Monday, August 31, 2009

इख्फ़ा-ए-मुहब्बत


तुम मोहब्बत को छुपाती क्यों हो?
हाय! ये हीर की सूरत जीना
मुंह बिगाडे हुए अमृत पीना
कांपती रूह धड़कता सीना
जुर्म फितरत को बनाती क्यों हो?
तुम मोहब्बत को छुपाती क्यों हो।
दिल भी है दिल में तमन्ना भी है
तुमको अपने पर भरोसा भी है
झेंपकर आंख मिलाती क्यों हो?
तुम मोहब्बत को छुपाती क्यों हो?
हां, वो हंसते हैं जो इंसान नहीं
जिनको कुछ इश्क का इर$फान (ज्ञान)नहीं
संग$जादों में $जरा जान नहीं
आंख ऐसों की बचाती क्यों हो?
तुम मोहब्बत को छुपाती क्यों हो?
जुल्म तुमने कोई ढाया तो नहीं
इब्ने आदम को सताया तो नहीं
यों पसीने में नहाती क्यों हो?
तुम मोहब्बत को छुपाती क्यों हो?
झेंपते तो नहीं मेहराबनशीं,
मक्र पर उनकी चमकती है जबीं
सिद्क पर सर को झुकाती क्यों हो?
तुम मुहब्बत के छुपाती क्यों हो?
परदा है दा$ग छुपाने के लिए
शर्म है किज़्ब (झूठ) पे छाने के लिए
इसको होठों में दबाती क्यों हो?
तुम मोहब्बत को छुपाती क्यों हो?
आओ, अब घुटने की फुरसत ही नहीं
और भी काम हैं, उल्फत ही नहीं
है ये खामी भी नदामत (शर्म) ही नहीं
डर के चिलमन को उठाती क्यों हो?
तुम मोहब्बत को छुपाती क्यों हो?
- कैफी आज़मी

Saturday, August 29, 2009

लाइफ इज अ सर्च

दा...दा...दा...करके बोलना शुरू भी नहीं किया कि एक तलाश साथ हो चली। पूरे घर में कुछ न कुछ ढूंढते फिरना। कभी कुछ गिराना, कुछ उठाना। कुछ चीजों को मुंह में डालकर स्वाद लेकर परखना...कान उमेठे जाना। फिर वही करना...फिर बड़े होना...तलाश जारी। अनजानी तलाश...जाने क्या ढूंढता है ये मेरा दिल...जैसे ख्यालों में घिर जाना।
सुख...हां शायद यही होगा...सब तो इसे ही ढूंढते हैं। लेकिन ऐसा भी तो हुआ है कई बार कि जब सुख या खुशी से सामना हुआ तो दिल का कोई कोना बेतरह भीग गया। जाने किस $गम की कसक हर खुशी में घुल जाती, चुपके से।
फूल, पत्ती, नदियां, पहाड़, चिडिय़ा, संगीत कुछ भी नहीं भाता। जी चाहता रबर से मिटा ही डालूं सब कुछ। एकदम खाली हो जाये कैनवास। या फिर आसमान के उस पार झांककर देखूं, कहीं वहां मेरा कोई हिस्सा तो नहीं। वजूद का कौन सा हिस्सा न जाने कब, कहां गिर गया हो। अगर तलाश है, तो $जरूर कुछ तो होगा ना जिसकी तलाश है। इसी तलाश के दरम्यिान कभी किसी पल में जिं़दगी को बेहद करीब पाया भी है...यह तस्वीर ऐसे ही पलों में से एक है। लाइफ इज अ सर्च....
(हमारे साथी फोटोग्राफर अतुल हुंडू की एक फोटो $िजंदगी झांकती है जहाँ )

Monday, August 24, 2009

कुछ, जिसका है इंतजार


केदारनाथ सिंह
कुछ
जिसे डाकिया कभी नहीं लाता
कुछ जो दिन भर गिरता रहता है
मकानों की छतों से धूल की तरह.
कुछ-जिसे पकडऩे की जल्दी में
बसें छूट जाती हैं,
चाय का प्याला मे$ज पर धरा रह जाता है
और शहर में होने वाली हत्या की खबर
चौंकाती नहीं
न आघात देती है।

