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Wednesday, May 20, 2026

मैं मिलने जाऊँगी

 


पिछले बरस मेरे जन्मदिन पर चमोली में मित्र ने एक पौधा लगाया था। सुना है वह पौधा अब बड़ा हो गया है।
एक रोज मैं उस पौधे से मिलने जाऊँगी। उस शहर में एक नदी बहती है,जो मेरी सहेली है। मैं उस नदी से मिलने जाऊँगी। उस शहर के मौसम ने मेरे गाढ़े दुखों में गुलाबी फूल खिलाये थे, मैं उस मौसम से मिलने जाऊँगी।

जिस मित्र ने मेरे नाम के पौधे को न सिर्फ लगाया उसे साल भर सहेजा, बड़ा किया मैं उसे मित्र से मिलने जाऊँगी।

एक दिन मैं स्नेह से भरे हर व्यक्ति से मिलने जाऊँगी।

Sunday, May 17, 2026

जीवन में ऋषभ का होना


भीतर भीतर कुछ दरक रहा होता है, जिसे कभी ढेर सारे काम से, कभी तेज़ कदमों से, कभी संगीत से, कभी ढेर सारी मुस्कुराहटों से और कभी झूठ मूठ की खिलखिलाहटों से रिप्लेस करने की कोशिश करती रहती हूँ। उस वक़्त अपने ज़िंदगी को चकमा देने के इस हुनर पर फख्र सा होने लगता है लेकिन...वो ज़िंदगी है, चुपके से धप्पा देती है। वो इंतज़ार करती है, एक ऐसी तनहाई का जिसमें आप टूटकर बिखर ही लें। 

बिखरना, बुरा नहीं है। टूटना बुरा है। टूटन को छुपाये फिरने के खेल में हम लगातार और टूटते जाते हैं। 
कभी सब्र की नब्ज़ टटोलती हूँ। बहुत मद्ध्म मद्ध्म सी हरकत मुश्किल से ढूंढ पाती हूँ। अपने ही सब्र को गले लगाकर बैठी हूँ। आज की इस सुबह में मैं हूँ मेरा लगभग टूटा हुआ सब्र है और कुछ अगड़म बगड़म सा दिन है। 

शायद मैं लिख भी न पाती कुछ। न जाने कबसे लिखना, पढ़ना स्थगित सा है। किया नहीं है स्थगित, यह खुद दूर जाकर बैठा है। मैं इंतज़ार में हूँ कि करीब आए वो नहीं आता। मैं अपनी पसंद की किताबों के साथ उसके करीब जाती हूँ, वो मुंह घुमाकर बैठ जाता है। मैं लौट आती हूँ। हालांकि, मनुहार करना जारी है। 

मैंने पाया है कि आपके कितने ही करीबी लोग हों वो आपके दुख, सॉरी दुख नहीं उदासी का सामना नहीं करना चाहते। उस बारे में बात नहीं करना चाहते। शायद मैं भी नहीं। और इसलिए हमारे चेहरे पर मुस्कुराहटों के मुखौटे मजबूत होते जाते हैं। 

कल मैंने 3 लोगों से कहा, 'मन अच्छा नहीं है'।  2 लोगों ने पूछा, 'अरे क्या हुआ?' और 1 ने कहा, 'मेरा भी मन बहुत खराब है' मैं इन सबके साथ खुद में वापस  लौट आई। क्योंकि 'क्या हुआ' जैसा कुछ तो हुआ नहीं। लेकिन क्या नहीं हुआ जैसा तो न जाने कितना कुछ है। 

जानती हूँ कि हर कोई अपने भीतर न जाने कितना सैलाब लिए फिर रहा है। देश दुनिया के हालात ऐसे हैं कि आप इनसे अछूते रह नहीं सकते। कुछ कहकर कभी कुछ न कहकर। 

मैंने बचपन से अपना कोपिंग मैकेनिज़्म चुप रहने और घर की सफाई में पाया है। बड़ी हुई (मतलब पिछले दस बारह सालों में ) लॉन्ग ड्राइव या ट्रैवल भी कोपिंग मैकेनिज़्म की तरह पाया है। हालांकि आम जीवन में इस तरह के मैकेनिज़्म वो भी स्त्रियॉं के लिए एक लग्ज़री ही है। 

पिछले तीन दिन से घिस-घिस कर घर के कोने चमकाने, और बेमतलब के आँसू बहा चुकने के बाद आज इतवार को मैंने कुछ मना सा लिया है। इसका एक बड़ा क्रेडिट जाता है ऋषभ को। उसने एक ब्लॉग बनाया है। सिंगापूर डायरी लिखनी शुरू की है। मुझे उसने रात भेजा था। मेरी सुबह हुई उसे पढ़ने से। पढ़ते-पढ़ते लगा जैसे ठंडी हवा के झोंके ने छू लिया हो। 

सरल होना मुझे इस कदर मोहता है कि क्या कहूँ। जिस सादगी से ऋषभ लिखता है, वैसा ही वो है। इसलिए ऐसा लगा, उसने अपना लिखा भेजकर कहा हो, 'प्रतिभा जी, मैं हूँ न साथ।' 

ऋषभ, तुम्हारे लिखे का जादू देखो, दिन खिला हुआ है। मन भी। 

हम दुनिया के किसी भी कोने में हों, अपने हिस्से की मानवीयता को जीते हुए इस दुनिया को सुंदर बनाने के सपने में एक छोटा सा योगदान तो कर ही रहे हैं। कि हर रात सोने से पहले खुद से पूछना, आज किसी का दिल तो नहीं दुखाया न? 

जब जीवन का 'स' ही न सध रहा हो ऐसे में  ऋषभ का जीवन में  यूं होना ब्लेसिंग ही तो है। और इस बात को सेलिब्रेट तो करना चाहिए। है न? तो अब उठती हूँ, आज फिर से दो कप चाय बनाऊँगी। पहला कप ऋषभ का, दूसरा...आप जानते तो हैं न। 
दिन शुभ हो सबका।  

ऋषभ के ब्लॉग का लिंक- https://open.substack.com/pub/riserishabh/p/singapore-slowly-some-days-improve?utm_source=share&utm_medium=android&r=1dr9dp 

Friday, April 3, 2026

जीवन के पास क्या मरहम है?


खरगोशों की उदुक-फुदक दिन के उगने से पहले धरती को संवार रही है। अरसे बाद बालकनी से लटक कर लगभग कांधे से आ लगने को आतुर अशोक धरती को शोक मुक्त करने की प्रार्थना में मानो आँखें मूँदें खड़े हैं। धूप के कुछ कतरे इधर-उधर बिखरना शुरू हो चुके हैं।

इस सुबह में कल रात का कलरव भी दाखिल है। पूर्णमासी का चाँद मानो सुबह के करीब रखे चाय के कप को जरा सा सरकाकर बैठा ऊंघ रहा हो। मैं नन्हे अचंभे से चाय के कप को देख रही हूँ, जिसके दाहिनी तरफ सुबह की किरनें हैं और बायीं तरफ पूर्णमासी के चाँद की धज।

सुबह के वैभव को देखती हूँ तो खुशी गालों पर छलक़ने को आतुर होती है। ठीक उसी वक़्त कोई मध्धम सी सिसकी जो भीतर ही भीतर न जाने कबसे पल रही है आँखों के रास्ते बाहर आने का रास्ता ढूंढ लेती है। सिसकियाँ बेआवाज होती है, उन्हें भीड़ से डर लगता है। उन्हें आईने से भी डर लगता है। वे एकांत की फिराक में रहती हैं। वे फिराक में रहती हैं कि कब मैं भीड़ से तनिक हाथ छुड़ाऊँ और खुद के करीब आऊँ।

