Thursday, July 27, 2017

जंग जहाँ भी है उसे हटाना होगा



हमने हाल ही में प्रोफेसर यशपाल को खो दिया है. यह देश का बड़ा नुकसान है. उनके विचारों को सहेजकर ही हम उन्हें सच्ची श्रधांजलि दे सकते हैं. वैज्ञानिक सोच की आज कितनी जरूरत है यह हम आसपास के माहौल से देख सकते हैं. हम अपने वैज्ञानिकों का, अंधविश्वासों के खिलाफ लड़ने वालों का कितना साथ देते हैं, कितना तड़प उठते हैं जब अन्धविश्वास के खिलाफ जिन्दगी भर काम करने वाले वैज्ञानिक की सरेआम हत्याएं होती हैं. वो तड़प का न होना ही आज सरेआम किसी को भी पीटकर मार दिए जाने में तब्दील हो ही रहा है. सोचने, समझने, तर्क करने और महसूस करने की हमारी निजी क्षमताओं पर किस तरह सत्ताएं कब्ज़ा करती हैं. किस तरह किसी का सोचा हुआ हमें हमारा निजी विचार लगने लगता है और हम उसके लिए लड़ते हुए किसी की हत्या तक करने को औचित्यपूर्ण मानने लगते हैं. शिक्षा को सत्ताओं ने हमेशा से मोहरा बनाया, वही घोलकर पिलाया जो उनके हित में था. हर सत्ता की पहली नज़र किताबें बदलने पर होती है, हालात बदलने पर नहीं. कि चेतन व्यक्तित्व सत्ताओं के लिए खतरा हैं, यह बात सत्ताओं को पता है. हमारी चेतना को सदियों से गुलाम बनाने का खेल जारी है...कठपुतलियों की तरह हम बस उछल रहे हैं.

यह बुरा समय है, शिक्षा से इन सबके लिंक जुड़े हैं. हमारी शिक्षा हमें कैसा बना रही है. क्या है ऐसे शिक्षित होने के अर्थ जिसके बाद अमरनाथ यात्रियों पर हुआ आतंकी हमला हिन्दुओं पर मुसलमानों के हमले के तौर पर देखा जाता है. हम इन्सान होने की बजाय हिन्दू मुसलमान, ब्राह्मण, दलित, पुरुष, स्त्री के समूहों में बंटते जा रहे हैं. संस्कृति की रक्षा के नाम पर परम्पराओं को सहेजने के नामपर अंधविश्वासों की परवरिश हो रही है. यह कैसी शिक्षा है जिसमें शिक्षिकाएं करवाचौथ के व्रत पर सरकारी छुट्टी होने पर खुश होती हैं बजाय इसका विरोध करने के. क्या सरकारें यह कहना चाहती हैं कि सभी महिलाओं को अपने पतियों की लम्बी उम्र के लिए व्रत रखने के लिए छुट्टी देकर वो उनका साथ दे रही हैं या वो सरकारें राज्य के तमाम पतियों की उम्र बढ़ने के अनुष्ठान में सरकारी आहुति डाल रही हैं. 

जो विज्ञान के छात्र है, शिक्षक हैं, वैज्ञानिक हैं वो भी अंध विश्वासों से मुक्त नहीं हैं फिर वो छात्रों को कैसे मुक्त कर सकेंगे भला. जबकि दूसरी ओर धर्म के ठेकेदारों ने विज्ञान के महत्व को समझा और उसे अपने स्वार्थ के मुताबिक गोल-मोल करके इस्तेमाल करना शुरू कर दिया. आज तमाम प्रवचन वैज्ञानिकता की चाशनी में लिपटे हुए हैं लेकिन तमाम विज्ञान की कक्षाएं धर्म से डरी हुई हैं. श्रधांजलि देने की औपचारिकता से बेहतर है की अपने भीतर की रूढ़ियों पर नजर डाली जाय. उन्हें तोड़ा जाय. सवाल हिन्दू मुलसमान से ऊपर का है, जंग जहाँ भी है उसे हटाना होगा।

Monday, July 10, 2017

कौन है, कौन है वहां?


