Monday, June 27, 2022

कविता कारवां मार्ग पर स्वागत है...




‘कविता कारवां मार्ग...’ उस सड़क के किनारे लगे बोर्ड को देख आँखें ख़ुशी से छलक पड़ी थीं. जैसे किसी ख़्वाब के सामने खड़ी हूँ. उंहू...इत्ते बड़े तो ख़्वाब देखे भी न हमने बस एक शाम कविताओ के नाम हो. ईर्ष्या, द्वेष, प्रतियोगिता इन सबसे दूर, अपनी कविताओं की जय जयकार से दूर बस अपनी पसंद की कविताओं की संगत में बैठना दो घड़ी और बस ज़ेहन की गठरी में समेट लेना कुछ नया अनुभव, कोई नई कविता, कोई नया कवि.

इसी देहरादून में 6 बरस पहले इस ख़्वाब का अंकुर बोया था. सुभाष और लोकेश ओहरी जी के साथ मिलकर. उस कविताओं से प्रेम के अंकुर को पानी खाद दिया सारे कविता प्रेमियों ने. आज छह बरस बाद देहरादून में कविता कारवां मार्ग का उद्घाटन हुआ गीता गैरोला दी के हाथों और साक्षी बने सब कविता प्रेमी.

कविता कारवां का यह सफर बीच-बीच में किसी नदी किनारे, किसी पहाड़ी पर, किसी पेड़ के नीचे सुस्ता जरूर लेता है लेकिन इसका चलना लगातार जारी है...और इस सफ़र में वो सब शामिल हैं जिन्हें कविताओं से प्यार है. आज किसी भी शहर में किसी भी देश में हुई किसी भी बैठक में शामिल वो सारे लोग याद आ रहे हैं जो इस सफर में शामिल हैं. वो भी जो शामिल होने की इच्छा से भरे हैं. ऋषभ, तुम्हारी इस अवसर पर सबसे ज्यादा याद आई...तुम होते तो यकीनन तुम्हारी आँखें भी छलक रही होतीं जैसे मेरी छलक पड़ी थीं...दुनिया भर को एक परिवार के सूत्र में बाँधने वाले ‘कविता कारवां मार्ग’ पर आप सभी का स्वागत व इंतजार है...

कविताओं से ऐसा प्यार देखा है कहीं?



Sunday, June 26, 2022

प्रेम पत्रों के नाम आ रहे हैं प्रेम पत्र


- कल्पना मनोरमा
"वह चिड़िया क्या गाती होगी?" प्रतिभा कटियार की नवलोकर्पित कृति Bodhi Prakashan से कुछ समय पूर्व प्रकाशित हुई थी।

इस पुस्तक का शीर्षक प्रश्नाकुलता लिए हुए है। हम में से जो भी अपने बचपन में अति संवेदनशील रहा होगा उसने एक न एक बार ये प्रश्न हवा में उछाल कर ज़रूर पूछा ही होगा कि दूर नीम की डाल पर या घर की मुंडेर पर वह जो चिड़िया मटक मटक का चूं चूं चूं कर रही है, आख़िर वह क्या गाती होगी? पंछियों की बोली हम जान पाते तो न जाने प्रकृति के कितने रहस्यों से रू ब रू हो सकते थे।

खैर, प्रतिभा जी ने ये पत्र महामारी के घोर त्रासद समय में अपना गुबार उगलने या आसुओं को शब्दों में समेटने के दौरान लिखे हैं। इस बात को मद्दे नज़र रखते हुए जब सोचती हूं तो लगता है कि लेखिका ने चिड़िया को जीवन के प्रतीक में लिया होगा क्योंकि जिस समय लेखिका इस कृति को रच रही होगी उस समय सड़क, घर, अस्पताल, पगडंडियों और न जाने कहां कहां जीवन बेकल हो चिचिया रहा था। कहीं चिड़िया की तरह बोलते हुए जीवन को प्रश्रय भी मिला तो कहीं तड़पते हुए प्राण गंवाते हुए भी देखा गया। लेकिन जब जब उस मनहूस समय के चंगुल में जकड़े जीवन को देखा गया था तब तब मन में यही ध्वनित हुआ कि आख़िर वह जीवन क्या बोल रहा है? क्या चाहता है?

इस किताब को पढ़ते हुए मानव मन की अनंत जिज्ञासाओं और एकांत समय में मन में उठने वाली भावनाओं जिन्हें शब्द देना आसान नहीं होता लेकिन लेखिका ने अपनी सहजता में वक्त की क्रूरता को गूंथकर दुःख को सहज ही लिख दिया है। प्रारंभ से अंत तक इस कृति को पढ़ते हुए महसूस होता चला गया कि जिस प्रकार किसी व्यक्ति की किसी व्यक्ति से मित्रता होती है तो त्वरित प्रगाढ़ता नहीं बढ़ती। बल्कि धीरे धीरे मित्रतापूर्ण वार्तालाप तीव्र से तीव्रतर होता जाता है।

लेखिका ने इन पत्रों को उस दौर में लिखा है जब संसार अवसन्नावस्था में था। मानवीय संवेदनाएं सुन्न पड़ चुकी थीं। इस विचार को विचारते हुए ये कार्य बेहद कठिन लगता है कि अपनी ठोस होती संवेदनाओं को आखिर एक रचनाकार कैसे तरलता प्रदान करता है। इसे जानना हो तो प्रतिभा को पढ़िए।

हालांकि पुस्तक के आरंभ से लेखिका अकेले शब्द सफ़र तय करती है लेकिन मध्य में पहुंचते पहुंचते उसे लेखक मानव कौल और किशोर चौधरी भी सहयात्री के रूप में मिल जाते हैं। और उनसे बोलते बतियाते हुए प्रतिभा बेहद सघन विचारधारा में उतरते हुए पाठक को वैचारिक यात्रा पर ले जाती हैं। जहां हर वस्तु, विचार, आदतें, अपने, सपने और न जाने क्या क्या इस प्रकार मुखर होते हैं कि बस शब्द शब्द कहता है कि रुक जाओ मेरे पास कि दुनिया की कठोरता तुम्हें साबुत न छोड़ेगी।

"तकनीक ने तो हमें जोड़ रखा है लेकिन एक दूसरे से मन से जुड़ने की तकनीक तो हमें खुद ही ईजाद करनी होगी है न!" प्रतिभा जी के इस वाक्य को यदि किताब का धरातल माने तो गलत न होगा। हमें मानव से मानवता की दूरी को ही समेटना है। इस तकनीकी समय में ये बेहद कठिन ज़रूर है लेकिन नामुमकिन नहीं। अस्तु!!

Saturday, June 18, 2022

I am falling in love again



हमारी ढेर सारी सांसें तैयारी होती हैं कुछ लम्हों को जीने की. तैयारी वाले उन लम्हों में हमें पता नहीं होता कि जीने वाले लम्हे जब हथेलियों पर होंगे तब हमें कैसे रिएक्ट करेंगे. कैसा महसूस करेंगे. सच में कुछ भी पता नहीं होता.

आँखें मूंदती हूँ तो खुद को एक जंगल में पाती हूँ. बारिश की बूदों को खुद पर उतरते हुए महसूस करती हूँ. जंगल की खुशबू का नशा तारी होने लगता है. आँखें खोलती हूँ तो जंगल मुस्कुराता है, हवा का तेज़ झोंका अपनी खुशबू में बूँदें समेटे हुए आता है और चेहरे को तर-ब-तर कर देता है.

ऐसा लगता है अब तक का सारा जीवन इन लम्हों तक आने की तैयारी था. लम्हे जिनमें मैं जी रही हूँ, लम्हे जो मुझे गढ़ रहे हैं. बीता सबकुछ छूट चुका है. स्मृति भी. स्मृतिविहीन होने की कोशिश में जितने जख्म कुरेद रखे थे वो अब भरने लगे हैं. कितने बरस का वक़्त काफी होता है स्मृतिविहीन होने के लिए कहना मुश्किल है.

स्मृतिविहीन होना असल में स्मृति से असम्पृक्त होना है.

नये मौसम में सब कुछ नया है. नए रास्ते हैं, नए रंग, नई खुशबू. उम्मीद अब भी कोई नहीं है जिन्दगी से, भरोसा है उस पर कि उसकी झोली में कुछ तो होगा मेरे लिए. पलकें झपकाती ज़िन्दगी कभी धूप, कभी बारिश और कभी कचनार के फूल रख देती है हथेली पर.

इनका होना मेरी हथेलियों में लकीरों के न होने को खुशरंग कर देता है. गुलाबी कचनार इन दिनों सुहा रहे हैं. पूरा शहर कचनार की रंगत में डूबा हुआ है.

खुद को आईने में देखती हूँ. कोई और दिखता है वहां. जो दिखता है उससे प्यार है.

कुछ नए सुर साथ हैं...सुख है...

Yellow paper daisy
You've made me crazy, lately
My heart's been so racy
Maybe I'm falling in love again
I'm falling in love again...


https://www.youtube.com/watch?v=JDfsMiovE1A

Thursday, June 16, 2022

अच्छा लगना कैसा होता है...


