Friday, July 14, 2023

तुमने दिल ले लिया है यार पिथौरागढ़


हर रात को सुबह का पता नहीं होता। हालांकि हर रात को सुबह की तलाश जरूर होती है। पिछली कई रातों की जाग, लंबे सफ़र और कुदरत के करिश्मों से जी भर के हुई मुलाक़ात का जादू यूं हुआ कि वक़्त से पहले आँख लग गयी। बाद मुद्दत ऐसी गहरी नींद हुई। सुबह हुई चिड़ियों की आवाज़ से। कमरे का दरवाजा खोला और पल भर में पूरा मौसम कमरे में आ धमका। मौसम ने मुसकुराकर कहा,'कितना सोती हो, चलो चाय पीते हैं।' मैंने कहा, बड़े दिन बाद अच्छी नींद आई है तो टोको तो मत। उसने मुट्ठी भर बौछार में हवा का झोंका मिलाया और मेरे मुंह पर उछाल दिया। सारा आलस सामने लगे चीड़ और देवदार के पेड़ पर जा बैठा। 

बालकनी में बैठकर आसमान, चिड़िया, पेड़ ताकना और चाय पीते-पीते भूल जाना और अगला घूंट लेना ये पुराना शगल है। लेकिन आज इस शगल में कुछ नया सा सुरूर था। बारिश एक लय में थी। पेड़ से टकराते हुए बूंदें मेरे पैरों को भिगोने की कोशिश में लगातार लगी हुई थीं।


ये लंबी सुबह थी। इसकी डोर मेरे हाथ में थी। मैं इसे कितनी भी देर तक थामे रह सकती थी। बूंदों का यूं एक लय में गिरना, चिड़ियों का खेल और सामने बिछा हरा समंदर, जिनकी निगरानी में खड़े खूबसूरत जंगल...दूर पहाड़ी पर उड़ते बादलों का बड़ा सा गुच्छा...ये कौन चित्रकार है...का ख्याल साथ था। ऊपर से चाय पसंद की मिल जाय तो कहना ही क्या। घर से बाहर अक्सर मन की चाय मिलना मुश्किल ही रहा है लेकिन ये शहर जिसने न्योता देकर बुलाया था, खयाल रखना जानता है। चाय के स्वाद को संभाल लेना भी।

लैपटॉप खोला कुछ लिखने के लिए लेकिन दृश्य से आँखें हटें तब न। सो लैपटॉप बेचारा चाय के कप के बगल में रखे हुए खुद को उपेक्षित महसूस करता रहा। उसका यूं उपेक्षित महसूस करना कहीं सुख भी दे रहा था। हमेशा सारी फुटेज खा लेता है वो लेकिन जब सामने मौसम हो तो इन महाशय की एक नहीं चलती।
 

बारिश का यूं है इस शहर में दिन भर मनमानी चलती है मैडम की। कभी भी कितनी भी। और जब मन भर जाये बरस के तो मुट्ठी भर धूप उछाल के गायब। अभी मैं बारिश में चल रहे चिड़ियों के खेल में गुम ही थी कि सामने की वादी धूप से चमक उठी। नन्ही सी हरे रंग की चिड़िया (नाम मुझे पता नहीं) सफ़ेद धारी वाली और लाल मुकुट वाली चिड़िया के साथ मिलकर कोई खेल खेलने निकल पड़ीं। चिड़ियों का मूड कैसा है यह उनकी उड़ान देखकर जाना जा सकता है। वो चिड़िया खुश थीं सब की सब।

एक कप और चाय की तलब उठी तो चाय मंगा ली। हालांकि अब सुबह समेटने का समय हो आया था। मुझे आज साहित्य और शिक्षा पर बात रखनी थी। सारे रास्ते मैं यही सोचती आ रही थी कि क्या बात करूंगी। एक संकोच, एक झिझक हमेशा साथ होती है क्या मैं बात रख पाऊँगी, क्या मैं इस बात की समझ भी रखती हूँ। फिर माँ का कहा याद आता है, 'सरल रहो बस।' मैं इसे सूत्र वाक्य की तरह बुदबुदाती हूँ। फिर हंस पड़ती हूँ, मुझे इसके सिवा आता भी क्या है। सरल होना सरल होना ही होता है उसके लिए प्रयास करते ही वो कठिन होने लगता है।