कौन है, कौन है वहां? दरवाजे की तरफ भागती हूँ...कोई आहट महसूस होती है. वहां कोई नहीं है. वापस आकर लेट जाती हूँ. कोई आएगा तो कॉलबेल बजाएगा न? आजकल तो सब शोर करके आते हैं...वाट्स्प मैसेज और फेसबुक अपडेट तक. यूँ आहट से पहचाना जाए ऐसा कौन है भला...पता नहीं. शायद वहमी हो गयी हूँ इन दिनों.

कानों में हर वक़्त कोई आहट गिरती रहती है. लगता है कोई आएगा. कोई आएगा यह सोचकर पहले कितने काम बढ़ जाते थे. रसोई में डब्बे तलाशना, बडबडाना ‘ओह...फिर कुछ नहीं बचा खाने को...कितना भी एडवांस में लाकर रखो ऐन वक़्त पर चीज़ें ख़त्म हो जाती हैं. फिर अचानक रसोई में सफाई की कमी नजर आने लगती है. कितनी भी सफाई करो कम ही लगती थी.’

‘बेडरूम कितना गन्दा है. बच्चों ने सब फैलाकर रखा है. दिन भर बटोरो दिन भर फैला रहता है. ड्राइंगरूम कितना उदास और अनमना सा है...ताजे फूलों ने कब का दम तोड़ दिया है और बासीपन का लिबास ओढकर सो चुके हैं. अख़बार पढ़े कम जाते हैं फैलते ज्यादा हैं. जिधर जाओ, उधर काम, एक प्याला चाय पीने की इच्छा को घन्टों की सफाई के अभियान से गुजरना पड़ता था.’

अब यह सब हंगामा नहीं होता क्योंकि ड्राइंगरूम अब रहा ही नहीं लेकिन आहटें खूब सुनाई देती हैं इन दिनों...कभी कभी लगता है असल में ये आहटें मेरे भीतर का कोई इंतजार है. किसका पता नहीं. लेकिन इंतजार तो है.

असल में कोई आये न आये मैं बचपन से पूरे घर को ड्राइंगरूम बना देना चाहती हूँ. उन्हू...ड्राइंगरूम नहीं बालकनी बना देना चाहती हूँ पूरे घर को...देखो न इसी चक्कर में बालकनी के गमले अक्सर कमरे में आते जाते रहते हैं...

सच कहूं मुझे ये ड्राइंगरूम वाला कांसेप्ट ही नहीं जंचता. वो मुझे एक नकली कमरा लगता है. जहाँ सब कुछ सजा होना चाहिए. नकली तरह से सजा हुआ. इन्सान भी. जो आये वो ड्राइंगरूम में बैठने के लिए तैयार होकर आये, मेजबान भी कपडे ढंग के पहन के सामने आये, सलीके से हाथ मिलाये या नमस्ते करे. दीवार पे टंगी महंगी पेंटिग अकड़ के कॉलर ऊंचा करके इंतजार करे कि आगन्तुक ज़रूर पूछें ‘ बड़ी अच्छी है, पेंटिंग किसकी है?’ कोई विदेशी नाम जानकर जिसे शायद आगन्तुक ने पहली बार सुना हो अचकचा कर ‘अच्छा-अच्छा’ कहते हुए संकोच में धंस जाए.

फिर वो महंगा वॉश, कालीन, सोफे...परदे...शो ऑफ में ऐंठते हुए दुनिया भर के देशों से बटोरकर लाये गये शो पीस. फिर महंगी क्रॉकरी में आया चाय नाश्ता...चमकते हुए गिलास में आया पानी जिसे देख इस डर के कि कहीं गिरकर टूट न जाए, प्यास ही मर जाए