सिर्फ आदमी उठता है
और अपनी कंघी को उठाकर
शीशे के और करीब रख देता है
कुछ, जिसके लिए
सारी पेंसिलें रोती हैं नींद में
और सड़क के दोनों किनारों के मकान
बिना किसी शब्द के
बरसों तक खड़े रहते हैं
एक ही सीध में।

Saturday, August 22, 2009

सदी का सबसे बड़ा आदमी-५ अन्तिम किश्त

काशीनाथ सिंह-
................. बुड्ढे, जब सारे लोग चले गये और कोई नहीं रह गया, तो शौक साहब बोले, तैने अपने बेटे की कीमत नहीं जानी बुड्ढे! बड़ी कीमती चीज है वो। बोल, कितना लगाएगा उसका मोल।सरकार, बूढ़े ने असमंजस में सड़क पर अपना माथा रख दिया।मैं थक गया हूं और अधिक थूकना मेर बस का नहीं. अब यह काम मेरा बेटा करे तो कैसा रहे? इसी गद्दी पर बैठकर! इसी खिड़की के पास. बूढ़ा उठ खड़ा हुआ. उसका मुंह खुला था और देर तक खुला रहा. वह अविश्वास के साथ खिड़की की ओर देख रहा था. उसने सूर्य को साक्षी करके दोनों हाथ जोड़े और आखें बंद कर लीं, पैर की धूल को चंदन बनाने वाले परवरदिगार ऐसा न करें, नहीं तो मैं पागल हो जाऊंगा, मारे खुशी के मर जाऊंगा...जब उसने आंखें खोलीं, तो उसकी आंखों में आंसू थे. उसने बेचैनी से बेहाल होकर कहा, सरकार आपने अभी-अभी कहा, उसे भूल तो न जाएंगे?
बुड्ढे शौक जो कहता है, उसे कभी नहीं भूलता।अपनी बात से मुकर तो नहीं जाएंगे?बुड्ढे, शौक की बात उसके मुंह से निकली हुई पीक की तरह होती है, जो वापस नहीं लौटती। बुड्ढे की खुशी का ठिकाना न था, लेकिन उसकी घबराहट बढ़ती जा रही थी। बेटा आने में देर कर रहा था। अब तक उसे लेकर न हाथी लौटे थ, न घोड़े, न बग्घी उसे खुद पता नहीं था, वरना दौड़ा हुआ गया होता और पकड़ लाया होता।सरकार, उसने अनुरोध किया, अगर इ$जाजत दें तो मैं खुद देखूं।नहीं, तू यहंा से नहीं हिल सकता, शौक साहब ने दृढ़ता से कहा।

बूढ़ा सिर झुकाकर सोचने लगा कि उसका बेटा जो बड़ा ही बेकहा और जिद्दी था, कहां-कहां जा सकता है। ठीक इसी समय जाने कहां से उसके मन में एक संदेह पैदा हुआ।लेकिन हुजूर, वह नीच जात...दूसरों पर थूकना उसे कैसे सोभेगा? उसने शौक साहब से अर्ज किया।क्योंउसी के भाई-बंद यह कैसे बर्दाश्त करेंगे?जैसे मुझे करते हैं।बूढ़ा हंसा. आपकी बात और है सरकार.मतलब यह कि किसी और पर थूकने से पहले अपने बाप पर थूके, तो दूसरों को क्या ऐतराज? क्यों न मुझी पर थूकने से शुरू करें?बूढ़े का जी धक से रह गया. वह घबरा उठा. अनर्थ हो जाएगा सरकार. वह जान दे देगा, लेकिन यह नहीं करेगा.

