्चा की शुरुआत हुई है.

उस रोज भी हम उसी बाबत बात कर रहे थे जब किसी कोचिंग संस्थान के दो साथी वहां आये. प्रिंसिपल सर ने उनकी बात को ध्यान से सुना। उन कोचिंग वाले लोगों ने अपना प्रोजेक्ट बताया कि इंटर पास करने के बाद बच्चों का एक टेस्ट लेंगे और जो टॉपर्स होंगे उनके लिए फ्री कोचिंग की सुविधा होगी. प्रिंसिपल सर ने बहुत धैर्य के साथ उनकी बात सुनते हुए कहा कि क्या आप जानते हैं ये बच्चे कहाँ से आते हैं. कितनी दूरी तय करके, कितना पैदल चलकर, किन पहाड़ी ऊबड़ खाबड़ रास्तों से? इन बच्चों के लिए यहाँ कॉलेज आना ही इतना मुश्किल है ये आपकी कोचिंग कैसे पहुँचेंगे भला. लेकिन इससे इतर एक बात मेरे मन में चल रही थी कि जो बच्चे सिलेक्ट नहीं होंगे उनके लिए क्या? यही बात प्रिंसिपल सर ने कहकर मेरे मन का बोझ हल्का कर दिया.

सारी दुनिया टॉपर्स सिलेक्ट कर रही है, सबके सिलेक्शन का क्राईटरिया नामी कॉलेज अच्छे मार्क्स ही हैं. तो फिर उनका क्या जिनके सामान्य नंबर आते हैं. जो सिलेक्ट होते होते रह जाते हैं, या जो इस रेस में बहुत पीछे छूट जाते हैं, कुछ तो डर के मारे इस रेस में दौड़ते भी नहीं. क्या कोई ऐसी कोचिंग या संस्था है जो पूछती हो कि जिन बच्चों को सीखने में दिक्क्त है उनके लिए हम हैं न? जो सिलेक्ट नहीं होते हम उनका ही हाथ थामेंगे कि सिलेक्टेड लोगों के साथ तो दुनिया है ही. क्या कोई ऐसी कंपनियां हैं या कभी होंगी जो चुनकर ले जाती हों हिम्मत हारे, मुरझाये लेकिन प्रतिभाशील लोगों को इस भरोसे कि वो उनके हुनर को निखार लेंगे।

सचमुच ये अच्छे नंबरों की दौड़ ने हमारा सबसे कीमती सामान हमारे भीतर का पानी छीन लिया है. उस रोज प्रिंसिपल सर की यह बात सुनकर कि उन बच्चों का क्या जो सिलेक्ट नहीं होंगे, हमारे लिए तो वो भी उतने ही अज़ीज़ हैं, बहुत अच्छा लगा. हम कितना ही प्राइवेटाइज़ेशन की ओर भाग लें लेकिन उम्मीद सरकारी स्कूलों की ओर से ही खुलती नज़र आती है जहाँ शिक्षक हर बच्चे के साथ निजी जुड़ाव के साथ काम कर रहे हैं और किन्ही कारणों से पीछे छूट गए बच्चों के पीछे खड़े होते हैं, उनके सर पर हाथ फेरते हुए कहते हैं कि मैं हूँ न! उस एक लम्हे में बच्चों की आँखों में जो चमकता है न पानी वही उम्मीद है!