जब मैं छोटी थी तो घर में ड्राइंगरूम नहीं था. एक ही कमरा था और कभी भी कोई भी आ सकता था. तो हर वक़्त कमरे को टाईडी रखने का दबाव रहता था और हर वक़्त खुद को भी ड्राइंगरूम मोड में रखना पड़ता था. फिर हमारी जिन्दगी में भी ड्राइंगरूम आ गया और साथ में और भी न जाने क्या-क्या आ गया. हालाँकि टाईडी रखने वाले दबाव से पीछा अब खुद ही छुड़ा चुकी हूँ. सोचती हूँ जिन दिनों ड्राइंगरूम नहीं थे उन दिनों में कितना कुछ था....बचपन की सारी मीठी स्मृतियाँ उसी एक कमरे वाले घर की हैं...धीरे धीरे घर के साथ हम भी बड़े होते गए. वैसे उन बिना ड्राइंगरूम वाले दिनों में ये आहटें कम होती थीं जो आजकल बढ़ गयी हैं.

आजकल जो लोग घर में आते हैं उनकी कोई आहट नहीं आती और जिनकी आहटें कानों में गिरती हैं उनका दूर दूर तक कोई अता-पता नहीं है.

फ़िलहाल, इन दिनों घर में कमरे कितने ही हों, ड्राइंगरूम कोई नहीं है...सब बालकनी हैं...हर कमरे में बारिश है...हर कमरे में चिड़िया आती है...सोचा था ड्राइंगरूम मोड के लोगों का न जीवन में कोई काम, न घर में. घर वही आएगा जो, घर आएगा यानी घर चाहे उखड़ा हो या बिखरा हो. चाहे चाय खुद बनाने के लिए भगोना भी खुद ही धोना पड़े आने वाले को. जिससे मैं मुस्कुराकर कह सकूँ ‘क्या खिलाने वाले/वाली हो आज?’ जो कुकर में हाथ डालकर मजे से चप चप करके सब्जी चाटकर खाए और पानी के लिए गिलास का मुह भी न देखे. जो बिखरे हुए को और बिखरा दे और ज़मीन पर पसरकर सो जाए कहीं भी...ड्राइंगरूम की ऐसी की तैसी जिसने जिन्दगी में भी कर रखी हो...कि स्लीपर्स में ही कोलम्ब्स बना फिरता हो...

तो घर तो ऐसा ही बना लिया है अब कि कॉलबेल भी बेमानी ही है...सीधे धड़धडाते हुए आने वाले दोस्तों का अड्डा. लेकिन यह बात समझ में नहीं आती कि ये रात-बिरात ‘कोई है’ की आहट किसकी होती है...क्या ये मेरा कोई डर है?

अभी-अभी पेपरवाले ने कॉलबेल बजाई है...महीने भर की पढ़ी-अनपढ़ी खूनी ख़बरों का बिल उसके हाथ में है...मेरे भीतर कड़क चाय पीने की इच्छा है...मुझे हिसाब करना पसंद नहीं...पांच सौ का नोट उसे पकड़ा देती हूँ, वो जितने वापस देता है फ्रिज पर रख दिए हैं बिना गिने हुए...

मेरा ध्यान चाय पर है...बाहर बारिश है...भीगने की इच्छा ज्वर के स्नेह के आगे नतमस्तक है...खिड़की से बारिश दिख रही है...सड़क दिख रही है...मिर्च के पौधे में लटकी मिर्चें इतनी प्यारी लग रही हैं मानो उनकी तासीर कडवे की है यह झूठ है...

घर में पसरा यह सन्नाटा, एकांत, ज्वर, चाय कितना जाना पहचाना सा है सब...फिर से कोई आहट सुनाई दी है मुझे...आपको भी सुनाई दी क्या? 


Friday, July 7, 2017

अवसाद में कौन नहीं है...



अजीब सी उधेड़बुन चल रही है. चलती ही जा रही है. उधेड़बुन यही कि अवसाद में कौन नहीं है... कहाँ नहीं है अवसाद? क्या अकेलेपन का अवसाद से कोई रिश्ता होता है. अकेलापन आखिर होता क्या है. यह जानते हुए कि सामने वाला अवसाद में है या हो सकता है क्या सचमुच हम उसकी मदद करने की योग्यता रखते हैं. मदद होती क्या है. कैसी होती है वो.

