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Thursday, April 16, 2026

अप्रैल उम्मीद है


वो जो खिलखिला रहे हैं मोगरे इन दिनों
ये अप्रैल की आहट है
ये जो सारे दरवाजे खिड़की भेदकर 
चली आती है रातरानी की ख़ुशबू 
ये अप्रैल का दीवानापन है 
ये जो आँखों से निकल भागे हैं ख़्वाब 
मटरगश्ती करते फिर रहे हैं यहाँ से वहाँ 
ये अप्रैल की शरारत है 
ये जो समन्दर की लहरों को 
अंजुरियों में समेट लेने को व्याकुल है एक लड़की 
ये अप्रैल पर भरोसा है 
ये उड़ते हुए सेमल के फाहे 
आ बैठे हैं काँधों पर 
ये अप्रैल से उम्मीद है 

Saturday, February 28, 2026

हम दोनों प्यार में थे




अज़ान की आवाज़ के साथ मैंने 
पार किया रास्ता 
प्रार्थना की पंक्तियों के साथ 
तुम आगे बढ़े 

हम मिले गिरजे की उन सीढ़ियों पर 
जहां न जाने कितने नाउम्मीद
लोगों के कदमों के निशान थे 
कितनी उदासियों का ठौर था 
कितने कनफेशन सर झुकाये बैठे थे 

हमने एक दूसरे को थामने से पहले 
उन तमाम नाउम्मीदियों को थामा 
हमने एक दूसरे को चूमने से पहले 
उन सीढ़ियों को चूमा 

उतरते दिन की रोशनी 
ने हम दोनों को ढँक लिया था। 

हम दोनों सजदे में थे 
हम दोनों प्यार में थे।  


Friday, August 1, 2025

टूटन



टूटी हुई नींद
चिड़िया का टूटा पंख है
जिसके किनारे 
टूटन के दुःख से सने हैं.

- प्रतिभा कटियार 



Wednesday, July 23, 2025

ये औरतें भी न, गज़ब हैं


स्टोव और सिलेन्डर फट चुकने के बाद 
सल्फास की गोलियों के ख़त्म होने के बाद 
अब औरतें तालाब में डुबोकर मारी जा रही हैं 
ठंडी रोटी परोसने पर कूटी जा रही हैं 
छत से सामान की तरह फेंकी जा रही हैं 
कई टुकड़ों में फ्रिज में रखी जा रही हैं 
धीरे-धीरे ठिकाने लगाई जा रहीं 

ओवन में ठूँसी जा रही हैं 
सड़कों पर घसीटी जा रही हैं 
घरों में कूची जा रही हैं 
डॉक्टर हों या कोमा में पड़ी मरीज 
6 महीने की नवजात हो 
या 70 बरस की दादी 
वे बस नोची जा रही हैं 

घर, सड़क, स्कूल, दफ़्तर   
हर जगह कई दर्जन निगाहें उनकी देह के 
हर हिस्से को खंगाल रहे हैं 

वे गर्भ में जिंदा बच जाने से लेकर 
जीवन के हर मोड़ पर 
शुक्रगुजार होना सीख रहीं 

शुक्रगुजार कि वे अब तक जिंदा हैं 
तो क्या हुआ कि उनके सपने मार दिये गए 

वे हर पल ठगी जा रही हैं 
फिर भी वे न प्यार करना छोड़ पा रही 
न भरोसा करना 

और एक आप हैं...?

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मरने से पहले 

मरने से पहले स्त्री के ज़ेहन में 
घूमता है पति का ख़्याल 
बच्चों की फिक्र 
घर के काम 
कुछ हिसाब जो अधूरे रह गए 
कुछ बिल जो पेंडिंग रहे 
कुछ वादे जो पूरे न हो सके 
कुछ पल जो कभी जी न सके 

मरने से पहले स्त्री सबको माफ करती है 
वो अपनी मौत का जिम्मेदार खुद को चुनती है
और पति के उज्ज्वल भविष्य की कामना करती है।  