Saturday, July 7, 2018

कितना सुख है मिलकर सीखने में


जैसा हम सोचते हैं, योजना बनाते हैं वैसा हमेशा कहाँ होता है. इसी तर्ज पर 6 जुलाई की सुबह की शुरुआत हुई. ठीक साढ़े नौ बजे प्राथमिक विद्यालय करनपुर पहुंची और पहुँचते ही एहसास हुआ कि जिस उद्देश्य से आई हूँ वह तो संभव नहीं क्योंकि आभा भटनागर मैम छुट्टी पर थीं और गीता कौशिक मैडम एक ही कक्षा में सभी क्लास के बच्चों को बिठाकर कुछ काम कर रही थीं. जिस वक़्त मैं वहां पहुंची गीता जी कुछ अभिभावकों से बात कर रही थीं. इस बीच मैंने बच्चों से बातचीत शुरू की. शुरुआत का सिरा था गर्मी की छुट्टियों वाला.
‘गर्मी की छुट्टियाँ कैसी रहीं?’ सवाल के साथ सभी बच्चे एक सुर में बंध गए.
‘बहुत अच्छी.’ बच्चों ने उत्साह से जवाब दिया.
‘छुट्टियों में क्या-क्या किया?’
‘घूमने गए, खेले, पढाई की.’
‘कहाँ-कहाँ घूमने गए?’
‘हरिद्वार, ऋषिकेश, मसूरी, नानी के घर, सहस्त्रधारा’.
‘अच्छा, घूमने गए तो क्या-क्या देखा?’
‘डोरिमान देखा पार्क में, नदी देखी, जंगल देखे, सड़क देखी, खूब मजे किये.’
‘नानी-दादी के घर क्या-क्या किया?’
‘हलवा खाया, पूड़ी खाई, मिठाई खाई.’ कुछ बच्चों ने जोड़ा ‘डांट भी खाई.’ जिसके बाद सारे बच्चे हंस दिए.
अब तक गीता मैम वापस आ गयी थीं. वो भी अब बातचीत में शामिल हो गयीं.
‘अच्छा कितने बच्चों ने छुट्टियों में खाना बनाया?’
करीब आधे बच्चों ने हाथ उठाया. जिन्होंने नहीं उठाया वो उम्र में बहुत छोटे थे. हाथ उठाने वाले बच्चों में लड़के और लड़कियां दोनों शामिल थे. रोहित ने बताया कि उसने हलवा बनाया, मीट बनाया. प्रियंका ने बताया उसने कढ़ी बनानी सीखी. और भी बच्चों ने इसमें चीजें जोड़ीं.
‘अच्छा रोहित ने हलवा बनाया. सूजी का हलवा. कितने लोगों को हलवा पसंद है?’
‘हमको’ पूरी कक्षा के हाथ उठ गये.
‘अरे वाह, अच्छा यह बताओ कि हलवा कितनी चीज़ों से बनता है?’
‘गाजर से, सूजी से, लौकी से’
‘आलू का हलवा, शकरकंद का हलवा किसने खाया है?’
किसी का हाथ नहीं उठा.
अच्छा गीता मैडम से पूछो उनको आता है क्या आलू और शकरकंद का हलवा बनाना.
बच्चों ने पूछा तो मैडम ने कहा कि ‘हाँ मुझे बनाना आता है और यह बहुत स्वादिष्ट होता है.’ बच्चों ने मैडम से आलू का हलवा बनाने की विधि पूछी जिसे मैडम ने ख़ुशी से विस्तार से बताया. विधि में ड्राई फ्रूट आने पर बच्चों ने उसके बारे में अलग से पूछा.
इसके बाद कौन सा फल, कौन सी सब्जी कहाँ होती है इसे पर फटाफट सवाल जवाब वाला खेल हुआ.
भुट्टा, सिंघाड़ा, जामुन, आम, चुकन्दर, आड़ू, बैंगन, भिन्डी, राजमा, लोबिया, आदि कहाँ पैदा होते हैं. पानी में, जड़ में या पेड़ पर. इस जल्दी-जल्दी बताना था. बच्चों में बताने का उत्साह भी खूबी था. इस जल्दबाजी में कभी कढ़ी पेड़ पर लग गयी और कभी हलवा जमीन में उग गया. इसके बाद जो मजेदार दृश्य बना वह देखने लायक था. सब पेट पकडकर हंस रहे थे. इस पूरे संवाद में गीता मैडम को बड़ा अच्छा लग रहा था. उनकी नजर उन बच्चों पर थी जो अक्सर चुप रहते हैं. वो चुप अब भी थे लेकिन उनके चेहरे बोल रहे थे. इसके बाद बातचीत का रुख थोड़ा बदला.
‘बड़े होकर कौन क्या क्या बनना चाहता है?’
प्रतिमा, दिव्यांशु, कोमल, मोहन ने डाक्टर बनने की इच्छा जताई, कुछ बच्चों ने पुलिस बनने की इच्छा जताई, कुछ ने किसान बनने की, कुछ ने कहा वो हवाई जहाज चलाएंगे.
कक्षा में काफी जोश आ चुका था. बच्चे बहुत खुश थे और अपने भविष्य के सपनों के बारे में बात कर रहे थे. कक्षा दो में पढने वाले दिव्यांशु को बार-बार बोलने का मन हो रहा था लेकिन अपनी बारी आने पर वो शरमा जा रहा था. हमने एक छोटी सी स्किट आनन-फानन में की. प्रियंक से कहा कि दिव्यांशु डाक्टर है तुम जाओ मरीज बनकर. एक बच्चा (नाम याद नहीं) प्रियंक के साथ गया.
प्रियल- डाक्टर साहब डाक्टर साहब बहुत तेज बुखार है.
शर्माते हुए अंगूठा मुंह में डालता है
प्रियल(प्रियल कक्षा 4 के हैं)- अरे डाक्टर साहब शरमाओ नहीं मेरा इलाज करो.
दिव्यांशु और शरमाने लगता है. कक्षा के बाकी बच्चों को बहुत मजा आ रहा है.
प्रियल- दवाई दे दो डाक्टर साब लेकिन सुई मत लगाना.
यह बात डाक्टर दिव्यांशु को जंच गयी. वो प्रियंक को सुई लगाने का अभिनय करने लगा. प्रियंक भागा, दिव्यांशु पीछे-पीछे भागा. गीता मैडम समेत सभी बच्चों की हंसी रुक ही नहीं रही थी.
एक छोटा सा ब्रेक बच्चों को देना चाहा कि बातचीत करते हुए काफी देर हो चुकी थी लेकिन बच्चों को कोई ब्रेक नहीं चाहिए था.
अब बात शुरू की सपनों की. कौन-कौन सपने देखता है, तुम्हारा क्या सपना है? बड़े होकर पुलिस या डाक्टर बनने वाले सपने में और सोते हुए जंगल में खो जाने वाले सपने में क्या फर्क होता है. सारे बच्चे अपने सपनों के बारे में बताने को बेचैन हो उठे जिसे घर से लिखकर लाने और मैडम को देने की बात तय हुई. सब बच्चे अपने सपनों के बारे में लिखेंगे यह तय हुआ. इसके बाद उनके सामने एक नया सवाल आया.
‘यह जो तुम्हारे सपने हैं, ये तुम्हें किसने बताये?’
‘यह तो हमने खुद सोचा.’ बच्चों ने कहा.
‘ओह. यह सोचना क्या होता है? यह कैसे होता है?’