साहित्य और शिक्षा पर क्या बात हुई, कैसी बात हुई यह नहीं जानती लेकिन इतना पता है कि लोगों ने संवाद को पसंद किया। मुझे खुशी हुई एक प्यारी सी लड़की दीप्ति से मिलने की। सरल सी, प्यारी सी लड़की जो मुझसे संवाद कर रही थी। बातचीत के मध्य ही दिल चाहा कि उसे गले लगा लूँ। सरलता मुझे आकर्षित करती है।

शीला जी से मिलना हुआ वो भी एकदम सहज सरल और अपनेपन से मिलीं। लगा ही नहीं कि पहली बार मिल रहे हैं। फिर एक के बाद एक लोगों से मिलना होता रहा। सब निश्चल और मौसम जैसे प्यारे लोग। 

थकान और देर तक बात कर चुकने के बाद एक अच्छी सी कॉफी पीने कि इच्छा ने एक कैफे में ला बिठाया। जाएँ कहीं भी, शहर अपने मौसम का टोकरा लिए साथ ही चल रहा था। मैं उसकी शरारत समझ चुकी थी। कॉफी पीते पीते मैंने मौसम की एक शाख को बालों में अटकाया और कॉफी पी चुकने के बाद चल पड़े बादलों के गाँव में।


जैसे-जैसे रास्तों पर आगे बढ़ रहे थे मौसम सुहाना होता जा रहा था। जैसे किसी प्रिय मेहमान के घर आने पर हम  उसके सम्मुख बेस्ट चीज़ें प्रस्तुत करते हैं, घर को करीने से सजाते हैं कुछ वैसा ही बल्कि उससे ज्यादा ही कर रहा था यह शहर। अपने सौंदर्य को खुलेमन से लुटा रहा था। खूब बरस चुकने के बाद पहाड़ और वादियाँ जिस तरह धुंध के खेल खेलती हैं उसका कोई मुक़ाबला ही नहीं। मैं रास्तों पर आगे बढ़ रही थी और उलझनें पीछे छूट रही थीं। मौसम ने ठान रखा था कि मुझसे मुझे चुरा ही लेगा। और मैं तो कबसे यूं खुद से बेजार होने को बेताब थी।

वो अटकी हुई लंबी सिसकी इस सौंदर्य के आगे सजदे में थी। गालों पर गीली लकीरों का खेल जारी था। दुख से, उदासी से डील करना आसान है उसकी तो खूब आदत है लेकिन जीवन के ऐसे ख्वाबिदा से लम्हों को करीब आते देखते ही सब्र छूटने लगता है। हिचकिचाते हुए सुख की डली को मुंह में रखते हुए महसूस किया कि ओह यह है सुख, इसका स्वाद तो वाकई बहुत अच्छा होता है। 

उदासियों का सामना डटकर करने वाली प्रतिभा कटियार को सुख के आगे घुटने टेकते जरा भी वक़्त नहीं लगता। सो टेक दिये घुटने और बह जाने दिया उस बरसों से अटकी सिसकी को। हथेलियों पर बादलों को लिए सड़कों पर झूमते नाचते हुए एक इच्छा ने जन्म लिया, काश, अभी इसी पल मैं मर जाऊँ। इन्हीं वादियों में सशरीर गुम हो जाऊँ। किसी को मिलूँ ही नहीं। फिर पेड़ बनकर उगूँ, पेड़ जो गुलाबी फूलों से भर उठे और जिसकी शाखों पर चिड़ियों के घोसले हों, उनके खेल चलें इस डाल से उस डाल। मृत्यु के इस रूमानी ख्याल से मन झूम उठा। कल्पना ही सही सुंदर तो है। यूं भी विनोद कुमार शुक्ल कहते ही हैं, यथार्थ झूठ है, कल्पना सच है।


 बहरहाल, अपनी ही मृत्यु के रूमानी ख्याल में डूबती उतराती फिलहाल ज़िंदगी में थी मैं और ज़िंदगी खूबसूरत थी। एक पूरा दिन थकान के साथ-साथ सर थपथपा कर राहत देकर जाने को था। मैंने उसे भरी हुई आँखों से देखा, उसने कहा, तुम्हारे लिए सुंदर रात मंगाई है। और सच में दिन में जो शहर बादलों के खेल और बारिश के मेल में महक रहा था रात को वो इस तरह चमक रहा था जैसे आसमान का सितारों भरा कटोरा किसी शरारती बच्चे ने गिरा दिया हो। एकदम शांत निस्तब्ध रास्ते और जगमग शहर...मैंने आँखें मूँदीं और गहरी सांस ली।


तुमने दिल ले लिया शहर पिथौरागढ़, बेसाख्ता होंठ बुदबुदाये। शहर मुस्कुरा दिया। उसने भी बुदबुदाते हुए जवाब दिया,'यही तो मैं चाहता था।'

खूबसूरत शहर मीठे लम्हों की गर्माहट वाला दोशाला देकर जा चुका था। सोने को हुई तो देखा, वो कहीं गया नहीं था वहीं छुपकर मुझे सोते हुए देख रहा था। देह में तनिक हरारत चढ़ आई थी, हवा रात भर ठंडी पट्टियाँ रखती रही। बादल का एक टुकड़ा जो बालों में अटका हुआ साथ चला आया था, बंद आँखों से रात भर बरसता रहा। हाँ, ये राहत की बारिश थी।  



जारी....

