Sunday, July 31, 2022

अच्छा लगने का स्वाद


तुम्हारा पास होना 
जैसे धरती पर छनक उठना 
ख्वाहिशों की पाजेब 
रुनझुन रुनझुन रुनझुन रुनझुन  
जिसकी धुन में गुम हों 
हम तुम तुम हम 

जैसे खिलना हजारों पीले गुलाब धरती पर 
और वादी में उतरना एक खूबसूरत धुन 
जैसे तपती दोपहर को मिलना
बारिश की फुहार 
बेचैन मन को मिलना चैन 

जैसे सदियों से जागी आँखों को मिलना 
भर मुठ्ठी नींद 
हरसिंगार के पेड़ का भर जाना फूलों से 
अप्रैल के महीने में 

जैसे बुलबुलों की उड़ान में शामिल होना शरारत  
जैसे रास्तों में भटक जाना और 
भटकते हुए खो जाना 
अनजाने सुख के घने जंगल में 
जैसे बंद आँखों से बरसना सुख की बदलियाँ 
जैसे चखना स्वाद पहली बार 
'अच्छा लगना' का. 

Wednesday, July 27, 2022

होंठों से ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं चुम्बन...


किसी कवि को पढ़ना उसे पढ़ते हुए देखने जैसा होना चाहिए. गौरव गुप्ता ख़ामोशी से एक स्पेस बना रहे हैं. उनकी पोस्ट, कवितायें पढ़ती रहती हूँ. उनमें एक सम्मोहक सा ठहराव है. गौरव किसे पढ़ते हैं, कैसे पढ़ते हैं, आवाजें, दृश्य और कोलाहल सब उनकी दुनिया में एक अलग ही ढंग से आता है. पिछले दिनों उनके द्वारा कुछ कविताओं का अनुवाद नजर में आया. दुन्या मिखाइल, निज़ार कब्बानी, अर्नेस्टो कार्डेनल और महमूद दरवेश. ये सब मेरे भी प्रिय कवि हैं. तो गौरव के अनुवाद के जरिये हिंदी में आये इन प्रिय कवियों को सहेज रही हूँ. गौरव को शुक्रिया कहते हुए और उन्हें ढेर सारी शुभकामनाएं देते हुए कि उनके भीतर की नमी यूँ ही बची रहे...

दुन्या मिखाइल की कविता

(1965 में जन्मी दुन्या मिखाइल अरबी भाषा की इराक़ी कवि हैं। अपने लेखन के कारण अधिकारियों से प्रताड़ित होने के बाद उन्होने अमेरिका में शरण ली )

1-धन्यवाद

मैं उन सभी को धन्यवाद देती हूं
जिन्हें मैं प्यार नहीं करती।
वे मुझे दिल का दर्द नहीं देते
उन्हें मैं लम्बा पत्र नहीं लिखती
वे मेरे सपनों में खलल नहीं डालते
मैं बेचैनी से उनकी प्रतीक्षा नहीं करती
मैं पत्रिकाओं में उनके राशिफल नहीं पढ़ती
मैं उनके नंबर डायल नहीं करती
मैं उनके बारे में नहीं सोचती रहती।
मैं उनका बहुत धन्यवाद करती हूं
वे मेरे जीवन को क्षत-विक्षत नहीं करते।

******

निज़ार कब्बानी की कविता
(1923-1998) सीरियाई कवि, राजनयिक तथा प्रकाशक

निजार कब्बानी की कविताओं में प्रेम की अभिव्यक्ति के साथ ही स्त्री की आजादी का भाव भी व्यक्त हुआ है।

१-
लालटेन से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है प्रकाश
नोटबुक से ज्यादा महत्वपूर्ण होती है कविताएँ
और होठों से ज्यादा महत्वपूर्ण होते है चुंबन
तुम्हारे लिए
लिखे गए मेरे ख़त
ज्यादा महत्वपूर्ण हैं हम दोनों से
वे एकमात्र दस्तावेज़ हैं
जहाँ लोग पाएंगे
दर्ज किया गया
तुम्हारा सौंदर्य और मेरा पागलपन।

२-
मैं तुम्हारे दूसरे प्रेमियों सा नहीं हूँ
मेरी प्रिये
अगर वें तुम्हें बादल देते हैं
तो मैं दूँगा तुम्हें बारिश
अगर वे देते हैं तुम्हें चिराग़
तो मैं दूँगा तुम्हें पूरा का पूरा चाँद
अगर वे तुम्हें एक टहनी सौंपते हैं
तो मैं रख दूँगा तुम्हारे सामने पूरा दरख़्त
अगर वे देते हैं तुम्हें जहाज़
तो मैं दूँगा तुम्हें एक सुंदर सफ़र।