सोचना मतलब कुछ सोचना. नन्हे आदि ने कहा. मतलब अपने आप से कुछ सोचना, कुछ ऐसा जो किसी ने हमें बताया न हो, कुछ ऐसा जो हमको करने का मन हो. नन्ही कोमल ने कहा, जैसे सोचना कि शाम को खाने में क्या मिलेगा. अब बात बढ़ने लगी थी. सोचना कि स्कूल से जाकर क्या-क्या करेंगे, बड़े होकर क्या बनेंगे. अब सोचने पर खूब बात होने लगी.
‘अब सोचते-सोचते थक गए न हम, चलो कुछ और करें.’ जैसे ही मैंने यह कहा, बच्चे खुश हो गए. बाल लेखन कैम्प के दौरान धोरण स्कूल की शिक्षिका अंजलि गुप्ता ने एक बार एक कविता कराई थी वो मुझे बहुत पसंद आई थी. यह कविता कक्षा 2 की गणित की (एनसीईआरटी) पुस्तक में है भी. मैंने सोचा था आज यही कविता बच्चों के साथ करते हुए इस पर बात करेंगे. इत्तिफाक था कि आज ही सुबह गीता मैम ने यह कविता बच्चों को सिखाई थी. अब बारी बच्चों की थी मुझसे कविता करवाने की. बच्चे कविता बोल रहे थे और मुझे एक्शन करने थे.
धीरे-धीरे मेरे साथ एक्शन में और बच्चे भी शामिल होते गए. कविता कुछ इस तरह थी
एक बुढिया ने बोया दाना
गाजर का था पौध लगाना
गाजर हाथोंहाथ बढ़ी
खूब बढ़ी भई खूब बढ़ी...
कविता लम्बी है और भाषाई सौन्दर्य के साथ गणित की अवधारणाओं से भी जुडती है. लेकिन अभी हम सिर्फ कविता का आनंद ले रहे थे. गाजर को खेत से उखाड़ने में एक-एक कर लोगों का जुटते जाना कविता का आकर्षण था और अंत में गाजर का उखड़ना, उसको धोना और हलवा बनाना बच्चों को आनंदित कर रहा था. वैसे भी आज हलवे की बात काफी हो भी चुकी थी. कविता खत्म हुई.
‘किसको-किसको स्वाद आया हलवे का?’
खूब हाथ उठे.
‘किसको किसको स्वाद आया?’ इस पर थोड़े कम लेकिन कुछ उठे. जो हाथ उठे उन्होंने कहा, ‘मैडम जी खूब मीठा है हलवा.’
अपनी कल्पना के संसार में कैसे हम कुछ भी पा सकते हैं, कुछ भी महसूस कर सकते हैं यही बात अब उनके सामने थी. इस पर बात करते हुए बच्चों से कहा चलो कल्पना का एक खेल खेलते हैं. सब लोग अपनी आँखें बंद करते हैं. एकदम चुपचाप. सोचो कि हम गाजर के खेत में हैं. बच्चे बोले ‘हाँ, मैडम जी हरे-हरे खेत में. चारों ओर हरा ही हरा.’ नन्ही मुस्कान आधी आँख खोलकर दूसरों को देखने की कोशिश कर रही थी. बाकी बच्चे खेत में थे. ‘हवा चल रही है. धीरे-धीरे.’ मैंने कहा. बच्चों ने जोड़ा. ‘गाजर की पत्तियां हिल रही हैं.’ अभिनव ने हाथ को लहराकर पत्तियों के हिलने का संकेत दिया.
‘हवा अब तेज़ चलने लगी है,’ मैंने कहा. बच्चों ने आगे जोड़ा, ‘अब गाजर की पत्तियां जोर-जोर से हिल रही हैं...ठंडी हवा है मैडम जी.’
‘चिड़िया उड़ रही हैं मैडम जी.’ गीता मैडम यह सब देखते हुए मुस्कुरा रही थीं.
‘चलो अब आँखें खोलते हैं.’ गाजर का खेत कैसा था?
‘बहुत मजा आया मैडम जी. अगली बार हलवाई की दुकान में ले जाना वहां गाजर का हलवा भी मिल जाएगा.’ वैभव ने मुस्कुरा कर कहा.
‘कविता कैसी लगी?’
‘बहुत अच्छी’
‘खेत की सैर कैसी थी?’
‘बहुत मजेदार.’
‘अच्छा बताओ कविता या कहानी कैसे बनती होगी?’ मेरे मन में इस बातचीत का अंत बच्चों के द्वारा बनाई एक कविता से ही कराने की योजना थी.
बच्चों ने सोचना शुरू किया. गीता मैडम ने जोड़ा कि वो कविता कहानी बनवाती हैं बच्चों से. कुछ शब्द देकर उनसे कविता या कहानी बनाने को कहती हैं. कुछ बच्चे बहुत अच्छी कवितायेँ कहानियां बनाते हैं. लेकिन सब नहीं बना पाते. मैं उनकी बात को ध्यान से सुनते हुए बच्चों से बातचीत भी करती जा रही थी. बच्चों ने जवाब देना शुरू किया.
‘कविता या कहानी शब्द से बनती है’
‘वाक्य से बनती है.’
‘कलम से बनती है’
‘किसी बात से बनती है’
‘मैडम जो शब्द देती हैं उससे बनती है’
‘और अगर मैडम कोई शब्द न दें तो?’
‘तो कैसे बनेगी कविता, नहीं बनेगी’ बच्चों ने कहा.
एक बच्चे ने कहा, ‘बनेगी तब भी क्योंकि तब हम सोचकर बनायेंगे.’ यही मेरा केंद्र बिंदु था कि कहानी या कविता सोचने से बनती है.
मैंने कहा आज हम सब मिलकर अपनी खुद की कविता बनायेंगे. बच्चों ने कहा कविता नहीं, कहानी. कविता तो आज हो गयी. घडी की सुई का इशारा था कि वक़्त ज्यादा नहीं है. 30 बच्चों के साथ कहानी बनने में वक़्त लगेगा लेकिन आखिर मुझे बच्चों की इच्छा के अनुरूप कहानी की ओर ही मुड़ना पड़ा.
यह कहानी सबकी कहानी होगी. इस कहानी में वो होगा जो हम चाहेंगे. वैसे होगा जैसे हम चाहेंगे. बच्चे यह सुनकर काफी खुश हुए. उनके चेहरों की चमक लगातार बढती जा रही थी. अब बारी थी सबको अपने अपने किरदारों के बारे में सोचना की. किसकी कहानी में कौन होगा, एक किरदार के बारे में सोचना था. राजा रानी, हाथी, शेर, मोर, जंगल, खरगोश, किसान, राजकुमारी, चुड़ैल, डायनासोर, कौआ और बहुत सारे किरदार उस क्लास में अब दाखिल हो चुके थे. अब मौसम आने लगे थे, कहीं हवा चलने लगी, तो कहीं बारिश होने लगी. बच्चों की कल्पना के घोड़े भागते ही जा रहे थे. घडी बता रही थी कि छुट्टी होने का वक़्त करीब है और कहानी अभी शुरू भी नहीं हुई बनना.
आखिर मोहित ने कहानी शुरू की. जिसे एक-एक करके बच्चे बढ़ाते गए और कहानी में अपने किरदारों को, अपनी कल्पनाओं को जोड़ते गए. आइये कहानी की ओर चलते हैं... 