मरने से पहले पुरुष को 
याद आते हैं पत्नी के सारे ऐब 
वो अपनी मौत से लेना चाहता है 
प्रतिशोध 
उसके ज़ेहन में नहीं आता 
बच्चे का ख़्याल 
न माँ-बाप की चिंता 
न घर के काम 
उसके ज़ेहन में आता है सिर्फ प्रतिशोध 
वो अपनी मौत को शस्त्र की तरह 
उपयोग में लाता है 
और गुहार लगता है पत्नी के लिए
कड़ी से कड़ी सजा की 

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Thursday, March 27, 2025

जब उदास होती हूँ


जब उदास होती हूँ
किसी नदी का हाथ थाम लेती हूँ
  
जब फफक कर रो पड़ने को होती हूँ 
किसी पेड़ को गले लगा लेती हूँ 

जब अन्याय की पराकाष्ठा होती है 
और मूर्खतापूर्ण बहसों का दौर शुरू होता है 
किसी मजदूर के पास बैठकर 
उसकी बीड़ी साझा करती हूँ।  

जब दुनिया नाउम्मीदी से भरने को होती है 
किसानों के साथ मिलकर 
उम्मीद के बीज बोने लगती हूँ 

जब नायक की विद्रूप हंसी भयभीत करती है 
बेहतर दुनिया के सपने देखने लगती हूँ 

जानती हूँ मेरे अकेले के बस का नही 
इस दुनिया को जीने लायक बना पाना 
फिर भी स्त्री हूँ, हार कैसे मानूँगी
इसलिए अपने हिस्से के काम 
और सुभीते से करने लगती हूँ...

Friday, June 21, 2024

बहुत दिन हुए


बहुत दिन हुए 
किसी झरे हुए पत्ते को
हथेली पर रखकर
देर तक निहारा नहीं

बहुत दिन हुए
किसी सूखी नदी से नहीं सुना
पानी की स्मृति का गीत

बहुत दिन हुए
किसी सपने से टकराकर
चोट नहीं खाई

बहुत दिन हुए 
किसी ने दिल नहीं तोड़ा 
कोई छोड़कर गया नहीं 

बहुत दिन हुए 
किसी कविता ने माथा नहीं सहलाया 
गले से नहीं लगाया 

बहुत दिन हुए कोई दुख
बगलगीर होकर गुजरा नहीं

कितना सूना है जीवन
बहुत दिनों से....

Friday, March 1, 2024

अपनेपन की रोशनी


सांत्वना और सहानुभूति के शब्दों की हथेलियाँ
खाली ही मिलीं हमेशा की तरह
उनके चेहरे पर अपनेपन का आवरण था
उनके दुख जताते शब्दों में
छुपा था एक मीठा सा सुख भी

अक्सर वे कंधे ही सबसे कमजोर मिले
जिन्होंने कंधा बनने की खूब प्रैक्टिस की थी
और जिन्हें अब तक नहीं मिला था मौका
अपनी प्रतिभा दिखाने का

'सब ठीक हो जायेगा' की अर्थहीनता
किर्रर्रर्रर्र की आवाज़ की तरह
कानों को चुभ रही थी

'मैं हूँ न, परेशान न हो' कहकर जो गए
वो कभी लौटे नहीं फिर

इन सबके बीच
कुछ निशब्द हथेलियाँ
हाथों को थामे चुपचाप बैठी रहीं

अंधेरा घना था लेकिन
अपनेपन की रोशनी भी कम नहीं थी।

Saturday, October 21, 2023

अक्टूबर महक रहा है


हथेलियों पर
रखे हरसिंगार के नीचे
धीमे से
बिना कोई हलचल किए
उग रही हैं नयी लकीरें

धूप की नर्म कलियाँ
खिलखिलाकर झर रही हैं
काँधों पर
अक्टूबर महक रहा है।

Wednesday, July 26, 2023

चुंबन


जब तुमने पहली बार चूमा था
अज़ान की आवाज़ पिघल रही थी कानों में
गौरेया का जोड़ा थोड़ा करीब सरक आया था
दिन कहीं गया नहीं था
लेकिन शाम की दहलीज पर
रात खड़ी मुस्कुरा रही थी
एक नन्हे बच्चे ने
अपनी गुल्लक खनखनाई थी
मेरी ज़िंदगी की खाली पड़ी गुल्लक में
एक चमकता सिक्का गिरने की
आवाज़ आई थी
खाली पड़ी शाखों पर
अंखुएँ फूटने की आहट हुई थी
धरती उम्मीद से भर उठी थी
कि तुमने सिर्फ एक स्त्री को नहीं चूमा था
तुमने सहेजा था एक स्त्री का भरोसा
मेरे माथे पर तुम्हारा चुंबन
सूरज सा जगमगाता है
मेरी देह से तुम्हारी देह की
खुशबू कभी झरती नहीं...

