ना जाने कब ज़िंदगी का सम छूट गया...अपने ही सम को पकड़ने के लिए हाथ बढाया और खुद से ही छूट गयी. इस दरम्यान एक नींद के गाँव के बारे में सुना. सुना था कि उस गाँव में ख्वाब आते हैं. पलकों की डालों से चिपक जाते हैं. ख्वाबों की रेशमी छुवन ज़िंदगी के रेगिस्तान में कुछ नमी भर जाती है... ...सुना था कि उदासी नहीं रहती उस गाँव में. उस गाँव के हर घर के बाहर मुस्तैद पहरेदार होता है, जो उदासियों को भीतर जाने नहीं देता...रोक देता है दरवाजे पर. पहरेदार कभी बारिश, कभी बादल, कभी खुशबू की शक्ल में होता...उदासियों को हाथ पकड़कर गाँव के बाहर छोड़ आता. उस गाँव का रुख किया तो उदासियों से कहा, 'तुम मेरे साथ नहीं जा सकतीं. जहाँ मैं जा रही हूँ वहां तुम्हारे लिए कोई जगह ही नहीं है...' उदासियाँ और उदास हो गयीं, उन्हें मेरे साथ की आदत थी. मुझे भी, फिर भी नजर घुमा ही ली.
Monday, April 30, 2012
ओस की बिछावन पर स्म्रतियों के पंख ...
ना जाने कब ज़िंदगी का सम छूट गया...अपने ही सम को पकड़ने के लिए हाथ बढाया और खुद से ही छूट गयी. इस दरम्यान एक नींद के गाँव के बारे में सुना. सुना था कि उस गाँव में ख्वाब आते हैं. पलकों की डालों से चिपक जाते हैं. ख्वाबों की रेशमी छुवन ज़िंदगी के रेगिस्तान में कुछ नमी भर जाती है... ...सुना था कि उदासी नहीं रहती उस गाँव में. उस गाँव के हर घर के बाहर मुस्तैद पहरेदार होता है, जो उदासियों को भीतर जाने नहीं देता...रोक देता है दरवाजे पर. पहरेदार कभी बारिश, कभी बादल, कभी खुशबू की शक्ल में होता...उदासियों को हाथ पकड़कर गाँव के बाहर छोड़ आता. उस गाँव का रुख किया तो उदासियों से कहा, 'तुम मेरे साथ नहीं जा सकतीं. जहाँ मैं जा रही हूँ वहां तुम्हारे लिए कोई जगह ही नहीं है...' उदासियाँ और उदास हो गयीं, उन्हें मेरे साथ की आदत थी. मुझे भी, फिर भी नजर घुमा ही ली.
Wednesday, April 11, 2012
उगना...
' न...अब सांस लेने की कोई गुंजाइश नहीं बची. जीने का जी नहीं करता कि अब सीने में कोई ख्वाहिश नहीं उगती...न ख्वाब आते हैं नींद के गांव में... जीवन अब सहा नहीं जाता, न लडऩे का मन होता है न जूझने का. कोई खुशी खुश नहीं करती न कोई दु:ख उदास करता है. जीवन में अब कुछ भी नहीं बचा जो रोक सके मुझे अपने पास. मुझे जाना ही है अब जिंदगी के पार कि शायद वहां कोई उम्मीद रखी हो मेरे लिए....'
मेज पर टेढ़ी-मेढ़ी सी लिखावट में ये शब्द रखे थे. पेपरवेट के नीचे दबे हुए. मेज के ठीक सामने एक खिड़की थी. खिड़की जो ज्यादा बड़ी नहीं थी, बहुत छोटी भी नहीं. पुराने जमाने के घरों की तरह कुछ सीखचेनुमा सी खिड़की. खिड़की के उस पार से कोई वनलता गुजर रही थी. जिस पर बेशुमार पीले फूलों का कब्जा था. इस कदर कब्जा कि वनलता अपना अस्तित्व ही भूल गई हो मानो. उन फूलों में ही वो अपना होना रख चुकी थी.
ये किसका कमरा है, ये किसकी लिखावट है और मानी क्या हैं इन शब्दों के. क्या कोई इस तरह अंजुरी भर शब्द रखकर जिंदगी से जा सकता है कि उसकी जिंदगी में अब कोई उम्मीद नहीं उगती. कैसे खो जाती हैं सारी उम्मीदें कि निराशाएं कमरे में फैले सारे उजियारे पर काबिज हो जाती हैं और जिंदगी पर भारी पडऩे लगती हैं.