'एक राजा और रानी थे, जो अपने बड़े से महल में आराम से रहते थे. उनकी एक छोटी सी प्यारी सी बेटी थी. एक दिन राजा रानी महल में झूले में बैठे थे, खूब ठंडी हवा चल रही थी. वहीँ पास में उनकी बेटी यानि राजकुमारी खिलौनों से खेल रही थी. पास में एक प्यारा सा मोर नाच रहा था और राजकुमारी उसे देखकर खुश हो रही थी. तभी वहां एक शेर आ गया. राजकुमारी शेर को देखकर और भी खुश हो गयी. उसने शेर से दोस्ती कर ली. लेकिन जैसे ही वहां से खरगोश गुजरा राजकुमारी खरगोश के पीछे भागने लगी. मोर और शेर राजकुमारी को खेलते देखकर खुश हो रहे थे. तभी महल में एक किसान आया. किसान बहुत थका हुआ था, वो एक बड़ा सा जंगल पार करके राजा से मिलने आया था. राजा ने किसान से कहा तुम अभी आराम करो अभी हम राजकुमारी के लिए खिलौने लेने मॉल जा रहे हैं. राजकुमारी बहुत दिन से नए खिलौने मांग रही है, लौटकर आकर मैं तुम्हारी बात सुनूंगा. इधर राजा राजकुमारी के लिए खिलौने लेने गया, तभी वहां महल में एक चुड़ैल आ गयी और वो राजकुमारी को अपने साथ लेकर चली गयी. लेकिन यह अच्छी चुड़ैल थी. उस चुड़ैल के कोई दोस्त नही थे इसलिए वो राजकुमारी को अपना दोस्त बनाना चाहती थी, इसलिए उसे अपने घर ले आई थी. चुड़ैल ने राजकुमारी को खिलौने दिए, नयी ड्रेस दी और उसे मैगी बनाकर खिलाई. चुड़ैल ने उसे खोये की बर्फी भी खिलाई. उधर राजा रानी जब महल में लौटे और राजकुमारी को नहीं देखा तो बहुत रोये. तब किसान ने कहा, महाराज, आप रोयें नहीं मैं राजकुमारी को ढूंढकर लाऊँगा. किसान राजकुमारी को ढूँढने निकला तो एक कौआ किसान के साथ हो लिया. उसने देखा था चुड़ैल को राजकुमारी को ले जाते हुए. कौए की मदद से किसान चुड़ैल के घर पहुँच गया. उसने देखा राजकुमारी तो चुड़ैल के पास खूब खुश है. किसान ने चुड़ैल से कहा, राजकुमारी के मम्मी पापा बहुत रो रहे हैं, हमें राजकुमारी को वापस महल ले जाना चाहिए. चुड़ैल ने कहा कि ठीक है, लेकिन मैं भी राजकुमारी के साथ चलूंगी. ये मेरी बेस्ट फ्रेंड है. किसान मान गया. एक झाडू पर सबसे आगे चुड़ैल बैठी फिर राजकुमारी और सबसे पीछे किसान. झाड़ू उड़ते हुए महल में पहुंची. राजा रानी राजकुमारी को देखकर बहुत खुश हुए. शेर, मोर, हाथी, खरगोश भी बहुत खुश हुए. राजा ने चुडैल को थैंक यू कहा और उसे महल में ही रहने को कहा. और किसान को बहुत सारा ईनाम दिया.'

