Showing posts with label मानव कौल. Show all posts
Showing posts with label मानव कौल. Show all posts

Wednesday, July 26, 2023

तुम्हारे बारे में- मानव कौल


उसने कहा 'तुम्हारे बारे में'। 
मैंने कहा नहीं सोचा,'कि अगर यह मेरे बारे में है तो तुम्हारे पास क्यों है?' 

सारे जमाने में हमेशा यही हुआ कि जिसके बारे में जो था, उसके अलावा वो सबके पास था। मुझे कभी-कभी लेखकों, कवियों पर गुस्सा आता है। दुनिया की सारी त्रासदी उनके लिए रसद है। लेकिन अगले ही पल यह भी लगता है कि सच ऐसा है क्या? काश!  

इस बरसती सुबह में जब कड़वी कॉफी का स्वाद होंठों पर चिपका हुआ है 'तुम्हारे बारे में' का ख़याल अटका हुआ है। असल में यह अटका तो तबसे है, जबसे देखा है। लेकिन कुछ भी लिख पाऊंगी का कमतर एहसास राह रोके रहा। यूं भी जो अटका रह जाता है, वो करीब सरक आता है। 

पृथ्वी थियेटर में पहली बार नाटक देखा 'तुम्हारे बारे में'। 
पृथ्वी थियेटर का माहौल अपनेपन आप में एक जीवन है, जीवंतता है। उसके बारे में फिर कभी। 

अभी उस किरच के बारे में जो चुभी हुई है, जिसने बहुत सारी चुभी हुई किरचों की कसक को बढ़ा दिया है। 
यह नाटक हम स्त्रियॉं के बारे में है, लेकिन यह पुरुषों के बारे में भी है। यह पूरे समाज के बारे में है। व्यक्ति की गढ़न के बारे में है। हमारा व्यवहार जो हमें लगता है हमारा है, हमारा अच्छा लगना, बुरा लगना, खुश लगना सब कुछ क्या सच में हमारा ही लगना है इसे खँगालने की बाबत कहाँ सोचते हैं हम, कहाँ सोच पाते हैं। 
 
'तुम्हारे बारे में' की तीन स्त्रियाँ मिलकर अपना सपना ढूंढती हैं जिसे लिखकर उन्होंने कहीं रख दिया था। एक स्त्री जिसने अपने उड़ने के सपने के बारे में लिखा होगा वो इतिहास की कोई स्त्री थी, यह हम ही थे। वो सपना जो लिखा नहीं गया, वो सपना जो अभी अपनी इबारत गढ़ रहा है, वो सपना जो अभी लिपि में ढला नहीं वो सपना जो खिड़की से दिखते आसमान के बारे में नहीं था एक मुक्त उड़ान के बारे में था। वो सपना जिसके बारे में सोचते ही आँखें भर आती हैं, मन सहम जाता है वो सपना कौन चुरा लेता है हमसे। 

उड़ान का सपना इतना बड़ा क्यों है आखिर? जब पंख हैं, आसमान है और उड़ने की इच्छा है तो अवरोध कहाँ है, क्यों है। हम उड़ना चाहती हैं, हमारे पास पंख हैं, सामने पूरा आसमान है लेकिन... ये कमबख़्त अपनों की शक्ल की बिल्ली...सारी ज़िंदगी उड़ान को रोके रहती है और मुस्कुराती है। 

मैंने यह नाटक दो बार देखा। और दोनों बार मैंने खुद पर खुद को तारी होते महसूस किया। बहते आंसू और खड़े होते रोयें मुझे गहरे मौन में धकेल रहे थे।
 
हम जो कहने से बचा लाते हैं वो हमसे जब-तब बतियाता रहता है। यह बतियाना बचा रहे इसलिए कहाँ लिख ही रही हूँ कुछ भी कि मैं तो इस सुबह में आई एक याद के सामने खड़ी हूँ बस। मेहंदी हसन गाये जा रहे हैं...बारिश बरसे जा रही है। 

मैंने अपनों की शक्ल की बिल्ली की तरफ देखना बंद कर दिया है फिर भी ठिठकी हूँ उड़ने का सपना अपनी हथेलियों में ज़ोर से भींचे हुए। 
मानव, तुमने हम सबके सपनों को क्यों चुरा लिया। वैसे अच्छा ही किया कि हम तो उस सपने को भूल ही गए थे...

हाँ, नाटक देखना नाटक पढ़ने से, नाटक के बारे में पढ़ने से बहुत अलग होता है। सचमुच। 

Friday, June 9, 2023

मानव कौल तितली और नाय्या

एक अजनबी
मेरे शहर
मुझसे मिलने आया...

जैसे-जैसे तितली पढ़ती गयी नाय्या की ओर खिंचती गयी. मैंने उन्हें ढूंढ-ढूंढ कर पढ़ना शुरू किया. पढ़ रही हूँ.
यह कविता अपने भीतर अपनेपन का ऐसा कोमल संसार लिए है कि यह बार-बार अपनी ओर खींचती है. पलकें भिगोती है.
 
मानव के लिखे को पढ़ते हुए उनके पात्रों से इकसार होना होता रहा है. जंग हे से तो जाने कितनी बार मिल चुकी हूँ. कैथरीन, इति ,उदय, पवन, जीवन, बंटी, सलीम, शायर. जैसे सबको मैं जानती हूँ शायद वो भी मुझे जानते होंगे. जानना कितना अपर्याप्त सा शब्द है लेकिन इसकी तरफ कैसा सा खिंचाव है.

लेकिन नाय्या पात्र नहीं हैं, वो लेखक हैं और कमाल की लेखक हैं. जितना भी सुना, पढ़ा और समझा उन्हें मुझे एक सहजता मिली. ऐसी सहजता जिसमें लेखक होने पर, गर्दन पर कोई बल नहीं पड़ता. जीवन ऐसा ही है जितना इसके करीब जायेंगे विनम्रता और करुणा से भरते जायेंगे.

साहित्य के शोर से दूर नाय्या को सुनना, पढ़ना और कृतज्ञ होना उस लेखक का जो अपने लिखे में ऐसे सुंदर ठीहों के पते छोड़ता चलता है.

Sunday, February 5, 2023

तितली- जीवन की धूप-छाँव के रंग



तितली उपन्यास एक सांस में पढ़ लिया था ऐसा कह सकते हैं लेकिन कुछ भी कहने की बजाय मौन में रहना ज्यादा भला लगा. उपन्यास पढ़ने के बाद जो पहला ख्याल आता है वो यह कि यह उपन्यास मृत्यु के बारे में है लेकिन जाने क्यों मुझे लगा कि असल में यह ज़िन्दगी का उपन्यास है. ज़िन्दगी को थाम के रखने की उस जिजीविषा का जिसमें अवसाद, पीड़ा, बेचैनी शामिल होने लगती है.

तितली उपन्यास को पढ़ते हुए मुझ मारीना बहुत याद आई. नाय्या, मारीना...कार्ल, इरिना.

कोई बात अधूरी छूट जाय तो बहुत दिक करती है यह उपन्यास उसी अधूरी छूटी हुई बात के बारे में है. वो बात जो असल में जिन्दगी थी पूरी.

जीवन क्या है, कितना है. कब कोई जीवन पूरा होता है और कब वो अधूरा रह जाता है. क्या इसका उम्र से कोई लेना-देना है. नहीं जानती, लेकिन इतना जानती हूँ बीच राह में यूँ ही अचानक बिछड़ गए लोग छूट गए लोगों के जीवन में इस कदर रह जाते हैं कि उनका जीवन सच में बहुत मुश्किल हो जाता है.

नाय्या की पीड़ा मारीना की पीड़ा एक जैसी ही तो थी. पीडाएं सहचर होती हैं. वो सच्ची दोस्त की मानिंद साथ हो लेती हैं. किसी भी देश, काल, व्यक्ति की पीड़ा कांधे से आकर टिककर बैठ सकती है. अपने दुःख से, पीड़ा से रिहा होने में कई बार दूसरे की पीड़ा को अपना लेना काम आया है. 

तितली को पढ़ते हुए कई जख्म खुलने लगते हैं, कुछ भरने भी लगते हैं. उपन्यास का पहला हिस्सा दूसरे हिस्से की तैयारी सरीखा है. पूरे वक़्त लगता है कि काफ्का आसपास हैं कहीं. हालाँकि वो उपन्यास में कहीं नहीं है. उपन्यास में बहुत सारे लेखकों का जिक्र है, उनके मृत्यु के बारे में लिखे कुछ अंश हैं. कुछ धूप छाँव सा समां बनता है जैसे जीवन की तैयारी हो रही हो. या शायद मृत्यु की. या शायद लम्हों की. मेरे जेहन में हमेशा से मृत्यु की बाबत सबसे पहले काफ्का का लिखा ही उभरता है फिर कामू फिर नीत्शे लेकिन तितली पढ़ते हुए यह विस्तार बढ़ता जाता है. पढ़ना और जीना दो अलग शय हैं. कुछ भी पढ़ना, किसी का भी लिखा पढ़ना जीने की तैयारी नहीं हो सकता लेकिन जिया हुए का स्वाद पढ़ने के संग जब मिलता है तब समझ तनिक और साफ़ होती है.

मुझसे कोई पूछे कि तितली उपन्यास कैसा लगा तो मैं सिर्फ चुप ही रहूंगी. ‘अच्छा लगा’ कहना मुझे अच्छा तो नहीं लगेगा. हालाँकि यह जरूर है कि इसे पढ़ना अपने भीतर के उन अंधेरों में झांकना है जिन्हें हमने छुपा दिया था. उन जख्मों को तनिक मरहम लगाना है जिसे हम इग्नोर किये बैठे थे. सामना करना है जीवन का, उसके हर रूप का. यह उपन्यास उस एहसास का मीठा स्वाद है जो दूर देश में बैठा कोई व्यक्ति महसूस कर पाता है. एक लेखक जब पाठक होता है और अपने प्रिय लेखक की पीड़ा को अपने भीतर समेट लेता है, उससे मिलने का ख़्वाब उसकी आँखों में दिपदिप करने लगता है.

कोई भी लेखक असल में तो पाठक ही है. तो यह उस उस पाठक के अपने लेखक के प्रति प्रेम की कहानी है. उस कहानी में सात समन्दर पार की यात्रा है, लेखक से हुईं खूबसूरत मुलाकातें हैं और जीवन है.

मुझे इस उपन्यास में शायर का किरदार किसी रिलीफ सा लगा. जैसे तेज़ धूप में पाँव जैसे ही जलने लगते हों शायर की उपस्थिति छाया कर देती हो.

मैं एक स्त्री हूँ और मैंने इसे स्त्री नजरिये से पढ़ते हुए पाया कि क्लाउस की प्रेमिका हो, शायर हो, खुद नाय्या हो कितना कुछ अनकहा रह गया है अभी. कितना कुछ सुनना बाकी है उनसे. लेखक ने उपन्यास भर का सामान जमा किया और जो छूट गया मेरा मन उसमें अटका हुआ है. क्यों समझ से भरी स्त्रियों के हिस्से कोई समझ और संवेदना से भरा पुरुष नहीं आता.

कभी-कभी लगता है कि यह उपन्यास अगर स्त्री ने लिखा होता तब यह कैसा होता? 

लेखक जिद्दी है वो अपने सपनों का पीछा करना जानता है. यह बात इस उपन्यास की ख़ास बात है. यह दो लेखकों की कहानी है, एक पाठक जो लेखक भी है का अपने प्रिय लेखक के प्रति प्रेम की कहानी है. यह कोपेनहेगन की धूप, वहां की हवा, पेड़ और भाषा की कहानी है जिसमें कॉफ़ी की खुशबू घुली हुई है. यह कहानी है इमोशनली एक्स्जास्ट होकर पस्त एक लेखक की यात्रा की. नाय्या की उपस्थिति इन सारी कहानियों का वो सुर है जिस पर सधकर ये सब कहानियां आगे बढ़ती हैं.

लेकिन जाने क्यों लगता है कि बहुत सी कहानियां शेष रह गयी हैं वो जीवन के किसी नए मोड़ पर हमारी बाट जोह रही होंगी. सोचती हूँ छत्तीसगढ़ जाऊं तो शायर से मुलाकात होगी क्या?

किताब में प्रूफ की गलतियाँ अखरती हैं. यूँ भी लगता है कि शायर के पत्रों की भाषा और शैली इतनी परिमार्जित न होती तो शायद और अच्छा होता. यह उपन्यास बहुत से सवाल ज़ेहन में छोड़ता है. इसके पूरा होते ही काफी सारा अधूरापन बिखर जाता और यही इसकी खूबसूरती है.

Sunday, January 22, 2023

तितली-मानव कौल


हम अमरकंटक गए थे तितलियाँ देखने लेकिन वो मुझे मिली घर में ही. जब लौटकर आई तो देखा ड्राइंगरूम में लगे पाम के पेड़ में तितली ने जन्म लिया है. उसका नाम हमने सोना रखा. दो दिन बाद सोना ने अपने जन्म की टहनी छोड़ी और कमरे में टहलना शुरू किया. जब भी दफ्तर से लौटती वो मुझे नयी जगह पर बैठी मिलती. उसके पंख बेहद चमकीले थे और चाल ठीक वैसी ही जैसे बच्चे सीखते हैं चलना.

एक रोज जब मैं ऑफिस में थी बेटू का फोन आया. उसकी आवाज़ में चहक थी. उसने हँसते हुए बताया ‘तुम्हारी सोना उड़ गयी...’ मैंने पूछा, ‘कहाँ’ उसने कहा ‘उड़कर खिड़की से बाहर चली गयी.’ वो देर तक हंसती रही.

