Tuesday, October 31, 2023

बाहर बारिश हो रही है


बाहर तेज धूप थी...भीतर अंधेरा था।
 
तभी मैंने पढ़ा, ‘बाहर बारिश हो रही है।‘ और पाया कि बारिश हो रही है। पेड़, पशु, धरती, पंछी सब भीग रहे थे। बूंदें उछलकर बालकनी के भीतर गिर रही थीं लेकिन वो क्या सिर्फ बालकनी के भीतर गिर रही थीं? मैंने देखा मेरा चेहरा तर-ब-तर था। मेरी हथेलियों पर बूंदें जगमगा रही थीं। भीतर का अंधेरा छँट रहा था। सूखा भी। एक भीगे परिंदे ने अपने पंख झटके, पूरी धरती सोंधी ख़ुशबू में डूब गयी।

लिखना और क्या है अपने पाठक की ज़िंदगी में बारिश बनकर बरस जाने, रोशनी बनकर बिखर जाने के सिवा। प्रियंवद ऐसे ही तो लेखक हैं। कल शाम उनकी नयी किताब ‘एक लेखक की एनेटमी’ के पन्ने पलटते ही एहसास हुआ लंबे अरसे से जो रुका हुआ है पढ़ना, लिखना, जीना वो शायद अब चल निकले।
‘बारिश हो रही थी। दोनों बारिश देख रहे थे।

बारिश न भी होती तो भी वे दोनों नीले रंग की दो अलग-अलग लंबी, पतली खिड़कियों से सर निकाल कर बाहर देखा करते थे। वे हमेशा इसी तरह बाहर देखते हुए, बाहर से देखने पर अलग-अलग तरह से दिखते।‘
मैं अभी अपने मन की खिड़की से बाहर का आसमान देख रही हूँ। किताब हाथ में है तो लगता है उम्मीद हाथ में है, बाहर देखने का चश्मा आँखों पर है।

फिलहाल आधार प्रकाशन से आयी “लेखक की एनेटमी” की संगत पर मन थिरक रहा है।

Friday, October 27, 2023

आसमानी बातें थीं उसकी...


लड़की ने स्याही में उंगली डुबोई और लड़के की पीठ पर रख दी। शफ़्फाक सुफेद शर्ट पर नीला आसमान उग आया था। लड़का उस नीले गोले को देख नहीं पाया था। उसने बस लड़की की उंगली की आंच को महसूस किया था। और शरारत के बाद की उस खिलखिलाहट के सैलाब में तिर गया था जो पीठ पर उंगली रखने के बाद लड़की के पूरे वजूद से झर रहा था।

पीठ पर उभरे उस स्याही के गोले का रंग लड़के की हथेलियों पर नीली लकीर बनकर उभरा जब प्रार्थना के वक़्त ड्रेस मॉनिटर ने उसे लाइन से बाहर निकाला और मास्टर जी ने हथेलियाँ आगे करने को कहा। लड़के के हाथ पर उभरी नीली लकीरें लड़की की आँख का नीला दरिया बनकर छलक पड़ी थीं। उसने कब सोचा था कि उसकी जरा सी शरारत का यह असर होगा।

लड़का अपनी हथेलियों पर आए दर्द को भूल गया था लेकिन उसे अपनी पीठ पर रखी लड़की की उंगली की आंच सुलगाये हुए थी। छुट्टी हुई। लड़की की बड़ी-बड़ी आँखों से दरिया बह निकला। लड़के की हथेलियाँ अपनी हथेलियों में लिए लड़की देर तक खामोश खड़ी रही।

लड़के ने लड़की की आँखों के दरिया से धरती को सींचा और लड़की की खिलखिलाहट के बीज बो दिये। मुद्दत हुई इस बात को। धरती के किसी भी कोने पर नीले अमलतास खिले देखो तो समझना वो लड़की की खिलखिलाहट खिली हुई है।

लड़के की पीठ पर अब भी आसमान टंका हुआ है। लड़की की आँखों में अब भी एक दरिया छलकता है। अक्टूबर का मौसम उन दोनों के प्रेम पत्र अपनी टहनियों पर समेटे बैठा है।

Saturday, October 21, 2023

अक्टूबर महक रहा है


हथेलियों पर
रखे हरसिंगार के नीचे
धीमे से
बिना कोई हलचल किए
उग रही हैं नयी लकीरें

धूप की नर्म कलियाँ
खिलखिलाकर झर रही हैं
काँधों पर
अक्टूबर महक रहा है।

Saturday, October 7, 2023

हथेलियों में झरता अक्टूबर


'मैं अपनी कहानियों का अंत बदलना चाहती हूँ।' लड़की ने अपनी पनीली आँखों से लड़के की आँखों में देखते हुए कहा।
लड़के का ध्यान ट्रेन के एनाउंसमेंट पर था। उसने लड़की की आँखों में देखे बिना कहा, 'तो बदल दो न। तुम्हारी कहानी है तो अंत वही होना चाहिए जो तुम चाहती हो।' यह कहते हुए लड़का चलने को उठ खड़ा हुआ। उसकी ट्रेन का एनाउंसमेंट हो चुका था। 
'चलो, निकलता हूँ अब। तुम अपना खयाल रखना' कहकर लड़के ने ट्रेन की तरफ कदम बढ़ा दिये। 

लड़की अपनी पनीली आँखों से जाते हुए लड़के को देखती रही। 
लड़के की पीठ पर उसकी गीली आँखें चिपकी हुई थीं। लौटते कदमों से वापस लौटती हुए लड़की सोच रही थी क्या लड़के को अपनी पीठ पर उसके आंसुओं की नमी महसूस होती होगी? वो लड़के से कह न पाई कि 'अपना ख्याल मैं क्यों रखूँ वो तो तुम्हें रखना था न।' 

वो सोच रही थी कि क्या सचमुच वो अपनी कहानी का अंत बदल सकती है? 
तो फिर लड़का चला क्यों गया, रुक क्यों नहीं गया। इस कहानी में वो लड़के का रुक जाना लिखना चाहती थी। 
तो क्या वह झूठी कहानी लिखे? 

उसकी उदास आँखें जाते हुए लड़के की नहीं आते हुए, जीवन में रुक गए, साथ निभाने वाले लड़के की कहानी लिखना चाहती थीं। 

लेकिन वो झूठी कहानी नहीं लिखना चाहती थी। उसने आसमान से झरते अक्टूबर के आगे हथेलियाँ फैला दीं। घर पहुँची तो लड़का इंतज़ार करता मिला। 

अरे...तुम तो चले गए थे न? 
मैं कहाँ गया हूँ। कब तक इस डर को जीती रहोगी। कहीं नहीं गया मैं। ख्वाब था तुम्हारा। लो चाय पियो। 

लड़की ने खुद को टटोला वो सचमुच ख्वाब में थी। उदास ख्वाब का मौसम बीत चुका था। ट्रेन न जाने कितनी चली गईं लड़का कहीं नहीं गया। वादे की मुताबिक सुबह की चाय बना रहा है। चाय की प्याली के बगल में हरसिंगार के फूल मुस्कुरा रहे थे।  

लड़की ने उदास कहानियाँ लिखना बंद कर दिया है। उसके मोबाइल पर माहिरा खान की शादी के वीडियो तैर रहे हैं।