Friday, October 25, 2019

निर्मल वर्मा स्मृति- बीतकर भी कहाँ बीतता है कुछ


बीतता अक्टूबर पलटकर देख रहा है. सुबह के छह बजे हैं. यह निर्मल वर्मा की सुबह की चाय का वक़्त है. मेरे पास एक प्याला चाय है और हैं निर्मल वर्मा की ढेर सारी स्मृतियाँ. पेड़ों की शाखों पर खिले धूप के गुच्छे अच्छे लगने लगे हैं. गुलाबी ठंड में सिमटी सड़कें अपने आंचल में पीले और लाल फूलों की पंखुडियां समेटे हुए मुस्कुरा रही हैं. दूर किसी कोने पर चाय की टपरी के पास कुछ युवा चाय पी रहे हैं. पास ही नीली गर्दन और सुनहरे पंखों वाली चिड़िया बांस के झुरमुट में छुपने और दिखने का खेल खेल रही है.

थोर्गियर अभी-अभी यहीं कहीं से गुजरे हैं. निर्मल उन्हें देख मुस्कुरा रहे हैं. धीमे क़दमों से चलते हुए वो थोर्गियर के कंधे पर हाथ रखते हुए बेहद धीमे अंदाज और आवाज में कहते हैं, ‘आदमी को पूरी निर्ममता से अपने अतीत में किये कार्यों की चीर-फाड़ करनी चाहिए, ताकि वह इतना साहस जुटा सके कि हर दिन थोड़ा सा जी सके.’ थोर्गियर चाय की टपरी पर रुककर चाय के लिए हाथ बढ़ा देते हैं. निर्मल की बात को चाय के साथ चुभलाते हुए वो नीली गर्दन और सुनहरे पंखों वाली चिड़िया को देखने लगे हैं.

न...न...यह प्राग नहीं है, बर्लिन भी नहीं, पेरिस नहीं, कोपेनहेगन भी नहीं. यह 2019 है. लगभग बीत चुके अक्टूबर की 14 बरस पुरानी पगडण्डी पर निर्मल वर्मा की स्मृति की एक शाख अब तक हिलती है. स्मृति की यह शाख जब हिलती है तो उनके कहानी संग्रह ‘परिंदे’, ‘जलती झाडी’, ‘पिछली गर्मियों में’, ‘कौव्वे और काला पानी’, ‘सूखा व अन्य कहानियां’ याद आते हैं. उनके उपन्यास ‘वे दिन’ ‘एक चिथड़ा सुख’ ‘रात का रिपोर्टर’ ‘लाल टीन की छत’ ‘अंतिम अरण्य’ मुस्कुराते हैं. साथ ही ‘चीड़ों पर चांदनी’ के साए में कोई ‘धुंध से उठती धुन’ सुनाई देती है जो ‘हर बारिश में’ की याद दिलाती है.

निर्मल की डायरी के पन्नों को पलटना अपने भीतर की तमाम गांठों को खोलने सरीखा लगता है. ये पन्ने ज़ेहन पर छाई धुंध को छांटने में मदद करते हैं. उनकी डायरी के इन पन्नों का हाथ थाम काफ़्काई हरारत को अपने भीतर उतरते महसूस करना सुख है. लंदन की सड़कों पर टहलते हुए निर्मल की डायरी के पन्नों की याद का सुख है. किसी दोस्त से प्राग के किस्से सुनना और बर्लिन की यात्रा पर निकल पड़ना सुख है. शिमला की सड़कों से गुजरते हुए शाल को शरीर पर कसकर लपेटते हुए किसी पगडण्डी पर खुद को चलते देखना सुख है. किसी यात्रा के दौरान बड़े से डैने वाले सफेद पंछी(जहाज) के काँधे पर बैठकर बादलों के गाँव में विचरते हुए डूबते सूरज को करीब से देखना और याद करना किसी अल्हड़ सी पहाड़ी धुन को, धुंध में डूबी वादियों में डूबते हुए खुद को डूबने से बचा भी लेना और चीड़ों पर झरती चांदनी को हथेलियों पर उतरते हुए महसूस करना सुख है. यह निर्मल के करीब से होकर गुजरने का सुख है, उन्हें महसूस करने का सुख है. सुख की इस जब्त में उनकी वो सुफेद कोमल और बेहद मुलायम हथेलियों की याद लाज़िम है जब कई बरस पहले ऐसे ही एक मौसम में उनका हाथ मेरे हाथ में था. उस स्नेहिल स्पर्श की स्मृति पलकों के भीतर चमकता हुआ सुख है.