उस रोज जब मैं वापस लौटी तो सोना को न पाकर उदास थी. तब बेटू ने कहा, ‘वो तितली है, उसे जंगल में ही जाना चाहिए.’ मैंने इस बात को सुना और अपने भीतर सहेज लिया.

कानों में न जाने कितनी तितलियाँ पहनीं हैं मैंने, उनमें से न जाने कितनी उड़ गयीं. कलाई पर तितली का टैटू बनाने की इच्छा मन में कबसे दबाये हूँ. लेकिन इन सब बातों का कोई कनेक्शन नहीं उस तितली से जो इस वक़्त मेरे हाथ में है. मानव कौल की तितली. मानव के लिखे में भी तितली का जिक्र बार-बार पहले आता रहा है लेकिन इस तितली के रंग अलग हैं, उड़ान अलग है.  

मानव का लिखा मुझे इसलिए भर प्रिय नहीं कि वो बहुत अच्छा लिखते हैं बल्कि इसलिए कि मानव का लिखा हमेशा, हर उलझन में, हर बेचैनी में अपने भीतर आने की जगह देता है. और मेरे भीतर कुछ बदलने लगता है, कुछ सहज होने लगता है. शायद यही कारण है कि मैंने उन्हें कई-कई बार पढ़ा है, सुना है. हर बार कुछ नए की ध्वनि के साथ.

तितली उपन्यास का मुझे तबसे इंतज़ार था जब यह लिखे जाने की यात्रा में था, या शायद तबसे जब मानव इस उपन्यास के रियाज़ के लिए पहला ‘स’ साध रहे थे.

उस रोज ढेर सारे कामों वाले थके से चिड़चिडे से दिन के बाद जब कार में बैठी तो ड्राइवर ने एक पैकेट दिया. मैंने अनमने मन से पैकेट ले लिया. देखा तो हिन्द युग्म दिखा. ओह, यह तो तितली है...मन चिहुंक उठा. अचानक दिन का सारा चिडचिडापन फुर्रर हो गया.

जाने क्यों लेकिन बहुत दिनों से लग रहा था कि इस वक़्त मुझे जो पढ़ने की जरूरत है वो तो अभी लिखा जा रहा है. और अब वह लिखा हुआ मेरे हाथों में था. उस रोज दोस्तों की पार्टी थी घर में लेकिन मैं होकर भी उसमें शामिल नहीं हो पा रही थी. मैं तितली की खुशबू में थी. दोस्त ने कहा, ’इतनी खुश तो तुम अपनी किताब आने पर भी नहीं थी.’ मैं हंस दी. दोस्त सच कह रहा था.

मैंने एक धुकधुकी के साथ किताब खोली और नाज़ा की वो कविता पढ़ी जो किताब की शुरुआत में है. अपनेपन की मिठास में डूबी सादी, सरल कविता. मैंने उसे एक ही बार में चार पांच बार पढ़ा. एक लेखक और एक पाठक के बीच का अपनापन, एक लेखक का दूसरे लेखक के बीच का अपनापन. कविता के शब्दों में जो तरलता है उसमें वही आकर्षण है जो झरने के पानी का होता है.

मैंने किताब सिरहाने सजाई और सो गयी. किताब मेरे साथ हर वक़्त रहने लगी. लेकिन जाने क्यों मैं उसे पढ़ नहीं रही थी. पलट रही थी. क्यों नहीं पढ़ रही थी पता नहीं. शायद पानी के किनारे बैठी थी और छलांग लगाने से हिचक रही थी. मैंने इसका पहला पैराग्राफ कम से कम 7 या 8 बार पढ़ा और उसके बाद किताब बंद कर दी.

शायद मैं जानती थी कि क्या होने वाला है, शायद मैं नहीं जानती थी कुछ भी...

शनिवार की रात देर तक मैं तितली को सिरहाने रखे उसे पढ़ना टालते हुए एक बेकार सी वेब सीरीज देखती रही. कुछ दोस्तों से बात करती रही और सोने की तैयारी करने लगी. मन उलझा हुआ था, थोड़ा उदास था तो मानव का एक पुराना इंटरवियु सुनने लगी. उसे सुनते हुए जाने क्या हुआ कि मैंने पाया कि मैं तितली खोलकर बैठी हूँ. अब मानव का इंटरवियु नेपथ्य में चला गया. तितली सामने उड़ने लगी.

मैं नाज़ा के बारे में मानव से सुन चुकी थी. नाज़ा को नेट पर सर्च किया और देर तक उन्हें खंगालती रही. कुछ किताबें ऑर्डर करने की लिस्ट बनाई. जिनमें सिमोन की A very easy death भी शामिल हुई.

किताब बेहद इंटेंस है. एक किताब में न जाने कितनी किताबें हैं. मृत्यु की बाबत बात करना जितना मुश्किल होता होगा शायद मृत्यु उतनी ही सरल होती है. जैसे देह कोई डाल हो और जीवन कोई तितली. एक रोज अचानक उठकर खिड़की से बाहर, फुर्रर्र...

मैंने मृत्यु की बाबत काफ्का का लिखा जब पढ़ा था तब ऐसा लगा था कि मृत्यु से प्रेम होने लगा है. तितली पढ़ते हुए काफ़्का बेतरह याद आ रहे हैं.

बहरहाल मध्य रात्रि तक तितली के मध्य में पहुंचकर बेमन से किताब बंद करके सोने की कोशिश करने लगी. देर तक नाज़ा, कार्ल, शायर और देवदार सपने में घूमते रहे.

ऊपर पहाड़ों पर बर्फ पड़ी है, देहरादून में मध्धम धूप उग रही है. चाय पीते हुए मैं कार्ल के बारे में सोच रही हूँ, नाज़ा के बारे में सोच रही हूँ.

इति, उदय, कैथरीन, जंग हे ऐसा लग रहा है सब मेरे साथ हैं इस यात्रा में. नाज़ा के गले से लिपट जाने की इच्छा से भर उठी हूँ और तितली को गले से लगा लेती हूँ.

तितली पढ़ना शुरू करने से पहले जो बेचैनी थी वो अब नहीं है. एक वाक्य रात भर किसी सिम्फनी की तरह बजता रहा वो इस सुबह का हासिल है. ’जो हम चाहते हैं वो एक बार पा जाएँ तो उसके बाद सारा जीवन कितना सुखद बीतेगा. पर जो चाहते हैं उसका पाना सबसे बड़ी त्रासदी है...’

किताब के बारे में तफसील से लिखूंगी बाद में अभी तो खुद को सहेज रही हूँ इसे पढ़ते हुए. यूँ लग रहा है कि बस बिखरने ही वाली थी कि किसी ने हाथ बढ़ा दिया है...

Thursday, July 14, 2022

पढ़ना यानी मिलना अपनी रूह से...


आज की सुबह बारिश नहीं है. हरारत भी नहीं है. अजब सी उदास सी शांति है. किसी भी कहानी का आरम्भ और अंत मुझे मुश्किल लगता है. जैसे एक ठीक सुर से उठाना कोई राग और उसी एकदम दुरुस्त सुर पर उसे पूरा करना. दोनों सिरे अगर संभल जाएँ तो मध्यम और पंचम खिल उठते हैं.

कल रात जब मैं इसके अंतिम पन्नों से गुजर रही थी तो यात्रा की समाप्ति की थकान और शान्ति दोनों साथ थी. किताब बंद करते ही मेरी कोरों से कुछ बूँदें लुढकीं और मैं एक ख़ामोशी ओढकर देर तक आसमान देखती रही. तब तक, जब तक वो शाम के नीले से रात के काले में न बदल गया...

मुझे नहीं मालूम आज मैं क्या लिखना चाहती हूँ. क्योंकि मैं तो असल में चुप रहना चाहती हूँ. चुप ही हूँ कई दिनों से. और चुप्पी को लिखना जरूरी क्यों है. लेकिन शायद जरूरी है कि ख्वाजाबाग के जिस घर में कई दिन अटकी रही, जिस नीले दरवाजे और सफेद दीवारों को सपने में देखती रही उससे बाहर आना जरूरी है. उसके बाद क्या हुआ क्या नहीं इसके बारे में नहीं है यह बात. यह बात है एक ऐसी यात्रा के अनुभवों की बाबत जिनसे गुजरना बेहद जरूरी है.

मानव का यह यात्रा वृतांत सिर्फ कश्मीर यात्रा का वृतांत भर नहीं है. यह कई यात्राओं की बाबत है. खुद को जानने समझने की बाबत है. हम क्या हैं, क्यों हैं, जैसे हम हैं वैसे ही क्यों हैं. क्या सच में हम ऐसे ही होना चाहते हैं? हमारी किसी के प्रति नाराजगी, गुस्सा, प्रेम यह सब कहाँ से आता है. देश क्या है आखिर. अपनापन कैसा होता है. इतिहास की उन चालाकियों को देखना हम कब सीखेंगे आखिर जो जानबूझकर अधूरा सच लिए हमारे सामने खड़ा कर दिया जाता है. क्या हम उसके पार जाकर देख पाने की योग्यता कभी ग्रहण कर सकेंगे?

खुद के भीतर झांकना मनुष्य होने की पहली और अनिवार्य शर्त है. यह सिलेबस में कहीं नहीं है, स्कूलों में नहीं पढ़ाया जाता खुद के भीतर झांकना, खुद को टटोलना. समूचे देश को, एक ऐसी नफरत की आग में झोंकना आसान है जिसका असल में कोई सर-पैर ही नहीं लेकिन यह मुश्किल है कि उदासी और नाराजगी की नन्ही किरचों को सुभीते से निकाला जाय कि दर्द में तनिक कमी आये.

कश्मीर क्या है आखिर...कश्मीरी कौन हैं. जिन कश्मीरी पंडितों के दर्द, तकलीफ को राजनीति ने बेहद चालाकी से अपने नफे के लिए भरपूर उगाहा उनके दर्द असल में हैं क्या यह किसने पूछा? जिन कश्मीरी मुसलमानों के लिए नफरत उगाई उनके भीतर जो प्यार था/है, जो अपनापन है उसे किसने देखा?

जिन दिनों मैं रूह के जरिये कश्मीर की यात्रा पर निकली थी उन दिनों मेरी बेटी मुझे पढ़ते हुए देख रही थी. और एक रोज उसने मुझे मैसेज किया, ' रूह के बारे में लिखना, रूह को पढ़ना अपनी रूह को तलाशने जैसा है.' मैंने उसे पूछा कि यह किसने लिखा? उसने कहा, यह तुम्हारे बारे में है. मुझे लगा तुम ऐसा ही महसूस कर रही हो.

एक ही वाक्य में उसने मेरी पाठकीय यात्रा को कह दिया. सचमुच यह अपनी रूह तलाशने जैसा है. इस किताब में न जाने कितनी ऐसी जगहें हैं जहाँ देर तक ठहरना चाहिए. न जाने कितने ऐसे हिस्से हैं जिनका सार्वजनिक पाठ होना चाहिए. यह किताब प्रेम के बारे में है नफरत के बारे में नहीं. जो होती नफरत के बारे में तो शायद बेस्ट सेलर हो चुकी होती अब तक, नफरत की मार्केट जो कमाल की है.

मुझे ख़ुशी है कि अपनी ही दुनिया में डूबा हिंदी साहित्य जगत कितना ही आत्म आनन्द में रत रहे लेकिन रूह को युवा पाठकों ने दिल से लगा रखा है. मैं हर युवा के हाथ में यह किताब देखना चाहती हूँ, रिकमंड करती हूँ. अगर आप सचमुच इंसानियत के पैरोकार हैं, दुनिया में अमन और सुकून चाहते हैं, कश्मीर को सच में इस देश का हिस्सा मानते हैं तो कुछ धाराओं और अनुच्छेदों से बाहर आकर, वहां के लोगों को गले से लगाना होगा. यह किताब वादी के हर इन्सान के दिल में धड़कते उस प्यार के बारे में है जो वो हमसे करते हैं, उस उदासी के बारे में है जो उन पर थोपे गए इल्जामों के भीतर सांस लेती रहती है. उस उम्मीद के बारे में है जिसमें प्यार की रौशनी होगी एक दिन.

कश्मीर सिर्फ पेड़, पहाड़, झील नहीं है, कश्मीर वहां रहने वालों के दिलों की धड़कन से आबाद है. नफरत से सिर्फ नफरत बढ़ सकती है, प्यार से प्यार. माया आंटी कहती हैं कि 'अगर हम वर्तमान को दुरुस्त करना चाहते हैं तो हमें सामने वर्तमान ही रखना होगा. बार-बार अतीत को सामने रखकर हम वर्तमान को दुरुस्त नहीं कर सकते.' कितनी सच बात है यह. लेकिन सच में क्या हम दुरुस्त करना चाहते हैं? अगर चारों तरफ प्रेम और सौहार्द हो गया तो क्या होगा राजनीति का. बेहद चालाकी से हमें एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा किया गया और हम मोहरे की तरह इस्तेमाल होते रहे.

यह एक कश्मीरी पंडित की इनसाइड स्टोरी है, वो परिवार जिसने वो सब सहा जिसे फिल्म में देखकर लोगों का  खून खौल उठता है और उनका देश प्रेम हिंसक हो उठता है. लेकिन जिसने वह सब जिया, सहा उसके भीतर तो कोई गुस्सा नहीं, कोई प्रतिशोध नहीं. वो तो प्यार से भरा हुआ है. रूह को पढ़ते हुए और भी न जाने कितने कश्मीर से आये दोस्त, पड़ोसी, सहकर्मी याद आये जिनके पास उनकी कहानियां तो थीं लेकिन नफरत नहीं थी कहीं. मैं खुद 8 साल एक कश्मीर से विस्थापित परिवार के घर में किरायेदार के तौर पर रही हूँ. मकान मालिक की आँखों से जो कश्मीर मैं देखा करती थी उसमें हमेशा प्रेम ही नजर आता था और उनकी याद में जो लोग आते थे वो न हिन्दू थे न मुसलमान वो बस कश्मीरी थे. 

