Sunday, June 20, 2021

फादरहुड


पैरेंटिंग का बड़ा सिरा माँ के हाथ में थमाने वाले समाज को यह आसान लगा हो. माँ को महान कहकर जो मुक्ति मिल जाती है उसमें कम्फर्ट भी तो है. जबकि बयोलौजिकल नजरिये से देखें तो बच्चे को नौ महीने गर्भ में रखने, प्रसव और ब्रेस्ट फीडिंग के सिवा ऐसा कुछ नहीं जो माँ कर सकती है पिता नहीं. लेकिन माँ की ममता के कसीदे काढ़ना आसान है बच्चे की हर तरह की जिम्मेदारी उठाना कठिन.

कल नेटफ्लिक्स पर 'Fatherhood' देखी. प्यारी फिल्म है. बच्ची की माँ की मृत्यु बच्ची के जन्म के समय हो जाती है और तब हमेशा से लापरवाह समझे जाना वाला शख्स पिता बनकर उभरता है. न आया की मदद, न नानी दादी की न बच्ची का वास्ता देकर दूसरी शादी. नौकरी और बच्ची को संभालता पिता. फिल्म प्यारी है.
हाल ही में देखी The Pursuit of Happyness के बाद इस फिल्म ने भी दिल जीत लिया.


Friday, June 18, 2021

श्रीकांत कैसे हो गया फैमिली मैन?

“कुछ गंभीर सवाल उठ रहे हैं. श्रीकांत इतना कुछ कर रहा है, फिर भी सुचित्रा खुश नहीं है. आखिर सुचित्रा चाहती क्या है?”
प्रतिभा कटियार


‘द फैमिली मैन’ देख लिया था. तब ही, जब आया था. मैं फैमिली मैन पर बात नहीं करना चाहती. उस पर काफी बात हो चुकी है. मैं बात करना चाहती हूं सुचित्रा के किरदार पर. हालांकि, उस पर भी काफी बात हो चुकी है. फिर भी मैं उस पर बात करना चाहती हूं. सुचित्रा के किरदार को लेकर खूब तानाकशी हो रही है. मीम बन रहे हैं. कुछ गंभीर सवाल उठ रहे हैं, ज्यादातर मजाकिया कि औरतों को कोई खुश नहीं कर सकता. श्रीकांत इतना कुछ कर रहा है उसके लिए, फिर भी वो खुश नहीं है. रिश्ते के बाहर तांकझांक कर रही है. आखिर सुचित्रा चाहती क्या है?

क्या चाहती है सुचित्रा से पहले, श्रीकांत जो एक आदर्श फैमिली मैन भी है, देश की रक्षा में लगा हीरो भी, वो क्या चाहता है, पर भी बात होनी चाहिए.

श्रीकांत एक अलग तरह की नौकरी करता है, वह नौकरी उसका पैशन है, उसके प्राण बसते हैं उसमें. उस नौकरी या कहें काम के लिए, उसने घरवालों के रिश्तेदारों के ताने सहे, बच्चों के भी कि इतनी मेहनत करके भी ज्यादा कमा नहीं पाता है. वो फिर भी वही नौकरी करता है. यह नौकरी उससे ढेर सारा समय, अटेंशन और जोखिम मांगती है. जो जाहिर है वो देता है.

तो फिर वो फैमिली मैन कैसे है? घर के किसी काम में वो कोई सहयोग नहीं दे पाता. कभी-कभार दी गयी जिम्मेदारियां भी उसके हाथ से फिसल जाती हैं. जाहिर है जिन्हें देशप्रेम के लिये त्याग की चाशनी में लपेटकर जस्टिफाई किया जा सकता है. वो बच्चों को स्कूल से लाना भूल जाता है, बीवी की प्रेगनेंसी हो, डिलीवरी हो या कोई भी दूसरा मौका, वो कहीं नहीं हो पाता. फिर वो फैमिली मैन कैसे है? और तो और अपनी पसंद के काम को इतनी तवज्जो देना वाला व्यक्ति पत्नी के यह कहने पर कि वो अपने टीचिंग जॉब से ऊब गयी है, कुछ नया करना चाहती है, इस बात को समझ नहीं पाता.


दूसरे सीजन में वो परिवार के लिए अपनी पसंद की नौकरी छोड़कर कॉरपोरेट जॉब कर लेता है. जहां उसे हर दिन घुटन हो रही है, जो पूरे वक्त दिखती है या दिखाई गई है. दर्शक उस घुटन से कनेक्ट कर पाते हैं, लेकिन सुचित्रा की घुटन से, उसकी उलझन से कनेक्ट नहीं कर पाते. टेक्निकल तरह से श्रीकांत परिवार के साथ समय बिताना, साथ डिनर करना, डिनर पर फोन का इस्तेमाल न करने का नियम बनाना आदि कोशिशें करता है जो दर्शकों को नजर आती हैं और वो कह उठते हैं “बेचारा कितना तो कर रहा है और क्या करे?”

जबकि रिश्ते में, जीवन में आये ठहराव से जूझने की कोशिश सुचित्रा भी कर रही है. वो काउंसलिंग के लिए जा रही है. श्रीकांत को भी ले जाती है, जिसका श्रीकांत मजाक उड़ाता है. यह आम भारतीय पुरुषों की समस्या है काउंसिलिंग का मजाक बनाना, उसे महत्व न देना. और इस बात को काउंसलर के किरदार को बेहद हल्के तरह से गढ़कर मामला श्रीकांत के पक्ष में रख दिया गया. यह खतरनाक है.

क्या डायरेक्टर कहना चाहते हैं कि काउंसिलिंग जैसी कोई चीज नहीं होती या उसका कोई महत्व नहीं होता. शायद इसलिए सुचित्रा की उस कोशिश के मर्म को समझने की बजाय वह पूरा वाक्य मजाकिया ढंग से गढ़ दिया गया है.

अगर ‘फैमिली मैन’ श्रीकांत ने परिवार के लिए नौकरी बदली है तो सुचित्रा ने भी नौकरी छोड़ी है. वो भी घर पर बैठी है परिवार के लिए. फिर एक दिन अपने मैनेजर के साथ श्रीकांत जो करता है उसे देख कितनों के जख्मी दिलों को राहत मिली, लेकिन उसी घुटन, उसी तरह की पीड़ा से गुजर रही सुचित्रा जब वापस अपने काम पर लौटती है, तो इसे इस तरह दिखाया गया जैसे वो इश्क लड़ाने के लिए काम पर गई है.

सुचित्रा का एक ही संवाद मेरी पूरी बात को कहने के लिए काफी है, “15 साल से पूरी गृहस्थी अकेले संभाल रही हूं मैं. तुम अचानक से एक दिन आते हो और कुछ कोशिश करते हो और तुरंत तुम्हें बेस्ट हसबैंड और बेस्ट फादर का अवॉर्ड चाहिए.”

श्रीकांत जैसे तमाम लोग आसपास नजर आते हैं. हर समय अपनी मनमर्जी करने के बाद किसी रोज गिफ्ट देकर या डिनर पर ले जाकर सोचते हैं वो बीवी के लिए कितना कुछ तो कर रहे हैं और क्या चाहिए उन्हें? और अंत में यह जुमला “क्या चाहिए इन्हें आखिर... इनकी तो आदत है बड़-बड़ करने की.” और फिर धीरे से उन्हें इग्नोर करना और उनके जरिये मिलने वाली सुविधाओं का उपभोग करना पुरुष समाज सीख जाता है.

मुझे लगता है सुचित्रा को, श्रीकांत को जो और जितना चाहिए, उससे काफी कम ही चाहिए था, लेकिन उसे वो कभी मिला नहीं. लगातार अकेले गृहस्थी में पिसते-पिसते वो घुटन से अवसाद से भरने लगी. और तब उसे एक दोस्त मिल गया जो उसे उसके काम की ऊब से छुटकारा दिलाकर नए काम में उसे शामिल करना चाहता है. यहीं मसाला मिल गया पब्लिक को या दे दिया गया.

दूसरे सीजन तक तो अफेयर स्टेब्लिश भी नहीं हुआ सुचित्रा का, अभी से उसे क्यों ट्रोल कर रहे हो भाई. और अगर यही क्राइटेरिया है तो श्रीनगर में बॉस के रूप में मिली पुरानी गर्लफ्रेंड से मिलकर खुश हो रहे श्रीकांत को भी सामने रखो न. वह भी बस खुश ही है और सुचित्रा भी बस खुश ही है अपने दोस्त से मिलकर. जबकि श्रीकांत अपनी पत्नी की जासूसी करने से भी पीछे नहीं हटता है.


एक और बात, श्रीकांत के लिए कभी भी चाहे श्रीनगर जाना हो या चेन्नई जाना हो ड्यूटी के लिए मुश्किल नहीं रहा. सामान पैक किया और निकल गया. लेकिन अपनी नयी जॉब में जब सुचित्रा को अगले हफ्ते लंदन जाने का प्रस्ताव आता है, तो यकीन मानिए मेरी सांस थम गयी थी कि कैसे दोनों बच्चों को छोड़कर जाएगी वो?

वर्किंग वुमन के लिए पूरा दिन घर से बाहर रहते हुए घर और बच्चों को मैनेज करना ही इतना बड़ा चैलेंज होता है कि टूर पर जाना किसी विपदा के आने जैसा महसूस होता है, खासकर तब जब वो अकेले ही संभाल रही हों सब कुछ. यह चैलेंज श्रीकांत के सामने तो कभी नहीं आया न? कभी नहीं आता न?

तो सुचित्रा के किरदार को ट्रोल करना बंद करिए. अपने आसपास की स्त्रियों को थोड़ा और समझने की कोशिश करिए. अरे हां, अगर तीसरे सीजन में सुचित्रा का अफेयर डायरेक्टर स्टेब्लिश भी कर दे, तब भी उसे जज करने से पहले ठहरकर सोचिएगा जरूर.

The Quint में प्रकाशित 
लिंक- https://hindi.thequint.com/voices/opinion/the-family-man-amazon-prime-stop-trolling-suchitra-shrikant-tiwari-job#read-more

Thursday, June 10, 2021

डाक्टर वरयाम सिंह जी जन्मदिन मुबारक


जब भी डाक्टर वरयाम सिंह के बारे में सोचती हूँ तो मन एकदम से खुश हो जाता है. उनका जिक्र भर सुख और आत्मविश्वास से भर देता है. खुद पर भरोसा करना उन्होंने ही सिखाया. सोचती हूँ तो लगता है उन पर एक पूरी किताब लिख सकती हूँ. और जब लिखने बैठती हूँ तो सिर्फ 'सुकून' लिख पाती हूँ. इस कम लिख पाने में आत्मीयता का विशाल समन्दर है जो मुझे उनसे मिला है. आस्थावादी होती तो कहती भाग्य. लेकिन अभी कहती हूँ भाग यानी मेरा हिस्सा. उनके होने में जो मेरा हिस्सा है उसमें कितने खूबसूरत किस्से हैं.