Thursday, July 13, 2023

पिथौरागढ़-अधूरे को पूरता शहर


नहीं यह पिथौरागढ़ के बारे में नहीं है, यह एक कोलाहल के बारे में है। उम्र से लंबी एक उदासी के बारे में है। चलते-चलते इस दुनिया से पार निकल जाने की इच्छा के बारे में है। यह उन तस्वीरों और रील्स की बाबत भी नहीं है जिन्हें देख लोग मुझ पर रश्क कर रहे हैं। यह आँखों में सजे मसकारे और काजल के बीच छुपी उस थकान के बारे में है जिसके बारे में बात करना भी थका देता है।

उस रोज जब मैं अपनी हथेलियों की टूटी-फूटी लकीरों से उलझी हुई थी, आसमान में कोई बदली अटकी हुई थी। मैंने पाया बदली तो कोई भीतर भी अटकी हुई है। तभी कानों में एक पुकार पड़ी। शहर पिथौरागढ़ की पुकार। उसने कानों के एकदम करीब आकर कहा,'आ जाओ मेरे पास।' मैंने चौंक कर उसे देखा, उसके चेहरे पर मुस्कान थी। मेरे माथे पर शिकन। 'ओ पिथौरागढ़, तुम तो दूर-दूर तक नहीं थे, अचानक और वो भी इस तरह न्योते के साथ'। मैंने पूछा। उसने पलकें झपकाकर कहा, 'जीवन को तुम जानती ही हो। उसका कहाँ कुछ तय होता है। सब अनिश्चित, सब अचानक।'

'हाँ, सही कह रहे हो। मैंने गुस्से से जीवन की ओर देखा।' जीवन अपनी दुष्टता पर मुस्कुरा दिया।
 

पिथौरागढ़ पहले भी एक बार जा चुकी हूँ। दस बरस पहले। हिल सिकनेस ने मेरी ऐसी बैंड बजाई थी कि स्मृति में सिर्फ वही बची थी। मैं सिहर गयी इस न्योते पर। सोचती रही, सोचती रही, फिर जाने का मन बना लिया। रिल्के का कहा अक्सर सूत्र वाक्यों कि तरह जब-तब निर्णय लेने में मदद करता है। 'Let life happen to you believe me life is in the right always- Rilke' हालांकि पूरी तरह सहमत नहीं होती हूँ मैं रिल्के से इसलिए अक्सर झगड़ा भी होता रहता है उनसे फिर भी अक्सर उनका कहा मान लेती हूँ। तो जीवन के बहाव के साथ बहते हुए पिथौरागढ़ के रास्तों की ओर कदम बढ़ा दिये।

रास्ते बरसाती झरनों, हरियाली से सजे हुए थे। वादियों में बादलों की चहलकदमी खामोशी के सुर पर चल रही थी। इन दृश्यों को कैद करते हुए हर बार लगा यह संभव ही नहीं। इस सौंदर्य को कैद कर पाना किसी कैमरे के बस की बात ही नहीं। इसे लिख पाना भी असंभव है और इस असंभव के आगे सर झुकाये जब यह लिख रही हूँ स्मृति से निकलकर एक बादल लैपटॉप में झांक रहा है। वो खुद को लिखे जाता देखना चाहता है, और जीवन मुझे उसके सम्मुख हारते देख खुश है। यूं सच कहूँ तो इस तरह हारने से मैं भी खुश हूँ। बूंदों से भरा वो बादल कुछ समझ नहीं पाता और बाहर बरस रहे बादल को देखने लगता है।

रास्ता लंबा था लेकिन इस बार मुश्किल नहीं था। हमारे सारथी गजेन्द्र जानते थे कि मुझे पहाड़ों में थोड़ी मुश्किल होती है और उन्होंने इस बात का इतना ख़याल रखा कि पूरे सफर में मैं सिर्फ बादल, बारिश, जंगल देखने के लिए आज़ाद रही।