तुम्हारे जाने के बाद जागती रहती हूँ रातों को
ख़्वाब  देखती हूँ  ख़्वाब आने का
टटोलती हूँ उन जगहों को जिन्हें छुआ था तुमने
कभी सोफे पर
कभी तुम्हारे पानी पिए गिलास में
सिगरेट की छूटी हुई गंध में   
आसमान में, जिसे देखा था साथ में हमने 
सूरजमुखी के उन फूलों में
जो हमें ताक रहे थे उस वक़्त
जब हम बात कर रहे थे
चेतन और अवचेतन दिमाग की कारस्तानियों की

जाते वक्त तुम्हारा 
पलटकर न देखना भी याद आता है 
माथे पर चुम्बन दिए बगैर 
तुम्हारा लौट जाना अटका रह जाता है 
वैसे ही जैसे अटका रह जाता है 
बालों में लगा फूल 
और बालकनी में चहलकदमी करता कबूतर 
ज्यादा साथ रह जाता है तुम्हारा कहना 
कि तुम सिर्फ वो करो जो मन करे 
और मैं कहते-कहते रुक जाती हूँ 
कि मन है तुम्हारे संग बूढ़ा होने का 
जाने कैसे पढ़ लेते हो मन 
और दो झुर्रीदार हथेलियाँ 
हमारी हथेलियों में समाने लगती हैं 

रोना चाहती हूँ 
कहना चाहती हूँ 
कि मुझे जीवन ने 
खुश होना नहीं सिखाया 
अच्छा लगना असल में कैसा होता है 
नहीं जानती 

अपनी पलकों पर तुम्हारे ख़्वाब रखने को होती हूँ 
कि गीली आँखें मुस्कुरा देती हैं 
तुम्हारे ख़्वाब में तो मैं हूँ 
अपनी ही पलकों पर अपने ख़्वाब उठाये 
बारिश के इंतजार में हथेलियाँ आगे बढ़ा देती हूँ 
कि अचानक तुम्हारी याद  
उन हथेलियों को चूम लेती है  
बारिश अपनी लय में बरसती जाती है 
जानती हूँ तुम होते तो 
तोड़ देते हर लय

तुम्हारे जाने के बाद  
अपने भीतर थोड़ा और उगने लगती हूँ 
हर बार...

बच्चों के नन्हे हाथों में चाँद सितारे रहने दो...

- प्रतिभा कटियार
उसकी नन्ही उँगलियाँ एक बड़ा सा घर बनाने के लिए तेजी से चल रही थीं. लकीरें तनिक टेढ़ी-मेढ़ी होतीं तो वो इरेज़र से दुरुस्त करती और पूरे मन से घर बनाने में लग जाती. वो महक थी. देहरादून के सरकारी स्कूल की कक्षा 2 की छात्रा. अपने ही स्कूल में चल रहे समर कैम्प का आनन्द लेते हुए वो तन्मयता से डूबी हुई थी. उसने घर बनाया, घर के बाहर एक बकरी, एक कुत्ता भी था. फिर उसने घर के पास कुछ फूल उगाये. एक पेड़ भी आकार लेने लगा. महक ने कहा ‘मैं दो सूरज बनाउंगी.’ मैं जो देर से उसे चुपचाप लकीरों से अपना आसमान, अपनी जमीन गढ़ते देख रही थी उससे पूछ बैठी, सूरज तो एक ही होता है न? तो दो सूरज क्यों? बड़ी देर बाद उसने अपना सर ऊपर उठाया, अपनी नजरें मेरे चेहरे पर रखीं और दृढ़ता से कहा, ‘मुझे दो सूरज चाहिए इसलिए.’ और वो फिर से झुककर सूरज बनाने लगी. कुछ ही देर में उसकी कॉपी में दो सूरज चमक रहे थे. महक अब खुश थी. मुझे फिल्म ‘स्काई इज़ पिंक’ का वह संवाद याद आया जब दूर देश में बैठी माँ अपने बच्चे से पूरे आत्मविश्वास से कहती है, ‘अगर तुम्हारे आकाश का रंग गुलाबी है तो वह गुलाबी ही है.’

मैंने महक से पूछा, ‘तुम्हारे घर की खिड़की से क्या-क्या दिखता है?’ उसने मुस्कुराकर कहा, ‘जो भी मैं देखना चाहती हूँ’ मैंने पूछा क्या-क्या, तो उसने कहा, ‘पेड़, नदी, पहाड़, आसमान पूरा, हवाई जहाज...रसगुल्ले वाले की दुकान और...और आइसक्रीम और काम से लौटती मम्मी.’ महक से बात करते हुए मेरे भीतर कोई खुशबू फूटने लगी थी. महक के कल्पना के संसार में गोते लगाते हुए, उसके दो सूरज की मुस्कुराहट को सहेजते हुए अचानक लगने लगा था कि यह दुनिया सच में किस कदर खूबसूरत है जब तक ये नन्ही आँखों, नन्हे कदमों और नन्ही उँगलियों के हवाले है. और हम समझदार लोग इन्हें अपने जैसा बनाना चाहते हैं. क्योंकर आखिर? निदा फाज़ली साहब का शेर मौजूं हो उठा था, बच्चों के नन्हे हाथों में चाँद सितारे रहने दो, चार किताबें पढ़कर ये भी हम जैसे हो जायेंगे.

इसके बाद कुछ देर मैं पूजा के पास बैठी. उसे देखती रही कि उसकी कल्पना की दुनिया में कैसे-कैसे रंग हैं. उसने सुंदर से घर के बाहर एक प्यारी सी लड़की बनाई थी. बेहद खूबसूरत थी वो लड़की. मैंने पूजा से पूछा ‘ये तुम हो?’ पूजा अचकचा गयी. ‘नहीं नहीं...मैं नहीं. मैं तो काली हूँ न. और सुंदर भी नहीं हूँ. ये तो ईशा है मेरी बहन. वो बहुत सुंदर है.’ और पूजा ईशा की ड्रेस में रंग भरने लगी. मेरे भीतर कुछ दरक गया. नन्ही पूजा किस कदर मान चुकी है कि वो सुंदर नहीं है. किसने बताया उसे यह. और क्यों, किस आधार पर. मैंने बहुत देर तक पूजा से बात की और उसे कहा कि वो बहुत खूबसूरत है लेकिन वो मानी नहीं.

राहुल की दुनिया में झाँका तो वहां खिलौने थे बहुत सारे. एक हवाई जहाज था. घर उसका भी बड़ा था लेकिन उसके घर के बाहर जो पेड़ था उसके नीचे वो अपने दोस्तों के साथ खेल रहा था. रंग चटख थे राहुल की दुनिया के. उसने फूल कम बनाये थे खिलौने ज्यादा.

सिध्धार्थ ने पूछा, ‘क्या अपने मन से कुछ भी बना सकता हूँ?’ जब शिक्षिका ने कहा हाँ, कुछ भी बना सकते हो तो उसने कहा ‘मैं धरती बनाऊंगा.’ वो धरती बनाने लगा. गोल-गोल धरती. सिध्धार्थ कक्षा 1 में पढ़ता है. उसने एक गोला बनाया और उसमें कुछ गोचागाची कर दी. उसकी शिक्षिका ने कहा, ‘शाबास तुमने बहुत सुंदर धरती बनाई है. अब इस धरती में कुछ पेड़ भी लगा दो.’ लेकिन सिध्धार्थ का मन नहीं था पेड़ लगाने का. उसने उस गोचागाची वाली अपनी ड्राइंग में एक महिला की तस्वीर बनाने की कोशिश की. तस्वीर तो बन नहीं पा रही थी लेकिन यह समझ आ रहा था कि यह कोई स्त्री है. उसकी शिक्षिका ने उसके सर को चूमते हुए कहा, ‘जाओ जाकर बाहर खेल लो और फ्रूटी पीना मत भूलना.’

सिध्धार्थ धीमे कदमों से बाहर चला गया. शिक्षिका ने बताया कि इसने अभी स्कूल आना शुरू किया है. कोरोना में इसकी माँ की मृत्यु हो गयी है. इसके पापा काम पर जाते हैं. अक्सर वो इसे स्कूल से ले जाना भूल जाते हैं. बच्चा अभी बिना माँ के जीना सीख रहा है. उसने धरती पर जो स्त्री बनाई है शायद अपनी माँ को बनाया है. उस लगभग न समझ में आने वाले अनगढ़ से चित्र के भीतर के उस कोमल संसार को सिर्फ वो शिक्षिका समझ पा रही थी जो सिध्धार्थ को जानती है, उसके मन को जानती है.

इस जानने का, महसूस करने का शिक्षा में कितना गहरा उपयोग हो सकता है यह बात सर्वविदित है ही.

इस बार के ये समर कैम्प कई मायनों में अलग हैं. यहाँ रंगों और खेलों का जो संसार है न जाने कितने जख्मी दिलों पर मरहम भी रख रहा है. न जाने कितने नन्हे मन की उड़ान को खुला आसमान दे रहा है. शिक्षक बच्चों के और करीब आ रहे हैं, बच्चे अपने ही और करीब आ रहे हैं. शिक्षक चाहते हैं कि समर कैम्प के बहाने बच्चों के मन की सारी जकड़न टूट जाए, बच्चे चाहते हैं कि वो अपनी दुनिया के दो सूरज से इस दुनिया को और रोशन कर दें.

रही बात सीखने की तो मैंने महसूस किया कि इस दौरान बच्चों और शिक्षकों दोनों का जिस तरह का सीखना हो रहा है उसी की कमी से तो सारा समाज जूझ रहा है.

Wednesday, June 15, 2022

क्षमा करो हे परम्पराओं रीति-रिवाजों

- प्रतिभा कटियार
खुद से मोहब्बत करना सिखाने वाला देश, समाज नहीं है यह. यहाँ संस्कार का अर्थ है अपने हिस्से की रोटी दूसरे को देकर सुख पाना. स्त्रियों के हिस्से तो यह इस कदर आया है कि यह उनकी रोजमर्रा की आदत में शामिल हो गया कि घंटों खाना बनाने के बाद पहले घर के पुरुषों को परोसना, खिलाना, उन्हें खाते देखने का सुख लेना और जो उनके खाने से जो बच जाय उसे खाकर अपना भाग्य सराहना.