आज जब साहित्य की तरफ कोई रेस सी लगी नजर आती है. कोई होड़. एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ ही नहीं एक-दूसरे की टांग फंसाकर गिराकर आगे निकलने की होड़ ऐसे में डाक्टर वरयाम सिंह की मुस्कुराहट के संग बैठ जाती हूँ. देखती हूँ सारे खेल तमाशे. 

मारीना पर काम करने के दौरान मैं सिर्फ मारीना तक नहीं पहुंची, उससे पहले पहुंची एक ऐसे व्यक्तित्व के पास जो ज्ञान से, प्रतिभा से, ओहदे से लबरेज थे. लेकिन आप अगर उनसे मिले हैं तो उन्हें याद करने पर पहली बात जो याद आती है वो है उनकी सादगी और उनसे मिला अपनापन.

फूलों और फलों से भरी डाल किस तरह झुकती जाती है उसका व्यक्तित्व से मिलान करना हो तो वरयाम जी याद आते हैं. कितना आसान है उनसे मिलना, बातें करना. उनसे तोहफे में ढेर सारी किताबें लेना. हर मौके बे मौके फोन पर बतिया लेना. उनकी उंगली  थाम रूस की गलियों में भटकते फिरना. कितना सुखद है अपनी शरारतों पर उनसे डांट खाना. 

सच में, उनके साथ मैंने खूब सारा समय जिया है. पलाश खिलने के मौसम में लगभग हर बरस दिल्ली में साहित्य अकादमी के प्रांगण में मेरा उनसे मिलना होता. मारीना धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी और मैं उनसे मिलते ही छोटी हो जाती थी. उनके पास बैठते ही लगता अब सब ठीक है. मैं अपनी तमाम गलतियों को उनके साथ बेहिचक बाँट लेती. वो एक बात को कई बार बताने पर भी कभी खीझते नहीं.

किताबें पढ़कर ही सब जाना नहीं जाता लोगों से मिलकर बहुत कुछ सीखा जाता है. वरयाम जी एक पूरा स्कूल हैं यह समझने का कि पढ़ने-लिखने से अहंकार नहीं नम्रता आती है, सहजता आती है जो पल भर में किसी अनजान को भी अपना बना लेती है. वो हिमाचल में रहते हैं. उनके गाँव बंजार का मौसम उनके जैसा ही है, प्यारा सा. आड़ू, नाशपाती, पुलम के फूलों और फलों वाले इस गाँव ने फूलों की घाटी में बदलते हुए खिलखिलाना, निश्छल प्यार लुटाना जरूर वरयाम जी से ही सीखा होगा.

आज उनके जन्मदिन पर मैं हमेशा की तरह बहुत बहुत खुश हूँ. उनके होने में जो मेरा छोटा सा हिस्सा है उसे मैं हमेशा सहेजकर रखूंगी. आप खूब जियें, स्वस्थ रहें, आपसे बहुतों को बहुत कुछ सीखना है अभी.

आपका जन्मदिन मुबारक आपको भी, हमें भी


Friday, June 4, 2021

स्मृति ही जीवन है


उदासी भी एक समय के बाद छीजने लगती है. उसे खुद से उकताहट होने लगती हो मानो. लेकिन जब तक उदास होने की वजह खत्म न हो आखिर रास्ता ही क्या इसमें धंसे रहने के सिवा. कोविड महामारी का यह दौर स्थाई उदासियाँ देकर गया है.और अभी गया भी कहाँ है. लेकिन सामान्य जीवन की पुकार इस कदर आकर्षक है कि पाँव खिंचते ही चले जाते हैं उस ओर. यह मानव स्वभाव है. देखा जाए तो इसी में जीवन की उम्मीद छुपी है. 'जीवन चलने का नाम' की तर्ज पर फिर से बाजार, दफ्तर फेसबुक गुलजार होने को हैं. लेकिन सोचती हूँ कि यह सामान्य होना क्या है. हम किस जीवन की ओर लौटने की इच्छा से भरे हैं? वही जीवन जो महामारी से पहले था या कोई और जीवन?

सामान्य शब्द का डायस मेरे हाथों में हैं. इसे लगातार घुमा रही हूँ. सामान्य क्या है? जो था, क्या वहीं लौटना अभिप्राय है या कहीं और जाना है. असल में वापस लौटने जैसा कुछ नहीं होता, कभी नहीं होता. होना भी नहीं चाहिए, लौटने में हमेशा एक नयापन शामिल रहता है. शामिल होना चाहिए. सुबह काम पर निकलते वक़्त जो हम थे, शाम को लौटते वक़्त उससे थोड़ा अलग हों तो बेहतर. थोड़ा बेहतर होते रहना मनुष्य की जिजीविषा होनी ही चाहिए. है भी शायद. लेकिन वो हमसे कहीं खो गयी है. या ढर्रे पर घिसटते हुए तथाकथित सफलता के पायदानों पर चढ़ते जाने के दबाव ने उसे हमसे छीन लिया है.

मुश्किल वक्त कभी खाली हाथ नहीं आता. पीड़ा और संताप के अलावा भी वह हमें बहुत कुछ देकर जाता है. क्या हम उसे देख पाते हैं? पीड़ा और संताप का वेग इतना प्रबल होता है कि हम कुछ और देख नहीं पाते. बहुत कम लोग देख पाते हैं उसे. बहुत कम.

इस महामारी की प्रलय से अगर हम सुरक्षित बच सके हैं तो इतना ही काफी नहीं है अब हमारे ऊपर दायित्व बढ़ा है ज्यादा बेहतर मनुष्य होने का, ज्यादा मानवीयता से भर उठने का. जीवन क्या है, कितना क्षणिक. कब छूट जाएगा कुछ पता नहीं. कभी भी, कहीं भी मृत्यु अपनी टांग अड़ा देगी और जीवन के तमाम हिसाब-किताब मुंह के बल गिर पड़ेंगे. वही हिसाब किताब जिनके लिए हम क्रूरता, अमानवीयता की हदें पार करते जाते हैं. क्यों? क्या होगा जो एक प्रमोशन कम मिलेगा, क्या हो जायेगा जो एक गहना कम होगा देह पर, क्या फर्क पड़ेगा अगर मानवीय मूल्यों के चलते हमें थोड़ा कम सफल व्यक्ति के तौर पर आँका जायेगा. असल सुख तो है चैन की वो नींद जो हर रोज हमें बेहतर मनुष्य होने के रास्ते पर चलते हुए आई थकन से उपजती है.

इस दौरान अच्छे भले व्यक्ति को 'बॉडी' बनते कई बार देखा. सांस के रहते तक वह व्यक्ति, व्यक्ति था उसका नाम था, पहचान थी सांस रुकते ही वह बॉडी हो गया. जिसके लिए आईसीयू, ऑक्सिजन, दवाइयों के लिए दौड़ते फिर रहे थे उसके लिए श्मशान घाट में नम्बर आने पर फूंकने का इंतजार होने लगा. वो व्यक्ति कैसे अचानक स्मृति भर बनकर रह गया. इस स्मृति की यात्रा कितनी लम्बी है यह उसके जिए हुए पर निर्भर करता है. फेसबुक पर आये श्रृध्धांजलियों के उछाल के बाद जो शेष बचती है जीवन में वह स्मृति. वह स्मृति ही असल में जीवन है.

दुःख, पीड़ा, अवसाद ने इस बार इतना खरोंचा है कि मन एकदम लहूलुहान है. इस दौर में कितनी ही बार ख्याल आया जाने अब हम अपनों से कभी मिल भी पायेंगे या नहीं. कितनों से तो नहीं ही मिल पायेंगे. कब कौन सी बात आखिरी बन गयी, कौन सी मुलाकात आखिरी बन गयी...हम अवाक देखते रह गये. उस आखिरी रह गयी मुलाकात और बात को मुठ्ठियों में बाँध लिया है, उस स्मृति में सांस शेष है. जो लगातार कह रही है, जीवन को दुनिया के क्षुद्र छल-प्रपंचों से बचाकर जियो, हर लम्हा भरपूर जियो. किसी की आँख का आंसू न बनो, किसी के आहत मन का कारण न बनो, बस इतना बहुत है.

शरीर और जीवन का बहुत मोह नहीं करना चाहिए, जो लम्हे सामने हैं जीने को उन लम्हों का मोह करना चाहिए, इस दारुण समय से हमने कुछ नहीं सीखा तो सामान्य जीवन की तरफ लौटने की हड़बड़ी किसी काम की नहीं.

link- https://epaper.jansatta.com/3116898/Jansatta/04-June-2021#page/6/2   




Thursday, May 20, 2021

ठहरना जरूरी है

बरस बरस के हांफ गये हैं बादल, जरा देर को ब्रेक लिया हो जैसे. और इस जरा से ब्रेक में ही परिंदों ने उड़ान भरी है. बरस के रुके हुए मौसम में एक अजब किस्म का ठहराव होता है. प्रकृति का समूचा हरा अपनी तिलस्मी स्निग्धता के संग मुस्कुराता नजर आता है. पत्तों पर अटकी हुई बूँदें किसी जादू से मालूम होती हैं. 

दोपहर के साढ़े बारह बजे हैं और मैं अभी तक सिर्फ एक कप चाय पीकर बारिश की संगत पर एकांत का सुर लगाने की कोशिश कर रही हूँ. यह सुर लग नहीं रहा अरसे से. कि जिस एकांत की कभी खोज रहा करती थी वही अब काटता क्यों है, भयभीत करता है. फिर यह भी है कि इसके खो जाने का भय भी है. अजीब  कश्मकश है. जो है उससे ऊब भी है, भय भी और उसी से मोह भी. जब कभी सुर लग जाता है तब एकांत महक उठता है और जब सुर नहीं लगता इसी एकांत को तोड़ देने के एक से एक नायाब तरीके जेहन में आते रहते हैं. 

असल मसला उस सवाल का है जो भीतर है और अरसे से अनुत्तरित है. हम जिन्दगी से क्या चाहते हैं? अगर इस सवाल का जवाब ठीक ठीक पता होता है तो वह मिलते ही हम संतुष्ट हो जाते हैं, खुश हो जाते हैं. लेकिन उस सवाल के उत्तर में अगर घालमेल है तो गडबड होती रहेगी.

मुझे हमेशा लगता है जवाब को छोड़ दें अगर हम पहले सही सवालों तक पहुँच जाएँ तो यह भी काफी है. शायद वहीँ से कोई राह खुले. 

खिली हुई जूही बारिश में भीग कर इतरा रही है. मौसम में सोंधेपन का इत्र है. भीतर की उदासी बाहर के मौसम से टकराकर टूट नहीं रही फिर भी टकराना अच्छा लग रहा है. 