कहानी पूरी हो चुकी थी, इसके बनने में सारे बच्चे शामिल थे, वो बच्चे भी जो शर्मीले थे, चुप रहते थे. उन्हें साथ लेकर, उनकी कल्पना को बाहर निकालने में उनकी थोड़ी मदद की और वो कान में आकर बता गये कहानी की बढ़त को. इस कहानी की हर लाइन में बच्चे के मन की दुनिया छुपी नज़र आ रही थी मुझे, चाहे वो खिलौने हों, खोये की बर्फी या मैगी या झाड़ू पर बैठकर उड़ने का सुख. सबने अपनी कहानी पर अपने लिए तालियाँ बजाईं. छुट्टी का वक़्त हो गया था लेकिन बच्चे क्लास से जाने को तैयार नहीं थे. वो कहानी के बारे में बात करना चाहते थे. सबको उस कहानी में अपना हिस्सा अपना किरदार सबसे अच्छा लग रहा था. प्रमोद ने पीठ पर बस्ता चढाते हुए कहा, ‘देखा मेरे किसान ने बचा लिया न राजकुमारी को.’ तभी मुस्कान ने शरमाते हुए कहा, ‘और मेरी चुड़ैल कितनी अच्छी थी’. दिव्यांशु ने कहा, ‘और मेरा मोर भी तो सुंदर था.’ तभी आदि ने कहा ‘मेरा डायनासोर तो आया ही नहीं...’ अरे हाँ, डायनासोर तो रह ही गया, हम सबने सोचा. चक्कर में पड गए कि इस कहानी में डायनासोर कहाँ और कैसे फिट होगा. तभी कोमल ने कहा, ’राजा और रानी डायनासोर वाला खिलौना लेने ही तो मॉल गये थे.’ और इस तरह कोमल ने समस्या सुलझा दी.

