Wednesday, March 30, 2022

थोड़ा और बेहतर मनुष्य होना सिखाती है कथा नीलगढ़





- प्रतिभा कटियार

यह कथा नीलगढ़ है. इस कथा में मासूम पगडंडियां हैं, कुछ अनचीन्हे रास्ते हैं, अभाव में भी खुश रहने का योग सीख रहे लोग हैं, ढेर सारा प्रेम है और है एक-दूसरे पर भरोसा. महानगरीय जीवन जीते हुए, खबरें पलटते हुए, विचार विमर्श के मुद्दों संग अठखेलियाँ करते हुए जरा थमकर कथा नीलगढ़ सुनी जानी चाहिए. एक ही देश में जीते हुए इसी देश के किसी कोने के बारे में, वहां के लोगों के बारे में, उनके सुख-दुःख, संघर्षों के बारे में जानना किसी कथा सरीखा लग सकता है. यह विडम्बना नहीं तो और क्या है. देश की जीडीपी ग्रोथ से नीलगढ़ का कोई लेना-देना नहीं, विश्व के मानचित्र में कहाँ है भारत की विकास यात्रा का रथ इससे उसका कोई ताल्लुक नहीं उसे तो अपने दो वक्त के चूल्हा जलने की ही फ़िक्र है बस. रोजमर्रा के जीवन की ढेर सारी फिक्रों के बीच अजब सी बेफ़िक्री है नीलगढ़ में. यह बेफिक्री इस गाँव का मिजाज़ है जहाँ से आता है यह भोला सा मधुर वाक्य जो हाल-चाल पूछने पर लगभग सबके ही मुंह से बा तसल्ली निकलता है कि ‘सब मजेदारी है.’

यह कथा शुरू होती है फ्लैशबैक में जब ज़िन्दगी की बुनियादी चीज़ों के लिए संघर्षरत इस गाँव में दिल्ली से एक नवयुवक अनंत आता है. वो आता है अपने रिसर्च पेपर को लेकर किये जाने वाले शोध के सिलसिले में लेकिन इस गाँव में स्नेह का जो बिरवा मिला उस नवयुवक को संघर्षों की जो तपिश देखि उसने गांववालों के जीवन में कि वो वापस लौटकर जा न सका. यहाँ के लोगों का अभाव इस युवक को सालने लगा. उसे लगा उसका शोध तो पूरा हो जायेगा लेकिन इन गाँव के लोगों के जीवन में क्या बदलेगा भला. विचारों के झंझावत में उलझा यह युवा एक रोज अपने शोधपत्र के पन्नों को पुर्जा-पुर्जा कर हवा में बिखेर देता है. अपने चमचमाते भविष्य के सपने को किनारे करता है और नीलगढ़ के लोगों से दिल लगा बैठता है. उनके जीवन में कुछ सकारात्मक बदलाव कर सके ऐसी इच्छा के साथ गाँव में आकर बस जाता है. फिर क्या-क्या होता है, कैसे-कैसे होता है यही है समूची कथा.

इसे अगर किताब की तरह पढ़ेंगे तो सिर्फ खूबसूरत भाषा, शैली, व्यंजनात्मक लहजे में लिखे 33 अध्याय मिलेंगे जिन्हें पढ़ते हुए आपको निसंदेह बहुत अच्छा लगेगा. लेकिन अगर इसके पन्नों का हाथ थाम नीलगढ़ की यात्रा पर निकलेंगे तो नीलगढ़ की खुशबू मिलेगी, नदियाँ मिलेंगी, पोखर मिलेंगे. चिकना पत्थर मिलेगा, भूख मिलेगी, तीन दिन की भूख के बाद गुड़ की डली का स्वाद जबान पर महसूस होगा. त्यौहार मिलेंगे, शादी ब्याह मिलेंगे, गाँव की बिटिया की विदाई के वक़्त की रुलाई में फफक उठेंगे आप. इस किताब को पढ़ते हुए मिलेंगे ढेर सारे ऐसे वाकये जो अब तक के जाने समझे से कहीं आगे ले जाकर खड़ा कर देंगे.