एक परिंदा खिड़की पर आ बैठा. मेरी तरफ देखते हुए वो नहीं जानता कि अब वो इस पार इंट्री ले चुका है. सोचती हूँ एक बार चाय और पी जाए. कल शाम एक फिल्म की बाबत एक दोस्त ने बताया है, एक आधी पढ़ी किताब है इन्हें जमापूँजी सा सहेजे हूँ. फिल्म देख लूंगी, कितबा पूरी पढ़ लूंगी तो पूँजी खत्म हो जायेगी...इसलिए थोड़ा ठहरना जरूरी है.

Wednesday, May 19, 2021

वर्तमान में कोई ऐसी जगह नहीं...मारीना

- ममता सिंह 
(अगर आपको जीवनी पढ़ना पसन्द है तो रूस की महान कवयित्री मारीना त्सेवेतायेवा की जीवनी ज़रूर पढ़नी चाहिए...
उथल पुथल,संघर्ष,देश से निर्वासन,ग़रीबी, बीमारी,बच्चों की मृत्यु के बीच भी लिखती हुई मारिया का जीवनवृत्त न केवल साहस और लिखने की छटपटाहट का चरम बिंदु है बल्कि यह आज के अंधेरे और आशाहीन समय में एक सम्बल भी है।)

'अजीब बात है हर कोई अपनी-अपनी लड़ाई अकेले लड़ रहा होता है फिर भी किसी कंधे की तलाश होती है,जिसके सर पर ठीकरा फोड़ा जा सके,सुनने में अटपटा लग सकता है,लेकिन अक्सर हम ठीकरा फोड़ने के लिए अपने प्रिय कंधे ही तलाशते हैं।' पृष्ठ 56

'असल में प्रेम हमारे भीतर ही होता है,कोई होता है,जो हमारे भीतर के उस प्रेम तक हमें पहुंचा देता है,जाने-अनजाने,उसके बाद हम ज़िन्दगी भर उसी प्रेम में जीते रहते हैं,अलग अलग लोगों से,चीज़ों से घटनाओं से जुड़ते रहते हैं,लेकिन केंद्र में वही होता है प्रेम' पृष्ठ 86

'मेरे पास वर्तमान में कोई ऐसी जगह नहीं थी,जहां मैं ख़ुद को सुरक्षित महसूस कर सकूं...न ही भविष्य की मुट्ठी में ऐसी कोई उम्मीद थी,इस इतनी बड़ी समूची दुनिया में मुझे मेरे लिए एक इंच जगह भी ऐसी नहीं नज़र आती थी,जहां मैं अपनी आत्मा को निर्विघ्न,बिना किसी डर के उन्मुक्त छोड़ सकूँ.मैं धरती के उस अंतिम टुकड़े पर हूं जिस पर मैं इसलिए खड़ी हूँ,क्योंकि मेरे होने से वह ख़त्म नहीं हो सका है.मैं इस छोटे से टुकड़े पर अपनी पूरी ताक़त से खड़ी हूँ.' पृष्ठ 213

किताब-मारीना
लेखक- प्रतिभा कटियार
प्रकाशक-संवाद प्रकाशन
पृष्ठ-259
मूल्य-300


Tuesday, May 18, 2021

स्मृति शेष- लाल बहादुर वर्मा


'है' से 'था' की दूरी तय करने में
सिर्फ समन्दर भर पानी नहीं लगता
आकाश भर सूनापन भी लगता है

सिर्फ जिए हुए लम्हों का इत्र ही नहीं लगता 
जीने से छूट गये लम्हों की हुड़क भी लगती है

सिर्फ धरती भर धीरज ही नहीं लगता  
स्मृतियों की सीढ़ी भी लगती है 
जो सितारा बने व्यक्ति तक पहुँचती है 

'है' से 'था' की दूरी तय करने को  
एक लम्बी हिचकी लगती है 
और ढेर सारा सूख चुका सुख लगता है. 

Sunday, May 16, 2021

मोगरे की खुशबू और उदास दिन रात


दिन हमेशा की तरह उदासी की सूरत लिए उगा और पीछे-पीछे घूमने लगा. उसे चकमा देने के लिए मैं बार बार जगह बदलती, काम बदलती लेकिन उसे पता चल जाता और वो अपनी बिसूरती सी सूरत लिए मेरे पीछे आ खड़ा होता. थककर मैं कमरे में लेट गयी और पंखे को देखने लगी. पंखा चल नहीं रहा था लेकिन दिमाग चल रहा था. कभी-कभी आपको पता नहीं होता कि आपके साथ क्या घट रहा है लेकिन वो जो घट रहा होता है उसके असर से बचना मुश्किल होता है. खासकर तब जब ऐसे उदास दिन पीछे पड़े हों.

दिन भर दिन के साथ आँख-मिचोली का खेल चलता रहा. फेसबुक वाट्स्प, न्यूज़ सबसे मुंह मोड़कर तमाम उदास खबरों से खुद को छुपाये फिरती हूँ लेकिन शाम होते-होते सब कोशिशें बेकार हो जाती हैं और दिन अपनी कारस्तानी दिखाकर कुछ उदास कुछ गुस्सा दिलाने वाली खबरों के हवाले करके अपनी उदासी शाम को टिकाकर मुंह चिढ़ाते हुए चला जाता है. 

ऐसे ही बीत रहा था आज का दिन भी. इतवार था तो कुछ ख़ास होना चाहिए और उस ख़ास में आँखों को छलक लेने को जरा स्पेस मिली. ढेर सारा रो लेने के बाद ढेर सारी प्यास लगती है यह मैंने पहली बार महसूस किया और लगातर तीन गिलास पानी पिया. सुबह से जो बेचैनी का गोला पेट में घूम रहा था वो अब पेट के पानी में गुडगुड करने लगा. मुझे इस गुडगुड वाली बात पर हंसी आ गयी. रोने के ठीक बाद वाली हंसी. फिर मुझे लगा इस समय ढेर सारे लोग हैं जो रो भी नहीं पा रहे अगर मैं उनके कुछ काम आ सकूँ और उनके हिस्से का रो लूं? लेकिन अगले ही पल यह बात काफी फ़ालतू लगी. अपनी ही पुरानी बात याद आ गयी कि दुःख आंसुओं से कहीं बड़ा होता है. 

शाम की वॉक करते-करते मैं उदासी दोनों से थकने लगे. रोज शाम की वॉक के वक़्त कुछ मोगरे अपने बालों में सजा लेती हूँ. वो रात भर महकते हैं और नींद न आने की सूरत में उनकी खुशबू मेरा साथ देती है. आज ढेर सारे मोगरे खिले मिले. अचानक मैंने महसूस किया कि एकदम से मेरा मन खिल गया है. ढेर सारी उदासी के बाद यह जरा सा खिलना देर से रियाज करते-करते किसी सुर के सही-सही लग जाने जैसा था. मैंने अपनी हथेलियों को मोगरे के फूलों से भर लिया. और मोगरे भरी उन हथेलियों से अपना पूरा चेहरा ढंक लिया. उस वक्त दिन और रात के मध्य का ऐसा समय था जब दिन और रात के संतरी ड्यूटी बदलते हैं और कुछ देर को सांझ की बेला दिन और रात के सिपाहियों से खाली होती है.

इसके पहले की रात अपनी उदास सूरत लिए नमूदार होती मैंने मोगरे के फूलों को धागे में पिरोकर बालों में पहन लिया. अब मैं उदास सूरत लिए पीछे घूमती रात से बचती फिर रही हूँ...
क्या तुम तक मोगरे की खुशबू पहुँचती है?

Saturday, May 15, 2021

उम्मीद के सुर और सूरजमुखी


जाने कौन देहरी पर उदास सुबहें छोड़ जाता है. जाने कौन है जो रातों की नींदों को दुनिया भर की चिंताओं से बदलकर चला गया है. जाने कौन है जिसने पूरे मौसम पर उदास चादर ओढ़ा दी है. यूँ कि दुनिया का कारोबार है चलना सो चल रहा है लेकिन जानती हूँ कुछ है जो एकदम ठहर गया है. किसी काम में मन नहीं लगता. उसी अनमने से मन के साथ घर भर में इधर से उधर, रसोई से बालकनी, एक किताब से दूसरी किताब, एक मीटिंग से दूसरी मीटिंग के बीच डोलती फिरती हूँ फिर देखती हूँ सूरज डूबने को हो आया है. तो एक और दिन बीता...यह ख्याल आने को होता ही है कि एक डर उस ख्याल को ओवरटेक करके सामने आ जाता है. नींद न आने का डर. करवटों में रात के गुजरने के इंतजार और फिर उदास सुबह के आने का डर. ये डर, ये उदासी कैसे जायेगी. कब जाएगी. जतन तो करती हूँ कि इस उदासी की बेड़ियों को काट सकूं, उदास सुबहों को जरा पीछे धकेल सकूं और एक नर्म नाज़ुक प्यारी मुस्कुराती सुबह के गले से लग जाऊं. लेकिन सब जतन अधूरे रह जाते हैं.

कल माँ ने पूछा,'लीचियां बड़ी हो गयी होंगी अब तो?' मैंने चौंककर कहा, 'नहीं, नहीं तो मैंने तो नहीं देखा.इस बार बौर भी आई थी क्या? लगता है इस बार बौर भी नहीं आई'. माँ ने प्यार से डपटते हुए कहा,' तुम्हारा ध्यान न गया होगा.बौर तो मेरे वहां रहते ही आ गयी थी.' मैं चुप रही. सचमुच मुझे कुछ याद नहीं. जैसे सब कुछ दिखना बंद हो गया है. इस बार कोयल की आवाज भी नहीं आती. सुबह की चाय भी किसी काम सी लगने लगी है.

यह मन की स्थिति है. किसी से कहने का कोई अर्थ नहीं. एक हजार नसीहतें मिल जाएँगी. लेकिन मेरा मन है मैं जानती हूँ. समय के माथे पर जो उदासी है उससे विलग कैसे रह सकता है कोई. सकारात्मक बातें भी जाने क्यों जबरन किया गया ऐसा प्रयास लगता है जिसे करने में घुटने, कोहनियाँ सब छिल जाते हैं. एक मुस्कुराहट की आस में लहूलुहान होने का सिलसिला जारी है.

दुनिया के तमाम शब्दकोषों को पलट रही हूँ. ढूंढ रही हूँ सद्भावना का वह एक शब्द जो फाहे की तरह रखा जा सके किसी के जख्मों पर. शब्द जिसके सीने से लगकर टूटती हिचकियों के संग जी भर के रोया जा सके. एक शब्द जिसे अपनों के चले जाने के दुःख में सूख चुकी आँखों के सामने रख दें तो गुम गया रुदन वापस लौट आये और कोई रो ही ले जी भर के. 

