Sunday, January 13, 2013

मैंने...तेरे लिए रस्ता बिछाया है...


वो चाय की प्याली के साथ धूप का एक टुकड़ा भी रख गई थी सिरहाने. उसके होठों पर कोई गीत रखा था, जिसे उसने मेरे करीब आते हुए छुपा लिया था फिर उस गीत की खुशबू उसके होठों के आसपास थी. मैंने उसे कहा, जोर से गाओ ना...वो शरमा गई. नहीं दीदी, हमको नहीं आता. कोई बात नहीं गाओ ना...ये मेरी पसंद का गीत है. मैंने कहा. वो शरमाते हुए गाने लगी...'ये जिंदगी उसी की है जो किसी का हो गया....प्यार ही में खो गया...' फिल्म अनारकली के इस गीत के साथ ही अतीत की एक खिड़की खुलती है. तीस बरस पहले..एक छोटा सा सीलन भरा कमरा. मरियल सी रोशनी फेंकता बल्ब. जमीन पर बिछी चटाई और उस पर रखा हारमोनियम. मां इसी गाने को सीख रही थीं. बजाना भी, गाना भी. मां के चेहरे पर तब जो खुशी थी, जो इत्मिनान जो सुकून वो मानो इस गाने में रच बस गया. आज कितने बरस बीत गये, जब भी ये गाना सुनती हूं लौटकर अतीत के उसी टुकड़े में पहुंच जाती हूं...धड़क रहा है दिल तो क्या दिल की धड़कनें न सुन...सुषमा अब भी गा रही थी.

कुछ गाने अपने अस्तित्व को इतना बड़ा बना लेते हैं कि वो सिर्फ किसी का लिखा गीत किसी आवाज या किसी का कंपोजिशन भर नहीं रह जाते. वो उन लम्हों की दास्तान बन जाते हैं जिन लम्हों को जीते हुए सुना था गीतों का. ऐसा ही एक गीत याद आता है बूढ़े पहाड़ों पर...'इन बूढ़े पहाड़ों पर कुछ भी तो नहीं बदला....' बेहद कम लोकप्रिय एलबम का यह गीत हमारे घर में किसी आरती या भजन सा बस बजता रहता था. गुलजार साब की आवाज, सुरेश वाडेकर की गायकी और विशाल भारद्वाज का शायद पहला कंपोजिशन. हमारी मासी रहती थीं उन दिनों हमारे साथ. उन्हें भी यह गाना खूब पसंद था. बाद में वो जब भी आतीं कहतीं, बिट्टा वो वालो गाना नाईं हैं....बूढ़े पहाड़ों वालो. हमैं बहुत नीको लगत है...मासी अब नहीं रहीं...उस कैसेट को रिलीज करने वाली पैन म्यूजिक कंपनी बंद हो गई. लेकिन वो गाना अब भी न जाने कितनी सारी यादों के साथ धड़कता रहता है दिल के बहुत पास...अब जबकि पहाड़ों पर आशियाना बना लिया है तो सोचती हूं सचमुच कुछ भी तो नहीं बदला....इन बूढ़े पहाड़ों पर.

ऐसे ही न जाने कितने किस्से याद आते हैं. अपनी दोस्त ज्योति के साथ जेठ की दोपहरों में लू फांकते हुए थकने के बाद किसी कोने में सिमटकर कैसेट पर सुनना सत्या का वो गाना 'तू मेरे साथ भी है...तू मेरे पास भी है....' ये गुलजार साब की दीवानगी का नया-नया दौर था. 'मैंने...तेरे लिए रस्ता बिछाया है...सूरज उगाया है...' गाने की वो लाइनें चलो हंसे...हंसते ही हंसते ही हंसते रहें...तो हम दोनों सचमुच खूब हंसते...हमने इस गाने को इतना सुना था कि कैसेट इसी गाने पर आकर अटक जाती थी. जिस समय लोग कल्लू मामा और सपने में मिलती है कुड़ी मेरी...सुन रहे थे हम गुलजार साब के बिछाये रास्ते ओढ़े बैठे थे...आज भी इस गाने में काॅलेज के दिन ज्योति के साथ की गई आवारागर्दी याद आती है.

