Friday, June 29, 2018

खलिया टॉप के बहाने रामगंगा घाटी की पुरानी याद- भास्कर उप्रेती



भास्कर उप्रेती विकट यायावर हैं. यात्रायें उनके रग-रग में समायी हैं. मानो जिन्दगी की हर मुश्किल का हल उन्हें यात्रा में मिलता हो. हर सवाल के जवाब, सुकून सब वो यात्राओं से पाते हैं. यात्राओं में रचे-बसे इस सैलानी युवा ने उत्तराखंड के चप्पे-चप्पे को पैदल नापा है. उनकी यात्रायें सुनियोजित, आरामतलब नहीं होतीं. वो कभी भी उठकर चल पड़ने की कैफियत रखते हैं. यात्राओं के प्रति उनका यह प्रेम ऐसा सुंदर है कि उनकी बेटी का नाम ही 'यात्रा' पड़ा. भास्कर के तीज त्यौहार, यात्रा (बिटिया) का जन्मदिन सब यात्राओं में मनते हैं. वो एक चेतन पत्रकार रहे हैं, देश दुनिया के मसायलों पर नज़र भी रखते हैं और बेबाक राय भी. पढ़ने-लिखने को आत्मसात किया है. साहित्य में उनकी खूब गहरी पैठ है. भास्कर ने अपनी एक यात्रा का छोटा सा टुकड़ा 'प्रतिभा की दुनिया' के लिए लिखा है...इस बहाने इस संस्मरण को पढने का सुख अब हम सबका साझा सुख है. - प्रतिभा


2018 अप्रैल अंतिम सप्ताह में अचानक कपकोट से तेजम जाने का प्रोग्राम बन गया. आकर्षण था इन दो जगहों को जोड़ने वाली सड़क. कार्यक्रम को और रंगत देने के लिए उसमें खलिया टॉप का ट्रेक सोच लिया गया. करीब 15 साल पहले इस मार्ग से पदयात्रा की थी. काफी महत्वाकांक्षी योजना बनाई थी लेकिन पदयात्रा के चौथे दिन ही जब मुनस्यारी सामने आ गया, हम निराश हो बैठे. कभी सोचा भी न था कि पिथौरागढ़ का अंतिम छोर और बागेश्वर का अंतिम छोर यूँ आपस में गुंथे पड़े होंगे. जैसे पिंडारी ग्लेशियर जाने पर पता चलता है चमोली में आ गए हैं. खैर, हमने अपनी योजना को और धार दी. पदयात्रा को पहले मुनस्यारी से मदकोट तक विस्तार दिया, फिर दूसरे हिस्से में पिथौरागढ़ से गंगोलीहाट की पदयात्रा.

तो नई यात्रा के वर्णन से पहले पुरानी यात्रा. दरअसल कोई यात्रा नई नहीं होती और कोई यात्रा पुरानी भी नहीं होती. यात्रा एक निरंतर संवाद की स्थिति है. कई बार आप मीलों चल लेने के बाद भी ठहराव की स्थिति में ही होते हैं और कई बार बैठे-ठाले आपको पुरानी स्मृतियाँ वेगवान कर देती हैं. 

वर्ष 2003 में शोध-छात्र सुरेश भट्ट की पीएचडी कार्य के बहाने सरयू, रामगंगा और धौली घाटियों में पदयात्रा का मौका बना था. सुरेश जी 'कुमाऊँ की ग्रामीण अर्थव्यवस्था' विषय पर गाँवों का सर्वे करना चाहते थे और विनोद पाण्डेय और मुझे कपकोट से मुनस्यारी का ट्रेक करना था. यह एक यादगार यात्रा रही. भारी जलालत के बाद नैनी ताल माउंटेनियरिंग क्लब (एन.टी.एम.सी.) की सदस्यता मिली. रुक्सैक, मैट, रोप आदि हाथ लगे. एन.टी.एम.सी. के संस्थापक और तत्कालीन निदेशक चंद्रलाल साह ठुल्घरिया उर्फ़ बूबू ने 14 दफ़ा एप्लीकेशन लिखवाई अंग्रेजी में. विनोद और मैं तो चिढ़ ही गए थे तब. मगर, अंत: मैं उन्होंने बोला कि अब हमारे पास एक ‘स्टैण्डर्ड एप्लीकेशन’ हो गयी है, हमारी साँस में साँस आई. अब जो भी आएगा वो इसे देखकर लिखेगा. ठुल्घरिया बूबू तहजीब पसंद व्यक्ति थे और हर काम तो जतन से करते, वह चाहे फिर किसी खड़ंजे में लेटकर गुनगुनी धूप का आनंद लेने जैसा मामला ही क्यों न हो.

नैनीताल से चलते समय ही यह निर्णय हो गया कि यह पदयात्रा हम जनसहयोग से करेंगे. छात्र जीवन में जैसी कि आदत होती है सब कुछ भकोस लेने की, हमने ग्रामीणों से उनके ज्ञान का सब कुछ एक साँस में गड़क लेना चाहा जो हज़म नहीं हो सका. ये अनुभव के साथ ही जाना कि जीवन में अधिक भागीदारी हो तो बहुत कम प्रश्नों से भी काफी ज्ञान बटोरा जा सकता है.

हम लोगों ने भराड़ी से चलना शुरू किया था. पहला दिन तो शिखर पर्वत और गुफा से मिलने-भेंटने में लग गया. रास्ते में मिले फ़ॉरेस्ट गार्ड नंदाबल्लभ तेवाड़ी जी ने हमें यहाँ के समृद्ध वन के बारे में विस्तार से बताया मगर गुफा में प्रवेश के समय उनसे थोड़ा बहसबाजी जैसी भी हो गयी. वह गुफा में प्रवेश के नियम बता रहे थे. गुफा के प्रवेश द्वार पर लिखा था- 'यहाँ महिलाओं का प्रवेश वर्जित है'. हमारे साथ कोई महिला साथी नहीं थी लेकिन हमें यह नियम पसंद नहीं आया तो तेवाड़ी जी ने हमें 'सोच समझकर बनाए गए नियमों का सम्मान' करने के लिए कहा. दूसरा नियम था, 'चमड़े से बनी चीजों के साथ गुफा में प्रविष्ठ न होने का'. तेवाड़ी जी ने बताया कि ऐसा करने से बड़ा अनिष्ट होता है. हमने कहा चलिए आजमा लेते हैं; वह अँधेरी गुफा में हमें बीच में छोड़कर भाग खड़े हुए. बड़ी टॉर्च भी उन्हीं के पास थी. बकौल तेवाड़ी जी उनका बेटा बाबा यानी भोले महराज के आशीर्वाद से ही फ़ौज में भर्ती हो सका था और वे इस कानूतोड़क प्रक्रिया में शामिल नहीं होंगे. खैर विनोद ने ठान लिया था कि चमड़े की बेल्ट पहनकर ही गुफा में प्रवेश करेगा और उसने तेवाड़ी जी को बताया कि उसकी बेल्ट शुद्ध चमड़े की बनी है. नंदावल्लभ जी हमें ऊपर चढ़ते हुए बता ही चुके थे कि हम झोपड़ा उतरे बगैर ही शामा पहुंचे सकते हैं. वापसी में हमने दुबटिया से शामा का ट्रेक पकड़ लिया. यह भी करीब आठ किलोमीटर लंबा रहा था और हमें यहाँ शामा से करीब ढाई किलोमीटर पहले सड़क पर उतरना था. यह घना और नम जंगल था. रास्ते की कांठियों में हमें वनसुपारी के पत्ते नज़र आए तो हम उनकी जड़ें उखाड़ने में जुट गए. चूँकि पानी हमारा खत्म हो चुका था, सो यह शरीर में पानी की भरपाई करने के लिए बढ़िया चीज मिल गयी. शामा के लिए जाते वक़्त सड़क में हमें मैदान से यहाँ नियुक्त हुए एक आयुर्वेदिक डॉक्टर मिले. उन्हें हमने जोशो-खरोश से अपनी यात्रा का मकसद बताया. लेकिन उन्होंने हमें उतना ही ठंडा करने की कोशिश की. 'यहाँ क्या है भेड़-बकरियों के सिवा'. आसमान भी पूरा नहीं दिखाई देता. कोई सुविधा नहीं. क्या जानना है इतना पैदल चलकर यहाँ के बारे में? हमने जितना संभव था उन्हें इस अभियान की पवित्रता के बारे में बताने की कोशिश की लेकिन वह भी अपनी जगह उतने ही अडिग बने रहे.

शामा की उस शाम में हमने दुनिया की बेहतरीन चायें पीं. भट्ट जी ने एक कस्बाई लोहार का इंटरव्यू लिया लेकिन उसने अपना और भट्टी का फोटो खिंचवाने से इंकार कर दिया. शायद यह समझकर कि हम उसकी गरीबी को दिखाना चाहते हैं. स्वाभिमानी लुहार था वो.

पहली रात शामा और पनियाली गांवों के लोगों के बीच बितायी. तब नैनीताल डीएसबी के हमारे सीनियर रहे डॉ राजेंद्र कोश्यारी शामा गाँव की अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करने के काम में जुटे थे. उनका घर पास में ही चीटाबगड़ गाँव में है. राजेंद्र भाई ने ग्रामीण आजीविका पर काम करने के अपने अनुभव हमारे साथ साझा किये. वह वहां सब्जी उत्पादन, मुर्गीपालन, बकरी पालन, पालीहाउस आदि पर काम कर रहे थे और उनके शुरुआती अनुभव अच्छे थे. उन्होंने हमें बताया कि फंडिंग और प्रोजेक्ट से चलने वाली योजनाएं उन्नत आईडियाज तो लाती हैं. सवाल उनको लोगों द्वारा सतत रूप से अपनाने का ही है. राजेंद्र भाई ने बताया कि इस संबंध में सरकार की भूमिका बेहद अहम् है और वही अपनी भूमिका नहीं निभा रही है. यदि गाँव के लोग शिमला मिर्च का उत्पादन करते हैं और यह उत्पाद निश्चित रूप से जैविक श्रेणी के हैं. तो सरकार का काम है कि वह किसानों का उत्पाद सुरक्षित रूप से स्टोर करने के उपाय करे, उत्पादों का सर्टिफिकेशन करवाए और उनका बाजार तलाशने में में किसानों की मदद करे. ग्राहकों का भी हक़ है कि वह कीमत देने पर ताजा और पुख्ता उत्पाद हासिल कर सकें. दरअसल यही कड़ी नहीं जुड़ सकी है.

जब हम ढूँढते-खोजते राजेंद्र भाई के पास पहुँचे तो उन्होंने आनन-फानन में हमारे भोजन की व्यवस्था पास के शामा क़स्बे में बने ढाबे में करायी. तब फुटबाल का विश्व कप चल रहा था और पुरानी शुष्क जिंदगी से विमुख हमारे साथी सुरेश जी पर फुटबाल का नशा तारी था. लेकिन उनसे कहीं अधिक ढाबे वाले दानू भाई पर. पता नहीं उन्होंने कितनी रोटियां सेंकी और पता नहीं हम कितनी खा गए. उधर अर्जेंटीना की टीम उरुग्वे पर गोल दाग रही थी और दानू भाई के अभ्यस्त हाथ उतनी ही गोल फुल्कियाँ परोस डाल रहे थे. ‘फुल डाईट’ वाला हिसाब हुआ तो मेहमानों की पौ बारह हो गयी ठहरी. वैसे भी खाने के डबल तो हमारे मेजबान राजेंद्र भाई को ही चुकाने थे. हमने तो जाते ही ऐलान कर दिया था कि हम जनसहयोग से ही यह यात्रा कर रहे हैं. राजेंद्र दाज्यू को भी यहाँ उनके कॉलेज से आए दोस्तों पर न्योछावर होने में क्या दिक्कत हो सकती थी. शिखर की आठ किलोमीटर की चढ़ाई और फिर शिखर से शामा उतरने से मित्र बैकटीरियाज भुकान हो रखे थे. 


