Thursday, June 30, 2011

रिल्के, मारीना और एक सिलसिला... 5

इधर मारीना की जिंदगी में उम्मीदें महक रही थीं. निराशा हाथ छुड़ा रही थी, मुस्कुराहटें हर वक्त उसके होठों के आसपास खेलती रहती थीं, उधर बोरिस भी अपनी दुनिया में उम्मीदों का नया संसार रच रहा था. बोरिस परस्तेनाक...रूस का वही महान कवि जो मारीना और रिल्के के पत्राचार की पहली कड़ी बना था. वो मन ही मन मरीना के ख्वाब बुनने लगा था. उसी आसक्ति के चलते ही शायद उसने चाहा होगा कि रिल्के के पत्र को पाकर जो खुशी उसे मिली है, वो मारीना को भी जरूर हासिल होनी चाहिए. प्रेम अक्सर हमारी चेतना पर हावी होता जाता है और हम अवचेतन में ठहर चुके स्नेह के बताये रास्तों पर दौड़ पड़ते हैं. अच्छे-बुरे के बारे में सोचने का वक्त ही कहां होता है तब. बोरिस अपनी ही बेख्याली में था. मारीना की कविता 'द एंड' को वो बार-बार पढ़ता था. उसे मारीना के चमकदार व्यक्तित्व और पवित्र रूह से अगाध जुड़ाव हो चुका था. आखिर एक रोज उसने खुद से कन्फेस किया कि हां, उसे मारीना से प्यार है. मास्को के हालात ऐसे थे कि जीवन में सिर्फ उथल-पुथल और अव्यवस्था ही थी. ऐसे में मारीना के ख्यालों का साथ उसे एक बेहद खूबसूरत संसार में ले जाता था.


ओह...मरीना...बरबस वो बुदबुदा उठता.





आखिर 20 अप्रैल को थोड़े संकोच, उलझन और ढेर सारे प्यार के साथ मरीना को उसने एक पत्र लिख ही दिया,






प्रिय मरीना,
आज मैं तुमसे वो कहना चाहता हूं जिसे मैं लंबे समय से अपने भीतर छुपाये हूं. उन शब्दों को तुम्हें सौंपना चाहता हूं जिनकी आग में मैं न जाने कब से झुलस रहा हूं. मरीना, तुम्हारे ख्याल का मेरे आसपास होना मुझे क्या से क्या बना देता है तुम नहीं जानतीं. मैं तुम्हारे पास होना चाहता हूं, तुम्हारे साथ रहना चाहता हूं हमेशा. तुम नि:संकोच होकर अपनी भावनाओं के बारे में मुझे बताना क्योंकि मैं तुम्हारे कारणों को समझने की योग्यता रखता हूं. निकट भविष्य में तुमसे मिलने की इच्छा रखता हूं. जब तुम कहो, जहां तुम कहो...
बोरिस...






यह पत्र पोस्ट करने के बाद बोरिस बेचैनी से मरीना के जवाब का इंतजाऱ करने लगा. उसे पक्का यकीन था कि जवाब उसके हक में आयेगा. लेकिन समय....इसके गर्भ में क्या है हममें से कोई नहीं जानता. बोरिस मरीना के पत्र का इंत$जार कर रहा था और उसके पास पत्र पहुंचा रिल्के का. इस पत्र में रिल्के ने परस्तेनाक से चिंतित भाव से मरीना की कुशल लेनी चाही थी और जानने की कोशिश की कि आखिर उसका लिखा अंतिम पत्र मरीना को क्यों नहीं मिला.





रिल्के के इस छोटे से पत्र से परस्तेनाक अवाक था. उसे रिल्के और मरीना के बीच की नजदीकियों और खतो-किताबत का पूरा आभास हो चुका था, जिसके बारे में उसे कुछ भी नहीं पता था. वो गहरे दु:ख में डूब गया.





जैसा कि मरीना अपनी डायरी में भी लिखा था कि परस्तेनाक एक अधैर्यवान पुरुष था. परस्तेनाक ने 23 मई को मरीना को एक कटु पत्र लिखा.