हाँ, यह अचरज की ही तो बात है कि जब हर कोई सुंदर और सुरक्षित भविष्य के लिए जी तोड़ मेहनत कर रहा है कोई युवक नीलगढ़ से इश्क़ कर बैठता है. और जब इश्क़ किया तो फिर हद कैसी, भूख प्यास क्या, अपमान क्या और मान क्या. सिनेमा के दृश्यों की तरह खुलती है कथा नीलगढ़. इसकी गढ़न ऐसी है कि कभी चलते-चलते दुःख गए पांवों को आराम मिलता है इस कथा की छाँव में बैठकर. कभी किस्सागोई का स्वाद मिलता है, कभी कविता की नरमाई. कभी-कभी एहसास होता है कि हम किसी उपन्यास को पढ़ रहे हैं और आगे क्या होगा का भाव किताब छोड़ने ही नहीं देता. अगर यह फिक्शन होता तो कमाल का फिक्शन होता लेकिन यह फिक्शन नहीं है. यह समूचा जिया गया जीवन है. इसमें पाँव की जो बिंवाइयां हैं, भूख है, तकलीफें हैं, अभाव हैं, अपमान हैं वो लेखक की कल्पना का संसार नहीं इस देश के एक कोने का सच है. लेखक खुद इस किताब में कही जा रही कथा का नायक है हालाँकि लेखक ने खुद को नहीं नीलगढ़ के लोगों को, वहां के जीवन को ही नायक बनाया है.

अगर कोई नीलगढ़ में जाकर बस गये और उस गाँव में बदलाव के लिए कार्य करने वाले युवा अनंत गंगोला से बात करके यह किताब लिखता तब इतनी सुगढ़, परिमार्जित और साहित्यिक दृष्टि से भी समृद्ध किताब की कल्पना करना आसान था लेकिन चूंकि यह किताब खुद अनंत गंगोला ने लिखी है इसलिए कई बार हैरत भी होती है कि एक व्यक्ति कितना समृद्ध हो सकता है जीवन जीने के सलीके को लेकर भी उस सलीके की बाबत बात करने की बाबत भी और उसे किताब के रूप में दर्ज करने को लेकर भी. यह किताब साहित्य की तमाम विधाओं को अपने भीतर समेटने को आतुर दिखती है. कविता, कहानी, उपन्यास, डायरी, संस्मरण, यात्रा वृत्त.

कथा नीलगढ़ पढ़ते हुए यह समझा जा सकता है कि शिक्षा में काम करते हुए क्या नहीं करना है और क्या करना है. बहुत जानना अच्छे शिक्षक की निशानी नहीं बल्कि बच्चों को समझना, उनके मन को, उनके परिवेश को समझना, उनके भीतर की सीखने की इच्छा को सहेजना पहली जरूरत है. बच्चों को एक पूरा नागरिक मानना, उनकी इच्छा को उनकी सहमति असहमति को निर्णयों में शामिल करना और उन्हें सम्मान देना कितना जरूरी है यह बात शिक्षा के बड़े परिदृश्य से गायब ही दिखती है. बच्चों की गलतियों को किस तरह देखना है, उन्हें गलती करने के अवसर देना कितना जरूरी है और उन गलतियों से सीखना है हम बड़ों को, गलतियों के कारणों को जानकर उन कारणों पर काम करना है हम बड़ों को यह सिखाती है कथा नीलगढ़. असल में यह किताब एक बेहतर मनुष्य होना सिखाती है, बताती है कि अगर ठान ही लें हम कुछ करना तो राहें खुलती जाती हैं. एकला चलो रे...से शुरु हुए अनंत गंगोला के सफर में धीरे-धीरे तमाम लोग जुड़ते गए और यह एक कारवां बनता गया.

यह अचरज सहेज लिए जाना वाला है कि जिस गाँव के लोगों ने स्कूल का नाम भी नहीं सुना, जिन्हें खाने, पहनने की चुनौतियों से ही फुर्सत न थी उनसे जब पूछा गया कि इस गाँव में क्या बदलाव चाहते हैं तो वो कहते हैं, ‘स्कूल’. बतौर शिक्षक हर किसी को अपनी जिम्मेदारी की सघनता से जोड़ता है नीलगढ़वासियों का यह कहना. शिक्षा की जरूरत को समझने लगा है समाज का आखिरी व्यक्ति. अब जिम्मेदारी है शिक्षक की उस जरूरत को अपने होने से सहेज ले. शिक्षा की ओर कदम बढ़ा रहे पहली पीढ़ी के बच्चों का हाथ थाम सम्मान के साथ उन्हें मुख्यधारा में लायें. अगर संसाधनों से रहित एक गाँव में एक युवक उस गाँव के बच्चों को शिक्षित करने के लिए खुद के जीवन को झोंक सकता है बिना किसी वेतन के, बिना किसी सुविधा के तो जो पेशेवर शिक्षक हैं वो क्या नहीं कर सकते.