अतीत की परछांइयों को टटोलो तो न जाने कितने नग्मे सांस लेते महसूस होते हैं. न जाने कितनी रातें गुजार दीं मेंहदी हसन साब को सुनते हुए 'जिंदगी में तो सभी प्यार किया करते हैं मैं तो मरके भी मेरी जान तुम्हें चाहूंगा....' लेकिन ये गाना मेरी स्मतियों में दर्ज है प्रकाश की आवाज में. बनारस की वो शाम, मणिकर्णिका घाट के सामने से गुजरते हुए जीवन और मत्यु के बीच के फासले को मिटते हुए देखना और ऐसे में प्रकाश की मीठी आवाज में छिड़ना जिंदगी का ये राग कि जिंदगी में तो सभी प्यार किया करते हैं...मैं तो मरके भी मेरी जान तुझे चाहूंगा. इस गज़ल में गंगा की लहरों की छुअन अब तक बाकी है...और बाकी है बहुत कुछ.

एक बार देर रात देहरादून की वादियों देर तक चलने वाली संगीत की महफिल मे स्वाति ने सुर साधा था...
' आज मेरे पिया घर आयेंगे..' .उस रोज तेज बारिशों वाली रात थी. घाटियों में बारिश की आवाज में स्वाति की आवाज की खुशबू घूल गई थी...अनहद नाद बजाओ री सब मिल....गाते-गाते सुबह हो गई थी....पूरी धरती धुली हुई जिस पर सूरज की मद्धिम किरनों ने फूलों के साथ मिलकर चैक पूरी थी. वो गाना उस दिन से कैलाश खेर का नहीं रहा मेरा और स्वाति का हो गया...देहरादून की उसी रात में कोई जादू रहा होगा कि तब जो मेहमान बनके आई थी शहर में अब इसी शहर में बस गई हूं....
याद करती हूं दिल्ली की वो रात जब निजाम की दरगाह में खुद से विदा मांगने गई थी. कोई इच्छा नहीं थी मन में कि जाने क्यों लग रहा था कि दिन जिंदगी के दिन बस पूरे हुए...हजारों बार सुना हुआ छाप तिलक जब वहां बैठे सूफी गायकों ने छेड़ा तो लगा उन्हें कुछ दे सकूं ऐसा तो कुछ भी नहीं है मेरे पास....' कागा सब तन खाइयो...चुन चुन खाइयो मांस दो नैना मत खाइयो जिन्हें पिया मिलन की आस...' हजारों बार सुना हुआ छाप तिलक उस रोज एकदम अलग था....न वडाली ब्रदर्स न साबरी बंधु न कोई और बस कि कुछ फकीरनुमा गाने वाले और फकीर ही सुनने वाले...


गानों से जुड़ी यादों के सिलसिले में बहादुर शाह जफर की उस गज़ल का जिक्र तो बेहद जरूरी है जिसे एक सत्रह बरस के लड़के की आवाज़ ने अपना बनाकर तोहफे में दिया था. गुलाम अली साहब भी उस रोज उस पर मेहरबान हुए होंगे कि अपनी आवाज का रंग उसे बख्शा था..;कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें इतनी जगह कहां दिले-दागदार में...' दिन जिंदगी के खत्म हुए शाम हो गई...फैला के पांव सोयेंगे कुंजे मज़ार में....उस बच्चे जिसका नाम आसिम है ने अपने बचपन में अपने अब्बा से इसे सुना और सीखा था. अभी उसकी तालीम की मासूमियत पर जमाने के किसी रंग की कोई पर्त नहीं चढ़ी थी. उसकी आवाज शाह के लिखे के संग डूब उतरा रही थी. गंगा के किनारे टहलते हुए कही गई विजय भाई की बात याद हो आई कि हम खुद भी चाहें तो हमेशा वैसा नहीं गा सकते जैसा कभी गा चुके होते हैं...ये बिल्कुल लिखने जैसा भी है कि हम चाहें तो भी अपने ही लिखे जैसा दोहरा नहीं सकते...यह बिल्कुल जीवन जैसा भी तो है ना? जिंदगी के लम्हों से कुछ नग्मे चुनते वक्त क्या-क्या न याद आया....

(अहा जिन्दगी के संगीत विशेषांक में प्रकाशित)

Saturday, January 12, 2013

याद कैलेण्डर



जनवरी-

सर्दियों के लिहाफ से चुपके निकलता है सूरज
कुछ चहलकदमी करके, वापस लौट जाता है
यादों को लौटने का हुनर क्यों नहीं आता...

फरवरी-
सुर्ख फूलों की क्यारियां,
बच्चों की हंसी की खुषबू
तेरी याद सी मासूम...

