Friday, April 3, 2020

ओ ईश्वर मैं समझती हूँ तुम्हारा दुःख


ओ ईश्वर,
मन है तुमसे बातें करने का
जानने का तुम्हारे मन का हाल

कैसे हो तुम
कैसा लगता है तुम्हें
जब तुम्हारे नाम पर
होती हैं हत्याएं
मचती है मार काट

क्या बीतती है तुम पर
जब मंदिरों के भीतर
और मस्जिदों के साये में
अंजाम लेते हैं अपराध

कैसे रोकते हो तुम अपने आंसू
जब नन्ही बच्चियां तुम्हारा नाम पुकारते हुए
रौंद दी जाती हैं
किसके काँधे पर सर टिकाकर
तुम फफक ही पड़ते हो
जयकारों के साथ गालियाँ सुनते हुए

अच्छी सी चाय बनाना चाहती हूँ
तुम्हारे लिए
जानती हूँ भूखे हो सदियों से
कुन्टलों चढ़ते भोग से निर्विकार हो तुम
क्योंकि मुठ्ठी भर अनाज के इंतजार में
दम तोड़ देते लोगों की भूख ही तुम्हारी भूख है

कितने बच्चे, स्त्रियाँ, बूढ़े, जवान
कभी न खत्म होने वाले सफर पर
चलते ही जा रहे हैं
लाठियां और गालियाँ खाते हुए
तुम्हारे पाँव खूब दुःख रहे होंगे न?

सोये नहीं हो न तुम अरसे से
कैसे सो सकता है कोई इन हालात में
कि कर्मकाण्ड की होड़ में
इंसानियत से ही दूर चा चुके भक्त
भला कहाँ सोने देते हैं पल भर भी

कितने अकेले पड़ गए हो
अज़ान, घंटे, घडियालों की आवाज के बीच
बहुत उदास हो न तुम?
ओ ईश्वर मैं समझती हूँ तुम्हारा दुःख
आओ बैठो यहाँ मेरे पास
यह उदास मौसम है...

Thursday, April 2, 2020

खिलना जी भर के


बदलते मौसम की आहटों को सुनना अच्छा लगता है. लेकिन धरती पर उदासियाँ इस कदर बिखरी हैं कि कुछ भी अच्छा लगना बहुत दूर जा चुका है. इतनी दूर कि उस तक हाथ पहुँच नहीं रहा. फूल हैं, किताबें हैं, संगीत है, पंछी हैं फिर भी...

'अच्छा लगने' और और 'अच्छा होने' के बीच अगर दूरी न होती तो शायद यह मुश्किल न होता. मैं 'अच्छा लगने' को 'अच्छा होने' से बदल देना चाहती हूँ. सबके लिए. 

अपनी इस इच्छा के उगने के साथ ही कुछ चटखने की आवाज सुनती हूँ. कुछ फूल और खिल जाते हैं...वो इस कदर खिल रहे हैं मानो कह रहे हों खिलना जी भर के, मौसम कैसा भी हो....

Wednesday, April 1, 2020

हाथ धोते रहें बस...