ऐसे देश, समाज में खुद से कोई इस कदर मोहब्बत कर बैठे कि खुद से ही ब्याह रचाने चल पड़े तो क्या हो भला? गुजरात की क्षमा बिंदु खुद से ब्याह करने वाली पहली महिला बन गयी हैं साथ ही उन्होंने बहुत सारे सवालों को भी जन्म दिया है. मैं उन सवालों उन टिप्पणियों पर बात नहीं करूंगी जिसमें उन्हें पब्लिसिटी स्टंट या सेल्फ औब्सेशन जैसी टिप्पणियों से नवाजा जा रहा है. मेरी चिंता कहीं और है, कुछ और है.

लम्बे समय से मैं विवाह संस्था की दुश्वारियों की बाबत सोच रही हूँ. क्योंकर आखिर विवाह संस्था को इस कदर सर पर चढ़ा लिया गया है कि वो दम घोंटने पर उतारू हो उठी हैं. फिर भी विवाह संस्था का ग्लैमर कम नहीं हो रहा है. लिवइन रिलेशनशिप जैसे वैकल्पिक कानून हमारे पास होने के बावजूद विवाह संस्था के वर्चस्व का किला लगातार मजबूत होता जा रहा है. क्षमा के खुद से विवाह करने के पीछे मुझे वही वर्चस्व नजर आता है.

विवाह संस्था का ग्लोरीफिकेशन इस कदर है कि कब वो ज़िन्दगी का एक बड़ा मकसद बन जाता है पता ही नहीं चलता. लड़कियों के लिए तो खासकर. अभी भी ज्यादा लड़कियों के सपने में उनका राजकुमार पहले आता है, करियर बाद में. बच्चियां होश बाद में संभालती हैं विवाह का वैभव उन्हें भरमाना पहले शुरू कर देता है. दुल्हन बनने का सपना, सजने-संवरने का सपना, मेहँदी, हल्दी, नाच, गाना इन सबका आकर्षण इस कदर उनके ज़ेहन में पैबस्त हो जाता है कि कई बार उनका दूल्हा भी प्राथमिकता के पायदान पर नीचे सरक जाता है और विवाह की परम्पराओं का आकर्षण पहले पायदान पर आ बैठता है.

दो दशक पहले तक यह बात चर्चा में आती तो थी कि विवाह में बेवजह के खर्चे, शोशेबाजी को कम करना चाहिए. उस वक़्त विवाह की रीढ़ पर दहेज़ के दानव की पड़ी हुई लात ही काफी थी. अभिभावक उसी से बिलबिलाये रहते थे. दूल्हे के घरवालों के सामने पगड़ी रखते लड़की के पिता को दिखाने वाले कितने ही दृश्य, दहेज के कारण बरात लौट जाने के कितने किस्से हम सबको याद हैं. लेकिन बजाय विवाह के खर्चों, शोशेबाजी पर लगाम कसने के यह उत्तरोत्तर बढ़ता गया. हिंदी फिल्मों और बाज़ार ने मिलकर इसमें खूब रोटियां सेंकीं. न सिर्फ विवाह की परम्पराएँ, रीति-रिवाज फैशन बन सर चढ़ने लगे, वैवाहिक उत्सव भी इसमें शामिल हो गये. करवाचौथ, शादी की सालगिरह आदि जैसी होड़ इसमें शामिल होने लगीं. अब आ गयी है शोशेबाजी की एक नयी विभीषिका शादी की 25वीं सालगिरह. रिश्ता कैसा है इस पर ध्यान नहीं लेकिन रिश्ते का सेलिब्रेशन और तस्वीरें चमकती हुई दिखना जरूरी हो गया है.

इंगेजमेंट, हल्दी, मेहँदी, बारात, जयमाल यह सब कितना फ़िल्मी स्टाइल हो यह अलग ही तनाव हो चला है. बेस्ट फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी, लाइव जयमाल, प्री वेडिंग सूट, पोस्ट वेडिंग सूट, प्रेगनेंसी फोटो शूट, पहला करवा चौथ, हर साल की एनवर्सिरी इन सबसे जुड़ी जो उत्सवधर्मिता है वो अचानक गायब हो जाती है जब कोई विवाह न करने का फैसला लेता है. पहले तो सिंगल रहने के निर्णय पर तथाकथित रिश्तेदार ही सवाल कर करके जान खा लेते थे यही कष्ट था अब एक और कष्ट जुड़ गया है इस निर्णय के साथ बाजार की चमचम करती यह उत्सवधर्मिता सिंगल व्यक्ति के जीवन से गायब हो जाती है.

क्या हो उन लड़कियों का जिन्होंने मेहँदी लगाने, शादी का लहंगा पहनने, सजने-संवरने के सपने देखते हुए ही ज़िन्दगी के सपने देखे हैं. एक बार एक लड़की को कहते सुना था, ‘यार शादी तो नहीं करनी लेकिन शादी की परम्पराएँ मजेदार लगती हैं, सोचती हूँ फेक मैरिज करके शादी वाले अरमान पूरे कर लूं.’ बात मजाक में कही गयी थी लेकिन उसकी जड़ें गहरी थीं.

एक काफी प्रोग्रेसिव कपल को जानती हूँ जो कई साल से लिव इन में थे लेकिन आखिर लड़के को उस रिश्ते से बाहर आना पड़ा क्योंकि लड़की को शादी करनी थी ताकि वो शादी की परम्पराओं को जी सके. लड़का इन परम्पराओं में यकीन नहीं करता था. शुरुआत में लड़की भी नहीं करती थी लेकिन एक आकर्षण उसे लगातर खींच रहा था.

एक बार जब एक दोस्त की करवाचौथ की रंगभरी तस्वीरबाजी से उकताकर इन परम्पराओं को खाए अघाए लोगों का शगल कह दिया था तो वो नाराज हो गयी थी. इसलिए जब कोई कहता है कि यह किसी पर दबाव नहीं है, मुझे ठीक लगता है मैं ऐसा कर रही हूँ, कर रहा हूँ किसी को न पसंद हो तो वो न करे तो उदास हो जाती हूँ. इतना सरलीकरण? सचमुच? दोस्त, यह बात इतनी सी नहीं होती. यहीं, बस इसी जगह ठहरकर सोचने की जरूरत है. कि यह जो मर्जी का ताना-बाना है यह आता कहाँ से है और यह होता कैसा है. कैसे आपकी कम्फरटेबल च्याव्स किसी की जबरन लादी हुई च्वायस में तब्दील हो जाती है पता ही नहीं चलता.

जिन बच्चियों की आँखों में किताबों के, दुनिया बदलने के, कुछ बेहतर करने के सपने होने थे कैसे उनमें चूड़ी, बिंदी, गजरा, और राजकुमार के सपने फिट कर दिए गये सोचिये तो सही. यह सब अवचेतन में काम कर रहा होता है. हमारी चेतना अवचेतन की शिकार रहती है तब तक जब तक हम उसे झाड़ पोंछकर साफ़ न करें.

अगर यह सचमुच आपकी मर्जी है तो इसका ढोल क्यों पीट रहे हैं आप भाई. लगातार एक दबाव बनता जा रहा है, बढ़ता जा रहा है. निश्चित तौर पर मध्यवर्ग खासकर नवोदित मध्यवर्ग इसके चंगुल में ज्यादा है. यह दबाव उन पर किस कदर भारी पड़ रहा है इसका एक उदाहरण मेरे घर में मैंने देखा. मेरी खाना बनाने वाली पूनम. पूनम सिंगल पैरेंट है. दो बेटियों और एक बेटे को उसने अकेले ही पाला है. हाड़-तोड़ मेहनत करके उसने बच्चों को शिक्षा दी, घर बनाया और उनके अच्छे भविष्य के सपने देखे. मेरे आश्चर्य की सीमा न रही जब पता चला कि उसने बेटी के लिए सत्तर हजार का लहंगा लिया है. लड़के वालों ने कोई दहेज नहीं माँगा था बस एक ही शर्त थी कि शादी धूमधाम से हो. लड़की का भी यही सपना था. पूनम की बेटी का भी प्री-वेडिंग शूट हुआ. हर रस्म एकदम फ़िल्मी तरह से हुई और शादी के बाद पूनम 8 लाख के कर्ज में थी.

‘जिसे न करना हो वो न करे’ कहकर अपने ऐश्वर्य पर इतराने वालों से इतना ही कहना है कि आप जियें बेशक वो सब जो आप जीना चाहते हैं लेकिन उसका ढिंढोरा पीटकर दूसरों के लिए उस इच्छा का दबाव न बनाएं. क्या ही बड़ी बात है कि क्षमा ने भी इन्हीं परम्पराओं को जी लेने के मोह में खुद से विवाह किया हो. ठीक वैसे ही जैसे क्वीन फिल्म में अकेले हनीमून पर गयी थी कंगना.

उनके नजरिये से देखिये, शादी न करने का फैसला इतनी सारी उत्सवधर्मिता के बिना क्यों आये. तो लो जी अकेले रहेंगे ठसक से और शादी की तमाम रस्मों का आनन्द उठाएंगे. ऐसा ही सोचा होगा शायद क्षमा ने भी.

