Friday, September 28, 2018

फेवरेट सिनेमा- अनुरनन


ये शाम इतनी खूबसूरत है, क्या इसे मैं हमेशा के लिए अपने पास नहीं रख सकती? जब कभी मेरा मन उदास हो जाय तब इसी शाम को क्या मैं फिर से नहीं जी सकती?
क्यों नहीं? बस करना यह है कि ऐसे लम्हों को एक याद में बदल देना है,
'शब्द होते हैं पल भर के लिए निशब्द होता है अनंतकाल के लिए.'

( फिल्म अनुरनन से)

'अनुरनन' ( resonance ) यह मेरी प्रिय फिल्मों में शुमार है. इस पर मैं बहुत तसल्ली से लिखना चाह रही थी.हालंकि तसल्ली अब भी कहाँ मिली है. सिनेमा किस तरह अपना असर दिखाता है, किस तरह वो आपके करीब आकर बैठ जाता है. किरदार आपसे दोस्ती कर लेते हैं ऐसा कुछ महसूस हुआ इस फिल्म को देखते हुए. फिल्म के सभी किरदार राहुल बोस, रितुपर्णो सेनगुप्ता, राइमा सेन और रजत कपूर बेहद संतुलित ढंग से फिल्म में अपनी भूमिकाओं में पैबस्त हैं. मानो वो अभिनय न कर रहे हों, एक खूबसूरत धुन में गुम हों. फिल्म के कुछ दृश्य तो तमाम थकन को निचोड़कर फेंक देने में कामयाब हैं.

बेहद सुंदर भरोसे और प्यार भरे रिश्तों के बीच भी अचानक किस तरह समाज अपनी गलतफहमियों की टोकरी उठाये दाखिल होता है और फिर होता ही जाता है. जिस वक़्त आर्टिकल 497 को लेकर तरह तरह की विवेचनाएँ आ रही हों उस वक़्त ऐसे रिश्तों के ताने-बाने से गुंथी फिल्म को दोबारा देखा जाना चाहिए. समाज की गलतफहमियों वाली टोकरी उतारकर दूर रख आने से जिन्दगी कितनी खूबसूरत, कितनी आसान हो सकती थी लेकिन ऐसा होना कहाँ आसान है.

फिल्म कई परतों में खुलती भी है और हमारी तमाम परतों को खोलती भी है. सच कहूँ तो इस फिल्म ने बहुत सुकून बख्शा था एक वक़्त में. सिनेमोटोग्राफ़ी सुंदर है. फिल्म के तमाम दृश्य किसी तिलस्मी सौन्दर्य से भरपूर नजर आते हैं. बात करने को दिल नहीं चाहता, सिर्फ उन दृश्यों में गुम जाने को जी चाहता है अपनी साँसों की आवाज सुनते हुए.


Monday, September 17, 2018

फेवरेट सिनेमा- सिमरन



प्यारी सी है सिमरन...

अगर बात सिर्फ बंधनों को तोड़ने की है तो बात जरूरी है लेकिन बात जब बंधनों को पहचानने की हो तो और भी ज़रूरी हो जाती है. सही गलत सबका अपना होता है ठीक वैसे ही जीवन जीने का तरीका भी सबका अपना होता है. भूख प्यास भी सबकी अपनी होती है, अलग होती है. हमारा समाज अभी इस अलग सी भूख प्यास को पहचानने की ओर बढ़ा नहीं है. सिमरन उसी ओर बढती हुई फिल्म है.

जाहिर है हिंदी फिल्मों में भी एक लम्बे समय तक अमीरी गरीबी, जातीय वर्गीय भेद, सामंती पारिवारिक दुश्मनियों के बीच प्यार के लिए जगह बनाने की जद्दोजहद में लगा हिंदी सिनेमा अंत में मंगलसूत्रीय महिमा के आगे नतमस्त होता रहा. फिर समय आया कि अगर एक साथी बर्बर है, हिंसक है, बेवफा है तो कैसे सहा जाए और किस तरह उस साथी को वापस परिवार संस्था में लौटा लाया जाए, लेकिन इधर हिंदी सिनेमा ने नयी तरह की अंगड़ाई ली है.