ये किसका कमरा है, ये किसकी लिखावट है और मानी क्या हैं इन शब्दों के. क्या कोई इस तरह अंजुरी भर शब्द रखकर जिंदगी से जा सकता है कि उसकी जिंदगी में अब कोई उम्मीद नहीं उगती. कैसे खो जाती हैं सारी उम्मीदें कि निराशाएं कमरे में फैले सारे उजियारे पर काबिज हो जाती हैं और जिंदगी पर भारी पडऩे लगती हैं.
नहीं, उम्मीद कभी उगना बंद नहीं करती कि बस हम उनके उगने पर अपनी निगाहों की बंदिश लगा देते हैं. आगे बढ़ते हुए कदम लगातार पीछे लौटाने लगते हैं. वजह कुछ भी हो, सृष्टि का यही नियम कि उगना कभी बंद नहीं होता.
फिर आखिर क्यों कोई नाउम्मीदी से इस कदर भर उठा कि जीवन से बेजार हो गया. आखिर ये किसका खत है जो उम्मीद के न उगने की बात कह रहा था. कौन था वो, अब कहां होगा, क्या वो जीवन की वैतरणी को पार कर चुका होगा या कि बस उतरने ही वाला होगा उस नदी में. क्या ये अंजुरी भर शब्द उसकी जिंदगी की जिजीविषा के द्योतक नहीं हैं. क्या इन शब्दों से यह आवाज नहीं आ रही कि क्यों नहीं कोई आता और मुझे जिंदगी की तरफ घसीट लाता....
मैंने बहुत पूछा लोगों से, पता लगाने की कोशिश की कि ये किसका कमरा है. ये किसका खत है...लेकिन किसी ने कोई जवाब नहीं दिया. मैं समझ चुकी थी कि ये शब्द हम सबके हैं. कभी न कभी हम सब जिंदगी से यूं ही मायूस हो उठते हैं जिंदगी किसी कारा से कम नहीं लगती. और हम जिंदगी की इस कारा से खुद को आजाद कर लेना चाहते हैं. टेढ़ी-मेढ़ी इबारत में अपनी निराशाओं को दर्ज करते हैं कि अब बाकी नहीं रहा किसी उम्मीद का उगना और ठीक उसी वक्त कोई उम्मीद जाग रही होती है हमारे ही भीतर. पेपरवेट से दबे वो शब्द अपने अर्थहीन होने पर मुस्कुराते हैं और खिड़की के बाहर पीले फूलों में झलकती उम्मीद से लाड़ लगा बैठते हैं.
असल में जिंदगी वहीं कहीं सांस ले रही होती है, जहां कोई उम्मीद दम तोड़ती है. मैं उन निराशा से भरे शब्दों को उठाकर खिड़की के बाहर फेंक देती हूं और महसूस करती हूं कि मैं खुद अपने ही भीतर नये सिरे से उग रही हूं.
बंजर से बंजर धरती पर एक न एक दिन कोई फूल खिलता ही है. घनी काली रात के सीने में एक सूरज छुपा ही होता है. रात के सीने में छुपा वह सूरज अपने उगने के सही समय का इंतजार करता है. गर्भ के गृह में एक किलकारी उग रही होती है. किसी चिडिय़ा के घोसले में नन्हे-नन्हे पंख उग रहे होते हैं. रास्तों पर उग रही होती हैं मंजिलें और मंजिलों पर एक नया ख़्वाब उगने को बेकरार होता है कि इसके बाद नये सफर की शुरुआत होनी है. धरती के हर कोने में हर वक्त कुछ न कुछ उग रहा होता है. और तो और जिस वक्त डूब रहा होता है सूरज किसी देश में ठीक उसी वक्त वो उग भी रहा होता है किसी दूसरे देश में. कहीं चांद भी उग रहा होता है ठीक उसी वक्त.
फिर आखिर क्यों कोई नाउम्मीदी से इस कदर भर उठा कि जीवन से बेजार हो गया. आखिर ये किसका खत है जो उम्मीद के न उगने की बात कह रहा था. कौन था वो, अब कहां होगा, क्या वो जीवन की वैतरणी को पार कर चुका होगा या कि बस उतरने ही वाला होगा उस नदी में. क्या ये अंजुरी भर शब्द उसकी जिंदगी की जिजीविषा के द्योतक नहीं हैं. क्या इन शब्दों से यह आवाज नहीं आ रही कि क्यों नहीं कोई आता और मुझे जिंदगी की तरफ घसीट लाता....