हालाँकि बेहतर तो यह होता कि हम सब मिलकर कहते क्षमा करो हे रीति रिवाजों, परम्पराओं, अब तुम्हारा और बोझ हमसे न ढोया जायेगा.

https://twitter.com/QuintHindi/status/1536741042044936192

Tuesday, June 14, 2022

घर, बुलडोजर और राष्ट्र

मैं आठवीं में पढ़ती थी जब हमारा घर बन रहा था. मैं महमूदाबाद में माँ और भाई के साथ रहती थी. पापा लखनऊ में घर बनवा रहे थे. हम बीच-बीच में जाते थे घर बनते देखने. जब हम लखनऊ में नहीं होते थे तब वो घर हमारे सपनों में बन रहा होता था. मेरा छोटा भाई मिट्टी के घर बनाया करता था. मैं भाई के मिट्टी के घर और पापा के द्वारा बनाये जा रहे घर के बीच कहीं रहा करती थी. माँ की आँखों में घर उगता देखती थी. एक-एक कोना उनकी आँखों में सांस लेता था. पापा की आवाज में चमक थी, आज नींव पूरी हो गयी, आज डीपीसी हो गयी, आज खिड़कियाँ लग गईं, अब छत पड़ने वाली है...

और एक दिन सब बिखर गया. पापा दफ्तर में थे, हम सब महमूदाबाद में. मजदूर काम कर रहे थे कि एक बुलडोजर आया और उसने हमारा समूचा घर ढहा दिया...कुछ देर पहले जहाँ छत पड़नी थी वहां अब मलबे का ढेर था. बुलडोजर क्यों चला, अचानक कैसे चला, क्यों पापा के आने का इंतजार नहीं किया. वहां इतने सारे घर थे सिर्फ हमारे ही घर पर क्यों चला, ये सब सवाल बेमानी हो गये थे,

मुझे याद है पापा उस खंडहर में बैठकर रात को रोया करते थे, माँ उन्हें सँभालने की कोशिश में खुद रो भी नहीं पाती थीं. बुलडोजर ने सिर्फ दीवारें नहीं तोड़ी थीं, हम सबकी जिन्दगी तोड़ दी थी.

अरसे से मैंने टीवी चैनलों से दूरी बना ली है कि खुद को छुपा लेने की कोशिश कर रही हूँ जैसे. लेकिन यह भ्रम कब तक आखिर. कल रात एनडीटीवी प्राइम टाइम पर जब इलाहाबाद में एक घर पर बुलडोजर कार्रवाई होते देख रही थी तो मेरे आंसू रुक ही नहीं रहे थे, गुस्सा थम ही नहीं रहा था.

ऐसी कार्रवाई के पहले की कार्रवाई कहाँ है? किसकी जेब में है समूची व्यवस्था, प्रक्रिया?

सचमुच जिन्हें लगता है कि ये 'उनका' घर टूटा है और जो टूटते घर को देखते हुए डिनर कर रहे थे, चैनल बदलकर गाने सुन रहे थे उनसे कुछ भी कहना बेकार है. क्योंकि उन्होंने ही इस व्यवस्था को पोषित किया है. जो खुश हैं और जिन्हें लगता है कि बिलकुल सही हुआ है जो हुआ है, वो यह नहीं जानते कि एक रोज वो खुद 'उन' लोगों में तब्दील हो सकते हैं. बस बुलडोजर रूपी राक्षस को दिशा ही बदलनी है अपनी.

इतनी नफरत भी मत फैलाओ साथियों कि अपनी ही फैलाई नफरत की आंच एक रोज तुम्हें जला के मार दे. सत्ता किसी की नहीं होती इस बात का तो इतिहास गवाह है. 

(तस्वीर लगाने की मेरी हिम्मत नहीं है)

Saturday, June 11, 2022

इच्छा का रंग कैसा होता है...



पीली धूप का गुच्छा अभी-अभी मेरी चाय के प्याले के पास गिरा है. उसके गिरने में एक खनक है. मैं जब हाथ में 'शर्ट का तीसरा बटन' लेकर बैठी थी तब भोर की रुपहली किरनों की मध्धम रौशनी थी, हवा का सुर मध्धम लगा हुआ था जिसमें बारिश का इंतज़ार शामिल था. मुठ्ठी भर आसमान आँखों के सामने टंगा हुआ था और मैं निकल पड़ी थी चोटी, राधे, गज़ल और और कथा के नायक के साथ.

अब जब पीली धूप का गुच्छा इसरार कर रहा है कि उससे बातें करूँ, उसे बताऊँ कि मैं क्या पढ़ रही हूँ तो मुस्कुरा देती हूँ, तुझे समझ नहीं आएगा, धूप के गुच्छे से कहती हूँ. वो मानता नहीं, वो एक प्रस्ताव रख देता है सामने, 'अगर तुम मुझे बताओगी तो मैं तुम्हारे लिए बारिश लेकर आऊँगा.' धूप बारिश लेकर आयेगी यह सुनना ही सुखद है. मैं प्रस्ताव मान लेती हूँ और अब धूप को सुना रही हूँ कुछ किस्से कुछ बातें...

'मैं बेहद खुश था. बिना किसी कारण के. जब भी मुझे बहुत ख़ुशी होती, ख़ासकर बिना कारण तो इच्छा जागती कि कैसे इस ख़ुशी को बरकरार रखा जाए. ऐसे में मैं भागकर नदी किनारे चला जाता. पर नदी किनारे ख़ुशी कभी रुकती नहीं थी. नदी अपने साथ हर चीज़ बहा ले जाती थी...'

'दुःख दोस्तों को करीब ले आता है'
'ठीक वक्त पर रो देना भी एक कला है.'
'इस वक़्त तुम्हारे हमारे धर्म से ज्यादा महत्वपूर्ण माँ है.'
'आप कितना ही जान लें उससे कहीं ज्यादा जानना हमेशा बचा रहता है.'
'माँ का कोई नाम हो सकता है यह बात मुझे हमेशा बहुत अजीब लगती थी.'
'एथेंस, रोम, प्राग, पेरिस, न्यूयार्क, वेनिस...मैं हमेशा कंचे खेलते वक़्त अपने सारे कंचों को अलग-अलग नाम दे देता था. अपनी सारी हार के बावजूद प्राग नाम का कंचा हमेशा मेरे पास रह जाता था.'
'मैंने आज तक जीवन में कोई निर्णय नहीं लिया था. मैं दूसरों के निर्णयों के पीछे हो लेता था. मैं किस स्कूल में जाऊं यह माँ का निर्णय था. मेरे बाल कैसे कटने चाहिए यह राजू नाई की उस वक़्त की मनस्थिति पर निर्भर करता था. खाना माँ तय करती थी और पढ़ने में किस विषय में कितनी मेहनत करनी है यह उस विषय के अध्यापक की क्रूरता पर निर्भर करता था. मैं बस धकेल दिया जाता था. और हर धक्के के बाद खुद को जहाँ भी पाता था मुझे वहां ठीक ही लगने लगता था.'

अभी मैंने बस ऐसे ही कुछ टुकड़े धूप को सुनाये...वो कुछ समझ नहीं पा रहा. उसने बस इतना पूछा, तुम्हारे पास भी तो प्राग बचा रहता है न? मैंने पलकें झपकाकर कहा हाँ. शायद पहले कभी मैंने उसे यह बताया होगा.
और? कोहनी टिकाये वो और सुनना चाहता है. मैं उसे कहती हूँ, आज इतना ही...और यह कहकर मैं गज़ल और नायक के बीच चल रहे प्रेमिल क्षणों को छुपा लेती हूँ.
धूप का गुच्छा उठकर लीची के गुच्छों के पास जाकर झूमने लगा है. मेरे हाथों में एक आसमान खुला हुआ है जिसमें नायक अपना होना तलाश रहा है....शायद हम सब भी...

इस सुबह में प्राग जाने की इच्छा का रंग भी घुल गया है. इच्छा का रंग कैसा होता है कभी देखा है तुमने?

Wednesday, June 8, 2022

कहानी- मन और मना के बीच

- प्रतिभा कटियार

जो दिन उगा था वो कोई और था. जो दिन सामने है वो कोई और है और जो दिन चाहे थे वो कोई और ही दिन थे. वो दिन जाने कहाँ होंगे. अभी तो सामने एक दिन है जिसमें समूचा जीवन बिखरा पड़ा है. अच्छा या बुरा जैसा भी. जस का तस. किसी को उम्मीद नहीं थी कि ऐसा होगा. एकदम से. ज़िन्दगी संभलने का मौका तो देती कम से कम. लेकिन वो ज़िन्दगी है, मनमानी करना उसका प्रिय शगल है.

‘शोभा...शोभा...बाहर आजा बिटिया. खुद को अकेले बंद मत कर. हम सब हैं न. बाहर तो आ. तू अकेली नहीं है शोभा’ माँ शोभा का दरवाजा बड़ी देर से खटखटा रही थीं. कमरे के भीतर शोभा सोफे पर बैठी हुई थी. उसे अपने भीतर एक अलग किस्म की अनुभूति हो रही थी जिसे वो किसी के संग बांटना नहीं चाहती थी. जैसे सदियों से तीखी धूप में नंगे पाँव चलते किसी मुसाफिर को छाँव मिली हो कुछ वैसी सी अनुभूति.

‘माँ मैं ठीक हूँ. तुम जाओ. कुछ देर अकेले रहना चाहती हूँ.’ शोभा कहना चाहती थी लेकिन एक भी शब्द बोलने की इच्छा नहीं हो रही थी उसकी. जैसे कितनी मेहनत करनी पड़ेगी बोलने के लिए. ‘आप चलिए मैं आती हूँ.’ बमुश्किल बोला शोभा ने सिर्फ इसलिए कि दरवाजे पर लगातार पड़ती थप थप बंद हो.