जीवन को देखने का नज़रिया ही तो जीवन को जीवन बनाता है. वरना सांसों के कारोबार से ज्यादा भला क्या है जीवन. निर्मल के करीब बैठना, उस नज़रिये को बनते हुए देखना है. निर्मल का नज़रिया नहीं उनकी जानिब से हमारा खुद का नज़रिया. जीवन के द्वंद्व, उहापोह, आसक्ति, विरक्ति, सामाजिक चेतना, राजनैतिक पक्षधरता, जीवन, मृत्यु सब पर सोचने का एक ढब मिलता है उनके यहाँ.

उनकी डायरियां सिर्फ यात्राओं के कुछ पड़ाव भर नहीं हैं, वो पूरी यात्रा हैं, जीवन की यात्रा. मनुष्य के चेतनशील, संवेदनशील बनने की यात्रा. एक ईमानदार यात्रा जिसमें सिर्फ सुख नहीं था. इसी के साथ यह बात भी मन में उठती है कि सुख आखिर है क्या? वो लिखते हैं, ‘यात्राओं में अनेक ऐसी घड़ियाँ आई थीं जिन्हें शायद मैं आज याद करना नहीं चाहूँगा...लेकिन घोर निराशा और दैन्य के क्षणों में भी यह ख्याल कि मैं इस दुनिया में जीवित हूँ, हवा में साँस ले रहा हूँ, हमेशा एक मायावी चमत्कार-सा जान पड़ता था। महज़ साँस ले पाना-जीवित रहकर धरती के चेहरे को पहचान—पाना यह भी अपने में एक सुख है—इसे मैंने इन यात्राओं से सीखा है.’

उनका कहा कान में गूंजता है, ‘जिस हद तक तुम इस दुनिया में उलझे हो, उस हद तक तुम उसे खो देते हो.’

डायरियों के साथ यह खूबसूरत बात होती है कि वो ईमानदारी से खुद को अभिव्यक्त करने का ठीहा बनती हैं. डायरियों की बाबत निर्मल खुद कहते हैं, ‘डायरी हमेशा जल्दी में लिखी जाती है. उड़ते हुए, अनुभवों को पूरी फड़फड़ाहट के साथ पकड़ने का प्रलोभन रहता है, अनेक वाक्य अधूरे रह जाते हैं, कई बार अंग्रेजी के शब्द घुमड़ते चले आते हैं एक लस्तम-पस्तम रौ में बहते हुए.’

इस लस्तम-पस्तम रौ का अलग ही आकर्षण है. इसी में मिलते हैं कई ईमानदार सवाल और कई बेहद ईमानदार जवाब भी. जीवन अपनी रवानगी में बहता हुआ लस्तम-पस्तम दरिया ही तो है. लगता है निर्मल कहीं गए नहीं हैं, यहीं हैं. बस कि जितनी देर में चाय का पानी खौल चुका होगा, चिड़िया अपने बच्चों को कोई गीत सुना चुकी होगी उतनी देर में वो आकर बैठेंगे ड्राइंग के सोफे पर चाय का इंतजार करते हुए. और पूछेंगे, ‘कैसा चल रहा है जीवन.’ हमारे पास दो ही शब्द होंगे कहने को लस्तम-पस्तम. वो मुस्कुरा देंगे.

https://hindi.thequint.com/zindagani/remembering-nirmal-verma-writer-of-rare-sensibilities?fbclid=IwAR1tPdmm1KuLwi4l-D7GmqCuwbh6iEb-jtLzZ6jjPBtJ17YgnTddCyUZHNc

Friday, October 18, 2019

ये दुनिया तुमसे सुंदर है


इन दोनों ने मुझे संभाल रखा है, मेरा घर संभाल रखा है. ये सोनू और सोनम हैं. एक ने स्वाद का जिम्मा लिया है भूख का जिम्मा लिया है दूसरी ने घर को तरतीबी देने का. दोनों खूब मेहनती हैं और खुशदिल भी. इनके आने से घर में सुबह होती है. सोनू जहाँ मध्धम मुस्कान लिए घर में डोलती फिरती है वहीं सोनम ठठाकर अपनी हंसी से पूरा घर गुंजा देती है. घर में काम तब शुरू होता है जब स्पीकर में बजने शुरू होते हैं इनकी पसंद के गाने. दोनों हँसते गुनगुनाते हुए घर और रसोई सहेजती हैं.