ये तुमने क्या किया? क्यों किया? कैसे कर पाईं तुम? कल मुझे रिल्के से मिले पत्र ने तुम्हारे और रिल्के के बारे में सब स्पष्ट कर दिया है. मैं इस बात की कल्पना भी नहीं कर सकता मरीना कि तुम्हारी जैसी प्यारी, खूबसूरत दिल रखने वाली स्त्री, जिसका जन्म समय के वाद्य पर मोहब्बत का राग गाने के लिए हुआ है वो कैसे ऐसा बेसुरा राग छेड़ सकी. मुझे नहीं पता अपनी जिंदगी में मैंने इतना दु:ख और गुस्सा एक साथ पहले कब महसूस किया था.





परस्तेनाक गहरे अवसाद में था. अधैर्यवान पुरुषों के लिए अवसाद को साधना अक्सर आसान नहीं होता. हर कोई रिल्के जो नहीं होता. परस्तेनाक ने उसी दिन मरीना के नाम एक और खत लिखा...





मैं इस बारे में रिल्के को कुछ भी नहीं लिख रहा हूं मरीना. क्योंकि मैं उन्हें भी तुमसे कम प्रेम नहीं करता. तुम ये सब क्यों न देख पाईं मरीना. मेरे दो प्रिय लोगों को मुझसे छीन लिया तुमने...





जिन दिनों का यह घटनाक्रम है परस्तेनाक उन दिनों कविताओं की एक श्रृंखला पर काम कर रहा था. उसने मरीना के लिए एक कविता लिखी थी अ डेडिकेशन. इस पत्र के साथ उसने मरीना को यह कविता भी भेजी...






(जारी...)


Tuesday, June 28, 2011

रिल्के, मारीना और एक सिलसिला... 4

12 मई 1926 की सुबह के उजाले में कुछ नई रंगत भी शामिल थी. कुदरत का यह नजारा मारीना को प्रिय लगा. कई बार हमें आगत का भान हो जाता है. अनायास दु:खी होना, बेचैन होना या मुस्कुराना असल में उस अनजाने आगत की गंध होते हैं. मारीना भी उस दिन बेवजह मुस्कुराहटों का पिटारा खोले बैठी थी. जैसे-जैसे दिन चढ़ रहा था, वो ढेर सारे घरेलू कामों के बीच मुस्कुराये जा रही थी. उसे यह सुख किसी कविता के पूरा होने के बाद के सुख से भिन्न लगा. तभी पोस्टमैन दरवाजे पर नजर आया. उसे देखते ही मारीना का चेहरा खिल उठा. असल में उसे भी इस आगत का इंतजार था. नौ मई के बाद से हर पल वो दरवाजे की ओर बेचैनी से देखती थी. आखिर उसे रिल्के का पत्र मिला. वो चार लाइनें, 'मारीना त्स्वेतायेवा, क्या तुम सचमुच हो. अगर हो तो क्या यहां नहीं हो? अगर यहां हो तो मैं कहां हूं...?' उसने सैकड़ों बार इन पंक्तियों को पढ़ा. इन पंक्तियों में अपने लिये रिल्के के भीतर महसूस की गई भावनाओं को छूकर देखा और कुदरत का शुक्रिया अदा किया.

जैसा कि प्रेम के बारे में एक शाश्वत सत्य प्रचारित है कि प्रेम में 'धीरज' और 'समझ' का कोई काम नहीं होता. बड़े से बड़ा ज्ञानी इसके आगे औंधे मुंह पड़ा होता है, वो शाश्वत सत्य अपना असर यहां भी काम कर रहा था. मरीना ने जरा भी विलंब किये बगैर रिल्के को उसी दिन एक और पत्र लिखा. लंबा पत्र. यह पत्र भी जर्मन में था. एक ही पत्र के आदान-प्रदान के बाद मारीना रिल्के को खुद के करीब महसूस कर रही थी. और अपना अतीत, वर्तमान, भविष्य के सपने, सुख सारे, दर्द जो सहे उसने सबके सब बांट लेना चाहती थी.