वो आँखें मूंदकर लेट गयी. लेटी रही. गाल भीगते रहे उसके. रेंगते हुए आंसू कानों को छूकर निकले तो उसे गुदगुदी हुई. उसने आंसू पोंछे और मुस्कुराई. हालाँकि आँखें लगातार आंसू उगले जा रही थीं. इन्हें लम्बे समय बाद मानो आज़ादी मिली हो. शोभा अपने भीतर रिक्तता महसूस कर रही थी. एक ऐसी रिक्तता जिसकी उसे जाने कबसे तलाश थी. आंसू दुःख नहीं होते, दुःख की परिणिति होते हैं. कभी-कभी सुख की परिणिति भी होते हैं. इस समय ये दुःख की परिणिति हैं या सुख की पता लगाना मुश्किल है. खुद शोभा समझ नहीं पा रही कि वो उदास है या...?

नीचे उसके पति का पार्थिव शरीर रखा है. अभी कुछ घंटों पहले ही देहांत हुआ है. और ऊपर शोभा दुःख और सुख के बीच कहीं झूल रही है. वैसे उसे इतना अंदाजा तो है कि यह दुःख तो नहीं है. उसने देह पर एक हल्कापन जरूर महसूस किया. जब तक बच्चे नहीं आयेंगे यह मातम यूँ ही घर में पसरा रहेगा. वो इसी पल, इस मातम को उठाकर फेंक देना चाहती थी. घर को अपनी पसंद के लाल फूलों से सजाना चाहती थी. उसका मन हुआ धीमी-धीमी आंच पर देसी घी में देर तक, सुनहरी होने तक सूजी को भूने और उसका हलवा बनाये. उसकी नाक में देसी घी में भुनती हुई सूजी की खुशबू भी आने लगी. वह मन ही मन मुस्कुराई यह सोचकर कितने दिन हुए कुछ मन का खाए, यूँ घर की रसोई लगभग रेस्टोरेंट की तरह चलती है लेकिन उसकी भूमिका ऑर्डर के हिसाब से बनाने भर की ही है. बहुत दिन हुए कुछ मन का खाए. बहुत दिन हुए मन का पहने. बहुत दिन हुए कुछ मन का बोले. सोचते-सोचते शोभा को दुःख वाला रोना आ गया. वो फफक-फफक कर रो पड़ी. बहुत दिन हुए वो हंसी नहीं, बहुत दिन हुए उसने सांस नहीं ली. बहुत दिन हुए कि बहुत दिन हुए ही नहीं.
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सिनेमा की रील की तरह स्मृतियाँ रिवाइंड हो रही थीं. हर बात हू-ब-हू. शोभा ने पहली बार महसूस किया कि स्मृतियाँ रंगहीन नहीं होतीं. उनमें रंग भी होते हैं. ‘उनमें रंग होते हैं’ से ‘उनके रंग होते हैं’ यह बात अलग थी. जैसे जब वह अरुण से पहली बार मिली थी की स्मृति में शोभा की पीली साड़ी, अरुण की सफेद शर्ट और धधकती दोपहर का ताप भी शामिल था. जब वो दोनों हनीमून पर कश्मीर गये थे की स्मृति में पेड़ों से संगीत की तरह झरते सुनहरे चिनार के पत्तों का रंग और शिकारे में अरुण का हथेलियों में भरकर डल झील के फेंके गए पानी की स्मृति का गीलापन शामिल था.

उसे अभी अपने गालों से बहते हुए कान और गले तक पहुंचे गीलेपन में डल झील की स्मृति का गीलापन घुलता नजर आया. तब भी अनुभूति सुख की थी, अब भी. तब अरुण के होने का सुख था और अब...? पता नहीं. इस तब और अब के बीच थे जीवन के 26 बरस. इस तब और अब के बीच थे मनु और अम्बिका. इसी तब और अब के बीच था शोभा का लगातार गुम होते-होते खो जाना.

इन 26 बरसों में कितनी बार जी चाहा अलग हो जाए अरुण से लेकिन नहीं हो सकी. कभी खुद की हिम्मत नहीं हुई, कभी बच्चों का ख्याल आ गया और कभी जमाने का. वैसे ज्यादा खुद की हिम्मत न होना ही मुख्य कारण है जिसे जानने के बाद भी मानने का कभी मन न किया शोभा का. एक और बड़ा कारण था किसी मुक्कमल वजह का न होना. वजह जो मुकम्मल तो हो ही, बड़ी भी हो. जो दूसरों को बाद में पहले खुद को कन्विंस करे. यूँ ही तो कोई शादी से अलग नहीं हो जाता. हालाँकि आसान तो तब भी नहीं होता जब मुक्कम्मल और बड़ी वजहें होती हैं लोगों के पास. यहाँ शोभा के पास तो बहुत छोटी-छोटी सी वजहें थीं बेजार होने की. इतनी छोटी कि उन वजहों के चलते अलग होने के ख़याल पर भी न जाने कितनी बार अपराध बोध ने जकड़ा उसे. हालाँकि उन बेहद छोटी दिखने वाली वजहों ने शोभा को भीतर ही भीतर तोड़ना शुरू कर दिया था. इसी उहापोह में साथ साथ 26 बरस बीत गये जिसमें से साथ लगातार कम होता गया. और वो यही सुनती रही सबसे ‘यू आर सो लकी शोभा, योर हजबैंड इज सो हैंडसम यार. ही इज सो केयरिंग. कितना विनम्र है. कितनी मिठास है उसके बोलने में.’ और तो और कामवाली बाई भी बोलकर जाती, ‘भाभी आप बड़ी किस्मत वाली हो. भैया कित्ते अच्छे हैं.’ हर साल शादी की सालगिरह पर पार्टियाँ होती रहीं फेसबुक पर हैपिली मैरिड कपल की तस्वीरें अपलोड होती रहीं.

शोभा जानती है कि अरुण खराब व्यक्ति नहीं था. असल में वो अच्छा व्यक्ति था. शायद इतना अच्छा कि उसकी अच्छाइयों के साए में दम घुटने लगा था शोभा का. वो अच्छाईयां थीं या अच्छाइयों का ओढ़ा हुआ लबादा जिसकी धीरे-धीरे आदत पड़ जाती है जिसमें चुपके से आकर अहंकार भी शामिल हो जाता है. जो यह लबादा लादे होता है कई बार वो खुद भी नहीं जान पाता. हालाँकि अरुण जानता था लेकिन मानता नहीं था. यह ओढ़ा हुआ जमाने भर से छुप सकता है, पत्नी से नहीं. जैसे-जैसे शोभा उन अच्छा होने, दिखने, बने रहने के अहंकार की परतों को खोलती गयी अरुण से दूर होती गयी.

बच्चे भी माँ को ही गलत समझने लगे क्योंकि माँ के पास कोई मुखौटा नहीं था. लगभग हर बात मान जाने वाले पिता सारी फरमाइशें पूरी करने वाले पिता रोकने-टोकने वाली और दिन भर चिड़- चिड़ करने वाली माँ के मुकाबले ‘कूल’ थे.

किसी से प्यार करने की क्या वजह होती है और प्यार न करने की क्या वजह होती है? जिसके बिना एक सांस भी लेना मुश्किल होता है ऐसा क्या हो जाता है कि उसी की उपस्थिति में सांस लेना मुश्किल हो जाता है. ये होने न होने के बीच का खेल था जिसे न शोभा समझ पाई न अरुण. गलत कोई नहीं था फिर भी सही कुछ न हो सका. हालाँकि दिखता सब सही ही रहा.

शायद आसान होता शोभा के लिए अरुण से अलग होना अगर अरुण एक बुरा व्यक्ति होता. मार पीट करता. कहीं अफेयर चला रहा होता. अशोभनीय व्यवहार करता. शराबी जुआरी होता या भरण पोषण के लायक न होता. लेकिन ऐसा कुछ नहीं था. हालाँकि तब भी कितना आसान होता कहना मुश्किल है. अपने आसपास वो तमाम स्त्रियों को देखती है जो तमाम बड़ी वजहों के उपलब्ध होने के बावजूद रोज अपने आत्मसम्मान की धज्जियां उड़ते देखकर भी मुस्कुराती रहती हैं. इनमें कामकाजी और गृहिणी दोनों ही स्त्रियाँ हैं. शोभा सहनशील तो बिलकुल नहीं थी, न उसकी परवरिश में सबकुछ सहकर भी घर जोड़े रखने वाली सलाहियतें थीं. वह कामकाजी और गृहिणी दोनों ही थी. शादी से पहले नौकरी करती थी शादी के बाद भी कुछ साल नौकरी की फिर अम्बिका के जन्म के समय नौकरी से ब्रेक लिया ‘अपनी मर्जी से’ और वो ब्रेक 21 साल लम्बा हो गया.

‘जैसा तुम्हारा मन हो वैसा करो’ को अरुण जुमले की तरह इस्तेमाल करता था. शुरू-शुरू में शोभा को यह बहुत एक्साइटिंग लगता था लेकिन धीरे-धीरे उसे समझ में आने लगा कि असल में ‘जैसा तुम्हारा मन हो वैसा करो...’ सिर्फ एक जुमला है. इसमें अरुण का मन ही शामिल है. शायद पति का मन ही पत्नी का मन होना चाहिए लेकिन शोभा इसे समझ नहीं सकी. वो अपने मन को भी बचाए रही और अरुण के मन को भी सहेजने का प्रयास करने लगी. लेकिन अरुण ने समझा दिया कि मन तो एक ही रहता है घर में चेहरे जरूर उसके दो होते हैं. शुरू-शुरू में इस बात पर प्यार आया करता था और फिल्मों के तमाम रोमैन्टिक सीन और गाने याद आया करते थे लेकिन धीरे-धीरे इसका दर्द उभरने लगा. शोभा समझ गयी थी कि अरुण के दो चेहरे हैं लेकिन दूसरा चेहरा सिर्फ शोभा को पता था. केयरिंग, लविंग, सॉफ्ट स्पीकिंग के पीछे एक डिक्टेटर का चेहरा. ‘जैसा तुम्हारा मन हो वैसा करो’ के पीछे अपने मन को थोपने वाला चेहरा.