मैंने बहुत पूछा लोगों से, पता लगाने की कोशिश की कि ये किसका कमरा है. ये किसका खत है...लेकिन किसी ने कोई जवाब नहीं दिया. मैं समझ चुकी थी कि ये शब्द हम सबके हैं. कभी न कभी हम सब जिंदगी से यूं ही मायूस हो उठते हैं जिंदगी किसी कारा से कम नहीं लगती. और हम जिंदगी की इस कारा से खुद को आजाद कर लेना चाहते हैं. टेढ़ी-मेढ़ी इबारत में अपनी निराशाओं को दर्ज करते हैं कि अब बाकी नहीं रहा किसी उम्मीद का उगना और ठीक उसी वक्त कोई उम्मीद जाग रही होती है हमारे ही भीतर. पेपरवेट से दबे वो शब्द अपने अर्थहीन होने पर मुस्कुराते हैं और खिड़की के बाहर पीले फूलों में झलकती उम्मीद से लाड़ लगा बैठते हैं.
असल में जिंदगी वहीं कहीं सांस ले रही होती है, जहां कोई उम्मीद दम तोड़ती है. मैं उन निराशा से भरे शब्दों को उठाकर खिड़की के बाहर फेंक देती हूं और महसूस करती हूं कि मैं खुद अपने ही भीतर नये सिरे से उग रही हूं.
Sunday, April 1, 2012
तेरी जुस्तजू करते रहे...
पहाड़ों की एक महकती शाम...लड़की न भी चाहे तो भी चाँद की किनारी आँचल से छू ही जाती. वो मुंह फिराकर नाराज होने का नाटक करे तो भी चाँद शदीद मोहब्बत सीने में दबाये सामने आ खड़ा होता है...लड़की उसे घूर के देखती, गुस्से में कहती....' दुश्मन'. वो हंस देता है. वो भी हंस देती. मौसम भी मुस्कुरा देता है. ये एक तरह का खेल है. न न...कोई ख्याल नहीं है बस एक खेल है....
दिन भर की थकान के बाद अक्सर नाराज़गी सर उठती है. किस पे उतारी जाए, तो जनाब चाँद ही सही...यूँ उससे भी नाराज होने का अपना मजा है... ये भी क्या बात हुई कि नाराज होने की कोई वजह होनी ही चाहिए. अरे, हम बेवजह ही नाराज होंगे...तो क्या कर लेंगे आप?
लड़की ने 'हुंह...' कहकर सर घुमाया तो वो मुस्कुराकर वहीँ उसके घुटनों के पास सर टिकाकर बैठ गया.
लड़की की आँखों में कोई बदली बरसने को तैयार थी...लड़की ने उसके सर पर हाथ फिराया...तो कोई नमी हाथों को छू गयी.
उसने अचानक सुर बदला...दूर किसी पहाड़ी से आती कुछ छायाएं कोई पहाड़ी धुन गुनगुना रही थीं.
उसने कहा, 'एक बात बताओ हम दोनों रो क्यों रहे हैं?'
उसने अपनी आँखें पोंछते हुए कहा, 'क्योंकि हम मुद्दत बाद मिले हैं.'
'मुद्दत बाद क्यों...रोज ही तो तुम मेरे सर पे टंगे रहते हो...' लड़की बोली.
'हाँ, टंगा रहता हूँ लेकिन तुम्हें याद है कि तुमने मुझे नज़र भर कब देखा था आज से पहले?'
'वो मेरे शहर की कोई रात थी....मेरे छत की कोई रात. उस रोज भी मैंने तुझसे कहा था, कि तू बेवजह ही गुमान किये फिरता है...इस धरती पर जो मेरा चाँद है न वो तुझसे भी सुन्दर है...पर सच्चाई ये है कि तनहा वो भी है और तनहा मै भी, और तनहा तू भी तो है.....तू उस रोज भी आँखें भिगोये मेरे दर पे खड़ा था...'
'मै तुम्हारे दर से कभी गया ही नहीं....' चाँद की आवाज भारी थी...
'मेरा दर?'
'मेरा तो कोई दर ही नहीं...बस एक गम कि गली है जिसमे अश्कों का आशियाना है. मेरी दुनिया में उसकी याद का सूरज कभी बुझता ही नहीं...चाँद कभी ढलता ही नहीं...ऋतुएँ आती हैं, ठहर जाती हैं. हाँ, ये बात और है कि उसका आना भी एक ख्याल ही रहा और वो ख्याल कभी जाता ही नहीं.'
