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Tuesday, May 19, 2026

आवाज़ भी एक जगह है


कल जन संस्कृति मंच ने देहरादून में मंगलेश जी की स्मृति में एक कार्यक्रम का आयोजन किया। सच कहूँ अरसे बाद किसी कार्यक्रम से इतना तृप्त होकर लौटी हूँ। तृप्ति का केंद्र मैंने खुद के लिए जिन चीजों में पाया है वे हैं स्नेह, सम्मान और अब तक जाने हुए में तनिक इज़ाफ़ा। कल की शाम इन तीनों से लबरेज़ रही।

आशुतोष, रविभूषण, ज़हूर आलम, दिगम्बर और राम जी राय (जी का सम्बोधन सबके साथ माना जाय) को सुनना सुखद था। कविता की लेयर्स को देखना, टटोलना, उसके भीतर और भीतर झांकना और कविता के मर्म तक पहुंचना सुखद था। जानना हमेशा ही कम होता है। हर बार लगता है, कितना तो कम जानते हैं हम। कल भी ऐसा ही सा दिन था।

इतने सारे कवियों ने इतना सुंदर सुवावस्थित कविता पाठ किया, आनंद हुआ। भरोसा हुआ कि हालात से बैचेन लोग कम भी नहीं हैं। प्रेम शंकर और मृत्युंजय ने क्या ही गज़ब का संचालन किया। यह उस संचालन की ही खूबी थी कि कार्यक्रम में इतने वक्ताओं के वक्तव्य और 20 कवियों के कविता पाठ से रचा बसा कार्यक्रम समय पर शुरू हुआ और समय पर खत्म हुआ।

न किसी कवि ने माइक पकड़कर पकड़े ही रहने की जिद की और ऐसा भी नहीं लगा कि बहुत हड़बड़ी हुई। तो यह संतुलन ख़ूबसूरत था। मदन चमोली शांति से सब संभाले भी रहे और लगने भी नहीं दिया कि कोई कुछ संभाल रहा है।

इब्बार रब्बी जी को पहली बार सुना, क्या ख़ूब हैं वो। क्या उत्साह, क्या बेबाक़ी और क्या ही कमाल का पाठ। नाम लेकर हर कवि के बारे में लिखूँगी तो कई किलोमीटर की पोस्ट हो जाएगी बस इतना ही कि हर कवि अपने होने में कमाल था। इतने सारे कवियों को एक साथ सुनना और एक मिनट के लिए भी कविता से ध्यान न हटना इस बात की तसदीक़ है।

श्रोताओं की संख्या भी सुख का एक कारण था। इतने सारे लोग समय पर आ गए और लगातार बने रहे, यह कम महत्वपूर्ण बात नहीं। प्रतिरोध के स्वर में इतने सारे साथियों का होना सुख तो है ही।

मंगलेश जी से जुड़े इतने स्नेहिल किस्से सुनने को मिले कि ऐसा लगा नहीं हैं वो हमारे बीच नहीं हैं। दैहिक रूप से वे हमारे साथ भले नहीं हैं लेकिन हम सबके भीतर वो हैं और रहेंगे। कार्यक्रम की शुरुआत में उनके कविता पाठ की रिकॉर्डिंग सुनना भी कम सुंदर अनुभव नहीं था।

तो कुल जमा बात इतनी है कि ये माना कि अंधेरा घना है, लेकिन इस अंधेरे को तोड़ने की कोशिश करने वाले भी कम नहीं हैं, और ये अंधेरा एक दिन टूटेगा ज़रूर।

मृत्युंजय पुराने साथी हैं, उनसे अरसे बाद मिलना बड़ा ही सुखद रहा। बाकी इस कार्यक्रम में जो गुना है वो धीरे-धीरे भीतर जगह बना रहा है। धीरे-धीरे उस पर भी लिखूँगी अगर वक़्त इज़ाजत देगा। 

जिंदाबाद साथियों!

Thursday, February 12, 2009

दूरियां

मैं सोचता
रहाऔर दूर चला आया
मैं दूर चला आया
और सोचता रहा
तुम सोचती रहीं

और दूर चली गईं
तुम दूर चली गईं
और सोचती रहीं
इस तरह हमने तय की दूरियां।

- मंगलेश डबराल