वह क्या करेगा, क्या नहीं करेगा, यह मुझ पर छोड़। शौक साहब ने उसे डंाटकर तुरंत चुप कर दिया।शौक साहब अब कुछ भी सुनने को तैयार नहीं लग रहे थे, वे आश्वस्त हो गए थे और बड़ी तेजी से उनका मूड बदल रहा था। वे कुछ गुनगुना रहे थे और जांघ पर ताल दे रहे थे। जाने कितने दिनों के बाद जाकर काम-धाम से फुरसत मिली थी उन्हें।उन्होंने जमुहाई ली और मुंह के आगे चिटकियां बजाईं।क्या करें कि दिन कटे? यह बात उनके भीतर उठने लगी थी। उन्होंने बाहर देखा न लोग थे, न गरियाना था, न रोना था, न घिघियाना था। पान से लाल सड़क पर जानलेवा सन्नाटा था और इससे वक्त नहीं कट सकता था. उन्होंने अपना सिर खुजलाया और तब तक खुजलाते रहे, जब तक हाथ दर्द नहीं करने लगा. फिर पीठ खुजलाई, फिर हाथों की उंगलियां चटकाईं, फिर दंात खोदे और खोदते रहे. अंत में शीशा उठाकर जब चेहरा देख रहे थे, तो कोठे के दिन याद आने लगे. खासतौर से बेला की हाय-हाय. क्या गला पाया था और क्या तरन्नुम था और क्या लोच था.एक बार फिर सोचें हुजूर, यह उस पर भी जुल्म होगा और मुझ पर भी. हम किसे मुंह दिखाएंगे? बूढ़े से रहा न गया, उसने फरियाद की.शौक साहब झल्ला उठे. उन्हें गुस्सा आ गया.बेवकूफ बुड्ढे! भाग सराह अपना कि तेरा बेटा, जो तेरे ख्याल से आवारा और निकम्मा है, तुझे वह सारा कुछ मुहैय्या कराने आ रहा है, जिनके लिए हर बाप झंखा करता है, समझा? कहकर बड़ी मोहब्बत से उन्होंने नीचे झांका और थोड़ी देर चुप रहे, फिर बोले, देख दिमाग मत चाट, जिंदगी के मजे ले. जब बड़े आदमी की सोहबत की है तो ऐश कर. बोल, तू क्या सुनेगा-ठुमरी या दादरा? वैसे मौसम चैता का है. अहा-हा केहि ठैयां झुलनी हेरानी हो रामा... शौक साहब ने आंचों बंद कीं और गुनगुनाना शुरू किया. थोड़ी देर बाद ही रुक गए और अंदर किसी को आवाज दी, अरे कौन है उधर? बेला बाई को भेज तो!अपने कानों में बूढ़े ने उंगलियां घुसेड़ ं. उसका माथा चकराने लगा. अगर चोबदारों ने उसे सहारा न दिया होता, तो वह भहरा पड़ा होगा. उसके दिमाग में इतना तो आ रहा था कि सरकार सही कह रहे हैं. वह पका आम, जाने कब चू जाए. अब कै दिन की जिंदगानी है उसकी? लोग बाल-बच्चों के लिए ही जीते हैं और यहां बेटे को राज मिल रहा है और वह भी अपने आप. दुनिया उसे हुजूर मालिक सरकार कहा करेगी और थुकवाने के लिए तरसती रहेगी, लेकिन मन कह रहा था कि ऐसे जीने से तो मर जाना अच्छा. वह भी क्या बाप, जिस पर बेटा थूके.सहसा जाने कहां से शायद उसकी अंतरात्मा से आवाज आई कि लाख ढूंढो, वह नहीं मिलेगा.उसे गुदगुदी जैसी महसूस हुई और उसने ऊपर ताका.ग्रामोफोन का रेकॉर्ड पूरे सुर में बज रहा था और खिड़की पर बैठे-बैठे शौक साहब झूम रहे थे।