अगला पड़ाव था रमाणी गाँव. अलसुबह चलकर हम दुपहरी में पहुँच गए थे गाँव की सरहद तक. शामा से कुछ मील सड़क-सड़क चलने के बाद गाँव की पगडंडी पकड़ ली गयी. एक बुबू ने हमें बताया कि कभी यह मार्ग जोहार और बागिसर (बागेश्वर) को जोड़ने वाला प्रमुख मार्ग था. शौका लोग इसी रास्ते बागेश्वर के नुमाइश खेत में लगने वाले मशहूर मेले में जाते. हो सकता है मालूशाही से मिलने गयी राजुला भी इसी मार्ग से चली हो (राजुला मालूशाही उत्तराखंड के लोक में प्रचलित लोक कथा है). उन्होंने यह भी बताया कि नुमाइश खेत के मेले में रमाणी के नारिंग (संतरों) का लोगों को इंतजार होता. रमाणी का संतरा सबसे महंगा भी बिकता. लेकिन, गाँव में अब कम लोग रह गए हैं और संतरों में भी कोई कीड़ा आ लगा है. अब दाने का आकार भी छोटा होता है और स्वाद में कमी आई है. यहाँ बकरी पालन आजीविका का मुख्य साधन था. मिट्टी की ऊपरी परत बारिश ने खरोंच डाली थी और अब नीचे से सलेटी मिट्टी उभर आई थी. जो उत्पादन के लिहाज़ से मुफीद नहीं थी. सो, खेती से बागवानों का मोहभंग तेज हो गया. हम अपने पीछे एक अत्यंत समृद्ध मिश्रित वन छोड़ आये थे. लेकिन यहाँ से आगे का दृश्य एकदम अलग था. नीचे पसरी रामगंगा घाटी में एक मायूस सफेदी छाई थी. सब कुछ सफ़ेद. बादल, पहाड़, पत्थर, मिट्टी, नदी, पानी सब.
वनस्पतियाँ भी अब कम हो रही थीं. सुरेश जी ने कुछ और घरों का सर्वे किया और फिर हम ढलान से उतार लगे. हम जिस घर से गुजरते वहां से हिदायत मिलती रास्ता अब चलन में नहीं है, सावधानी से आगे बढ़ना. कहीं-कहीं पर साँप और ग्वाण का भी भय रहेगा. सड़क का रास्ता काफी पहले दूसरी तरफ मुड़ चुका था और दरअसल भू-स्खलन से सड़क जगह-जगह मटियामेट हो चुकी थी. गाँव वालों ने बताया कि 60 के आस-पास इस सड़क का सर्वे हुआ था. 80 के आस-पास यह खुदी और 90 के आस-पास इसमें समतलीकरण का काम चला लेकिन यह चालू हालत में कभी भी नहीं आ सकी और अब तो जीर्ण-शीर्ण ही हो चुकी थी. 
हम रात तक तेजम पहुँचने का लक्ष्य लेकर चले थे और नीचे घाटी में उतर
रहे थे, जहाँ हमारी मुलाकात रामगंगा से होनी थी. जिस खड़ंजे से हम उतर रहे थे उसका मटमैला रंग धीरे-धीरे सफेदी लेने लगा था. तटवर्ती क्षेत्र होने से यहाँ गंग्लोड़े तो मिलने लगे थे लेकिन उस पर भी सफेदी तारी थी और यह अच्छा संकेत नहीं था. यह सफेदी धीरे-धीरे पैरों की फिसलन में बदल गयी. सफ़ेद पत्थर और उससे चूरा हुई सफ़ेद बजरी में चाँदी सी चमक थी/ यह जूतों की ग्रिप नहीं बनने दे रही थी. अब सूरज पहाड़ के दूसरी ओर जा रहा था और हम छाया से घिर रहे थे. दिन भर तपे खड़िया-पत्थर हमारे शरीर को पसीने से तर कर देने के लिए काफी थे. संभलकर और धीरे-धीरे चलने से हमारी गति प्रभावित हुई. किसी तरह रगड़ते हुए हम रामगंगा की गोद में आ गए थे. जहाँ हम उतरे थे वहां नदी का पाट बहुत चौड़ा था और पानी भी छितराया हुआ. आधा मील आगे बढ़े तो यही पानी एक संकरी धार में बदल गया था. यहीं पास में झील बन गई थी. ऐसी झीलें वहीं बनती हैं जहाँ पानी में भँवर हो.

मेरे दोनों तैराक मित्रों का मन हुआ कि यहाँ स्नान कर लिया जाय. उमस से मुक्ति के लिए इससे अच्छी बात और हो भी क्या सकती थी लेकिन जैसे ही दोनों नदी में कूदे तो मालूम पड़ा पानी बर्फानी है. एक मिनट के भीतर ही दोनों बाहर छिटक गए. दोनों ने फिर से हिम्मत दिखाई और फिर नदी को अपने शरीर का रहा-सहा ताप सौंपकर ताजगी बटोरी. नदी का पाट आगे भी चौड़ा था लेकिन रास्ता जहाँ नदी की धार झुकी थी उसके सिरहाने से होकर जा रहा था. धीरे-धीरे शाम भी हो रही थी तो हम इसी हल्के-हल्के रास्ते से ऊपर चढ़ने लगे. अब यहाँ से कोई भूला-भटका ही गुजरता है सो जगह-जगह कंटीली झाड़ियाँ भी हम पर झपट रही थीं.

हमारे दाहिनी हाथ में अब एक विशाल पहाड़ था जो उर्ध्वाकार रूप से स्खलित हो रहा था. ऊपर जंगल था लेकिन वह इस तरह से फट पड़ा था मानो उस पर अभी-अभी वृष्टि हुई हो. हम जितना आगे बढ़ रहे थे उतना ही उसे फैलता हुआ देख रहे थे. इतना बड़ा भू-स्खलन हम पहली बार देख रहे थे. एक जगह हल्का सा कांठा आया, सुरेश जी उसे पार कर गए थे लेकिन पार करते-करते वे कातर हो उठे. जिस महीन पगडंडी से हम गुजर रहे थे उसकी मिट्टी में बहुत अधिक फिसलन थी और एक खड़ा पहाड़ था. दूसरी तरफ गहरी खाई. खाई सीधे नदी में गिर रही थी. यह भयाक्रांत करने वाला था. सुरेश जी ने चिल्लाकर हमें आगाह किया तो हम और सजग हो गए. ट्रेकिंग में इस तरह की सावधान मुद्राएँ कई बार नुकसान ही करती हैं. मैं बहुत संभलकर सरक रहा था और पैरों को थिराने के दौरान ये याद नहीं रहा कि मेरे रुक्सैक के ऊपर तिरछी रखी मैट पीछे उभरी चट्टान से जा लगी है. विनोद मेरे ठीक पीछे था. मुझे ढलकता देख उसने मुझे आगे को धकेल दिया. दो छोटी झाड़ियाँ मेरे हाथ आयीं जिसमें से एक उखड़ गयी जबकि दूसरी अपनी जगह अड़ी रही. इसी भरोसेमंद जड़ ने मेरी जान बचा ली. मैट की ऐसी भूमिका को समझकर विनोद ने अपने बैग की मैट अलग निकाल ली और वह चुपके से आगे निकल आया. अब तक रोमानी रही यात्रा के बीच में मिला यह सबक हम तीनों को कंपित कर देने वाला क्षण था. हमारे पैर अब वाकई जमीन में आ गए थे. 

देर शाम हम रामगंगा नदी पर बने झूला पुल को पार कर तेजम पहुँच गए. तेजम गहरी रात की मानिंद सुनसान लग रहा था. धुरों में रहने के आदी हम लोगों के लिए घाटी की यह समय से पहले की पस्ती कुछ गजबजाने वाली थी. विनोद ने बताया कि उसके गाँव बेतालघाट से भी आसमान छोटा ही दीखता है. एक तरफ कालाखेत वाला पहाड़, एक तरफ बधानथली और एक तरफ घोड़ियाहल्सू. जब तक आप ऊंची डांडी-कांठ्यु से आसमान नहीं निहारते, यह काफी बड़ा होता है. हालाँकि प्रकृति से साक्षात्कार की बात हो तो यह मैदानों की बजाय पहाड़ों में ही अधिक हो पाता है. यहाँ अधिक आयाम मिल जाते हैं. अपने ननिहाल के गाँव शुमगढ़ से मुझे भी एक छोटा का आसमान नज़र आता था, जिसे मैं बड़ी हसरत भरी नज़रों से देखता था. यह आसमान तो ऐसा था जैसे कि पहाड़ों के ऊपर एक नीले रंग का ढक्कन रख दिया हो. गर्मियों में उस काले-भुतहा पहाड़ के चीड़ों पर जब आग धधकती तो वह और भी अधिक डरावना हो जाता.

तो खैर, हम अपने दूसरे महत्वपूर्ण पड़ाव तेजम में थे. नदी घाटी में आमतौर पर पायी जाने वाली खुशबू यहाँ मिल रही थी. गाँव के बीच बनी पगडंडी में गोबर-खाद की महक तो थी ही आदमी की गुवैन भी थी. जैसे-जैसे हम नदी तट से थोड़ा ऊपर पहुँचे यह गंध जाती रही. नदी तट के पास जानवरों के खरीक भी थे, आमतौर पर यह विष्ठास्थल भी होते हैं. अब हमें रात के लिए ठौर तलाशनी थी. पहले दिन शिखर धार का ट्रेक तो पैर सहन कर गए थे लेकिन आज शामा से तेजम तक उतरने में अँगूठे बुरी तरह दुःख रहे थे. ऊपर से रामगंगा घाटी की चिपचिपी उमस से बदन पसीना-पसीना हो गया था. रूह को आराम की सख्त दरकार थी. सख्त जान भट्ट जी झटपट आराम की तरफ मुड़ने और आसरा ढूँढने को उद्द्त न थे. उन्होंने अपना सर्वे कार्य शुरू कर दिया, हम भी बेमने से साथ लग गए.

उन्होंने पहले ओखल कूटती महिलाओं से बात की और फिर उन महिलाओं ने उन्हें कालीन बुनती एक महिला के पास भेज दिया. भट्ट जी की निश्चिंतता हमें उग्र बना रही थी. ठहरेंगे कहाँ, खाएंगे क्या? खैर, रात की आहट ने भट्ट जी को जगाया और फिर हम अलग-अलग घरों में गए. गहरी थकन के बाद अपनी मुस्कान बचाए रखते हुए अपनी पदयात्रा का मंतव्य बताते, रहने-खाने की व्यवस्था की जिरह करते.

तेजम गाँव में थोड़ी देर फिरते हुए अहसास हुआ कि यहाँ ठौर पाना इतना आसान नहीं होगा. यह रोड-हेड की जगह है. शुरुआती घर दलित परिवारों के थे. वहां लोग बातचीत तो कर रहे थे लेकिन आसरा मांगने पर भारी संकोच से भर जाते. हमने भरसक कोशिश की कि वे तैयार हो जायें लेकिन किसी ने हमारा प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया. फिर हम सवर्ण परिवारों की तरफ गए, ये क्या यहाँ तो उन्हें कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा था. उन्हें हममें कोई इंटरेस्ट नहीं था और वे चाहते थे कि हम टल ही जाएँ. लेकिन, हम जाते तो कहाँ जाते. आगे गाँव कितना दूर है कोई यह बताने को भी तैयार न था. ट्रेकिंग के बाद जब रात का आसरा आसानी से न मिले तो थकान सर में चढ़ जाती है. हम बेतरह चूर हो चुके थे. हमें शिखर गुफा में किए गए पाप याद आने लगे और नंदावल्लभ तेवाड़ी का अट्टहास करता चेहरा!