'धीरज'...बस एक शब्द भर रह गया था और वो उसकी बुकशेल्फ के आसपास मंडराता रहता था. मारीना पत्र लिखने में इतनी मसरूफ थी कि उसके पास धीरज के बारे में सोचने का वक्त ही नहीं था. रिल्के को पत्र लिखते समय मरीना कभी तो मुस्कुरा उठती और कभी सिसक ही पड़ती. उसके अतीत का एक-एक धागा उधड़ रहा था. उसने उस लंबे पत्र में खुद को उड़ेल दिया और उसी दिन वह पत्र रिल्के के लिए रवाना किया. पत्र भेजने के बाद मरीना ने अपने भीतर परिवर्तन महसूस किया. उसे लगा कि उसका शरीर पंखों से भी हल्का हो गया है. बरसों से जिस तन्हाई और उदासी की पर्तों को वो भीतर छुपाये थी, उन्हें उसने बाहर निकाला था. रिल्के को खत लिखने के बहाने उसने खुद से बात की थी और अपने आपको सुना था. रिल्के अब उसके लिए एक महान कवि भर नहीं था.

रिल्के को मारीना के पत्र का उतनी ही बेसब्री से इंतजार था या नहीं इसका ब्योरा कहीं उपलब्ध नहीं है सिवाय इस बात के कि रिल्के को जैसे ही 17 मई को मारीना का यह लंबा पत्र मिला, उसी दिन इस महान कवि ने उस पत्र का पूरी आत्मीयता से जवाब दिया. रिल्के ने मारीना की संवेदनशीलता से प्रभावित होकर उसकी प्रशंसा की. उसकी कविताओं पर बात की. कुछ कविताओं के बारे में दरयाफ्त की जो कठिन रूसी में होने के कारण उसे ठीक से समझ में नहीं आई थी. इन पत्रों के जरिये वे अनौपचारिक ढंग से बात करने लगे थे और रिल्के ने मारीना को स्पष्ट रूप से लिखा कि अगर कभी व्यस्तता के चलते उसे पत्र का जवाब देने में विलंब हो या वो जवाब न दे पाये तो इसे अन्यथा लिये बगैर मरीना उसे लगातार पत्र लिखती रहे. यह संदेश मारीना के लिये रिल्के की जिंदगी में खास जगह बना लेने की मुनादी जैसा था. मारीना को यूं भी लंबे-लंबे खत लिखने की आदत थी. उसका अधिकतम जीवन उसके द्वारा लिखे खतों से ही झरता है. जैसे ही कोई खत झाडि़ए अंजुरी भर मारीना झरती है. अन्ना अख्मातोवा, बोरिस परस्तेनाक, इवानोविच युरकेविच, एफ्रोन,अन्ना अन्तोनोव्ना, असेयेव, पाब्लेन्को, मायकोवेस्की आदि न जाने कितने लोग थे जिनसे मारीना का नियमित पत्र-व्यवहार होता था. ये पत्र रूस के उस समय के हालात, कवियों, कलाकारों के सामाजिक, राजनैतिक और निजी जीवन के संघर्ष, कविता की स्थिति, कविता के संघर्ष आदि को बयान करते हैं.

बहरहाल, मारीना अब रिल्के को नियमित पत्र लिखने लगी थी और उसने महसूस किया कि रिल्के के संपर्क में आने के बाद, कविता पर लंबी बातचीत के बाद मारीना की कविताओं में सुधार हो रहा है. वो अब अपनी कविताओं से पहले से ज्यादा संतुष्ट थी. जीवन से भी. एक मुस्कुराहट उसके उदास जीवन में उम्मीद बनकर बरस रही थी. वो उस उम्मीद की बारिश में अपनी कविताओं के साथ खुद को खुला छोडऩे को आतुर थी...

(जारी...)

Monday, June 27, 2011

रिल्के, मारीना और एक सिलसिला... 3


जैसा कि हर अच्छा और बड़ा लेखक करता है रिल्के ने भी बोरिस के पत्र का तुरंत जवाब दिया.