Wednesday, July 12, 2023

प्रेम



बारिशों को अपने जूड़े में बांधकर
लड़की बुदबुदाती है
सब कुछ प्रेम है
स्मृति भी
इंतज़ार भी
वेदना भी
मिलन भी
विरह भी
हाँ, सब कुछ प्रेम है। 

'सब कुछ होना
बचा रहेगा'
पास में रखी किताब
में दर्ज है। 

जिंदगी की किताब में भी।

Saturday, May 27, 2023

एक था नज़ीब


तुम्हें याद है वो नौजवान
जिसकी आँखों से ख़्वाब छलकते रहते थे
जिसकी बाँहों में सामर्थ्य थी 
दुनिया के अंधेरों को मिटा देने की 
वो नौजवान जो सिर्फ अपने लिए नहीं 
पूरी दुनिया के लिए सपने देखता था 
वो जो हर वक़्त मोहब्बत में डूबा रहता था 
इस दुनिया को मोहब्बत के फूलों से 
सजाना चाहता था, संवारना चाहता था 
जो चाहता था कि जो सच दिखे 
वो सच ही हो भी 

क्या तुमने देखा है उस नौजवान को 
जो अधूरी नींदों के बीच से जागकर 
लोगों के लिए सुकून की नींद बुनना चाहता था 
जो कैंटीन में छोड़ देता था अधूरा समोसा 
और निकल पड़ता था उस ख़्वाब के पीछे  
कि कोई बच्चा मुठ्ठी भर अनाज की कमी से 
दम न तोड़े 
कोई किसान मुंह न फेरे ज़िंदगी से 
वो जो दुनिया के हर मसायल को 
अपनी जिम्मेदारी समझता था 

वो नौजवान बहुत दिनों से गुम है
उसका नाम नज़ीब था  

वो जब से गुम हो गया है 
मेरे सपनों में आने लगा है
हर रात वो कुछ सवाल और कुछ सपने
मेरी नींदों में रख जाता है 

जागती हूँ तो नज़ीब की माँ की याद आती है 
रोहित वेमुला की माँ की याद आती है 
उन तमाम माँओं की याद आती है 
जिनके बच्चों ने इस दुनिया को 
जीने लायक बनाने के सपने देखने की सजा पायी
गर्दन उदासी से झुक जाती है
और आपकी?

Thursday, March 23, 2023

जाऊँगा कहाँ, रहूँगा यहीं


वो दुःख है
जायेगा कहाँ,
रहेगा यहीं
कभी मुस्कान में छुपकर
कभी खिलखिलाहट में
कभी 'सब ठीक है' के भीतर
तानकर सो जाएगा लम्बी नींद
उसकी नींद के दौरान हम
तनिक खुश होंगे
और तनिक सतर्क
कि कहीं लौट न आये फिर से
और एक रोज जब
आईना देख रहे होंगे
हमारी आँखों के नीचे आये
काले घेरों के बीच से
वो झांकेगा
और मुस्कुरा कर कहेगा
मैं कोई सुख नहीं हूँ 
कि चला जाऊँगा   
मैं तुम्हारा दुःख हूँ
जाऊँगा कहाँ
रहूँगा यहीं, तुम्हारे पास. 