इत्ते में एक व्यक्ति सड़क से गुजर रहा था तो विनोद ने कूदकर उसके सामने पूरी सामर्थ्य से पीड़ा और जरूरत बयां कर दी. वो आदमी तीन नौजवानों को इस तरह से बेसहारा, बे-आबरू देखकर पसीज गया. उसने तपाक से कहा कि पंचायत घर में व्यवस्था कर देते हैं. मैं सयाना जी से बात करके आता हूँ.

पंचायत घर: हमारे सामने पंचायत घर की छवियाँ तैरने लगीं. इससे अच्छा तो गाँव के स्कूल का कमरा ही खोल देते. खैर, यह वक़्त अपनी फ़रमाइश पेश करने का बिल्कुल नहीं था. हम पंचायत घर के खुलने का इंतजार करने लगे. लेकिन, बहुत देर तक वह व्यक्ति नहीं लौटा तो हम फिर आशंकाओं से घिरने लगे. भूख भी भड़क रही थी. हम यूँ ही एक बड़े ढुंगे (गोल चट्टान) से सटकर सुस्ताने के लिए लधार लग गए. करीब 40 मिनट बाद वह व्यक्ति एक बुजुर्ग को साथ लेकर आ गए. शायद यही सयाना जी थे. उन्होंने हमारे बारे में हर संभव तहकीकात की. वह एस.एस.बी. के गुरिल्ला रह चुके थे. जब तसल्ली हो गयी तो उन्होंने अपनी खल्दी से पंचायत घर की चाबियाँ निकालीं और हमारे लिए जिरह कर रहे व्यक्ति को सौंप दीं.

हम स्वाभाविक रूप से उस भले आदमी के आगे नतमस्तक हो गए. सड़क से थोड़ी ऊपर ही पंचायत घर था. भले आदमी ने जैसे ही मुख्य दरवाजा खोला तो हम जन्नत में थे. यह पंचायत का बैठक कक्ष था, जिसमें बड़े-बड़े सोफे लगे थे. फिर हमने झट से अन्दर बेडरूम में भी झाँक लिया. यहाँ तो डनलप के गद्दे थे. विनोद तो ख़ुशी के मारे चीख ही पड़ा. भले आदमी ने बाहर श्रोत से पानी का जग भी भर दिया और बताया कि थोड़ी देर में सयाना जी आने ही वाले होंगे. मुझे थोड़ा आगे जाना है, इजाजत दीजिये, हमारा मन हुआ कि खुदा के भेजे इस फ़रिश्ते से चिपटकर गले लग जाएँ लेकिन विनम्रता से उसका शुक्रिया कर उसे विदा किया.

फिर हम तीनों एक दूसरे को देखकर मुस्कराए-खिलखिलाए. जाहिर है आगे बात करने के लिए एक सुंदर विषय था. आखिर यह पंचायत घर इतना सुंदर और आरामदेह क्यों? हम बात करते-करते इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि यह किसी व्यक्ति ने धर्मार्थ बनाया होगा. कुछ लोग समाज में ऐसे होते हैं जिन्हें पुण्य की तलाश रहती है. यह ऐसे ही किसी व्यक्ति का कारनामा होगा. बात करते-करते मैं और विनोद सोफे में ही ढुलक गए. खुरदुरी यात्रा के बाद गुदगुदे सोफे. भट्ट जी अपनी दैनंदिन डायरी लिखने बैठ गए, हमारी आँख लग आई थी कि इतने में दरवाजे पर सयाना जी खटखट करते हैं. भट्ट जी दरवाजा खोलते हैं.

यह क्या सयाना जी का पूरा परिवार ही चला आया है और सबके हाथ में कुछ न कुछ है. हम लज्जा से चूर हो गए. हमारे लिए इतना सब. दो-दो रोटी दे देते क्या कम था! हमसे न धन्यवाद कहा जा रहा था न ही हमारी फटी आँखें छुप पा रही थीं. हमने सयाना जी से बैठने के लिए कहा. हमारी हालत काटो तो खून नहीं जैसी. सयाना जी ने ही बोलना शुरू किया. आप लोग बहुत अच्छा काम कर रहे हैं. नन्ताल से आए हैं. गांवों को जानना चाहते हैं. यह बहुत अच्छी बात है. उनकी इतनी सी बात थी कि हम थोड़ा सहज हो सके. 'जी, आप जैसे लोगों का सहयोग मिलता रहे तो हम तो चलते रहें... ही...ही ही...' भट्ट जी ने कुछ इस तरह से उनका जवाब दिया. हमें यह बड़ा अजीब लगा लेकिन यह भट्ट जी का नैसर्गिक रूप था. माहौल अब काफी हद तक सामान्य था. हम लोग एक आलीशान गेस्ट हाउस में रुके थे और तमाम व्यंजन हमारे सामने थे.

विनोद ने संवाद आगे बढ़ाने के लिए कुमाऊंनी में पूछाः ''बूबू तुमर नाम की हय?'' बूबू ने कहा, 'मैं रावत हूँ.' फिर थोड़े से विराम के बाद बोले, “हम लोग भोटिया रावत हुए. यह पूरा गाँव हमारा ही हुआ''. बुबू ने बताया कि पहले तेजम एक पड़ाव था, अब गाँव और क़स्बा जैसा हो गया है.'' बूबू ने कहा कि आप लोग पहले भोजन कीजिये, फिर गाँव के कुछ लोग आएंगे. मैंने उन्हें यहाँ आपके आने की सूचना दी है. शायद यह भी यहाँ का दस्तूर है कि लोग मेहमानों से मिलने-भेंटने आते हैं.

इस बात से हमारी पदयात्रा करने की सार्थकता सिद्ध हो गई. हम इतने आनंद और संतोष की स्थिति में आ गए कि अब बुबू से सवालों-जवाबों का सिलसिला ही चल निकला. हम भुक्कड़ों की तरह भोजन पर टूट पड़े थे और बातें भी करते जाते. यहाँ आकर पहली बार मालम पड़ा कि रावत भोटिया भी होते हैं. दूसरा इस तरह की मेजबानी भी वही कर सकते थे. लेकिन, बुबू से जो पहला बुनियादी सवाल हमने किया कि 'यह पंचायत घर ऐसा क्यों है? क्या यह धर्मार्थ है?' बुबू ने हँसकर जवाब दिया; ''नहीं नहीं, यह धर्मार्थ नहीं है. यह तो पंचायत का कुछ पैसा था. उसमें हम लोगों ने कुछ मिलाया और यह थोड़ा काम का बन गया. उन्होंने बताया कि यह गाँव का सबसे अच्छा घर है. जहाँ मेहमानों को टिकाया जाता है”. 'मेहमान माने कौन? खुद ही पूछा और खुद ही जवाब दिया. “आप जैसे लोग नहीं. टूरिस्ट भी नहीं. हमारे बच्चे जो बाहर से यहाँ आते हैं. उन्हें थोड़ा सुभीता चाहिए न?''; और यह कहकर वह खुद ही जोर से हँस पड़े.

थोड़ी देर में मालूम पड़ा कि बूबू यानी सयाना जी का बेटा अमेरिका में डॉक्टर है. गाँव के सभी लोग बहुत पढ़े-लिखे और अच्छी नौकरियों में हैं. कुछ आईएएस और आईपीएस भी इस गाँव से हैं. थोड़ी देर बाद गाँव के दो बुजुर्ग और आ गए. उन्होंने सयाना जी से कान में कुछ कहा, मगर हम समझ नहीं पाए. लेकिन सयाना जी से रहा नहीं गया और उन्होंने कह ही दिया. “देखिए बच्चो हमारे यहाँ कुछ रिवाज हैं. आप क्या लेते हैं कुछ?” हम फिर भी समझ नहीं पाए. उन्होंने तसल्ली से कहा, 'देखिये जबरदस्ती नहीं है लेकिन रिवाज हुआ ये मुझे इन दो साथियों ने याद दिलाई. मुझे भी ध्यान था मगर माइंड से निकल गया”. हमने पहले कहीं सुना था भोटिया परिवार मेहमानों को स्वागत के समय चकती यानी गाँव में बनी हुई शराब पेश करते हैं. हमने विनम्रता से मना कर दिया यह कहते हुए कि लेते तो ले ही लेते.

हम भोजन पा चुके थे और आराम चाहते थे, मगर भट्ट जी अपना रजिस्टर खोलकर बुजुर्गों के सामने पाल्थी मारकर बैठ गए. उन्हें भी अच्छा लगा उनके बारे में कोई जानना चाहता है. सयाना जी की आवाज आ रही थी. “देखिये पहले तेजम मुनस्यार, थल और दानपुर के बीच की बड़ी मंडी था. व्यापार होता था खूब दम-ठुलंग, जड़ी-बूटी-मोंगे. लामा लोग भी आते थे तिब्बत से. बागिसर का मेला..सारा सामान यहाँ जमा होता था. यहीं से जरूरत के मुताबिक जाता था. चीनियों ने डिस्टर्ब कर दिया. फिर तो ख़तम जैसा ही हो गया. उनके साथी उनके साथ सहमति की होई होई कर रहे थे. हम थकान के आगे नतमस्तक थे. कब आँख लगी मालूम ही नहीं पड़ा. सुबह भट्ट जी को जगाकर पूछा कि रात कब तक बात चलती रही, कब गए बूबू लोग?

हमें याद आया कि शामा धुरा से एक बंगाली परिवार भी हमारे साथ चला था, जो बीच में भी हमें एक बार मिला, लेकिन बाद में नहीं दिखा. शायद वह दूसरे रास्ते निकल गया हो या कफनी ग्लेशियर की तरफ मुड़ गया हो. उनके पास भी हमारी तरह भिगोये गए घोड़िया-चनों की बोतल थी. पदयात्राओं में भीगे चने से बढ़िया कोई भोजन नहीं.

अगला दिन ट्रेकिंग के हिसाब से लंबा रास्ता था मगर इस रास्ते में एक बड़ा आकर्षण था. बिर्थी का झरना. बहुत सुना था इसके बारे में. आज देखना भी हो जाएगा. शमशेर की कविता हमारे साथ थी. 'मुझे प्यास के पहाड़ों में लिटा दो. जहाँ मैं एक झरने की तरह तड़प रहा हूँ. मुझको सूरज की किरणों में जलने दो ताकि उसकी आँच और लपट में तुम फौवारे की तरह नाचो’. आज भट्ट जी प्रसन्नचित्त थे. होते भी क्यूँ नहीं, कल शाम उन्हें ज्ञान का जो जखीरा मिला था वो इस शोध-यात्रा को मुकम्मल करने और परवान चढ़ाने के लिए कैटेलिस्ट से कम न था.