मुझे जो प्रेमपूर्ण भावनाएं अभी प्राप्त हुईं उनसे मैं अभिभूत हूं. उन कोमल भावनाओं के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए मेरे पास सचमुच शब्द नहीं हैं. मारीना, कृप्या मेरी भावनाएं हमारे मित्र बोरिस तक पहुंचा दें. पत्र के साथ बोरिस ने जिस किताब की दरकार की थी उसे भी भेज रहा हूं. 
शुभकामना
रिल्के

7 मई का वो एक ऊबा हुआ सा दिन था जब मारीना रोज के घरेलू कामों में उलझी थी. अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई थी. पोस्टमैन उसे एक पार्सल और एक खत दे गया था. उस दिन पोस्टमैन की वो दस्तक असल में उसके दरवाजे पर नहीं, सीधे दिल पर थी. रिल्के के खत में लिखी उन चार लाइनों को मारीना ने न जाने कितनी बार पढ़ा. किताब को उलट-पुलटकर देखा. खिड़की से बाहर देर तक मौसम को ताका जो अचानक खुशनुमा हो उठा था. उसने पत्र और पार्सल बोरिस को उसी दिन रवाना किया लेकिन खुद को रिल्के के पत्र की खुशबू से मुक्त नहीं कर पाई. आखिर उसने रिल्के को पत्र लिखने का मन बनाया. नौ मई को रिल्के के लिए अपनी समस्त भावनाओं को पिरोते हुए उसने जर्मन भाषा में एक लंबा पत्र लिखा. इस पत्र में मारीना ने लिखा कि उसे कितनी खुशी हुई रिल्के का पत्र पाकर. उसने पत्र में कविता के प्रति अपनी आसक्ति का ब्योरा देते हुए बताया कि कैसे छोटी सी उम्र में कविता ने उसका हाथ थाम लिया था. असल में यह पत्र लंबा इसलिए था क्योंकि वो रिल्के के प्रति अपनी भावनाओं को ढेर सारे शब्दों के बीच छुपा ले जाना चाहती थी. जैसे कई बार हम बोलकर मौन को साधते हैं कुछ उसी तरह. उसने विस्तार से लिखा कि उनकी कविताएं पढ़ते हुए वो अपने भीतर कितनी हलचल महसूस करती रही है. यह उसका पहला पत्र था रिल्के के लिए.

लेकिन जिसके लिए पत्र लिखा गया था वो कोई मामूली आदमी नहीं था. वो रिल्के था. शब्दों के अंदर डुबकी लगाना उसे आता था. वो उसके भीतर छुपे सघन भावों को आसानी से पकडऩे का हुनर जानता था. तभी तो उस लंबे पत्र का छोटा सा उत्तर कुछ इस तरह दिया उसने.

'मारीना त्स्वेतायेवा....क्या तुम सचमुच हो? क्या तुम यहां नहीं हो? अगर तुम यहां हो तो मैं कहां हूं..'
रिल्के

दस मई को मरीना के पत्र के जवाब में रिल्के ने ये कुछ शब्द लिख भेजे. समूची सृष्टि पूरे कौतूहल से इन शब्दों के मारीना के पास पहुंचने का इंतजार कर रही थी. आखिर 12 मई को मरीना को जादुई शब्दों का यह खजाना मिल ही गया.


(जारी....)

Saturday, June 25, 2011

रिल्के, मारीना और एक सिलसिला... 2


जादुई एहसास रू -ब-रू 
वो बीतते बसंत के दिन थे. अप्रैल 1926 की कोई शाम रही होगी शायद. अनमने दिनों ने अभी अपनी गठरी बांधी भी नहीं थी कि दरवाजे पर दस्तक हुई थी. बोरिस परस्तेनाक (रूस का महान कवि) ने अनमने मन से दरवाजा खोला और डाकिये से डाक ली. डाकिये ने बोरिस को दो खत पकड़ाये और बोझिल से दिन को अपने कांधों पे लादकर चलता बना.
परस्तेनाक ने पहला पत्र खोला. यह मारीना त्स्वेतायेवा का खत था. उसने इस खत में अपनी कविता 'द एंड' के बारे में कुछ दरयाफ्त की थी इस खत में. दूसरा खत था उसके पिता लिओनिद ओसिपोविच परस्तेनाक का जो कि म्यूनिख में रहते थे. वो मशहूर जर्मन कवि रिल्के के मित्र थे और उन्होंने अपने बेटे को इस खत में लिखा कि रिल्के ने परस्तेनाक की कविताओं की तारीफ की है. बोरिस रिल्के की कविताओं के घनघोर प्रशंसक थे और रिल्के द्वारा उनकी कविताओं की तारीफ बहुत मायने रखती थी. पिता के इस खत के बाद उनका मन हुआ कि क्यों न रिल्के को पत्र लिखा जाये. 12 अप्रैल 1926 को बोरिस ने आखिर रिल्के को पत्र लिखा. यह पत्र उन्होंने जर्मन में लिखा. बोरिस का जर्मन भाषा पर अच्छा अधिकार था. उन्होंने लिखा-

