Thursday, April 16, 2026

अप्रैल उम्मीद है


वो जो खिलखिला रहे हैं मोगरे इन दिनों
ये अप्रैल की आहट है
ये जो सारे दरवाजे खिड़की भेदकर 
चली आती है रातरानी की ख़ुशबू 
ये अप्रैल का दीवानापन है 
ये जो आँखों से निकल भागे हैं ख़्वाब 
मटरगश्ती करते फिर रहे हैं यहाँ से वहाँ 
ये अप्रैल की शरारत है 
ये जो समन्दर की लहरों को 
अंजुरियों में समेट लेने को व्याकुल है एक लड़की 
ये अप्रैल पर भरोसा है 
ये उड़ते हुए सेमल के फाहे 
आ बैठे हैं काँधों पर 
ये अप्रैल से उम्मीद है 

Sunday, April 12, 2026

कहानियों के फूल हक़ीक़त की धरती पर खिल उठे थे


मुझे ख़्वाब देखते लोग बहुत अच्छे लगते हैं। उनके पास से अलग ही ख़ुशबू आती है। न जाने क्यों लेकिन ख़ुद ख़्वाब देखने से डरती रही। डर ख़्वाब टूट जाने का। डर मेरे ख़्वाबों का उपहास उड़ाए जाने का। 

लगभग आधी ज़िंदगी जी चुकने के बाद सहमते हुए ख़्वाबों की ओर हाथ बढ़ाना शुरू किया। चारों तरह देखते हुए कि कोई ख़्वाब देखते हुए देख न ले। कोई देखेगा तो मज़ाक ही उड़ाएगा 'आईं बड़ी, इत्ते बड़े-बड़े ख़्वाब देखने।वालीं'। 

फिर मैंने अपनी दुनिया समेट ली। लोगों से दूरी बना ली। शब्दों से, कुदरत से दोस्ती कर ली। अपनी छोटी-छोटी कहानियों में अपने तमाम सपने लिखने लगी। इन कहानियों में मैं थी, मेरा मन था। वो जंगल थे जिन्हें मैंने देखा नहीं, वो रास्ते जिनसे मैं गुजरना चाहती थी, मुक्कमल प्रेम की चाहना जो ख़्वाब में भी पूरा होने को तैयार नहीं। इन कहानियों समंदर, नदी, झरने, फूल, बादल, बारिश सब भरपूर थे। और थी इस धरती को प्यार से भर देने की इच्छा। 
मैं अपनी कहानियों में सांस लेने लगी थी, मैंने देखा मैं खुश रहने लगी हूँ। इन कहानियों से एक ख़ुशबू आती है जो मुझे टूटने से बचा लेती है।

फिर ये कहानियाँ भी जज की जाने लगीं। इनका भी उपहास किया जाने लगा। और हम सब जानते हैं कि हमारा मनोबल हमारे सबसे करीबी लोग ही तोड़ते हैं। मेरी कहानियों के फूल मुरझाने लगे, मेरी कहानी की नदियां सूखने लगीं। 

कहानियाँ लिखना बंद होने लगा। एक रोज मैंने ख़ुद को ख़ुद से बिछड़ते पाया। मैं सूखी नदी के सीने से धंस जाती और देर तक सुबकती रहती। अमावस की रात में चाँद ढूंढती फिरती। एक रोज मैंने अपने सूखे मन पर कुछ बूंदें महसूस कीं। मेरी ही कोई कहानी हक़ीक़त में मेरा हाथ थामकर मुझे लेकर चल पड़ी। मैं उसके पीछे-पीछे हैरत से, वो मेरा हाथ थामे मुसकुराते हुए।

मैं समझ गयी, मेरी कहानियाँ हक़ीक़त की ज़मीन पर उतर भी सकती हैं। वो समंदर का किनारा, वो प्रेमी के कांधे से टिककर घंटो जाते हुए सूरज को देखना, तारों की छाँव में बिना बोले बस चलते जाना और सोचना कि एक दिन यूध्ध खत्म हो जाएंगे सारे, धरती पर सिर्फ प्यार बचेगा। 

कहानी कहती, 'उस प्यार को बचाने के लिए भी युध्ध तो करना पड़ेगा। युद्ध सबको लड़ना होगा, हर किसी को। किसी से नहीं, ख़ुद से। अपने भीतर पल रही हिंसाओं से। तरह-तरह की हिंसाओं से।'

'फिर?' मैं कहानी से पूछती। 
'फिर दुनिया में कोई किसी से नफ़रत नहीं करेगा।'  कहानी मुस्कुराती। मैं उसका हाथ थामे उसके पीछे पीछे चलते हुए मासूमियत से पूछती 'लेकिन यह तो यूटोपिया है न ? 