इस गहरी सिसकी में जमाने भर की औरतों की वेदना घुली है। इसमें मेरी बेबसी घुली है। जब्त है, आक्रोश है। मैं इससे आँखें नहीं चुरा सकती।

नन्हा सा सुख भी किसी कर्ज़ सा लगता है।

इस सुबह में प्यार है। साथ ही एक गुहार है। ईश्वर से प्रार्थना है, कि तुम हो, तो हो न यार। सारे पत्थर दिलों को मोम कर दो न। सारे हथियारों को फूलों में बदल दो न। सारे बस्तों में सपने भर दो, इस दुनिया को कुछ तो जीने लायक बना दो।

तो क्या मैं इतनी निराश हो चुकी हूँ कि किसी चमत्कार.का इंतज़ार करने लगी हूँ। मैं खबरें छुपाती फिरती हूँ, या खबरों से छुपती फिरती हूँ पता नहीं लेकिन जानती हूँ बच तो बिलकुल भी नहीं पाती।

अशोक के पेड़ों की कतारें जिस तरह प्रार्थनामय हैं मेरे हाथ अपने आप जुड़ गए हैं, ओ जीवन, जरा सा मरहम बन जा, जा जख्मी दिलों को गले से लगा ले। सामने ख़रगोश कुलांचे मार रहे हैं, सुबह पूरी तरह धरती पर बिखर चुकी है, लेकिन क्या अंधेरा पूरी तरह गायब हो चुका है।

Saturday, March 14, 2026

सुख को नाराज़ होते देखा है कभी?

खुद से इतनी शिकायतें रहती हैं कि मुंह चुराती फिरती हूँ। मानो खुश रहना कोई गुनाह हो। जब-जब रत्ती भर सुख हुआ, उसके छूटने के दुख ने इतना विचलित किया कि सुख के गाल पर मानो कोई स्क्रेच आ गया हो। वो मुझे घूर के देखता और मुंह फेर लेता। सुख को नाराज़ होते देखा है कभी? 

मैं उसके नाराज़ होने से उदास तो होती हूँ लेकिन उसे मना नहीं पाती। जाने कहाँ से प्रेमी की यह आदत मुझमें छूट गई। 

बाज दफा तमाम शिकायतें होती ही इसलिए हैं कि उन्हें मान मिले, उनकी परवाह की जाय। देखा है अक्सर झगड़ों की वजह इतनी मामूली होती हैं कि हैरत होती है कि भला इस बात पर कोई कैसे झगड़ सकता है लेकिन जो इश्क़ के खेल से वाकिफ हैं वो जानते हैं ये झगड़ा नहीं प्रेम है। वजह पर मत जाओ, प्यार पर जाओ। जब प्रेमी रूठे तो रूठने की वजह मत तलाशो, तर्क मत करो बस बाहों में भर लो। एक स्नेहिल स्पर्श हज़ार मर्ज की दवा होती है। 

सब जानते हुए भी सुख की हथेलियाँ थाम नहीं पाती, हालांकि चाहती हूँ उसके कंधे पर सर टिकाकर बची हुई उम्र गुज़ार दूँ। प्रेम में मान बहुत होता है। सुना था मानिनी प्रेमिकाओं का माथा हमेशा उन्नत होता है और उनके चेहरे पर अलग ही चमक होती है। क्या मेरे चेहरे पर वह चमक है? आईना देखती हूँ और मुस्कुरा देती हूँ। 

मेरा रूठा हुआ सुख मुझे आईने में देख अपना रूठना भूल जाता है। क़रीब आकर खड़ा हो जाता है। बिलकुल सटकर। हम दोनों साथ में अच्छे लगते हैं मैंने मन में सोचा। मेरा ऐसा सोचते ही खिड़की से हवा का झोंका कमरे में दाखिल हुआ। आईने में मेरे सिवा कोई नहीं था। 

कमरे में भी कोई नहीं। घबराकर इधर-उधर देखा, वो कहीं नहीं था। वो जा चुका था। नहीं जानती थी कि फिर वापस आएगा या नहीं। एक पूरा बरस या शायद उससे ज्यादा ही बीत गया उसे गए। वो सुख था पढ़ने का सुख, लिखने का सुख, संगीत का सुख, जीने का सुख। सुबह की चाय के साथ देर तक बारिश देखने का सुख, परिंदों के खेल देखने का सुख। मैंने सबको नाराज़ कर दिया और खुद को काम में झोंक दिया। 

किताबें पास होने से आप उन्हें पढ़ लेंगे यह संभव नहीं। कई बार किताबों को पलटा, कुछ पन्नों का सफर तय किया और फिर जाने कहाँ खो गई। वो किताबें अच्छी हैं, मेरा ही सुर बिगड़ा हुआ है। 

आज इस सुबह में जब आबिदा को कबीर गाते सुन रही हूँ तो महसूस हो रहा है कि कोंपलें सिर्फ बाहर नहीं फूट रही हैं। शायद मेरे सुख दरवाजे पर हैं। शायद वो लौटना चाहते हैं। शायद वो भी मुझे मिस कर रहे होंगे। अजीब सा दीवानापन है इस सुबह में। थोड़ी सी हड़बड़ी भी। ज्यादा सुकून है। 

सोच रही हूँ चाय का पानी पहले चढ़ाऊँ या दरवाजा पहले खोलूँ? सुबह की चाय पिये कई महीने बीत चुके हैं। आखिर दरवाजा पहले खोलते हूँ, कहने को वहाँ कोई नहीं लेकिन मैं जानती हूँ एक जीवन है जो रूप बदलकर बिना दस्तक दिये आने की फिराक में है। 

चाय का पानी चढ़ा दिया है, दो कप चाय का पानी। आबिदा आपा मुस्कुराकर गा रही हैं, भला हुआ मोरी मटकी फूट गई....

Thursday, March 12, 2026

क्या मुझे नींद आएगी


कई रोज से एक ख़ुशबू को थामे चल रही हूँ। उगते सूरज की ख़ुशबू। नई कोंपले फूटने की ख़ुशबू। सड़कें झरे हुए फूलों से भर उठी हैं। जिन रास्तों से गुजरती हूँ मेरे सर पर आसमान के साथ-साथ फूलों का एक सैलाब सा छाया होता है। मेरे दायीं तरफ फूलों की कतारे हैं और बाईं तरफ आम, लीची की बौर। पूरा शहर फिर से नये उगने की ख़ुशबू में डूबा है।

सारे दिन शहर का मौसम मुझे देश दुनिया के मौसम से, ख़बरों से बचाए रहता है। शाम होते-होते सब बिखरने लगता है। ख़बरों के छींटे कानों में पड़ते हैं और कानों से खून रिसने लगता है। अंधेरा छाने लगता है आँखों के आगे। नींद आ तो जाती है लेकिन बुरे ख़्वाब के चलते टूट जाती है। सोचती हूँ ख़्वाब ज्यादा बुरा था या हक़ीकत ज्यादा बुरी है।

नानी की कहानी में प्यार का जिक्र यूं होता था जैसे दाल में नमक का। बिना नमक की कोई दाल हुई भला, वैसे ही बिना प्यार के कोई ज़िंदगी हुई भला। सम्मान और प्यार हर इंसान की जरूरत है। रोटी भी बिना सम्मान के मिले तो बुरी ही लगती है ये बात और है कि मुफ़लिसी ने सम्मान को पीछे धकेलने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

जब सबको प्यार चाहिए तो ये नफ़रत कौन परोस रहा है। इतनी नफ़रत कि इंसान को इंसान ही न समझें। दुनिया की नफ़रत के बारे में ड्राइंगरूम या सोशल मीडिया पर मोर्चा खोलने या ज्ञान देने के बाद वक़्त मिले तो यह ज़रूर सोचना चाहिए कि एक व्यक्ति के रूप में हमारे भीतर कितनी हिंसा है। हमने कितनी बार हिंसक व्यवहार किया। किसके साथ किया। हिंसा को किस तरह समझा।

एक लंबी चुप्पी, उपेक्षा, उपहास क्या कम हिंसक होती है?