इन्सान पर जो दुःख टूटा है न उसके आगे दुनिया भर के शब्दकोष शर्मिंदा खड़े हैं. 'अपना ख्याल रखना' इन दिनों  बहुत अधूरा महसूस करता है बहुत निरीह. लेकिन सिवाय इसके चारा ही क्या है. यूँ तो इतरा कर कहा करते थे कभी कि, 'मैं क्यों रखूं अपना ख्याल, यह तो तुम्हारा काम है.अपना ख्याल भी खुद ही रखा तो क्या बात हुई. तुम रखना मेरा ख्याल, मैं तुम्हारा रखूंगी...' वो लड़कपन की बातें थीं. वक्त सयाना है. वक्त के आगे हम सब घुटने टेके बैठे हैं. उनके आगे भी जो वक्त की इस क्रूर मार से बचा सकते थे. वो क्या कभी आईना देखते होंगे? क्या उन्हें चैन से नींद आती होगी? क्या उन्हें किसी की कराहें, किसी का विलाप नींद से जगा न देता होगा? मेरे इस सवाल पर एक अट्टहास गूंजता सुनाई देता है. ये वही लोग हैं जिन्होंने रुदालियों की बुनियाद पर महलों की नींव रखी है.

ध्यान हटाने की कोशिश में तुम्हारा ख्याल आता है. सुना था प्रेम के पास हर मर्ज की दवा होती है. प्रेमी की एक बूँद आवाज मरहम होती है लेकिन दुख की इन बेड़ियों को काटने के लिए तुम्हें अभी और दरिया, और रेगिस्तान, और जंगल पार करने हैं शायद. 

मोहन ने बांसुरी का टुकड़ा भेजा है. बहुत मीठा बजाते हैं मोहन. मैं उदास सुबह को इन बेमतलब के शब्दों से खुरचने की कोशिश कर रही हूँ जिसमें मोहन की बांसुरी साथ दे रही है. ’बरसेगा सावन झूम झूम के...’ बांसुरी की मिठास चाय में घुलने लगी है...शायद सुबह में भी. कि आज ठीक से देख पा रही हूँ सामने खिले सूरजमुखी...छोटी लीचियां और मम्मी के लगाये करेले के नन्हे पौधे में (जो अब लम्बी चौड़ी बेल बन चुकी है) आये फूल...

उम्मीद के सुर से लगातार उँगलियाँ टकराती जाती हैं...

Sunday, May 9, 2021

जंग जारी है...


मुझे एक ऑक्सीजन सिलेंडर चाहिए?
है तो लेकिन वो सिर्फ परिवारी जन के लिए है. क्या पेशेंट आपके परिवार के हैं?
मैंने जोर से सर हिलाकर कहा 'हाँ, एकदम' जबकि सर हिलाना फोन पर नहीं दिखा होगा.
कौन हैं?
मैंने कहा वो मेरे पिता जैसे हैं?
मैडम 'जैसे' का कोई रिश्ता नहीं होता.
फोन कट

मुझे एक ऑक्सीजन सिलेंडर चाहिए?
अच्छा. मिल जाएगा. एक घंटे में इसी नम्बर पर फोन करियेगा.
आपने कहा था एक घंटे बाद फोन करने को. मुझे ऑक्सीजन सिलेंडर चाहिए.
हाँ, तो पता और पेशेंट के डिटेल्स भेजिए
....हॉस्पिटल.
सौरी मैडम हम हॉस्पिटल में सिलेंडर नहीं भेजते. उन्हें भेजते हैं जिन्हें हॉस्पीटल नही मिले.
फोन कट

मुझे एक ऑक्सीजन सिलेंडर चाहिए...
ओह, आपने थोड़ा पहले फोन किया होता. आज
आज संडे न होता
नम्बर नम्बर नम्बर...फोरवर्ड ....फोन स्विच ऑफ या बिजी

जब तक उतरो न मैदान में जंग की सिर्फ खबरें लहूलुहान करती हैं जब उतरो मैदान में तब खबरों की तो दूर शरीर के जख्मों की भी सुध नहीं रहती. इस समय किसी की जान बचाना भी एक जंग है...

फ़िक्र से भरी बेटियां माँ जैसी हो जाती हैं


गोलियों वाली नींद मुझे अच्छी नहीं लगती. लगता है उधार की नींद है. गोलियों वाली नींद से डर भी लगता है. गोलियों की आदत जो लग जाती है फिर इससे निकलना आसान जो नहीं होता. यूँ किसी भी आदत से निकलना कहाँ आसान होता है. तुम्हारी याद की आदत...वो भी तो कहाँ छूट पायी है अब तक. 

खैर, इन दिनों फिर से गोलियों वाली नींद का सिलसिला चल पड़ा है. ऐसा नहीं कि मैंने बिना गोलियों वाली नींद के लिए कोशिश नहीं की. और मुझे नींद आ भी जाती है लेकिन फिर वो बीच में रात के बीच सफर में टूट जाती है और उसके बाद दुनिया भर के ख्याल मेरे पीछे पड़ जाते हैं. मैं घबरा जाती हूँ.  बार-बार पानी पीती हूँ, करवट लेती हूँ लेकिन नींद नहीं आती.

ऐसा ही कल रात भी हुआ. मैंने नींद की गोली नहीं खायी और खूब व्यायाम किया. पैदल चली. खुद को खूब थकाया और एक एनिमेशन फिल्म देखते हुए आराम से सो भी गयी लेकिन वही रात के आधे सफर में टक से खुल गयी नींद. और फिर सारे दुःख सिमटकर घेरकर बैठ गए. दुःख से डूबे चेहरे, लाचार लोग, मृत्यु, अवसाद, गले लगकर रो तक न पाने की पीड़ा...जब पौ फटी तो दिल को सुकून हुआ कि रात कटी तो सही. ये रात तो कट गयी लेकिन ये जो विशाल जीवन एक उदास रात में बदल गया है ये कैसे बदलेगा. पता नहीं.

तुम्हें जो बात बतानी थी वो ये कि जब मेरी नींद टूटती है तब बेटी की नींद भी टूटती है. वो सिरहाने चिंता में बैठी रहती है कि माँ क्यों बेचैन है. मैं चाहकर भी सोने का नाटक देर तक नहीं कर पाती. और फिर हम दोनों जागती रहती हैं. वो मेरी नींद की रखवाली करती है बरसों से. उसे ऐसा करते देखना दुःख से भरता है. जब उसे बेफिक्र होना चाहिए था तब वो फ़िक्र से भरी हुई है. फ़िक्र से भरी बेटियां माँ जैसी हो जाती हैं.

यह काला समय बीतेगा तब शायद हम वापस अपनी नींदों में लौटेंगे जो बचे रहेंगे. यह समय किसी दुस्वप्न सा है.  बचपन से एक सपना मुझे डराता था कि चारों तरफ लाशें ही लाशें...मैं उस सपने के डर से सोने से डरती रही. वो सपना अब हकीकत बन चुका है. न नींद में चैन लेने देता है न जाग में. हम सब आने भीतर गहन उदासी समेटे जीवन को सामान्य करने की कोशिश में लगे हैं, लेकिन कर नहीं पा रहे. फोन उठाते डर लगता है, मैसेज चेक करते डर लगता है. जागते डर लगता है, सोते डर लगता है.


सुबह उठी हूँ तो हैपी मदर्स डे का कार्ड रखा मिला है सिरहाने...यही सुख जियाये हैं.
तुम अपना ख्याल रखना.

Friday, May 7, 2021

The Disciple- ज़िन्दगी का रियाज़



The Disciple देखते समय पूरे वक़्त रोयें खड़े रहे, आँखें टप टप करती रहीं. कहने को तो यह फिल्म है लेकिन असल में यह जीवन का सत्व है. जिसे निचोड़कर इस फिल्म में रख दिया गया है. यह फिल्म उस रियाज़ की बात करती है जो जिन्दगी को साधने से सधता है. महीनों सालों रियाज़ करके हम सुर को ठीक से लगाना तो सीख सकते हैं लेकिन उस सुर के भीतर जो शुद्धता है, मर्म है, भाव है वह आत्मा की शुध्धता के रियाज़ से ही आता है.

मैं एक दर्शक के तौर पर इस फिल्म से अभिभूत हूँ और अभिभूत व्यक्ति ठीक व्यक्ति नहीं होता समीक्षा जैसी चीज़ों के लिए और वो मुझे करना आता भी नहीं. इसलिए इस फिल्म को लेकर मेरे कुछ भाव ही व्यक्त्त कर रही हूँ. फिल्म शास्त्रीय संगीत की दुनिया की कहानी है. किस तरह कोई पूरी ज़िन्दगी लगाकर सुर साधना करता है और कैसे कोई थोड़ा सा ही सीखकर शोहरत की बुलंदियों पर पहुँच जाता है.

लेकिन मेरे लिए यह फिल्म उस यात्रा की है जो हमारे भीतर चलती है, जहाँ अपनी प्यास का कुआँ हम खुद खोदते हैं और उस कुँए के मीठे पानी से खुद की प्यास बुझाते हैं. जहाँ एक सुर सही लग जाने पर मन नाच उठता है और ठीक से न लग पाने पर तालियों की गडगडाहट के शोर में भी उदास हो जाता है.

इस फिल्म को देखते हुए मुझे किशोर वय के वे दिन भी याद आये जब मैं सितार सीखा करती थी और पड़ोस के कमरे में वोकल की क्लास चलती थी. हमें फ़िल्मी गीत गाने या बजाने पर एकदम प्रतिबन्ध था. और वो कुछ इस तरह हमारे गुरु जी ने हमें बताया था मानो अगर हमने फ़िल्मी गीत बजा दिया तो कोई पाप हो जायेगा. हमें तब ज्यादा समझ तो नहीं आया था लेकिन हमसे कोई पाप न हो इसलिए हमने फ़िल्मी गीत बजाने की कभी नहीं सोची. इसलिए जब कोई मेहमान या रिश्तेदार कहते ‘बेटा जरा हमें भी बजाकर सुनाओ’ तो मैं अपना प्रिय राग मालकोश या भीमपलासी बजाने बैठ जाती. सुनने वालों को लगता वो फंस गए हैं. वो बीच में ही कहते ‘बेटा कुछ गाना वाना नहीं बजाती हो?’ तो हम शान से कहते हमारे गुरु जी ने गाना बजाने को मना किया है. क्यों मना किया गाना बजाने को, क्यों एक ही राग को महीनों बजाने के बाद भी गुरु जी को कुछ कम ही लगता था उसमें इन सवालों का जवाब इस फिल्म में है.