चंपावत में कुछ देर समय बिताने के बाद हम अपेक्षित समय से पहले ही पिथौरागढ़ पहुँच चुके थे। बिना हिल सिकनेस का शिकार हुए। तो आधा दिन हथेलियों पर रखा था और पूरा पिथौरागढ़ सामने था।

एक शहर में न जाने कितनी चीज़ें होती हैं देखने की घूमने की। यह हम पर है हम क्या चुनते हैं। मैंने हमेशा कंक्रीट और इतिहास पर प्र्कृति को चुना है। दोस्त यह बात जानते हैं। पिथौरागढ़ के दोस्तों ने हाथ थामा और एक बेहद सुंदर रास्ते पर रख दिया। इतना हरा बिखरा हुआ था कि ज़िंदगी की तमाम हार भूल जाये इंसान। हरे में हार भुलाने की ताक़त होती है यह मैंने कई बार महसूस किया है। मैं हतप्रभ और मौन इन सुंदर रास्तों पर चलती जा रही थी। हमने कई गाँव पार किए, करते गए। पहाड़ी खेतों का सौंदर्य, उसमें काम करती स्त्रियाँ, लंबी खाली सड़क पर अचानक इत्मीनान से बतियाती दो औरतें, और लंबे खाली रास्ते को पार करने के बाद सड़क पर क्रिकेट खेलते कुछ लड़के। लंबे से हरे मैदान के बीच चमकता एक लाल टीन वाला घर। चारों ओर बिखरी इस हरियाली की खुशबू। एक ठीहे पर बैठकर मैं लंबी सांस लेती हूँ और सुनती हूँ उस लंबी सिसकी को जो न जाने कितने बरसों से भीतर छुपकर रह रही है। ऐसे मौकों पर वह बाहर आने को अकुलाने लगती है। मैं उसे आज़ाद करती हूँ और गालों पर उसे चुपचाप रेंगने देती हूँ।

 

ये जो दृश्य हैं सामने, ये क्या सिर्फ दृश्य हैं? क्या इन्हें ज्यों का त्यों लिखा जा सकता है। क्या उस लाल टीन वाले घर के लाल को लिखा जा सकता है जिस पर आसमानी नीले की छाया है और जिसकी किनारी पर धरती के हरे की कशीदाकारी है। मैं एकटक उसे देखती जाती हूँ। आड़ू के पेड़ ललचाते हैं मैं उन्हें दूर से देखती हूँ। उनकी ओर भागती नहीं। अपनी सीमाओं का मुझे भान है, ता उम्र मैं इस ख़ुशबू को नहीं लिख पाऊँगी लेकिन इस दृश्य को जी सकती हूँ, इस खुशबू को पी सकती हूँ, यह मुझे आता है।

कुछ ही देर में मैं उस हरे कालीन में पड़े कढ़ाई के किसी बूटे की तरह शामिल हो जाती हूँ। विलीन। जज़्ब।


 पहाड़ हर मौसम में सुंदर होते हैं। दोस्त बताते हैं कि मार्च में इनका निखार अलग ही होता है। मैं सोचती हूँ क्या इससे भी सुंदर कुछ हो सकता है। सिगरेट पीने की शदीद इच्छा को टालकर चाय पीने की इच्छा पर टिकती हूँ और उसी हरे समंदर के भीतर बैठकर चाय पीती हूँ।

पानी के नैचुरल स्रोत को देखना उसे सहेजने की टेकनीक देखना मजेदार था। दोस्त ने गुलदार के ठिकानों के बारे में बताया और यह भी कि अगर इंसान उन्हें न छेड़ें तो वो भी नहीं छेड़ता। लेकिन इंसान उनके घर तक पहुँच जाना चाहता है, आखिर वो इंसान है।

मुझे उन गांवों के नाम याद नहीं लेकिन नाम जो भी हों मुझे उनकी ख़ुशबू याद है। लौटते समय मैंने देखा ढेर सारी स्त्रियाँ स्वेटर और जैकेट पहनकर घूम रही हैं। थोड़ी हैरत हुई मुझे लेकिन कुछ दूर जाने पर जब अपनी देह पर सर्द हवा का फिसलना महसूस हुआ तो उनके स्वेटर पहनने का कारण स्पष्ट हो गया।

लौटना हमेशा अधूरा होता है लेकिन उस अधूरे में बहुत कुछ पूरा हो रहा होता है तो उस अधूरे पूरे के साथ हम शहर लौटे। किताबों का एक मेला लगा था शहर में उसमें शामिल होना था।


जारी...