सरकार, अगर वह न आए तो? बूढ़े ने खुशी में चिल्लाकर पूछा?शौक साहब का ध्यान टूटा। उन्होंने नाक-भौं सिकोड़ी। उन्हें यह खटराग बड़ा ही बेसुरा लगा, फिर भी उन्होंने जब्ती से काम लिया, अबे उल्लू के पट्ठे, उसे बुला कौन रहा है? वह लाया जा रहा है।लेकिन वह न मिले तो?बूढ़स उसी रौ में चिल्लाया।शौक साहब ने बेला बाई या जो भी रही हों, उन्हें थोड़ी देर के लिए चुप कराया और गुस्से से बूढ़े को देखा। बूढ़ा सड़क के बीचोबीच खड़ा मिचमिचाती आंखों से मुंह बाए उनकी ओर ताक रहा था. उसके हाथ जुड़े थे और कांप रहे थे. अगल-बगल चोबदार उसकी बांह पकड़े हुए उसे दुत्कार रहे थे. गुस्से में तो बहुत थे शौक साहब, लेकिन उन्हें दया आ गईं. इधर चैता ने भी उनके दिल को कोमलता और उदारता से भर दिया था. वे विनोद में मुस्कुरा उठे, भांड़ों और लौंडों के नाच के रसिया बुड्ढे, तुझे मुजरे का मजा क्या मालूम? तभी तंग जूती की तरह बीच-बीच में काट रहा है. अच्छा, अब सारी बातों का लुब्बे-लुबाब सुन ले और यह हाय-हाय बंद कर दे. रियायत नहीं चलेगी यहां. अगर तूने थूकने वाले को बेटा जानकर गालियां देने में, रोने में, गिड़गिड़ाने में कोताही की, चूक की, तो याद रख. एक बार नहीं, दो बार नहीं, तीन बार नहीं वह तक तक थूकता जाएगा, जब तक हमें संतोष न हो. बस...हां, तो बेला रानी अब शुरू कर.ग्रामोफोन की आवाज फिर खिड़की से बाहर आई और धूप में बल खाने लगी.शौक साहब ताल ही नहीं दे रहे थे, समय-समय पर सुर में सुर भी मिला रहे थे.बूढ़े ने ऊंची आवाज में फिर कुछ कहा, लेकिन खुद नहीं सुन सका कि क्या कह रहा है्वह पालथी मारकर वहीं सड़क पर बैठ गया.

शौक साहब इंत$जार कर रहे थे आने का। बूढ़ा इंत$जार कर रहा था न आने का.यह पहला दिन था. चार दिन और बाकी थे.शौक साहब के नाम पर बने नगर के इस चौराहे पर, जिसे लो शौक न कहकर चौक कहते हैं, साल में एक बार बिरहा-दंगल होता है. जिसमें बिरहा गाने वाली दोनों पार्टियां आपस में सवाल जवाब करती हैं. हालांकि हर कोई जानता है कि छठे रोज क्या हुआ था फिर भी बिरहियों की आखिरी लडंत होती है भोर में जिसके फैसले का दारोमदार इन सवालों के जवाब पर होता है कि नौजवान मिला या नहीं, गद्दी पर बैठने के लिए कहा गया, तो बैठा या नहीं, अपने बाप पर थूका या नहीं. थूका तो बाप ने कुछ किया या नहीं?इसमें संदेह नहीं कि जवाब तो अच्छे-से-अच्छे दिए जाते हैं, मगर सुनने वालों का मन नहीं भरता.
समाप्त....