फिल्म के कुछ टुकड़े आपसे साझा करती हूँ,

‘एक अस्थिर मन के साथ कोई भी व्यक्ति गहराई और सच्च्चाई से ख्याल नहीं गा सकता. प्रत्येक स्वर की, प्रत्येक श्रुति की पूजा करने के लिए मन का पवित्र और निष्काम होना जरूरी है. ख्याल का अर्थ क्या है? ख्याल उस समय विशेष, उस पल में कलाकार की मन की अवस्था को कहते हैं. कलाकार अपने मन की अवस्था को ख्याल के माध्यम से प्रस्तुत करता है. गाते समय आपको खुद पता नहीं होता कि राग का कौन सा नया पहलू आप उजागर करेंगे. अगर आप चाहते हैं कि राग का सत्य स्वयं सामने आये तो आपको मन से असत्य, लोभ और अपवित्रता को मिटाना होगा.’

‘बारीकियों में फंसना छोड़ो, तुम साल दर साल रियाज़ करके बारीकियों पर काबू पा सकते हो. पर वह तुम्हें सत्य की ओर नहीं ले जाएगा. शैली अपने अंदरूनी जीवन को व्यक्त करने का केवल एक माध्यम है, शैली सिखाई जा सकती है सत्य सिखाया नहीं जा सकता, उसके लिए निर्भीक सच्चाई के साथ अपने अंदर झाँकने की ताकत होनी चाहिए यह बहुत कठिन है यह जीवन भर की तलाश है...’

‘प्रतिभावान कलाकारों की संगत में रहने से और उनके बारे में किताबें छापने से आप खुद प्रतिभावान नहीं बन जाते.’

मैं इस फिल्म को जीवन के हर पहलू से जोड़कर देख पा रही हूँ फिर भी लगता है शायद अपनी सीमित समझ के चलते कम ही देख पा रही हूँ. जहाँ माई (संगीत गुरु) ख्याल की संगीत की बारीकियां बता रही हैं मुझे सुनते हुए लगा हाँ, ऐसा ही तो लिखने के बारे में भी है. बहुत सारा पढ़कर, सुनकर लोगों से मिलकर लेखन की बारीकियां जाना लेना कौन सा मुश्किल है, लेकिन शब्द वो क्या सिर्फ शब्द होते हैं. उनके भीतर भाव का जो संसार होता है उस तक पहुंचना, उन शब्दों को अपनी निश्छल आत्मा के ताप में पकाना और तब लिखना. बिना यह सोचे कि इस पर कितनी वाहवाह मिलेगी बल्कि उस अनुभव को प्राप्त करने को जब कुछ ऐसा लिख जाय हमसे कि आत्मा का कोलाहल कुछ शांत हो और आँखों से निर्मल नीर की नदी छलक उठे.

ऐसी फ़िल्में तकनीक से नहीं रूहानी जुड़ाव से बनती हैं. फिल्म धैर्य मांगती है देखने के लिए, एकांत मांगती है बिलकुल वैसे ही जैसे रियाज़ मांगता है...लेखक निर्देशक चैतन्य तम्हाणे ने इसे आत्मा से बनाया है और वैसे ही आत्मा के संगीत से इसे सींचा है अनीश प्रधान ने. आप सबके प्रति आभार से झुकी हूँ.

फिल्म नेटफ्लिक्स पर है.

Saturday, May 1, 2021

मदद करना उपकार नहीं


मदद और उपकार में बड़ा फर्क होता है. इस समय तमाम मदद इमदाद जरूरतमंदों तक पहुँचाने में लगे हैं लोग. कुछ बच रहे हैं कुछ नहीं. कहीं मदद पहुँच पा रही है कहीं नहीं. लेकिन शायद सबके भीतर एक जज्बा जरूर है कि किसी तरह बीमार तक मदद पहुंचा सकें, किसी की साँसों की डोर को थाम सकें. यह मदद का जज्बा है. इसमें उपकार नहीं है. जरा भी नहीं. और यही इस बुरे वक्त की जरा सी सही लेकिन अच्छी बात है. इसके दो कारण हो सकते हैं एक कि यह वक्त इस कदर निर्मम है कि कुछ सोचने का मौका ही नहीं दे रहा और दूसरी कि अगर हम मनुष्यों पर सामाजिक दुराग्रहों की परतें न चढ़ी होतीं तो मूलतः हम भले ही हैं. कुछ लोगों की परतें इस दौर में उतरीं और वे बेहतर मनुष्य हुए कुछ की परतें मजबूत थीं या उनकी उन परतों को उतारने की कोशिशें कमजोर थीं और वे अब तक दुराग्रहों के दलदल में फंसे रहे. 
यह वक्त क्या कह रहा है. इसने हमें बताया कि जिया हुआ लम्हा ही जीवन है बाकी सब हिसाब-किताब है. यह लम्हा कह रहा है कि वो जो छोटी-छोटी सी बातें थीं न स्पर्श, गले लगाना, हथेलियाँ कसकर हथेलियों में भींच लेना, काँधे से सटकर बैठना जो हमसे छूट गया था जीवन की आपाधापी में, कभी लापरवाही में भी वो कितना जरूरी था. वो जो पुकारना था प्रिय को उसके नाम से और जताना था उसे कि 'तुम हो तो जीवन खुश रंग लगता है,' वह अब कभी नहीं कहा जा सकेगा. उनसे जो जा चुके हैं जीवन से. जो छोड़ गए हैं स्मृतियाँ और एक अधूरापन कि इस तरह जाने की सोची तो नहीं थी. 

लेकिन वो जो दूर कमरे में आइसोलेशन में हैं उनका भी एक मन है जो टूट रहा है. उन्होंने भी किसी अपने को खोया है. उन्हें समझ नहीं आ रहा कि वो अपने प्रिय के जाने से ज्यादा दुखी हैं या अपनी सांसों की डोर को सहेजने को ज्यादा परेशान है. आइसोलेशन भौतिक है लेकिन तोड़ रहा है भावनात्मक दुनिया को. 

कितने दिन हुए किसी के गले नहीं लगे, कितने दिन हुए किसी की बहती आँखों को पोछ नहीं पाए. कुछ दुःख इतने भारी होते हैं कि उनको उठाने में पूरी जिन्दगी खर्च हो जाती है. उन बच्चों की आँखें पल भर को भी जेहन से हटती  नहीं जिन्होंने अपने माँ-बाप दोनों को खो दिया. बेटियों का दर्द इतना ही है कि मम्मी पापा को आखिरी बार देख भी न पाए. जो माँ पूछकर पसंद की चीज़ें बनाकर खिलाती थी फिर भी खाने में होती थी न-नुकुर वो मदद में आने वाले खाने के पैकेट का इंतजार करती हैं और चुपचाप खा लेती हैं उसमें होता है जो भी खाना, जैसा भी.
 
अच्छा है लोग मदद कर रहे हैं, उपकार नहीं. वरना तो बची-खुची जिन्दगी और भारी हो जाती. सोचती हूँ कि काश किसी के काम आ सकती, कुछ तो कर पाती. उन बच्चियों को छाती से लगा पाती कह पाती मैं हूँ तुम्हारी माँ, मैं बनाऊँगी तुम्हारी पसंद का खाना, तुम पहले की तरह नखरे करना. लेकिन शब्द हलक में अटक जाते हैं. कुछ कह नहीं पाती. 

यह मैं क्यों लिख रही हूँ, जब कुछ करना चाहिए जीवन के लिए तब लिखना क्या है आखिर सिवाय लग्जरी के. पता नहीं. मैं शायद रो रही हूँ. यह लिखना नहीं रोना है, बिलखना है, यह इच्छा है उदास दोस्त को कलेजे से लगा लेने की शायद...कुछ पता नहीं बस किसी मन्त्र की तरह बुदबुदाती हूँ सब ठीक हो....

ठीक शब्द के ढेर सारे बीज बो देना चाहती हूँ, पूरी धरती पर उगाना चाहती हूँ 'सब ठीक है' के नन्हे-नन्हे वाक्य. हालाँकि जानती हूँ 'सब ठीक है...' एक भ्रम है. कुछ है जो कभी ठीक नहीं होता...बस कि उस न ठीक के साथ जीने की आदत डालनी होती है.

Friday, April 30, 2021

अपना ख़याल रखना


30 अप्रैल 2021

एक गहरी चुप सी लगी है. कुछ कहते नहीं बनते, कुछ सुनने को दिल नहीं करता. उदास खबरें बीनते बीनते हाथों में फफोले निकल आये हैं. लेकिन इन फफोलों का दर्द नहीं होता. दर्द होता है किसी के दर्द को कम न कर पाने का. कैसी महामारी है ये, ये कैसे बुरे दिन हैं कि चरों तरफ बस मौत बरस रही है. क्या सचमुच लोग वायरस की मार से मर रहे हैं. नहीं, ज्यादा लोग सिस्टम के फेल्यौर से मर रहे हैं. ये मौतें नहीं हैं हत्याएं हैं और हम दुर्भाग्य से इस हत्याकांड के गवाह. क्या हम कुछ नहीं कर सकते? हम कुछ क्यों नहीं कर सकते?

काश रोक पाए होते असमय गए लोगों को. काश गले लगा पाए होते उन सबको जो अपनों से बिछड़ गए. ये काश इतना बड़ा क्यों हो गया. ऐसी बेबसी, ऐसी लाचारी कभी महसूस नहीं की. कभी भी नहीं. एक बार मेरे पड़ोस में रहने वालों ने अपने जवान बेटे को खो दिया था. एक्सीडेंट में. चूंकि वो परिवार हमारे परिवार के काफी करीब था इसलिए वो पारिवारिक क्षति ही थी. इतने बरस हो गए उस बात को आज तक उस बच्चे का मुसुकुराता चेहरा आँखों के आगे घूमता रहता है. इस दौर ने तो न जाने कितने अपनों को. कितने अपनों के अपनों को निगल लिया. दिल इस कदर घबराया रहता है कि अब कोई और खबर न आये, और तब तक दो चार और खबरें तोड़ देती हैं. दिन भर एम्बुलेंस के सायरन की आवाजें दिल की धडकनों को तेज करती रहती हैं.

यह कैसा समय है. क्यों है ऐसा समय. क्या सरकार की फेल्योर दिखती नहीं लोगों को. क्यों नहीं दिखती. कब दिखेगी आखिर. यह नृशंस हत्याकांड है. ठीक है कि इस वक़्त सरकार को कोसने से ज्यादा जरूरी है लोगों की मदद करना, लेकिन यह क्या कि मदद करने वालों के खिलाफ ही कार्रवाई करने लगे सरकार. इसी वक़्त चुनाव भी करवाए सरकार. और हम अभी सरकार को न कोसें.क्यों भला?

सच कहूँ तो समझ में नहीं आ रहा कि मेरे मन में गुस्सा ज्यादा है या दुःख. या दोनों ने मिलकर कुछ नया ही गढ़ लिया है. न जाने कब यह हाहाकार रुकेगा. न जाने कब जिन्दगी सम पर आएगी. ऐसा पहली बार हुआ है कि अब प्यार पर प्यार नहीं आता बस उसकी सुरक्षा का ख्याल आता है. तुम जहाँ रहो सुरक्षित रहो...प्यार का क्या है वो तो अंतिम सांस तक रहेगा ही. वो कब मुलाकातों के भरोसे बैठा था. बस कि सांसें बचाते हुए हम खुद की निर्मिति पर भी ध्यान टिका सकें...काश कि यह ज़िन्दगी किसी के काम आ सके.