'वो जो नहीं है वही तो है हर जगह.'
'तुम्हें इंतजार है उसका?' उसने पूछा.
'इंतजार?'
'नहीं...वो तो है हर पल, हर सांस, मेरा होना है उसका ही होना...जो गया ही नहीं उसके आने का इंतजार कैसा...कहते हुए लड़की की आँख भर आई....नहीं है कोई इंतजार....कोई इंतजार नहीं...'
चाँद ने उसकी कलाई थाम ली...'बस कर...चुप हो जा. वो आएगा एक रोज.'
'कौन...कब...कहाँ...'
लड़की बावली होने लगी...उसने चाँद के हाथों में फंसी अपनी कलाई को छुड़ाया नहीं...
'बोलो न कब?' बेसब्री छलकी जा रही थी...
वो मुस्कुराया...'बहुत जल्दी.' कुदरत का ज़र्रा-ज़र्रा तेरे प्रेम का गवाह है...तेरे प्रेम की शिद्दत से बचकर कोई कहाँ जायेगा...फ़िलहाल मै जा रहा हूँ.
'कहाँ...' लड़की घबराई...फिर से अकेलेपन की दीवारें उठने को थीं....'तेरे प्रेम के सन्देश को पहुँचाने..उसके देश, उसकी गली, उसकी छत पर...'
'मुझे भी ले चलो न?' लड़की मुस्कुराई...
'चलो...' चाँद ने शरारत से बाहें पसार दीं...
लड़की शरमा के खुद में सिमट गयी...'इस मिटटी की देह को अब उनकी आमद का है इंतजार...उनसे कहना कि जिन्दगी कि यात्रा ख़त्म होने को है...मेरी आत्मा को मुक्त करें और इस देह से इसे आजाद करें...जीवन अब भार हुआ जाता है...' उसकी आँखों में छुपी बदलियाँ बरस चली थीं...पहाड़ अचानक भीगने लगे.
चाँद चल दिया....लड़की अपना संदेशा बांचती रही...
तभी सुबह कुलबुलाई...घाटियाँ राग भैरव के आलाप से सज रही थीं...मंदिर में किसी ने घंटा बजाया था...क्या निज़ाम आये थे शिव मंदिर में प्रसाद की चाय पीने...या मेरे सांवरे की है ये आहट...लड़की धीरे से बुदबुदाई...
Sunday, March 18, 2012
उनके लहू का रंग नीला है...
उनकी शिराओं में लाल रंग का नहीं
नीले रंग का लहू है...देह पर कोई चोट का निशान नहीं मिलेगा
न ही गुम मिलेगी होठों की मुस्कराहट
साइंसदानों, तुम्हारी प्रयोगशालाएं
झूठी हैं
वहां नहीं जाँची जा सकतीं
नीलवर्णी रक्त कोशिकाएं
न ही ब्लड सेम्पल में आते हैं
सदियों से दिल में रह रहे दर्द के कारन,
ना समंदर की लहरों की तरह उठती
दर्द की उछाल
जांच पाने की कोई मशीन है पैथोलॉजी में
बेबीलोन की सभ्यता के इतिहास में
पहली बार जब दर्ज हुआ था
एक प्रेम पत्र
तबसे ये दर्द दौड़ ही रहा है लहू में
नहीं, शायद दुनिया की किसी भी सभ्यता के विकास से पहले ही
प्रेम के वायरस ने बदलना शुरू कर दिया था
लहू का रंग
प्रेमियों के लहू का रंग प्रेम के दर्द से नीला हो चुका है
इसका स्वाद खारा है...
इसके देह के भीतर दौड़ने की रफ़्तार
बहुत तेजी से घटती-बढती रहती है
दिल की धडकनों को नापने के सारे यंत्र
असफल ही हो रहे हैं लगातार
चाँद तक जा पहुंचे इंसान के दिल की
चंद ख्वाहिशों की नाप-जोख जारी है
उदासियाँ किसी टेस्ट में नहीं आतीं
झूठी मुस्कुराहटें जीत जाती हैं हर बार
और रिपोर्ट सही ही आती है
जबकि सही कुछ बचा ही नहीं...
सच, विज्ञान को अभी बहुत तरक्की करनी है...
Saturday, March 17, 2012
मैंने खुद को रास्तों में पाया है...