Friday, August 21, 2009

सदी का सबसे बड़ा आदमी- 4

काशीनाथ सिंह

............इस ऐलान को करते हुए उनकी आंखों में आंसू थे और वे आंसू गालों पर ढुलक-ढुलक आ रहे थे कि वे तब तक किसी पर नहीं थूकेंगे, जब तक जुर्म करने वाला उसे भगाने वाला खुद सामने आकर कबूल नहीं करता.
इस ऐलान की बड़ी विकट प्रतिक्रिया हुई. इसे सुनते ही भीड़ के दक्खिनी छोर पर, जहां पकड़ी का पेड़ था और जिसकी डालें छोटे-बड़े अधनंगे शरीरों और सिरों से लदी हुई थीं, कोई बोला, हाय कुर्ता! दूसरे किसी छोर से एक और आवाज आई, हाय धोती, धीरे-धीरे हर कोने से आवाजें आनी शुरू हुईं और यह कीर्तन जैसा सुनाई पडऩे लगा, हाय कुर्ता, हाय धोती. हाय चावल, हाय रोटी.
कुछ जो चुपचाप खड़े थे और गा नहीं रहे थे, शक की निगाहों से आगे-पीछे ताक रहे थे और सबकी भलाई को देखते हुए आगे आने के लिए एक-दूसरे को उकसा रहे थे.
हुजूर, आखिरकार एक बूढ़ा आगे बढ़ा और दोनों हाथ उठाकर चिल्लाया, यह कसूर मेरा है.
शौक साहब ने अपनी आंखें पोंछी, कौन है तू?
उस अभागे का बाप! बूढ़ा बोला.
क्या करता है तू?
था तो हलवाहा हुजूर, लेकिन जब से जमींदारी गई, इसी नगर में रिक्शा खींच रहा हूं.
और तेरा बेटा? वह क्या करता है?
कुछ नहीं सरकार! आवारा और निकम्मा है. रात-रात भर दोस्तों से गप्पें लड़ाता है, घर से गायब रहता है और भी जाने क्या-क्या करता है?
इंकलाबी तो नहीं है?
पता नहीं हुजूर!
शौक साहब चुप-चुप उसे घूरते रहे. संतोष से उनकी आंखें चमक रही थीं, मगर ऐसा क्यों किया तैने?
हुजूर, वह मेरा खून है और मैं उसे जानता हूं. वह नहीं मरता. हरगिज नहीं मरता, लेकिन आप सरकार...वह हकलाने लगा. अगर आपको कुछ हो जाता,तो हम कहीं के न रहते.
लेकिन तैने दुनिया को जो बताया कि सरकार तेरे बेटे के मुकाबले कमजोर और बुजदिल हैं, उसके लिए क्या कहते हो?
बूढ़ा सोच में पड़ गया. उसने यह न सोचा था कि इसका मतलब ऐसा भी हो सकता है. उसने मदद के लिए उधर-उधर देखा. लोग-बाग पीछे से गर्दन उचका-उचकाकर देख रहे थे और उसे सुनने की कोशिश कर रहे थे.
सरकार, बुजदिल वह है, जो मैदान छोड़ दे, आप नहीं.
यह बात नहीं है बुड्ढे! शौक साहब कुछ देर सोचते रहे, साफ-साफ बोल, तैने किसकी जान बचाई? मेरी या अपने बेटे की?
अपने बेटे की हुजूर.
सो कैसे?
अगर आप न होते, तो ये लोग, जो चारों ओर फैले हुए हैं और कीर्तन कर रहे हैं, उसे जिंदा न छोड़ते?
पहले भी और अब भी?
अब भी?
यह भला क्यों?
यह इसलिए कि आप हैं, तो हम हैं आप नहीं तो हम कहां?
शौक साहब हंसे और बड़ी जोर की हंसी हंसे. उनका भारी शरीर जब शांत हुआ, तो बोले, बुड्ढे! बहुत चालाक है तू. मैं तेरे से खुश भी हूं और नाराज भी. खुश इसलिए कि तैने मेरी जान बचाई, लेकिन नाम मेरे बेटे का लिया और नाराज इसलिए कि तैने एक साथ सबको जलील किया. मुझे भी इस जम्हूरियत को भी और बेटे की बहादुरी को भी...तो बोल, तेरी मंशा क्या है? क्या चाहता है तू?
सरकार? बूढ़े ने सर झुका लिया.
वह चोबदारों के बीच खड़ा था और सोच नहीं पा रहा था कि क्या कहे? उसे सरकार के रुख का अंदाजा भी नहीं हा रहा था कि वे उससे क्या सुनना चाहते हैं? जब काफी देर तक बूढ़ा असमंजस में खड़ा रहा और कुछ न बोल सका, तो शौक साहब भीड़ की ओर मुखातिब हुए, लोगों उन्होंने भीड़ में ऐलान किया, वह नौजवान जहां कहीं भी हो, आकाश में हो तो आकाश से पाताल में हो तो पाताल से, धरती पर हो तो धरती से पकड़कर उसे हाजिर करो. जो हाजिर करेगा, वह बख्शीश का हकदार होगा. जाओ.
भीड़ धीरे-धीरे छंटने लगी. लोग दौड़ते-धूपते न$जर आने लगे. शौक साहब ने अपने ऐलान में पांच दिन की मोहलत दी थी कि इस दौरान वे यह विचार करेंगे कि थूकने का कार्यक्रम आगे भी चलाया जाए या बंद कर दिया जाए. उनकी इस धौंस ने हर आदमी को चुस्त और बेचैन कर दिया था.
देखते-देखते गली सूनी हो गई।
क्रमशा