तुम अपना ख़याल रखना.

Sunday, April 25, 2021

दुःख


कोई घुटता हुआ दुःख सरक रहा है साँसों में
बाहर निकलने को व्याकुल है दर्द भरी चीख 
जिसकी कोई जगह नहीं अभी बाहर

फफक कर रोने की इच्छा को रौंद दिया है समय ने
कि आँखों में आंसुओं की नहीं
बचे हुओं को बचाने की कोशिशें हैं
भारी होती सांसों पर भारी है
खुद को सहेजने की जिम्मेदारी

खिड़की पर बैठी उदास चिड़िया पूछती है 
क्या सचमुच उम्मीद जैसा होता है कोई शब्द
क्या सचमुच समय के पास होता है 
हर घाव का मरहम है...?

Friday, April 23, 2021

अप्रैल का सीना छलनी है




पेड़ों से पत्तियां नहीं उदासी झर रही है
रिक्त हथेलियों में उतर आया है सूना आसमान
रास्तों की वीरानी टपकती रहती है कोरों से
कि आहटें सिर्फ उदासी की खबर बन आती हैं
'अपना ख्याल रखना' के भीतर
कुंडली मारे बैठी है बेचैनी
अप्रैल का सीना अपनों के दुःख से छलनी है...

Wednesday, April 21, 2021

कविता कारवां के सभी लाइव कार्यक्रम स्थगित



साथियो,

जैसे-जैसे बाहर के हालात ख़राब होते जा रहे हैं मन का मौसम उजड़ता जा रहा है. जब कविता कारवां के पांचवी वर्षगाँठ के अवसर पर सबको साथ लेकर मिल बैठने की सोची थी तब क्या ख़बर थी कि ऐसे मंज़र सामने आयेंगे. इन हालात में कविता कारवां टीम लम्बे समय से उहापोह में थी और आज वह उहापोह ख़त्म हुई. हमने आज से शुरू होने वाले सभी लाइव कार्यक्रमों को फ़िलहाल स्थगित करने का निर्णय लिया है. शायद अभी इस समय हम सबकी भूमिका कहीं और ज़्यादा है. शायद किसी को ऑक्सीजन पहुँचाने, प्लाज़्मा के लिए संपर्क करने, किसी की हिम्मत बढ़ाने के लिए साथ खड़े होने या दो घड़ी उदास लोगों के साथ चुपचाप बैठ जाने की.


जिन भी साथियों ने इन पांच दिन के लाइव के लिए रजिस्ट्रेशन किये, सहमति दी उन सबके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए उम्मीद करते हैं कि हालात सामान्य होने पर हम फिर से कार्यक्रमों के ज़रिये जुड़ रहे होंगे.

आप सब अपना बहुत सारा ख़्याल रखिये. कविता कारवां परिवार इस दुःख और त्रासदी के समय में आपके साथ है.

शुक्रिया!

Monday, April 19, 2021

तुमसे प्यार है



किसी से कहना हो
कि तुमसे प्यार है
तो कह दो
इस मुश्किल वक़्त में
कौन जाने ये शब्द
थाम लें किसी की टूटती साँसों को

अपने होने को उड़ेल दो
दूर बैठे किसी अपने के सीने में
जो अकेले बैठ राह ताके हो
तुम्हारी एक कॉल की

वो जिसका ठीक होना अटका हुआ है
सिर्फ इस इंतजार में कि
कम से कम इन हालात में
शायद तुम किसी रोज पूछोगे
'ठीक हो न?'
उसे ठीक कर सकते हैं तुम्हारे शब्द

अब भी अगर कहने से खुद को बचा ही रहे हो
तो किस दिन के लिए आखिर
अपने प्रिय से सुनना कि 'तुमसे प्यार है'
इस समय की सबसे बड़ी औषधि है.

सब ठीक हो, सब ठीक हों...



रोज खुद को टटोलती, अपनी सांसों की आवाज सुनती, नब्ज पर कान धरकर सुनती मध्धम हलचल. रोज दिल की धड़कनों की आवाज पर ध्यान लगाती. सोचती, ठीक ही तो हूँ एक जरा सी हरारत ही तो है, बस जरा सी खराश ही तो है गले में. ऐसी न जाने कितनी हरारतों को अनदेखा कर दौडते-भागते काम पर मुस्तैदी से जुटी रही हूँ. लेकिन इस बार इसी हरारत ने जान सांसत में डाल रखी थी. टेस्ट के लिए इधर-उधर भटकते हुए, लम्बी लाइन में लगते हुए डर बढ़ना शुरू हुआ कि इस अफरा-तफरी का हिस्सा बनते हुए न हुआ होगा, तो हो जाएगा कोविड. डर के साथ घर वापस लौट आई. अब बुखार पहले से ज्यादा डरा रहा था. चार दिन बाद टेस्ट हुआ और खैरियत यह हुई कि रिपोर्ट उसी दिन आ गयी और रिपोर्ट निगेटिव थी. निगेटिव शब्द ने पहली बार राहत दी. वो चार दिन कैसे गुजरे मैं ही जानती हूँ. मन को बुरे ख्यालों से दूर रखने के जितने उपाय हो सकते थे सब किये कुछ काम न आया. सबसे ज्यादा चिंता बेटू की हुई कि अगर मुझे एडमिट होना पड़ा तो उसका ख्याल कौन रखेगा. कैसे संभालेगी वो खुद को, अकेले.

यह कितना छोटा सा वाकया था. लेकिन इसने मुझे हिला कर रख दिया था. लेकिन उनका क्या जो कोविड की चपेट में आ गए हैं, परिवार के परिवार जूझ रहे हैं, कुछ निकल आये हैं कुछ जूझ रहे हैं. चारों तरफ तबाही का मंजर है. जैसे मौत बरस रही है. एक परिवार की तीन बच्चियां जिन्होंने कुछ ही समय पहले एक सडक हादसे में पिता को खोया था अब माँ को खो दिया. कोविड का यह कहर उन मासूम बच्चियों के जीवन पर हमेशा के लिए चस्पा हो गया. हर रोज न जाने कितने जानने वालों के गुजर जाने की खबरों के बीच रोज के काम निपटाते हुए सोचती हूँ जो गुजर गये उनका दोष क्या था आखिर. उन्हें सचमुच वायरस ने मारा या अव्यवस्था ने?

शब्द निष्प्राण हैं, यह भी कहते नहीं बनता कि सब ठीक हो जायेगा...हालाँकि दिल इसी दुआ से भरा है कि सब ठीक हो जाए, सब ठीक हो जायें. लेकिन सब ठीक कहाँ होता है. जो गुजर गए उनके परिवार क्या इस सब ठीक को कभी भी महसूस कर पायेंगे. कितनी ही हिम्मत कितना ही धैर्य सब कम पड़ रहा है. होंठ बुदबुदा रहे हैं...सब ठीक हो, सब ठीक हों...

Wednesday, April 14, 2021

'अब ऐसा कुछ नहीं होता' का सच


क्या आपने अपनी नंगी पीठ पर खाए हैं 
अपनी जाति के कारण पड़ने वाले चाबुक 
क्या आपके बच्चे सोये हैं कई रातों तक 
भूख से बिलबिलाते हुए 
क्या आपकी पीढियां गुजरी हैं उस दर्द से 
जो सिर्फ झूठन पर जिन्दगी गुजारने से जन्मता है 
और उसे उन्हें उम्र भर सहना पड़ता है

क्या आपके कुल खानदान में से कभी कोई उतरा है 
गटर की सफाई के लिए और गंवाई है जान 
क्या अपने अस्तित्त्व को गाली की तरह
इस्तेमाल होने का स्वाद चखा है आपने  
क्या आपको कहानियां लगती हैं 
दलितों पर अत्याचार की घटनाएँ 

क्या आप समझते हैं कि दिन में एक बार 
चावल का माड़ पीकर सोने वाले बच्चे 
और सुविधाओं से घिरे आपके 
शहजादे की परवरिश एक सी है 
क्या सचमुच आपको कोई फर्क महसूस नहीं होता 
भूखे पेट ढिबरी में पढने 
और भरपेट खाने और चार ट्यूशन से पढने में 

क्या आपकी नसें तनी हैं कभी दलित स्त्रियों से बलात्कार की खबरों से 
या मान लिया है आपने कि उनका जन्म ही हुआ है इसके लिए 
क्या आपको लगता है कि 'हमने तो नहीं देखी बराबरी' कहकर 
समय और समाज की बड़ी हकीकत को झुठला सकते हैं आप 
क्या आपको सचमुच नहीं पता कि 
बिना सम्मान के पीढ़ी दर पीढ़ी जीते जाना कितना पीड़ाजनक होता है 
जाति के कारण कुँए के सामने प्यास से दम तोड़ते लोगों के बारे में जानना 
क्या आपको किसी काल्पनिक उपन्यास का कोई पन्ना लगता है 

क्या नहीं पसीजता आपका दिल 
नन्हे के एक वक्त के दूध की खातिर 
देह को बिछाने की पीड़ा सहती स्त्री के बारे में जानकर 

तो देवियों और सज्जनों, 
अपने गले की नसें टूटकर बिखर जाने की सीमा तक 
चीखते हुए कहना चाहती हूँ कि 
आप मुगालतों की दुनिया में हैं 
क्योंकि यह सब होता है आज भी, अब भी 
यहीं कहीं आपके बहुत पास 
न जाने कितनी सिसकियाँ होंगी 
जो आपने सुनी नहीं 
दृश्य जो आपने देखे नहीं 

कृपया अपने मुगालतों की दुनिया से बाहर निकलिए 
उतारिये कुछ देर को जाति की उच्चता की 
वह आलीशान पोशाक जो जन्म के साथ ही 
आपके लिए तमाम सुविधा समेत आपको पहना दी गई है 

कल्पना कीजिये न सिर्फ एक बार वह सब जीने की 
जिसके होने को नकार रहे हैं आप 
और अगर नहीं कर सकते ऐसा 
तो कृपया बंद करिए फरमान देना 
कि 'अब ऐसा कुछ नहीं होता' 
क्योंकि होता तो अब भी सब कुछ ऐसा ही है 
बल्कि कुछ ज्यादा ही शातिर ढंग से.

(बाबा साहब की जयंती और उदास मन) 

Monday, April 12, 2021

‘नो टू सेक्स फॉर वाटर’



- प्रतिभा कटियार
(समकालीन जनमत में प्रकाशित लेख)

मेरे घर के ठीक सामने एक कुआँ था. कुआँ अपनी सामन्य भव्यता के साथ मुस्कुराता था. यानी वो पक्का कुआँ था. उसकी जगत पक्की थी, मुंडेर उठी थी और पानी खींचने की गडारी (पहियेनुमा चकरी जिसमें रस्सी डालकर पानी खींचना आसान होता था.) थी. वो कुआं मुझे आज क्यों याद आ रहा है, यह बाद में बताऊंगी अभी यह बताने का मन है कि कुँए की बाबत क्या-क्या याद आ रहा है.