रूह को पढ़ना जरूरी है और अगर इसे ठीक से पढ़ा है तो निश्चित तौर पर भीतर काफी कुछ बदलता महसूस होगा. क्योंकि यह सचमुच अपनी रूह को टटोलने जैसा है.

Monday, July 11, 2022

बस घर आने वाला है- रूह


एक बड़ा सा इतवार सारा दिन घर में डोलता रहा. मैं उससे आँखें चुराती रही. आलस खूबसूरत शय है. मैंने आलस का हाथ थाम रखा था और इतवार के मन में जितने मंसूबे थे उन सबको धराशाई करती रही. दिन भर बारिश होती रही और मैं सोने और जागने के बीच में झूलते हुए आसमान ताकती रही.

रूह पास में रखी रही...मैं उसे देखती रही. कभी पलट भी लेती लेकिन आगे के पन्नों पर बढ़ने से जाने कैसा संकोच था कि पढ़े हुए पन्नों को फिर से पढ़ने लगती. फिर उसे पलटकर रख देती और खिड़की के शीशे पर गिरती बारिश से बनती आकृतियों को देखने लगती.

आखिर शाम तक आलस में और मुझमें समझौता हो गया. मैंने उससे थोड़ी मोहलत मांगी उसने आसानी से दे भी दी. मैंने रूह उठा ली. वाइन पीने की इच्छा को चाय पीने की इच्छा के आगे देर तक रखे रहने दिया. और आखिर चाय पीने की इच्छा ने चाय का कप आगे बढ़ा दिया.

असल में मुझे नहीं पता था कि मैं किस यात्रा पर निकली हूँ या फिर शायद मुझे पता था. ख्वाज़ाबाग़ पहुँचने की मुझे कोई जल्दी नहीं थी. लेकिन आखिर तो पहुंचना ही था. और...मेरी शाम धुंधलाने लगी. यह बीती रात की बाबत है. बीती रात जब मैं पन्ना दर पन्ना सफर करते हुए रूह का हाथ थामे ख्वाजाबाग की उस गली, उस गेट को ढूंढ रही थी जो लेखक की स्मृति में था. पढ़ते हुए इस कदर इकसार हो चुकी हूँ कि मुझे यह मेरी ही कहानी लग रही है. और ख्वाजाबाग की उस कॉलोनी की उस गली के आखिरी घर के सामने मैं ही खड़ी हूँ.

कि मुझमें उस घर के भीतर जाने की हिम्मत नहीं हो रही. मैं किताब को पलटकर रख देती हूँ. एक अजीब सी हूक, एक बेचैनी घेर लेती है. आखिर फिर से किताब उठा लेती हूँ और फफक फफक कर रो पड़ती हूँ. रोती ही जाती हूँ.

ऊंचे फ्रेस के पेड़ों की कतारों को पहचनाते हुए पिता की गोद में बैठे हुए सुनना कि 'बस घर आने वाला है'.
रूह ने मेरा हाथ पूरे वक़्त कसकर पकड़ा हुआ था. रूह चाहती थी घर में मैं अकेले प्रवेश करूँ.
'बस यहीं रोक दो यही मेरा घर है...'
'हम जिस दरवाजे से सेब चुराने जाते थे हमें अब उस दरवाजे से भीतर जाना होगा.'
अपनी हिचकिचाहट में मैंने दरवाजे को धक्का दिया. कुछ देर की जद्हदोजेहद के बाद वह दरवाजा खुला इसके भीतर प्रवेश पूरी तरह अतीत में प्रवेश था,

सच कहूँ इन पन्नों से गुजरते हुए मैं हर पल बिखर रही थी. टूटी सिसकियाँ, अटकी हुई हिचकियाँ बरसती बूंदों के सुर में सुर मिला रही थीं. इनको कोई कैसे लिख सकता है. मैं कैसे लिख सकती हूँ ख्वाजाबाग के उस घर, उस बुखारी, उस बैठक, उस रसोई की बाबत कुछ भी.उस खिड़की के बारे में कैसे लिख सकती हूँ जिससे लेखक ने घंटों आसमान ताकना सीखा था. उस जगह के बारे में कोई भी कैसे कुछ लिख सकता है जहाँ बचपन में टाफियां छुपाई हों...मेरे बचपन की तमाम स्मृतियाँ ख्वाजबाग की स्मृतियों में घुलने लगीं. लेखक और मैं इकसार होने लगे थे. कि मेरी रुलाई की रफ्तार तेज़ होती जा रही थी.

बस फर्क इतना था कि लेखक अपनी बेचैनी के साथ घर से निकल गया और मैं वहीं छूटी रह गयी. वहीं दरवाजे से टिककर खड़ी रसोई में माया आंटी को खाना बनाते देख रही थी ठीक वैसे ही जैसे इंदौर में देखती हूँ उनके आश्रम में. मैं वहीं फर्श पर लेट जाना चाहती हूँ, बचपन में छुपाई सारी टॉफियां निकाल लेना चाहती हूँ, कुछ नयी टॉफियां छुपा देना चाहती हूँ कि फिर कोई लौटे बरसों बाद तो वो उदास न हो.

रूह ने कहा, 'कुछ देर और ठहर जाओ, पता नहीं फिर तुम कब यहाँ कभी आ भी पाओगे या नहीं.'
'मैं आऊँगा पर अभी मैं रुक नहीं सकता हूँ...'

लेखक अपनी उदास आँखें लेकर घर से जा चुका है जबकि मैं वहीं छूटी हुई हूँ. रात भर सपने में मैं उस घर में भटक रही थी. क्या वो मेरा ही घर था, क्या मैं रूह थी...मेरी रूह कहाँ है आखिर.मेरी आवारा रूह तो कहीं भी भटक जाती है, अटक जाती है. मैं देहरादून में हूँ और वो मेरे पास नहीं...

(अंतिम से पहले...)

Friday, July 8, 2022

रूह की तस्वीर कोई कैसे खींच सकता है



कल दिन भर पेट में हंसी के बगूले उठते रहे. शाम को बेबी आंटी का फोन आया और बगूलों को उनकी आवाज़ ने थाम लिया. बेबी आंटी से मैं मिली नहीं हूँ, उनके कुछ किस्से सुने हैं माया आंटी से. उनके फोन आने की बात से लगा कि मैं उन्हें जानती हूँ. उनके गले लग जाने की इच्छा हुड़क बनकर उभरने लगी. उनका कहना 'तू बस आ जा' आँखों में बदलियाँ भर देता है.

'मैं कुछ भी नहीं कह पा रहा था. मेरा गला भारी हो गया था. मैं कितना कहना चाहता था कि बेबी आंटी मैं आपसे बहुत प्रेम करता हूँ, अभी भी. ठीक इस वक्त मैं आपके गले लग जाना चाहता हूँ. जब उन्हें मेरी तरफ से कोई आवाज़ नहीं आई तो उन्होंने, 'अच्छा बेटा आना तो फोन करना' कहकर फोन काट दिया.

मेरे मन में अजीब सी कशमकश चल रही है. क्या बेबी आंटी लेखक के और देहरादून में बैठी इस पाठक के, इंदौर में बैठी माया आंटी के मन में उनके लिए कितना प्रेम है कभी जान पायेंगी. अगर नहीं तो क्यों नहीं. लेखक ने क्यों नहीं कहा, जो उसने महसूस किया. शायद वो हम सबके हिस्से का भी कह देता. न कहकर क्या लेखक अपने लिए लिखने का राशन जमा करता है. यह तो ठीक नहीं. मुझे नहीं पढ़ना ये सब. नाराजगी आ घेरती है. 

लेखक की बरसों पहले लिखी एक कविता का टुकड़ा याद आ गया, 

'सोचता हूँ, 
अभी वो कहीं अगर मुझसे टकरा जाएगी,
कहीं भी
सड़क में, बाज़ार में, किसी मोड़ पर
तब शायद वो मुझे मेरे नाम से ही पुकारेगी
पर मैं इस तरफ खड़े होकर,
विदूषक ही तरह सुन रहा होऊंगा
और चुप रहूँगा 
मानो वो किसी और को आवाज़ दे रही हो
फिर मैं ऊपर आसमान की तरफ देखूंगा,
अगर बादल होंगे तो उनके बारे में सोचूंगा...

अपने मन की बात न कह पाने, पुकार पर पलटकर जवाब न देने पर पूरी किताब लिख सकते हैं लेकिन कह नहीं सकते कि 'तुमसे प्यार है...' हद है. एक अजीब सी बेचैनी के साथ दोबारा किताब उठती हूँ तो भीगी आँखें हंस देती हैं. इसी कशमकश में तो लेखक भी है. न कह पाने और फिर उस एक लम्हे में अपने मन की बात न कह पाने की पीड़ा को यहाँ-वहां बरसों व्यक्त करने की बेचैनी. सरल होना इतना कठिन क्यों बना लेते हैं हम. मेरे सामने बेबी आंटी हैं...और उनकी गोद में बैठा एक नन्हा सा बच्चा जो उन्हें बेहद प्यार करता है, अब भी. लेकिन दुनिया में शब्दों का इतना ढेर है, इतना शोर है कि सबसे पवित्र भावों को कहने के समय उसने चुप रहना सीख लिया है.

पढ़ने के दौरान...नहीं, लिखने के दौरान या शायद जीवन के दौरान जिन पलों के आने से आँखें चुराती हूँ जब वो सामने आ खड़े होते हैं तो पैर के अंगूठे से पत्थर की फर्श को कुरेदने का जतन शुरू कर देती हूँ. हमेशा से सोचती थी कि प्रेम में भीगे लम्हों की बाबत बात नहीं करनी चाहिए, उन्हें लिखना नहीं चाहिए, उन्हें पढ़ना नहीं चाहिए. उन्हें छोड़ देना चाहिए वैसे ही जैसे हम साँसों के बारे में बात नहीं करते उसके बारे में लिखते नहीं लेकिन वो न हो तो क्या हो आखिर...जैसे क्या हम फूल खिलने को लिख सकते हैं, हवा की छुअन को लिख सकते हैं उसी तरह प्रेम के लम्हों को भी क्योंकर लिखना चाहिए...उन्हें तो बस खिलना चाहिए...महकना चाहिए...

तमाम यात्रा एक लम्बी कविता में बदलने लगी है. रूहानी, लेखक और गुल मोहम्मद के साथ गुलमर्ग के रास्ते पर निकल पड़ी हूँ. सारे रास्ते मुझे गुलमर्ग याद आता रहा. 2012 में इन्हीं रास्तों पर पहली बार मैं कुदरत की ऐसी खूबसूरती देख फूटफूट कर रोई थी. यूँ पूरी कश्मीर यात्रा के दौरान मेरी आँखें भीगी ही थीं. लेकिन गुलमर्ग के रास्तों पर मैंने पहली बार अजीब सी दिव्यता, अपनेपन और मुक्ति को एक साथ महसूस किया था. शायद आध्यात्मिक लोग इसे ही कहते होंगे ईश्वर के दर्शन होना. मेरी बहती आखें रूहानी की शरारतों और लेखक के संकोच को इग्नोर कर रही हैं.

बस लेखक के लिखे में कुछ वायलिन के गुंथे हुए सुरों को पढ़ पा रही हूँ.
'तुम्हें कुछ पढ़कर सुनाऊँ?' रूह ने पूछा.
'हाँ सुनाओ' लेखक ने कहा.
ये ललद्यद हैं जो मुझे बहुत पसंद हैं...
who is to die and who they kill?
who can kill and who is to die?
one who gorgets God for the sake of the hearth,
Is sure to die and is to be killed.''

तुम्हें पता है, हर देश में, हर धर्म में ललद्यद जैसे लोग हुए हैं जिन्होंने भाईचारे, आपसी प्रेम और शांति से जीने की सुंदर बातें की हैं. और वो आम लोगों के बीच बेहद प्रसिद्ध भी हुए हैं. लेकिन फिर भी ये हिंसा कभी खत्म नहीं हुई.'

'मुझे लगता है कि लोग बोर हो जाते हैं. जैसे हमारे देश में लोग गाँधी से बोर हो गए हैं. जैसे ही कोई गाँधी के अलावा कोई विवादास्पद बात उनके बारे एसा कहता है तो लोगों के कान खड़े हो जाते हैं. हमें अपनी ज़िन्दगी में लगातार ड्रामा चाहिए होता है. हमारे घरों को ही ले लो, चार-छह लोगों में हम इतना ड्रामा खड़ा कर देते है कि हमारा आपस में साथ रहना मुश्किल हो जाता है.'

'यह इतना आसान नहीं है.' रूह ने कहा. 
'वह बर्फ में पैर रखते हुए पहाड़ों में ऊपर की तरफ चलने लगी. मेरी इच्छा हुई कि मैं उसकी तस्वीर खींच लूं इस वक़्त. इन घने देवदार के जंगल में, बर्फ के बीच चलती हुई वह किसी पेंटिंग सी लग रही थी.'
तस्वीर खींचने की इच्छा को भीतर धकेलते हुए लेखक ने सोचा कि रूह को तस्वीर खिंचवाना पसंद नहीं, यूँ भी कोई रूह की तस्वीर कैसे खींच सकता है.

सोशल मीडिया पर उतराते मैसेज की बाढ़ का ललद्यद जैसे कवि कभी मुकाबला नहीं कर सकते.
'जिस देश में लोगों को अच्छी कला, अच्छी कविता की समझ नहीं है, वहां हिंसा का होना आम बात है.'

(जारी...)