हमारे भीतर जो आक्रोश है वो किसके प्रति है? Powerless के प्रति ही तो। यही सारा खेल है। इसे समझने की बजाय इसमें फँसते जा रहे हैं हम सब। नफ़रत का यह चक्रव्यूह सबको घेरता जा रहा है। ऐसा चक्रव्यूह जिससे निकलने का रास्ता कोई नहीं जानता।

इस चक्रव्यूह की गिरफ्त बढ़ती जा रही है। हम एक अंधी सुरंग में जाते जा रहे हैं। धरती पर खून के छींटे बढ़ते जाते हैं और मन पर स्याह अंधेरा घिरता जाता है।

मैं खिलती हुई कोंपलों को देख ही रही थी कि खेल के मैदान में खेलता एक बच्चा ठोकर खाकर गिर गया। तभी एक दूसरे बच्चे ने आकर उसे उठाया और उसकी धूल झाड़ी।

मैं न तो गिरने वाले बच्चे का धर्म या जाति जानती थी, न उसे उठाने वाले बच्चे की। बस उन दोनों के चेहरे की मुस्कुराहट को और साथ खेलने को देख रही थी। तेज हवा के झोंके से वोगेनवेलिया के फूल शाखों से छूटकर मेरे काँधों पर आ बैठे थे।

क्या मुझे आज कुछ अच्छी नींद आएगी?

Saturday, February 7, 2026

पापा अब ठीक हो रहे हैं


सुबहें फिर से नज़र आने लगी हैं। रातों का अंधेरा अब डरा नहीं रहा। दूरियों के कारण रुकती हुई सांसें अब बेहतर हैं, जब पिता की कलाई हाथ में है। पापा अब ठीक हो रहे हैं। वो ठीक हो रहे हैं तो बिखरा हुआ जीवन सम पर लौट रहा है। शुभचिंतकों की शुभकामनाएं और डॉक्टर्स के एफर्ट्स मिलकर काम कर रहे हैं।

एक सप्ताह हुआ। हाँ, पिछले शनिवार यानि 31 जनवरी की शाम, पापा को हार्ट अटैक आया। एक ही पल में सब उलझ गया। उदास या परेशान होने का समय कहाँ होता है उस वक़्त, उस वक़्त तो बस संभालने का समय होता है। परेशान होना का जिम्मा उन्हें मिलता है जो दूर होते हैं। देहरादून से लखनऊ पहुँचने का समय इतना लंबा कभी नहीं लगा। राहत थी कि भाई है, सब ठीक कर लेगा, बड़ी राहत यह भी कि वो अकेला नहीं है उसके दोस्तों की पूरी फौज है उसके साथ, राहत थी कि माँ अकेली नहीं है इस गाढ़े वक़्त में। राहत कि भाभी मुझसे पहले पहुँच चुकी थी। इन तमाम राहतों ने हौसला दिया और पापा के पास पहुँचने तक का समय तनिक आसान किया।

पापा के दोस्तों ने साहस दिया, साथ दिया।

अब पापा ठीक हो रहे हैं। घर आ गए हैं। बड़ी मुसीबत आई थी...लेकिन अब जबकि सब ठीक होने की तरफ है, सोचती हूँ, तो पापा की मुस्कुराहट हौसला देती है और उनका वो सर्जरी के बाद चेतन होते ही किताब और चश्मा मांगना भी गुदगुदाता है।

हम सब असल में पापा की हिम्मत से बने हैं, उनके ही हौसले से चलते हैं। पापा के शीघ्र स्वास्थ्य लाभ के लिए आप सब की शुभकामनाएँ लगातार चाहिए।

इस दौरान जिन लोगों के फोन नहीं उठा सके उनसे क्षमा, उम्मीद है समझेंगे आप।

Monday, September 22, 2025

मन प्यार में डूबा रहा


कहीं भी जाती हूँ लौटकर आना चाहती हूँ, वहाँ जहां मेरे इंतज़ार में होता है मेरी खिड़की में टंका आसमान। मुस्कुराता हुआ हरसिंगार, सिरहाने रखी बिना पढ़ी गयी किताबों की ख़ुशबू और देर तक छाया रहने वाला सन्नाटा। इस बार लौटी हूँ तो हरसिंगार मुस्कुराकर नहीं खिलखिलाकर मिले। देर तक उसकी छाया में खड़ी रही। ख़ुशबू महसूस करती रही। दो बित्ते के थे जनाब जब इन्हें 4 बरस पहले घर लाई थी। माशाअल्लाह, बाँके जवान हो गए हैं जनाब। पहले मैं इनका ख़याल रखती थी अब ये मेरा रखने लगे हैं। ख़ुशबू साँझ से दुलराने लगती है। रात के बढ़ते ही जैसे सितारे उतर आए हों...देखती हूँ तो देखती ही जाती हूँ।
 
सितारों की ओढ़नी लेकर सो जाती हूँ और सुबह उनींदी आँखों से देखती हूँ, वो मुस्कुराकर कहता है, 'गुड मॉर्निंग'। मैं अलसाई हंसी उसे सौंपकर चाय का पानी चढ़ाती हूँ कि तभी कानों में जैसे कोई कोमल सुर घुलता है। चौंकती हूँ, कहीं कोई नहीं, कोई भी तो नहीं...ये कैसी आवाज़। जैसे किसी की सांस की आवाज़ हो।

ओह भ्रम होगा, माथे पर अपना ही हाथ मारते हुए हंस देती हूँ लेकिन वह आवाज़ फिर सुनाई देती है। इस बार सिहरन सी दौड़ जाती है। चाय लेकर बालकनी में आती हूँ, वह आवाज़ वहम नहीं थी, वो हरसिंगार के झरने की आवाज़ थी। कैसे हौले से शाखों से उतरकर झूमते हुए धीरे धीरे ज़मीन पर बिछ रहे हैं। कभी किसी दूसरी शाख पर अटक जाते हैं जैसे कुछ कहना रह गया हो, कहकर फिर झर जाते हैं। जहां झरते हैं उस जगह को सुफेद और नारंगी रंग की ओढ़नी सा सजा रहे हैं।

कश्मीर यूनिवर्सिटी की वो दोपहर याद हो उठी जब ऐसे ही झरते देखे थे चिनार के पत्ते। जैसे झरने का सुर लगा हो कोई। मध्धम, कोमल सुर।

जीवन जब सूचनाओं का अम्बार हो चुका हो, सूचनाओं पर आने वाली प्रतिक्रियाओं का सैलाब बहा ले जाने को आतुर हो तब ऐसी सुर लगी सुबहों के प्रति मन कृतज्ञ हो उठती हूँ। तमाम ख़बरों के बीच ज़ुबिन गर्ग के लिए आसाम के लोगों के प्यार ने कल दिन भर थामे रखा। इस सुबह की मखमली छुअन मैं ज़ुबिन की याद के हवाले करना चाहती हूँ, उन सबके हवाले जो किसी न किसी रूप में दुनिया में प्रेम सहेज रहे हैं।

चाय के कप के करीब रखी कुँवर नारायण की कविता मुस्कुरा रही है-

इतना कुछ था दुनिया में
लड़ने-झगड़ने को

पर ऐसा मन मिला
कि ज़रा-से प्यार में डूबा रहा

और जीवन बीत गया...