ज्योति नन्दा- 

लोग मर रहे हैं"- क्रोनोलॉजी
विक्रम संवत 1941 फाल्गुन मास की 1 तिथि, दिनांक 24 फरवरी सन 2020
"लोग मर रहे हैं ,हां वो चीन के वुहान में."
"पता है किसी ने भविष्य वाणी की थी सालों पहले कि लोग मिसाइल से नहीं वाईरस से मरेंगे. अब देखो लोग मर रहे हैं"
"और खाओ चमगादड़, मरो, हम तो वेजिटेरियन हैं कुछ नहीं होगा"
" सुना जर्मनी इटली स्पेन मे लोग मरने लगे हैं"
"पापा! यूरोपियन देश तो कितने डेवलपड हैं फिर भी लोग मर रहे हैं अमेरिका में भी. कैसे?
" लीडरशिप. लीडरशिप का कमाल है बेटा! मजबूत नेता देश को बचा लेता है.
".....जी कोरोना को मार देंगे अकेले. वाॅव."
"बंद करो ये चुम्मा चाटी. भारतीय संस्कृति पूरी दुनिया में फैल रही है सबको नमस्कार."
"आदाब-अर्ज से भी तो बच सकते हैं ?" "चुप रहो ! लोग मर रहे हैं इनको लाॅजिक की पडी है."
"गो कोरोना गो कोरोना गो"
चैत्र मास की 13वी तिथि दिनांक 22मार्च 2020.
" देश को मरने से बचाने के लिये लाकडाउन किया गया है.प्रधानमंत्री जी का साथ दें "
"थाली बजाओ, ताली बजाओ उत्सव मनाओ करोना आ गया यहा भी लोग मरेंगे.देश बच जायेगा"
" मैं ने तो बजा बजा के थाली में छेद कर दिया."
"चमचा तो चमक गया न बस ठीक है. देश बच जायेगा"
"डाक्टर के पास मास्क दस्ताने नहीं है. लेकिन उनको सैल्यूट वो लोगों को बचा रहे हैं."
"अगले चुनाव तक याद रखना सैल्यूट ठोंकते रहना देश बचेगा"
"हाऊ इज द जोश?"
"हाई रिस्क सर"
"चुप! पप्पू कही का"
" लोग मरते हैं अपनी मूर्खता से"
चैत्र मास की पहली तिथी दिनांक 24 मार्च --
"मैने कहा था न. देखो वो सडक पर आ गये मरने के लिए. जाहिल कही के.इनके लिए छुट्टी है घर जा रहे हैं. सबकी जान लेके मानेगे.
"दीज इडियट्स लाॅक देम गोली मार दो."
"सर आपने सरकार से पूछा स्वास्थ्य और शिक्षा बजट कैसे कहाँ? खर्च होता है"
"राफायेल विमान कित्ता शानदार है न देश बचाने के काम आयेगा पड़ोसी के घर में घुस के मारेगा|"
"हम तो लेखक हैं जो देखेगे लिख देंगे "भूख और गरीबी से बडी महामारी कोई दूसरी नहीं यहा तो रोज़ सैकड़ों भूख से मर जाते है. कोरोना क्या चीज है.?"
लाकडाउन काटने के उच्च मध्यमवर्गीय नुस्खे.--
"मजदूरों के पलायन के ह्रदय विदारक, अवसाद पैदा करने वाले वीडिओ और खबरे सोशल मीडिया के जरिये लोगो तक पहुचाने वाले जागरुक नागरिक और पत्रकारों को तुरंत अनफ्रेंड कर दें."
"प्रधानमंत्री को फालो करे."
" आँखे बंद करे, ध्यान करे स्वच्छ नदी कल कल करती बह रही है,हवा बहने की मधुर ध्वनि को महसूस करे. लम्बी सांस भरें कुछ देर रुके फिर छोडे. ऐसा करने से सांस रोकने की क्षमता बढेगी और वेंटिलेटर की कमी महसूस नहीं होगी"
फिर ध्यान करे कि लोग अपने पिछले जनम के बुरे कर्मों की सजा फलस्वरुप असमय मर रहे हैं. ऐसा सोचने से सकारात्मक सोच के रहस्य को जान पायेंगे और अपने मन की बात को दर किनार कर दूसरे के मन की बात को आत्मा में उतार लेंगे .
फिर आप सुख की अनवरत बहती धारा मे कोई व्यवधान उत्पन्न नहीं होगा फिर से ट्वीट करते हुए असीम सुख प्राप्त करेंगे -
"जान से हाथ धोने से बेहतर है बार बार हाथ धोते रहें"

Sunday, March 29, 2020

ये लोग देश हैं, देशद्रोही नहीं हैं


यह नफरत का समय नहीं है, ये सरकार को कोसने का समय नहीं है, ये लेफ्ट राईट के खांचों में बंटने का समय नहीं है. ये समय अपने घरों में बैठे हुए बेघर होने का दर्द महसूस करने का है. अपने पांवों में लगातार चलने से होने वाले दर्द को महसूस करने का. कई कईं दिन की भूख को महसूस करने का. और जितना संभव हो किसी की भूख को खाने से बदल पाने का. ज्यादा और ज्यादा मनुष्य होने का.