Thursday, July 7, 2022

उसका नाम रूहानी था - रूह



आँख देर से खुली. जाने रात की हरारत के कारण या बारिश की मध्धम धुन को ओढ़े पड़े रहने के लालच के कारण. माँ फोन पर पूछती हैं, बुखार कैसा है? मैं हंसकर कहती हूँ, 'बुखार नहीं है, हरारत है. एक किताब पढ़ रही हूँ जब तक वह खत्म नहीं होगी यह हरारत रहेगी.' माँ मेरे पागलपन की आदी हैं. बेफिक्री से कहती हैं, 'ठीक है फिर जल्दी खत्म करो किताब'. 

बालकनी की खिड़की खोलती हूँ तो जूही की पत्तियों पर अटकी बूँदें मुस्कुराकर कहती हैं 'गुड मॉर्निंग'. मैं हंस देती हूँ. सुबह की चाय बनाते हुए 'रूह' का ख्याल साथ है. सुबह पढ़ने का सुख, सुबह पढ़ने का सुख ही है उसे किसी से बदला नहीं जा सकता. कल के पढ़े हुए के साथ गड्डमगड्ड करते हुए सोचती हूँ सुबह Pat Boone, सुनूँ या Cliff Richard.' Cliff Richard गाने लगे हैं. आज की सुबह में 'रूह' को उठाने की बेताबी नहीं है. चाय के कप के करीब रूह को रखे देखना सुख है. जैसे दो प्रिय बैठे हों साथ.

'आजकल आप रूह पढ़ रही हैं न? बहुत अच्छी किताब है क्या? कितना सुंदर लिख रही हैं आप?' कल इनबॉक्स में किसी ने पूछा था. मैं देर तक चुप रही. समझ नहीं आया क्या कहूँ...क्या मैं अच्छा लिख रही हूँ? क्या किताब बहुत अच्छी है? अच्छा लगना कैसा होता है. 'अच्छी और बहुत जरूरी किताब है' इनबॉक्स में जवाब ठेलने के बाद सोचती रहती हूँ.

जीवन का सारा अच्छा वहां था जब असल में वह अच्छा नहीं था. इस किताब को पढ़ते हुए अच्छा नहीं लगता, दुःख, उदासी, बेचैनी, पीड़ा उभरती है...कहीं-कहीं अच्छा भी लगता है. मेरे तईं सबसे अच्छा पढ़ना वही था जिसे पढ़ने के बाद मैं महीनों, सालों उस पढ़े हुए में घूमती रही, परेशान रही, सोचती रही. उससे जुड़े तमाम तार ढूंढती रही, कुछ और पढ़ने को बेचैन होती रही. इस लिहाज से यह अच्छी किताब है. कि कल से दो नए गायक मेरी जिन्दगी में शामिल हो चुके हैं और एक किताब जो कल विश लिस्ट में थी तोहफा भेजने को आतुर दोस्तों में से एक ने ऑर्डर कर दी है.

रूह अपनी पूरी धज के साथ घर में रहती है. जैसे यह उसका ही घर है. किचन में, ड्राइंगरूम में, बालकनी में, कार में...हर जगह. हाँ, यह रूह का ही तो घर है.

पहली बार लेखक की हेठी घुटने टेकते हुए दिखी है तो सच कहूँ तो अच्छा लग रहा है. 'रूह हर चीज़ की तह तक जाकर संवाद करती है.' वह लेखक को कश्मीर पर लिखने को उकसाती है लेकिन यह भी कहती है कि 'कश्मीर से निकलते ही मैं जा चुकी होऊंगी.'
'हम दोनों के पास सिर्फ कश्मीर तक का ही वक्त था. जब मैंने सुझाव दिया कि हम दोनों कश्मीर के बाद भी टच में रह सकते हैं क्या? उसने कहा था, कश्मीर यात्रा खत्म होने के बाद हमारे साथ रहने का कोई कारण नहीं है.' मैं जब भी प्रेम सरीखे वाक्य बोलता तो वो डर जाती...'
इन हिस्सों को पढ़ते हुए मेरे भीतर चोर मुस्कुराहट तैर जाती है. मुझे 'बहुत दूर कितना दूर होता है' की कैथरीन याद आती है और कैथरीन की फिर से मिलने की इच्छा पर लेखक का यह सोचना याद आता है कि 'अभी तो मैं गिलहरियों का खेल देख रहा हूँ, अभी मैं कैसे आ सकता हूँ.' रूह ही कैथरीन लगने लगती है. यह लिखते हुए जो मुस्कुराहट है उसमें लेखक की रूह के साथ टच में रहने की इच्छा को इग्नोर होते देखने की तसल्ली शामिल है. सच, रूह ही है जो हमारी तमाम हेकड़ी को ठिकाने लगा सकती है.

तभी इति और उदय से मुलाकात होती है. अरे, इति और उदय? इन्हें तो मैं जानती हूँ. ये यहाँ कैसे. इति उदय और बिलाल के साथ ट्रैक पर निकल पड़ी हूँ. जिस तरह पढ़ना डुबकी लगाने जैसा होना चाहिए मुझे लगता है उसी तरह देखना भी दृश्य में घुल जाने जैसा होना चाहिए. लिखना कैसा होना चाहिए इसके बारे में ठीक-ठीक पता नहीं लेकिन यह हिस्सा पढ़ते हुए लगता है कि दृश्यों को जीना ऐसा ही होना चाहिए...

'रात के क़रीब तीन बजे मेरी आँख खुली, मुझे पेशाब करना था. तभी टेंट के बाहर कुछ बहुत धीमी हरकत सुनाई देने लगी. डर के मारे मैंने ख़ुद को स्लीपिंग बैग में छुपा लिया. जब आवाज़ आनी बंद हो गयी तो मुझे उठना पड़ा , पेशाब करना बहुत जरूरी था. जैसे ही मैंने टेंट के बाहर कदम रखा तो मैं हतप्रभ सा आसमां ताकता रह गया. इतने सारे तारे मैंने एक साथ कभी नहीं देखे थे, लग रहा था कि सारे तारे पृथ्वी के थोड़ा ज्यादा क़रीब आ चुके थे. नीचे तालाब को देखने से लग रहा था कि जाने कितने तारे टूटकर तालाब में गिर पड़े हैं. चारों तरफ चांदनी में नहाए ऊंचे पहाड़. मैं कुछ देर के लिए पेशाब करना भूल गया था. मैं इसे देखते हुए सोच रहा था कि अगर मैं इस दृश्य को कभी लिखूंगा तो क्या पढ़ने वाले को वही दिखेगा जो मैं देख रहा हूँ.'

इस दृश्य को पढ़ने के बाद ऐसा लग रहा है कि यह सुबह चांदनी रात में तब्दील हो गई है. और मैं तारों भरे आकाश के नीचे तारों भरे तालाब के किनारे कहीं बैठी हूँ. भला हुआ कि मुझमें चीज़ों को शब्दशः पढ़ने का हुनर न आया और मैं उन्हें भावशः पढ़ती रही, सुनती रही, देखती रही.
बिलाल के घर न जाने और जूते चोरी के किस्सों को छोड़ आगे बढ़ रही हूँ लेकिन चोपानों की और बिलाल की पीड़ा को साथ लिए हुए ही.

बड़ी देर बाद शायद पहली बार किताब में एक ऐसा हिस्सा आता है वो भी एकदम अचानक कि मेरी हंसी ही नहीं रुक रही. होटल में एक अकेली लड़की से मुलाकात होना और उससे लेखक का कहना, 'कल मैं गुलमर्ग जा रहा हूँ अगर आप चाहें तो मैं आपको ड्रॉप कर सकता हूँ.'
'शुक्रिया ! मैं आपसे पूछने ही वाली थी. मुझे लगा आपको यह न लगे कि मैं आपके गले पड़ रही हूँ.'
'नहीं ऐसी कोई बात नहीं है, बस मैं अपनी पत्नी से पूछकर आपको बताता हूँ.'
'बीवी?'
'जी वो ऊपर सो रही है'...

इसके बाद का किस्सा पाठकों के लिए छोड़ रही हूँ कि मेरी हंसी रुक ही नहीं रही...

लड़की का नाम रूहानी था...

(जारी...)

Wednesday, July 6, 2022

यह सदियों की उदासी है- रूह

'तुम लोग तो चले गये थे, उसके बाद हम बचे हुए कश्मीरियों के बहुत बुरे हाल हुए थे...'

कल जब पेज 94 पर बुकमार्क लगाकर किताब बंद की थी तब आसमान साफ़ था बाहर लेकिन भीतर ढेर सारा कुहासा घिर आया था. मेरी पढ़ने की गति काफी अच्छी है. यूँ माँ कहती हैं कि तुम्हारे हर काम में बहुत गति है, सामान्य से काफी ज्यादा. यह बात मुझे भी लगती है. तो गति के मुताबिक 175 पेज की यह किताब एक सिटिंग में पढ़ना आसान था मेरे लिए. लेकिन गति भी एक नियम चाहती है, उसकी भी एक इच्छा होती है. आखिर बात रूह की है तो जल्दबाजी कैसे काम करती. सच कहूँ तो किताब के आने में जितनी देर हो रही थी मुझे ठीक ही लग रहा था. इस बात को ठीक-ठीक मैं समझ पायी रूह पढ़ते हुए ही. कि जिस जगह आप असल में शिद्दत से पहुंचना चाहते हैं वहीं जाने से कन्नी काटते रहते हैं लेकिन उसके आस पास घूमते रहते हैं और वहां पहुँचने की इच्छा को जीने का सुख च्विंगगम की तरह चुभलाते रहते हैं. 

आज की सुबह भीगी हुई है. रात भर बरस चुकने के बाद बारिश अपनी बूंदों भरी ओढ़नी धरती को ओढ़ाकर सुस्ताने लगी है. मैंने रूह उठा ली है. कुछ ही पन्ने पढ़ पायी हूँ. आगे बढ़ नहीं पा रही. फिर कल पढ़े हुए पन्नों को जिन्हें कल सारा दिन चुभलाती रही दोबारा पलटती हूँ. रोकती नहीं आंसुओं को. बहने देती हूँ...

मुश्ताक कहना जारी रखते हैं... 'तुम लोग तो चले गये थे, उसके बाद हम बचे हुए कश्मीरियों के बहुत बुरे हाल हुए थे. मुझे लगता है कि मेरी उम्र के जो लोग उस वक्त इस वादी में बड़े हो रहे थे उनका मानसिक संतुलन अगर अच्छा है तो यह बहुत बड़ी बात है.' (पेज 83) मुश्ताक कहना जारी रखते हैं मैं उनकी ज़ानिब से सुनती हूँ उन सबकी आवाज़, उन सबकी पीड़ा जिन्होंने सदियों से सिर्फ सहा है. उन्हें न सुना गया ठीक से, न समझा गया.

इतिहास...सबका अपना इतिहास है. और सबके अपने सच. कब और कैसे एक के सच को दूसरे के सच के प्रतिपक्ष में खड़ा करना है यह राजनीति का काम है जो वो बखूबी कर रही है. इतिहास में क्या दर्ज होना है, कैसे दर्ज होना है यह भी राजनीति बखूबी जानती है. हमारे सामने कुछ आधा सच लिए हुए कहानियों को अलग ढंग से अलग तरह के इतिहास में लपेटकर परोस दिया जाता है. हम उसे ही पूरा सच मान लेते हैं. यह हमारी मासूमियत ही है जो राजनीति की खुराक है.

मुश्ताक का सच पन्नों में सिमटने वाला सच नहीं है, वो कोई किस्सा नहीं है. 

'हमारा गांव तीन तरफ से घिर गया था. एक तरफ जेकेएलएफ, दूसरी तरफ हिज़बुल और तीसरी तरफ मुस्लिम मुजाहिदीन.' 

 'मैंने अपने दोस्त को जलते हुए देखा था'

एक बार हिज़बुल ने गाँव में पर्चे बंटवा दिए कि कोई भी गाँव में बत्ती बंद नहीं करेगा. एमएम ने भी पर्चे बंटवाए कि कि किसी के घर से रौशनी नहीं दिखनी चाहिए. मेरे पिता ने सारी खिड़कियों में ईंटें लगवाकर उन्हें चुनवा दिया था, हवा के लिए एक ईंट की जगह ख़ाली छोड़ी थी जिस पर भी जाली लगा दी थी. हम रातों में बत्ती जलाकर रखते पर घर चारों तरफ से बंद था इसलिए रौशनी बाहर नहीं जाती थी. आम कश्मीरी को दोनों से बचने के उपाय करने होते थे.'

कल पढ़े हुए पन्ने आज भी खड़े हुए रोयें में शामिल हैं अपनी तमाम पीड़ा के साथ. क्या जानते हैं हम कश्मीर के बारे में वहां के लोगों के बारे में. कुछ भी तो नहीं. कश्मीर हमारा है तो ये सब लोग भी तो हमारे हैं, मुश्ताक, बशीर ये सब भी तो हमारे हैं. उनका जिया हुआ सच भी तो हमारा ही होना चाहिए न? क्यों नहीं है...यह सवाल सबसे बड़ा है. हालाँकि जवाब से अनजान कोई नहीं.

'क्या हम दूसरे के डरों को छू सकते हैं? मुश्ताक के किस्सों में कहीं भी लड़कियों का जिक्र नहीं था. कुछ रेप के वाकये थे पर लड़कों के साथ बड़ी हो रही लड़कियों के किस्से क्यों नदारद थे?' ' मैं जानना चाहता हूँ कि तुम्हारे आसपास बड़ी हो रही लड़कियों का क्या हुआ होगा?'  लेखक की जिज्ञासा असल में हम सबकी जिज्ञासा है. 

'असल में वे औरते ही थीं जिन्होंने मिलिटेंटस को घर में घुसने नहीं दिया था. पर उन औरतों पर बहुत कम लिखा गया.'
 