कहानी मुझे हौसला देती, 'सपने देखने से न डर पगली। तू सपने लिख, क्या पता किसी दिन तेरे सपने हक़ीक़त बन खिल उठें।' यह सुनते हुए मैंने उस रोज अपने सबसे प्यारे सपने की हथेलियों को ज़ोर से अपनी हथेलियों में भींच लिया। मेरी आँखें बह निकली थीं, सुख से। सपने को सब पता होता है, उसने मुझे गले से लगा लिया। लहरों की आवाज़ कानों में घुल रही थी।

आसमान में तारे उस रोज झमककर खिले थे। सप्तऋषि मण्डल को देखते हुए हम ध्रुव तारे को ढूंढने लगे ताकि ख़्वाबों पर यक़ीन करना चाहिए इस बात पर ध्रुव तारे की मुहर लगा दी जाय। ध्रुव तारा मुस्कुरा रहा था।

अगली सुबह मैं नया ख़्वाब लिख रही थी....कि एक रोज़ धरती पर कोई किसी से नफ़रत नहीं करेगा, ईर्ष्या नहीं करेगा, कोई प्रेम से नफरत नहीं करेगा...

उस रोज चाँद आसमान से जाने को तैयार नहीं था। वो कहानी में लिखे ख़्वाब को किसी आयत की तरह  बुदबुदा रहा था। समंदर की लहरें करीब आकर बैठी थीं, एकदम शांत।

मैंने कहानी के अंत में लिखा...आमीन!

Friday, April 3, 2026

जीवन के पास क्या मरहम है?


खरगोशों की उदुक-फुदक दिन के उगने से पहले धरती को संवार रही है। अरसे बाद बालकनी से लटक कर लगभग कांधे से आ लगने को आतुर अशोक धरती को शोक मुक्त करने की प्रार्थना में मानो आँखें मूँदें खड़े हैं। धूप के कुछ कतरे इधर-उधर बिखरना शुरू हो चुके हैं।

इस सुबह में कल रात का कलरव भी दाखिल है। पूर्णमासी का चाँद मानो सुबह के करीब रखे चाय के कप को जरा सा सरकाकर बैठा ऊंघ रहा हो। मैं नन्हे अचंभे से चाय के कप को देख रही हूँ, जिसके दाहिनी तरफ सुबह की किरनें हैं और बायीं तरफ पूर्णमासी के चाँद की धज।

सुबह के वैभव को देखती हूँ तो खुशी गालों पर छलक़ने को आतुर होती है। ठीक उसी वक़्त कोई मध्धम सी सिसकी जो भीतर ही भीतर न जाने कबसे पल रही है आँखों के रास्ते बाहर आने का रास्ता ढूंढ लेती है। सिसकियाँ बेआवाज होती है, उन्हें भीड़ से डर लगता है। उन्हें आईने से भी डर लगता है। वे एकांत की फिराक में रहती हैं। वे फिराक में रहती हैं कि कब मैं भीड़ से तनिक हाथ छुड़ाऊँ और खुद के करीब आऊँ।

इस गहरी सिसकी में जमाने भर की औरतों की वेदना घुली है। इसमें मेरी बेबसी घुली है। जब्त है, आक्रोश है। मैं इससे आँखें नहीं चुरा सकती।

नन्हा सा सुख भी किसी कर्ज़ सा लगता है।

इस सुबह में प्यार है। साथ ही एक गुहार है। ईश्वर से प्रार्थना है, कि तुम हो, तो हो न यार। सारे पत्थर दिलों को मोम कर दो न। सारे हथियारों को फूलों में बदल दो न। सारे बस्तों में सपने भर दो, इस दुनिया को कुछ तो जीने लायक बना दो।

तो क्या मैं इतनी निराश हो चुकी हूँ कि किसी चमत्कार.का इंतज़ार करने लगी हूँ। मैं खबरें छुपाती फिरती हूँ, या खबरों से छुपती फिरती हूँ पता नहीं लेकिन जानती हूँ बच तो बिलकुल भी नहीं पाती।

अशोक के पेड़ों की कतारें जिस तरह प्रार्थनामय हैं मेरे हाथ अपने आप जुड़ गए हैं, ओ जीवन, जरा सा मरहम बन जा, जा जख्मी दिलों को गले से लगा ले। सामने ख़रगोश कुलांचे मार रहे हैं, सुबह पूरी तरह धरती पर बिखर चुकी है, लेकिन क्या अंधेरा पूरी तरह गायब हो चुका है।