हम खेलते, गाते, कूदते-फाँदते, कुलाँचें मारकर आगे बढ़ रहे थे. हम हिरण तो न थे पर हिरण बनने की कोशिश कर रहे थे. दिन के मुतालिक क्वीटी, बिर्थी, गिरगांव तल्ला, रातापानी आदि में सर्वे कार्य किया गया. मगर, विनोद और मेरी दिलचस्पी बिर्थी फाल और पर्यटन के अंतर्संबधों में अधिक थी. कुदरत ने क्या जो गजब नेमत बख्शी है बिर्थी झरने के रूप में. सदाबहार झरना और वो भी रोड हेड से लगा हुआ. मुन्सियारी तब कुछ पर्यटक जाने लगे थे और इधर आस-पास के स्कूलों-कॉलेजों से भी कुछ दल बिर्थी फाल देखने आते हैं. लेकिन, आश्चर्यजनक रूप से न यहाँ कोई ढाबा है, न कोई भुट्टा-ककड़ी बेचने वाला, न कोई 'हमारे होटल आओ' कहने वाला. आपको बिर्थी में रुचि है तो आइये, देखिये और जाइए. हमें अच्छा भी लगा, क्यों सारे पर्यटक स्थल एक जैसे हों. हमने जितना हो सकता था उतना बिर्थी फाल को देखा और फिर उसी के रास्ते से लगी गिरगाँव की पगडंडी पकड़ ली.

स्थानीय लोगों ने बताया था कि हम रात तक मुन्सियारी पहुँच सकते हैं और यह बात हमें जितना गुदगुदाने वाली थी उतनी ही निराश करने वाली. निराश इस मायने में कि हम कई दिन की मानसिक तैयारी से चले थे इस पदयात्रा पर. कपकोट से मुन्सियारी पदयात्रा अपने आप में एक मह्त्वाकांक्षी बात लगती थी. हमें पहला झटका लगा जब हम समय से पहले तेजम पहुँच गए. दूसरा अब यह समाचार कि हम आज रात में ही मुन्सियारी पहुँच जाने वाले हैं. तब इस यात्रा में मजा ही कहाँ रहा?

लेकिन, मजा था. मजा छुपा पड़ा था गिरगांव की चढ़ाई में. समुद्र के तल से हम जैसे-जैसे ऊपर उठ रहे थे तो साँस चढ़ रही थी. दूसरी तरफ जूतों के अन्दर कुछ गुदगुदी मचने लगी. यह गुदगुदी जूतों के सिलाई-छिद्रों से अन्दर जा घुसी जोंकें कर रही थीं. शुरू-शुरू में तो हम जूते खोलते, जौंक हटाते और फिर चल पड़ते. मगर, यह बार-बार होने लगा. हम बहुत कम धूप देखने वाले आद्र वन से गुजर रहे थे. यह वन मिश्रित वन था. बांज-बुरांश-रियांज-उतीस-फल्यांट और पतेलों से भरा हुआ छड़म-छड़म-छड़म की आवाजें तब तक भली थीं, जब तक जोंकें नहीं आईं थीं. जौंकें कितनी जो ताकतवर होती है यह पाठ आज हमें जानना था. यह सही मायनों में जौंकों की राजधानी थी.

हमारा पिकप गिर गया. अब बचते-बचाते हम फूक-फूककर आगे सरक रहे थे. हालाँकि हमारे साथ बिर्थी गाँव से चले ठेले (ट्रक) घुमावदार, लंबे मोड़ों से आते हुए हमें नहीं पछाड़ पा रहे थे. सच मानिए जो कल रात खातिर हुई थी तेजम गाँव में, आज उसका पाई-पाई हमसे निचोड़ा जा रहा था. लेकिन, कुछ जगहें जहाँ जौंकों ने हम पर रहम किया हम वन्यता की. जैव-विविधता की शान में बोल सके. ऐसे स्थलों पर तो हमने जौंकों के भी गुण गा दिए. गिरगांव पार करने-करने तक अँधेरा गहरा गया था. चौमास आया नहीं था अभी लेकिन उसकी पूरी दस्तक हो चुकी थी. आसमान शाम ढलते ही गहरा और गाढ़ा हो गया. मुँह फेर कर देखा तो हमारे पीठ पीछे के पहाड़ों पर गहरा सलेटी रंग पोता जा चुका था. उजाले की एक किरण तक देख पाना मुमकिन न था. लंबे ट्रेक, उमस, थकान ने हमारी हड्डियों के जोड़ खजबजा दिए. किसी तरह कालामुनि टॉप तक पहुँच गए. आगे मुनस्यार का संसार था लेकिन आगे बढ़ा नहीं जा सकता था. आठ-साढ़े आठ बजा होगा शायद हमने कालामुनि मंदिर का गेट खटखटाया. हमारे ऐसा करते ही भयानक गर्जना वाले तीन भोटिया कुत्ते एक साथ भौंकने लगे. हमारी रूह काँप गयी. साफ़-साफ़ देखना मुमकिन नहीं था, लेकिन उनकी बड़ी-बड़ी और रौबीली आँखें चमक रही थीं. मानो आँखें ही कुत्ते हों और आँखों का आकार कुत्तों से बड़ा हो. हम सहमकर बैठ गए. हमारा भरोसा मंदिर के अन्दर था. हम बाहर थे और यह भय सता रहा था कि यदि ये कुत्ते गेट से बाहर आ गए तो हमारी बोटियाँ चबा जायेंगे. थोड़ी देर सुस्ताने के बाद जब कुत्तों की सिंह गर्जना हल्की हुई तो हमने फिर से गेट खटखटाया. इस बार थोड़ा आग्रहपूर्वक. लेकिन कुत्तों को हमारी ये गुस्ताखी एकदम रास नहीं आई. वे और अधिक ताव में आकर हम पर बरस पड़े. वे वाकई डरावने थे, जरूर ताकतवर भी होंगे.

जोहार से भेड़ चराने हमारे जंगलों से गुजरने वाले भेड़-दलों के साथ ऐसे आक्रांत करने वाले कुत्ते देखे थे. उन्हें देखकर बाघ को भी जोखिम उठाते नहीं बनता था. हम बुरी तरह निराश हो गए. कड़ाके की ठंड थी और बर्फानी हवाएं सरककर निकल रही थीं. हल्की-हल्की बूंदाबादी भी शुरू हो चुकी थी. ऐसे में यहाँ हिमकण भी आना संभव था. हमने जोर-जोर से चीखना-चिल्लाना शुरू कर दिया. कुत्ते भौंक रहे थे और हम चीख रहे थे. कुछ तो हम अपने बचाव में ऐसा कर रहे थे और कुछ हमारी थकान से मिला चिड़चिड़ापन हमसे ये करा रहा था. मंदिर का गेट न खुला तो आज मौत तय है. मुन्सियारी दूर थी और इस मौसम में वहां जा नहीं सकते थे. चाहकर भी नहीं जा सकते थे क्यूंकि अब पैर उठ ही नहीं रहे थे

एक घंटा होने को था तो मंदिर के भीतर कुछ हरकत शुरू हुई. एक कड़कड़ाती हुई आवाज हम तक आई. ये बाबाजी थे जो स्वयं गेट पर आये थे. शायद उन्होंने बारिश और ठण्ड को देखते हुए हमारे बारे में कुछ निर्णय ले लिया. उन्होंने कुत्तों को झिड़ककर दूर हटने का आदेश दिया और गेट खोल दिया. लेकिन बाबाजी ने हमसे कोई बात नहीं की और वहां मौजूद एक आदमी को आवाज लगायी. उन्होंने उस आदमी को हमें साथ ले जाने और खाने की जरूरत होने पर कुछ खिला देने का आदेश सुनाया. वह दूर इंतजार कर रहे अपने कुत्तों के साथ मुख्य मंदिर की ओर चल दिए. आदेशित आदमी चुपचाप हमें एक तरफ को ले गया. चलते-चलते ही वह अचानक एक गुफानुमा कमरे में घुस गया. हमने कुछ देर इंतजार किया लेकिन जब वह बाहर नहीं आया तो मैं भी गुफा में घुस गया. यह बहुत कम ऊंचाई का गोठ था. यहाँ सीधी कमर उठा नहीं जा सकता था. मैंने आदेशित आदमी से पूछा कि क्या हमें यहीं रहना है. वह कुछ बुदबुदाया और फिर उसने हाथों से इशारा किया कि अपने साथियों को अंदर बुला लूं.

मालूम पड़ा यह आदमी एक चरवाहा (बद्दी) है जो अपने पुश्तैनी खरीक में अड्डा जमाए है. उसने हमें बताया कि मंदिर बहुत बाद में बना, उनका यह पुराना अड्डा है. अब उसका खरीक मंदिर परिसर में आ गया है. उसकी बातों से हमें महसूस हुआ कि वह बाबाजी के आदेश से खुश नहीं था. मगर, वह बाबाजी को कुछ कह भी नहीं सकता था. हम लोग किंकर्तव्यविमूढ़ थे. खरीक गोल पत्थरों के ढेर लगाकर बनायीं गयी थी. जिसकी छत में फूस पड़ी थी. आदमी से भेड़ों की बास आ रही थी और ऐसा लगता था कि शायद कभी-कभार कुछ भेड़ें भी यहाँ चरवाहे के साथ सो जाती हैं. हमने आँखों ही आँखों में तय कर लिया कि भोजन का अब नाम न लो!

चरवाहे की विवशता पर हमें तरस आ रहा था और उसकी विवशता की वजह भी हम ही थे. वह उनींदा लग रहा था. शायद सो ही चुका था. खरीक के अंदर भी ठंड से राहत नहीं थी सो हमने जितने कपड़े मुमकिन थे पहन लिए. विनोद और मेरे पास मैट और स्लीपिंग बैग भी थे मगर यहाँ इतनी जगह नहीं थी कि चार लोग पैर पसारकर सो सकें. सो हम उकडू हालत में सोने की कोशिश करने लगे. थकान से हमारी आँख लग आई थी. इसी दौरान खरीक में कुछ धुँआ सा आने लगा और हमारी नाकों तक मिट्टी तेल की दुर्गंध पहुँची. बद्दी चूल्हे में आग सुलगाने की कोशिश कर रहा था. उसकी लकड़ियाँ गीली थी मगर वह बिना कोई बात कहे अपने काम में लगा था. वह भट्ट जी के सारे सवालों के जवाब नहीं दे रहा था और जो दे रहा था वह भी समझना मुश्किल था कि क्या बोला होगा. शायद उसकी अपनी कोई और भाषा थी और शायद उसका स्वभाव ही ऐसा था कि कम शब्दों में ही उसका काम चल जाता था. भट्ट जी से उसने ये तस्दीक कर ली थी कि हम लोग भूखे हैं. इसलिए अब वह हमें खिलाने की जुगत में लगा था. हम दोनों कुछ घटता हुआ तो देख रहे थे लेकिन शिथिल हो चुके शरीर और अचेतनता से सब समझ नहीं पा रहे थे. हाँ, कुछ तो घट रहा है, मैंने विनोद को बताया लेकिन क्या यह अभी कहा नहीं जा सकता. आग जल गयी तो बद्दी ने एक लंबी से लौकी पत्तियों के बीच से निकाल ली और एक अभ्यस्त खुकुरी से उसे काटने में जुट गया.

भट्ट जी ने हमारी ओर देखते हुए इशारा किया सब कुछ अच्छा होगा. हम अब खाने को लेकर बहुत उत्साहित नहीं रह गए थे. उल्टा बद्दी भाई की स्थिति से हमें पीड़ा ही हो रही थी. फिर भी हम कुछ कहने की स्थिति में नहीं थे. हमने देखा कि बद्दी ने लौकी को बिना तले ही कड़ाई में छौंक दिया और ऊपर से उस पर मोटा नमक छिड़क दिया. अब वह एक पीतल की थाली में आटा गूँथने लगा. हम बीच-बीच में कोई दृश्य देखते और फिर हल्की-सी झपकी हमें सुला देती. बद्दी के हाथों को देखा या बद्दी के हाथों के बारे में सपना आया जाने क्या मगर एक अजीब सी भावना मन में उपजी. फिर जब हमारी आँख खुली तो भट्ट जी और बद्दी खाना परोसने की कोशिश कर रहे थे. आज भी खुदा की रहमत से हमें भूखा नहीं सोना होगा.