३-
एक लंबे अंतराल के बाद
हर बार, जब मैं तुम्हें चूमता हूँ
मैं महसूसता हूँ
जैसे लाल रंग के लेटरबॉक्स में
जल्दी-जल्दी में डाल रहा एक प्रेम पत्र।

४-
मैंने तुम्हें चुनने के अवसर दिया है
इसलिये चुनो
तुम कहाँ मरना पसंद करोगी?
मेरे सीने पर
या मेरी कविताओं के पन्नों के बीच

*****
अर्नेस्टो कार्डेनल की कविता
(निकारगुअन कवि)

जब मैंने तुम्हें खो दिया
हम दोनों हार गए
मैं इसलिए हारा
क्योंकि वो तुम थी जिसे मैंने सबसे ज्यादा प्रेम किया.
और तुम इसलिए हारी
क्योंकि वो मैं था जिसने तुम्हें सबसे ज्यादा प्रेम किया.
लेकिन हम दोनों में
तुमने सबसे ज्यादा खोया है
क्योंकि मैं किसी औऱ से उतना ही प्रेम कर सकता हूँ
जितना मैंने तुम्हें प्रेम किया था
लेकिन कोई दूसरा
तुम्हें उतना प्रेम कभी नहीं कर सकता
जितना मैं तुमसे करता था

(2)
यही होगा मेरा प्रतिशोध
कि एक रोज़ तुम्हारे हाथों में होगी
एक प्रसिद्ध कवि की कविता की किताब
और तुम पढ़ोगी उन पंक्तियों को
जिसे कवि ने तुम्हारे लिए लिखा था
और तुम कभी जान नहीं पाओगी यह बात।

****

महमूद दरवेश की कविता

1941-2008

फिलिस्तीनी प्रतिरोधी साहित्य के प्रसिद्ध कवि। विश्व प्रसिद्ध “लोटस” पुरस्कार और “लेनिन शांति पुरस्कार” से सम्मानित।

आज सुबह तुम्हारे लिए फूल खरीदना चाहा था
लेकिन कुछ दोस्त भूखे थे
इसलिए मैंने उनके लिए रोटियां खरीदीं
और तुम्हें लिखी प्रेम कविताएँ

*****
(वागर्थ पत्रिका में प्रकाशित )

Sunday, July 24, 2022

और हम भटक चुके थे



जीवन में जितना उजला मिला वो हरे के पास मिला. कच्ची सी नींद में थी कि कोई सिरहाने एक उजली सी सुबह रख गया. हरे रंग में जगमगाती उजली सी सुबह. पलकों से ख़्वाब छलक रहे थे. हथेलियों में तितलियां लिख रही थीं प्रेम की इबारत. सर पर रौशनी का समन्दर था जो हरी कोंपलों के भीतर से चलते हुए हम पर छलक रहा था. एक गहरी ख़ामोशी थी चारों ओर. ज़िन्दगी की सरगम का पहला सुर एकदम ठीक से सध रहा था.

हम नहीं जानते थे हम कहाँ जा रहे थे, रास्ते का रुख किधर का है. सचमुच, न जानने का सुख बहुत होता है. एक लय थी हमारे साथ आगे बढ़ते कदमों में, एक अभिलाषा थी घने जंगलों में कहीं भटक जाने की. हम भटक जाने को बेताब थे. और हमने मुस्कुरा कर एक-दूसरे की आँखों में देखा. हम भटक चुके थे.

कुदरत की ऐसी मेहरबानियों के आगे सज़दे में कौन न झुक जाए. एक हरा हमारे भीतर उग रहा था, एक हरा हमारे आगे बिखरा हुआ था और एक टुकड़ा हरा मेरे बालों में आ टंका था.

पलकों से उतरकर ख़्वाब अब हमारी हथेलियों पर रखे थे, टुकुर-टुकुर देख रहे थे हमें. सुनहरी रौशनी की किरणों ने हमें आगोश में भर लिया. इतना उजला हरा कभी नहीं देखा था...हरे की उस रोशनी से ज़िन्दगी जगमग है. आँख क्यों न डबडबायेगी भला.