'मेरे प्यारे और महान कवि रिल्के,
मुझे नहीं पता कि इस खत में क्या लिख पाऊंगा. मुझे नहीं पता कि मैं इस खत के जरिये आप तक अपना प्यार, सम्मान, दिल की गहराइयों से आपके प्रति महसूस की गई भावनाओं को संप्रेषित कर पाऊंगा या नहीं. लेकिन आज मैं जो कुछ भी हूं, जैसा मैं सोचता हूं, जैसा मैं महसूस करता हूं वो सब आपका दिया हुआ है. आपको पढ़ते हुए मैंने आपको अपने भीतर बूंद-बूंद समेटा है. मेरा लिखा हर शब्द अगर वो किसी लायक है तो वो आपकी ही देन है. आपको पढ़ते हुए मैं हमेशा एक जादुई अहसास से गुजरता हूं और मेरा पूरा वजूद एक सिहरन महसूस करता है.
बोरिस आगे लिखते हैं-
जिस दिन मुझे अपने पिता द्वारा भेजे गये आपके मेरे प्रति उदार शब्द मिले ठीक उसी दिन मुझे एक ऐसी कविता पढऩे को मिली जिसे पढ़कर मैं हतप्रभ हूं. विश्वास करिये, रूस में ऐसी कविताएं लिखने वाले बहुत कम लोग हैं. और जानते हैं मेरे प्रिय कवि, यह कविता किसकी है. यह कविता है यहां की मशहूर कवियत्री मारीना त्स्वेतायेवा की. वो जन्मजात कवियत्री है. बेहद प्रतिभाशाली और संवेदनशील है वो. इन दिनों वो पेरिस में रह रही है. प्रिय रिल्के मुझे माफ करना, लेकिन मैं चाहता हूं कि अपनी कविताओं पर आपकी टिप्पणियां पाकर जो खुशी मुझे महसूस हुई है वही खुशी इस कवियत्री को भी मिले. आप इसे मेरी धृष्टता कह सकते हैं लेकिन मेरे प्रिय मैं जानता हूं आप मेरी संवेदना और भावना भी समझ सकेंगे. मैं आपको मरीना की कुछ कविताएं भेज रहा हूं. साथ ही मैं आपसे गुजारिश करता हूं मेरे प्रिय रिल्के कि आप अपना कविता संग्रह 'डियोनो एल्जिस' जिससे मैंने हमेशा प्रेरणा ली है उसे अपने स्नेह के साथ मरीना के पते पर भेज दें. यह हम दोनों के लिए बहुत सम्मान की बात होगी.
उम्मीद है मेरा बहुत सारा प्यार और सम्मान आप तक पहुंचेगा और आपका स्नेह हम तक.
आपका
बोरिस
(इसके बाद मिला मरीना को रिल्के का पहला ख़त. फिर क्या हुआ...इंतजार..)

Friday, June 24, 2011

रिल्के, मारीना और एक सिलसिला...


खतो-किताबत पुराना शगल रहा है. अगर कहूं कि खतों और डायरियों ने मुझे जिंदा रखा है तो अतिशयोक्ति न होगी. हमेशा लिखकर ही खुद को कुछ हद तक अभिव्यक्त कर पाई हूं. बोलकर कहने का सलीका तो आया ही नहीं. हर बात कहने के बाद लगता है ओह...कुछ रह गया. इसी शगल के चलते साहित्य में भी डायरियां, खत, आत्मकथाओं ने ज्यादा आकर्षित किया. सोचती हूं कि दो लोगों के बीच की बात क्या दो लोगों के बीच की ही बात भर होती है. नहीं, वो सृष्टि के दो टुकड़ों के बीच संवाद होता है. एक सिरे की दूसरे से जुडऩे की प्रक्रिया. एक व्यक्ति, एक समष्टि के दूसरे से संवाद की प्रक्रिया. इसीलिए अक्सर कहना सिर्फ कहना नहीं, रहना यानी रह जाना होता है. उस कहे हुए में कितने लोग अपना अक्स देखते हैं. अमृता आपा के लिखे से अगर उनकी डायरियां, खत और रसीदी टिकट निकाल दें तो...? हम कल्पना भी नहीं कर सकते ना?