Sunday, December 31, 2023

जग दर्शन का मेला


इस बरस की अंतिम सुबह चाय के साथ पहली लाइन पढ़ी, 'जब चाँद को पहली बार देखा तो लगा यही है वह, जिससे अपने मन की बात कह सकती हूँ।' एक सलोनी सी मुस्कान तैर गयी। पहली चाय के साथ जिस पंक्ति का हाथ थाम एक सफर पर निकली थी शाम की चाय तक उस सफर की खुमारी पर चढ़े रंग साथ हैं।

इस बरस....
उसने मुझसे पूछा, 'क्या चाहती हो?'
मैंने कहा, 'मौत सी बेपरवाह ज़िंदगी।' 
उसने वाक्य में से मौत हटा दिया और हथेली बेपरवाह ज़िंदगी की इबारत लिखने लगा। लकीरों से खाली मेरी हथेलियाँ उसे बेहद पसंद हैं कि इनमें नयी लकीरें उकेरना आसान जो है। 
एक रोज मैंने कहा 'आसमान' तो समूचा आसमान मेरी मुट्ठी में था, फिर एक रोज समंदर की ख़्वाहिश पर न जाने कितने समंदर उग आए कदमों तले। 
जाते बरस से हाथ छुड़ाते हुए मैंने उसकी आँखों में देखा, उसके जाने में आना दिखा। रह जाना दिखा। 
जाने में यह सौंदर्य उगा पाना आसान कहाँ। 

इस बरस ...
मैंने अधूरेपन को प्यार करना सीखा। ढेर सारे अधूरे काम अब मुझे दिक नहीं करते। आधी पढ़ी किताबें, आधी देखी फिल्में, अधूरी छूटी बात, मुलाक़ात। इस अधूरेपन में पूरे होने की जो संभावना है वह लुभाती है। सिरहाने आधी पढ़ी किताबों का ढेर मुस्कुरा रहा है। मैं जानती हूँ इनके पढे जाने का सुख बस लम्हा भर की दूरी पर है लेकिन मन के खाली कैनवास पर कुछ लिखने का मन नहीं। तो इस खाली कैनवास को देखती रहती हूँ। कितना सुंदर है यह खाली होना। 

इस बरस...
कुछ था जो अंगुल भर दूर था और दूर ही रहा, कुछ था जो सात समंदर पार था लेकिन पास ही था। कि इस बरस उलझी हुई स्मृति को सुलझाया, कड़वाहट दूर हुई और वह स्मृति मधुर हुई, महकने लगी। जिस लम्हे में हम जी रहे हैं वो आने वाले पल की स्मृति ही तो है। इस लम्हे को मिसरी सा मीठा बना लें या कसैला यह सोचना भी था और सीखना भी। 

इस बरस...
अपने में ही मगन होना सीखा कुछ, बेपरवाही को थामना और जीना सीखा कुछ, सपनों को थामना उन्हें गले लगाना सीखा। किया कुछ भी नहीं इस बरस, न पढ़ा, न लिखा ज्यादा न जाने कैसे फ़ितूर को ओढ़े बस इस शहर से उस शहर डोलती रही। खुश रही। 
खुश होने की बात कहते कहते आँखें नम हो आई हैं। तमाम उदासियाँ सर झुकाये आसपास चहलकदमी करती रहीं। दुनिया के किसी भी कोने में कोई उदास है तो वह खुश होने और खुश दिखने की उज्ज्वल इच्छा पर स्याह छींटा ही तो है। 

चलते चलते- 
वो जो जा रहा है अपना समस्त जिया हुआ हथेलियों पर रखकर उसके पस कृतज्ञ होना है और वो जो आ रहा है नन्हे कदमों से हौले-हौले उसके कंधों पर कोई बोझ नहीं रखना है बस कि जीना है हर लम्हा ज़िंदगी को रूई के फाहे सा हल्का बनाते हुए...वरना कौन नहीं जानता कि एक रोज उड़ जाएगा हंस अकेला...

Sunday, December 24, 2023

इस बरस की खर्ची


इस बरस को पलटकर देखने को पलकें मूँदती हूँ तो आँखों के किनारे कुछ बूंदें चली आती हैं। इन बूंदों में एक कहानी छुपी है। एक नन्ही सी भोली सी कहानी। पलकें खोलने का जी नहीं करता कि बंद पलकों के भीतर एक प्यारी सी बच्ची को छाती से लगाए हुए का एक दृश्य है। पलकें खुलते ही ज़िंदगी की तीखी धूप पसर जाती है। सर्दियों वाली धूप नहीं जेठ के महीने वाली धूप।

किस्सा एक स्कूल का है। एक बच्ची थी प्यारी सी। बहुत सारे बच्चों के बीच। हँसती, खिलखिलाती, मुसकुराती। मैंने सारे बच्चों से कुछ बातें कीं और उनके दोस्त के बारे में लिखने को कहा। बच्चे लिखने लगे। बच्चे छोटे थे, कक्षा 3 के। सरकारी स्कूल के बच्चे जिन्हें न ट्यूशन न किताबें ठीक से न कॉपियाँ। लेकिन हरगिज़ कम मत आंकिए इनकी प्रतिभा को। तो बच्चों ने लिखना शुरू किया। कुछ ने मुझे दिखाया अपना लिखा, कुछ ने सुनाया। फिर मैं चलने को हुई तो आँचल ने अपनी कॉपी बढ़ा दी। मैंने कहा अब मैडम को दिखा देना मैं निकलती हूँ। उसने कुछ कहा नहीं, लेकिन उसकी आँखें उदास हो गईं। मैं बैठ गयी। उदास आँखें छोड़कर कैसे जाती ये तो पाप होता न।

कॉपी ली और पढ़ने लगी। तीसरी पंक्ति में लिखा था 'मैं और मेरी दोस्त गौरी बहुत मजे करते थे।' मुझे लगा उसने गलती से 'थे' लिख दिया है। आगे पढ़ा तो उस 'थे' का विस्तार बढ़ता ही जा रहा था। उसे पपीता बहुत पसंद था। हम साथ में घूमने जाते थे। अंतिम वाक्य था 'मुझे उसकी बहुत याद आती है। अब मैं कभी पपीता नहीं खाती।'

अंतिम वाक्यों तक आते हुए मैं बिखर चुकी थी। 30 बच्चों की हल्ले गुल्ले वाली कक्षा के बीच उसे भींचकर गले लगाने की इच्छा को जाने किस संकोच ने रोक लिया लेकिन उसकी हथेलियाँ मैंने अपने हाथों में ले लीं। उसकी बड़ी बड़ी आँखों में सागर से बड़े-बड़े आँसू टपक रहे थे लेकिन होंठ लगातार मुस्कुरा रहे थे।

मैंने धीमे से इतना ही पूछा, 'क्या हुआ था'
उसने कहा, 'पता नहीं। शाम को खेलकर गयी थी फिर उसके पापा ने उसे मारा था। सब कहते हैं वो बीमार थी।'
क्या दुनिया की किसी भी भाषा में कोई शब्द है जो ऐसे वक़्त में किसी को दिलासा दे सके। मुझे तो नहीं मिला अब तक सो मैंने उसकी हथेलियों को ज़ोर से भींच लिया।