कहानी बन चुकी थी, छुट्टी हो चुकी थी, लेकिन कहानी बच्चों के साथ ही घर जा रही थी. गीता मैम खुश थीं कि कई बच्चों ने पहली बार कहानी बनने में अपनी भूमिका निभाई.

मैंने बच्चों से विदा ली तो उन्होंने जल्दी फिर से आने का वादा करने को कहा. ‘पक्का प्रॉमिस मैम, जल्दी आओगी न’ मुस्कान ने कहा. मैंने कहा ‘हाँ’. मेरी वापसी के कदमों में सुख था कि कितना कुछ सीख सकी हूँ आज.

Friday, July 6, 2018

बदलाव की इच्छा का सुख



यूँ तो भीतर एक उथल-पुथल सी हमेशा चलती रहती है कि जो कर रही हूँ उसमें कितनी सार्थकता है. जिन रास्तों पर दौड़ रही हूँ, वो कहीं पहुंचेंगे भी या नहीं. यह बात, जिन्दगी के रास्तों की नहीं अपने पेशेवर काम के संदर्भ में कर रही हूँ. हर दिन खुद के ‘किये’ पर सवाल करना जैसे आदत हो, और ‘न किये पर’ सवाल करना और पक्की आदत. इन्हीं उहापोह के बीच काम करना आसान करने के जो भी बिंदु मिलते हैं उन्हें सहेजती चलती हूँ. क्योंकि यहीं से और गति के साथ चलने की ऊर्जा मिलती है.

ऐसे ही कुछ अनुभवों से भरा-पूरा गुजरा जून का महीना. जिन सरकारी शिक्षकों के काम करने की नीयत पर, जिनके काम की गुणवत्ता पर सवालिया निशान लगाने से न कभी सिस्टम हिचकिचाता है, न समाज यह उन्हीं सरकारी शिक्षकों की बाबत है. अपनी छुट्टियों के दिनों में परिवार के साथ समय बिताने, सिनेमा देखने जाने, रिश्तेदारों के यहाँ जाने आदि को स्थगित करके बिना किसी सरकारी आदेश के, शुद्ध रूप से अपनी इच्छा से अगर अपनी छुट्टियों के चार दिन (कुछ तो 8, और कुछ 12 दिन भी) अपनी कक्षा कक्ष प्रक्रियाओं को बेहतर कर पाने के उद्देश्य से किसी कार्यशाला में जाते हैं तो यह सामान्य बात नहीं है. उनके भीतर सीखने की, बेहतर करने की, अपने बच्चों को नए-नए तरीकों से, रोचक तरह से पढ़ाने की यह इच्छा बेहद उत्साहजनक है.