Tuesday, March 21, 2023

कैद कबूतर


देर तक अपनी आँखें आसमान में टिकाये रहने के बाद थककर एक कप चाय पीना और उसके बाद खाली दीवार में आँखें धंसा देना अजीब से सुख से भरता है. कोई फोन बजता है तो देखती रहती हूँ देर तक फिर फोन के कटने से ठीक पहले ऑटो मैसेज सेंड करती हूँ,’आई एम बिजी राईट नाव, आई विल कॉल यू लेटर.’ उसके बाद फिर उस कबूतर के बारे में सोचने लगती हूँ जो कल गलती से बालकनी में बंद रह गया था. जब मैं दो घंटे बाद घर लौटी तो उसे बालकनी के बंद शीशे से टकराते देखा. मैं दर्द से कराह उठी थी. ओह...यह कैसे हो गया. ये महाशय कहीं छुप के बैठे होंगे. जाने से पहले आदतन मैंने सारी खिड़कियाँ बंद कर दी थीं. पारदर्शी कांच से आसमान एकदम साफ़ दिख रहा था, बाहर के पेड़ भी, पंछी भी. कबूतर को बार-बार लगता आसमान उसका है वो उस तरफ जाने की कोशिश करता और कांच से टकरा जाता. बालकनी का सारा सामान गिरा पड़ा था. मैंने जैसे ही उसे देखा सीधे बालकनी में गयी और खिड़कियाँ खोल दीं. वो इस कदर डर चुका था कि खुली खिडकियों के बावजूद बाहर नहीं निकल पा रहा था. मैं जो उसे निकालना चाह रही थी, वो मुझसे भी डर रहा था.

मैं चुपचाप अंदर चली आई कि शायद मुझसे डरना कम करे तो शायद सहज हो और निकल सके. मेरी आँखें ये सोचकर नम थीं कि इन दो घंटों में उसे कैसा महसूस हुआ होगा. यह सोचते हुए चाय का पानी चढाया था और एक सिसकी सुनी थी अपनी ही. हम सब कबूतर ही तो हैं. कैद कबूतर. बेचारे कबूतर.

जाने भीतर क्या होगा, शायद कुछ मजेदार होगा की जिज्ञासा लिए एक ऐसे जाल में उलझे हुए जिससे निकलने की राह ही नहीं मिलती. आसमान दिखता तो इतने करीब है जैसे हाथ बढ़ाएंगे और छू लेंगे लेकिन जैसे ही आसमान की तरफ बढ़ते हैं न दिखने वाले मजबूत अवरोध से टकराकर गिर जाते हैं. फिर उठते हैं, फिर टकराते हैं. चोट खाते रहते हैं, कोशिश करते रहते हैं. फिर कोशिश करते-करते थक जाते हैं. एक रोज कोई खिड़कियाँ खोलने आता है तो उससे ही डरने लगते हैं और कोशिश करना छोड़ चुके होने के कारण खुली खिड़की के बावजूद आसमान तक पहुँच नहीं पाते.

कबूतर के टूटे हुए पंख मुझे मेरे ही पंख लगे.

Monday, March 20, 2023

स्त्री कविता और राजनीति


जब किसान
अपने हक़ के लिए 
उतरे होते हैं सड़कों पर
स्त्री लिखती है 
रोटी पर कविता

जब राजनीति 
बो रही होती है 
वैमनस्व के, हिंसा के बीज
स्त्री चूम लेती है
प्रेमी का माथा
और लिखती है प्रेम कविता
 
जब दुनिया भर में 
सरहदों की ख़ातिर
छिड़ रहा होता है युद्ध
स्त्री सात समंदर पार बैठी दोस्त को
झप्पी भेजती है

जब दुनिया भर के लोग
सेंसेक्स पर निगाहें गड़ाये
दिल की धड़कनों को 
समेट रहे होते हैं
स्त्री नन्हे की गुल्लक में
उम्मीद के सिक्के डालती है

तुम्हें लगता है 
स्त्रियों को दुनिया की
राजनीति की समझ नहीं है 
असल में स्त्री के 
राजनैतिक दखल को
समझ पाने की 
तुम्हारे पास नज़र ही नहीं.

Monday, March 13, 2023

दुनियादारी


जिन्होंने डराया
उन्होंने कहा, 'मुझसे डरो मत'
और मुस्कुराये
 
जिन्होंने रचे प्रपंच
उन्होंने शदीद दुःख जताया
प्रपंच रचने वालों पर

जिन्होंने रची झूठ की इबारतें 
उन्होंने कहा झूठ बोलने से ज्यादा जरूरी हैं
बहुत सारे काम 

जिन्होंने शोर बोया 
उन्होंने शन्ति की तलाश पर 
लिखी कविता 

जिन्होंने काटे वृक्ष 
उन्होंने आंसू बहाए 
हरियाली के कम होने पर

जिन्होंने आज़ादी पर लगाये ताले 
उन्होंने दिए सुंदर भाषण आज़ादी पर 

जिन्होंने हड़प ली दूसरों की रोटी 
उन्होंने भूख को एजेंडा बनाया 
और जीते चुनाव 

और इस तरह जीवन में 
सब 'ठीक ठाक' चलता रहा
सूरज रोज की तरह उगा पहाड़ी पर 
और मुस्कुराया इस खेल तमाशे पर.