अकेलापन बाहर की चीज़ है या भीतर की? लगती तो भीतर की है लेकिन देखी बाहर जाती है. 'उसका इस दुनिया में कोई नहीं था/थी. वो बेहद अकेला था/थी.' अगर ऐसा है तो जिनके आसपास बहुत  हैं वो तो कतई अकेले नहीं हैं और न ही वो कभी अवसाद में जाएंगे। लेकिन बहुत सारे लोगों को देखा है अवसाद में धंसे हुए जिनके आसपास बाकयदा मज़मा लगा होता था. और ऐसे लोगों को भी बेहद खुशमिज़ाज़ और जिंदगी से भरा हुआ पाया जिन्होंने खुद को दुनियादारी से दूर रखा और अपने होने के उत्सव में किसी को भी शामिल करने से इंकार किया.

कभी-कभी आसपास देखती हूँ तो पाती हूँ कि अवसाद में कौन नहीं है भला. कोई कम,कोई ज्यादा। जो जितना संवेदनशील वो उतना ही अवसाद में. अवसाद में धंसे व्यक्ति की मदद कैसे की जा सकती है भला, उससे बात करके? क्या बात करके? किस वक़्त बात करके? कितनी और कैसी बात करके?

कई बार अवसाद में मदद को आगे बढे लोग अनजाने ही, उदासी और अवसाद को और भी ज्यादा बढ़ा देते हैं. उन्हें लगता है वो मदद कर रहे हैं जबकि वो समस्या को बढ़ा रहे होते हैं. कितने कम लोग होंगे जो समस्या पर बात किये बगैर समस्या तक पहुँचने और उससे लड़ने की ताक़त बन सकते हैं. बहुत कम. जबकि मैं यह अच्छी तरह से जानती हूँ कि मुझे मेरे काले, गहरे, गाढ़े, मृत्यु के करीब तक ले गए अवसाद से मेरे दोस्तों ने ही निकाला है, डॉक्टरों का नंबर तो बहुत बाद में आया. मुझे वो सारे दोस्त याद हैं जिन्होंने थप्पड़ लगाए हैं, जिन्होंने सीने में भींचकर रात-रात भर पीठ सहलाई है और वो भी जिन्होंने कहकहों की वजहें जानबूझकर बनायीं, जिन्होंने बिना मुझे खबर लगने दिए मेरी जिंदगी के रास्ते बदले हैं.... इसके बावजूद कहती हूँ कि अवसाद में मदद करने की ताक़त और योग्यता  बहुत कम लोगों में होती है.

अवसाद में धंसा व्यक्ति मूर्ख नहीं होता वो सिम्पैथी और लेक्चर दोनों से चिढ़ता है. इससे बचने के लिए वो खुद को समेटता है, अपने भीतर की हलचल को किसी से साझा नहीं करता। वो  हँसता है, मिलता जुलता है, पार्टी करता है, फेसबुक पर स्टेटस लगाता है और अंदर ही अंदर लड़ता रहता है.

तो जिन्हें अकेलापन बाहर की चीज़ लगता है, उन्हें गलत लगता है शायद। परिवारों के भीतर सबसे ज्यादा अकेलापन और अवसाद पल रहा है. और परिवार के लोग बहुत कम समझ पाते हैं कि घर का कोई सदस्य अवसाद में है. एक दोस्त ३ साल तक डिप्रेशन का बाक़ायदा इलाज कराता रहा, दवाइयां काउंसलिंग सब लेकिन परिवार में किसी को बता नहीं सका.

एक और बात लगती है कि अगर कोई मदद की हाथ बढ़ाये तो क्या ज़रूरी है आप मदद की स्थिति में हों? हो सकता है जिसकी तरफ मदद का हाथ बढ़ा हो वो खुद गहरे अवसाद में धंसा हो. हो सकता है वो खुद मदद की तलाश में हो...अवसाद में घिरा व्यक्ति दूसरे के अवसाद से बहुत जल्दी इफेक्टेड होता है. ऐसे में वो या तो अपना नुकसान कर रहा होता है या दूसरे की मदद न कर पाने के अपराधबोध से घिर जाता है.

