Sunday, April 12, 2026

कहानियों के फूल हक़ीक़त की धरती पर खिल उठे थे


मुझे ख़्वाब देखते लोग बहुत अच्छे लगते हैं। उनके पास से अलग ही ख़ुशबू आती है। न जाने क्यों लेकिन ख़ुद ख़्वाब देखने से डरती रही। डर ख़्वाब टूट जाने का। डर मेरे ख़्वाबों का उपहास उड़ाए जाने का। 

लगभग आधी ज़िंदगी जी चुकने के बाद सहमते हुए ख़्वाबों की ओर हाथ बढ़ाना शुरू किया। चारों तरह देखते हुए कि कोई ख़्वाब देखते हुए देख न ले। कोई देखेगा तो मज़ाक ही उड़ाएगा 'आईं बड़ी, इत्ते बड़े-बड़े ख़्वाब देखने।वालीं'। 

फिर मैंने अपनी दुनिया समेट ली। लोगों से दूरी बना ली। शब्दों से, कुदरत से दोस्ती कर ली। अपनी छोटी-छोटी कहानियों में अपने तमाम सपने लिखने लगी। इन कहानियों में मैं थी, मेरा मन था। वो जंगल थे जिन्हें मैंने देखा नहीं, वो रास्ते जिनसे मैं गुजरना चाहती थी, मुक्कमल प्रेम की चाहना जो ख़्वाब में भी पूरा होने को तैयार नहीं। इन कहानियों समंदर, नदी, झरने, फूल, बादल, बारिश सब भरपूर थे। और थी इस धरती को प्यार से भर देने की इच्छा। 
मैं अपनी कहानियों में सांस लेने लगी थी, मैंने देखा मैं खुश रहने लगी हूँ। इन कहानियों से एक ख़ुशबू आती है जो मुझे टूटने से बचा लेती है।

फिर ये कहानियाँ भी जज की जाने लगीं। इनका भी उपहास किया जाने लगा। और हम सब जानते हैं कि हमारा मनोबल हमारे सबसे करीबी लोग ही तोड़ते हैं। मेरी कहानियों के फूल मुरझाने लगे, मेरी कहानी की नदियां सूखने लगीं। 

कहानियाँ लिखना बंद होने लगा। एक रोज मैंने ख़ुद को ख़ुद से बिछड़ते पाया। मैं सूखी नदी के सीने से धंस जाती और देर तक सुबकती रहती। अमावस की रात में चाँद ढूंढती फिरती। एक रोज मैंने अपने सूखे मन पर कुछ बूंदें महसूस कीं। मेरी ही कोई कहानी हक़ीक़त में मेरा हाथ थामकर मुझे लेकर चल पड़ी। मैं उसके पीछे-पीछे हैरत से, वो मेरा हाथ थामे मुसकुराते हुए।

मैं समझ गयी, मेरी कहानियाँ हक़ीक़त की ज़मीन पर उतर भी सकती हैं। वो समंदर का किनारा, वो प्रेमी के कांधे से टिककर घंटो जाते हुए सूरज को देखना, तारों की छाँव में बिना बोले बस चलते जाना और सोचना कि एक दिन यूध्ध खत्म हो जाएंगे सारे, धरती पर सिर्फ प्यार बचेगा। 

कहानी कहती, 'उस प्यार को बचाने के लिए भी युध्ध तो करना पड़ेगा। युद्ध सबको लड़ना होगा, हर किसी को। किसी से नहीं, ख़ुद से। अपने भीतर पल रही हिंसाओं से। तरह-तरह की हिंसाओं से।'

'फिर?' मैं कहानी से पूछती। 
'फिर दुनिया में कोई किसी से नफ़रत नहीं करेगा।'  कहानी मुस्कुराती। मैं उसका हाथ थामे उसके पीछे पीछे चलते हुए मासूमियत से पूछती 'लेकिन यह तो यूटोपिया है न ? 

कहानी मुझे हौसला देती, 'सपने देखने से न डर पगली। तू सपने लिख, क्या पता किसी दिन तेरे सपने हक़ीक़त बन खिल उठें।' यह सुनते हुए मैंने उस रोज अपने सबसे प्यारे सपने की हथेलियों को ज़ोर से अपनी हथेलियों में भींच लिया। मेरी आँखें बह निकली थीं, सुख से। सपने को सब पता होता है, उसने मुझे गले से लगा लिया। लहरों की आवाज़ कानों में घुल रही थी।

आसमान में तारे उस रोज झमककर खिले थे। सप्तऋषि मण्डल को देखते हुए हम ध्रुव तारे को ढूंढने लगे ताकि ख़्वाबों पर यक़ीन करना चाहिए इस बात पर ध्रुव तारे की मुहर लगा दी जाय। ध्रुव तारा मुस्कुरा रहा था।

अगली सुबह मैं नया ख़्वाब लिख रही थी....कि एक रोज़ धरती पर कोई किसी से नफ़रत नहीं करेगा, ईर्ष्या नहीं करेगा, कोई प्रेम से नफरत नहीं करेगा...

उस रोज चाँद आसमान से जाने को तैयार नहीं था। वो कहानी में लिखे ख़्वाब को किसी आयत की तरह  बुदबुदा रहा था। समंदर की लहरें करीब आकर बैठी थीं, एकदम शांत।

मैंने कहानी के अंत में लिखा...आमीन!

2 comments:

Admin said...

आपने डर, टूटन और फिर खुद को वापस पाने की जो यात्रा दिखाई, वो बहुत सच्ची लगी। मुझे सबसे ज्यादा ये बात छू गई कि आपने सपनों से भागना छोड़ा और उन्हें लिखकर जीना शुरू किया। लोग क्या कहेंगे वाला डर हम सबको रोकता है, लेकिन आपने उसे पहचान लिया।

Anita said...

बहुत सुंदर पोस्ट!!
एक दिन सब ऐसा करें या न करें, हम तो आज इसी वक्त ऐसा करने के लिए स्वतंत्र हैं