ये समय है किसी भी तरह पैदल, भटकते देश के साथ खड़े होने का. वो लोग जो पैदल चले जा रहे हैं वो न हिन्दू हैं, न मुसलमान. न स्त्री, न पुरुष. वो इन्सान हैं. उन्हें आप पर आस्था थी. भरोसा था. जिनके पास थालियाँ थीं उन्होंने थालियाँ बजाई होंगी, आपके गाल बजाने से ज्यादा बजाई होंगी जिनके पास थालियाँ नहीं रही होंगी उन्होंने तालियाँ बजायी होंगी. उन्होंने प्रधानमन्त्री जी की बात को हमेशा गौर से सुना, उनकी बात मानी भी. उन्हें वोट भी दिए. लॉकडाउन हुआ तो भी उन्होंने बात मानी. उदास हुए लेकिन जहाँ थे वहीं रुक गए.

फिर क्या हुआ...जहाँ वो थे वहां से उन्हें खदेड़ा जाने लगा. काम से, बसेरे से. भूखे, बेघर जेब से खाली लोग सड़क पर आ गये. सडक पर आये तो पीटे जाने लगे.

वो पिकनिक मनाने नहीं जा रहे हैं. वो भी हमारी, आपकी तरह घर में रहना चाहते हैं, सैनीटाइज़र से हाथ साफ़ करते, रामायण देखते, खाने की फोटू लगाते फेसबुक पर लेकिन उनके पास नहीं है ये सुविधा. उनके पास एक देह है, भूख है, असुरक्षा है इसलिए वो चल रहे हैं.

सदियों से जो एक सी सामजिक, आर्थिक स्थिति में ठहरे हुए हैं आज वो चल रहे हैं. तब उनके ठहरे हुए जीवन पर हमारी नजर नहीं गयी कि क्यों पीढ़ी दर पीढ़ी ये वहीं के वहीं ठहरे हुए हैं. जीडीपी के आंकड़ों में ये कहीं भी क्यों नहीं हैं. ये सदियों से भूखे हैं, इनका कोई सम्मान नहीं. इनके बच्चे दुखी नहीं होते अपने माँ बाप को पिटते देख. इनके माँ बाप का दिल रोता नहीं जब बच्चा रोटी (पिज़्ज़ा या चाऊमीन नहीं ) मांगता है तो ये एक चमाट मार देते हैं. इनके बच्चे बनती हुई भव्य इमारतों के बीच कहीं कोने में पड़े-पड़े बड़े हो जाते हैं. वही भव्य इमारतें जिनके बन जाने के बाद ये उसमें घुस भी नहीं सकते.

ये दीवारों के पीछे छुपाये जाते लोग हैं. इन्हें हर हाल में मौत से लड़ना होता है, हर दिन. ये देश हैं, देशद्रोही नहीं हैं. इनके प्रति आपके मन में इतना आक्रोश क्यों है आखिर? कहाँ से आया? और खुद को संवेदनशील कहते हैं आप?

नफरत मिटाकर हाथ बढ़ाने का वक्त है इंसानियत की तरफ. जितनी संभव हो जरूरतमंदों की मदद करने का. परिवार के साथ रामायण देखते हुए थोड़ा सा रो लेने का. कोरोना से नहीं नफरत के वायरस से भी लड़ने का वक्त है ये.

(लॉकडाउन डेज़)

Saturday, March 28, 2020

तुम हो तो जीने को जी चाहता है


तुम साथ होती हो तो
आसमान झुक कर
करीब आ जाता है

काँधे से सटकर
बैठ जाती हैं उम्मीदें

बारिश की बूंदे
सिर्फ तुम्हारी खातिर
अटकी रहती हैं देर तक
पत्तों पर

तुम हो तो हर उम्मीद को
थाम लेने की जी चाहता है
तुम हो तो जीने को जी चाहता है.

जन्मदिन मुबारक प्यारी संज्ञा