बीते जून में पूरे उत्तराखंड में हुई 80 कार्यशालाओं में करीब 1600 शिक्षकों ने इन कार्यशालों में भाग लेकर शिक्षा को लेकर फैली उन भ्रांतियों को मुंह चिढ़ाया है जिनके तहत शिक्षा जगत के सिर्फ नकारात्मक पक्ष को ही बार-बार सामने रखा जाता रहा है.

जब भी इन शिक्षकों से मिलती हूँ, मन में एक ही सवाल होता है कि आखिर क्या है जो उन्हें अपने काम के प्रति इतनी सकारात्मकता से भरता है. क्या है जो व्यवस्थागत अडचनों के बावजूद उनका रास्ता आसान करता चलता है. पाया कि इन शिक्षकों में अपने काम को लेकर एक आदर भाव है. यह बात उत्तराखंड के शिक्षकों के (सब नहीं) संदर्भ में ही कह रही हूँ. कितने ही शिक्षक मिलते हैं जो अपने परिवार का समय स्कूलों में लगा रहे हैं. कुछ निजी सहयोग से अपने स्कूलों को संवार रहे हैं. अपने बच्चों की एफडी तोड़कर अपने स्कूल की दीवारें व छत पक्की बनवाना कोई मामूली बात तो नहीं है. लेकिन इन शिक्षक साथियों को अपने पेशे के प्रति इस तरह के गैर मामूली लगाव का कोई भान भी नहीं है. यह इल्म न होना उनके काम के सौन्दर्य को बढाता है. अगर आप इनसे मिलेंगे और उनकी तारीफ करेंगे तो ये शिक्षक साथी संकोच से भर उठेंगे. हालाँकि ये शिक्षक लगातार यह मानते हैं कि उन्हें और नए तरीके जानने की जरूरत है ताकि बच्चों को बेहतर ढंग से सिखा सकें. इसीलिए वो अज़ीम प्रेमजी फाउन्डेशन के टीचर्स लर्निग सेंटर्स या स्वैच्छिक शिक्षक मंच (वीटीएफ) में छुट्टी के दिनों में या काम के दिन में स्कूल की छुट्टी के बाद आते हैं. गर्मी और जाड़े की छुट्टियों में खुद की क्षमता संवर्धन हेतु आते हैं. बिना किसी सरकारी आदेश के बिना कहीं से कोई शाबासी मिलेगी ऐसी इच्छा के.

स्वैच्छिक प्रतिभाग कितना महत्वपूर्ण होता है इसका उन्हें अंदाजा है और यही बात काफी हद तक उनकी कक्षाओं में भी दिखती है. कोई भी तब बेहतर सीखता है जब या तो उसकी सीखने की प्रबल इच्छा होती है या जरूरत. इसलिए स्कूलों में सबसे पहले बच्चे का आने का मन होना, स्कूल में उसका रहने का मन होना, स्कूल में खुश महसूस करना कुछ भी सीखने-सिखाने से पहले की जरूरतें हैं. बच्चे जितना अपने शिक्षक से लगाव महसूस करते हैं उतना जल्दी सीखते हैं. सीखने को लेकर आत्मविश्वास भी जरूरी है. यह बात कि सीखा जा सकता है, सीखने की क्षमता है, बड़ों और बच्चों दोनों को सीखने की ओर बढाता है.

सीखने-सिखाने से जुडी कुछ इन्हीं संवेदनशील बातों का ध्यान रखते हुए गर्मी की छुट्टियों में अजीम प्रेमजी फाउन्डेशन द्वारा कार्यशालाएं आयोजित की गयीं और उनमें शिक्षकों का प्रतिभाग उत्साहजनक रहा. यूँ तो यह बदलाव की एक बहुत छोटी सी शुरुआत है. लेकिन इन्हीं छोटी-छोटी रोशनियों में आने वाले कल का उजाला छुपा है. ‘कुछ बदल गया है’ के उत्सव के तौर पर नहीं ‘कुछ बदलने की इच्छा’ के तौर पर शिक्षकों के इस प्रतिभाग का सुख तो महसूस किया ही जा सकता है. बाकी सफर तो अभी शुरू हुआ है...