बहुत कम बर्तन थे, लेकिन तीन लोगों का खाना लग रहा था. हमें सुलटा किया गया और फिर लौकी की सब्जी के साथ मोटी-मोटी रोटियां परोसी गयीं और हमने खाया भी. पता नहीं हाथ धोये कि नहीं धोये लेकिन हम भरपेट अहसास के साथ गहरी नींद सोये. इतना याद है कि बद्दी हमें खाना खिला चुकने के बाद संतुष्टि भाव से धीमा-सा मुस्कराया था और फिर वह और भट्ट जी भेड़पालन को लेकर कुछ बातें कर रहे थे. सुबह बद्दी ने ही हमें जगाया और कहा कि बाबाजी हमें याद कर रहे हैं. हम लोग जाग जाएँ और मंदिर की प्रार्थना में शामिल हों. उसने यह भी बताया कि वह आज अगले खरीक तक जाएगा. हम जल्दी तो नहीं उठे, थोड़ा और सोये, अब यह खरीक हमें अपनी-सी लगने लगी थी. सूरज की रौशनी पर्याप्त महसूस हुई तो हम झटपट उठे और अपना सामान समेटा. सामान वहीं छोड़ हम बाबाजी से मिलने गए.
बाबाजी इस समय काफी हँसमुख लग रहे थे. हमने पूछा भी कि क्या कल उन्होंने ही हमें शरण दी थी. उन्होंने बताया कि हाँ वे वही थे. बाबाजी अपनी धूनी ज़माने लगे तो इस बीच हमने मंदिर में हाथ साफ़ किए, यह रसूखदार मंदिर था और इस यात्रा में जहाँ भी हमें कुछ कमाई होती भट्ट जी ऐसे देवता और मंदिर को और पुष्पित-पल्लवित होने का आशीर्वाद जरूर देते.

हमने अपने बैग उठाये. बाबाजी को जोरो का धन्यवाद कहा और आगे बढ़ गए. जाते-जाते बाबाजी ने हमसे कहा कि बच्चा खलिया टॉप जरूर जाओ. भोले-बाबा वहीं मिलेंगे. थोड़ा आगे से खलिया बुग्याल का रास्ता निकलता था. यहाँ से पञ्चचूली और अन्य हिम दृश्यावलियों का विहंगम दृश्य दिखता है. लेकिन हमारी प्राथमिकता फ़िलहाल हिमालय नहीं यहाँ के लोग थे. 'हम पर्यटन करने नहीं आये हैं', यह अहसास भट्ट जी हमें बार-बार कराते. यह भी एक गर्वोक्ति थी कि 'हम कोई बाहर से थोड़ना आए हैं यहीं के रहने वाले हैं, प्रकृति को तो जानते ही हैं.' यह हमारा तब का तिरष्कार भाव ही था क्यूंकि उन दिनों हम घरघोर जनवादी जो थे.

रास्ते में हमें बद्दी की बड़ी याद आई. कितना सीधा और सच्चा इंसान था वो. हिमालय का दृश्य अब खुल चुका था. हम हिमालय की तरफ वाले पहाड़ में थे. वनस्पति शास्त्र के ज्ञाता विनोद ने बताया कि मध्य हिमालय की वनस्पतियों से थोड़ा फरक वाली वनस्पतियाँ दिख रही हैं. बाँज-बुरांश-चीड़-देवदार की फरक छवि को हम सबने महसूस किया.

दोपहर तक हम मुन्सियारी में थे. भट्ट जी ने पहले मुन्सियारी बाजार का सूक्ष्मता से अवलोकन किया. फिर यहाँ के व्यापारियों से बात की. यहाँ पूछने, बताने और खोजने के लिए बहुत कुछ था. सेब, राजमा, जड़ी-बूटियों, कुटीर उद्योग-पर्यटन, पर्वतारोहण, आव्रजन, पलायन, भोज्य-विविधता आदि पर ढेरों बातें की गयीं. अब तक हमारे मन में छवि थी कि भोटिया लोगों में जातिभेद नहीं होता. लेकिन, यहाँ जानकारी मिली कि यहाँ भी दो जातियाँ हैं तथाकथित निचली जाति के भोटिया लोग आज भी विकट परिश्रम करते हैं और शिक्षा कम होने से उनका सरकारी नौकरियों में जाना न के बराबर हुआ है. उनमें पलायन भी कम है सो वह आज भी यहाँ की कृषि-पशुपालन अर्थव्यवस्था की धुरी बने हुए हैं. कुमाऊं की महिलाओं के बनिस्पत यहाँ की महिलाएं अधिक स्वतंत्र और स्वायत्त हैं लेकिन यह उस तरह का मातृसत्तात्मक समाज भी नहीं है जैसे कि अकादमीशियन बता देते हैं. घर के बड़े फैसले तो पुरुष ही लेते हैं, उन्हीं का संपत्ति पर नियंत्रण भी है. बावजूद सबकुछ के हमें यहाँ की अर्थव्यवस्था में भारी ताकत दिखी. खुद से रोजगार सृजन की कूबत यहाँ सबमें कूट-कूटकर भरी है. क्षेत्र के गांवों में अब भी जबरदस्त सहकार की भावना मौजूद है. लोगों ने विपरीत मौसम के अनुसार यहाँ रहना और जीना सीखा है. भाषा के मामले में जरूर हीनभावना आई है. लोगों ने जोहारी की जगह कुमाऊंनी और हिंदी अपना ली है.

मुन्सियारी क़स्बे के बाद भट्ट जी को धौली गंगा घाटी के गांवों में सर्वे कर अपने सैम्पल साइज़ की भरपाई करनी थी. कपकोट से मुन्सियारी तक उतने गाँव नहीं मिल सके थे जितनी की उम्मीद थी. सो, इसे मुन्सियारी की तलहटी में बसे गांवों से लेकर पहले मदकोट फिर जौलजीवी तक खींचा गया. ट्रेक लंबा होने से विनोद और मेरा अहं भाव भी तुष्ट हुआ. बाद में जौलजीवी से पिथौरागढ़ जीप से गए. वहां एक-दो रोज हरीश पंत जी (सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य) जीआईसी रोड के यहाँ आराम किया. इसी यात्रा में हम पुनः एक और पदयात्रा जोड़ पाए. पिथौरागढ़ से वाया पाताल भुवनेश्वर गंगोलीहाट. शायद हमें पैदल चलने की हौस लग गयी थी. मगर, शोध-यात्रा के बरक्स हो रही पदयात्रा का उत्स तो मुन्सियारी ही था.

तब बदला क्या है?

इस बार कपकोट से मुन्सियारी की योजना गढ़ते समय पहले तो मुझे ये आश्चर्य हुआ कि 15 साल पहले हमने कोई पदयात्रा इस रूट से की थी. ओह 15 साल गुजर गए! दूसरा आश्चर्य ये हुआ कि 15 साल गुजर जाने पर भी हम उस यात्रा को शब्द में नहीं ढाल सके. यह यात्रा उन बिरल यात्राओं में थी जो हमने प्रकृति की बजाय मनुष्य को केंद्र में रखकर की थी. मनुष्य इन विकट पहाड़ों में कैसे जीता है, यह हमारी उत्कंठा का केंद्र बिंदु था. विरल आबादी थी लेकिन हमने उस पर सघन काम किया. जरूर भट्ट जी की पीएचडी थीसिस के कुछ पन्नों में उसका सत्व गया होगा और जरूर कुछ आँकड़े पुष्ट-परिपुष्ट हुए होंगे लेकिन उसका तरल रूप अनछुवा रह गया. तेजम के सयाना जी की मिजबानी के उन भावों को हम अब वैसा का वैसा तो नहीं ला सकेंगे और न ही कालामुनि मंदिर के अहाते में रह रहे बद्दी के मन में उमड़ता-घुमड़ता वो सब कुछ, जो हमारे साथ लंबे स्पर्श की तरह रहा. यही बात महसूस होती है कि जहाँ आपको कुछ नैसर्गिक, मानवीय भाव मिलें वह जरूर दर्ज हों. भौतिक जगत की छवियाँ फिर से जुटायी जा सकती हैं लेकिन तनाव के क्षणों में ‘मनुष्य-मनुष्य के बीच घटा वह खास’ नहीं लौटाया जा सकता. जबकि वही एक ऐसी चीज है जिसे मनुष्यों की अगली पीढ़ियों को हस्तांतरित होना चाहिए.

भौतिक रूप से इस मार्ग में अब भी कोई ड्रामाई बदलाव नहीं आए हैं. शामा धुरा से तेजम तक पक्की डामर सड़क जरूर बन गयी है. अभी इसकी खबर बहुतों को नहीं हुई है. निश्चित रूप से यह नई सड़क अपने नए मंजरों से खाए-अघाए पर्यटकों को कुछ ताजगी दे पाए. शामा का क़स्बा थोड़ा फूल गया है. फैला नहीं है, फूल गया है अपनी ही जगह. जहाँ पहले खुली-खुली दुकानें थीं, अब वे बाज़ार के प्रिय उत्पादों से भर गईं हैं. दुकानों और मकानों के ऊपर होटलनुमा कमरे निकाल लिए गए हैं. बाकी अवस्थापना बहुत कुछ वैसी की वैसी है. बाहर का कोई आदमी एक बड़ा होटल यहाँ बना रहा है, शामा से थोड़ा पहले. राजेंद्र कोश्यारी अपना आजीविका प्रयोग बीच में छोड़ देहरादून चले गए हैं. उनके मूल गाँव चीटाबगड़ की तरफ भी उदासी पसरी है. हालाँकि नाचनी के पास से कोई नई सड़क उधर जा रही है. रमाणी गाँव लगभग पूरा उजड़ गया है. लोगों ने बताया कि 15 साल पहले जो कीड़ा यहाँ के संतरों पर लगना शुरू हुआ था, वह बाद में संतरों का जड़-मूलनाशक साबित हुआ. रमाणी के मशहूर संतरे अब केवल बुजुर्गों की यादों में हैं. सड़क रमाणी को पूरा नहीं छूती है. किनारे से निकल जाती है. सड़क अभी बेहद सँकरी है और पहाड़ में नए आने वालों के लिए खतरों से भरी हुई. लेकिन, सड़क से नदी और पहाड़ के साथ बनने वाले दिलकश-दृश्य बेहद मनोहारी हैं. अब नीचे रामगंगा नदी में आपको एक हवादार पुल मिलता है और यही नदी-पुल बागेश्वर-पिथौरागढ़ की सरहद बनाते हैं. सड़क फिर से कई घुमावदार चक्कर लेती चढ़ती है और अंततः तेजम से कुछ किलोमीटर पहले मुन्सियारी हाईवे में मिल जाती है. बीच में एक जगह से रामगंगा में सड़क डाली गयी है, जहाँ एंगलिंग की कैंप साइट है. सड़क मार्ग में तेजम अलग-थलग छूट गया है जो कभी बागेश्वर-पिथौरागढ़ के बीच की जरूरी मंडी होने से गौरवान्वित होता था. रमाणी-तेजम के मार्ग से सड़क शायद इसलिए भी न दी हो क्यूंकि रमाणी के ठीक बाजू में काफी बड़ा लैंडस्लाइड सक्रिय है. यह 15 साल पहले भी हमने इसी भुतहा रूप में देखा था. अब इसका मुँह और फ़ैल गया है. पूरा पहाड़ ऊपर से नीचे तक छलनी हो चुका है और शायद प्रकृति में हो रहे बदलाव का एक बड़ा सूचक है. कृत्रिम उपायों से इसे रोक पाना अब मुमकिन न होगा. जाने क्या चल रहा है भीतर-भीतर!

