Friday, June 18, 2021

श्रीकांत कैसे हो गया फैमिली मैन?

“कुछ गंभीर सवाल उठ रहे हैं. श्रीकांत इतना कुछ कर रहा है, फिर भी सुचित्रा खुश नहीं है. आखिर सुचित्रा चाहती क्या है?”
प्रतिभा कटियार


‘द फैमिली मैन’ देख लिया था. तब ही, जब आया था. मैं फैमिली मैन पर बात नहीं करना चाहती. उस पर काफी बात हो चुकी है. मैं बात करना चाहती हूं सुचित्रा के किरदार पर. हालांकि, उस पर भी काफी बात हो चुकी है. फिर भी मैं उस पर बात करना चाहती हूं. सुचित्रा के किरदार को लेकर खूब तानाकशी हो रही है. मीम बन रहे हैं. कुछ गंभीर सवाल उठ रहे हैं, ज्यादातर मजाकिया कि औरतों को कोई खुश नहीं कर सकता. श्रीकांत इतना कुछ कर रहा है उसके लिए, फिर भी वो खुश नहीं है. रिश्ते के बाहर तांकझांक कर रही है. आखिर सुचित्रा चाहती क्या है?

क्या चाहती है सुचित्रा से पहले, श्रीकांत जो एक आदर्श फैमिली मैन भी है, देश की रक्षा में लगा हीरो भी, वो क्या चाहता है, पर भी बात होनी चाहिए.

श्रीकांत एक अलग तरह की नौकरी करता है, वह नौकरी उसका पैशन है, उसके प्राण बसते हैं उसमें. उस नौकरी या कहें काम के लिए, उसने घरवालों के रिश्तेदारों के ताने सहे, बच्चों के भी कि इतनी मेहनत करके भी ज्यादा कमा नहीं पाता है. वो फिर भी वही नौकरी करता है. यह नौकरी उससे ढेर सारा समय, अटेंशन और जोखिम मांगती है. जो जाहिर है वो देता है.

तो फिर वो फैमिली मैन कैसे है? घर के किसी काम में वो कोई सहयोग नहीं दे पाता. कभी-कभार दी गयी जिम्मेदारियां भी उसके हाथ से फिसल जाती हैं. जाहिर है जिन्हें देशप्रेम के लिये त्याग की चाशनी में लपेटकर जस्टिफाई किया जा सकता है. वो बच्चों को स्कूल से लाना भूल जाता है, बीवी की प्रेगनेंसी हो, डिलीवरी हो या कोई भी दूसरा मौका, वो कहीं नहीं हो पाता. फिर वो फैमिली मैन कैसे है? और तो और अपनी पसंद के काम को इतनी तवज्जो देना वाला व्यक्ति पत्नी के यह कहने पर कि वो अपने टीचिंग जॉब से ऊब गयी है, कुछ नया करना चाहती है, इस बात को समझ नहीं पाता.


दूसरे सीजन में वो परिवार के लिए अपनी पसंद की नौकरी छोड़कर कॉरपोरेट जॉब कर लेता है. जहां उसे हर दिन घुटन हो रही है, जो पूरे वक्त दिखती है या दिखाई गई है. दर्शक उस घुटन से कनेक्ट कर पाते हैं, लेकिन सुचित्रा की घुटन से, उसकी उलझन से कनेक्ट नहीं कर पाते. टेक्निकल तरह से श्रीकांत परिवार के साथ समय बिताना, साथ डिनर करना, डिनर पर फोन का इस्तेमाल न करने का नियम बनाना आदि कोशिशें करता है जो दर्शकों को नजर आती हैं और वो कह उठते हैं “बेचारा कितना तो कर रहा है और क्या करे?”

जबकि रिश्ते में, जीवन में आये ठहराव से जूझने की कोशिश सुचित्रा भी कर रही है. वो काउंसलिंग के लिए जा रही है. श्रीकांत को भी ले जाती है, जिसका श्रीकांत मजाक उड़ाता है. यह आम भारतीय पुरुषों की समस्या है काउंसिलिंग का मजाक बनाना, उसे महत्व न देना. और इस बात को काउंसलर के किरदार को बेहद हल्के तरह से गढ़कर मामला श्रीकांत के पक्ष में रख दिया गया. यह खतरनाक है.