तो आखिर क्या हो? क्यों यह समाज अवसाद के साथ डील कर पाने में लगातार असफल हो रहा है. यह बात व्यक्ति के तौर पर कम समूह के तौर पर ज्यादा सोचे जाने की जरूरत लगती है. जिस तरह शरीर से जुडी तमाम बीमारियों को लेकर हमारा व्यव्हार होता है वैसा मन की बीमारी को लेकर नहीं होता। या तो हम खुद उसे समझ नहीं पाते, दूसरे की बीमारी को सतही तरह से लेते हैं और मान लेते हैं कि ज्ञान पिलाने से लेक्चर के बूस्टर सुबह शाम लगा देने से बात बन जायेगी, या 'बेकूफ़ हो क्या इतनी चीज़ें तो हैं फिर काहे अवसाद में हो ' कहकर उसके  दुःख को, उसके अवसाद को छोटा, तुच्छ साबित करने में लग जाते हैं. हम शायद नहीं जानते कि अवसाद में धंसा व्यक्ति अपने दुःख से बहुत प्यार करता है, उसे यह कतई सहन नहीं होता कि कोई उसे मूर्ख और उसके अवसाद को फ़ालतू कहे.

और तो और यह समाज मनोवैज्ञानिक बीमारी, अवसाद या डिप्रेशन का इलाज कराने वाले को पागल न समझ ले इसका भी खतरा कम नहीं होता इसलिए इलाज कराने वाले किसी को बताना नहीं चाहते कि वो क्लिनिकल या सायकोलॉजिकल मेडिकेशन में हैं. जॉब में भी इसका उल्टा असर पड़ सकता है. निजी जिंदगी में भी, दोस्तों में भी... यानी एक समाज के तौर पर हम डिप्रेशन से लड़ने के लिए तैयार नहीं हो सके हैं न अपने और दूसरों के तो बिलकुल नहीं।

सब कुछ बेहद उलझा हुआ नज़र आता है. सारे लोग रोबोट जैसे लगते हैं. लोग ऊपर से हंस रहे हैं, चल रहे हैं, घूमने जा रहे हैं, सिनेमा देख रहे हैं, सेल्फी ले रहे हैं लेकिन अंदर ही अंदर टूट रहे हैं... यह टूटन सुनने की हमारी क्षमता नहीं है. क्षमता अगर है भी तो कुछ कर सकने की सामर्थ्य नहीं है...इन बीमारियों का इलाज करने योग्य डॉक्टर्स भी अभी बहुत नहीं हैं. सायकोलॉजिकल काउंसलिंग के नाम पर लेक्चर और क्लिनिकल ट्रीटमेंट के नाम पर नींद की गाढ़ी डोज़ के आगे कम ही बढ़ पाए हैं डॉक्टर्स। यह गंभीर बात है... इलाज कहाँ हैं पता नहीं... जो इलाज आप किसी अवसाद में धंसे व्यक्ति को सुझाने वाले हैं यकीन मानिये वो उनसे ज्यादा इलाज़ आपको बता सकता है... फिर क्या हो... पता नहीं..

कुछ गाली देने वाले, थप्पड़ लगाने  वाले, गोद में समेट लेने वाले दोस्त तो होने ही चाहिए खैर...

तुम्हारी बाइक और कैमरा तुम्हें याद करते हैं दोस्त...

5 जुलाई, 2017.

प्रिय दोस्त कमल,

कैसे हो ?

यह मेरी तुम्हें पहली चिठ्ठी है. अजीब बात है न वाट्सअप, फेसबुक और फोन के ज़माने में चिठ्ठी लिख रही हूँ. उम्मीद है ठीक से पहुँच गए होगे तुम. यहाँ बारिशें बहुत हो रही हैं. वहां का मौसम कैसा है? तुम्हारे जाते ही वहाँ का मौसम खिल गया होगा न? जानते हो तुम्हारे जाने के बाद सब अस्त-व्यस्त हो गया है. सब कहते हैं वक्त सब सहेजना जानता है. सच में जानता है क्या? अगर जानता है वक़्त सब सहेजना तो तुम्हारी साँसों को क्यों न सहेजा?