क्वीटी और बिर्थी गाँव के बीच भी एक बड़ा भू-स्खलन सक्रिय हुआ है. लेकिन, यह पहले नहीं था या छोटे रूप में रहा हो. यह भी काफी विस्तार और गहराई लिए हुए है, यह उस तरह का नदी-घाटी का भू-स्खलन नहीं है जैसा कि ऊखीमठ से जौलजीवी के बीच कई जगह देखने को मिलता है. यह सामान्य पहाड़ में है जिसमें एक तरफ गिरगांव का भारी मिश्रित जंगल है. हो सकता है इस क्षेत्र में कुछ आतंरिक संरचना बदल रही हो. बिर्थी फाल के नीचे अब कुछ दुकानें पर्यटकों के लिहाज से खुल गयी हैं, ये पास के बिर्थ्वाल लोगों की ही हैं. यहीं पास में अब केएमवीएन का भी एक बड़ा होटल बन चुका है.

मुन्सियारी से पहले जो जगह जैव-विविधता पार्क बने हैं. संभवतः यह पूर्व वन महानिदेशक डॉ. आरबीएस रावत के समय में वन पंचायतों के जमा धन से बने थे. लेकिन, अच्छी मंशा से बने और पर्यटकों को यहाँ की वनस्पतियों से परिचित कराने के लिए बने इन पार्कों की दुर्दशा देखते ही बनती है. सरकारी सिस्टम का सबसे बड़ा दोष ये है कि यहाँ एक अच्छे कदम की इतिश्री उसे उठाने वाले की विदाई के साथ ही हो जाती है. कोई नया अधिकारी उसे आगे बढ़ाने का इच्छुक नहीं रहता.

पर्यटक स्थल बन जाने से मुन्सियारी जाहिर है अपना मिजाज बदल चुका है. यह स्वाभाविक बात है लेकिन यहाँ तेजी से फलते-फूलते होटल व्यवसाय में बाहर का पैसा लगना भी अनिष्टकारी प्रतीत होता है. मुन्सियारी से ठीक पहले हिमालय की छटा को बाधित करने वाला एक विशालकाय मंदिर नुमा धर्मशाला बना है. गायत्री मन्त्र वालों के धार्मिक पर्यटन के हिस्से का निवेश लगता है. यह यहाँ सबसे अधिक अटपटा लगने वाला मामला है. मुन्सियारी में मल्लिका विर्दी के प्रयासों से शुरू हुआ होम-स्टे का प्रयोग काफी चर्चित रहा है. लाभ-वितरण के हिसाब से देखें तो यह काफी सुखद परिघटना है लेकिन यह खतरे भी साथ ला रही है. गाँव के लोग पर्यटकों को अपने घरों में टिकाकर, घर का खाना खिलाकर आतिथ्य भाव का जो मॉडल बनाना चाहते हैं, पर्यटक उस संस्कृति के नहीं हैं. लिहाज़ा यहाँ चकती पीना एक बड़ा आकर्षण बन चुका है. जाहिर है होम-स्टे ने चकती उद्योग को बढ़ावा दिया होगा लेकिन अकस्मात् हो रही कमाई इस काम में लगे लोगों का चरित्र नहीं बदलकर रख देगी, कहा नहीं जा सकता.
मुन्सियारी में महान सर्वेयर पंडित नैन सिंह रावत की स्मृति में एक पर्वतारोहण संस्थान की शुरुआत हुई है. यह एक अच्छी पहल है. निम, उत्तरकाशी जैसी संस्था बहुत कम लोगों को प्रशिक्षण दे पाती है. यह उस इच्छा का भार बाँटेगा. मगर सरकारी चाल के हिसाब से अभी इसके फलने-फूलने में बहुत देर लगनी है. अब संस्थाओं को खड़ा करने में व्यवस्था में वैसा उत्साह नहीं.

खलिया टॉप ट्रेकिंग के नक़्शे में अचानक बहुत ऊपर चला गया है. शायद मुन्सियारी कस्बे से इसकी कम दूरी ही इसकी बड़ी वजह हो. गंभीर पर्यटक तो ऐसे शिखरों और बुग्यालों में पहले भी जाते रहे हैं लेकिन यह आम आदमी के लिए भी सुगम हो गया है. पंचचूली की विहंगम छवियों का साक्षात्कार पाने के लिए यह छोटा-सा ट्रेक बड़ा उपयोगी है. खासकर, हिमालयी शिक्षा के हिसाब से बेहद फलदायी. मगर, बुग्याल में जगह-जगह बिखरी पड़ी शराब और पानी की बोतलें, नमकीनों और कुरकुरों के रैपर विनाश की पूर्वसूचना लाते दीखते हैं. हमारे यहाँ पर्यटन के लिए कोई नियम-कानून, शिक्षा और प्रशिक्षण नहीं है.

मुन्सियारी में आज बहुत लोगों को इस बात का इंतजार है कि झट से झट मिलम ग्लेशियर के पास तक सड़क चली जाए. मिलम और ऊपर घाटियों में अब बहुत कम लोग रह गए हैं. हिमालय के सामीप्य का पर्यटन ही प्रमुख आकर्षण है. जैसे-जैसे यह सड़क आगे बढ़ेगी, वैसे-वैसे बाजार से पूँजी यहाँ पहुंचेगी. शायद उस मॉडल में स्थानीय लोगों का मालिकाना वैसा नहीं रह सकेगा, जैसा कि वो सदियों से रहा है.


Thursday, June 28, 2018

विलम्बित लय में गूंजती है बारिश की आवाज


एक चुप सी लगी है. इस चुप में सुख है. बड़ी मशक्कत से इस चुप तक पहुंचना हो पाता है. इसे सहेजने के जतन में कई बार घबराहट होती है. कहीं कोई चूक न हो जाए, कहीं इस चुप पर कोई खरोंच न लग जाये. बारिशों के घेरे में सहेजती हूँ इस चुप को, तुम्हारी याद के घेरे में भी. 

इस चुप का उदासी से कोई रिश्ता है, जानती हूँ फिर भी जाने क्यों इस दफे नहीं चाहती थी कि इस चुप में कोई उदासी आये. कभी तो यूँ हो कि मैं हूँ, तुम हो और उदासी न हो. ओह, यह तो कुछ ज्यादा की उम्मीद हो गयी शायद. फिर भी कोशिश करती रही. उदासियों को चुप के घेरे में आने से बचाती रही, तेरी यादों को तेरे होने से बचाती रही. लेकिन हूँ तो बुध्धू ही, सो ऐसा हो न सका. उदासी ने चुप की कलाई थाम ही ली.

उदासी में एक सुख है, यह शाश्वत उदासी है जो चुप के घर में रहती है. कुछ अनमनी सिसकियाँ हैं जिन्हें खो दिया था कहीं वो मुस्कुराने लगी हैं. सब कुछ कितना जाना हुआ है. इस उदासी के साथ ढेरों पैदल यात्राएँ करना चाहती हूँ, बहुत सारा रोना चाहती हूँ. नृत्य करना चाहती हूँ. न, तुम्हारा होना नहीं चाहती कि तुम्हारा होना उदासी के इस राग को खंडित करता है.

तुमसे बिछड़ने का सुख है. उदासी का सुख. विलम्बित लय में गूंजती है बारिश की आवाज. यह आवाज मेरी गुम गयी आवाज ही तो है. वो आवाज जिसे मैंने बहुत सारे बोले हुए के पीछे छुपाया था.

मैं तुम्हें तुम्हारे बिना ही चाहती हूँ.

Tuesday, June 26, 2018

वो ख़्वाब जो बरस रहा है...




रात का किवाड़ खटखटाती है
तुम्हारी आवाज की उजली किरन

पपीहे की टेर
लगती है राग भैरवी सी
 रात झरे हरसिंगार से सजी है धरती

तुम्हारी आवाज में सुबह के खिलते ही
मोगरे और रातरानी को नींद आने लगी है
जबकि बुलबुल के जोड़े को सूझ रही है शरारत

पास में बैठे हैं विनोद कुमार शुक्ल
और वॉन गॉग दोनों

मेरे पास दो कप चाय है
मैं दोनों कप चाय पी रही हूँ बारी बारी से
दूसरा कप किसके हिस्से का है
पता नहीं
पहला कप यकीनन तुम्हारा ही है

हवाओं से बात करती हूँ
तुम मुझे बात करते हुए देखते हो

सुख और क्या है
दूर शहर में बैठकर
तुम्हारे यूँ इतने करीब होने के सिवा

मैंने सपने में एक नदी देखी
तुमने सपने में देखा एक जंगल
इस सुबह में वो जंगल झूम रहा है
 वो नदी खिलखिला रही है

यूँ ही हथेलियाँ आगे कर देती हूँ
टप्प से गिरती हैं कुछ बूँदें
जबकि बादल कहीं नहीं थे

अचानक हवाएं उड़ा ले जाती हैं मेरे शहर का ख्वाब
अब वो तुम्हारे शहर का ख्वाब है
अब वो पूरी धरती का ख्वाब है

वो ख़्वाब जो बरस रहा है...



Thursday, May 31, 2018

जिन्दगी की कश्मकश से रू-ब-रू कराती कवितायें



- प्रतिभा कटियार

यूँ तो समूचा जीवन ही कविता है लेकिन जीवन में कविता कहाँ टकराएगी पता नहीं. यह कविताओं का तूफानी दौर मालूम होता है. पलक झपकते ही अनगिनत कविताएँ नज़रों से गुजरती हैं, लेकिन ठहरती कुछ ही कवितायेँ हैं. पिछले दिनों ऐसी कुछ कविताओं से वास्ता पड़ा जो ज़ेहन में ठहरी हुई हैं. ये कवितायेँ हैं श्रुति कुशवाहा की. श्रुति के संग्रह ‘कश्मकश’ से गुजरते हुए महसूस होता है कि कहीं अपने ही भीतर की किसी पगडंडी से गुजर रही हूँ. अपने ही सवालों को श्रुति की मार्फत दोबारा पढ़ रही हूँ और दुनियादारी के शोर में बचाकर रख रही हूँ थोड़ी सी उम्मीद.

यह श्रुति का पहला संग्रह है. कई मायने में यह संग्रह अपनी विशेषताओं की ओर ध्यान खींचता है. इस संग्रह में जिन्दगी की छुअन महसूस होती है. जिन्दगी के सारे रंग बिना किसी तरह के कॉस्मेटिक प्रभाव के यहाँ मिलते हैं, संवेदना की तमाम परतें स्वाभाविक ढंग से खुलती हैं. रिश्तों के प्रति जीवन के प्रति, समाज के प्रति कवि की संवेदना ने इस संग्रह को गढ़ा है. इन कविताओं में जहाँ समाज की तमाम विद्रूपताओं के प्रति एक सजग नजर और नाराजगी का भाव दीखता है वहीँ नकारात्मकता से लड़ने का माद्दा भी दीखता है. इन कविताओं में बदलाव की मध्धम-मध्धम आंच में पकती जिद दिखती है और दिखती है आने वाले कल को लेकर एक उम्मीद.