Friday, July 22, 2022

भाषा से बाहर



जब मैं लिखना चाहती हूँ
सदियों से गले के भीतर अटकी हुई
सिसकी के बारे में
लाख खंगालने के बावजूद
भाषा के पास नहीं मिलता कोई शब्द,

जब मैं लिखना चाहती हूँ भूख
दुनिया के तमाम शब्दकोषों को पलटने के बाद भी
नहीं मिलता एक शब्द जो
भूख से उठने वाली पेट की ऐंठन, चुभन
सिकुड़ती खाल, नाउम्मीद हो चुकी आँखों का सूखापन
दर्ज कर सके,

जब मैं लिखना चाहती हूँ मौन
तब न जाने कहाँ से आ जाते हैं
ढेर सारे शब्द
शोर मचाते हुए,

जब मैं लिखना चाहती हूँ
बेबसी, यातना, पीड़ा
भाषा के आंगन में शुरू हो जाता है
शब्दों का खेल,

जब मैं लिखना चाहती हूँ प्रेम
खिल उठते हैं तमाम फूल
बरसने लगते हैं बादल
बच्चे खिलखिलाने लगते हैं,
गैया लौटने लगती हैं घर
चूल्हे में बढ़ने लगती है आंच
नदियों में कोई वेग आ जाता है
रास्ते मुस्कुराने लगते हैं
यह सब होता है भाषा के बाहर,

और जब मैं तुम्हें देखती हूँ
दुनिया की तमाम भाषाएँ
देखती हैं मुझे तुम्हें देखते हुए
किसी भाषा के पास वह शब्द नहीं
जो इस देखने की मिठास को समेट सके...

Thursday, July 14, 2022

पढ़ना यानी मिलना अपनी रूह से...


आज की सुबह बारिश नहीं है. हरारत भी नहीं है. अजब सी उदास सी शांति है. किसी भी कहानी का आरम्भ और अंत मुझे मुश्किल लगता है. जैसे एक ठीक सुर से उठाना कोई राग और उसी एकदम दुरुस्त सुर पर उसे पूरा करना. दोनों सिरे अगर संभल जाएँ तो मध्यम और पंचम खिल उठते हैं.

कल रात जब मैं इसके अंतिम पन्नों से गुजर रही थी तो यात्रा की समाप्ति की थकान और शान्ति दोनों साथ थी. किताब बंद करते ही मेरी कोरों से कुछ बूँदें लुढकीं और मैं एक ख़ामोशी ओढकर देर तक आसमान देखती रही. तब तक, जब तक वो शाम के नीले से रात के काले में न बदल गया...

मुझे नहीं मालूम आज मैं क्या लिखना चाहती हूँ. क्योंकि मैं तो असल में चुप रहना चाहती हूँ. चुप ही हूँ कई दिनों से. और चुप्पी को लिखना जरूरी क्यों है. लेकिन शायद जरूरी है कि ख्वाजाबाग के जिस घर में कई दिन अटकी रही, जिस नीले दरवाजे और सफेद दीवारों को सपने में देखती रही उससे बाहर आना जरूरी है. उसके बाद क्या हुआ क्या नहीं इसके बारे में नहीं है यह बात. यह बात है एक ऐसी यात्रा के अनुभवों की बाबत जिनसे गुजरना बेहद जरूरी है.

मानव का यह यात्रा वृतांत सिर्फ कश्मीर यात्रा का वृतांत भर नहीं है. यह कई यात्राओं की बाबत है. खुद को जानने समझने की बाबत है. हम क्या हैं, क्यों हैं, जैसे हम हैं वैसे ही क्यों हैं. क्या सच में हम ऐसे ही होना चाहते हैं? हमारी किसी के प्रति नाराजगी, गुस्सा, प्रेम यह सब कहाँ से आता है. देश क्या है आखिर. अपनापन कैसा होता है. इतिहास की उन चालाकियों को देखना हम कब सीखेंगे आखिर जो जानबूझकर अधूरा सच लिए हमारे सामने खड़ा कर दिया जाता है. क्या हम उसके पार जाकर देख पाने की योग्यता कभी ग्रहण कर सकेंगे?

खुद के भीतर झांकना मनुष्य होने की पहली और अनिवार्य शर्त है. यह सिलेबस में कहीं नहीं है, स्कूलों में नहीं पढ़ाया जाता खुद के भीतर झांकना, खुद को टटोलना. समूचे देश को, एक ऐसी नफरत की आग में झोंकना आसान है जिसका असल में कोई सर-पैर ही नहीं लेकिन यह मुश्किल है कि उदासी और नाराजगी की नन्ही किरचों को सुभीते से निकाला जाय कि दर्द में तनिक कमी आये.