ऐसे ही रूस की महान कवियत्री मारीना के बारे में सोचती हूं कि पत्र, डायरियों के बगैर मारीना को समझ पाना कितना मुश्किल होता. रूस का वह मुश्किल दौर. एक संवेदनशील जुझारू लड़की जो किस्मत या बदकिस्मती से कवि भी. पति फौज में. देश से निर्वासन, बिना किसी आर्थिक आधार के बच्चों की परवरिश, बीमारी, कविताओं पर पाबंदी...न जाने क्या-क्या. सोचती हूं कि इस स्त्री ने कैसे सहा सब कुछ. और इसके बावजूद उसकी दृढ़ सोच और भाषाई कमनीयता में कोई कमी नहीं आई. कड़वे जीवन का हलाहल अपने गले में उतारने के बावजूद उसका जीवन प्रेम की अभिलाषा में हमेशा नम रहा.

जीवन क्या होता है, जब यह समझ भी नहीं आई थी, तबसे मारीना का जीवन मेरे सामने खुला पड़ा था. मैं इस स्त्री के नाम का सजदा करती हूं. उसकी पसंद, नापसंद, जीने का ढंग, अभिव्यक्ति को लेकर उसकी साफगोई और अतिरेक, खुली समझ, वैचारिक स्पष्टता सब मुझे बचपन से आकर्षित करते हैं. ठीक उसी तरह जैसे रिल्के. बीए फस्र्ट ईयर में थी उन दिनों. सवालों की खेती लहलहा रही थी जेहन में. ऐसे में किसी ने रिल्के थमा दिये थे. बस जी, काम हो गया हमारा उसी दिन से. जिसने किताब दी थी उसकी अहसानमंद रहूंगी हमेशा. हर शब्द जैसे मन के भीतर चल रहे सवालों के अंधड़ को विराम देता था.

जानती हूं रिल्के के खतों को पढ़ते हुए मेरी ही तरह या हो सकता है इसे ज्यादा गहन अनुभूति से भी बहुतों ने महसूस किया होगा. ऐसा सघन वैचारिक तालमेल आसानी से कहां मिलता है. ऊपर से राजी दी ने अनुवाद भी ऐसा किया मानो सामने बैठकर रिल्के खुद बात कर रहे हों. इन पत्रों को खूब-खूब पढ़ा गया. हर पढऩे-लिखने वाले की प्रिय किताबों में रिल्के की कविताओं के साथ-साथ उनके पत्रों ने भी खास जगह बनाई.

रिल्के और मारीना एक ही वक्त में रचना प्रक्रिया में रत थे. रिल्के महान कवि थे और मारीना नवोदित. मारीना रिल्के से प्रेरित थी लेकिन रिल्के मारीना से नावाकिफ. मेरे लिए यह जानना बड़ा दिलचस्प था कि मारीना के भीतर रिल्के के प्रति आकर्षण था. लेकिन इतने छोटे से सच की दूसरी कडिय़ां नहीं मिल पा रही थीं. पिछले दिनों मारीना की जिंदगी की तमाम कडिय़ां मेरे हाथ लगीं. शरारती मन कहिये या इंसानी फितरत, सबसे पहले रिल्के और मारीना के बीच की कडिय़ों को जा पकड़ा मैंने. आखिर क्यों न होता दोनों मेरे प्रिय जो हैं. (यकीन मानिए ये लिखते हुए भी मैं मुस्कुरा रही हूं.) पता नहीं कौन, कब, कैसे कड़ी बन जाता है दो लोगों को जोडऩे की हमें नहीं पता होता. रिल्के और मारीना भी ऐसे ही जुड़ गये थे. उनके बीच संवाद की प्रक्रिया कब और किस तरह शुरू हुई इसका ब्योरा सोचती हूं साझा कर ही लिया जाए. बस, जरा सा इंतजार ...