शादी, प्यार, बेवफाई के अलावा भी है जिन्दगी यही सिमरन की कहानी है. कंगना पहले भी एक बार 'क्वीन' फिल्म में अपने सपने पूरे करने अकेले ही निकलती है. शादी टूटने को वो सपने टूटने की वजह बनने से बचाती है लेकिन सिमरन की जिंदगी ही एकदम अलग है. वो प्यार या शादी की तमाम बंदिशों से पार निकल चुकी है. शादी के बाद तलाक ले चुकने के बाद अपनी जिंदगी को अपनी तरह से जीना चाहती है. उसके किरदार को देखते हुए महसूस होता है कि किस तरह नस-नस में उसकी जिंदगी जीने की ख्वाहिश हिलोरे मारती है. जंगल के बीच अपनी फेवरेट जगह पर तितली की तरह उड़ती प्रफुल्ल यानि कंगना बेहद दिलकश लगती है. उसका प्रेमी उसे कहता है, 'कोई इतना सम्पूर्ण कैसे हो सकता है, तुम्हें सांस लेते देखना ही बहुत अच्छा लगता है'. सचमुच जिंदगी छलकती है सिमरन यानि प्रफुल्ल में.

वो अपने पिता से कहती है, 'हाँ मैं गलतियां करती हूँ, बहुत सी गलतियां करती हूँ लेकिन उन्हें मानती भी हूँ न'. वो जिंदगी का पीछा करते-करते कुछ गलत रास्तों पर निकल जाती है मुश्किलों में फंसती चली जाती है लेकिन हार नहीं मानती। उसकी संवेदनाएं उसका साथ नहीं छोड़ती। बैंक लूट के वक़्त जब एक सज्जन को दौरा पड़ता है तो उन्हें पानी पिलाती है.' बैंक लूट की घटना के बाद किस तरह ऐसे अपराधों के लिए मुसलमानों को जिम्मेदार मान लिए जाने की आदत है लोगों में इस पर अच्छा व्यंग्य है साथ ही एक मध्यमवर्गीय भारतीय पिता की सारी चिंता किसी भी तरह बेटी की शादी पर ही टिकी होती हैं इसको भी अंडरलाइन करती है फिल्म।

सिमरन एक साफ़ दिल लड़की है. छोटे छोटे सपने देखती है, घर का सपना, जिंदगी जीने का सपना, शादी उसका सपना नहीं है, वो प्यार के नाम पर बिसूरती नहीं रहती लेकिन किसी के साथ कोई धोखा भी नहीं देती। गलतियों को जस्टिफाई नहीं करती, उनसे बाहर निकलने का प्रयास करती है. प्रफुल्ल के किरदार को कंगना ने बहुत प्यार और ईमानदारी से निभाया है. फिल्म शादी, ब्वॉयफ्रेंड, दिल टूटने या जुड़ने के किस्सों से अलग है. तर्क मत लगाइये, सही गलत के चक्कर में मत पड़िये बस कंगना से प्यार हो जाने दीजिये।

पिछले दिनों अपने बेबाक इंटरव्यू को लेकर कंगना काफी विवाद में रही है. विवाद जो उसकी साफगोई से उपजे। कौन सही कौन गलत से परे एक खुद मुख़्तार लड़की कंगना ने अपना मुकाम खुद बनाया है.... उसकी हंसी का हाथ थाम लेने को जी करता है, सब कुछ भूलकर जिन्दगी को जी लेने को दिल करता है.

Sunday, September 16, 2018

नायिका उस प्रेम से बाहर नहीं आ सकी थी


और मैंने पाया है अक्सरहाँ यह गुण तुम्हारी नायिका में कि वह घटनाओं में, संबंधों में, अनुष्ठानों में, कार्यक्रमों में, संवादों में, बारिशों में, स्वप्नों में आसानी से प्रवेश करती नहीं। और फिर जो भीतर चली ही जाए तो बाहर लौटती नहीं। बिना ओर-छोर के जंगल में भटकती जाने कौन-सी जड़ी-बूटी खोजती फिरती तुम्हारी नायिका। जीवन की सीढ़ियाँ चढ़ते-चढ़ते तुम्हारी कथाओं की जल भरी बावड़ी में उतर डुबकी लगाने वाली नायिका। फिर नर्मदा तट पर दीयों की झिलमिल संग डूबते-उतराते किसी अँधेरे ज़ेहन में उतर जाने वाली तुम्हारी नायिका।

नहीं, प्रेम से ही नहीं, तुम्हारी यह नायिका कहीं से भी बाहर नहीं आती। बल्कि ये बाहर आने के सारे विकल्पों पर कँटीली बाड़ खींचकर जंगल में प्रवेश करती है। ऐसी नायिका को जीवन की वह गुमी हुई बूटी न मिले तो भला किसे मिले ?