अरुण सबका ख़याल रखने के लिए ही जाना जाता था. ऑफिस, परिवार, दोस्त, मोहल्ले वाले सब उसके केयरिंग होने के मुरीद थे. हर किसी के पास अरुण से मिली किसी मदद का कोई न कोई किस्सा था. फिर शोभा को क्या परेशानी थी? यही बात समझते-समझते 26 बरस बीत गये. वो खुद को अरुण की ज़िन्दगी में किसी कठपुतली जैसा पाती थी. सजी-धजी मुस्कुराती गुड़िया. जिस पर हमेशा इस बात का बोझ था कि कितनी किस्मत वाली है, कितना अच्छा पति मिला है उसे. यूँ कोई परेशानी थी भी नहीं, न किसी चीज़ की कमी थी बस हर वक़्त जैसे किसी सुनहरी जेल में होने जैसा एहसास होने लगा था. अरुण ने शोभा को एटीएम कार्ड दे रखे थे लेकिन उसके नोटिफिकेशन अरुण के पास जाते थे ठीक वैसे ही जैसे उसकी सांस लेने का भी नोटिफिकेशन अरुण के पास जाता हो. वो घबरा जाती कि आज शाम हिसाब में बताना पड़ेगा कि दो ज्यादा साँसे कहाँ खर्च कर दीं.

प्यार का रिश्ता कब डर का रिश्ता बना शोभा भी नहीं जान पायी. जब जानी तो इतना ही कि उसे घुटन होने लगी है. मायके जाओ तो वहां भी अरुण की तारीफों के किस्से. मम्मी तो एकदम फैन थीं अरुण की. उन्होंने कभी नहीं पूछा शोभा तू ठीक है न? हमेशा यही कहा क्या खूब भाग पाया है तूने.
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‘शोभा, शोभा बाहर आ जाओ बिटिया...सब तुझे पूछ रहे हैं. पंडित जी भी आ गए हैं.’ माँ फिर से दरवाजे पर थप थप करने लगी थीं. ‘मैं नहीं आऊंगी माँ.’ शोभा ने थोड़ी दृढ़ता के साथ कहा तो माँ का चौंकना लाज़िमी था. इस चौंकने में गुस्सा भी शामिल था ही. शोभा को तुरंत लग गया उसे कहना चाहिए था ‘नहीं आ पाऊंगी’ दृढ़ता से नहीं निरीहता से. तब शायद वो समझ पातीं. शायद स्पेस भी देतीं. ‘नहीं आऊंगी’ और ‘नहीं आ पाऊंगी’ के बीच पूरा सामाजिक अहंकार बसता है. लोग निरीहता थामने को तैयार बैठे रहते हैं लेकिन स्वाभिमान उन्हें सहन नहीं होता, आत्मविश्वास उनसे झेला नहीं जाता. यूँ तो किसी का भी लेकिन स्त्रियों का खासकर.

माँ भड़क चुकी थीं. पापा को बुला लिया था. ‘दिमाग खराब है इस लड़की का. पति मर गया है और इसे अपनी अलग ही पड़ी है.’ माँ बड़बड़ कर रही थीं. पापा माँ को समझा रहे थे, ‘सदमा लगा होगा उसे. कैसे देखेगी ये सब. समझो उसकी बात को. उसे अकेले छोड़ दो न’ पापा ने समझाने की कोशिश तो की लेकिन वो जानते थे कोशिश को बेकार ही जाना है. ‘छोड़ दो? अरे मैं क्या उसे कुछ करने को कह रही हूँ. बाहर आकर बैठ जाए बस. आने-जाने वाले सब उसे ही पूछ रहे हैं.’ माँ के सामने लोगों का पूछना एक विशाल पहाड़ बना खड़ा था. ‘उनसे कह दो कि सदमे से उसकी तबियत बिगड़ गयी’ पापा ने माँ को सुझाया. माँ को आइडिया ठीक लगा. वो चली गयीं. शोभा ने राहत की सांस ली और पापा को मन ही मन थैंक्यू बोला.
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शोभा को लगा उसके बदन पर जाने कितनी थकान चढ़ी है. वो नहाने चली गयी. उस दिन वो बहुत देर तक नहाती रही. नहाते हुए उसके कानों ने उसे गुनगुनाते हुए सुना. कितने अरसे बाद. कितना मीठा गाती थी वो. अरुण को उसका गाना इतना पसंद था कि जब भी दोस्तों की किसी महफिल में जाते शोभा से गाने को जरूर कहते या घर में कोई पार्टी या गेट टू गेदर हो तो भी. ‘साँसों की माला में सिमरूं मैं पी का नाम.’ शोभा का फेवरेट गाना था. वो गाते-गाते मुस्कुराकर जब अरुण की तरफ देखती तो अरुण के कंधे चौड़े हो जाते. उसमें गुरूर सा आ जाता.

धीरे-धीरे शोभा को लगने लगा कि उसका गाना अरुण के कंधे पर लगे स्टार्स को बढ़ाता है. उसे लगने लगा उसके पास ‘नो’ की कोई स्पेस है ही नहीं. मन नहीं, तबियत ठीक नहीं जैसी बातें महत्वहीन थीं. मनाने के सब तरीके आते थे अरुण को. लाड़, दुलार, रूठना, गुस्सा करना. शोभा का मन इन्हीं के बीच लगातार अपनी स्पेस खोता गया.

शोभा की बागडोर अरुण ने मजबूती से थाम रखी थी. इस बागडोर की जकड़ ऐसी थी कि इसकी जद में ज़िन्दगी का छोटे से छोटा लम्हा आता था. थोड़ी कमी-बेसी की कोई रियायत ही न हो जैसे. एक रोज एक पार्टी से आकर जब अरुण ने गुस्से में कहा, ‘तुम थोड़ा फ्रेश और चियरफुल नहीं लग सकती थीं. कैसी फूहड़ जैसी दिख रही थीं. और कितना खाना था तुम्हारी प्लेट में. कितनी बार बता चुका हूँ डीसेंट लोगों की प्लेट ठुंसी नहीं दिखती पार्टी में. भुख्खड़ की तरह टूट नहीं पड़ते हैं.’ अरुण की ‘बात’ ज्यादा अपमानजनक थी या ‘तरीका’ पता नहीं लेकिन शोभा रो दी थी. ‘मैंने कहा था मुझे मत ले जाओ आज पार्टी में. फीवर था सुबह से कैसे लगती फ्रेश और चियरफुल. और बुखार उतरा था तो मेरा मन कुछ तीखा खाने का हो रहा था भूख भी लगी थी.’ कहते-कहते शोभा जोर से रो पड़ी. ’मैंने सुबह से कुछ नहीं खाया था.’ उसने अरुण की ओर देखते हुए कहा.

‘अरे यार अब रोओ मत. देखो थोड़ी देर की तो बात थी. घर आकर खा लेती. अच्छा नहीं लगता यार. मैं नहीं चाहता कोई तुम्हें रत्ती भर भी कम आंके. मेरी वाइफ बेस्ट है.’ कहते-कहते अरुण का कन्धा तन गया, माथा चौड़ा हो गया. ‘एंड आई लव यू. यू नो दैट’ कहते हुए अरुण ने शोभा को चूम लिया. रोती हुए शोभा मुस्कुरा दी.

शोभा तो क्या दुनिया की कोई स्त्री कभी नहीं समझ पायी कि उसकी दासता की बेड़ियाँ प्यार के नाम पर सबसे ज्यादा कसी गयीं. तारीफें, सुन्दरता, गुणों की नुमाइश. ‘इतना प्यार तो करते हैं इनके लिए कुछ भी’ वाले भाव में निहाल होती स्त्रियों के चेहरे पर अवसाद की काली लकीरें खिंचने लगती हैं उन्हें खुद भी पता नहीं चलता. और एक दिन उन्हें पता चलता है कि प्रेम को भी शस्त्र की तरह इस्तेमाल करते हैं पति. बहुत सारी स्त्रियों को तो ज़िन्दगी भर पता नहीं चलता.
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नहाकर निकली तो देर तक खुद को आईने में देखती रही शोभा. उम्र की कितनी लकीरें उभर आई हैं चेहरे पर, बालों पर. इन लकीरों को आज़ाद छोड़ना सुखद है.

दोस्त, रिश्तेदार, ऑफिस के लोग, पड़ोसी सब जमा हो चुके थे. पूरा हॉल भरा था. यह हादसा इतना अचानक हुआ था कि कोई यक़ीन ही नहीं कर पा रहा था.

हालाँकि हर हादसा अचानक ही तो होता है. अरुण सुबह बाकायदा ऑफिस के लिए निकला. ऑफिस पहुंचकर कुछ फोन किये, एक मीटिंग की, कुछ फाइलें निपटाई. सुरेश को कॉफ़ी के लिए बोला. सुरेश कॉफ़ी लेकर लौटा तो सब खत्म हो चुका था. हॉस्पिटल ले जाया गया लेकिन वहां जो पहुंचा वो अरुण था ही नहीं अरुण की बॉडी थी. इंसान से बॉडी बनने में बस चंद साँसों का फासला ही तो है. पहला हार्ट अटैक था और पहला ही आखिरी हो गया. 51 साल की युवा उम्र में अरुण झटके से चला गया. वो हर काम में नफासत पसंद था और मरा भी नफासत से.