मार्च-
धरती ने पहनी धानी चूनर
लगाया अमराइयों का इत्र
और तेरी याद का काजल...

अप्रैल-
झर गयी हैं स्मतियां
खाली पड़े हैं आंखों के कोटर
नये भेश में आर्इ है याद इंतजार बनकर...

मर्इ-
हांफते दिनों का हाथ थाम
रात तक बचा ही लेता हूं
आंख की नमी...तुम्हारी कमी....

जून-
गुलमोहर और अमलताष
कुदरत के दो रंग, दो राग
तीसरा तुम्हारी याद...

जुलार्इ-
बूंदों की ओढ़नी
मोहब्बत का राग
और तुम्हारा नाम...

अगस्त- 
दिन की किनारी पर बंधे
दिन... रात...
और तुम्हारे कदमों की आहट

सितंबर-
लाल आकाष पर समंदर की परछांर्इ
रात के माथे पर उगते सूरज की तरह
जैसे तूने जोर से फूंका हो रात को...

अक्टूबर-
वक्त की षाख से उतरकर
कंधे पर आ बैठे हैं
सारे मौसम...

नवंबर-
न जाने कितने लिबास बदलने लगा है दिन
षाम सजनी है किसी दुल्हन की तरह
तेरा जिक्र करता है करिष्मे क्या-क्या...

दिसंबर -
मीर की गजलों का सिरहाना बनाकर
धूप में बैठकर सुनता हूं
तेरे कदमों की आहट....

(31 दिसंबर 2012 को दैनिक जागरण में प्रकाशित)

Friday, December 14, 2012

बेसलीका ही रहे तुम


तुम्हें जल्दी थी जाने की
हमेशा की तरह
वैसी ही जैसे आने के वक्त थी

बिना कोई दस्तक दिए
किसी की इजाजत का इंतजार किये
बस मुंह उठाये चले आये
धड़धड़ाते हुए
चंद सिगरेटों का धुंआ कमरे में फेंका


मौसम के गुच्छे
उठाकर टेबल पर रख दिए
थोड़ा सा मौन लटका दिया उस नन्ही सी कील पर
जिस पर पहले कैलेंडर हुआ करता था

फिर एक दिन उठे और
बिना कुछ कहे ही चले गये
जैसे कुछ भूला हुआ काम याद आ गया हो
न..., कोई वापसी का वादा नहीं छोड़ा तुमने
लेकिन बहुत कुछ भूल गये तुम जाते वक्त
तुम भूल गये ले जाना अपना हैट
जिसे तुम अक्सर हाथ में पकड़ते थे

लाइटर जिसे तुम यहां-वहां रखकर
ढूंढते फिरते थे
लैपटाप का चार्जर,
अधखुली वार एंड पीस,
तुम भूल गये दोस्तोवस्की के अधूरे किस्से
खिड़की के बाहर झांकते हुए
गहरी लंबी छोड़ी हुई सांस

तुम समेटना भूल गये
अपनी खुशबू
अपना अहसास जिसे घर के हर कोने में बिखरा दिया था तुमने

टेबल पर तुम्हारा अधलिखा नोट
तुम ले जाना भूल गये अपनी कलाई घड़ी
जिसकी सुइयों में एक लम्हा भी मेरे नाम का दर्ज नहीं
आज सफाई करते हुए पाया मैंने कि
तुम तो अपना होना भी यहीं भूल गये हो
अपना दिल भी
अपनी जुंबिश भी
अपना शोर भी, अपनी तन्हाई भी
अपनी नाराजगी भी, अपना प्रेम भी

सचमुच बेसलीका ही रहे तुम
न ठीक से आना ही आया तुम्हें
न जाना ही...

Tuesday, December 11, 2012

जीवन यात्रा को विराम कब मिलेगा?

10 नवंबर-
पूरा दिन जैसे सर्रर्रर्र से बीत गया हो. पूरे हफ्ते की मेहनत का रंग आज दिखा. एक सेमिनार होना था जो खूब अच्छा हो गया. कैम्पस में लोगों से बात करते हुए कितनी पर्तें खुलीं. यूं पहले भी पूरा मुंह आंचल में ढंके दौड़ती भागती औरतों ने मुझे पहले दिन से आकर्षित किया था. मैं अपने पत्रकार को आजकल सुला के रखती हूं. फिर भी वो बीच-बीच में आँखें खोलता ही रहता है. बच्चियां पूरे उत्साह से बात करती हैं. फौजिया, हिना, महताब, गुल...मैं उन्हें अपनी एक और दोस्त फौजिया के बारे में बताती हूं तो वे शिकायत करती हैं कि यानी आपको बस फौजिया ही याद रहेगी. लड़कियां भले ही पर्दे में हों लेकिन उनके जेहन में पर्दा हरगिज नहीं था. उन्हें सब पता है दुनियादारी. ओबामा को क्यों मीडिया इतना कवरेज देता है इरोम शर्मिला को क्यों नहीं....वो सवाल उछालती हैं. हम क्या नहीं जानते इन सवालों का जवाब. हमें सब पता है कि सियासत कब, कहां, कैसे इंसानियत का सीना छलनी करती है और कैसे बाजार खबरें बनाता है.