संग्रह की पहली कविता ‘सही वक़्त’ कवि के मिजाज़ को खोलती है जहाँ वो कहती है ‘दिखने में आदमी जैसा/जब नहीं रह जाता आदमी/जब चारों ओर मंडराता है संकट/ वही होता है/कविता लिखने का सबसे सही वक़्त.’

लिखने की भूख, से परे लिखने को जीवन की जरूरत में तब्दील होने के रूप में देखती श्रुति अपनी कविता ‘लिखना लाज़मी है’ लिखती हैं. दुनिया किस तरह कृत्रिम होती जा रही है और उस कृत्रिमता के शोर में किस तरह सच्चाई और सरलता पीछे छूटती जा रही है इसे ‘सब महफ़ूज हैं’ में देखा जा सकता है ‘ इधर भेडिये को सौंप दी गयी है चौकीदारी/अब डरने की कोई वजह नहीं/ सब महफूज हैं.’

इन कविताओं के स्वर कवि की चेतना और सजगता को इंगित करते हैं. वह जो एक पूर्वानुमान अक्सर बन जाता है किसी स्त्री के संग्रह को खोलते वक़्त कि स्त्री विषयक स्वर होगा ही मुख्य स्वर, वह टूटता है क्योंकि संग्रह की रेंज काफी ज्यादा है. ‘निर्ममता’ नामक कविता में ऐसे ही स्वर को इस तरह दर्ज किया है कवि ने, ‘अपनी कौम और देश/ खुद नहीं चुनते बच्चे/लेकिन/ कौम और देश के नाम पर/मारे जाते हैं वो’.

कविता में बहुत सारी पर्तें खुलती हैं समय की, भीतर की बेचैनी की और वो हमें खंगालती भी हैं, मुक्तिबोध की याद आती है कविता ‘सवाल’ पढ़ते हुए जहाँ वो लिखती है ‘ये दुनिया उतनी ही बुरी है/जितनी हमने सुनी है/ ये दुनिया उतनी ही भली है/जितनी हमने देखी है/ सवाल दुनिया का नहीं/ सवाल तो यह है/कि हम किस ओर खड़े हैं.’

अपने भ्रमों को टटोलती है कवि की नज़र और ‘आज़ादी’ कविता में ढलती है कुछ इस तरह ‘ आज़ादी का जश्न मनाने का सोचती हूँ/कि याद आ जाती है मणिपुर की ईरोम चानू शर्मिला/अरुणा शानबाग, सोनी सोरी, थान्गजाम मनोरमा/ निलोफर, आसिया जान, निर्भया, प्ररेति राठी/कानों में गूंजते हैं ढेरों नाम/शिकारी घूम रहा है खुलेआम’ इसी कविता में वो आगे लिखती है, ‘ सावधान! आवाज उठाना सख्त मना है/आवाज़ उठाने की एवज में होंगे बलात्कार’. एक और कविता ‘क्या तुम जानते हो’ का जिक्र इसी संदर्भ में ज़रूरी है जहाँ कविता सवाल करती है, ‘क्या तुम जानते हो डाऊआला की जूली की कहानी/सोलह की उम्र में/मर्दों की गन्दी नज़र से बचाने के लिए/जिसके वक्षों को गर्म पत्थर से दागा गया था/कैमरून में अरसे से हो रही है ब्रेस्ट आयरनिंग’ यह कविता अपने समय और समाज में स्त्रियों के प्रति आई क्रूरता की कलई खोलते हुए सवाल करती है. इसकी रेन्ज में पूरी दुनिया की स्त्रियाँ हैं, उनके दर्द हैं, उनकी तकलीफें हैं और इन सबको जोडती है दुनिया की हर एक स्त्री की पीड़ा से, उसके प्रति की गयी उपेक्षा से और अंत में कविता कुछ यूँ कहती है, ‘चलो ये सब छोड़ो/बताओ क्या तुम जानते हो/ सालों से अपने घर के भीतर रहने वाली/अपनी पत्नी के बारे में/जो हर रात सोती है तुम्हारे बाद/हर सुबह उठती है तुमसे पहले/क्या उसने नींद पर विजय पा ली है?’

इन कविताओं को स्त्री विमर्श के खांचे में डालकर देखा जाना कविताओं को कम करके आंकना है. क्योंकि स्त्री भी कवि की कविताओं में उसी तरह आती है जिस तरह अन्य विषय आते हैं और उन सबका आना एक ही बात का सूचक है कि कवि की चिंता में यह समूची दुनिया है जिसे वो हंसी से, ख़ुशी से, मोहब्बत से भर देना चाहती है. इसके लिए वो तमाम वर्जनाओं को तोड़ने से भी गुरेज नहीं करती.

‘और हंसो लड़की’ ‘बुरी औरत’ ‘लाल रंग की लड़की’ ‘स्कूल जाती लड़की’ ‘लड़कियां’ आदि कवितायेँ इस समूची धरती को सुंदर बनाने की कामना की कवितायेँ हैं, स्त्रियों को भी इन्सान समझे जाने की बात कहती कवितायेँ हैं. इन कविताओं के ज़रिये स्त्रियों के लिए भी इस दुनिया और समाज में जगह बनाने की, उनकी अस्मिता को सहेजने की बात तो है लेकिन यह किसी किस्म के आरोप, प्रत्यारोप, और पुरुषों से किसी किस्म के भेद या उनके प्रति औफेंसिव कवितायेँ नहीं हैं.

श्रुति की कवितायेँ शोर नहीं मचातीं, वो चुपचाप असर करती हैं. सोशल मीडिया पर इन कविताओं का कोई शोर नहीं, न ही सर पर कविताओं को लेकर घूमने की कोई हड़बड़ी. कवि के संजीदा और संकोची मिजाज़ की मुनादी सी हैं ये कवितायेँ कि भोपाल शहर से एक आत्मीय रिश्ता भी खुलता है संग्रह की एक कविता में जहाँ भोपाल शहर के नाम एक खत आता है. प्रेम कवितायेँ हौले से सटकर आ बैठती हैं बिना किसी लाग लपेट के और आसपास प्रेम महकने लगता है.

भाषाई चमत्कार से कतई दूर इन कविताओं की सरलता और सहजता इनका मूल तत्व है जिसके चलते इन कविताओं से रिश्ता जल्दी ही कायम हो जाता है.

चूंकि यह पहला संग्रह है तो जाहिर है छुटपुट जगह बिखरा हुआ सा अनगढ़पन भी दिख जाता है. वह अनगढ़पन दीखता है कविताओं के चयन में. कुछ कविताओं को इस संग्रह में शामिल करने से बचा जा सकता था हालाँकि ऐसी कवितायेँ कम ही हैं. अंतिका प्रकाशन से प्रकाशित यह संग्रह प्रोड्क्शन के लिहाज से भी काफी अच्छा है.

मेरे लिए आजकल के ‘मेरी कविता तेरी कविता’ के शोर के बीच एक सजग, संवेदनशील, संकोची मिजाज़ की कवि की समय से मुठभेड़ करती, सवाल उठाती और नए रास्ते बनाने में यकीन करती कविताओं से रू-ब-रू होना सुखद अनुभव है. ये कवितायेँ पेज पलटते ही पलट नहीं जातीं बल्कि जेहन में रह जाती हैं. कविताओं के सैलाब के बीच ऐसी कविताओं का होना उम्मीद का होना है.

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Wednesday, May 30, 2018

रेखा चमोली की डायरी के साथ एक यात्रा


यह 2012 की याद को पलट के देखना है. उस रोज जब मुठ्ठियों में 20 मई का दिन था और सामने उत्तरकाशी का रास्ता. अगर स्मृति दोष नहीं है तो संभवतः वह 25 मार्च 2012 का दिन था, मैं पहली बार उत्तरकाशी के रास्तों पर थी. फ्योली के फूलों से भरा रास्ता खूबसूरत पहाड़ और एक नयी दुनिया में जाने का नए लोगों से मिलने का बहुत कुछ नया जानने सीखने का उत्साह सफ़र को खुशनुमा बना रहा था. मैं बावरी सी सब कुछ देख सुन रही थी, महसूस कर रही थी.

पहले भी कई बार उत्तरकाशी गयी हूँ, वहां के शिक्षक साथियों से मुलाकातें की हैं, स्कूलों में जाना हुआ है, नदियों से दोस्ती हुई है, लोगों से प्यार हुआ है. उत्तराखंड में देहरादून के बाद उत्तरकाशी से ही पहले पहल की दोस्ती हुई. आज जब कई बरस बाद उत्तरकाशी के रास्ते पर हूँ तो लग रहा है स्मृति के वो पन्ने भी साथ हैं.

मैं रास्तों में बादलों की लुका-छिपी, फूलों की बहार ढूंढ रही थी लेकिन यह मौसम कोई और था. पहाड़ों में आग लगी हुई मिली. बादलों की लुका-छिपी की जगह धुआं नज़र आ रहा था. रास्तों में हरियाली कम नदियों में पानी कम लेकिन मन में उत्साह जरा भी कम नहीं. उत्साह की मुख्य वजह थी शिक्षिका रेखा चमोली की डायरी 'शिक्षक की स्कूल डायरी' जिसे अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी ने प्रकाशित किया है का विमोचन और डायरी पर शिक्षकों से बातचीत का अवसर.

रेखा शैक्षिक अनुभवों से समृद्ध शिक्षिका हैं. यह समृध्धि उनके काम के बरसों से नहीं उनके काम की गहराई से मापी जा सकती है. मैं उनसे कई बार मिली हूँ, औपचारिक व अनौपचारिक हर स्तर पर बातचीत की है, उनकी कवितायें पढ़ी हैं और रेखा को महसूस किया है. मैंने पाया है कि रेखा अपने लिखे में, अपने दिखे में और अपने जिए में एक सी हैं. मेरे तईं यह बात बेहद मूल्यवान है. शायद यही वजह है कि रेखा मैम अब प्यारी रेखा यानि सहेली रेखा में बदल चुकी है. रेखा की डायरी पर विस्तार से अलग से बात करनी होगी लेकिन यह तय है कि अब तक जितने भी पन्ने पलटे हैं उनके भीतर एक पॉजिटिव अनरेस्ट दिखा है, कुछ करने की शदीद इच्छा, बहुत कुछ जानने की, सीखने की इच्छा. मैं इन इच्छाओं का बहुत सम्मान करती हूँ इसलिए जहाँ भी ये इच्छाएं हैं वहां होना चाहती हूँ. क्योंकि कुछ भी करने से पहले इच्छा का होना जरूरी है. वरना बिना इच्छा के, बिना बेचैनी के, बिना सीखने की कोई चाह के भी कई किताबें लिखने वालों को, भाषण देने वालों को भी जानती ही हूँ.

मेरे लिए यह बेहद खूबसूरत अवसर था कि मैं भावनाओं, काम और अभिव्यक्ति में ईमानदार रेखा चमोली की किताब के विमोचन में उनके साथ रही. ऐसे साथ हमेशा आपको कुछ सिखाते हैं, परिमार्जित करते हैं. इसी अवसर पर मुझे डायरी पर शिक्षकों के साथ संवाद करने का भी अवसर मिल रहा था. कोई भी बाहरी संवाद असल में पहले भीतरी संवाद ही होता है इस लिहाज से शिक्षकों के साथ संवाद असल में मेरे ही सीखने, जानने, महसूसने और कुछ अब तक के जाने हुए को साझा करना था. यह बातचीत 3 अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग शिक्षक समूहों के साथ होनी थी. सबसे पहले हम बडकोट पहुंचे.