- प्रतिभा कटियार
धरती अपनी धुरी पर सदियों से घूम रही है. लगातार...लगातार...ये सफर कभी नहीं रुकता. लेकिन न धरती कहीं पहुंचती है न कोई धरती के करीब आता है. ये कैसा सफर है, कैसी चाल...कदम चलते ही जा रहे हैं बेहिस, राह बिछती ही जाती है कदमों में. इन्हीं ख्यालों की मद्धिम सी रोशनी और आंखों में उदासियों का सैलाब लिए एक रोज यूं ही घर की दहलीज को पीछे छोड़ दिया था. वक्त...कलाई पर बंधा जरूर था लेकिन याद नहीं. हां, सारा शहर दिन की ड्यूटी खत्म करके अपने-अपने घरों को लौट रहा था. रोशनी की दिप-दिप लगातार बढ़ रही थी. रोशनी को देख मुस्कुरा उठी थी. वो कौन सी रोशनी होगी जो बरसों से जमे गाढ़े अंधेरे को काट पायेगी. क्यों कोई सूरज नहीं पहुंचता मन के अंधियारों तक. क्यों नियोन लाइट का उजियारा बस अंजुरी में सिमट भर के रह जाता है...सवालों की बड़ी बुरी आदत होती है, उन्हें जरा सी ढील दो तो सरपट रेस लगाने लगते हैं. हर सवाल दूसरे सवाल को पीछे छोड़ आगे निकलना चाहता है. हालांकि किसी भी रेस का प्रतिफल कोई जवाब नहीं है.
वो शायद उस तारीख को शहर से निकलने वाली आखिरी बस थी. उस बस में मैं थी. मैं कौन...? कहां जा रही थी? कहां से जा रही थी? क्यों भला? आखिर तलाश क्या थी? न मंजिल का पता, न चलने का सबब बस एक सफर यूं ही शुरू हो गया था. मैं और कोई नहीं एक स्त्री. कहां जा रही थी, शायद खुद की तलाश में और खुद से ही दूर. गहरे नीले पर्दे को सरकाकर देखा तो शहर छूटता जा रहा था. ये जो छूट रहा था ये कौन सा शहर था. बस एक चांद था, जो पहचाना सा था. साथ वाली सीट पर एक नौजवान था, जो देर तक अपनी महबूबा से मद्धिम आवाज में गुफ्तगू कर रहा था. एकांत का एक टुकड़ा मिलते ही न जाने कितने सैलाब सवालों को लांघते हुए चले आए. कभी-कभी आंखों के समंदर में छलांग लगाने का भी अपना आनंद होता है. हालांकि हरदम आंसुओं को मुस्कुराहटों की ओट में रख देना भी कम कूव्वत का कम नहीं होता. सारा सफर उसी सैलाब के आंचल में भीगते बीता. सारे सफर में उस नौजवान की उसकी महबूबा से बात होती रही. जहां बस रुकी उसने मुझे चाय दी. बार-बार पूछता रहा, आप ठीक हैं ना? कभी-कभी अनजानी आवाजों में वो अपनापन मिलता है, जो जिंदगी भर के लिए अपनों की इबारत में गढ़ दिये गये लोगों से नहीं मिलता. वो नीम बेहोशी की रात थी. खुद से छूटने की...उस नीम बेहोशी में भी ये याद रहा कि किस तरह वो नौजवान मेरे कंधों पर शाल ढंकता रहा. जितना उससे बन पड़ा ख्याल रखता रहा.
सूजी हुई आंखों और गालों पर खिंची आंसुओं की लकीरों के साथ आखिरी स्टेशन पर उतरते हुए जब मैंने उसका नाम पूछा तो उसने नम आंखों से बस इतना कहा, अपना ख्याल रखियेगा. वो रुका नहीं, चला गया. पर वो गया नहीं, रुका ही रहा. कोई आवाज कहीं से स्टेशन के सारे शोर को रौंदती हुई आई और सीने से लिपट गई. न जाने कितनी देर हिचकियां दो देहों में लिपटी रहीं. ये सफर की शुरुआत थी या मध्य ये पता नहीं लेकिन इस सफर में एक खुशबू शामिल हो चली थी एक से मुसाफिरों के हमजोली बनने की खुशबू.
आपको कहीं देखा है...
मैं शहरों को उनके नाम से नहीं, उनमें बसने वाली प्यार भरी आवाजों के नाम से जानती हूं. वो शहर भी अपना नाम मेरी एक दोस्त की धड़कन में रखकर खुद को भूल गया था. हम एक-दूसरे को एक-दूसरे से छुपा रहे थे. हमने खिलखिलाहटों का मास्क लगाया और एक-दूसरे में प्यार भरा.