दोनों प्यारी रहेलियां हैं. घर के प्रति, मेरे प्रति दोनों इतनी जिम्मेदार हैं कि कई बार आँखें छलक पड़ती हैं कि कितना प्यार है जीवन में. कितनी ही बार बीमारी की हालात में सोनू ने बिस्तर से उठने नहीं दिया. सब्जी से लेकर दूध तक सब संभालती है. जब भी घर से बाहर होती हूँ, दोनों की मुस्तैदी बढ़ जाती है. मुझसे ज्यादा चिंता करती हैं ये घर की बेटू की, माँ पापा की.

ईमानदारी, प्यार और खुशमिजाजी से भरी ये सहेलियां कई बार मुझे डांटती भी हैं, 'क्या दीदी, आप तो सब भूल ही जाती हैं.' सचमुच ये दोनों मुझे लापरवाह भी बना रही हैं. और इनसे डांट खाने का सुख भी अलग ही होता है.

कितने ही मुश्किल पलों को ये दोनों आगे बढ़कर आसान बना देती हैं, यह कहकर, 'आप फ़िक्र न करो, हम कर देंगे.' इन दिनों घर से दूर हूँ और पल-पल घर की फ़िक्र में ये दोनों मुस्तैद हैं. पापा को ठंडी रोटी न खानी पड़ी इसकी फ़िक्र सोनम संभाले है और बेटू का टिफिन टाइम पर बने और घर बिखरा न रहे इसकी चिंता सोनू उठाये हैं.

इन दोनों प्यारी लड़कियों को मुझसे बहुत प्यार है क्या यह कहने की बात है कि मुझे भी...

शुक्रिया प्यारी सखियों, तुम्हारी मुस्कुराहटें यूँ ही बने रहें.

Sunday, October 13, 2019

स्काई इज़ पिंक



'अगर तुम्हारा स्काई पिंक है तो वो पिंक ही है. किसी के कहने से तुम अपने स्काई का कलर मत बदलना. जो टीचर कहती है कि तुमने स्काई का कलर गलत पेंट किया वो टीचर गलत है. समझे' गले तक भर आये आंसुओं के सैलाब को संतुलित आवाज में समेटते हुए अपने छोटे से बच्चे को उससे बहुत दिनों से बहुत दूर गयी माँ समझाती है. वो उसे नहीं समझाती वो हम सबको समझाती है कि गलत सही के खांचों से बाहर निकलकर हमें बच्चों की दुनिया में प्रवेश करना चाहिए.

'स्काई इज़ पिंक' ओह क्या तो राहत था इसे देखना. क्या तो सुख. कोई कुछ भी कहे लेकिन एक बात को बार-बार महसूस करती हूँ कि माँ होना माँ होकर ही जाना जा सकता है. हालाँकि इसी कन्ट्रास्ट को पोट्रे किया है प्रियंका ने. यह फिल्म है तो बेटी के बारे में लेकिन है एक माँ की फिल्म. प्रियंका चोपड़ा के अभिनय ने एक बार फिर दिल पर मुहर लगा दी है. अदिति (प्रियंका), निरेन (फरहान), ईशान (रोहित), आयशा (जायरा) एक परिवार है. दुःख और संघर्ष की डोर से बंधा परिवार उम्मीद का गुलाबी आसमान रचता नजर आता है.

एक माँ अपने बच्चे के लिए यमराज से भी लड़ जाती है कुछ ऐसी है यह कहानी. जिस बच्चे के जन्म के साथ ही उसके न जी पाने की बात (SCID नामक बीमारी) जुड़ी हो उसके जन्म पर कैसा एहसास हुआ होगा, कैसे उसकी परवरिश एक हर पल के युद्ध में तब्दील होती है. यही कहानी है.