जैसे उस कुँए से पानी लेने जाने के वक़्त घर के भीतर स्त्रियों की चहल-पहल, सजना-संवरना, कुँए पर स्त्रियों की हंसी-ठिठोली, कुँए के किसी कोने पर अपने सुख दुःख साझा करती स्त्रियाँ.

ज्यादातर ब्याहता महिलाएं लम्बे घूँघट में होती थीं और कुंवारियां अपने कुंवारेपन की ठसक में. घर कैद की दीवारों से मुक्ति जैसा था कुँए से पानी भरने जाना या नहर पर कपड़े धोने जाना.

इस कुँए की बाबत दूसरी बात याद आती है कि सुबह की पानी भरने की पाली खत्म होने के बाद पुरुषों का कुँए पर आकर नहाना. वैसे ही जैसे वो आज भी कहीं भी कैसे भी नहाने के लिए आज़ाद मानते हैं खुद को. नहाते हुए बेडौल पुरुषों को देख स्त्रियों की खुसुर-फुसुर और मसखरी भी शामिल होती ही थी.

कुँए को लेकर एक याद और है कि शादी के वक्त (लडके की शादी) लड़के की माँ कुँए में एक पैर लटकाकर बैठती थी और तब लड़का उसे मनाता था और तब बरात जाती थी. यह ब्याह की एक रस्म थी. कहा जाता है कि लड़के की माँ बेटे से कहती थी कि वो वादा करे कि बहू आने के बाद भी वो उसकी बात मानेगा तब बारात जाने देगी वो वरना कुँए में कूद जायेगी. लड़का माँ को वादा करता था और बारात लेकर बहू यानी आज्ञाकारी स्त्री जो घर के काम संभाले, माँ बाप की सेवा करे और पति की इच्छाएं पूरे करे को ब्याह लाता था.

फिर वो स्त्री इसी कुँए से पानी भरने आती और सखियों से अगर वो बनी हैं तो अपने मन की पीर कहती वरना घूँघट में सिसकते हुए पानी भरकर मटके पर मटके रखकर घर को पानी से भर देती. हालाँकि उसकी आँखों के पानी को कोई नहीं देखता.

स्त्रियों का पानी से गहरा नाता है. ये स्मृतियाँ मेरे बचपन की हैं. मैदानी इलाके के गाँव की. ऐसी ही मिलती-जुलती छवियाँ राजस्थान, पहाड़ों की भी हैं जहाँ स्त्रियाँ पानी भरने के लिए न जाने कितना मुश्किल और लम्बा सफर तय करती हैं. स्त्रियाँ बीमार हों, गर्भवती हों किसी भी हाल में पानी उन्हें ही भरना होता था. जब मैं ‘था’ लिख रही हूँ तो बहुत उदास हूँ क्योंकि जानती हूँ अब भी यह कई जगहों पर ‘है’ ही है. इसे ‘था’ बनने में न जाने कितना समय लगेगा अभी.

अब आती हूँ उस बात पर जिसकी वजह से वो कुआँ मेरी स्मृतियों से निकलकर बाहर आ गया. मैंने कल रात एक हॉलीवुड फिल्म देखी The Source. 2011 में रिलीज हुई यह फिल्म उत्तरी अफ्रीका के एक ऐसे गाँव की कहानी है जहाँ पानी और बिजली जैसी जरूरी चीज़ें नहीं हैं. वह सूखे पहाड़ों वाला कोई गाँव है वो और वहां दूर एक पानी का सोता है जहाँ से स्त्रियों को पानी भरकर लाना होता है. स्त्रियाँ सदियों से इस काम को एक परम्परा की तरह निभा रही हैं. इस परम्परा को निभाते हुए न जाने कितनी स्त्रियाँ पानी भरकर लौटते हुए गिरकर मर गयीं, कितनी स्त्रियों के बच्चे उनके गिरने से गर्भपात के कारण मर गए, नौवें महीने की प्रसूताओं को भी कोई रियायत नहीं थी वो भी डंडे में दोनों छोर पर बाल्टियाँ लटकाकर घर में पानी लाती थीं. जबकि ठीक उस वक्त गांव के मर्द शराब पी रहे होते, बैठकी में गपशप कर रहे होते या कुछ और मनोरंजक काम कर रहे होते थे.

लडकियों को पढ़ाना नहीं चाहिए, उनका दिमाग बेकाबू हो जायेगा फिर वो धर्म की बात मानने से इंकार कर देंगी, स्त्रियों का काम है मर्दों की बात मानना और उनकी सेवा करना, पुरुषों की हुक्म उदूली धर्म के खिलाफ है जैसी बातों को गाँठ में बांधे ये स्त्रियाँ एक यातना शिविर से जीवन में जीने को अभिशप्त थीं और इसे ही नियति माने जिए जा रही थीं. 18, 20, 16 , 12 बच्चे पैदा करने वाली स्त्रियों ने कुछ ही जीवित संतानों को गले लगाया. ज्यादातर संतानें यातना शिविरों में जन्म लेने से पहले ही मर गयीं या कुछ जन्म लेने के बाद.

कहानी तब शुरू होती है जब एक रोज लैला नामक युवा स्त्री जो गाँव की बहू है और थोड़ी पढ़ी-लिखी भी है स्त्रियों से कहती है पानी लाना हमारा ही काम क्यों? तर्क मिलता है क्योंकि पानी घर के कामों में खर्च होता है इसलिए यह स्त्रियों को ही लाना चाहिए क्योंकि घर के काम स्त्रियों को ही करने चाहिए ऐसा धर्म की किताब में लिखा है. धर्म की वो किताब जिसे कोई स्त्री पढ़ नहीं सकती. लैला ने धर्म की किताबें भी पढ़ी हैं और बेहतर जिन्दगी का सपना भी देखा है. वो गाँव में पानी लाने के लिए गाँव की स्त्रियों को एक अजीब सी हड़ताल करने का आवाहन करती है. हड़ताल ये कि सभी स्त्रियाँ पुरुषों के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाने बंद कर दें. कब तक? जब तक गाँव में पानी न आ जाए.

जैसा कि हमेशा से होता है ज्यादातर स्त्रियों ने इस बात का मजाक उड़ाया और पानी लाने के काम को अपना धर्म बताया. लेकिन धीरे-धीरे स्त्रियों को बात कुछ-कुछ समझ में आने लगी और उन्होंने हड़ताल शुरू कर दी. वो रात में पुरुषों से मार खातीं, दिन भर काम करतीं लेकिन उन्होंने सम्बन्ध बनाने नहीं दिए. सुनने में लगता है क्या यह इतनी बड़ी बात थी? लेकिन थी. क्योंकि गाँव के पुरुष असुरक्षित हो रहे थे, उनकी स्त्रियों ने पहली बार उन्हें इंकार किया था. स्त्रियों पर धर्म का दबाव डाला गया लेकिन लैला ने धर्म की किताबें पढ़ी थीं जिसमें स्त्री और पुरुष की बराबरी की सम्मान की बात लिखी थी स्त्री को पुरुष का गुलाम नहीं कहा गया था.

बहरहाल, इस अनोखी हड़ताल ने उस गाँव में तो पानी ला ही दिया मेरी आँखों में भी पानी भर आया. दुनिया के किसी भी कोने में स्त्रियाँ सिर्फ सह ही रही हैं. दुनिया के हर कोने में स्त्री को गुलाम बनाकर रखने की फितरत क्यों परवान पर है. और प्यार का मतलब सेक्स ही समझकर उस पर धर्म का लबादा उढ़ाकर स्त्रियों को सहेजने को क्यों दे दिया गया है आखिर. शहरी खुद को पढ़ी-लिखी समझने वाली एक बड़ी आबादी को यह बात अजीब लग सकती है कि इसी हिन्दुस्तान में अब भी न जाने कितनी स्त्रियाँ जिन पतियों के बच्चे पैदा करती हैं उनकी शक्लें उन्होंने कई बरस बाद देखीं, और इसे प्रेम का नाम दिया गया.

बहुत सारी लैलायें चाहिए जो अपनी बात को समूचे गाँव की समुदाय की आवाज बना दें. और ऐसा करने का यह अर्थ भी नहीं कि वो पुरुषों से नफरत करती हैं. नहीं, बल्कि वो खुद को भी थोड़ा सा प्यार करना चाहती हैं, खुद को भी इन्सान की तरह जीते हुए देखना चाहती हैं गुलाम की तरह नहीं. बस इतना ही सा तो ख्वाब है…वह भी क्यों चुभ रहा है.

इस फिल्म में पानी के बहाने स्त्रियों के तमाम मुद्दों पर बात हुई है. मसलन तन ढंकने का अधिकार. गरीब औरतों को तन ढंकने का अधिकार नहीं होता था. जिसे देखते हुए मुझे याद आई हिंदुस्तान की नंगेली जिसने निचली जाति की स्त्रियों के तन ढंकने के अधिकार के लिए अपने स्तन काट दिए थे.

स्त्रियों की गुलामी की जड़ें इतनी गहरी हैं कि आँखें भर आती हैं. तब और जब उन्हीं परम्पराओं का पोषण करने वाली कुछ स्त्रियाँ इतराते हुए उन परम्पराओं पर ‘माय च्वायस’ का लेबल लगाती हैं. क्या वो सच में नहीं जानतीं कि वे उन परम्पराओं पर ‘माय च्वायस’ का लेबल लगा रही हैं जिन परम्पराओं को तोड़ने को स्त्रियों ने जानें दी हैं, और उन्हें निभाते हुए भी जाने गंवाई हैं.

यह फिल्म स्त्री विमर्श की कई लेयर्स पर तो बात करती ही है साथ ही पुरुषों से भी संवाद करती है कि सेक्स ऑब्जेक्ट भर नहीं हैं स्त्रियाँ उन्हें भी इन्सान की तरह जीने का हक है और सेक्स प्यार नहीं होता. प्यार, प्यार ही होता है.

(समीक्षक प्रतिभा कटियार, लखनऊ में जन्मी, पली-बढ़ी. राजनीति शास्त्र में एम ए, एलएलबी, पत्रकारिता में डिप्लोमा. 12 वर्षों तक प्रिंट मीडिया में पत्रकारिता. कहानियाँ और कविताएँ कई पत्रिकाओं और हिंदी अखबारों में प्रकाशित. व्यंग्य संग्रह ‘खूब कही’ और मैत्रेयी पुष्पा के साक्षात्कारों पर आधारित पुस्तक ‘चर्चा हमारा’ का संपादन. रूसी कवियत्री मारीना त्स्वेतायेवा की जीवनी प्रकाशित. इन दिनों अज़ीम प्रेमजी फाउन्डेशन देहरादून में कार्यरत.