शिक्षक होना सिर्फ बच्चों को पढ़ाना नहीं होता, उनके अभिभावकों से जुड़ना, उनके दुःख-सुख में शामिल होना उनके जीवन की छोटी-छोटी लड़ाइयों में उनका साथ देना होता है. कोई कह सकता है कि किताब के लेखक अनंत गंगोला ने एक सनक की तरह नीलगढ़ में रहना चुना और वहां काम करना शुरू किया यह सबके लिए संभव नहीं. लेकिन अगर हम इस समाज में सचमुच कुछ सकारात्मक बदलाव चाहते हैं, देश समाज में जो हो रहा है उस पर चाय पीते हुए चर्चा करने से आगे बढ़कर कुछ करना चाहते हैं तो हम पायेंगे कि हमारे आसपास तमाम नीलगढ़ हैं. हम सबको अपने भीतर के उस अनंत को तलाशना है जो जीवन पर, प्रेम पर मनुष्यता पर भरोसा करता है और उसी भरोसे की उंगली थाम बदलाव के सफर पर चल पड़ता है.

इस किताब को पढ़ते हुए हमें अपने भीतर की उस यात्रा पर निकलने का अवसर मिलता है जीवन की आपाधापियों में जहाँ जाना हमसे छूट गया था. कथा नीलगढ पढ़ते हुए कई बार रोयें खड़े होते हैं, कई बार मन गुस्से से भर उठता है और कई बार बुक्का मारकर रोने का दिल करता है.

एक और बात इस किताब को ख़ास बनाती है वो है इसका प्रोडक्शन. एकलव्य प्रकाशन से प्रकाशित हुई इस किताब की बुनावट, बनावट बहुत ही कलात्मक है, बहुत सुंदर है.

किताब- सब मजेदारी है! कथा नीलगढ़
लेखक- अनंत गंगोला
प्रकाशक- एकलव्य प्रकाशनमूल्य- 175 रुपये

Sunday, March 27, 2022

टर्निंग प्वाइंट




जब आँखें नींद से बोझिल होने लगती हैं ठीक उसी वक़्त नींद न जाने कहाँ चली जाती है. फिर उन सपनों को टटोलते हूँ जिन्हें असल में नींद में आना था. उन सपनों में एक सपना ऐसा भी है जिससे बचना चाहती हूँ. लेकिन जिससे बचना चाहते हैं हम वो सबसे ज्यादा सामने आ खड़ा होता है. उस अनचाहे सपने से मुंह चुराने की कोशिश में रात बीतती है और सुबह होते ही कोयल जान खाने लगती है.
 
बालकनी की खिड़की खोलते ही मंजरियों की ख़ुशबू घेर लेती है. पूरा शहर इस ख़ुशबू में डूबा है इन दिनों. इस ख़ुशबू में एक दीवानगी है, उम्मीद है. कुछ रोज में ये शाखें जो मंजरियों से लदी पड़ी हैं फलों के बोझ से झुकने लगेंगी. फिर शहर फलों की ख़ुशबू में डूब जाएगा.

इन सबके बीच मैं नींद तलाशते हुए कोयल से झगड़ा करुँगी.

उसे अपनी कशमकश की बाबत कुछ नहीं बताउंगी. किसी को नहीं बताउंगी कि मुझे किसी से कोई भाषण नहीं सुनना. हाँ, जानती हूँ कि जिदंगी एक ब्लाइंड टर्न पर है, उस पार न जाने क्या होगा की धुकधुकी, उदासी, उम्मीद सब मिलजुल कर मन का ऐसा कॉकटेल बना रहे हैं कि क्या कहूँ. सोचती हूँ, कहीं छुप जाऊं, दूर से देखूं खुद को. इस मोड़ के पार होने तक आँखें बंद किये रहूँ लेकिन आँखें बंद करने का ऑप्शन नहीं है. खुली आँखों से यह मोड़ पार करना है...उस पार क्या पता मीठी नींद हो, थोड़ी कम बेचैनी हो और हो कुछ ऐसा जिसे देख दिल कहे, अरे, यही...बस इसी की तो तलाश थी...