'मैंने लड़कियों को अपने चेहरे पर चूल्हे की राख मलते हुए देखा है ताकि वो अपना गोरापन छुपा लें. उन्हें किसी ने नहीं छोड़ा न हिज़बुल ने, न एमएम ने, न आर्मी ने.'

एक गहरी ख़ामोशी पसरी हुई है...बिना किसी सिसकी के आँखें लगातार बह रही हैं. फराह बशीर की किताब 'रूमर्स ऑफ स्प्रिंग' विश लिस्ट में शामिल हो गयी है. मिलिटेंसी के दौरान वादी में बड़ी होती एक लड़की की निजी दास्तान जिसका लेखक ने जिक्र किया है.

आज की सुबह में कल की उदासी है...असल में यह सदियों की उदासी है...

(जारी...)

Sunday, July 3, 2022

रूह


कल सारा दिन बारिश होती रही...मैं नीम हरारत में रूह को सिरहाने रखे बारिश देखती रही. किताब के कवर को देखती, पढ़ी हुई भूमिका को फिर-फिर पलट लेती लेकिन पहले ही वाक्य पर अटकी रही. 'यही वह किताब थी जिसे कभी लिखना न था...' यह एक वाक्य भर नहीं है. लम्बी यात्रा है. इसके भीतर कितनी उथल-पुथल, कितनी बेचैनी, कितनी तलाश, कितना अपनापन और एक ख़ोज शामिल है.

मैं अपने घर पर नहीं रहता हूँ
मैं उसे अपने साथ लिए फिरता हूँ...

कविता के साथ संवाद करते हुए घर शब्द के मायने ढूँढने लगती हूँ. पढ़ने की इच्छा को पढ़ने से ऊपर रखने का सुख अलग ही होता है. मैं इस सुख के साथ खेलती हूँ अक्सर. मानव को मैंने वैसे भी बहुत संभलकर पढ़ा है, कि थोड़ा पढ़ना बचाये रखूं कि कोई ऐसी जगह है जहाँ कभी भी जाया जा सकता है और वो जगह निराश नहीं करेगी.

इतवार की सुबह में भी हरारत बनी हुई है लेकिन बारिश थमी हुई है. मैं कश्मीर यात्रा पर निकल चुकी हूँ और किताब के दूसरे पन्ने पर ही मानव का देहरादून आना दर्ज पाकर खुश हो गयी हूँ. एक निजी सुख गुंथ गया है इस पाठकीय यात्रा में.

चेरापूंजी होते हुए कश्मीर पहुंचना, मिलना शब्बीर और बशीर से, मिलना गुल मोहम्मद से, मिलना उस नीले आसमान से, उस मंडराते चीलों से, नून चाय, कहवा, लवास की ख़ुशबू में डूबना चल ही रहा था कि सामने रूह आकर बैठ गयी है. मैं रूह से मुत्तास्सिर हूँ. ऐसी स्पष्टता, ऐसा आत्मविश्वास और ऐसी सहजता इसमें एक अलग सा आकर्षण है. 

लेखक को वाज़वान खाता छोड़कर मैं बालकनी में चक्कर काट रही हूँ.

मुझे राज्यपाल कुरैशी के दफ्तर के बाहर दो छोटे बच्चों के साथ बैठी रोती हुई औरत का चेहरा नज़र आता है. अपनी देह के उजले रंग को न नहाने से छुपाकर यहाँ के बच्चों में घुल जाने की तरकीब लगाते दो छोटे बच्चे दिखते हैं. एक चुप पिता हैं जो तमाम संवादों के ऊपर खिंची रेखा सरीखे हैं. एक डर है जिसे भीतर धकेलकर 'सब ठीक है' मन्त्र का जाप करते से मुस्कुराते लोग हैं. अनंतनाग, पहलगाम, श्रीनगर इन सब जगहों पर जा चुकी हूँ, वहां के लोगों से मिली हूँ कश्मीरी घरों में जाकर कहवा पिया है, कश्मीरी खाना खाया है, कुछ सवाल भी किये हैं कश्मीर की बाबत वहां के लोगों से और फिर पछताई हूँ सवाल करने पर कि उन सवालों के जवाब में मुस्कुराहटें पकड़ाई हैं लोगों ने.

लेखक की बेचैनी मुझे कम बेचैन करती है, ज्यादा बेचैन करती है कश्मीर को लेकर होने वाली वो तमाम राजनीति जिसने इस कदर लहूलुहान करके रख दिया है सब कुछ.

कश्मीर पर सूचनात्मक दस्तावेज तो खूब लिखे गये, पढ़े गये, चर्चा में आये लेकिन उन सूचनात्मक दस्तावेजों से इतर एक इनसाइडर स्टोरी के सामने खड़े होना आपको रुला देगा. वहां (कश्मीर में)एक बड़ा सा घर था से हम एक कमरे के छोटे से घर में रहने लगे तक को समझना. और इस समझने में कोई आक्रोश नहीं, हिंसा नहीं, किसी के प्रति कोई द्वेष नहीं. यह संभव कर पाना असल में इस समय की सबसे बड़ी जरूरत है. यह उस माँ की बाबत है जिसने अपने बच्चों को ऐसी तरबियत दी कि कश्मीर से आ गये फिर भी कश्मीर से प्यार नहीं कम हुआ बच्चों में, संघर्ष किये, संघर्षों की आंच में तपे लेकिन राजनीति की चतुराई के झांसे में नहीं आये कभी मोहरा नहीं बने किसी खेमे का. क्योंकि माँ और पिता दोनों जानते थे कि असल में दोनों एक ही हैं...'जिगरा तुम मुसलमान हो जाओ मैं हिन्दू हो जाता हूँ फिर देखते हैं कौन आता है हमें यहाँ से निकालने...'

बस एक बार, सारे हिन्दू मुसलमान होकर देखें और सारे मुसलमान हिन्दू होकर. बस एक बार हम अपनी चस्पा कर दी गयी पहचानों के खोल से बाहर निकलकर उन पहचानों में ढलकर देखें जिनके प्रति मन में गुस्सा है, जिनसे सवाल हैं...एक बार बस...

पेज 71 पर बुकमार्क लगाकर मैं अब तक के पढ़े हुए को चुभला रही हूँ. माया आंटी बहुत याद आ रही हैं. कि इसमें लिखे न जाने कितने किस्से उनसे सुने थे, पढ़ते हुए लगा वो ही हैं अक्षरों के बीच बैठी हुई कहीं. 

इतने सारे शब्द उलीच चुकने के बाद शब्दहीनता की शरण की तलाश में हूँ. फिर मुझे मानव का लिखा एक वाक्य शरण देता है कि 'किसी भी वाक्य पर पहुँचने के मेरे सारे रास्ते ऊबड़-खाबड़ थे'.

जारी...

Thursday, December 24, 2020

अंतिमा- मध्य में होने का सुख


ख़्वाब भरी आँखें अगर एकदम से खाली हो जायें और वो भी यूँ कि आँखों में बसने वाले ख़्वाब एक दिन कूद कर बाहर आ जाएँ और आसपास चहलकदमी करने लगें तो क्या हो? सिर्फ आँखों की कोरों को छूकर लौट जाने की बजाय एक चमकीली गीली लकीर हथेलियों पर उतर आये तो क्या हो? क्या हो कि वर्तमान के सुख में अतीत की पीड़ा का तिलिस्म (वो पीड़ा जिसकी किसी नशे की तरह हमें आदत लग चुकी थी) आकर बैठ जाए? क्या हो कि एक लम्बी गहरी चुप्पी के बीच मिल जाए कोई खोया हुआ वाक्य, कोई शब्द कोई उम्मीद जिसकी राह देखते हुए हम थक चुके थे और हमने इंतजार छोड़ दिया था? 

अंतिमा पढ़ते हुए ऐसा ही महसूस हो रहा है. इसे पढ़ते हुए जैसे अतीत, और भविष्य खिसककर वर्तमान की ओर उत्देुता भरी आँखों से देख रहे हों. भीतर की किसी भूख को जैसे एक बड़ा सा टुकड़ा मिल मिल गया हो देर तक चुभलाने को और लम्बे समय बाद भूख मिटने के सुख में एक नयी भूख जाग उठने की बेचैनी शामिल होती जा रही हो .

मैं खाना धीमे खाती हूँ, चाय और भी धीरे पीती हूँ लेकिन पढ़ती तेजी से हूँ. आमतौर पर इसका सुख हुआ है लेकिन कभी-कभी उलझन भी. आज पीठ के दर्द के चलते दिन आराम के नाम था और ऐसे में अपनी पसंद की किताब पढने से अच्छा भला और क्या हो सकता था. दोपहर तक अंतिमा के ठीक बीच में पहुँच चुकने के बाद खुद को रोक लिया. सारी किताबें ऐसी नहीं होतीं कि उन्हें गति से पढ़ा जाय. मानव को पढ़ते हुए ऐसा अक्सरहां महसूस होता है. किताब को सरकाकर खुद से दूर कर दिया. उसे न पढने के लिए तमाम उपक्रम किये. अंतिमा को दूर से देखते हुए कुछ दोस्तों को फोन किए, एक बेकार सी सीरीज देखी, कई बार चाय पी, एक्सरसाइज़ की लेकिन नजर अंतिमा से हटी नहीं.

इस बीच कामू, बोर्खेस, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना को फिर से पढने की इच्छा भी सामने आ खड़ी हुई. लेकिन मैंने रोहित, पवन, अरु के संवादों और चुप्पियों के बीच किसी को फ़िलहाल आने नहीं दिया.
कहे जा चुके शब्द अपना अस्तित्व धीरे-धीरे ग्रहण करते हैं. जब लगता है वो कहे जा चुके हैं तब असल वो उगना शुरू करते हैं. और जब हम पन्नों से गुजर चुके होते हैं तब पढ़े जा चुके संवाद, पढ़े जाने में घटित हुए दृश्य हमारे करीब आकर बैठ जाते हैं.

फ़िलहाल उन दृश्यों के मध्य होने का सुख है. चाहती तो आज पूरी पढ़ी जा सकती थी यह किताब लेकिन बीच में रुकना सुख दे रहा है. मानव बेहद आसान लेखक हैं दिल में जगह बनाने के लिहाज से लेकिन वो अपने लिखे से अपने पाठक का हाथ पकडकर जिस दुनिया में ले जाते हैं वहाँ जाना आसान नहीं है. इस लिहाज से मानव को लोकप्रिय लेखक के तौर पर देखना संतोष से भरता है.

अंतिमा निश्चित ही मानव के पुराने पाठकों को पसंद आएगी और नए पाठक भी बनाएगी. फ़िलहाल किसी किताब के मध्य में होना यात्रा के मध्य में होने या जीवन यात्रा के मध्य में होने जैसा ही मालूम हो रहा है. आधा जिया/पढ़ा जा चुका है और आधा जिया/पढ़ा जाना बाकी है. जो बाकी है वह अनिश्चितता से भरा है... अनिश्चितता उत्सुकता बनाये हुए है..

Sunday, April 3, 2016

हंसा - दोस्त चिंता नहीं, सब ठीक होगा...



हमारा समाज, हमारा परिवेश हमें गढ़ते हैं। हम चाहें, न चाहें वो हमारे साथ चलते हैं...चलते रहते हैं। एक खाली कक्षा में सूनी आंखों वाली बच्ची अपनी ड्राइंग की काॅपी में जो लकीरें खींचती है वो महज तस्वीर नहीं है, उस बच्ची का पूरा संसार है...स्कूल, कक्षा, शिक्षक कुछ भी उस समूचे संसार से विरत नहीं है। खेल-कूद से दूर अगर कोई बच्चा चुपचाप बैठा है तो वह बहुत कुछ बयान कर रहा है...बिना बच्चों के मन से रिश्ता बनाये, बिना उनके संसार को समझे उनसे किस शिक्षा का आग्रह हम कर सकते हैं यह सवाल है। सरकारी स्कूलों के शिक्षक अक्सर कहते हैं, हम जो भी पढ़ाते हैं बच्चे घर जाकर किताबें तक नहीं पलटते, या घरवाले बच्चों पर ध्यान ही नहीं देते...लेकिन घरवालों के हालात तो ऐसे हों शायद कि पढ़ाई की बात उनके लिए किसी लक्ज़री सी मालूम होती हो, क्या पता। ऐसे में बच्चों के परिवार, परिवार के सदस्यों, समाज, हालात से इतर बच्चे को आइसोलेशन में देखकर कोर्स पूरा कराने की कवायद कारगर हो सकती है क्या यह सोचने की बात है। बच्चे के मन के संसार और उसके आसपास के बाहर के संसार तक पहुंचने के लिए हमें तमाम माध्यमों की जरूरत पड़ती है...फिल्म हंसा भी ऐसा ही एक माध्यम है...

उत्तराखंड के खूबसूरत दृश्यों और मौसमों वाली काॅपी में एक उदास पन्ना खुलता है। पन्ने पर उभरती हैं कुछ लकीरें....कोई धुंधली सी तस्वीर बनती है...क्लासरूम में आखिरी बची आखिरी बच्ची की आंखों से उतरकर वो तस्वीर जिन्दगी के रास्तों पर दौड़ने लगती है...भागने लगती है...फिल्म की शुरुआत बस यहीं से...इंतजार से भरी दो आंखें पूरे स्क्रीन पर फैलती हैं...तमाम सुंदर दृश्यों के बीच...पिता के इंतजार में रची-बसी आंखें...वो आंखें जिनमें जाते हुए पिता की पीठ दर्ज है...