क्या डायरेक्टर कहना चाहते हैं कि काउंसिलिंग जैसी कोई चीज नहीं होती या उसका कोई महत्व नहीं होता. शायद इसलिए सुचित्रा की उस कोशिश के मर्म को समझने की बजाय वह पूरा वाक्य मजाकिया ढंग से गढ़ दिया गया है.

अगर ‘फैमिली मैन’ श्रीकांत ने परिवार के लिए नौकरी बदली है तो सुचित्रा ने भी नौकरी छोड़ी है. वो भी घर पर बैठी है परिवार के लिए. फिर एक दिन अपने मैनेजर के साथ श्रीकांत जो करता है उसे देख कितनों के जख्मी दिलों को राहत मिली, लेकिन उसी घुटन, उसी तरह की पीड़ा से गुजर रही सुचित्रा जब वापस अपने काम पर लौटती है, तो इसे इस तरह दिखाया गया जैसे वो इश्क लड़ाने के लिए काम पर गई है.

सुचित्रा का एक ही संवाद मेरी पूरी बात को कहने के लिए काफी है, “15 साल से पूरी गृहस्थी अकेले संभाल रही हूं मैं. तुम अचानक से एक दिन आते हो और कुछ कोशिश करते हो और तुरंत तुम्हें बेस्ट हसबैंड और बेस्ट फादर का अवॉर्ड चाहिए.”

श्रीकांत जैसे तमाम लोग आसपास नजर आते हैं. हर समय अपनी मनमर्जी करने के बाद किसी रोज गिफ्ट देकर या डिनर पर ले जाकर सोचते हैं वो बीवी के लिए कितना कुछ तो कर रहे हैं और क्या चाहिए उन्हें? और अंत में यह जुमला “क्या चाहिए इन्हें आखिर... इनकी तो आदत है बड़-बड़ करने की.” और फिर धीरे से उन्हें इग्नोर करना और उनके जरिये मिलने वाली सुविधाओं का उपभोग करना पुरुष समाज सीख जाता है.

मुझे लगता है सुचित्रा को, श्रीकांत को जो और जितना चाहिए, उससे काफी कम ही चाहिए था, लेकिन उसे वो कभी मिला नहीं. लगातार अकेले गृहस्थी में पिसते-पिसते वो घुटन से अवसाद से भरने लगी. और तब उसे एक दोस्त मिल गया जो उसे उसके काम की ऊब से छुटकारा दिलाकर नए काम में उसे शामिल करना चाहता है. यहीं मसाला मिल गया पब्लिक को या दे दिया गया.

दूसरे सीजन तक तो अफेयर स्टेब्लिश भी नहीं हुआ सुचित्रा का, अभी से उसे क्यों ट्रोल कर रहे हो भाई. और अगर यही क्राइटेरिया है तो श्रीनगर में बॉस के रूप में मिली पुरानी गर्लफ्रेंड से मिलकर खुश हो रहे श्रीकांत को भी सामने रखो न. वह भी बस खुश ही है और सुचित्रा भी बस खुश ही है अपने दोस्त से मिलकर. जबकि श्रीकांत अपनी पत्नी की जासूसी करने से भी पीछे नहीं हटता है.


एक और बात, श्रीकांत के लिए कभी भी चाहे श्रीनगर जाना हो या चेन्नई जाना हो ड्यूटी के लिए मुश्किल नहीं रहा. सामान पैक किया और निकल गया. लेकिन अपनी नयी जॉब में जब सुचित्रा को अगले हफ्ते लंदन जाने का प्रस्ताव आता है, तो यकीन मानिए मेरी सांस थम गयी थी कि कैसे दोनों बच्चों को छोड़कर जाएगी वो?