फिल्म की कहानी का बेस दुःख है, संघर्ष है, पीड़ा है, आत्मसंघर्ष है लेकिन पर्दे पर निराशा नहीं उम्मीद दौड़ती है, मुस्कुराहटें गुनगुनाती हैं, आसमान में उड़ने के ख्वाब हैं. वो आसमान जिसका रंग नीला नहीं गुलाबी है, मुस्कुराहटों वाला गुलाबी. जिन्दगी के डिफरेंट शेड्स का कोलाज है फिल्म जो पूरे वक्त कलाई नहीं दिलों की धडकनों को थामकर रखती है.

आमतौर पर जब भी मैं और बेटू फिल्म देखने जाते हैं वो मुझे चिढाती है मम्मा रोना नहीं. जरा सा भी इमोशनल सीन मेरी हिचकियाँ बाँध देता है. इसे लेकर मुझमें कोई संकोच भी नहीं है. कि रोना कोई बुरी बात भी नहीं.

मेरे लिए इस फिल्म पर लिखते हुए फिल्म के बारे में लिख पाना बहुत मुश्किल है क्योंकि मैं इस फिल्म के जरिये अपनी जिन्दगी को ही जी रही थी. 1991 का वह भयंकर एक्सीडेंट. माँ-पापा शहर में थे नहीं. उन्हें दो खबरें मिलीं एक कि गुड़िया अब नहीं रही, दूसरी कि जल्दी पहुँचिये शायद आखिरी बार मिल सकें.
माँ रोई नहीं इस खबर पर. उन्होंने बस इतना कहा बस मुझे उसकी एक सांस मिल जाय फिर मैं सब ठीक कर लूंगी. उन्हें वो एक साँस मिल गयी और उस एक सांस को पकड़कर वो जूझ गयीं. बरसों उन्होंने रुई के फाहे में छुपाकर रखा. सांस-सांस सहेजा, लेकिन टूटी नहीं, हारी नहीं. नौकरी, घर, अस्पताल और एक-एक लम्हे को सिर्फ माँ पर आश्रित बच्ची की तीमारदारी. शायद माँ सोती नहीं थीं. वो थकती भी नहीं थीं. कभी किसी पर नाराज नहीं होती थीं. हमेशा उम्मीद से भरी. और आखिर उन्होंने मुझे खड़ा कर दिया. मुझे उस दौर में माँ की भावनात्मक मजबूती आकर्षित करती है. हालाँकि मैं उनके जैसी मजबूत नहीं हूँ. क्योंकि मेरी बच्काी च वैक्सीनेशन भी मेरे लिए बड़ा युद्ध रहा हमेशा. सो यह जिम्मा उसकी नानी और पापा को मिला. अपने कानों में अपने बच्चे की रोती हुई आवाज को सहेजना कितना मुश्किल होता है यह दिल ही जानता है.

फिल्म सिर्फ फिल्म नहीं थी. भावनात्मक यात्रा थी. परिवार की ताकत को महसूसना था. भाई किस तरह दोस्त बनकर सामने से हंसाता रहता है और चुपके-चुपके रोता है. पिता जो मजबूत दिखने का जिम्मा कन्धों पर उठाये हैं लेकिन टूटते हैं वो भी. यह मजबूती से जुड़े रहने और चुपके-चुपके टूटने की कहानी है.

'भाई मैं मरना नहीं चाहती' लंदन के मेट्रो स्टेशन पर फोन पर मरती हुई बहन से यह सुनना और उसे हल्के-फुल्के अंदाज में सहेज पाना कितना मुश्किल रहा होगा यह फोन कटने के बाद उसके एक्सप्रेशन से कन्वे होता है. जब छोटी बहन के लिए एक-एक सांस सहेजने में माँ-बाप जूझ रहे हों तब माँ से दूर इण्डिया में रह रहा ईशान भी तो बचपन के लिए जूझ रहा होगा लेकिन इसकी कोई शिकायत नहीं दर्ज होती समझ दर्ज होती है. बच्चों को खेलने, शैतानी करने और जिद करने की उम्र में समझदार होने की सजा बड़ी सजा होती है. मेरे जेहन में ईशान के उस बचपन के पन्ने खुलते हैं जो सेल्यूलाइड के पर्दे पर नहीं खुले.