एक अजनबी चेहरा हमारे मास्क लगे चेहरों के करीब से रोज गुजरता था. अभिवादन करता और मुस्कुराता. हमें भी मालूम था कि उस चेहरे पर भी मास्क लगा है और शायद उसे भी यह मालूम ही था. फिर भी दुनिया की रवायतों को निभाना मानो सांस लेने जैसा क्रम बन गया हो. एक रोज अपने मास्क उतारकर सीढिय़ों के पास रखकर हम अपने बाल सुखा रहे थे, अपने गीले गाल भी और भीगा मन भी. तभी वो मास्क लगे चेहरे वाली स्त्री पास से गुजरी थी. हमने ध्यान से देखा तो उसका मास्क भी उस रोज नदारद था. वो वहीं बैठ गई हमारे पास. सचमुच पास.
मैंने खुद को खो दिया था-
धूप सीढिय़ों पर अठखेलियां करते हुए कंधों से आ लगी थी. अब हम दो नहीं तीन थीं. लेकिन शायद एक ही. उसने अपने शहर का नाम मुंबई बताया था. उम्र को अगर बरसों में गिना जाए तो पचास के पार की होगी शायद. नाम रक्क्षंदा हुडा. ये नाम यूं कभी याद न रहता जो उसने अपने दिल की गलियों में हमारा हाथ पकड़कर घुमाया न होता. कैनवास पर अपनी जिंदगी के बिखरे हुए रंगों को कैसे उसने पकड़-पकड़कर समेटा था. हर कैनवास पर एक संसार था. स्त्री के मन का संसार. उसकी जीने की शिद्दत का संसार, रंगों पर चढ़ी अवसाद की काली चादर का संसार, उससे बाहर निकलने की तीव्र इच्छा का संसार...कामनाओं के रंगों वाले उस संसार से हम भीगे हुए ही बाहर निकले थे. हमारी खिलखिलाहटों के मुखौटे वहीं सीढिय़ों के पास पड़े हुए मुरझा गये थे और हमारे हाथ एक दूसरे की हथेलियों को लगातार कस रहे थे. बरसती हुई आंखों में मुस्कान समेटे हम कितने करीब आ बैठे थे. जख्मों को हमने मुस्कुराहटों से पीछे धकेल दिया था. कहानी वही पुरानी...दर्द भी वही जाना पहचाना सा, हर दिल में पलता हुआ बस कि हमारी हथेलियों ने एक-दूसरे को शायद पहली बार कसा था. अपनी ही धुरी पर घूमते-घूमते धरती शायद सरककर हमारे कंधों से आ लगी थी. दो कदम आगे बढ़कर. चाय के प्याले से उठता धुआं उन गलियों में ले गया, जहां एक नयी नवेली दुल्हन अपने शौहर का हाथ थामे ख्वाबों की पनाहगाह में दाखिल होती है. सबको खुश रखना ही जहां जीवन का उद्देश्य, धर्म और कर्म था. जहां अपने बारे में सोचने का न वक्त था, न नियम. बस सबकी मुस्कुराहटों पर निसार होना ही जिंदगी. बरस बालों पर होकर गुजरते रहे और हम सब पर निसार होते रहे. न जाने कब अपना नाम भी अपना नहीं रहा, न ख्वाहिशें अपनी, न चाह कोई. बस कभी एकांत मिलता तो कमर का दर्द एक टीस देता. एक रोज तेज बुखार में तपते हुई देह के सामने एक चुनौती आ खड़ी हुई. बेटे के स्कूल में पेंटिंग कॉम्पटीशन और बाजार सारे बंद. दवाइयों से बुखार को पीछे धकेल घर में पड़े कुछ सूखे बिखरे से रंगों को समेटा और कुछ उल्टा-पुल्टा, आड़ा-टेढ़ा खींचा. अगले दिन जब बेटा स्कूल से लौटा तो गुस्से से भरा हुआ. ये आपने किसकी पेंटिंग दे दी है? आंखों में आंसू भरे हुए रक्क्षंदा ने कहा, बेटा ये तो मैंने ही बनाई है. तो कोई स्कूल में मानता क्यों नहीं. मुझे डांट पड़ी कि मैं किसी बड़े आर्टिस्ट की पेंटिंग क्यों ले आया? बेटे को सीने से चिपकाकर जोर से रोने का जी चाहा था उस रोज. वो बड़ा आर्टिस्ट तेरी मां ही है, उसने कहना चाहा पर चुप रही. अगले महीने अपनी पॉकेटमनी बचाकर एक कैनवास और कुछ रंग लाकर दिए बेटे ने...न जाने कितने सालों बाद उस रोज धरती पर सूरज उगा था. न जाने कितने सालों बाद मेघ बरसे थे. आज देश के बड़े-बड़े शहरों में उसकी एक्जीबिशंस लगती हैं लेकिन उन अंधेरे और अकेले खानों की खामोशी वो किसी को नहीं देती. सदियों के सफर में हमसफर बनते हुए उसने हमें सबसे कीमती चीज दी, अपने गम, अपना संघर्ष और अपनी आरजुएं. विदा के वक्त हथेलियों में जुंबिश थी और दिल में यह सवाल कि क्यों सदियों से एक ही छत के नीचे रहते हुए हमारे बेहद अपने हमारे चुपचाप मरने की आहटें सुन नहीं पाते...उस रोज धरती ने कुदरत का नियम तोड़ा था एक पल को और गहरी सांस ली थी. राहत की सांस.