वर्किंग वुमन के लिए पूरा दिन घर से बाहर रहते हुए घर और बच्चों को मैनेज करना ही इतना बड़ा चैलेंज होता है कि टूर पर जाना किसी विपदा के आने जैसा महसूस होता है, खासकर तब जब वो अकेले ही संभाल रही हों सब कुछ. यह चैलेंज श्रीकांत के सामने तो कभी नहीं आया न? कभी नहीं आता न?

तो सुचित्रा के किरदार को ट्रोल करना बंद करिए. अपने आसपास की स्त्रियों को थोड़ा और समझने की कोशिश करिए. अरे हां, अगर तीसरे सीजन में सुचित्रा का अफेयर डायरेक्टर स्टेब्लिश भी कर दे, तब भी उसे जज करने से पहले ठहरकर सोचिएगा जरूर.

The Quint में प्रकाशित 
लिंक- https://hindi.thequint.com/voices/opinion/the-family-man-amazon-prime-stop-trolling-suchitra-shrikant-tiwari-job#read-more

Thursday, June 10, 2021

डाक्टर वरयाम सिंह जी जन्मदिन मुबारक


जब भी डाक्टर वरयाम सिंह के बारे में सोचती हूँ तो मन एकदम से खुश हो जाता है. उनका जिक्र भर सुख और आत्मविश्वास से भर देता है. खुद पर भरोसा करना उन्होंने ही सिखाया. सोचती हूँ तो लगता है उन पर एक पूरी किताब लिख सकती हूँ. और जब लिखने बैठती हूँ तो सिर्फ 'सुकून' लिख पाती हूँ. इस कम लिख पाने में आत्मीयता का विशाल समन्दर है जो मुझे उनसे मिला है. आस्थावादी होती तो कहती भाग्य. लेकिन अभी कहती हूँ भाग यानी मेरा हिस्सा. उनके होने में जो मेरा हिस्सा है उसमें कितने खूबसूरत किस्से हैं.

आज जब साहित्य की तरफ कोई रेस सी लगी नजर आती है. कोई होड़. एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ ही नहीं एक-दूसरे की टांग फंसाकर गिराकर आगे निकलने की होड़ ऐसे में डाक्टर वरयाम सिंह की मुस्कुराहट के संग बैठ जाती हूँ. देखती हूँ सारे खेल तमाशे. 

मारीना पर काम करने के दौरान मैं सिर्फ मारीना तक नहीं पहुंची, उससे पहले पहुंची एक ऐसे व्यक्तित्व के पास जो ज्ञान से, प्रतिभा से, ओहदे से लबरेज थे. लेकिन आप अगर उनसे मिले हैं तो उन्हें याद करने पर पहली बात जो याद आती है वो है उनकी सादगी और उनसे मिला अपनापन.

फूलों और फलों से भरी डाल किस तरह झुकती जाती है उसका व्यक्तित्व से मिलान करना हो तो वरयाम जी याद आते हैं. कितना आसान है उनसे मिलना, बातें करना. उनसे तोहफे में ढेर सारी किताबें लेना. हर मौके बे मौके फोन पर बतिया लेना. उनकी उंगली  थाम रूस की गलियों में भटकते फिरना. कितना सुखद है अपनी शरारतों पर उनसे डांट खाना. 

सच में, उनके साथ मैंने खूब सारा समय जिया है. पलाश खिलने के मौसम में लगभग हर बरस दिल्ली में साहित्य अकादमी के प्रांगण में मेरा उनसे मिलना होता. मारीना धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी और मैं उनसे मिलते ही छोटी हो जाती थी. उनके पास बैठते ही लगता अब सब ठीक है. मैं अपनी तमाम गलतियों को उनके साथ बेहिचक बाँट लेती. वो एक बात को कई बार बताने पर भी कभी खीझते नहीं.