आँचल अब भी मिलती है। हम दोनों में एक अनकहा सा रिश्ता है जो उसकी आँखों में मुझे देखते ही खिल उठता है।
'मैं अब कभी पपीता नहीं खाती...का वाक्य गूँजता रहता है।'

हम इस बहस में ही उलझे हुए हैं कि बच्चों को कैसा साहित्य देना चाहिए, कैसी कहानियाँ। उनमें मृत्यु, दुख, दर्द होना चाहिए या नहीं। असल में हमें बच्चों को हम जैसा जीवन दे रहे हैं वैसा ही साहित्य देना होगा। अगर सिर्फ हँसता मुसकुराता साहित्य देना चाहते हैं तो हँसता मुसकुराता जीवन देने की कोशिश करनी होगी। कहानियाँ बदलने से कुछ नहीं होगा।


इस बरस के तमाम हिसाब-किताब के बीच आँचल से मेरा जो मेरा रिश्ता बना वही मेरा इस बरस का हासिल है कि उसकी आँखें मुझे भरोसे और प्यार से देखती हैं।

Wednesday, September 27, 2023

धरती को बहुत प्रेम चाहिए


न जाने कितनी सदियों पहले देखा होगा ये ख़्वाब कि सामने समंदर होगा एक रोज़ मन में होगी डूब जाने की ख़्वाहिश। प्रेम में डूब जाने की। समंदर खारा सही लेकिन खरा प्रेमी है। उदास नहीं करता। उसकी उदात्त लहरें जीवन की तमाम लालसाओं समेत, तमाम खर पतवार समेत समेट लेती हैं पूरा का पूरा वजूद। वो आपको आज़ाद करता है। मुक्ति की लालसा से भी। आप समंदर का किनारा पकड़िए वो आपको जीवन का मध्य पकड़ा देगा।

मैंने हमेशा समंदर के करीब जाकर जीवन को कुछ और जाना है। मैं पहाड़ में रहती हूँ और समंदर से प्यार करती हूँ। जंगलों में फिरना मेरा शगल है और आसमान पर हमेशा मेरी नज़र टिकी रहती है। माँ ने हमेशा सिखाया कि नज़र आसमान पर हो और पाँव धरती पर मजबूती से जमे हुए। यही जीवन का मंत्र है। लेकिन समंदर सारे मंत्र सारी योजना, सारे तरीके तोड़ देता है। वो प्रेमी है। उसका काम है सब छिन्न भिन्न करना। जब टूटेगा कुछ तभी तो नया उगेगा। समंदर उसी नए उगने की मुनादी है।

तो इस बार समंदर से मुलाक़ात अलग थी। उदासी जीने की अभिलाषा में बदली हुई थी। मैंने लहरों को छुआ और और लहरों ने मुझे सराबोर किया और खिलखिलाकर कहा, 'तुम्हें प्रेमी से किस तरह मिलते हैं ये सलीका भी नहीं आता'। मैं एक पल को लजा गयी।
 


हिचक टूटी और लहरों के आगोश में सिमटने की बेकरारी ने हाथ थामा। कुछ ही देर में समंदर मुझमें था और मैं समंदर में। सुख वहीं आसपास टहल रहा था, मुस्कुरा रहा था। मैंने सुख को देखा और हंस पड़ी। सुख से मेरी जान पहचान एकदम नयी है। मैं उसके बारे में ज्यादा नहीं जानती लेकिन वो कमबख्त मेरे बारे में सब जानता है। मैंने सुख से कहा देखो सूरज। डूबते सूरज की लालिमा ने आसमान को सिंदूरी रंग में डुबो दिया था। आसमान के कैनवास पर बेहद खूबसूरत पेंटिंग बन रही थी। मैं मंत्रमुग्ध सी उसे देख रही थी और सुख मुझे। तभी एक बड़ी लहर ने हम दोनों को अपने भीतर समेट लिया। पाँव उखड़ गए और कुछ ही देर में मैं बीच धार में थी। आसमान और धरती के मिलन का समय था। समंदर में आसमान सूरज समेत उतरने को व्याकुल। मैंने सुख की ओर हाथ बढ़ाया उसने मुस्कुराकर कहा, जी क्यों नहीं लेती जी भरके। मैं फिर से पानी में गुड्प हो गयी। उसी समय सूरज डूबा, उसी समय दो पंछियों ने एक दूसरे की गर्दन सहलाई, उसी वक़्त धरती पल भर को थमी।

मैंने पाया कि सुख की चौड़ी हथेलियों ने मुझे थाम रखा है। वो एक लम्हा था जिसकी खुशबू पूरी धरती पर बिखरी हुई है। सदियों पहले देखा कोई ख़्वाब आसमान से उतरकर धरती के करीब खुद चलकर आया हो जैसे। धरती को बहुत प्रेम चाहिए। 


Sunday, June 4, 2023

काफ्काई मन



ये इतवार की सुबह है. एक उदास अख़बार दरवाजे के नीचे से झाँक रहा है. उसे उठाने की हिम्मत नहीं हो रही. लेकिन न देखने से चीजें होना बंद नहीं होतीं, दिखना बंद हो जाती हैं. लेकिन लगता है दिखना भी बंद नहीं होतीं.

कोई बेवजह सी उदासी है जो भीतर गलती रहती है. जैसे नमक की डली हो. वजह कुछ भी नहीं, या वजह न जाने कितनी ही हैं. हमेशा वजहों के नाम नहीं होते. लेकिन वो होती हैं. इतना मजबूत मन न हुआ है, न हो कभी कि आसपास के हालात का असर न हो.

कभी जब हम जिन चीज़ों पर बात नहीं करते वो चीज़ें और गहरे असर कर रही होती हैं. दुःख कितना छोटा शब्द है, सांत्वना कितना निरीह. घटना और खबर के पार एक पूरा संसार है जहाँ बहस मुबाहिसों के तमाम मुखौटे धराशाई पड़े हैं.

कल काफ्का की याद का दिन था. सारे दिन की भागमभाग के बीच काफ्का से संवाद चलता रहा. मैंने उससे पूछा, 'ऐसा क्यों हो रहा है इन दिनों?' उसने पूछा कैसा? मैंने कहा,'कोई बेवजह सी उदासी रहती है. किसी भी काम में मन नहीं लगता. पढ़ना दूर होता जा रहा है, लिखने की इच्छा नहीं होती. बात करने की इच्छा होती है लेकिन किससे बात करूँ समझ नहीं आता. अगर कोई बात करता है तो दिल करता है ये क्यों बोल रहा है. चुप क्यों नहीं हो जाता. सब लोग क्यों बोलते हैं इतना?' ये कहते हुए मैं फफक पड़ी. मैंने सुना कि मैं भी तो कितना बोल ही रही हूँ. किसी से न सही खुद से ही सही. चुप रहना न बोलना तो है नहीं. उफ्फ्फ, अजीब उलझन है.

काफ्का मुस्कुराये और बोले, 'चाय पी लो.'
मैं चाय बना रही हूँ. सामने लिली और जूही में खिलने की होड़ है. लीचियां पेड़ों से उतरने लगी हैं.

देह पर हल्की सी हरारत तैर रही है. काफ्काई हरारत.