रात गुज़ारिश के 'ये तेरा ज़िक्र है या इत्र है' के साए में बीती और सुबह 'सौ ग्राम ज़िन्दगी' गुनगुना रही है.
मैं उम्मीद के काँधे पर सर टिकाये हूँ और कोयल कमबख्त जली जा रही है, कूके जा रही है...

https://www.youtube.com/watch?v=saH2Shlup1Q

Saturday, March 19, 2022

बेआवाज टूटता है कोई दुःख


यूँ ख़ुशी के साथ हल्की उदासी की रेख हमेशा ही चलती है. इन दिनों यह बढ़ गया है. एक युवा अचानक उठकर चल दिया अनंत की यात्रा पर. क्या दुनिया का कोई शब्द, कोई बात उसे जरा भी कम कर पाने में सक्षम है. दुनिया की तमाम इबारतें, तमाम शब्दकोष रुआंसे हैं, मौन हैं, उस दुःख के आगे सजदे में हैं. कोई लौटा नहीं सकता उसे जो अब स्मृति के देश का वासी हो गया है. कितने लम्हे जीने थे अभी साथ में, कितने सपने साथ देखने थे, कितना कुछ था जो छूट गया. जैसे बजते हुए एक मीठा राग अचानक साज बिखर गया, टूट गया. वह राग टूटा ही रहेगा अब.

कितना कुछ होना था इस जीवन में
जो हुआ ही नहीं
कितना कुछ था जो अधूरा छूट गया
कितनी शिकायतें
जिनकी कभी सुनवाई न हुई
कितने रास्ते पथिकों के इंतजार में रहे
कितने सुख रखे-रखे ऊंघते रहे
और एक दिन उनके गालों पर
झुर्रियां उग आयीं
कितनी चुप्पियाँ शब्दों के ढेर के नीचे
बेआवाज कराहती रहीं

कितना कुछ होना था इस जीवन में
जो हुआ ही नहीं
कि ढेर सपने होने थे सबकी आँखों में
प्रेम के, मनुहार के, मेलजोल के
और उनमें झोंक दी गयी हिंसा, घृणा, लिप्सा
कितने कदम चलना था साथ एक लय में
और बिना किसी लय के भागते ही रहे कदम
किसी के दुःख में बैठना था
उसके काँधे से सटकर चुपचाप
और हम तलाशते रहे शब्द
हम एक जरा सी दूरी तय न कर सके
जबकि कोई लांघकर चला गया
समूचा जीवन, समूचा मोह

होना तो यह था कि
उदास हथेलियों को लेकर अपने हाथ में
कोई कहता कि मैं हूँ न...
और सचमुच जीवन में
खिल उठता बसंत इन्हीं तीन शब्दों से
लेकिन तमाम उम्र उम्मीद के
टूटने की आवाजें बटोरने में गुजर गयी
कितना कुछ होना था इस जीवन में
जो हुआ ही नहीं.

Wednesday, March 16, 2022

प्रेम के प्रेम में होना


इस तस्वीर को देखती हूँ तो भीतर कुछ भरावन सी महसूस होती है. सघन प्रेम का स्वाद है इस तस्वीर में. जैसे जिए जा रहे एक लम्हे में डूबे हुए दो लोगों की कोमल छवि को सहेज लिया हो किसी ने. इतने सुभीते से कि जिए जा रहे लम्हे को ख़बर भी न हो.

इस तस्वीर में तीन प्रिय लेखक हैं. एक हैं मेरे प्रिय लेखक मानव, दूसरे हैं मेरे प्रिय लेखक विनोद कुमार शुक्ल और तीसरे जो कि असल में पहले हैं मानव के प्रिय लेखक. पाठक इस तरह अपने लेखक के साथ खुद को जोड़ता चलता है जहाँ एक त्रयी बनती है, अपनेपन की एक धुन बनती है.

मानव को उनकी पहली पुस्तक के प्रकाशन के बहुत पहले से पढ़ रही हूँ. वो मुझे बहुत अपने से लगते हैं. उनके लिखे में एक ख़ास बात है वो यह कि ज़िन्दगी की तमाम उलझनों के बीच जब-जब पढ़ने-लिखने की खिड़की बंद हुई, कुछ भी लिखना पढ़ना स्थगित हुआ, सोचना समझना मुश्किल हुआ तब भी मानव को पढ़ने की राह खुली ही मिलती थी. उनकी ब्लॉग पोस्ट्स को कई-कई बार पढ़ा है. उनके नाटकों को पढ़ा है, नाटकों को देखा है, कविताओं से बातें की हैं. ऐसे ही शायद मानव ने विनोद कुमार शुक्ल को पढ़ा होगा. शायद नहीं यकीनन. इससे ज्यादा ही शायद.