और वह पुरुष, जिसके पास हज़ार ज़िम्मेदारियों का विलाप रहा होगा, हमेशा एक हड़बड़ी रही होगी, गहमागहमी रही होगी; वह पुरुष कहीं प्रवेश नहीं करता पूरा-पूरा। वह, जो दिखता है परिवार में भी, ऑफ़िस की मीटिंगों में भी, अख़बार की सुर्ख़ियों पर बिला नागा प्रतिक्रियाओं में भी, घड़ी में भी, कैलेंडर में भी, स्मृतियों में भी, प्रेम में भी, वह कहीं नहीं है।
क्योंकि बात बड़ी सीधी है कि जो हर कहीं है, वह कहीं नहीं है।

और तुम्हारी यह दुष्टना नायिका, प्रतिभा !

वह एक अछूते गिटार के तारों में तक प्रवेश कर गयी है, जिसे कभी बजाया नहीं जाता। उस गिटार की असह्य धुन पूरी कहानी में गूँजी है।

ओह ! ऐसा आरोह !

मैं तुम्हें बताऊँ, मेरी दोस्त !
कि वह गिटार तुम्हारी कहानी का सबसे मुख्य क़िरदार है।
और बहुत रुलाया तुमने मुझे ऐसी रुत में
कि जब बाद बारिश सूरज तक चिपचिपाता है
कि जब मैंने ख़याल किया था कि नहीं देखनी है एक और बार 'द जैपनीज़ वाइफ़'
कि जब मुझे प्रेस करनी थी मटकुल की वह लेसदार रेड फ़्रॉक
कि जब मुझे समझना था इन दिनों कैसे रुपये किलो टमाटर का भाव
कि जब मुझे अकेले ढूँढ़ निकालना था ट्रेन में अपनी सीट
कि जब मुझे आँखें मूँद कर देखना था अपनी श्वास का विलोम
कि जब मुझे नज़र में आती चीज़ों को भी कर देना था नज़रअंदाज़
कि जब मुझे उड़ने देनी थी अपनी हँसी की तितलियाँ
तब मेरी दोस्त !
तुमने भेजीं मेरे लिए बेहिसाब बारिशें
मिलनी चाहिए तुम्हें इसकी कुछ तो सज़ा
कि जब इस मौसम में, प्रतिभा !
सूरज तक चिपचिपाता है
मैंने तय किया कि रहूँगी दिन भर एरिक क्लैप्टन के
मनभेदिये गिटार के साथ

टियर्स इन हैवन.. टियर्स इन हैवन
टियर्स इन..

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[ प्रतिभा की ताज़ा कहानी के भीतर चले जाने के बाद ]


#बाबुषा

Saturday, September 15, 2018

फेवरेट सिनेमा- जापानीज़ वाइफ


एक फिल्म देखी थी जापानीज़ वाइफ. यह धीरे-धीरे सरकती हुई फिल्म है ठीक वैसे ही जैसे आहिस्ता-आहिस्ता नसों में उतरता है प्यार. कोई हड़बड़ी नहीं पूरे धैर्य के साथ. यह फिल्म जेहनी सुकून की तलाश को पूरती है, सुख क्रिएट करती है और उसे सहेजकर आगे बढती है. अपर्णा सेन की यह फिल्म मेरी प्रिय प्रेम कहानियों में से एक है. इस फिल्म को देखते हुए प्रेम की साधारणता के साथ उसकी उच्चता को एक साथ महसूस किया मैंने. 