कश्मीर क्या है आखिर...कश्मीरी कौन हैं. जिन कश्मीरी पंडितों के दर्द, तकलीफ को राजनीति ने बेहद चालाकी से अपने नफे के लिए भरपूर उगाहा उनके दर्द असल में हैं क्या यह किसने पूछा? जिन कश्मीरी मुसलमानों के लिए नफरत उगाई उनके भीतर जो प्यार था/है, जो अपनापन है उसे किसने देखा?

जिन दिनों मैं रूह के जरिये कश्मीर की यात्रा पर निकली थी उन दिनों मेरी बेटी मुझे पढ़ते हुए देख रही थी. और एक रोज उसने मुझे मैसेज किया, ' रूह के बारे में लिखना, रूह को पढ़ना अपनी रूह को तलाशने जैसा है.' मैंने उसे पूछा कि यह किसने लिखा? उसने कहा, यह तुम्हारे बारे में है. मुझे लगा तुम ऐसा ही महसूस कर रही हो.

एक ही वाक्य में उसने मेरी पाठकीय यात्रा को कह दिया. सचमुच यह अपनी रूह तलाशने जैसा है. इस किताब में न जाने कितनी ऐसी जगहें हैं जहाँ देर तक ठहरना चाहिए. न जाने कितने ऐसे हिस्से हैं जिनका सार्वजनिक पाठ होना चाहिए. यह किताब प्रेम के बारे में है नफरत के बारे में नहीं. जो होती नफरत के बारे में तो शायद बेस्ट सेलर हो चुकी होती अब तक, नफरत की मार्केट जो कमाल की है.

मुझे ख़ुशी है कि अपनी ही दुनिया में डूबा हिंदी साहित्य जगत कितना ही आत्म आनन्द में रत रहे लेकिन रूह को युवा पाठकों ने दिल से लगा रखा है. मैं हर युवा के हाथ में यह किताब देखना चाहती हूँ, रिकमंड करती हूँ. अगर आप सचमुच इंसानियत के पैरोकार हैं, दुनिया में अमन और सुकून चाहते हैं, कश्मीर को सच में इस देश का हिस्सा मानते हैं तो कुछ धाराओं और अनुच्छेदों से बाहर आकर, वहां के लोगों को गले से लगाना होगा. यह किताब वादी के हर इन्सान के दिल में धड़कते उस प्यार के बारे में है जो वो हमसे करते हैं, उस उदासी के बारे में है जो उन पर थोपे गए इल्जामों के भीतर सांस लेती रहती है. उस उम्मीद के बारे में है जिसमें प्यार की रौशनी होगी एक दिन.

कश्मीर सिर्फ पेड़, पहाड़, झील नहीं है, कश्मीर वहां रहने वालों के दिलों की धड़कन से आबाद है. नफरत से सिर्फ नफरत बढ़ सकती है, प्यार से प्यार. माया आंटी कहती हैं कि 'अगर हम वर्तमान को दुरुस्त करना चाहते हैं तो हमें सामने वर्तमान ही रखना होगा. बार-बार अतीत को सामने रखकर हम वर्तमान को दुरुस्त नहीं कर सकते.' कितनी सच बात है यह. लेकिन सच में क्या हम दुरुस्त करना चाहते हैं? अगर चारों तरफ प्रेम और सौहार्द हो गया तो क्या होगा राजनीति का. बेहद चालाकी से हमें एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा किया गया और हम मोहरे की तरह इस्तेमाल होते रहे.

यह एक कश्मीरी पंडित की इनसाइड स्टोरी है, वो परिवार जिसने वो सब सहा जिसे फिल्म में देखकर लोगों का  खून खौल उठता है और उनका देश प्रेम हिंसक हो उठता है. लेकिन जिसने वह सब जिया, सहा उसके भीतर तो कोई गुस्सा नहीं, कोई प्रतिशोध नहीं. वो तो प्यार से भरा हुआ है. रूह को पढ़ते हुए और भी न जाने कितने कश्मीर से आये दोस्त, पड़ोसी, सहकर्मी याद आये जिनके पास उनकी कहानियां तो थीं लेकिन नफरत नहीं थी कहीं. मैं खुद 8 साल एक कश्मीर से विस्थापित परिवार के घर में किरायेदार के तौर पर रही हूँ. मकान मालिक की आँखों से जो कश्मीर मैं देखा करती थी उसमें हमेशा प्रेम ही नजर आता था और उनकी याद में जो लोग आते थे वो न हिन्दू थे न मुसलमान वो बस कश्मीरी थे. 

रूह को पढ़ना जरूरी है और अगर इसे ठीक से पढ़ा है तो निश्चित तौर पर भीतर काफी कुछ बदलता महसूस होगा. क्योंकि यह सचमुच अपनी रूह को टटोलने जैसा है.