खूबसूरत दृश्य, पहाड़ियां, सूर्योदय, फूलों से भरी डालियां और हंसा. हंसा एक बारह-चैदह बरस के बच्चे के इर्द-गिर्द बुनी गई कहानी है। हंसा के पिता लापता हैं। वो गांव छोड़कर चले गये हैं। शायद शहर। शायद बच्चों के लिए खूब सारे खिलौने और मिठाइयां लाने। शायद कर्ज में डूबे घर के लिए ढेर सारा पैसा कमाने। शायद...यह शायद फिल्म में लगातार मौजूद रहता है। हंसा की बड़ी बहन चीकू इस शायद से लगाताार संवाद करती है, उससे टकराती है। नाराज भी होती है।

यह उदासी की कहानी नहीं है। यह कहानी है जीवन में जबरन ठूंस दी गई या आ गिरी निराशा और मुश्किलों से पूरी हिम्मत के साथ टकराने की। मजलूमों  का  मजलूमों  से अनजाने  ही बन जाने वाले रिश्ते की कहानी है. कहानी है मासूम हंसा की शरारतों की। जिस दौर में बच्चे वीडियो गेम, मोबाइल ऐप्प में उलझे हैं अपना हंसा लाल गेंद के पीछे भागता फिरता है। फिल्म में बहुत संवाद नहीं हैं लेकिन कहन बहुत है। दृश्य, घटनाएं, भाव संवादों से ज्यादा मुखर हैं।

यह हालात के आगे घुटने न टेकने वाली चीकू की कहानी है...हंसा की शरारतों की कहानी है, पेड़ पर अटकी लाल गंेद के गिरने के साथ ही उदास आंखों में उभर आने वाली उम्मीद की कहानी है...यह कहानी है हम सबकी जो हर रोज हालात का सामना करते हुए कितनी ही बार निराशा से भर उठते हैं लेकिन भीतर से एक आवाज आती है...दोस्त चिंता नहीं, सब ठीक होगा...

Tuesday, February 25, 2014

सर, मुझे कविता लिखनी नहीं आती है...


21 फरवरी शाम पांच बजे, बाल भवन के आडिटोरियम में शब्द अपना चोला उतारने को व्याकुल नज़र आये। मौका था मानव कौल के नाटक ' लाल पेंसिल' को देखने का। लाल पेंसिल देखते हुए महसूस हुआ कि जिन शब्दों को तराशने, सहेजने, उन्हें अपने सर पर ताज की तरह पहनने की जिजीविषाएं चारों ओर बिखरी पड़ी हों ठीक उसी वक्त कहीं कोई अव्यक्त शब्दों की दहलीज को पार करने को किस कदर व्याकुल है।

दिन भर किताबों के मेले में घूमने के बाद मेरे हाथ में थे ढेर सारे कविता संग्रह और सामने एक बच्ची का चीत्कार था...सर...मुझे कविता लिखनी नहीं आती है...बहुत मुश्किल काम है...कितना मुश्किल...क्या इतना मुश्किल कि जिंदगी एक अज़ाब हो जाये...कि सांस सांस वेदना...लगातार घनी होती वेदना...इतनी घनी की शब्दों का जंगल छोड़कर भाग जाने को जी चाहे...लेकिन भागना किससे, खुद से...खुद को व्यक्त न कर पाने की पीड़ा से मुक्ति भी नहीं है...प्रश्न यह है कि यह वेदना किसके हिस्से आई है...

नाटक 'लाल पेंसिल' जिंदगी की कई पर्तों को खोलता है, हमारे खामोशी के मानी तलाशता है, हमारी बोलियों में पैबस्त चुप को टटोलता है, भेड़चाल में फंसकर एक जैसा समझने, एक जैसा रचने, एक जैसी अभिव्यक्तियों और उनसे मिलने वाले देय को अभिलाषा से देखने की हसरतों को बेनकाब करता है। हमें जीवन भर लगता रहता है कि हमने सब कुछ ठीक-ठीक समझ लिया है...मैं समझा...मैं समझा...मैं  समझा...बड़...बड़...बड...यानी हम अपनी नासमझ समझ के मुगालते में जाने क्या-क्या बोलते जाते हैं बड़...बड़...बड़...यह बोलना सब कुछ है, लिखना, जीवन को जीना, अभिव्यक्त करना...और असल में सब निरर्थक...

यह नाटक बच्चों की दुनिया से खुलता है। एक जैसे होने की होड़...एक जैसे बच्चे...एक जैसे चेहरे...एक जैसी भाव भंगिमाएं...एक जैसी समझ और एक जैसी ही नासमझी भी। किस तरह हम सबका जीवन एक जैसे ढर्रे पर दौड़ता जाता है...यह इस कदर तेज दौड़ है कि हम अपने ही व्यक्तित्व की तमाम दूसरी खूबसूरत संभावनाओं को, इच्छाओं को समझ ही नहीं पाते। भेड़चाल, सफलता के कुछ तय मानक और बड़...बड़...बड़...बड़.…पिंकी इस भेड़चाल से अलग है। शायद इसीलिए वो कक्षा में उपेक्षित है। उसका कोई दोस्त नहीं है। बापू उसके दोस्त हैं, उनसे ही वो अपने मन की बात करती है। कक्षा में बच्चों से शिक्षक कविता लिखने को कहते हैं. सब बच्चे खुश होकर कविता लिखने लगते हैं...ऐसी कविता...वैसी कविता...शब्दों की उथल-पुथल और कविता...लेकिन पिंकी परेशान है...जहां एक ओर बच्चे किसी मशीन की तरह कविता लिखते हैं पिंकी इस वेदना से गुजरती है कि उसे तो कविता लिखनी आती ही नहीं है।

इसी दौरान उसे लाल पेंसिल मिल जाती है। लाल पेंसिल पकड़ते ही वो लिखने के प्रति दबाव महसूस करती है। इतना घना दबाव, ऐसी वेदना कि वो परेशान हो जाती है। वो अपने हाथ को रोकती है...पूरी कोशिश करती है कि न लिखे लेकिन नहीं...अब यह उसके बस का नहीं....और वो उस यातना से गुजरते हुए कविता लिखती है...कविता लिखने के बाद वो सेलिब्रिटी बन जाती है...क्लास के बाकी बच्चे उससे दोस्ती करना चाहते हैं...शिक्षक उसे सम्मानित करते हैं लेकिन पिंकी इन सबसे बेजार है...वो गले में पड़े मेडल को फेंक देती है और बार-बार कहती है मैंने कविता नहीं लिखी, मुझे कविता लिखना नहीं आता... वो लाल पेंसिल को फेंक आती है लेकिन वो पेंसिल उसका पीछा नहीं छोड़ती।

लाल पेंसिल का आकार धीरे-धीरे बढ़ता जाता है...यह लाल पेंसिल दरअसल पिंकी की इच्छा का प्रतीक है... इसे समझ पाना आसान नहीं लेकिन एक बार आप खुद को समझने की राह पे निकल पड़े तो इससे मुक्ति भी सम्भव नहीं।

लाल पेंसिल हमारे भीतर की दुनिया में चल रहे द्वंद्व को बेहतर ढंग से उकेरने में भी कामयाब होता है। हम सब कई लेयर्स पर जी रहे हैं। वो लेयर्स नाटक में खुलती हैं. नाटक का हर संवाद गहरा असर छोड़ता है। हर किरदार के लिए भरपूर स्पेस है। मंच का पूरा इस्तेमाल होता है। लाइट्स का इस्तेमाल कंटेंट को बखूबी सर्पोट करता है। सभी कलाकार अभिनय की शिद्दत को उकेरते हैं। यह नाटक एक खूबसूरत टीमवर्क के तौर पर उभरता है जिसमें एक नहीं बल्कि इससे जुड़ा हर व्यक्ति लीड रोल में नज़र आता है। इसे देखते हुए अपने भीतर की तमाम पर्तों को खुलता हुआ और शब्दों के मकड़जाल से मुक्त होता हुए महसूस करते हैं....

मानव एक निर्देशक के तौर पर चुपचाप दूर कहीं मुस्कुराते नज़़र आते हैं... 


Saturday, February 1, 2014

जिसे जीना बाक़ी है...

सब कुछ हो रहा है,
हर शाम एक टीस का उठना,
सब कुछ होने मैं शामिल रहता है।

किस्म-किस्म की कहानियाँ, आँखो के सामने चलती रहती है।
कुछ पड़ता हूँ ... कुछ गढ़ता रहता हूँ।

दिन में आसमान दखता हूँ।

जो तारा रात में दखते हुए छोडा था...वो दिन में ढूँढता हूँ।
सपने दिन के तारों जैसे है।
जो दिखते नही हैं... ढूढने पड़ते हैं।

रात में सपने नहीं आते....
सपनों की शक्ल का एक आदमी आता है।
ये बचा हुआ आदमी है।
जो दिन के 'सब कुछ होने में'- सरकता रहता है,
और शाम की टीस के साथ अंदर आता है।
ये दिन की कहानी में शामिल नहीं होता....

इसकी अपनी अलग कहानी हैं...
जिसे जीना बाक़ी है.… 

- मानव कौल 

(मानव की अन्य कविताओं को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें -http://manavaranya.blogspot.in/)

Wednesday, January 29, 2014

वह भर पेट संगीत नहीं लिख पाता है...


क्या तुमने वह संगीत सुना है,
जिसे कोई भूख के लिए बजा रहा होता है?

बंधे-बंधाए सुर के बीच में कहीं उसकी उंग्लिया गलती से कांप जाती है।
कहते हैं, जब दूर देश से उसकी प्रेमिका का खत उसे मिलता था..
तो वह उस ख़त में प्रेम नहीं.... पैसे तलाशता था।

सुना तुमने.... सुनो...
भूख के लिए उसकी उंग्लिया फिर कांप गई।
लोग उससे कहते हैं कि वह बहुत अच्छा संगीत लिखता है।
तो वह कहता है कि... मैं नहीं लिखता, लिखता तो कोई ओर है...
मैं तो बस उसे सहता हूँ।

संगीत उसकी धमनियों में नहीं है...
वह उसके पेट निकलता है।
हर उंग्लियों की गलती पर उसके संगीत में आत्मा प्रवेश करती है।
कहते है... वह भर पेट संगीत नहीं लिख पाता है...
उसके लिए उसे भूखा रहना पड़ता है।

भूख...
भूख एक आदत है.... बुरी आदत।
जो उस व्यक्ति को लगी हुई है...
जिसे वह लगातार सहता है।

- मानव कौल 

Monday, January 27, 2014

अब वह सपने में हैं...


थोड़ी देर तक उसका नाम लेने से वह सपनों में चली आती है। देर तक मुझपर हंसकर वह मेरे पास बैठना चाहती है। जगह की कमी हम दोनों महसूस करते हैं... दुनिया कितनी बड़ी है... वह कहती है। मैं अपनी जगह् से भटक जाता हूँ। किंगफिशर सामने के पेड़ पर आकर मेरी ख़ाली बाल्कनी देखता रहता है। मैं देर तक बाल्कनी को भर देने की कोशिश करता हूँ..।

हम एक दूसरे की ख़ाली जगह भर सकते थे... मैं तुम्हारे साथ बूढ़ा होना चाहता हूँ... मैंने अपनी गर्म सांसो में लपेटकर कई बार यह बात उसके पैरों के पास रखी थी। जीवन बहुत सरल था और हम फिर चालाक निकले....।

हमने अपने बड़े होने के सबूत दिये.. खेल हमेशा बचकाना था। अब वह सपने में हैं... कहानी ख़ाली पड़ी है..।

बाल्कनी में झूला लगाने की ज़िद्द जीवन मांगती है। और हम दोनों जीवन को चुन लेते हैं। सपने में वह कहती है.... और मैं सपनों में उसे जी लेता हूँ।

- मानव कौल

(जारी)

Sunday, January 26, 2014

मानव कौल- उम्मीदों का आसमान


वक़्त कैसा भी हो, मन कितनी भी मनमानियां कर रहा हो, कुछ ठीहे ऐसे होते हैं जहाँ पल भर ठहरना सुकून देता है.… 'मौन में बात' ऐसा ही एक ठिकाना है.