अपना सूरज खुद-
इंतजार बहुत हुआ. बहुत संभाली उम्मीदों की पोटलियां अपने कांधों पर कि कभी तो कोई मिलेगा जो हमें एक बिंदु के चारों ओर गोल गोल घूमते जाने के अभिशाप से मुक्त करायेगा. अब कोई इंतजार नहीं. अपने हाथों को गौर से देखा तो वो कम मजबूत नहीं थे. दिल के हौसले ने और मजबूती दी. तो क्या हुआ कि एमबीए की डिग्री ने चमकता करियर सामने बिछाया है. मोटी तनख्वाह और जिंदगी के सारे ऐशो-आराम. फिर भी नींद क्यों नहीं आती रात भर. क्या यही वो जीवन था जो हमने चाहा था. नहीं, ये जीवन समाज ने हमारे लिए चुना था. उहापोह के इसी बीहड़ से गुजरते हुए एक रोज एक टहनी पर बैठे सूरज ने उसका हाथ पकड़ लिया. बस, यही फैसले की घड़ी थी. राजस्थान के एक छोटे से गांव की वो सरपंच बन गई. दुनिया उसे छवि राजावत के नाम से जानती है. यूएन में वो सोढा गांव ही नहीं हर भारतीय गांव की उन्नति का खाका पेश करती है. छवि के भीतर इस धरती के हर कोने को खुशहाल करने का ख्वाब है. इसीलिए जब वो जीन्स को फोल्ड करके खेतों में कुदाल चला रही होती है तो सूरज ठीक उसके माथे पर चमक रहा होता है.
मेरा नाम अंजलि है-
इस सफरनामे में न जाने कितने शहर छूटने थे, न जाने कितने शहर मिलने थे और न जाने कितने लोग मिलने थे. लगभग आधा सफर तय हो चुका था और हम दोनों अजनबी महिलाएं अपने-अपने ढंग से सफर की ऊब को दूर करने की कोशिश कर रही थीं. कभी किसी बच्चे को देखते, कभी खिड़की के पार का छूटता संसार. हम दोनों संकोची थे. आखिर उसने मौन तोड़ा और बातचीत का सिरा उठाया. मेरा नाम अंजलि है, क्या मैं आपके पास बैठ सकती हूं. क्यों नहीं. मैंने झट से कहा. अब वो मेरे करीब बैठी थी. खूबसूरत, लंबी, इकहरे बदन वाली वो एक आकर्षक महिला थी. काफी ठंड है ना? उसने पूछा. मैंने कहा, हां. दिल्ली तो और भी ठंडा है. उसने बात को आगे बढ़ाया. मैं चुप रही. जाने क्यों अजनबी लोगों से बातचीत के सिलसिले मौसम या देश की राजनीति से ही शुरू होते हैं. पॉलिटिकल डिस्कशंस से होते हुए हम उस मोड़ पर आ खड़े हुए जहां छुप के दिल में तनहाई रहा करती है. वो ज्वेलरी डिजाइनर है. देश ही नहीं विदेश में भी उसकी डिजाइन की हुई ज्वेलरी की काफी मांग है. ढेर सारी सफलताओं के बाद भी वो तन्हा थी. उसने बताया कि कितना मुश्किल था उसके लिए एमबीए करने के बाद बढिय़ा नौकरी छोडऩा और नये सिरे से नये करियर की ओर हाथ बढ़ाना. आज अंजलि अग्रवाल ज्वेलरी डिजाइनिंग का जाना माना नाम है. उसने धीरे से कहा, देखो घर जाकर क्या-क्या सुनना पड़े. उसकी आवाज में उदासी थी लेकिन अगले ही पल उसकी आवाज में खनक लौट आई. मैं खुश हूं यार, कि मैंने अपनी पसंद का काम चुना. हम दोनों ने अपनी हथेलियों को आपस में जोड़ा और हम दोस्त बन गये. सफर अब सचमुच खुशगवार बन चुका था. दूरियां अब दूरियां नहीं रही थीं.