किताबें पढ़कर ही सब जाना नहीं जाता लोगों से मिलकर बहुत कुछ सीखा जाता है. वरयाम जी एक पूरा स्कूल हैं यह समझने का कि पढ़ने-लिखने से अहंकार नहीं नम्रता आती है, सहजता आती है जो पल भर में किसी अनजान को भी अपना बना लेती है. वो हिमाचल में रहते हैं. उनके गाँव बंजार का मौसम उनके जैसा ही है, प्यारा सा. आड़ू, नाशपाती, पुलम के फूलों और फलों वाले इस गाँव ने फूलों की घाटी में बदलते हुए खिलखिलाना, निश्छल प्यार लुटाना जरूर वरयाम जी से ही सीखा होगा.

आज उनके जन्मदिन पर मैं हमेशा की तरह बहुत बहुत खुश हूँ. उनके होने में जो मेरा छोटा सा हिस्सा है उसे मैं हमेशा सहेजकर रखूंगी. आप खूब जियें, स्वस्थ रहें, आपसे बहुतों को बहुत कुछ सीखना है अभी.

आपका जन्मदिन मुबारक आपको भी, हमें भी


Friday, June 4, 2021

स्मृति ही जीवन है


उदासी भी एक समय के बाद छीजने लगती है. उसे खुद से उकताहट होने लगती हो मानो. लेकिन जब तक उदास होने की वजह खत्म न हो आखिर रास्ता ही क्या इसमें धंसे रहने के सिवा. कोविड महामारी का यह दौर स्थाई उदासियाँ देकर गया है.और अभी गया भी कहाँ है. लेकिन सामान्य जीवन की पुकार इस कदर आकर्षक है कि पाँव खिंचते ही चले जाते हैं उस ओर. यह मानव स्वभाव है. देखा जाए तो इसी में जीवन की उम्मीद छुपी है. 'जीवन चलने का नाम' की तर्ज पर फिर से बाजार, दफ्तर फेसबुक गुलजार होने को हैं. लेकिन सोचती हूँ कि यह सामान्य होना क्या है. हम किस जीवन की ओर लौटने की इच्छा से भरे हैं? वही जीवन जो महामारी से पहले था या कोई और जीवन?

सामान्य शब्द का डायस मेरे हाथों में हैं. इसे लगातार घुमा रही हूँ. सामान्य क्या है? जो था, क्या वहीं लौटना अभिप्राय है या कहीं और जाना है. असल में वापस लौटने जैसा कुछ नहीं होता, कभी नहीं होता. होना भी नहीं चाहिए, लौटने में हमेशा एक नयापन शामिल रहता है. शामिल होना चाहिए. सुबह काम पर निकलते वक़्त जो हम थे, शाम को लौटते वक़्त उससे थोड़ा अलग हों तो बेहतर. थोड़ा बेहतर होते रहना मनुष्य की जिजीविषा होनी ही चाहिए. है भी शायद. लेकिन वो हमसे कहीं खो गयी है. या ढर्रे पर घिसटते हुए तथाकथित सफलता के पायदानों पर चढ़ते जाने के दबाव ने उसे हमसे छीन लिया है.

मुश्किल वक्त कभी खाली हाथ नहीं आता. पीड़ा और संताप के अलावा भी वह हमें बहुत कुछ देकर जाता है. क्या हम उसे देख पाते हैं? पीड़ा और संताप का वेग इतना प्रबल होता है कि हम कुछ और देख नहीं पाते. बहुत कम लोग देख पाते हैं उसे. बहुत कम.

इस महामारी की प्रलय से अगर हम सुरक्षित बच सके हैं तो इतना ही काफी नहीं है अब हमारे ऊपर दायित्व बढ़ा है ज्यादा बेहतर मनुष्य होने का, ज्यादा मानवीयता से भर उठने का. जीवन क्या है, कितना क्षणिक. कब छूट जाएगा कुछ पता नहीं. कभी भी, कहीं भी मृत्यु अपनी टांग अड़ा देगी और जीवन के तमाम हिसाब-किताब मुंह के बल गिर पड़ेंगे. वही हिसाब किताब जिनके लिए हम क्रूरता, अमानवीयता की हदें पार करते जाते हैं. क्यों? क्या होगा जो एक प्रमोशन कम मिलेगा, क्या हो जायेगा जो एक गहना कम होगा देह पर, क्या फर्क पड़ेगा अगर मानवीय मूल्यों के चलते हमें थोड़ा कम सफल व्यक्ति के तौर पर आँका जायेगा. असल सुख तो है चैन की वो नींद जो हर रोज हमें बेहतर मनुष्य होने के रास्ते पर चलते हुए आई थकन से उपजती है.