Wednesday, July 12, 2023

प्रेम



बारिशों को अपने जूड़े में बांधकर
लड़की बुदबुदाती है
सब कुछ प्रेम है
स्मृति भी
इंतज़ार भी
वेदना भी
मिलन भी
विरह भी
हाँ, सब कुछ प्रेम है। 

'सब कुछ होना
बचा रहेगा'
पास में रखी किताब
में दर्ज है। 

जिंदगी की किताब में भी।

Friday, June 9, 2023

मानव कौल तितली और नाय्या

एक अजनबी
मेरे शहर
मुझसे मिलने आया...

जैसे-जैसे तितली पढ़ती गयी नाय्या की ओर खिंचती गयी. मैंने उन्हें ढूंढ-ढूंढ कर पढ़ना शुरू किया. पढ़ रही हूँ.
यह कविता अपने भीतर अपनेपन का ऐसा कोमल संसार लिए है कि यह बार-बार अपनी ओर खींचती है. पलकें भिगोती है.
 
मानव के लिखे को पढ़ते हुए उनके पात्रों से इकसार होना होता रहा है. जंग हे से तो जाने कितनी बार मिल चुकी हूँ. कैथरीन, इति ,उदय, पवन, जीवन, बंटी, सलीम, शायर. जैसे सबको मैं जानती हूँ शायद वो भी मुझे जानते होंगे. जानना कितना अपर्याप्त सा शब्द है लेकिन इसकी तरफ कैसा सा खिंचाव है.

लेकिन नाय्या पात्र नहीं हैं, वो लेखक हैं और कमाल की लेखक हैं. जितना भी सुना, पढ़ा और समझा उन्हें मुझे एक सहजता मिली. ऐसी सहजता जिसमें लेखक होने पर, गर्दन पर कोई बल नहीं पड़ता. जीवन ऐसा ही है जितना इसके करीब जायेंगे विनम्रता और करुणा से भरते जायेंगे.

साहित्य के शोर से दूर नाय्या को सुनना, पढ़ना और कृतज्ञ होना उस लेखक का जो अपने लिखे में ऐसे सुंदर ठीहों के पते छोड़ता चलता है.

Sunday, June 4, 2023

काफ्काई मन



ये इतवार की सुबह है. एक उदास अख़बार दरवाजे के नीचे से झाँक रहा है. उसे उठाने की हिम्मत नहीं हो रही. लेकिन न देखने से चीजें होना बंद नहीं होतीं, दिखना बंद हो जाती हैं. लेकिन लगता है दिखना भी बंद नहीं होतीं.

कोई बेवजह सी उदासी है जो भीतर गलती रहती है. जैसे नमक की डली हो. वजह कुछ भी नहीं, या वजह न जाने कितनी ही हैं. हमेशा वजहों के नाम नहीं होते. लेकिन वो होती हैं. इतना मजबूत मन न हुआ है, न हो कभी कि आसपास के हालात का असर न हो.

कभी जब हम जिन चीज़ों पर बात नहीं करते वो चीज़ें और गहरे असर कर रही होती हैं. दुःख कितना छोटा शब्द है, सांत्वना कितना निरीह. घटना और खबर के पार एक पूरा संसार है जहाँ बहस मुबाहिसों के तमाम मुखौटे धराशाई पड़े हैं.

कल काफ्का की याद का दिन था. सारे दिन की भागमभाग के बीच काफ्का से संवाद चलता रहा. मैंने उससे पूछा, 'ऐसा क्यों हो रहा है इन दिनों?' उसने पूछा कैसा? मैंने कहा,'कोई बेवजह सी उदासी रहती है. किसी भी काम में मन नहीं लगता. पढ़ना दूर होता जा रहा है, लिखने की इच्छा नहीं होती. बात करने की इच्छा होती है लेकिन किससे बात करूँ समझ नहीं आता. अगर कोई बात करता है तो दिल करता है ये क्यों बोल रहा है. चुप क्यों नहीं हो जाता. सब लोग क्यों बोलते हैं इतना?' ये कहते हुए मैं फफक पड़ी. मैंने सुना कि मैं भी तो कितना बोल ही रही हूँ. किसी से न सही खुद से ही सही. चुप रहना न बोलना तो है नहीं. उफ्फ्फ, अजीब उलझन है.

काफ्का मुस्कुराये और बोले, 'चाय पी लो.'
मैं चाय बना रही हूँ. सामने लिली और जूही में खिलने की होड़ है. लीचियां पेड़ों से उतरने लगी हैं.

देह पर हल्की सी हरारत तैर रही है. काफ्काई हरारत.