आत्मीयता की ऐसी गढ़न, ऐसी खुशबू बेहद स्वाभाविक होती है. इसे चाहकर रचा नहीं जा सकता. जैसे किसी को चाहकर प्रेम नहीं किया जा सकता. वो तो बस हो जाता है. यह उसी हो गये प्रेम की तस्वीर है. इस तस्वीर में उस पाठक के सुख की बाबत लिखा नहीं जा सकता जो इन दोनों के प्रेम में हो.

ऐसा ही अनुभव मुझे मारीना और रिल्के की बाबत हुआ था. मेरी प्रिय लेखिका मारीना और मेरे प्रिय लेखक रिल्के. जब मुझे मारीना और रिल्के के पत्र पहली बार पढ़ने को मिले थे मैं ख़ुशी से झूम उठी थी. नाचती फिरती थी. जैसे कोई खजाना मिल गया हो. मुझे याद है मारीना किताब पर काम का सबसे पहला हिस्सा उन्हीं पत्रों से शुरू हुआ था. यह अजब सी ख़ुशी होती है. इस ख़ुशी में एक गढ़न होती है, एक खुशबू होती है, कोई संगीत होता है. इस ख़ुशबू में रच-बस जाने का मन करता है. इस संगीत में डूबे रहने का जी चाहता है.

विनोद जी के स्नेहिल एक्सप्रेशन और मानव का उनके लाड़ में लिपटा हुआ होना. विनोद जी से मिलने की मेरी इच्छा को कुछ ठौर मिलता है इस तस्वीर में. मैं इस तस्वीर के प्रेम में हूँ.

चाय की तलब ज़िन्दगी की तलब है

सुख की परत बहुत हल्की सी होती है. लेकिन बहुत आकर्षण होता है उसमें. हम खिंचे चले जाते हैं उसकी ओर. उसके भीतर गाढ़ा दुःख जमा होता है. वो दुःख हमारे साथ हो लेता है. हम उसके साथ हो लेते हैं. शुरू-शुरू में उस दुःख में भी सुख की ख़ुशबू मौजूद मिलती है. धीरे-धीरे वो ख़ुशबू विलीन होती जाती है. दुःख की अपनी ख़ुशबू उगने लगती है. हमें वो अच्छी लगने लगती है. हमें दुःख की आदत होने लगती है. तब भी जब हम उस दुःख से निकलना चाहते हैं अनजाने कहीं इच्छा रहती है कि वो दुःख हममें बचा रहे, चाहे थोड़ा सा ही. एक रोज एहसास होता है कि इस दुःख के बिना तो हमारा अस्तित्त्व ही नहीं रहा. इसके बिना हम रहेंगे कैसे, जियेंगे कैसे. फिर हम कंधे चौड़े करते हैं, खुद को दुःख से मुक्त करने के लिए तैयार करते हैं और एक रोज...

...एक रोज हम सच में दुःख से आज़ाद हो जाते हैं. अब न कोई इंतज़ार, न कोई पीड़ा न कोई मुक्ति की इच्छा. जीवन एकदम खाली हो जाता है. इतना खाली जिसकी न हमें आदत थी न अनुभव. खाली पड़े पेड़ों की शाखों की तरह इस उम्मीद में कि कोई कोंपल फूटेगी...

फिर हम उस दुःख की याद को याद करते हैं. वो याद नहीं आता, वो जा चुका है. 

जब जीवन से सुख और दुःख दोनों जा चुके हों तब जीवन कितना मुश्किल होता है यह जीकर ही जाना जा सकता है. अब स्मृतियों को खुरचने से भी दुःख वापस नहीं आता...खाली आँखों में न कोई सपना, न कोई आंसू.

देह जैसे साँसों का बोझ ढो रही हो. कि सांस है तो जीने की जिम्मेदारी है जिसे सलीके से जीना है. जीना क्यों है लेकिन...इसका जवाब मिलता है कि मरना भी क्यों है आखिर. इस सबके बीच जीवन दूर कहीं मुस्कुरा रहा होता है. हमें सुख और दुःख के खेल में उलझाकर वो रामनारायण की टपरी पर चाय सुड़क रहा है. 

कदम चाय की टपरी की ओर अनायास बढ़ने लगते हैं लेकिन रामनारायण की टपरी जिस क्षितिज पर है वहां पहुँचने की यात्रा अनवरत चलते जानी है...चाय की तलब असल में ज़िन्दगी की तलब है.