इस दौरान अच्छे भले व्यक्ति को 'बॉडी' बनते कई बार देखा. सांस के रहते तक वह व्यक्ति, व्यक्ति था उसका नाम था, पहचान थी सांस रुकते ही वह बॉडी हो गया. जिसके लिए आईसीयू, ऑक्सिजन, दवाइयों के लिए दौड़ते फिर रहे थे उसके लिए श्मशान घाट में नम्बर आने पर फूंकने का इंतजार होने लगा. वो व्यक्ति कैसे अचानक स्मृति भर बनकर रह गया. इस स्मृति की यात्रा कितनी लम्बी है यह उसके जिए हुए पर निर्भर करता है. फेसबुक पर आये श्रृध्धांजलियों के उछाल के बाद जो शेष बचती है जीवन में वह स्मृति. वह स्मृति ही असल में जीवन है.

दुःख, पीड़ा, अवसाद ने इस बार इतना खरोंचा है कि मन एकदम लहूलुहान है. इस दौर में कितनी ही बार ख्याल आया जाने अब हम अपनों से कभी मिल भी पायेंगे या नहीं. कितनों से तो नहीं ही मिल पायेंगे. कब कौन सी बात आखिरी बन गयी, कौन सी मुलाकात आखिरी बन गयी...हम अवाक देखते रह गये. उस आखिरी रह गयी मुलाकात और बात को मुठ्ठियों में बाँध लिया है, उस स्मृति में सांस शेष है. जो लगातार कह रही है, जीवन को दुनिया के क्षुद्र छल-प्रपंचों से बचाकर जियो, हर लम्हा भरपूर जियो. किसी की आँख का आंसू न बनो, किसी के आहत मन का कारण न बनो, बस इतना बहुत है.

शरीर और जीवन का बहुत मोह नहीं करना चाहिए, जो लम्हे सामने हैं जीने को उन लम्हों का मोह करना चाहिए, इस दारुण समय से हमने कुछ नहीं सीखा तो सामान्य जीवन की तरफ लौटने की हड़बड़ी किसी काम की नहीं.

link- https://epaper.jansatta.com/3116898/Jansatta/04-June-2021#page/6/2   




Thursday, May 20, 2021

ठहरना जरूरी है

बरस बरस के हांफ गये हैं बादल, जरा देर को ब्रेक लिया हो जैसे. और इस जरा से ब्रेक में ही परिंदों ने उड़ान भरी है. बरस के रुके हुए मौसम में एक अजब किस्म का ठहराव होता है. प्रकृति का समूचा हरा अपनी तिलस्मी स्निग्धता के संग मुस्कुराता नजर आता है. पत्तों पर अटकी हुई बूँदें किसी जादू से मालूम होती हैं. 

दोपहर के साढ़े बारह बजे हैं और मैं अभी तक सिर्फ एक कप चाय पीकर बारिश की संगत पर एकांत का सुर लगाने की कोशिश कर रही हूँ. यह सुर लग नहीं रहा अरसे से. कि जिस एकांत की कभी खोज रहा करती थी वही अब काटता क्यों है, भयभीत करता है. फिर यह भी है कि इसके खो जाने का भय भी है. अजीब  कश्मकश है. जो है उससे ऊब भी है, भय भी और उसी से मोह भी. जब कभी सुर लग जाता है तब एकांत महक उठता है और जब सुर नहीं लगता इसी एकांत को तोड़ देने के एक से एक नायाब तरीके जेहन में आते रहते हैं. 