बड़कोट- बडकोट एक क़स्बा है. पहाड़ों को मसूरी या नैनीताल में ढूँढने वालों के लिये इसका नाम न सुना होना लाजिमी हो सकता है. लेकिन यह पहाड़ों से घिरा सुंदर सा शहर है. छोटा, सादा, सुंदर. छोटी-छोटी सब्जी की दुकानें, फलों की दुकानें, छोटी-छोटी रोजमर्रा की ज़रूरत के सामान की दुकानें. छोटी सी मार्किट जिससे गुजरना भला लगता है. बहुत सारे अजनबी लोग जो अजनबी नहीं प्यारे लगते हैं. किसी पर भी भरोसा करने को जी चाहता है. कमरों में ताला लगाने की जरूरत नहीं लगती. लोग झिड़कते नहीं किसी बात पर. हर कोई अपने काम में व्यस्त है लेकिन किसी को कहीं पहुँचने की जल्दी नहीं है. मैं यहाँ पहली बार आई हूँ और महसूस कर रही हूँ कि ऐसी ही तो किसी जगह की तलाश थी. कितनी शांति है यहाँ. अजनबियत से भी ऐसा अपनापन जो कई बार अपनों के बीच भी मिसिंग लगता है.

मैं और रेखा दोनों डायट बडकोट समय से पहले ही पहुंचकर लोगों से मिलना चाहते थे. रेखा की काफी यादें जुडी हैं बडकोट से. उसके लिए यह नया नहीं है. रेखा ने यहीं डायट बडकोट से बीटीसी की ट्रेनिंग ली है. यह शहर उसके लिए पहचाना है, लोग पहचाने हैं. मैं उसके पहचाने हुए के बीच अपना अजनबी होना छुपा रही हूँ. रेखा जिस प्यार से, सहजता से लोगों से मिलती है वह मुझे बहुत विरला सा लगता है. उसमें सचमुच का अपनापन होता है. यहाँ लोग भी रेखा को खूब प्यार करते हैं, सम्मान करते हैं.

कार्यक्रम ठीक-ठीक हो जाने का सुख हमारे साथ शाम से हो लेता है. यह ठीक से होना क्या है आखिर? तालियाँ, प्रशंसा या कुछ अकुलाहट, कुछ सवाल. कार्यक्रम के अंत में शिक्षकों के सवालों ने मुझे मोहा. वो सवाल कि कैसे लिखने के दौरान आती हैं अडचनें, कैसे दूर किया जा सकता है? नियमित कैसा हुआ जाय? क्या हर कोई लिख सकता है सचमुच? रेखा कैसे वक़्त निकालती होंगी लिखने का? डायरी को बेस्ट फ्रेंड के रूप में पाना और पलटकर खुद को देखना, अपने भीतर कुछ सुधार कर पाना आदि.

सफल होना असल में सवालों से भर जाना ही तो है. अगर पुराने सवाल थे तो नए सवालों से उन्हें बदल लेने से भी है. अगर भीतर शांति थी अब तक तो उसे एक बेचैनी, एक अकुलाहट से भर देना और शुरू करना सोचना कि कुछ न कुछ तो अब करना होगा. कि जब आप जैसे आये थे वैसे ही वापस न जा रहे हों. मैं तो वैसी ही वापस नहीं जा रही थी लेकिन देख पा रही थी कि काफी शिक्षक साथी अपनी अकुलाहट को लेकर बात कर रहे थे. कुछ भावों में डूबे हुए थे . कुछ ठान चुके थे कि आज से ही शुरू हो जायगा डायरी लेखन.

उत्तरकाशी- उत्तरकाशी खूबसूरत शहर है. इस शहर की नदी के किनारे मैंने अकेले काफी वक़्त बिताया है. यहाँ पहुँचते ही फिर वही कल कल कल का शोर पुकारने लगा था. हर्षा रावत जी से मिलने का तय हुआ और नदी का किनारा पकडकर चल पड़ी उनके घर. सारे रस्ते नदी बात करती रही. वो कोलाहल, वो नदी का रौद्र रूप जो आपदा बन आया होगा. मैंने पूछा नदी से, 'क्यों तुमने रुलाया इतने लोगों को? स्वभाव से तो तुम ऐसी नहीं हो? ' नदी खामोश रही. इस ख़ामोशी में उसकी भी पीड़ा दर्ज है, ठीक वैसे ही जैसे पहाड़ों से उठते धुंए में पहाड़ों की पीडा दर्ज है, पक्षियों का दर्द दर्ज है. इस दर्द की जिम्मेदारी हमारी ही है, उत्तरकाशी में पसीना पोछते लोगों का दुःख समझा जा सकता है, जहाँ कभी पंखे होते ही नहीं थे ,अब एयरकंडिशन लगे हुए है. हर्षा जी का घर नदी के ठीक सामने है. यहाँ इसी नदी की धार के बीच पत्थरों पर बैठकर मैंने और हर्षा जी ने घंटों बात की थी. यह और बात है कि बाद में वह बात एक साक्षात्कार बना था. आज हम फिर उसी जगह थे, चाय थी, शाम थी हर्षा रावत का स्नेहिल साथ था. वापसी में हमें रस्ते में तीर्थयात्रियों का सैलाब मिला ऐसा सैलाब कि पैदल व्यक्ति भी जाम में अटक जाय. हमारे धर्म हमारी आस्थाएं हमारे रास्ते आसान तो कभी नहीं करते, हाँ रोकते कई बार हैं. ऐसा क्यों होता होगा भला. शायद हमारे ही धर्मों को देखने समझने और अपनाने का कोई दोष होगा.

अगले दिन कार्यक्रम समय से तनिक देर से शुरू हुआ लेकिन चला पूरी धुन में. यहाँ काफी शिक्षक मुझे भी जानते थे लेकिन यह कार्यक्रम रेखा के शहर में हो रहा था. यह उसकी शाम थी. वो उन लोगों के बीच थी जिनके बीच पली, बढ़ी और बड़ी हुई है. अपनी दूसरी किताब के साथ इन सबके बीच होना रेखा को उत्साह से भी भर रहा था और संकोच से भी. वो सबसे मिल रही थी. लोग उसे प्यार कर रहे थे, बधाई दे रहे थे. वो संकोच को छुपाने के प्रयास में और खूबसूरत लग रही थी. यहाँ भी डायरी लेखन पर बातचीत हुई, रेखा ने अपने अनुभव साझा किये डायरी के कुछ अंश पढ़े भी गए. इन कार्यक्रमों की आत्मीयता मोह लेती है.

रामेश्वरी लिंगवाल मैडम से कई सालों बाद मिलना हो रहा था. वो बार बार गले लग रही थीं फिर चुप होकर देख रही थीं. मैं उस भीतर घट रहे को सहेज रही थी ठीक वैसे ही जैसे रेखा सहेज रही थीं सबसे मिलना. उनकी दोनों प्रधानाध्यापिकाएं, साथी शिक्षक, दोस्त, सीनियर्स सब थे. रेखा ने कुछ बहुत कमाल की बातें कहीं मसलन यह किताब या कुछ भी लिखना एक स्त्री के लिखने और पुरुष के लिखने में जो अंतर है उसे अभी समाज नहीं पाट पाया है. स्वीकार्यता का भी मसला है. एक शिक्षक को सिर्फ स्कूल आकर पढाना और घर जाने से ज्यादा कुछ करना होता है. यह डायरी किसी सफलता की कहानी नहीं बल्कि शिक्षक के सफर की दास्ताँ हैं.

कार्यक्रम बीत चुका था, सूरज ढल रहा था ठीक आँखों के सामने और नदी की पुकार बढती ही जा रही थी.

चिन्यालीसौड- यहाँ भी पहली बार आई हूँ. रेखा आज खुद अपनी गाडी ड्राइव करके आई हैं. मैं उसकी हिम्मत को देखकर दंग हूँ. संकोच के साथ हिम्मत का मिश्रण गजब का सौन्दर्य लेकर आता है. एक संयुक्त परिवार में रहते हुए सबको साथ लेकर चलना और अपने मन को भी न छोड़ने का संकल्प सामान्य बात तो नहीं. जीवन के हर लम्हे को सुंदर और सार्थक तरह से जीने की जिद रेखा को भीड़ से अलग करती है. मुझे हैरत और सुख इस बात का हुआ कि मुझे यहाँ भी खूब जानने वाले शिक्षक साथी मिले. पहचानी आखों में खुद के लिए स्नेह देखना बताता है पिछली मुलाकातों का असर. यहाँ भी हमने शिक्षकों से शिक्षक डायरी की बाबत कुछ ज़रूरी बातें कीं मसलन क्या हो जाता है लिखने से, क्या लिखना किसी समस्या का हल है, शिक्षक की जिन्दगी में क्या बदलता है डायरी लिखने से, उसकी कक्षाओं में क्या बदलाव आता है. बात एक ही थी कि डायरी लेखन पहले खुद से रिश्ता बनाने में मदद करता है फिर बच्चों से. इससे हमारा और बच्चों का सीखना कुछ हद तक आसान होने लगता है. रेखा ने अपने अनुभवों को यहाँ भी साझा किया. उसने कहा, हम कैसे शिक्षक के तौर पर याद किये जाना चाहते हैं. हमें क्या याद है कि किस शिक्षक ने विज्ञान का कौन सा सूत्र समझाया था, किसने गणित का कोई सवाल समझाया था? नहीं, हमें वही शिक्षक याद रहते हैं जो हमारे मन को छू पाते हैं, जो हमारे टूटते हौसले पर विश्वास का मरहम रखते हैं. जो सर पर हाथ फेरकर कहते हैं कोई बात नहीं, तुमसे हो जाएगा यह काम. शिक्षक को किस तरह अपने जाति धर्म, ऊंच-नीच के पूर्वाग्रहों से मुक्त होने की जरूरत है, स्कूल संस्था में किस तरह इनका नकारात्मक असर पड सकता है, जो बच्चों के साथ सारी जिन्दगी के लिए पैबस्त हो जाता है इस बारे में सोचने की जरूरत है.

चिन्यालीसौड में एक और युवा शिक्षक सुंदर नौटियाल ने अपनी और अपने बच्चों की स्व प्रकाशित डायरी की बाबत जब हमें बताया तो सुखद हैरानी की बात तो थी ही. विज्ञान के शिक्षक सुंदर ने विज्ञान को कैसे खेल बनाकर सिखाना शुरू किया है क्लास में वो अनुभव भी दिलचस्प थे. यह जानना और भी सुखद आश्चर्य से भर रहा था कि इस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए वो छुट्टी लेकर आये थे. ऐसी भी लगन होती है शिक्षकों में.

तीनों अलग-अलग जगहों पर, अलग-अलग लोगों से लगभग एक सी बात करते हुए भी हम हर बार अलग थे. इस बात में शिक्षकों के संकोच, उनके सवाल, कुछ अन्य साथी शिक्षकों के डायरी के पन्ने, कुछ बच्चों की डायरी के पन्ने और बहुत सारे साथियों के प्यार के साथ थी रेखा की डायरी. इस डायरी के बहाने हुए संवाद सार्थक संवाद रहे और इस संवाद में सभी शिक्षक साथी हर लगभग हर जगह अपनी इच्छा से शामिल हुए. क्या यह सचमुच उत्साह की बात नहीं कि इतने सारे शिक्षक साथी एक जगह जमा होकर अपनी छुट्टी के समय में से समय चुराकर एक शिक्षक साथी की डायरी के पन्ने पलटते हैं, उनसे बात करते हैं और खुद भी ऐसा ही कुछ करने की इच्छा से भर उठते हैं.

शिक्षा जगत में रेखा चमोली की इस डायरी का प्रकाशित होकर आना एक बेहद सकारात्मक घटना है.