मौन में बात करने वाले मानव जब बोलते हैं तो चीज़ों के अर्थ बदलने लगते हैं. उनकी कहानियां, कवितायेँ, नाटक और अब फ़िल्में भी. वो एक गहरा एब्स्ट्रैक्ट रचते हैं, जो जिंदगी के रंगों से भरपूर होता है. हालाँकि ये मानव ही हैं जो रंगों को उनके खोल से मुक्त कर देते हैं, सुरों को आजाद कर देते हैं. उनकी दुनिया में कुछ कहने के लिए चुप हो जाना होता है, सांस-सांस सुनना होता है मौन, लम्हा लम्हा पलकों में भरनी होती हैं जिंदगी, उम्मीदें, ख्वाब।

जीवन, मृत्यु, प्रेम, रंग, आस पास की दुनिया की उठा पटक सब उनके यहाँ एक ठहराव के साथ दाखिल होती है, गहरा असर छोड़ते हुए. वो चीज़ों पर फौरी प्रतिक्रिया देने वाले लेखक, कलाकार नहीं हैं बल्कि वो तमाम झंझावातों को ज़ज्ब करते हैं. बचपन जिस तरह मानव की दुनिया में जगह पाता है उसमें नयी दुनिया का सपना पलते देखा जा सकता है. उनकी कवितायों पर, कहानियों पर, नाटकों पर, फिल्मों पर, और इन सबसे इतर उनकी डायरी के पन्नों पर ढेर सारी बात होनी चाहिए। ज़रूर होनी चाहिए। लेकिन इस वक़्त जिसका कहा जाना मुझे सबसे ज्यादा ज़रूरी लगता है वो है मानव का खुद से, अपने काम से आसक्त न होना। अपने मैं से मुक्त होना।

मानव का कोरे पन्ने के आगे किसी मासूम बच्चे की तरह बैठ जाना विस्मित भी करता है और उनके व्यक्तित्व के कई पहलू भी खोलता है. अपनी रचनाओं से, सफलताओं से, प्रशंसाओं से वो जिस तरह खुद को विरत रखते हैं वो इस बात की उम्मीद बचा लेता है कि कहीं कोई है जो अपने मैं से आज़ाद है.… आज जब हर कोई अपने अपने मैं को पालने पोसने में, अभिभूत होने में व्यस्त है ये शख्श किसी जंगल, किसी पहाड़ी पर कुछ नया तलाश रहा होता है. उन्हें अपने किये जा चुके काम के बारे में बात करने में खास दिलचस्पी नहीं। वो बेहद रचनात्मक होते हुए भी किसी भी किस्म की रेस से बहुत दूर हैं. उनके मौन के पास मुझे उन तमाम सवालों के जवाब अक्सर मिलते हैं जो ढेर सारे शोर, बतकहियों में नहीं मिलते।

बाद मुद्दत एक रोज उनसे पूछती हूँ उनके न होने का ठिकाना और वो चुपचाप हथेलियों पर एक टुकड़ा ख्वाब का रख जाते हैं.… ख्वाब जिसका नाम है कलर ब्लाइंड। 

उनके बारे में कुछ भी लिखना या कहना असल में लिखना है अपने लिए ही.…शुक्रिया मानव! नाउम्मीदियों से भरी इस दुनिया में उम्मीद को बचाये रखने के लिए.…

कलर ब्लाइंड -  http://vimeo.com/81892333

(इस सप्ताह मानव की रचनाएं जारी.... )

Friday, June 3, 2011

अबाबील- मानव कौल


( मानव कौल की यह कहानी जब पढ़ी थी तो ख़याल आया था की सहज होना इतना मुश्किल भी तो नहीं. मानव की अनुमति से इसे अपने ब्लॉग पर सहेज रही हूँ )

'तुम अगर कहो तो मैं तुम्हें एक बार और
प्यार करने की कोशिश करूंगा,
फिर से,शुरु से।
तुम्हें वो गाहे-बगाहे आँखों के मिलने की
टीस भी दूंगा।
तुम्हारा पीछा करते हुए,
तुम्हें गली के किसी कोने में रोकूंगा,
और कुछ कह नहीं पाऊंगा
रोज़ मैं तुम्हें अपना एक झूठा सपना सुनाऊँगा
पर इस बार
'सपना सच्चा था'- की झूठी कसम नहीं खाऊँगा
अग़र तुम मुझे एक मौक़ा ओर दो...
तो मैं तुमसे...
सीधे सच नहीं कहूंगा,
और थोड़ी-थोड़ी झूठ की चाशनी,
तुम्हें चटाता रहूँगा।
 'बस रोक दो मुझे ये नहीं सुनना है।'
 उसने कुर्सी पर से उठते हुए कहा, वो कुछ सुनना चाहती थी ये ज़िद्द उसी की थी।मैं चुप हो गया।वो कमरे में धूमती रही,उसे अपना होना उस कमरे में बहुत ज़्यादा लग रहा था,वो किसी कोने की तलाश कर रही थी जिसमें वो समा जाए, इस घर में रखी वस्तुओं में गुम हो जाए, इस घर का एक हिस्सा बन जाए, जैसे वो कुर्सी, जिसपर से वो अभी-अभी उठ गयी थी। 
'क्या हुआ?'
मैंने अपनी आवाज़ बदलते हुए कहा, उस आवाज़ में नहीं जिसमें मैं अभी-अभी अपनी कविता सुना रहा था।
'तुम्हारी कविता से मुझे आजकल बदबू आती है। किसकी?... मैं ये नहीं जानती।'
उसे शायद मेरे छोटे से कमरे में एक कोना मिल गया था, या कोई चीज़ जिसे पकड़कर वो सहज हो गई थी और उसने ये कह देया था।... पर मेरे लिए वो कुर्सी नहीं हुई थी, वो मुझे अभी भी घर में लाई गई एक नई चीज़ की तरह लगती थी।मेरे घर की हर चीज़ के साथ 'पुराना' या 'फैला हुआ' शब्द जाता है, पर वो हमेशा नई लगती है, नई...धुली हुई, साफ सी।ऎसा नहीं है कि मेरे घर में कोई नयी चीज़ नहीं है, पर वो कुछ ही समय में इस घर का हिस्सा हो जाती है। यहाँ तक की, नई लाई हुई किताब भी, पढ़ते-पढ़्ते पुरानी पढ़ी हुई किताबों में शामिल हो जाती है।पर वो पिछले एक साल से यहाँ आते रहने के बाद भी, पढ़े जाने के बाद भी, पुरानी नहीं हुई थी... , जिसे मैं भी पूरे अपने घर के साथ पुराना करने में लगा हुआ था।
'मेरे लिखे में, तुम्हारे होने की तलाश का, मैं कुछ नहीं कर सकता हूँ।'
इस बात को मैं बहुत देर से अपने भीतर दौहरा रहा था, फिर एक लेखक की सी गंभीरता लिए मैंने इसे बोल दिया।
रात बहुत हो चुकी थी, उसे घर छोड़ने का आलस,उसके होने के सुख को हमेशा कम कर देता था।वो रात में,कभी भी मेरे घर में सोती नहीं थी, वो हमेशा चली जाती थी। बहुत पूछने पर उसने कहा था कि उसे सिर्फ अपने बिस्तर पर ही नींद आती है।उसने मेरी बात पर चुप्पी साध ली थी, कोने में जल रहे एक मात्र टेबिल लेंप की धीमी रोशनी में भी वो साफ नज़र आ रही थी, पूरी वो नहीं,बस उसका उजला चहरा, लम्बें सफेद हाथ। अचानक मैं अबाबील नाम की एक चिड़िया  के बारे में सोचने लगा, जिसे मैंने उत्तरांचल में चौकोड़ी नाम के एक गांव में देखा था। वो उस गांव की छोटी-छोटी दुकानों में अपना घोसला बनाती थी,छोटी सी बहुत खूबसूरत। शुरु शुरु में मुझे वो उन अधेरी,ठंड़ी दुकानों के अंदर बैठी, अजीब सी लगती थी,मानो किसी बूढ़े थके, झुर्रीदार चहरे पर किसी ने रंगबिरंगी चमकदार बिंदी लगा दी हो। पर बाद बाद में मैं उन दुकानों में सिर्फ इसलिए जाता था कि उसे देख सकूं, जो उसी दुकान का एक खुबसूरत हिस्सा लगती थी।
'मुझे पता है ये केवल कल्पना मात्र है, उससे ज्यादा कुछ नहीं, पर मुझे लगता है कि तुम मुझे धोखा दे रहे हो, नहीं धोखा नहीं कुछ और। कल रात जब मैं तुम्हारे साथ सो रहे थे तो मुझे लगा कि तुम किसी और के बारे में सोच रहे हो,तुम मेरे चहरे को छू रहे थे पर वंहा किसी और को देख रहे थे।उस वक्त मुझॆ लगा, ये सब मेरी इन्सिक्योरटीज़ है और कुछ नहीं। पर अभी ये कविता सुनते हुए मुझे वो बात फिर से याद आ गई।मैं इसका कोई जवाब नहीं चाहती हूँ, मैं बस तुम्हें ये बताना चाहती हूँ।'
रात में उसके सारे शब्द अपनी गति से कुछ धीमे और भारी लग रहे थे। मुझे लगा मैं उन्हें सुन नहीं रहा हूँ, बल्कि पढ़ रहा हूँ।
'ये तुम्हारी इन्सिक्योरटीज़ नहीं हैं, अगर तुम इसे धोखा मानती हो तो मैं तुम्हें सच में धोखा दे रहा हूँ। अभी भी जब तुम उस कोने में जाकर खड़ी हो गई थी,तो मैं किसी और के बारे में सोच रहा था।'
अब मैं उसे ये नहीं कह पाया कि मैं उस वक्त, असल में अबाबील के बारे में सोच रहा था, पता नहीं क्यों, पर शायद मुझे कह देना चाहिए था।
'मैं एक बात और पूछना चाहती हूँ, कि जब तुम मेरे साथ होते हो तो कितनी देर मेरे साथ रहते हो।''
'पूरे समय।'
 'झूठ।'
 'सच।'
 'झूठ बोल रहे हो तुम।'
 'देखो असल में...'
 'मुझे कुछ नहीं सुनना... मैं जा रही हूँ...।'
 'मैं तुम्हें छोड़ने चलता हूँ... रुको।'
'कोई ज़रुरत नहीं है...।'
 और वो चली गई, खाली कमरे में मैं अपनी आधी सुनाई हुई कविता,और अपनी आधी बात कह पाने का गुस्सा लिए बैठा रहा।सोचा कम से कम वो आधी कविता अपने घर की पुरानी, बिखरी पड़ी चीज़ो को ही सुना दूं,पर हिम्मत नहीं हुई।उसे घर, आज घर नहीं छोड़ा इसलिए शायद वो यहाँ थी का सुख अभी तक मेरे पास था। मैं क्या सच में कल रात उसके साथ सोते हुए किसी और के बारे में सोच रहा था, किसके बारे में?
हाँ याद आया, मैं जब उसके चहरे पे अपनी उंगलियां फेर रहा था... तो अचानक मुझे वो सुबह याद हो आई, जब मैं अपनी माँ को जलाने के बाद, राख से उनकी अस्थीयाँ बटोर रहा था। मैंने जब तुम्हारी नाक को छुआ तो मुझे वो, माँ की एकमात्र हड़्डी लगी जिसे उस राख में से मैंने ढूढा़ था। उसके बाद मैं काफी देर तक राख के एक कोने में यू ही हाथ घुमाता रहा,हड्डीयाँ ढूढ़ने का झूठा अभिनय करता हुआ, क्योंकि मैं माँ की और हड़्ड़ीयों को नहीं छूना चाहता था... उन्हें छूते ही मेरे मन में तुरंत ये ख्याल दोड़ने लगता कि वो उनके शरीर के किस हिससे की है... ये उनकी मौत से भी ज़्यादा भयानक था।फिर मैं तुम्हारे बारे में सोचने लगा कि जब तुम्हें जलाने के बाद मुझे अगर तुम्हारी अस्थीयों को ढूढ़ना पड़ा तो... और इस विचार से मैंने अपना हाथ तुम्हारी पीढ़ पर ले गया... लगा कि तुम जलाई जा चुकी हो,तुम्हारा ये शरीर राख है और मैं उस राख में से तुम्हारी हड़्ड़ीयाँ टटोल रहा हूँ। तुम अचानक हंसने लगी थी, पर मैं शांत था क्योंकि मैं सच में तुम्हारी हड़डीयाँ टटोल रहा था।
वो सच कहती है मैं हर वक्त लगभग उसे ही देखते हुए कुछ और देखता होता हूँ...। मैंने सोचा टेबल लेंप बंद कर दूं, पर उसके बंद करते ही कमरे में इतना अंधेरा हो गया कि मुझसे सहन ही नहीं हुआ... मैंने उसे तुरंत जला दिया।नींद की आदत उसके कारण एसी पड़ गई थी कि रात के कुछ छोटे-छोटे रिचुअल्स बन गये थे, जिन्हें पूरा किए बिना नींद ही नहीं आती थी।जैसे उसे घर छोड़ने के बाद अकेले वापिस आते वक्त,  उसके रहने के सुख का दुख ढूढ़ना।वापिस घर आते ही उसे काग़ज़ पे उतार लेना... वैसे यह अजीब है, जब मैं अपने सबसे कठिन दौर से गुज़र रहा था तो जीवन की खूबसूरती के बारे में लिख रहा था, और जब भी घर में सुख छलक जाता है तब मैं पीड़ा लिखने का दुख बटोर रहा होता हूँ। शायद यही कारण है कि जब वो घर में होती है तो मैं उसके बारे में लिखना या सोचना ज़्यादा पसंद करता हूँ, जो उसके बदले यहाँ हो सकती थी।कल उसे छोड़ने के बाद ही मैंने ये कविता लिखी थी जिसे वो पूरा नहीं सुन पाई।बाक़ी रिचुअल्स में वो संगीत तुरंत आकर लगा देना जिसे उसके रहते सुनने की इच्छा थी।घर में धुसते ही शरीर से कपड़े और उसके सामने एक तरह का आदमी बने रहने के सारे कवच और कुंड़ल उतार फैकना।नींद के साथ उस सीमा तक खेलना जब तक कि वो एक ही झटके में शय और मात ना दे दे, और फिर चाय पीना, ब्रश करना या कभी कभी नहा लेना.... अलग।
अब ना उसे छोड़ने गया और ना ही रात का वो पहर शुरु हुआ है जहां से मैं अपने रिचुअल्स शुरु कर सकूँ। अचानक मैं फिर से अबाबील के बारे में सोचने लगा, उसी गांव (चौकोड़ी) के एक आदमी ने मुझे बताया था कि इस चिड़िया का ज़िक्र कुरान में भी हुआ है, और ये उड़ते-उड़ते हवा में अपने मूहँ से धूल कण जमा करती है, जिसे थूक-थूक कर वो अपना घोसला बनाती है।मैंने कुछ संगीत लगाने का सोचा पर फिर तय किया कि अभी तो रात जवान है.. पहले चाय बना लेता हूँ,मैं अपने किचिन में चाय बनाने धुसा ही था कि मुझे डोर बेल सुनाई दी, मैंने तुरंत दरवाज़ा खोल दिया। वो बाहर खड़ी थी। मैं कुछ कहता उससे पहले ही वो तेज़ कदमों से चलती हुई भीतर आ गई।
'तुम मुझे मनाने नहीं आ सकते थे, तुम्हें पता है मैं अकेली घर नहीं जा सकती हूँ, मुझे डर लगता है।'  मुझे सच में ये बात नहीं पता थी। मुझे उसका यह चले जाने वाला रुप भी नहीं पता था सो उसका वापिस आ जाना भी मेरे लिए उतना ही नया था जितना उसका चले जाना। दोनों ही परिस्थिती में कैसे व्यवहार करना चाहिए इसका मुझे कोई अंदाज़ा नहीं था। मैं कुछ देर तक चुपचाप ही बैठा रहा। फिर अपने सामान्य व्यवहार के एकदम विपरीत, मैं उसके बगल में जाकर बैठ गया।
 आई एम सॉरी... माफ कर दो मुझे..।’
इस बात में जितना सत्य था उतनी चतुरता भी थी, पर इसमें मनऊवल जैसी कोई गंध नहीं थी। पर उसने शायद इन शब्दों के बीच में कुछ सूंघ लिया और वो मान गई।वो मेरी तरफ पलटी और मुस्कुरा दी।उसने अपने हाथ मेरे बालों में फसा लिए, और उनके साथ खेलने लगी।
'मैं जब पहली बार तुमसे मिली थी, याद हैं तुम्हें....मुझे लगा था कि तुम एक हारे हुए आदमी हो जो सबसे नाराज़ रहता हैं। क्या उम्र बताई थी तुमने उस वक्त अपनी?...पेत्तालीस साल... हे ना!'
'वो सिर्फ एक साल पुरानी बात है... i was 43 last year...'
'ठीक है 44... एक साल इधर-उधर होने से क्या फ़र्क पड़ता है।'
वो हंसने लगी थी, मैं जानता था वो मुझे उकसा रही है। कोई और वक्त होता तो शायद मैं जवाब नहीं देता पर मैं जवाब देना चाहता था क्योंकि मैं वो हारे हुए आदमी वाली बात को टालना चाहता था।उसके हाथ मेरे बालों पर से हट गए थे।
'चालीस के बाद,एक साल का भी इधर-उधर होना बहुत माईने रखता है।'
मैं एक मुस्कान को दबाए बोल गया था।
'हाँ.. मुझॆ महसूस भी होता है।'
ये कहते ही उसकी हंसी का एक ठहाका पूरे कमरे में गूंजने लगा।मैं चुप रहा, मानो मुझे ये  joke समझ में ही नहीं आया हो।वो थोड़ी देर में शांत हुई...उसके हाथ वापिस मेरे बालों की तलाशी लेने लगे... हाँ मुझे अब उसका बाल सहलाना, अपने बालों की तलाशी ही लग रहा था।
 'मैं जब छोटी थी, उस वक्त हमारे घर में बहुत महफ़िले जमा होती थी...।’
उसने अचानक एक दुसरा सुर पकड़ लिया... मैंने इस सुर को बहुत कम ही सुना है खासकर उसके मुहँ से.... वो मेरे हाथों को भी टटोल रही थी... मानो वो सारा कुछ, जो वो बोल रही है... मेरे ही हाथों मे लिखा हो...
* * * * *