शाम होते-होते बच्चे आ गए तो शोभा कमरे से बाहर निकली. मनु और अम्बिका को गले लगाते हुए शोभा ने महसूस किया उसे बिलकुल रोना ही नहीं आ रहा है. बस फ़िक्र हो रही है कि सब काम निपट जाए जल्दी से. सब लोग चूंकि पहुँच गए थे तो शाम 6 बजे ही क्रियाकर्म के लिए अरुण को ले जाया जाना था. ‘मनु अभी छोटा है’ कहकर शोभा ने अंतिम संस्कार के लिए देवर रवि को कह दिया. जैसे ही शोभा ने रवि को कहा कि ‘तुम ही कर देना सारे काम’, रवि चौंका. उससे ज्यादा चौंकी माँ. शोभा ने महसूस किया कि चौंके तो वहां मौजूद सारे ही लोग हैं सिवाय मनु के. और कौन किससे ज्यादा चौंका यह अंदाजा लगाना फ़िलहाल मुश्किल था. लेकिन सास की भूमिका में माँ उतरी हुई थीं. सासू माँ चुपचाप कोने में बैठी सुबक रही थीं लेकिन माँ ने मोर्चा खोला हुआ था. ‘ऐसा कैसे. ऐसा थोड़े ही होता है. इसी दिन के लिए तो पुत्र होता है. अंतिम विधि तो मनु ही करेगा.’ पापा ने माँ को समझाना चाहा ‘कैसे करेगा वो, छोटा बच्चा है.’ तो माँ के तुणीर से एक-एक कर स्मृतियों के बाण निकलने लगे, ‘मेहता जी की डेथ हुई तो उनका बेटा 12 साल का, उसने ही तो किया था सब काम. और अपने पड़ोसी शर्मा जी जिनकी एक्सीडेंट में डेथ हुई उनका बेटा तो सिर्फ 3 साल का था लेकिन उसी से कराया गया क्रियाकर्म. बेटा होता ही इस दिन के लिए है.’ शोभा की माँ बोले जा रही थीं. मनु नानी की बात सुनकर समझने की कोशिश में नाकाम हो रहा था क्योंकि वो पापा की मृत्यु के सदमे से ही उबर नहीं पा रहा था. हालाँकि सदमा शब्द का अर्थ उसे ठीक-ठीक पता नहीं था. शोभा सोच रही थी ये सच में उसकी माँ हैं, इनकी हरकतें तो माँ वाली लग नहीं रहीं. उनके कहे में मिसेज अग्रवाल भी टपक पड़ीं, ‘अरे भाभी जी, दूर क्या जाना हमारे तो खुद के घर में इनकी बहन के देवर की डेथ हुई तो उसका बेटा गोद में था लेकिन उसी से कराया गया क्रियाकर्म.’ शोभा सबकी बातें सुनते हुए मनु को और अपनी सास को देख रही थी. न सास ने कुछ कहा न मनु ने. दोनों सुबकने के कर्म को जारी रखने की मशक्कत कर रहे थे. जब बीच में सुबकना रुक जाता तो जैसे उन्हें अपराधबोध होता और वो और तेज़ से सुबकने लगते. शोभा को हंसी सी आने लगी. उसने बमुश्किल अपनी हंसी को रोकते हुए माँ की और मिसेज अग्रवाल की बातों को बीच में ही रोकते हुए कहा, ‘किया होगा. लेकिन मेरा बेटा नहीं करेगा.’ शोभा जानती थी यह चर्चा चल गयी तो चलती ही जायेगी.

रवि ने कहा, ‘लेकिन भाभी?’ ‘तुझे भी कोई दिक्कत है क्या?’ शोभा ने रवि को लगभग डपटते हुए कहा. अम्बिका जो यह सब सुन रही थी बोली, ‘मम्मा मैं तो छोटी नहीं हूँ मैं कर सकती हूँ क्या?’ अम्बिका ने सुबकते हुए कहा तो शोभा की देर से सूखी आँखों में बदलियाँ तैर गयीं. वो अब तक मनु को चिपकाये खड़ी थी उसने बढ़कर अम्बिका को बाँहों में भींच लिया. उसने दृढ़ता से कहा, ‘नहीं तेरे रवि चाचा ही करेंगे और अब इसमें कोई बहस नहीं होगी. अगर तेरी दादी को कोई दिक्कत हो तो और बात है.’ उसने सासू माँ की और देखते हुए कहा. सासू माँ ने सर हिलाते हुए मौन में ही जवाब दिया कि उन्हें कोई दिक्कत नहीं. अरुण की माँ की स्वीकृति मिलते ही बात खत्म हो गयी.

इधर अरुण की देह घर से गयी, उधर घर में रुदाली का भूचाल सा आया. शोभा ने देखा वो लोग ज्यादा जोर से रो रहे थे जिन्हें अरुण से ज्यादा कोई निस्बत भी नहीं थी. उसने बच्चों को अपनी बाँहों में कस लिया. 3 साल से हॉस्टल में रह रहा है मनु. पांचवीं के बाद ही भेज दिया था अरुण ने. अम्बिका को भी भेज दिया था. बच्चे पास रहे ही नहीं ज्यादा. मनु को गले लगाते हुए शोभा को जोर का रोना आया. वो रोना पहली बार मनु के हॉस्टल जाने की याद को याद करके आया था. कैसे गैया से बछड़े को अलग किया था अरुण ने. न बच्चा जाना चाहता था, न माँ भेजना चाहती थी लेकिन पापा ने बेस्ट स्कूलिंग के नाम पर भेज दिया बोर्डिंग स्कूल. उसने रोते-रोते ही मन में सोचा अब बच्चों को यहीं अपने पास बुला लेगी.

उसे यह सोचकर ही इतनी राहत हुई कि अगर उसने यह सोचा है तो वो अब कर भी सकती है कोई परमिशन नहीं लेनी किसी की, कोई मना नहीं करेगा अब उसे. मन और मना के बीच का फासला मिट गया सा लगा शोभा को.

Monday, June 6, 2022

शर्ट का तीसरा बटन



प्रशंसक की तरह नहीं एक सामान्य पाठक की तरह किताब को उठाती हूँ. किताब लिखने वाला दोस्त हो तो भी मैं किताब को ऐसे उठाती हूँ जैसे मैं लेखक को नहीं जानती. इससे पढ़ने का स्वाद अलग सा महसूस होता है.

इस बार भी मैंने इसी तरह किताब उठाई. 'शर्ट का तीसरा बटन' और इतवार की सुबह की तीसरी चाय के साथ भूमिका पर खुद को टिका दिया. आधा घंटा बीत चुका है. चाय खत्म हुए देर हो गयी है. धूप की चहलकदमी की रफ्तार कम हो गयी है वो अब ऊंघने लगी है पेड़ों पर.

मैं 'अतीत' और 'चित्रलेखा' के साथ वहीं अटकी हूँ. वही अपराध और दंड को सिरहाने टिकाये सोच रही हूँ कि किस तरह अतीत से निकलकर चित्रलेखा सामने आ खड़ी हुई है. मेरे सब दोस्त जानते हैं कि चित्रलेखा मुझे किस कदर पसंद है खासकर वो भरी सभा में कुमारगिरी के साथ शास्त्रार्थ करने वाला दृश्य. सच कहूँ लगता है चित्रलेखा की मेरे भीतर होने वाले बदलावों में बड़ी भूमिका है. आज सुबह मानव के उपन्यास में फिर से अतीत के संग चित्रलेखा का सामने आना कोई इत्तिफाक नहीं है...

पढ़ने में हड़बड़ी करना मुझे पसंद नहीं, इसलिए अभी कुछ समय भूमिका को चुभला रही हूँ.
रस्कोलोविच सोच रहे हैं कोई मुझे खत भेज भी दो...और मैं सोच रही हूँ कि अतीत को ख़त लिखूं...

चाय फिर से चढ़ा दी है, उधर धूप चढ़ रही है..

कुछ दिन 'शर्ट का तीसरा बटन' के संग गुजरने वाले हैं. और उसके बाद 'रूह' तो है ही...

Sunday, June 5, 2022

जीवन की लय साधते प्रेम पत्र


- प्रतिभा कटियार

‘तेरी खुशबू में बसे ख़त मैं जलाता कैसे...’ ये गज़ल किशोर वय के दिनों से दिल के करीब रही. शायद पत्रों से मोहब्बत होने की वजह भी बनी हो. मुझे पत्र लिखने का खूब शौक था.

मैंने छुटपन से खूब खत लिखे. स्कूल के दिनों में जब कोई दोस्त एब्सेंट होती तो उसके लिए पत्र लिखती और उसके आसपास रहने वाले के जरिये उस तक पहुंचाती. फिर यह सिलसिला इस तरह चला कि मुझे भी दोस्तों ने खूब पत्र लिखे. स्कूल से कभी-कभी इसलिए भी नागा कर लेती कि छुट्टी में ढेर सारे पत्र मिलेंगे दोस्तों के. फिर डाकबाबू के दिन आये. हंस, उत्तर प्रदेश और अखबारों में कुछ कहानियां छपने लगीं जिनमें पता भी होता था. उस पते पर न जाने कहाँ-कहाँ से पत्र आने लगे. अनजाने लोगों के पत्र, अपनेपन की रौशनी से भरे पत्र. एक पत्र तिहाड़ जेल से एक कैदी का भी आया था. अज़ीज़ दोस्त ज्योति जब शादी के बाद बंगलौर गयी तब खूब पत्र लिखे. अन्तरदेशी में कहाँ समाती हमारी बातें. हम तो खर्रे लिखा करते थे.