अपने हाथों में सिर्फ 24 घंटे का जीवन लेकर आई रोती-बिलखती बच्ची को सहेजती प्रियंका की पीड़ा झकझोर देती है.आह. जीवन कितना क्रूर होता है, फिर भी कितना सुंदर कि पैसे की कमी इलाज के आड़े आने नहीं देते दुनिया भर के लोग सिर्फ एक रेडियो अपील के बाद.

सच कहूँ, अभी भी रो रही हूँ. हम माँ बेटी पहली बार पूरी फिल्म में चुप थे लेकिन यह दुःख की चुप्पी नहीं थी. वापस लौटते हुए बेटू ने एक बात कही, 'मम्मा दुःख की एक ख़ास बात होती है न, वो सबको कितना जोड़कर रखता है न ?'

हम एहसासों से भरे हुए साथ चल रहे थे...जैसे चलती है हरसिंगार की खुशबू उसके करीब दो पल बैठकर चलने के बाद.

शुक्रिया सोनाली बोस!

Thursday, September 26, 2019

ये दुनिया तुमसे सुंदर है


जब ये कक्षा 6 में थीं तब इनसे मुलाकात हुई थी. पहली बार. फिर इनसे दोस्ती हो गयी. फिर दोस्ती गाढ़ी होती गयी. अब ये कक्षा 8 में हैं. हम बातें करते हुए सीखते हैं एक-दूसरे से. मैं ज्यादा सीखती हूँ ऐसा महसूस करती हूँ. इन बच्चियों ने अपने जीवन की पहली चिठ्ठी लिखी मेरे संग. अपने सपनों के बारे में बताया मुझे. मेरे सपनों की पड़ताल की. मेरा हाथ थामकर अपने स्कूल के बारे में सब बताया. कोना-कोना घुमाया. आज जब स्कूल पहुंची तो थोड़ी नाराजगी से मिलीं ये सहेलियाँ. नाराजगी इसलिए कि काफी दिन बाद जाना हुआ था. लेकिन जैसे ही मैंने कान पकड़कर माफ़ी मांगी सब की सब हंस दीं. माफ़ कर दिया मुझे. और हाथ पकड़कर ले गयीं उस बगिया में जो इन बच्चों ने अपने हाथों से उगाई है, सजाई है. उन पेड़ों के पास ले गयीं जो इन्होने लगाये हैं. वादा किया जब इन आम के पेड़ों में फल आयेंगे तो मुझे भी मिलेंगे. बस कि मुझे वहां आना होगा.

तनिषा एथलीट है अभी स्टेट लेवल की खेल कूद प्रतियोगिताओं में उसने तीसरा स्थान प्राप्त किया है. अनीता पेंटर बनना चाहती है. नीति पुलिस में जाना चाहती है. उसकी आँखों में चमक है. वो चाहती है कि सारी लड़कियों को सुरक्षा दे सके अंशिका टीचर बनना चाहती है. हम बातें करते हुए जिन रास्तों से गुजर रहे थे बरसात ने उन सड़कों की हालत खराब कर रखी थी. हवाओं के पंखों पर सवार ये लड़कियां उड़ती फिर रही थीं. मैं संभल-संभल कर चल रही थी वो फलांगती फिर रही थीं. नीति ने कहा प्रधान जी आयेंगे तो सड़क बनेगी. क्या तुममें से कोई प्रधान नहीं  बनना नहीं चाहती? मैंने पूछा तो अंशिका ने कहा, राजनीति पसंद नहीं हमें. यानि प्रधान होना राजीनति में होना है यह पता है उन्हें. उनमें से एक बच्ची के पिता प्रधान हैं. हमने छवि राजावत के बारे में बात की. मैंने उन्हें छवि के बारे में बताया तो अंशिका ने कहा, अरे वाह हमने सोचा नहीं था ऐसा कि हम प्रधान भी बन सकती हैं. अब हम जरूर इस बारे में सोचेंगे.

लड़कियां बोलती कम थीं, हंसती ज्यादा थीं. इन लड़कियों ने शहर ने नहीं देखा है. इनकी दुनिया में मोबाईल नहीं है. फेसबुक नहीं है. वाट्स्प भी नहीं है. इनकी दुनिया में पेड़ हैं, नदियाँ हैं, पगडंडियाँ हैं, बारिशें हैं...खिलखिलाहटें हैं. मैं इनकी खिलखिलाहटों को पूरी दुनिया में बिखेर देना चाहती हूँ. मैं इनकी मुस्कुराहटों को नजर के काले टीके में सहेज देना चाहती हूँ. 