अच्छा एक बात सच सच बताओ, जाने से पहले तुमने अपनी तस्वीरों को जी भर के देखा था क्या? उनमें इस कदर जिन्दगी भरी थी, उसने तुम्हें रोका तो ज़रूर होगा. लेकिन तुम ठहरे हठी यायावर, मौसम कैसा भी हो, रास्ते कितने भी मुश्किल तुमने यात्रा पर निकलने की ठान ली तो ठान ली. कितनी बार कहा दोस्तों ने कि कभी किसी की सुन भी लिया करो...लेकिन अगर सुनी होती किसी की तो ‘आवारगी’ शब्द को इतनी बुलंदियों पर कैसे पहुँचाया होता भला, कैसे जिया होता तुमने.

सीधे रास्ते तुम्हें कब भाते थे, हमेशा आड़े-टेढ़े रास्तों ने तुम्हें लुभाया. जो भी हो लेकिन तुम्हें बताना चाहती हूँ कि जब उस रोज तुमने मेरी ट्रैवेल सिकनेस का मजाक उड़ाया था तो मुझे तुम पर बहुत गुस्सा आया था, सच्ची.

तुम्हारा कभी कोई एक ठिकाना रहा कब? हमेशा से किसी आवारा हवा के झोंके से कभी इस शहर कभी उस शहर. एक पल में एक पहाड़ी से दूसरी पहाड़ी पर. रास्ते तुम्हारे इंतजार में बाहें पसारे बैठे होते. तुम नए रास्तों को खोजने के धुनी ठहरे, सो तुमने इस बार एकदम नया रास्ता ढूंढ लिया. और मुसाफिर तुम पक्के थे सो कोई गलती नहीं की, एक बार निकल पड़े तो सफ़र पार...

लेकिन दोस्त, एक बात बताओ इस बार तुम अपनी बाइक, कैमरे सब छोड़ गए...?

ये दुनिया यूँ ही जीने लायक नहीं बन पा रही है. इन्सान इन्सान के खून का प्यासा हो रहा है. कुछ भीड़ के हाथों मारे जा रहे हैं कुछ अकेलेपन से टूट रहे हैं...चारों तरफ दोस्तों का हुजूम है फिर भी कितनी तन्हाई है सबके भीतर. तुम्हारे भीतर भी बह रही होगी कोई तन्हा सी नदी...जिसे अपने समन्दर की तलाश होगी.

तुम इस कदर जिन्दगी से भरे थे कि तुम चल दिए...कि तुम्हें डर था शायद कि कहीं जिन्दगी ठहरने को न कह दे...कहीं रुकना न पड़ जाए...बिना सफ़र के जीवन कैसा होगा यह सोचकर तुमने लम्बे सफ़र की तैयारी की होगी.

हम तुम्हारी तस्वीरों में तुम्हें देखा करेंगे. तुम्हारा कैमरा और बाइक हम सबसे ज्यादा तुम्हें याद करते हैं...

ख्याल रखना!
प्रतिभा




Wednesday, July 5, 2017

‘क’ से कमल जोशी:


ये तस्वीर आपके जन्मदिन पर लगाने के लिए चुराकर रखी थी कमल जी. आप इतना रुलाओगे सोचा न था...

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'क’ से कविता, के एक साल पूरा होने के अवसर पर ‘क’ से कटियार साहिबा ‘क’ से कमल जोशी की बधाई लेते हुए आपको ‘क’ से कैसा लग रहा है?!’
ऐसा ही चुलबुला सा संवाद था हमारे दरम्यान जब यह तस्वीर खींची जा रही थी। यह बातचीत सिर्फ खिंचवाई जा रही तस्वीर की खातिर थी, जानबूझकर। न उस रोज़ मंच मेरा था, न कमल जी का। तस्वीर गीता दी ले रही थीं,हम सब इस नाटकीय तस्वीरबाजी पर हंस रहे थे।