मेरे पत्र मित्र जिन्हें पेन फ्रेंड कहते हैं लोग भी बने कुछ. लेकिन सबसे लम्बा सिलसिला चला कवि मित्र बसंत त्रिपाठी के संग. मुझे किसी की कोई रचना अच्छी लगती तो मैं उसे पत्र लिखती. मैंने ममता कालिया जी को पत्र लिखा, गुलज़ार को पत्र लिखा, नासिरा शर्मा जी को पत्र लिखा, कुलदीप नैयर को पत्र लिखा. मजे की बात यह हुई कि सबके जवाब आये. अगर किसी पत्र का जवाब कभी नहीं आया तो वो महबूब को लिखे पत्रों का. जाने उसने पढ़े भी या नहीं.

मैंने अपने प्रिय लेखकों के पत्रों को ढूंढ-ढूंढकर पढ़ा. हमेशा दिलचस्पी रही कि दो दोस्तों की, दो प्रेमियों की, माँ बेटे की, पिता पुत्री की पत्र में क्या बातें होती होंगी. वो जब अनौपचारिक ढंग से एक-दूसरे को पत्र लिखते हैं तब वो कितने सहज होते हैं. पत्र से मेरा जो लगाव हुआ उसके चलते मैंने दुनिया के मशहूर प्रेम पत्रों को अनुवाद भी किया.

फिर इंटरनेट का ज़माना आ गया और कागज की जगह ले ली मेलबॉक्स ने. मेल से भी खूब पत्र लिखे. न जाने कितने पत्र तो ड्राफ्ट में अब भी मौजूद हैं. लिखने की सहजता डायरी और पत्र ने मुझे खूब दी. डायरी लिखते हुए लगा यह मेरी दुनिया है, और पत्र लिखते समय उस दुनिया कोई एक प्रिय उस दुनिया में शामिल हो गया. डायरी और पत्र दोनों गोपन चीज़ें हैं, मैं विधा के नहीं अभिव्यक्ति के तौर पर देखती हूँ इन्हें. कोई बाधा नहीं, कोई नियम नहीं कोई जज किये जाने का जोखिम भी नहीं.

अच्छा समय हुआ तो पत्र लिखे, बुरा समय हुआ तो भी पत्र ही लिखे. जिसे पत्र लिखे उसके सामने होना अभिव्यक्ति में बाधा ही लगा. कल्पना ही सच है की तर्ज पर अगर देखूं तो पत्रों ने मुझे मेरे माफिक वो जगह दी जहाँ मैं अपनी तरह से जी सकूं, साँस ले सकूँ. प्रेमी का शुक्रिया कि उसने मेरे पत्रों का जवाब कभी न देकर पत्र के जवाब में लिखे गए पत्रों के इंतज़ार से बचा लिया और पत्र मेरे लिए और गहन हो गये. मेरे खुलने की जगह, मेरी साँस लेने की जगह बन गये.

जब कोरोना ने पाँव पसारे और बाहर सब कुछ बंद हो गया तब मन की बेचैनी ने एक बार फिर पत्र लिखने की तरफ मोड़ा. मैंने पूरे लाकडाउन हर रोज पत्र लिखे. ये किसी को भेजे नहीं गए बस लिखे गए. क्यों लिखे गए ये कोई पूछे तो एक ही जवाब है मेरे पास कि न लिखती तो जी न पाती शायद. हर रोज सुबह अपनी हिम्मत को सहेजते हुए ज़िन्दगी पर भरोसे को सहेजते हुए चाय की प्यालियों के बीच मैं लगातार पत्र लिख रही थी. जैसे कोई बैठा हो इबादत में कि ‘सब ठीक हो...सब ठीक हों...’ यही धुन रहती थी लिखने के दौरान. जैसे कोई मन्त्र जप रही हूँ. प्रकृति और प्रेम के भरोसे मैं लगातार ज़िन्दगी में आस्था बनाये रखने की कोशिश में लगी रही. कई विचलन आये लेकिन हर विचलन के समय मैं लिखती रही.

किसे लिखे गए ये पत्र के जवाब इन पत्रों में ही हैं. कई बार लगा ये सब खुद के ही लिखे हैं कि प्रेमी मुझसे अलग है भी कहाँ. कई बार लगा सारे जमाने के प्रेमियों को सारे जमाने की प्रेमिकाओं की तरफ से लिख रही हूँ और कभी लगा मैं लिख कहाँ रही हूँ मैं तो सांस ले रही...इतनी सी बात है इन कठिन दिनों के प्रेम पत्रों की बाबत.

कब तक दिल की खैर मनाएं...


जीवन अक्सर अल्फाज़ों के पार जाकर बैठ जाता है. टुकुर-टुकुर देखता है. मुस्कुराता है. हम उसकी मुस्कुराहट के आकर्षण में खिंचते चले जाते हैं और डरते, सहमते, हिचकते हुए जीवन की ओर हाथ बढ़ा देते हैं. और वो आगे बढ़ जाता है. हमारे खाली हाथ उदास आँखें जीवन को फिर भी उम्मीद से देखते हैं.

उम्मीद है कि टूटती नहीं. शायद इसीलिए उसका नाम उम्मीद है. उम्मीद एक नशा है, हम बेख्याली में भी इस नशे की ज़द से निकलना नहीं चाहते. ये नशा मुश्किल से मुश्किल दौर में हाथ थामे रहता है. उसी नशे की ज़द में एक रोज फिर से जीवन की ओर हाथ बढ़ा बैठी...और इस बार वो उठकर चल नहीं दिया. रुका रहा. उसके कंधे को छुआ तो मेरे भीतर कोई झरना फूट पड़ा...तर-ब-तर हो उठी. 

'जीवन और मैं' हम दोनों दोस्त हैं. लेकिन हमारी अक्सर बनती नहीं. जीवन अपनी मस्ती में रहता है, उसकी अपनी चाल है, अपना ढब. और मैंने अब अपना ढब अख्तियार कर लिया है. मैं उसकी चाल के साथ अपनी चाल नहीं मिलाती. वो मगरूर है तो कम तो मैं भी नहीं. हम नदी के दो किनारों की तरह साथ चलते हैं. जीने की इच्छा का पानी हम दोनों को जोड़े रहता है.

उस रोज जीवन का कंधा छुआ तो वो सरककर करीब आ गया. मेरी आँखों में ख़ुशी से ज्यादा हैरत थी. 'तुम हो? सचमुच क्या तुम ही हो?' जीवन ने पलकें झपकाईं और बोला, 'मैं कब नहीं था' अब रूठने की बारी मेरी थी. 'तुम थे तो अब तक कहाँ थे, 'यहीं तुम्हारे भीतर. पर तुमने मुझे पुकारा ही नहीं.' जीवन ने यह कहते हुए कशिश की सिगरेट सुलगा ली थी.

'क्यों पुकारूँ, तुम जीवन हो तो मैं भी जीने की इच्छा से भरी लड़की हूँ. मुझे तुम्हारी चाह है तो तुम्हें भी तो चाह होगी न मेरी?' मगरूर आँखों में शरारत खिलने लगी थी. जीवन ने पीठ पर हौले से धप्पा दिया और बोला, 'तभी तो हूँ तुम्हारे पास.' हम दोनों ने एक-दूसरे को देखा और ठठाकर हंस दिए. इतनी तेज़ कि हंसी के बगूलों में धरती डूबने लगी. बादल हंसी के बगूलों में डूबती धरती को देखने चले आये.  बरसने वाले बादल. हम हंसते रहे, बादल बरसते रहे, हम भीगते रहे.

उस रोज जीवन और मैं एक साथ एक ही कप से आइसक्रीम खा रहे थे और साथ घर लौट रहे थे...अली सेठी रिपीट में फैज़ अहमद फैज़ की गज़ल गाये जा रहे थे...कब तक दिल की खैर मनाएं...

पीले अमलतास सर पर झर रहे थे झर झर झर...

Friday, June 3, 2022

नीला गुलमोहर और प्रेम


अभी-अभी डाकिया रख गया है एक पत्र
देहरी पर
जिसके भीतर लहरा रहा है
आशाओं का संसार
जिसे छूते घबरा रही है लड़की
मुस्कुरा रही है दूर से देखकर ही

अभी-अभी अम्मा ने सांकल खोली है
तमाम नियम कायदों की
वो निकल गयी हैं घर से बहुत दूर
देर रात
उन्हें बाद मुद्दत सांस आई हो जैसे

अभी-अभी ज़िन्दगी की कुम्हलाई शाख पर
उम्मीद की कोंपलें फूटने की आहट हुई
प्रेमासिक्त कबूतर के जोड़े ने 
देखा एक-दूसरे को
और मूँद ली हैं आँखें

अभी-अभी नन्हे ने किलक के उंगली बढ़ाई है
गुस्से से भरे उस अजनबी की ओर
जिसकी आँखों में कुछ देर पहले
उतरा रही थी हिंसा
अब उस अजनबी की आँख में 
उतरा रही है एक नदी 

अभी-अभी शाख से टूटकर गिरा है
नीला गुलमोहर  
प्रेमी जोड़े के कंधे पर 
रास्तों ने मुस्कुराकर कर देखा उन्हें
एक बदली घिर आई है आसमान पर

अभी-अभी तुमने मेरी हथेलियों को चूमा है
और देखो धरती प्रेम से भर उठी है...