Sunday, February 12, 2023

फ़िज़ूल का प्रेम


जब दुनिया में
हजार मसायल हों
तब प्यार की बात करना
फिजूल ही तो है
हाँ, भला प्यार में डूबे
दो लोग
दुनिया के किस काम के
लेकिन बिना प्यार में डूबे लोगों के
ये दुनिया भी भला किस काम की.

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मामूली सा प्यार
प्यार बहुत मामूली सी चीज़ है
बिलकुल उतना ही मामूली
जैसे दाल में
ठीक-ठीक नमक
जैसे रोटी पर
जरा सा घी
जैसे मजदूर की थाली में
भरपेट खाना
जैसे बच्चों के हाथों में
खिलौने
जैसे आँखों में नींद
नींद में सपने
सपनों में तुम
और तुम्हारा
वो जाते-जाते पलटकर देखना...
----

एक रोज खूब भूख लगी
भरपेट खाना खाया
खूब नींद लगी
देर तक सोयी रही
दिन में कई बार चाय पी
बादल थे नहीं आकाश में
लेकिन बारिश की
बाट जोहती रही
आईना देखा नहीं दिन भर
और बेवजह मुस्कुराती रही
फिर देर तक दीवार घड़ी की
सेकेण्ड की सुई की रफ्तार
ताकती रही
कितना सरल सा तो था प्यार.
----

एक रोज लड़की ने कहा
‘जा मैं तुझे प्रेम नहीं करती’
यह कहकर वो
देर तलक खिलखिलाई
लड़के ने उसकी खिलखिलाहट को
अपने धानी बोसे में
छुपा लिया.

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सपनों में से
नींदें गुम गयीं
रातों में घुल गयी
सिरफिरी सी एक रात
दिन निकला
लेकिन जाने कहाँ
ठिठका ही रहा
उदास शामें सिमट गयीं
मुस्कुराहटों के आगोश में
बस कि जरा सा
प्यार ही तो हुआ था
और तो कोई बात नहीं थी.

- प्रतिभा कटियार


Thursday, February 9, 2023

तुम्हारा होना


जैसे चिड़ियों को मिलना ऊँची उड़ान
जैसे स्त्रियों को मिलना पूरा आसमान
जैसे पूरा होना धरती पर हर किसी का ख़्वाब
जैसे शीरी का फ़रहाद से मिल जाना
जैसे रेशमा आपा की आवाज़ में
जुदाई नहीं मिलन के गीत गूंजना

तुम्हारा होना
जैसे सदियों से थके जिस्म को
राहत मिलना
और अधूरे ख़्वाबों को मिलना उनकी ताबीर.

Monday, January 30, 2023

प्रेम- दो कवितायें



वादियाँ दूधिया कोहरे से ढंकी थीं 
और सूरज नन्ही बदलियों में छुपकर 
लुका छिपी का खेल खेल रहा था 
बसंत हथेलियों पर   
सपनों की कोंपलों खिलने को आतुर थीं 
ठंडे रास्तों पर 
जीने की ऊष्मा बिखरी हुई थी 
जैसे उनींदी आँखों पर 
बिखरा होता है इंतज़ार 
जब तुम आए  
सच में, वक़्त ठहरा हुआ था हथेलियों पर. 

भरोसा और उम्मीद 
आते हुए प्रेमी के चेहरे पर 
प्रेमिकाएं तलाशती हैं भरोसा 
और जाते हुए प्रेमी की पीठ पर 
लौट कर आने की उम्मीद.

Thursday, January 26, 2023

जब बसंत आता है...