कार्यक्रम उम्मीद से ज्यादा अच्छा हुआ और उसके बाद फेसबुक पर तस्वीरों की बाढ़ आ गयी। यह तस्वीर मेरे पास सुरक्षित रही। उन्होंने पूछा भी, ‘प्रतिभा अपनी वो वाली तस्वीर क्यों नहीं लगाई तुमने?!’ मैं उनसे हंसकर कहती ‘धीरज रखो कमल जी, उसे खास मौके के लिए संभालकर रखा है’। मैंने सोचा था उनके जन्मदिन पर एक अच्छी सी पोस्ट के साथ यह तस्वीर लगाकर उन्हें सरप्राइज़ दूँगी। क्या पता था कि सारी तस्वीरें यादें बनकर रह जायेंगी और वो ख़ास मौका ऐसा होगा।

बाहर बादल बरस रहे हैं भीतर न जाने क्या-क्या भीग रहा है। हर मुलाकात, हर चुहल, छेड़छाड़...सब किसी रील सा चल रहा हो जैसे,

मैं उन्हें ज्यादा वक़्त से नहीं जानती थी।सच कहूँ तो उनकी तस्वीरों के पार उन्हें ‘क’ से कविता के ज़रिये ही जाना। वो शहर में होते तो हमारी बैठकों में उनका होना तय होता। कभी जताया नहीं उन्होंने लेकिन कई बार सिर्फ बैठक में शामिल होने के लिए भी आये कोटद्वार से. बेहद जिन्दादिल, खुशमिजाज़ और ऊर्जा से भरे हुए। उन्हें देखकर रश्क होता था। गलती से भी कोई उनके सामने उम्र की बात करे तो तुरंत टोकते थे, ‘मैं युवा हूँ, इन सफ़ेद बालों पर मत जाना’ ऐसा कहकर उनके चेहरे पर जो मुस्कान आती वो दिल जीत लेती। बाइक और कैमरे का साथ उनकी जिन्दगी था।मुस्कान, जिन्दादिली उनके जीने का तरीका। वो अक्सर कहते, ‘तुम मुझे कविता पढना सिखाओगी? मुझे ठीक से कविता का पाठ करना नहीं आता।’ मैं हंस देती यह कहकर कि ‘अच्छा तो पढ़ते हैं आप’।

‘क’ से कविता' देहरादून की जान थे वो। बैठकों की चिंता उन्हें रहती, उन्हें बेहतर करने के लिए वो लगातार सोचते रहते और एक आवाज पर हाज़िर रहते। मुझे याद है ‘क’ से कविता की सालाना बैठक के ठीक पहले हमने प्रेस कॉन्फेंस की थी। एक रात पहले मैंने उन्हें फोन किया कि ‘कमल जी, आप प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए अपने मीडिया के दोस्तों को बोल दीजियेगा’। उन्होंने कहा फ़िक्र न करो! बस मैंने फ़िक्र छोड़ दी। वो उस वक़्त पिथौरागढ़ में थे।

अगले दिन सुबह प्रेस क्लब में मैंने देखा वो सामने से चले आ रहे हैं। मैं चौंक गयी ‘अरे आप, आप तो पिथौरागढ़ में थे न?’ मैंने चौंकते हुए पूछा। उन्होंने हँसते हुए कहा, ‘तो क्या हुआ, अब यहाँ हूँ।मुझे लगा मुझे यहाँ होना चाहिए तो आ गया बस’ इतनी सहजता, इतना लगाव!

सालाना बैठक में एक वक़्त आया जब देहरादून के सभी साथी मंच के नीचे थे और देहरादून के बाहर से आये सभी साथी मंच पर थे। नरेंद्र सिंह नेगी जी भी मंच पर थे, अरुण देव भी, मनीष गुप्ता भी, गोपी भी और उत्तराखण्ड की तमाम अलग-अलग जगहों से आये ‘क’ से कविता के साथी भी। लेकिन कमल जी मंच पर नहीं गए। बाद में उन्होंने मुझसे एकांत में चुपके से कहा ‘जानती हो, मैं मंच पर क्यों नहीं गया, क्योंकि मैं तो देहरादून की टीम का हूँ न?’ उनके प्रेम पर आँखें भर आई थीं उस रोज़।
उनसे हुआ यह लगाव परिवार तक में घुल चुका है। एक तरफ ‘क’ से कविता परिवार उदास है दूसरी ओर बेटी भी शाम से उदास से है, लंदन में बैठी माँ उदास हैं।लखनऊ में बैठी दोस्त ज्योति उदास है जो हाल में कोटद्वार में उनसे मिली थी, कोटद्वार में विमल भैया उदास हैं जिनके घर पर उनसे आखिरी मुलाकात उनके शहर कोटद्वार में 18 जून को हुई थी।