Wednesday, May 17, 2023

मन की मनमानियां


मन अब मनमानी करने लगा है. सुनता नहीं किसी की. मुझे उसकी यह आदत अच्छी लगती है. ऐसा लगता है अब मेरा मन, मेरा मन होने लगा है. थोड़ा दुष्ट, थोड़ा बेपरवाह. एक रोज मैंने मन से पूछा, 'तुम्हें यूँ अपने मन की करने में क्या मजा आता है?' वो मेरा चेहरा देखकर मुस्कुरा दिया. 'तुम नहीं समझोगी' कहकर वो पाँव पसार कर बालकनी में लुढ़क गया. मैंने उसे लाख समझाया, 'देख, बहुत काम हैं. बहुत ही ज्यादा काम हैं. अभी ये सब नहीं चलेगा. उठो तो जल्दी से.' उसकी मुस्कुराहट और फ़ैल गयी और टाँगे और ज्यादा ही पसर गयीं. फिर? फिर क्या, काम का काम तमाम और महाशय मन की मनमानी चली.
 
कभी-कभी लगता है चारों तरफ का खाली घेरा बढ़ता जा रहा है. अपनी ही सांस की आवाज़ से टकराती फिरती हूँ. लेकिन इस सबमें कोई उदासी नहीं है. बस कुछ नहीं है जैसा कुछ है शायद.

किसी से खूब सारी बातें करने को दिल करता है लेकिन देर तक सोचती रहती हूँ किसे कॉल करूँ? सारे नाम एक एक कर गुजरते हैं ज़ेहन से. फोन नहीं करती. कभी कर लेती हूँ अगर तो दूसरी तरफ घंटी जाते ही भूल जाती हूँ किसे कॉल किया था. स्क्रीन देखती हूँ कि याद आये. तीन चार घंटी जाती है तो सोचने लगती हूँ काश कि न उठाये कोई फोन, काश न उठाये. अगर नहीं उठता फोन तो चैन की सांस लेती हूँ. और अगर उठ जाता है तो फंस जाती हूँ ये सोचकर कि अब क्या बात करूँ? सामने वाले के पास बताने को इतना कुछ है कि ऊंघने लगती हूँ कुछ देर में लेकिन बात का प्रवाह ऐसा होता है कि बीच में रख नहीं पाती.

कोई मैसेज इनबॉक्स में दिपदिप करता है. उसे खोलती नहीं. दीवार घड़ी की सुइयों का खेल देखना ज्यादा भला लगता है.   

देर तक अकेले रह चुकने के बाद सोचती हूँ किसी से मिल लूं. मिलते ही खुद से अजनबी होने लगती हूँ. शब्द कानों से टकराते जाते हैं, सुनाई कुछ भी नहीं देता. अपनी आँखों में खुद को ढूंढती हूँ. वहां एक खिड़की नज़र आती है. खिड़की जिसके बाहर खुला आसमान है, लेकिन खिड़की बंद है. मैं खिड़की खोल भी सकती हूँ लेकिन चाहती हूँ कोई आये और खोल दे. और जैसे ही कोई आने को होता है घबरा जाती हूँ. नाराज होती हूँ, मना करती हूँ...मेरे जीवन की सारी खिड़कियाँ, सारे दरवाजे मैं खुद ही खोलूंगी...

मन मुझे देखता है, देखता जाता है. मुस्कुरा कर पूछता है, 'तुम चाहती क्या हो आखिर?'
मैं अपनी हथेलियों को देखते हुए कहती हूँ, एक कप चाय पीना चाहती हूँ, पिलाओगे.'
वो चादर ओढ़कर सो जाता है. मैं चाय की इच्छा लिए खिड़की के बाहर टंगे आसमान को देखने लगती हूँ.
आसमान खूब नीला है.

Sunday, April 16, 2023

एक पूरा दिन है और मैं हूँ



इतवार की शाख से अभी-अभी सुबह उतारी है. एकदम खिली-खिली सी सुबह है. बाद मुद्दत हथेलियों में फुर्सत के फूल रखे हैं. एक लम्बी व्यस्तता के बीच वायरल ने जब धप्पा दिया तो वायरल को शुक्रिया कहा कि यूँ ही दिन दिन भर सामने वाली दीवार को ताकते रहना और चाय पीने की इच्छा और बनाने के आलस से जूझते हुए घंटों बिता देना. इसका भी कोई सुख होता है. देह की हरारत की डोर में स्मृतियों की ख़ुशबू पिरोना.
 
माँ की चिंता कि 'अकेले कैसे करोगी सब?' को सहेज लेती हूँ और माँ को कहती हूँ 'माँ, अकेली कहाँ हूँ. अकेला होना घर में किसी के न होने से नहीं होता.' माँ कुछ समझती नहीं बस चिंता में घुली जाती हैं तो अब आवाज़ में ख़ुशी पिरोकर बात करना आदत बना ली है. हालांकि हूँ भी खुश लेकिन कभी खुश दिखना होने से ज्यादा जरूरी हो जाता है.

बहरहाल, इस सुबह में हरारत नहीं है. एक पूरा दिन है और मैं हूँ. मुस्कुराती हूँ. सोच रही हूँ क्या-क्या कर सकती हूँ. देर तक सो सकती हूँ, कहीं घूमने जा सकती हूँ, चुपचाप पड़े रह सकती हूँ.

कुछ पौधे हसरत से देखते हैं तो उनसे कहती हूँ, 'हाँ आज थोड़ा समय तुम्हारे लिए भी.' वो खुश हो जाते हैं. बालकनी में बैठे कबूतर गुटर गूं कर रहे हैं जैसे कह रहे हों, 'तुम दिन यूँ ही क्या करूँ सोचते हुए बिता दोगी देख लेना.' मैं हंसती हूँ. हाँ सच ऐसा ही तो होता है हमेशा.

इन दिनों चुप की ऐसी आदत हो चली है कि इसकी संगत में मन खिलता है. तो इतवार की इस सुबह में रेखा भारद्वाज गुनगुना रही हैं 'गिरता है गुलमोहर ख़्वाबों में रात भर....'

दोस्तोवस्की क़रीब रखे हैं और सिमोन की डायरी पढ़ने की इच्छा कुलबुला रही है. दिन के हाथों में तसल्ली का तोहफा है. सामने ढेर सारे सूरजमुखी खिले हैं.

हाँ, मैंने अरसा हुआ न्यूज़ नहीं देखी.


Wednesday, March 15, 2023

इच्छा के फूल


सामने वही पहाड़ी थी जिसे हम दोनों साथ बैठकर ताका करते थे. खामोशियाँ खिलती थीं और शब्द इन्हीं पहाड़ियों में फिसलपट्टी खेलने को निकल जाते थे. मुझे याद है वो तुम्हारी इच्छा भरी आँखें और नीले पंखों वाली चिड़िया की शरारत. तुम्हें पता है, तुम्हारी इच्छा के वो बीज इस कदर उग आये हैं कि धरती का कोना कोना फूलों की ओढ़नी पहनकर इतरा रहा है. उस पहाड़ी पर अब भी हमारी ख़ामोशी की आवाज़ गूंजती है. वो पहाड़ी लड़की जिसने पलटकर हमें देखा था और मुस्कुराई थी उसकी मुस्कान अब तक रास्तों में बिखरी हुई है.

बारिश बस ज़रा सी दूरी पर है, तुम आओ तो मिलकर हाथ बढ़ायें और बारिश को बुला लें…🌿

Sunday, March 5, 2023

झरती पत्तियों सी मैं


मौसम सुनहरा हो रहा है. सारे रास्ते सुनहरी पत्तियों से ढंके हुए हैं. काम करते-करते निगाह बाहर जाती है और मन शाखों से लहराकर उतरती पत्तियों के संग अटकने लगता है. भटकने लगता है. पत्तियों के गिरने में एक लय है. उनके धरती चूमने का अलग अंदाज है. मीठी सी आवाज है.