असल मसला उस सवाल का है जो भीतर है और अरसे से अनुत्तरित है. हम जिन्दगी से क्या चाहते हैं? अगर इस सवाल का जवाब ठीक ठीक पता होता है तो वह मिलते ही हम संतुष्ट हो जाते हैं, खुश हो जाते हैं. लेकिन उस सवाल के उत्तर में अगर घालमेल है तो गडबड होती रहेगी.

मुझे हमेशा लगता है जवाब को छोड़ दें अगर हम पहले सही सवालों तक पहुँच जाएँ तो यह भी काफी है. शायद वहीँ से कोई राह खुले. 

खिली हुई जूही बारिश में भीग कर इतरा रही है. मौसम में सोंधेपन का इत्र है. भीतर की उदासी बाहर के मौसम से टकराकर टूट नहीं रही फिर भी टकराना अच्छा लग रहा है. 

एक परिंदा खिड़की पर आ बैठा. मेरी तरफ देखते हुए वो नहीं जानता कि अब वो इस पार इंट्री ले चुका है. सोचती हूँ एक बार चाय और पी जाए. कल शाम एक फिल्म की बाबत एक दोस्त ने बताया है, एक आधी पढ़ी किताब है इन्हें जमापूँजी सा सहेजे हूँ. फिल्म देख लूंगी, कितबा पूरी पढ़ लूंगी तो पूँजी खत्म हो जायेगी...इसलिए थोड़ा ठहरना जरूरी है.

Wednesday, May 19, 2021

वर्तमान में कोई ऐसी जगह नहीं...मारीना

- ममता सिंह 
(अगर आपको जीवनी पढ़ना पसन्द है तो रूस की महान कवयित्री मारीना त्सेवेतायेवा की जीवनी ज़रूर पढ़नी चाहिए...
उथल पुथल,संघर्ष,देश से निर्वासन,ग़रीबी, बीमारी,बच्चों की मृत्यु के बीच भी लिखती हुई मारिया का जीवनवृत्त न केवल साहस और लिखने की छटपटाहट का चरम बिंदु है बल्कि यह आज के अंधेरे और आशाहीन समय में एक सम्बल भी है।)

'अजीब बात है हर कोई अपनी-अपनी लड़ाई अकेले लड़ रहा होता है फिर भी किसी कंधे की तलाश होती है,जिसके सर पर ठीकरा फोड़ा जा सके,सुनने में अटपटा लग सकता है,लेकिन अक्सर हम ठीकरा फोड़ने के लिए अपने प्रिय कंधे ही तलाशते हैं।' पृष्ठ 56

'असल में प्रेम हमारे भीतर ही होता है,कोई होता है,जो हमारे भीतर के उस प्रेम तक हमें पहुंचा देता है,जाने-अनजाने,उसके बाद हम ज़िन्दगी भर उसी प्रेम में जीते रहते हैं,अलग अलग लोगों से,चीज़ों से घटनाओं से जुड़ते रहते हैं,लेकिन केंद्र में वही होता है प्रेम' पृष्ठ 86

'मेरे पास वर्तमान में कोई ऐसी जगह नहीं थी,जहां मैं ख़ुद को सुरक्षित महसूस कर सकूं...न ही भविष्य की मुट्ठी में ऐसी कोई उम्मीद थी,इस इतनी बड़ी समूची दुनिया में मुझे मेरे लिए एक इंच जगह भी ऐसी नहीं नज़र आती थी,जहां मैं अपनी आत्मा को निर्विघ्न,बिना किसी डर के उन्मुक्त छोड़ सकूँ.मैं धरती के उस अंतिम टुकड़े पर हूं जिस पर मैं इसलिए खड़ी हूँ,क्योंकि मेरे होने से वह ख़त्म नहीं हो सका है.मैं इस छोटे से टुकड़े पर अपनी पूरी ताक़त से खड़ी हूँ.' पृष्ठ 213

किताब-मारीना
लेखक- प्रतिभा कटियार
प्रकाशक-संवाद प्रकाशन
पृष्ठ-259
मूल्य-300