मैं मुस्कुराती हूं. सुन लो दुनियावालों, तहरीर चौक जल्द ही गली-गली में नजर आयेंगे. मन ही मन सोचती हूं.
ये आखिरी दिन था श्रीनगर में. इस दिन के हिस्से बड़े काम थे. बचे हुए श्रीनगर को घूमना भी, शापिंग भी और वापसी की तैयारी भी. जाने वक्त को पता चल गई हमारी मुश्किल कि प्रदीप जी की प्लानिंग काम आई दिन मानो फैलकर दोगुना हो गया. हालांकि इसमें हमारा लंच न करने का इरादा भी काम आया.

शालीमार गार्डन, मुगल गार्डन, चश्माशाही, निशात गार्डन, परी महल...जर्रर्रर्र से घूम लिये. मानो किसी ने पकड़कर गोल गोल घुमा दिया हो. हालांकि जिस जगह का जर्रा-जर्रा खुदा ने खुद संवारा हो वहां अलग से किसी गार्डन में जाना क्या और न जाना क्या...फिर भी... इन सारे गार्डन के लिए जाने के लिए हमें डल झील के किनारों पर ही दौड़ना था और ये बेहद खूबसूरत बात थी.

रात आई तो बाजारों का रुख किया गया. बाजारों को हमने अपनी जेबों में यथासंभव ठूंसा और लौटे अपने ठीहों पर. ये आखिरी रात थी. हम देर तक बैठे रहे. रनदीप का दिल आ गया था श्रीनगर पर. वो यहीं छूट जाना चाहती थी. उसकी आंखें छलक रही थीं. हमें वापस क्यों जाना है....क्योंकि वापस फिर आना है. और उसी रात ये तय हुआ कि हम फिर आयेंगे...
इसी वादे को सिरहाने रख हम सोने गये तो घर वापसी की स्वप्निल रजाई ने हमें ढांक लिया.
11 नवंबर-
आज आखिरी दिन था. मलिक साब मिलने आये थे. नाश्ता करते हुए उनकी और अनंत जी की बातचीत को सुनते हुए मैं पराठा कुतर रही थी. मलिक साब ने हमारी काफी मदद की थी. बड़े खुश मिजाज इंसान हैं वो. उनसे पहली मुलाकात देहरादून में ही हुई थी. उन्होंने एजूकेशन सेक्टर में काफी काम किया है. वो भी अलग ढंग का काम. शिक्षा के भारतीय दर्शन पर काम किया है. उनसे मिलकर अच्छा ही लगता है हमेशा.
एयरपोर्ट पर सुरक्षा जांच का लंबा सिलसिला था. एक खूबसूरत जगह जहां प्यार के फूल खिलते हों कैसे छावनी में तब्दील हो गया है. न जाने किसकी काली नजर लग गई? क्यों बंदूकों का सीना कांप नहीं गया, क्यों उनके सीने से गोलियों की जगह फूल नहीं बरस उठे...