जब बसन्त आता है
तब बसन्त कहाँ आता है
वो तो आता है तब
जब आती है मिलने की आस
जब खिलते हैं मन के पलाश
जब भरोसे पर बढ़ता है तनिक और भरोसा
जब टूटने से बच जाता है कोई ख़्वाब
जब यह धरती बच्चों की खिलखिलाहट से
गूँज उठती है
जब प्रेयसी के माथे पर सजती है
सूरज की पहली किरन

जब बसंत आता है तब कहाँ आता है बसंत
वो तो आता है तब जब आती हैं 
तुम्हारे आने की आहटें...

Tuesday, December 27, 2022

चलो न खो जाते हैं...



अरे कहाँ गया, यहीं तो रखा था. ऐसे कैसे खो जाता है कुछ भी. अभी-अभी तो यहीं था, अभी नहीं है. ऐसा ही होता है हमेशा, कभी भी कुछ भी खो जाता है.

स्कूल में खो जाती थी पेन्सिल और इरेज़र भी. पेन्सिल खोने के साथ ही खो जाती थीं उससे लिखी जानी वाली न जाने कितनी ही इबारतें, इरेजर खोने के साथ खो जाती थी सम्भावना लिखी गयी इबारत को दुरुस्त कर पाने की.

कुछ किताबें खोयीं, खोये दोस्त कुछ. बचपन के कुछ खेल खोये, धौल धप्पे, शरारतें खोयीं. खोये कुछ रंग ओढ़नी के. पाज़ेब की रुनझुन खोई, रहट की आवाज़ खोई, नीम की पत्तियों के झरने की आवाज के साये तले शीशम के पेड़ से लिपट जाने के याद खोई. नहर में पाँव डालकर घंटों आसमान ताकने वाली फुर्सत खो गयी एक रोज.

आँखों का काजल खोया था जिस रोज, एक ख़्वाब भरी रात भी खो गई थी. एक झुमका खो गया था और उसका जोड़ी झुमका न जाने कितने बरस अपने साथी झुमके की ख़ुशबू बिखेरता रहा.

खोये कुछ सावन, धूप खो गयी थी सर्द दिनों में. किसी उदास शाम में एक रोज गुलमोहर की याद खो गयी. ग़ालिब का दीवान खो गया एक रोज, बेगम अख्तर की आवाज़ खो गयी.

खोया चश्मा तो देख सके कि न जाने कितने लम्हे खो गये हैं. यहीं हथेली पर तो रखे थे वो नर्म, खुशनुमा लम्हे. ख़्वाब खो गए कुछ और कुछ ख़्वाबों की तो याद भी खो गयी. एक चांदनी रात खो गई जिसके साये तले देर तक, दूर तक टहलते रहे थे हम रात भर.

कोहरे की वो ख़ुशबू खो गयी जो समेट लेती थी सारे सुख दुःख अपने भीतर.

नीले आसमान में टांगा था आरजुओं का जो थैला वो थैला भी गुम गया, देखा ध्यान से एक रोज तो आसमान भी गुमशुदा ही मिला.

नीली नदी के किनारे एक धुन खो आई थी उस रोज जब मिलके लौटी थी प्रेम से. धुन बस प्रेम में जीने और प्रेम में ही मर जाने की. हथेलियों की लकीरें खो गयीं न जाने कितनी ही कि शफ्फाक हथेलियों में लकीर कोई भी नहीं.

समन्दर के किनारे एक रोज खुद को ही खो आई थी. बंजारा बस्तियों में अपनी आवारगी खो आई थी. चलते-चलते एक रोज खो गया था जीवन का रास्ता भी. भटके हुए रास्ते में अब खुद को खो देने की तमन्ना लिए बैठी हूँ कि कोई हाथ बढ़ाये और खुद को खो दूँ.

अम्मा ठीक कहती थीं, ‘बड़ी लापरवाह है लड़की देखो न कुछ भी तो संभालकर नहीं रखती.’

किसी रोज ज़िंदगी भी खो दूँगी यूँ ही सोचते हुए मुस्कुराती हूँ. मुस्कुराहट में होती थी जो चमक वो भी न जाने कहाँ खो आई हूँ.

जाते दिसम्बर की उदास हथेली अपनी हथेलियों में लेती हूँ, कहती हूँ, ‘चलो न, हम दोनों खो जाते हैं.’ दिसम्बर पलकें झपका देता है.