जब मैं वहां से चली, ये लड़कियां मेरे नाम की चिठ्ठी लिख रही थीं...मुझे उनकी लिखी चिठ्ठियों का इंतजार नहीं है. शायद मैं जानती हूँ उन चिठ्ठियों में क्या लिखा होगा. उनकी खिलखिलाहटों की कर्जदार हूँ. उनके लिए एक बेहतर दुनिया बनाने का कर्ज...

Thursday, September 19, 2019

थोड़ा सा उगने लगी हूँ



गृह प्रवेश कराने को कोई दरवाजे पर धान का कटोरा भरकर, रंगोली का थाल सजाकर नहीं बैठा था. किसी ने दरवाजे पर हथेलियों की थाप नहीं ली. कोई इंतजार में नहीं था रोली कुमकुम लिए स्वागत का शगुन करने को. उल्टे करने को बहुत सारे काम थे. दीवारों के रंग सूखे नहीं थे, लकड़ी का काम अधूरा ही पड़ा था अभी, सामान कहीं से लोड कराना था कहीं उतरवाना था. कितने लोग थे पेमेंट के इंतजार में. कितना ही रखो हिसाब कुछ न कुछ गड़बड़ा ही जा रहा था. थक के चूर था जिस्म कुछ भी महसूस करने की गुंजाईश के बिना बस भागते-दौड़ते हुए धरती एक कोने पर अपना नाम लिखना था, सो लिख दिया. यूँ सुरक्षा जैसा कुछ होता नहीं फिर भी कुछ वहम बचे रहें तो जीना जरा आसान हो जाता है यही सोचकर सर पर एक छत होने का सुख आंचल में बाँधने चल दी थी. अपने लिए या अपनों के लिए पता नहीं.

इस दौड़-भाग में ही एक रोज धरती के इस कोने से बतियाने बैठी थी. बारिश थी उस रोज बहुत. मिट्टी की खुशबू बारिश के लिबास में सजकर अलग ही रूआब में थी. मैंने हथेलियों में जितनी आ सकती थी उतनी मिट्टी भरी. दोनों हथेलियों को कसकर भींच लिया था. बरिश बहुत तेज़ हो गयी थी. हथेलियों से मिट्टी बहते हुए सरक रही थी. मैं भी सरक रही थी धीरे-धीरे. यह धरती के उस कोने से जुड़ने के पल थे...मोहब्बत के पल थे. मैं उस पल मिट्टी हुई जा रही थी. मिट्टी में समाती जा रही थी. कुछ ही देर में बारिश, मिट्टी और मुझमें कोई अंतर नहीं बचा था. उसी रोज उसी मिट्टी में मैंने जूही का एक छोटा सा पौधा लगाया था. सोचा था यह लम्हा सहेज दूँगी इस पौधे में. मिट्टी से प्यार करिए, बारिश से प्यार करिए वो कभी धोखा नहीं देती. उस लम्हे को खूब प्यार से सहेजा धरती के उस कोने ने. जूही का वह नन्हा पौधा अब बड़ा हो गया है. बेल बनकर चढने को आतुर है. अलग-अलग शाखाएं इधर-उधर कूदफांद करते हुए हाथ-पाँव मार रही हैं.

आँखें मलते हुए इस नन्हे की हथेलियों पर पहली-पहली कलियाँ आयीं हैं. जूही की कच्ची कलियाँ. गुलाबी रंग है इनका. अभी खिली नहीं हैं, अभी ठीक से मुस्कुराना भी नहीं सीखा है इन्होंने. बस कि आवाज देकर मुझे पुकारना सीखा है. मैं देर तक इन कलियों के करीब बैठी रही. जूही की इस बेल के बहाने मैंने खुद को ही तो रोपा था मिट्टी में, देखती हूँ जड़ें पकड़ ली हैं...जिंदगी का सफर चल पड़ा है. संघर्ष की मिट्टी में ख्वाहिशों की बेल उगने लगी है. कलियों के खिलने में, खुशबू बिखरने में अभी वक़्त है लेकिन बिखरेगी जरूर.

यह खुशबू इस धरती से तमाम नाउम्मीदी को मिटाएगी.
आमीन !