श्रीनगर एयरपोर्ट पर मैं अपने साथियों से बिछड़ गई. मेरे हिस्से में आया था एयरपोर्ट पर इंतजार. करीब तीन घंटे अपने सामान से मुक्त होकर काॅफी पीते हुए, निर्मल को पढ़ते हुए अजनबी चेहरों को देखते हुए बिताना...जाने क्यों हमेशा से अच्छा लगता रहा है. इतने रिलेक्स होकर मैंने किसी को भी रेलवे स्टेशन पर इंतजार करते हुए नहीं देखा.
मैंने तीसरा काफी का प्याला लेते हुए खुद से वादा किया नो मोर काफी प्रतिभा...लेकिन दिल्ली पहुंचते-पहुंचते दो काफी और हो ही गई. कभी-कभी नियम तोड़ने में हर्ज ही क्या है.
दिल्ली पहुंचते ही दुनिया बदल गई. लदे हुए कपड़े हमें एलियन बना रहे थे. यहां सर्दी बस छू रही थी. मेरे पास वक्त भी नहीं, सुविधा भी नहीं कि दूसरी फ्लाइट का टाइम हो रहा था. लगभग भागते हुए मैंने अपनी फ्लाइट पकड़ी। फिर वही काफी, वही सैंडविच वही, निर्देश बस इस बार बदलाव इतना था कि मैं लखनऊ जा रही थी. चंद घंटों में बिटिया के पास....
अमौसी एयरपोर्ट पर उतरते ही किसी अपनेपन की खुशबू में भीग गई. धनतेरस की रात सजे हुए शहर को देखते हुए घर पहुंचना...मेरा लड्डू...(मेरी बिटिया) दरवाजे पर खड़ी मिली...
यात्रा को एक सुंदर विराम मिला...जीवन यात्रा को विराम कब मिलेगा?

Monday, December 10, 2012

डल झील- जैसे महबूब को जी भर के देखना


9 नवंबर

सूरज की हथेली पर मानो किसी ने बर्फ का ढेला रख दिया हो. ठंडी सी गर्माहट थी उसके आने में. हमारे यहां आने के मकसद को बस अंतिम अंजाम मिलना बाकी था. काम बेहतर हो जाए तो उस संतुष्टि के साथ महसूस करने की क्षमता बढ़ जाती है. नौ नवम्बर का दिन दस तारीख के कार्यक्रम की तैयारियों को अंजाम देने के लिए था. सारा दिन कालेज, यूनिवर्सिटी के चक्कर लगाने के बाद...हजरत बल और फिर...डल झील.

इतने दिन से हम डल झील के करीब थे लेकिन आज यहां जाना हुआ. सच ही है जो करीब होता है अक्सर उसी के पास हम सबसे देर में जा पाते हैं.

पानी से मुझे कितनी मोहब्बत है यह माधवी जानती है. नदी, पोखर, समंदर, झील देखते ही पहला ख्याल आता है कूद जाऊं? तैरना जानबूझकर नहीं सीखा। हाँ, पार जाना ज़रूर सीखा है. मेरे दोस्तों को अब पता है मेरा पागलपन सो पहले से हजार नसीहतें हाथ थामे थीं. कुछ पूरे समय हाथ थामे बैठी भी रहीं, कुछ फोन पे टिमटिमाती रहीं।मैंने झील के ठीक मध्य में कहवा पीने के बाद खुद को खुद से विलग किया. नजर की आखिरी हद तक पानी ही पानी और चारों ओर खूबसूरत पहाडि़यां. रास्ता रोकती पहाडि़यां नहीं, रास्ता देती हुई. हमारा नाविक हमें बता रहा था कि कहां किस फिल्म की शूटिंग हुई, कहां की क्या खासियत है. समूची डल किसी दुल्हन सी सजी थी. झील के बीच में कोई नाव आपकी नाव के करीब आ लगेगी और आपको शापिंग कराने ले जायेगी. चाय भी पिला देगी. ये पानी में तैरता एक शहर है. बाजार पानी में. खेत पानी में. जिंदगी में, पानी में. पांव रखने को जमीन तलाशने पर नाव ही मिलेगी...अरे हां, वही शिकारा...हाउसबोट कुछ भी कह लो यार. शापिंग में मेरी दिलचस्पी कभी रही ही नहीं लेकिन सामान बेचने वालों को गौर से देखती हूं. हमारा नाविक डल झील की खासियत बता रहा था...दूर कहीं सूरज झील के भीतर उतरने को बेताब था.

 ऐसी खूबसूरतें शामें जिंदगी में कम ही आती हैं. ये लम्हे चुपके से स्मतियों में दर्ज होते जा रहे थे. कैमरे की क्लिक में समेटते हुए झील के पानी को छूने का जी चाहा...'इसकी गहराई कितनी होगी?' अनायास पूछ बैठी थी. 'तुम्हारे मन से कम...' किसी ने हंस के कहा...तो फिर डूबने से क्या फायदा...डूबना कैंसिल...हम सब हंस दिये.
दो-ढाई घंटे का वो सफर कहने को बीत चुका था लेकिन सच तो यह है कि बीतता कुछ भी नहीं.
लैया चना खाते हुए झील को आंख भर देखना जैसे महबूब को जी भर के देखना...