हवा चलती है तो जैसे कोई अल्हड़ युवती छन छन करती पायल पहनकर भागते हुए गुजरी हो.

रास्तों से गुजर रही होती हूँ कि हवा का एक बड़ा सा झोंका सुर्ख और पीले फूलों की पंखुड़ियों को उड़ाकर पूरे वजूद को ढंक देता है. मेरी पलकें भीग जाती हैं. जीवन कितना समृद्ध है, कितना खूबसूरत. प्रकृति के जितने करीब हम जाते हैं जीवन के रहस्य खुलते जाते हैं.

ये झरती हुई पत्तियां ये उगती हुई कोपलें इनसे बड़ा जीवन दर्शन क्या है भला. हर यात्रा का एक विराम होता है. उस विराम को कैसे और कितना सुंदर बना पाते हैं बस इतना ही तो रहस्य जानना है. और यह रहस्य हमारी हथेलियों पर रखा होता है हम देख नहीं पाते.

मैं पीले पत्तों को अपना पीला मन सौंपती हूँ. वे मुझे नयी उगती कोंपलों की बाबत बताते हैं.

मैं जीवन से कहना चाहती हूँ कि मुझे पीले पत्तों से और उगती कोंपलों से एक जैसा प्यार है. न कम, न ज्यादा.
वो जो झर रही हैं पत्तियां वो मैं हूँ, वो जो उग रही हैं कोपलें वो मेरे ख्वाब हैं...

Sunday, November 27, 2022

तेरी आँखों में मेरा चेहरा



सुबह के कान में धीरे से कहा, 'मन नहीं लग रहा यार'. सुबह ने पलकें झपकायीं, सर पर हाथ फेरा और अपनी बाहें फैला दीं. उन बाहों में समाती गयी और मन का लगना जाने कहाँ गुम हो गया. कासे के लहराते फूल, पानी की मीठी सी आवाज़, लाल पंख और सफ़ेद धारी वाली चिड़ियों की शरारतें, सिर्फ मोहब्बत के आगे झुकने वाले पहाड़ों पर गिरता सुबह की धूप का टुकड़ा. कुदरत का एक ऐसा कोलाज कि उदास रातों को इस कोलाज के आगे पनाह मिले.

एक बार एक दोस्त ने कहा था कि हर आने वाले लम्हे का उत्सुकता से इंतज़ार करता हूँ कि न जाने उसकी मुठ्ठी में क्या हो. अब मैं भी वही करती हूँ. आने वाले लम्हों की आहटों पर कान लगाये रहती हूँ, उम्मीद के काँधे पर सर टिकाये ज़िन्दगी के खेल देखती हूँ. वो ज़िन्दगी है, हैरान करने का हुनर उसे खूब आता है. कब कौन सा रास्ता बदल दे, कब कहाँ से उठाकर कहाँ पहुंचा दे कुछ कह नहीं सकते. बस कि खुद को ज़िन्दगी के हवाले करना होता है और उसके सारे रंगों से मोहब्बत हो ही जाती है.

मैं ज़िन्दगी की आँखों में झाँककर मुस्कुराती हूँ, वहां मेरी ही सूरत नज़र आती है.

Saturday, November 26, 2022

सुबह का बोसा


जंगल के पास जीवन के बड़े राज हैं. कभी उनके क़रीब जाना और चुपके से किसी दरख्त की पीठ से टिककर बैठ जाना. जंगल अपने राज यूँ ही नहीं खोलते, वो तुम्हें देख मुस्कुरा देंगे. जंगल की बात सुनने के लिए मौन की भाषा सीखनी होगी. दृश्य के भीतर जाने के लिए दृश्य के पार देखना सीखना होगा. अपना तमाम 'मैं' उतारकर उनके क़रीब जाना होगा और तब देखना कोई जादू घटेगा. अपने ही गालों पर कुछ सरकता सा महसूस होगा. वो सुख होगा. आँखों के रास्ते गालों तक पहुँचता सुख.
 
हरे रंग की यात्रा पूरी कर चुकी पत्तियां तुम्हारे आसपास कोई सुनहरा घेरा बना देंगी. उन पीली पत्तियों के पास जीवन के हर सवाल का जवाब मिलेगा. किसी भी पेड़ पर चढ़कर इतराती, खिलखिलाती लताओं में इकसार होकर निखरने का मन्त्र मिलेगा. अपनी हथेलियों में सूरज की किरनें सहेजे जंगल से पूछना कभी उम्मीद के उन जुगनुओं की बाबत जो कैसे भी गाढे अँधेरे में चमकते रहते हैं.

जंगल से गुजरना जंगल के क़रीब होना नहीं है ठीक वैसे ही जैसे किसी व्यक्ति के पास होना उसके क़रीब होना नहीं है. अपनी सुबहों में कुछ खुद को खो रही हूँ, कुछ खुद से मिल रही हूँ. 

सूरज की पहली किरन का बोसा मुझे लजा देता है. मेरे चलने की रफ्तार तनिक धीमी पड़ती है...फिर आसमान देखती हूँ और मुस्कुराकर रफ्तार थोड़ी सी बढ़ा लेती हूँ. चलने की नहीं, जीने की.   

Tuesday, November 22, 2022

अफ़ीमी है तेरा मेरा प्यार


जब हम देखना बंद करते हैं तब दिखना शुरू होता है. पिछले कुछ दिन जब मेडिकल रीज़न से दिखना बंद हुआ तब महसूस हुआ कि कितना कुछ देखने से छूटा हुआ था. दृश्यों की भीड़ में गुम हो गयीं स्मृतियाँ बंद आँखों में रोशन हो उठी थीं. हम डी-टौक्स करने के तरह तरह के तरीके अपनाते हैं, कभी हमें दृश्यों से, आवाजों से भी खुद को डी-टाक्स करने का ख्याल क्यों नहीं आता.

एक बात के ऊपर दूसरी-तीसरी बात जम्प करती रहती है. हम बातों और दृश्यों के ढेर में लगातार गुम होते जाते हैं. कुछ करने जाते हैं और कुछ और करने लगते हैं क्या करने आये थे भूल जाते हैं. क्या कहना था, ज़ेहन से निकल जाता है और न जाने क्या-क्या बोलते जाते हैं. हमसे कुछ हमारा ही खो सा गया है. कैसा सैलाब है ये. कुछ अच्छा नहीं लगता. फिर अचानक चलना शुरू कर देती हूँ. चलती जाती हूँ. कुछ सोचना नहीं चाहती, यह सोचते हुए न जाने क्या-क्या सोचती जाती हूँ.

दृश्यों से दूरी वाले दिनों में कुछ उजाला क़रीब आया हुआ महसूस हुआ. लेकिन अजीब सी फितरत है कि सुख को हाथ लगाते डर लगता है. ख़ुशी थोड़ी दूरी पर रखी हुई ही भली लगती है कि हम एक-दूसरे के देख मुस्कुरा सकें. लेकिन जब हम उठकर चल दें विपरीत दिशाओं में तो कुछ टूटे नहीं.