यह कहानी दो ऐसे प्रेमियों की है जो पत्रों के माध्यम से एक दुसरे को जानते हैं. स्नेहमोय (राहुल देव) एक स्कूल टीचर है और उसकी दोस्ती जापान की मियागी (Chigusa Takaku)से हो जाती है. यह दोस्ती खतों के माध्यम से होती है फिर यह खतों के माध्यम से ही प्रेम में बदलती है और फिर ब्याह में. इस दौरान स्नेहमोय के घर में एक विधवा स्त्री संध्या अपने 8 बरस के बच्चे के साथ आती है, उस बच्चे के साथ स्नेहमोय का भावनात्मक लगाव फिल्म में खिलता है साथ ही संध्या की चुप चुप सी उपस्थिति में एक अलग सा खिंचाव है. रिश्तों के पेचोखम में उलझाये बगैर फिल्म प्रेम की सादगी को संभाले हुए आगे बढती रहती है.

इस ज़माने में जब वाट्सप पर फेसबुक पर सेकेंड्स में सन्देश जा पहुँचते हों, वीडियो कॉल के जरिये दुनिया के किसी भी कोने में बैठे किसी भी व्यक्ति से झट से कनेक्ट किया जा सकता हो उस दौर की प्रेम की कहानी को महसूस करना जब कि चिठ्ठियाँ खुदा की किसी नेमत ही मालूम हुआ करती थीं और डाकिया बाबू खुदा के बंदे लगते थे अलग ही अनुभव देता है. ट्रंक कॉल के पैसे जमा करना, कॉल न लगना या आवाज न आना, बात भी न हो पाना और पैसे भी लग जाना, आँख भर-भर चिठ्ठी का इंतजार करना और चिठ्ठी मिलने पर सुख से छलक पड़ना. प्रेम में मिलने का अपना महत्व है लेकिन यह प्रेम कहानी लौंग डिस्टेंस रिलेशनशिप की कहानी एक अलग ही परिभाषा गढ़ती है प्रेम की. प्रेमी जो कभी मिले नहीं उनके प्रेम की प्रगाढ़ता किस तरह फिल्म में खिलता है इसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है. फिल्म के दृश्य, बारिश, जंगल, नदी सब प्रेम को कॉम्प्लीमेंट करते हैं.

मुझे इस प्रेम कहानी का अंत और भी खूबसूरत लगता है हालाँकि इसके अंत से काफी सारे व्यावहारिक लोग असहमत हो सकते हैं लेकिन चूंकि प्रेम की शुरुआत और अंत सिर्फ प्रेम है किसी घटना का कोई आकार लेना नहीं इस लिहाज से इस कहानी का अंत कुछ भी होता इसे इतना ही खूबसूरत होना था. टिपिकल बॉलीवुड अंत से इसे बचाकर अच्छा ही किया है अपर्णा सेन ने. 15 बरस का प्रेम और एक भी मुलाकात नहीं...झर झर झरते आंसुओं के बीच इस प्रेम कहानी को देखना मैं कभी भूल नहीं पाती.

राहुल बोस मेरे प्रिय कलाकार हैं उन्होंने इस बार भी मोहा है लेकिन फिल्म के अन्य कलाकारों राइमा सेन, मौसमी चटर्जी और Chigusa Takaku ने भी अच्छा अभिनय किया है. अनय गोस्वामी की सिनेमोटोग्राफ़ी कमाल की है.

Friday, September 14, 2018

बारिश का बोसा और सितम्बर


चुपके से दबे पाँव आता है सितम्बर
पीठ से पीठ टिका कर बैठ जाता है
झरनों का संगीत सुनाता है
ओढाता है
बदलते मौसम की नर्म चादर
उंगलियों में सजाता है हरी दूब से बनी मुंदरी
और मंद-मंद मुस्कुराता है मूँद कर आँखें

दूर जाती खाली सड़क पर रख देता है इंतजार
पीले फूलों में आस भर देता है
तेज़ कर देता है खिलखिलाहटों की लय
बिखेरता है धरती पर मोहब्बत के बीज
उदास ख़बरों की उदासी पोंछता है
बंधाता है ढाढस

बारिश का बोसा देता है सितम्बर
पलकों पर रखता है सुकून की नींद के फाहे
सांसों की मध्धम आंच पर सेंकता है सीली ख्वाहिशें
मोहब्बत पर यकीन की लौ तेज़ करते हुए
धीमे से मुस्कुराता है सितम्बर

जिन्दगी को जिन्दगी बनाता है सितम्बर