बादलों के बरसने के ठीक पहले वो भैया के घर आये थे। पूरा परिवार उनसे मिलकर खुश था और वो भी बुरांश का जूस पीकर खुश थे। बोले,‘अच्छा हुआ रूह आफजा नहीं है। मैं ऊब गया हूँ रूह आफजा पीकर’। कितने किस्से सुनाये उस रोज, कितनी बातें। शायद इतनी तसल्ली से बैठकर इतनी लम्बी बातचीत पहली बार हो रही थी।
अस्थमा रहता था उन्हें, उन्होंने बताया कि किस तरह उस ज़माने में वो अस्थमा से डील करते थे जब इन्हेलर्स नहीं आये थे। उन्हें इंजेक्शन लेना पड़ता था। उन्होंने बताया कि कभी-कभार जब यात्रा के दौरान उन्हें दिक्कत होती तो वो खुद इंजेक्शन लगा लेते थे। कई बार लोग उन्हें ड्रग एडेक्ट समझने की भूल कर देते थे। एक बार तो किसी रेलवे अधिकारी ने उन्हें बिठा लिया,जाने ही नहीं दिया। तब उन्होंने जैसे-तैसे इंजेक्शन लगाने के बाद जब तबियत थोड़ी सुधरने लगी तो उसे बताया कि देखो ये डाक्टर का प्रिस्क्रिप्शन, यह कोई नशा नहीं दवा है।फिर भी वो स्टेशन मास्टर उन्हें शक की नज़र से ही देखता रहा।

जब कमल जी को पता चला कि मुझे ट्रैवेल सिकनेस है और मैं देहरादून से कोटद्वार ट्रेन से आई हूँ तो उन्होंने खूब मजाक उड़ाया। फिर ट्रैवेल सिकनेस से जुड़े कुछ पुराने किस्से भी साझा किये कि किस तरह कुछ लड़कियां उनके साथ बस में चल तो पड़ीं लेकिन रास्ते भर उल्टियाँ करती रहीं और सारे यात्री परेशान हुए।

आज सोचती हूँ कि क्या कमल जी अपनी मुस्कुराहटों में कोई गम छुपा रहे थे। मस्तमौला दिखने वाले कमल जी भीतर से उदास थे क्या?! उन्होंने कोटद्वार में अपने घर में मुझे आमंत्रित भी किया था लेकिन वक़्त की कमी के चलते जाना टल गया। वो पिछले दिनों चिकनगुनिया के बाद होने वाले दर्द की शिकायत किया करते थे। बताते थे कि ‘इस दर्द ने तोड़कर रख दिया है कि मुझे अपने लिए पहली बार बेड लाना पड़ा,वरना मैं ज़मीन पर ही सोना पसंद करता हूँ’।

चलते वक़्त उन्होंने कहा, ‘जल्दी ही देहरादून आता हूँ तब मिलता हूँ तुमसे, तुम मुझे कविता का पाठ करना सिखाओगी?!’ कोटद्वार में ‘क’ से कविता शुरू करने की बात भी हुई। विमल भैया खुश थे कि कोटद्वार में उन्हें उनके जैसा कोई युवा दोस्त मिल गया है। उन्हें क्या पता था कि पहली मुलाकात आखिरी मुलाकात बन जायेगी।

‘क’ से कमल जी ये ‘कैसे’ सफ़र पर निकल गए आप...हम सब आपको याद बनते देखने को कतई तैयार नहीं थे...