यह थोड़ा मुश्किल है लेकिन इन दिनों यही ठीक लग रहा है. ख़्वाब जब तक आँखों में थे सुंदर थे, जैसे ही वो हकीकत की हथेली पर उतरे उनके बिखरने का डर भी साथ चला आया. ऐसे ही एक रोज दोस्त से मजाक में कहा था, 'मुझे सुख से डर लगता है, वो क़रीब आता है तो सोचती हूँ अभी इसके पीछे-पीछे आता होगा दुःख भी.' फिर हम देर तक हंसे थे.

कोई फांस धंसी हुई हो जैसे. जीने की इच्छा और जी लेने के बीच. बावजूद इसके जीने की इच्छा को सबसे ऊपर रखती हूँ और खुद को ज़िन्दगी के हवाले कर देती हूँ.

सूरज इस कदर आँखों में कूदने को व्याकुल है कि आंखें चुंधिया जाती हैं. मैं हंस पड़ती हूँ. खुद से किये वादे को दोहराती हूँ कि ख़ुश रहूंगी. खुश रहना भी साधना है. खुश दिखने से यह अलग होता है. इसके रास्ते में तमाम उदासी के पहाड़, नदियाँ जंगल आते हैं उन्हें पार किये बिना यह संभव नहीं.

हथेलियाँ आगे करती हूँ तो जूही खिलखिला पड़ती है. कानों में एक गीत बज उठता है, 'अफीमी अफीमी अफीमी है ये प्यार...' हाँ ज़िन्दगी से प्यार अफ़ीमी ही तो है.

Monday, November 21, 2022

इस सुबह में मैं खिल उठी हूँ


हमेशा से जानती हूँ कि हर रात की हथेली पर एक सुबह का इंतज़ार है. यह भी कि सुबहों की मुठ्ठियों में कोई नामालूम सी उम्मीद खिलती है. फिर भी जब-तब अपनी सुबहें गुमा बैठती हूँ. फिर कोई दोस्त मुझे आलस और उदासी के मिले जुले प्रकोप से निकालता है और सुबहों को हथेलियों पर रख देता है. इन दिनों फिर सुबहों से यारी हो चली है. 

मैं सुबहों से कुछ कहती इसके पहले वो मुझसे पूछ बैठती हैं, 'नींद पूरी हो गयी?'मैं पलकें झपका देती हूँ. क्या सुबहों को मेरे और नींद के बिगड़े रिश्ते की बाबत मालूम होगा मन ही मन सोचती हूँ कि चिड़ियों का एक रेला गुजरता है सर के ऊपर से.

धरती पर रात खिली जूही और रातरानी बिखरी हुई है. जो फूल धरती पर हैं वो मुस्कुरा रहे हैं जो डालों पर अटके हैं वो ऊंघ रहे हैं. मैं इस सुबह में बिखर जाना चाहती हूँ. यह सोचते ही रुलाई का कोई भभका फूटने को होता है और मैं मुस्कुरा देती हूँ. सोचती हूँ सुबहों ने मेरे भीतर प्रवेश करना शुरू कर दिया है शायद कि रोना बढ़ गया है इन दिनों. अच्छा लगना भी बढ़ गया है और उदास होना भी.

कल एक दोस्त ने पूछा था जब सारा दिन अच्छा बीता तो शाम तक बिखर क्यों गयी तुम, कहाँ से लाती हो इतनी उदासी. मैं उसकी बात सुन मुस्कुरा दी. मन में सोचा जिन्दगी से.

उदासी को इतना बुरा क्यों समझते हैं लोग. वो भी जीवन का हिस्सा है. आंसू भी. उसका हमारे भीतर बचे रहना शुभ है. कौन है ऐसा जो हमेशा खुश रहता होगा. हमेशा खुश रहने का सपना कितना बोरिंग है.
फ़िलहाल खूब रो चुकने के बाद मैंने अपने चेहरे पर ढेर सारी धूप मल ली है. थोड़ी सी ओस पलकों पर रख ली है. थोड़ा सा आसमान आँखों में भर लिया है.

बहुत दिनों से पढ़ने का रुका हुआ सिलसिला फिर शुरू करने का मन है. सिरहाने रखी किताब 'सरे चाँद थे सरे आसमां' इस सुबह में मुस्कुरा रही है.

Saturday, November 5, 2022

उसका नाम ख़्वाब रखा मैंने



मैं आवाज़ को नहीं पहचानती, ख़ामोशी को पहचानती हूँ. चेहरे में मुझे सिर्फ आँखें दिखती हैं, आँखों में दिखता है वो पानी जिसमें असल पहचान होती है. चेहरे पर लाख चेहरे रख ले कोई आँख के पानी को बदल पाना अभी सीखा नहीं मनुष्य ने. मैंने हमेशा संवादों के बीच से खामोशियाँ चुनी हैं आहिस्ता, शाइस्ता ढंग से. जैसे मृत्यु के बाद चुनते हैं राख से अस्थियाँ. उँगलियों से जब टकराता है अस्थि का कोई टुकड़ा तो सिहरन होती है, कंपकपी. याद का भभका रुलाई बन फूटता है कि राख के भीतर छुपा अस्थि का यह टुकड़ा कभी गले में पड़ी बांह थी.

अल्फाज़ की लरजिश ने कभी भरमाया नहीं, ख़ामोशी की तासीर ने पुकारा हमेशा. जब सोचती हूँ किसी के बारे में तो उसका चेहरा नहीं, आँखें दिखती हैं. उन आँखों का पानी दिखता है. देखने का अंदाज नहीं देखने की जुम्बिश दिखती है. स्मृतियों में जो आँखें हैं उनकी जुम्बिश थामे रहती है. किसी सुख से भरती है. उदासी से भी.

सुख और उदासी क्या अलग शय हैं? प्रेम और विछोह क्या अलग शय हैं?

कल यूँ ही एक बच्चा करीब आकर लिपट गया. वो मुझे नहीं जानता था. मैं भी उसे नहीं जानती थी. जब यह लिख रही हूँ तो पास में बैठी हुई विनोद कुमार शुक्ल की कविता 'हताशा में आदमी' मुस्कुरा रही है. मैंने कविता को देख पलकें झपकायीं और बच्चे को मुस्कुराकर देखा, बच्चे ने मुझे. मैंने कहा, 'कैसे हो', उसने हंसकर कहा, 'बहुत अच्छा हूँ.' मैंने उसकी आँखों में खुद को टिका दिया और पूछा, 'ये बहुत अच्छा कितना बड़ा होता है'. उसने अपने नन्हे हाथों को भरसक बड़ा करते हुए फैला दिया...'इतना'. हम दोनों हंस दिए. मैंने उसके गाल थपथपाए उसने अपनी बाहें मेरे गले में डाल दीं. सच कहूँ, मेरी आँखें भीग गयीं. शायद अरसे से किसी के गले लगने की इच्छा को ठौर मिला था. मैंने उसे भींच लिया. वो पलकें झपकाकर चला गया. 
क्या वो बच्चा जीवन था या ख़्वाब?
वो खेल के मैदान में गेंद के पीछे भागने लगा था और मेरा मन उसकी आँखों में डूबा था.

ज़िन्दगी किस कदर रहस्यों से भरी है, हम नहीं जानते. मैं देर रात तक उन नन्हे हाथों के बारे में सोचती रही जिसने बताया था कि बहुत अच्छा होना कितना बड़ा होता है. यही सोचते हुए सोने की कोशिश की तो आँखों में एक मुस्कान खिल गयी.

सुबह उठी तो जूही की डाल फूलों से भरी हुई थी.

मुझे उस बच्चे का नाम ख़्वाब रखना का जी चाहा. ख़्वाब जो जियाये रहते हैं...थामे रहते हैं.