Monday, May 23, 2011

कोई कला समाज नहीं बदलती-मानव कौल


मानव कौल युवा नाटककार, कवि, कहानीकार और अब फिल्मकार भी  हैं. उनकी प्रयोगधर्मिता उनकी पहचान है. नाटक शक्कर के पांच दाने, पार्क, मम्ताज भाई ने अंतरराष्ट्रीय सक्सेस पाई. शक्कर के पांच दाने का मंचन जल्द ही न्यूयॉर्क में डायरेक्टर मार्क ब्लूम करने वाले हैं. उन्होंने जजंतरम ममंतरम, १९७१ और आई एम् फिल्मों में बतौर अभिनेता भी काम किया है .उनकी खासियत है कि वो अपनी जमीन खुद तलाश करते हैं और लगातार कुछ नया करने की फ़िराक में रहते हैं. पिछले दिनों उनकी मनोभूमि की बाबत उनसे कुछ बातचीत हुई- प्रतिभा 

सवाल- क्या नाटक या कोई और रचनात्मक विधा समाज के अंतिम छोर से संवाद कर पाने में सचमुच सफल हो पाती है? 
माफी चाहता हूं, पर मुझे लगता है कि कोई भी विधा अगर यह दंभ भरे तो वह उस विधा की कोरी कल्पना है. कोई भी विधा या कलाकार अगर एक शब्द भी कहता है तो वह शब्द इस समाज का ही शब्द है... उसी के द्वारा दिया गया... जिसे वह वापस समाज के सामने परोस कर रख देता है. उसका समाज के विरुद्ध कहना... समाज की गलतियां निकालना... नए समाज की कल्पना करना सभी उसके आसपास के जिए का हिस्सा है. उससे ज़्यादा कुछ भी नहीं.

सवाल- इन रचनात्मक अभिव्यक्तियों से क्या सामाजिक परिवर्तन में कोई असर पड़ता है? या ये महज सेल्फ सैटिस्फैक्शन के लिए है? 
मैं समाज बदलने के बिलकुल खिलाफ हूं. ना तो मेरी समाज बदलने में, और ना ही उन लोगों में कोई दिलचस्पी है जो समाज बदलने के लिए कला का सहारा लेते है. सत्य इतना सरल और सामान्य है... जो लगभग सभी जानते हैं... उन सत्यों को लगातार दोहराते रहने से हम उन सारे सत्यों को गांधी बना देते है... जिसका अब किसी पर कोई असर नहीं होता.
शायद हमारी कला से हम एक सा संसार रच लेते हैं जिस संसार में बार-बार जाने से हमें शांति मिलती है...(या वह हमें असहज करता है). हमारी कला एक कन्फेशन बॉक्स  की तरह काम करती है जहां जाकर हम एक बच्चे की तरह अपनी सारी कमियों, छलनाओं, कमीनेपन, अवसादों और पीड़ाओं को कह देते हैं.... उसे कह देने के बाद हम बहुत असहनीय हलकापन महसूस करते हैं.... और शायद जब कोई उस विधा को पढ़ता है या देखता है... तो यही बात उसे उसकी तरफ खींचती है...हम समाज के भीतर रहते हुए .. बहुत छोटे-छोटे संसार गढ़ते रहते हैं. इससे जीने में.... जीते रहने में एक तसल्ली बनी रहती है.

सवाल- नाटकों को लेकर मिलने वाला ऑडियंस का रिस्पांस किस तरह के भविष्य को रेखांकित करता है?
 मैंने कभी इसके बारे में नहीं सोचा... पर मुझे लगता है कि मनोरंजन के इतिहास को अगर मैं देखूं तो जिस किस्म के मनोरंजन की आशा इस वक्त हमारा समाज करता है... (उदाहरण के बतौर जिस किस्म के नाटक और फिल्में ज़्यादा चलती हैं) उससे मेरा कोई वास्ता नहीं है. क्योंकि जिस तरह के नाटक मैं देखना चाहता हूं, जिस तरीके की कहानियां मैं पढऩा चाहता हूं मैं अंत में वही लिख रहा होता हूं. तो एक तरह से मैं कह सकता हूं कि मैं अपने मनोरंजन के साधन खुद जमा कर रहा होता हूं.
अब इसमें एक बात और है कि जैसे हम इस दुनिया में रहते हुए सब लोगों के करीब नहीं हो पाते, ठीक उसी तरह जब आपका नाटक देखने 400 या 500 लोग आते हैं तो कुल जमा चार पांच या ज़्यादा से ज़्याद दस लोग उसे करीब से समझ लेते हैं.. और यह काफी है.
नाटक यूं भी क्षणिक विधा है... नाटक के चलते हुए जो भी घट रहा होता है नाटक बस उतना ही है... भविष्य में आप उस नाटक को पढ़ सकते हैं.. पर खेला गया नाटक वहीं.. उसी वक्त खत्म हो जाता है.

सवाल- अपने किये काम को लेकर कोई मोह न रखना कैसे संभव होता है, जबकि आजकल जरा सी सफलताएं लोगों के सर पर बैठ जाती हैं?
आपका खुद का लिखा हुआ आपको कुछ भी देता नहीं है... नाटक या कहानी के खत्म होते ही मैं बहुत गहरा ख़ालीपन महसूस करता हूं... कहीं कुछ बदल जाता हूं... मैं वह नहीं रहता जिसने वह नाटक या कहानी लिखी थी. सो मैं अपने नाटकों के सामने ही दर्शक सा हो जाता हूं.
मोह रखना तो दूसरी बात है मेरा उससे बहुत संबंध भी नहीं बचता है. 

सवाल- अपने नाटक खुद लिखने का क्या कारण है?

 कारण वही है जैसा मैं देखना सुनना चाहता हूं... वैसा ही लिख देता हूं. और लिखने के अलावा मैं अपने साथ और कुछ भी नहीं कर सकता हूं.

सवाल- एक साथ कई विधाओं में काम करने के बाद सबसे ज्यादा जुड़ाव कहां पाते हैं?
सबसे ज़्यादा जुड़ाव कोरे पन्नों से है...
जहां तक उत्साह की बात है मैं इस वक्त अपनी नई फिल्म, जो कि मैंने पूरी उत्तराखंड में बनाई है... से बहुत ही उत्साहित हूं. यह फिल्म हमारे ग्रुप अरण्य के काम का ही एक हिस्सा है.... मैं इस तरीक़े के कामों को लेकर हमेशा से उत्साहित रहता हंू, जब कुल जमा बीस लोग.. बिना किसी पैसे के... किसी एक विचार के पीछे आपके साथ हो लेते हैं. हम सब लोगों ने मिलकर यह फिल्म बनाई है... आशा है जल्द ही लोगों के सामने आएगी.

(आई नेक्स्ट के सम्पादकीय पेज पर २२ मई को प्रकाशित)


Monday, March 14, 2011

एक ख़त

अवसाद के घने अंधेरों के बीच एक मित्र का एक ख़त रौशनी बनकर उभरता है. सोचती हूँ क्यों न उसे साझा किया जाये. 

प्रिय मित्र, 

मैंने हमेशा से यह महसूस किया है कि वह जो हमारे भीतर बैठा एक और ’मैं’ है...। जिसका जन्म हमारे जीते जी बीच में कहीं हो गया था। उसके साथ हमारे संवादों ने, जिसे हम अपना सारा लिखा हुआ कह सकते हैं, उस ’मैं’ को इतना पानी दिया है वह एक हरा भरा पेड़ बन चुका है। जिसकी छांव में हम खुद को इतना सुरक्षित महसूस करते हैं जितनी सुरक्षा शायद हमने अपनी माँ की कोख़ में महसूस की थी। पर इन संवादों में हमारा लगातार उसके साथ एक द्वंद चल रह होता है। वह दरख़त जितना बड़ा होता जाता है कि हमारा जीना उसके सामने एकदम ही निर्थक जान पड़ता है। सार्थकता की लड़ाई जो उस दरख़त के और हमारे बीच चल रही होती है वह हमारे कर्म में जीवंत्त्ता बनाए रखती है। 

जहाँ से मेरी समस्या शुरु होती है वह है... शांति.. उस दरख़्त और मेरे बीच की। जब हम ’सम...’ पर बहुत समय तक बने रहते है। जहाँ वह मुझे और मैं उसे स्वीकार कर लेता हूँ। 
जैसा कि मैंने पहले कहीं लिखा है... कि “लिखता मैं नहीं हूँ लिखता तो कोई ओर है. मैं तो बस उसे सहता हूँ।“
हमें हमारे एकांत से बहुत अपेक्षाएं हैं..। शायद इसी वजह से जब हम अपने एकांत में प्रवेश करते हैं तो वह, हमारा एकांत, हमसे क्या अपेक्षा रखता है? इसे हम सुन भी नहीं पाते। हम अपने एकांत में अपनी पूरी गंदगी लिए प्रवेश करते हैं और अपेक्षा करते हैं कि हमारा एकांत हमारे सारे पाप धो देगा.... और अंत में जब हम इससे बाहर आएगें तो हमारे पास नए विचार... और किसी नई कृति की शुरुआत होगी। शायद यह अपेक्षाएं ही      है जिसके कारण हमारा एकांत भी हमें हमारी निजी समस्याओं से भरा लगता है..हम बहुत देर वहाँ भी ठहर नहीं पाते...। हमारी अपेक्षा, चाहे हमारे एकांत से हो, चाहे वह हमारी पीड़ाओं से हो, या चाहे हमारे अवसादों से.... वह सबका एक जैसा स्वाद कर देती है।
और क्या हम सोच-समझकर किसी भी बात को कह सकते हैं...। हम शायद एक स्थिति पर रहते हैं.. बरसों... और बहुत समय बाद वह बात हमारे भीतर से कहीं निकलती है और हमें लगता है कि वाह! क्या बात कह दी मैंने ही। पर उस बहुत समय तक एक स्थिति पर रहने की पीड़ा का क्या? वह तो हमें ही भोगना है और इसलिए नहीं कि वह बहुत असहनीय है, ना... वह बहुत सुंदर स्थिति है...। यह वह ही स्थिति है जिससे हम काई के नीचे की झील को महसूस कर पाते हैं। जैसे हमें जब बुखार आता है तो हम कहते हैं कि मेरी तबियत खराब है... जबकि सत्य यह है कि शरीर भीतर लड़ रहा है... वह भीतर पल रहे रोगों को खत्म करने की कोशिश में है। सो बुखार आने की स्थिति को मैं स्वस्थ कहूंगा... अस्वस्थ नहीं।

जब अवसाद, खालीपन.. और असहजता के दिन चल रहे होते हैं तो हम उस वक़्त उस काई को हटाने की कोशिश में लगे होते है जिससे हमें शांत नीला पानी दिखे...। 

फिर मिलते हैं
- मानव