कभी छांव कभी धूप-
जिंदगी के इसी सफर की उस मुसाफिर की याद ताजा हो आई जो दूसरी बार गांव की प्रधान बनी थी. पश्चिमी उत्तर प्रदेश का एक अनजाना सा गांव. एक दुबली-पतली सी औरत, जानवरों के लिए चारा काटती, दूध दुहती, घर के कामकाज करती और इस बीच उसके घूंघट को हवा भी नहीं हिला पाती थी. महिला सीट होने के कारण राजनैतिक पेचोखम से निपटने का यही तरीका था कि परिवार के लोग उसे चुनाव में खड़ा करें. जितने वोट पड़े वो पति के नाम पर पड़े. चुनाव में खड़ी होने वाली महिला भी, उसका पति भी और वोट डालने वाले वोटर भी सबको पता था कि सच्चाई क्या है. वो चुनाव जीती तो पति की गर्दन फूलों की मालाओं से भर गयी. वो दूध दुहती रही और पति प्रधानी संभालते रहे. कागज पत्तर पर जब उसके हस्ताक्षर की जरूरत होती तो उसे खड़ा कर दिया जाता. ये एक अंधी सुरंग थी जिसके दोनों सिरे पर सूरज था लेकिन उस घूंघट में सिमटी ग्राम प्रधान के हिस्से में सूरज की रोशनी पहुंचने से पहले ही चुरा ली जाती. पांच साल तक वो प्रधान रही और दूध दुहती रही, चारा काटती रही. अगली बार फिर उसे खड़ा किया गया. इस बार भी वो जीत गई. लेकिन इस बार वो सिर्फ चुनाव नहीं जीती, अंधेरा भी जीती. उसने कहा कि ये मेरा सूरज है, तुम क्यों लिए बैठे हो. पहले वो बात करते समय कांपती थी और अब विश्वास से खड़ी होती है. डेढ़ हाथ का घूंघट अब माथे तक सिमट आया है. अब वो सचमुच प्रधान है. उसकी हिम्मत ने अंधी सुरंग को काटकर रास्ता बनाया और वो इस काफिले का हिस्सा बन गई जो अपने लिए सुंदर जीवन चाहता है बिना किसी को नुकसान पहुंचाये. अरे हां, हमारी इस हमसफर को अब अपना नाम याद है, सरिता देवी.
ये सफर किसी के नाम, उसके काम, उसकी सफलताओं का नहीं है. ये सफर है खुद को जिंदा रखते हुए आगे बढऩे का नाम. हवाई जहाज में एयर होस्टेस की सबसे अच्छी बात जो मुझे लगती है वो उसका यह कहना कि इमरजेंसी की स्थिति में सबसे पहले खुद की सुरक्षा करें, बाद में दूसरों की मदद करें. कितनी सच्ची है यह बात. जो खुद अपनी मदद नहीं कर पा रहा है उस पर घर, परिवार, समाज की जिम्मेदारी का बोझ है. इससे भी ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि अधिकांश स्त्रियों को पता ही नहीं कि उन्हें क्या चाहिए. जीवन वो जो उन्हें मिला है या वो जो चाहती हैं. रास्ते वो जिन पर उन्हें खड़ा कर दिया गया है या ढूंढने हैं नये रास्ते. बनी बनाई पगडंडियों पर चलने में सुरक्षा बोध है और अनजानी पगडंडियों पर चलने में जोखिम. लेकिन जीवन का आनंद जोखिम लेने में है. अपना सूरज खुद बनने में है. अपनी राहें खुद बनाने में है. अपनी मर्जी का मालिक खुद बनने में है. ये सफर कठिन हो सकता है लेकिन मुकम्मल यही होगा. कुछ नाम कुछ किस्सों के बहाने आइये हम सब जुड़ते हैं इस सफर में अपनी ख्वाहिशों की लगाम अपने हाथ में लेते हैं.
('अहा जिंदगी' के इस माह के 'स्त्री विशेषांक' में प्रकाशित)
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