सम्पर्क: kpratibha.katiyar@gmail.com)

https://samkaleenjanmat.in/review-of-the-film-the-source-by-pratibha-katiyar/

Sunday, April 11, 2021

'सिर्फ मेरे प्रेम पर ही सवाल क्यों?'- मारीना


 कल रात मारीना फिर आई. मुझे मालूम था वो आएगी. हम देर तक बात करते रहे. हालाँकि वो खामोश थी. लेकिन अब हम दोनों ने शब्दहीनता में संवाद करना सीख लिया है. मैंने उसकी कलाई अपने हाथ में लेते हुए पूछा, 'उदास हो?' वो चुप रही. सवाल तो होना चाहिए था 'खुश हो?' कि मारीना के जीवन और जिजीविषा के नाम एक पूरी शाम जो थी. कितना प्रेम मिल रहा था. वही प्रेम जिसके लिए वो जीवन भर तरसती भी रही और वही जिसमें वो जीवन भर निमग्न भी रही. उसकी ख़ामोशी की मुझे आदत है. मैंने कहा कॉफ़ी पियोगी? उसने हाँ कहा. 

मैं उसे पीले फूलों वाले बागीचे में छोड़कर कॉफ़ी बनाने गयी. कॉफ़ी बनाते वक़्त असल में मैंने अपने भीतर भी कोई उदास धुन को गलते हुए महसूस किया. क्यों है यह उदासी. जबकि मन तो ख़ुशी से भरा होना चाहिए था. मारीना की इतने सारे नये लोगों से दोस्ती हुई कल. इतना प्यार मिला उसे भी, मुझे भी. शायद हर सुख के अन्तस में कोई दुःख का केंद्र है. वही होगा उदासी की वजह. मैंने अक्सर बेहद खुश होने के अवसरों पर एक उदासी तारी होती महसूस की है. लेकिन इस दफे यह तनिक लग उदासी थी. 

मैं उसके आगे कॉफ़ी का मग बढ़ाते हुए कहती हूँ 'प्रेम' 

उसकी निगाहों में नजर आता है प्रेम. 

'जानती हूँ तुम्हारी उदासी की वजह' मैं उससे कहती हूँ. शायद यही वह मुझसे भी कहती है. 

'क्या मेरा जीवन सिर्फ मेरे प्रेम और मेरे रिश्तों के लिए ही जाना जायेगा? या उन दुखों के लिए जो मैंने सहे? या उस मृत्यु के लिए जिसे मुझे चुनना पड़ा? मैं अपनी रचनाओं के लिए भी जाने जाना चाहती हूँ.' उसकी पलकें नम थीं और कॉफ़ी का मग थामे वो दूर निगाहें टिकाये थी. 

कह देने से मन हल्का होता है. उसके कह देने से मेरा मन हल्का हो आया था. रूई सा हल्का. प्रेम अगर स्त्री का  हो, कई प्रेम तो उसकी तमाम प्रतिभाओं के बावजूद जब भी उस पर बात होती है केंद्र में उसके प्रेम ही जाने क्यों आ जाते हैं. मैं उसके कंधे पर हाथ रखकर कहती हूँ, 'दोस्त सौ बरसों का फासला गुजरा जरूर है लेकिन बहुत कुछ बदला नहीं है अभी भी. इसलिए नाराज न हो, उदास न हो कॉफ़ी पियो. कि तुम इस बाबत मुझे पहले ही बता चुकी हो प्रेम बाहर की नहीं भीतर की यात्रा है. कितने प्रेम नहीं कितना प्रेम, कितनी सघन यात्रा. प्रेम के सफर में आने वाले व्यक्तियों को गिने बिना अवसाद की,अधूरेपन की उस यात्रा को देख पाने का शऊर अभी सीखना है दुनिया को. कि जब हम लिबरल होकर कहते हैं न कि हमें उसके तमाम रिश्तों से आज़ाद ख्याली से कोई परेशानी नहीं तब भी कहीं होती है परेशानी.' 

'मैं प्रेम से भरी थी...'  वो कुछ कहने को हुई. 

'रुक जाओ कुछ न कहो.' मैं उसे रोक देती हूँ. 

'जस्टिफिकेशन कोई नहीं दोस्त. किसी को मत दो. लोगों को उनकी समझ के साथ छोड़ते हैं. उन्हें अभी परिपक्व होने में समय लगेगा. हम कॉफ़ी पीते हैं. '

'बस एक सवाल?' मारीना की उदासी आसपास भटकने लगी थी. 

'बस एक?' मैं हंसकर यूँ कहती हूँ जैसे मुझे तो सवालों के जवाब आते ही हैं. जैसे कि मैं तो बुध्धू हूँ ही नहीं. 

'क्या अगर मारीना पुरुष होती तो भी ये सवाल ऐसे ही होते, क्या तब भी समूची रचनात्मकता को उसके तमाम रिश्तों और प्रेम पर केन्द्रित कर सीमित कर दिया जाता?' 

मैं हंस देती हूँ. यह सवाल समूची आदमजात से है. उन सबसे जो एक स्त्री को जज करने के अपने भोथरे हथियारों के साथ सदियों से खड़े रहते हैं. न जाने साहित्यकार, कलाकार हैं दुनिया भर में जहाँ एकाधिक प्रेम के किस्से सहजता से स्वीकारे गए लेकिन एक स्त्री...उसकी रचनात्मकता के आगे उसके चरित्र का विश्लेष्ण खड़ा कर सारा विमर्श समेट दिया जाता है. चाहे उसके संघर्ष हों, उसकी सफलता या उसका जीवन.

'छोड़ो न ये सब, तुमने जीवन भर जिन बातों की परवाह नहीं की तो अब क्यों?'

'परवाह नहीं कर रही दोस्त उदास हूँ इतने बरसों के बाद भी स्त्री को देखने का नजरिया जरा भी नहीं बदला.'

मैं और मारीना कल शाम की तस्वीरों में खुद को तलाशने लगती हैं. कुछ मुस्कुराहटें हमारा हासिल हैं,  

एक कारवां मोहब्बत का





- प्रतिभा कटियार
सोचती हूँ तो पुलक सी महसूस होती है कि पांच बरस हो गये एक ख़्वाब को हकीक़त में ढलते हुए देखते. पांच बरस हो गए उस छोटी सी शुरुआत को जिसने देहरादून में पहली बैठक के रूप में आकार लिया था और अब देश भर को अपनेपन की ख़ुशबू में समेट लिया है उस पहल ने. एक झुरझुरी सी महसूस होती है. आँखें स्नेह से पिघलने को व्याकुल हो उठती हैं. फिर दोस्त कहते हैं कि सपना नहीं है यह, सच है.

आँखें खुली हुई हैं और प्रेम चारों तरफ बिखरा हुआ है. कविताओं के प्रति प्रेम. पाठकीय यात्रा के रूप में शुरू हुआ यह सिलसिला असल में अपने मक़सद में कामयाब हुआ. मकसद क्या था सिवाय अपनी पसंद की कविताओं की साझेदारी के साथ एक-दूसरे की पसंद को अप्रिशियेट करने के. अपने जाने हुए को विस्तार देने के और लपक कर ढूँढने लग जाना उन कविताओं और कवियों को जिन्हें अब तक जाना नहीं था हमने.

शुरुआत हुई तो नाम था 'क से कविता'. फिर तकनीकी कारणों से नाम हो गया 'कविता कारवां'. जब तकनीकी कारणों से नाम में बदलाव करना पड़ा तो मन में एक कचोट तो हुई कि उस नाम से भी तो मोह हो ही गया था लेकिन यहीं जीवन का एक और पाठ पढ़ना था. मोह नाम से नहीं काम से रखने का.

अपनी नहीं अपनी पसंद की कविताओं को एक-दूसरे से साझा करने की यह कोई नयी या अनोखी पहल नहीं थी. ऐसा पहले भी लोग करते रहे हैं अपनी-अपनी तरह से, अपने-अपने शहरों में साहित्यिक समूहों में. कविता कारवां की ही एक सालाना बैठक में नरेश सक्सेना जी ने कहा था कि बीस-पचीस साल पहले ऐसा सिलसिला शुरू किया था उन्होंने भी जिसमें कवि एक अपनी कविता पढ़ते थे और एक अपनी पसंद की. तो ‘कविता कारवां’ ने नया क्या किया. नया यह किया कि इस सिलसिले को निरन्तरता दी. बिना रुके ‘कविता कारवां’ की बैठकें चलती रहीं. उत्तराखंड में ही करीब 22 जगहों पर हर महीने कविता प्रेमी एक जगह मिलते और अपनी पसंद की कविता पढ़ते रहे. कुछ बैठकें मुम्बई में हुईं, कुछ लखनऊ में और दिल्ली में निशस्त दिल्ली के नाम से यह सिलसिला लगातार चल रहा है.

'कविता कारवां' के बारे में सोचती हूँ तो तीन बातें मुझे इसकी यूनीक लगती हैं जिसकी वजह से इसकी पहचान अलग रूप में बनी है. पहली है इसे पाठकों की साझेदारी के ठीहे के तौर पर देखना जिसमें कॉलेज के युवा छात्र, गृहिणी, स्कूल के बच्चे, डाक्टर, इंजीनियर बिजनेसमैन सब शामिल हुए कवि कथाकार पत्रकार भी शामिल हुए लेकिन पाठक के रूप में ही. कितने ही लोगों ने अपने भीतर अब तक छुपकर रह रहे कविता प्रेम को इन बैठकों में पहचाना और पहली बार यहाँ अपनी पसंद की कविता पढ़ी. दूसरी बात जो इसे विशेष बनाती है वो है बिना ताम-झाम और बिना औपचारिकता वाली बैठकों की निरन्तरता. कोई दीप प्रज्ज्वलन नहीं, कोई मुख्य अतिथि नहीं, कोई मंच नहीं, कोई विशेष नहीं बल्कि सब मुख्य अतिथि, सब विशेष अतिथि. और तीसरी और अंतिम बात जो सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है जिसके चलते पहली दोनों बातें भी हो सकीं वो यह कि ‘कविता कारवां’ की एक भी बैठक में शामिल व्यक्ति इसके आयोजक मंडल में स्वतः शामिल हो जाता है. ज्यादातर साथी जो किसी न किसी बैठक में शामिल हुए थे अब इसकी कमान संभाले हुए हैं पूरी जिम्मेदारी से.

इस सफर का हासिल है ढेर सारे नए कवियों और कविताओं से पहचान होना और एक-दूसरे को जानना. आज पूरे उत्तराखंड और दिल्ली लखनऊ व मुम्बई में कविता कारवां की टीम काम कर रही हैं. हम सब एक सूत्र में बंधे हुए हैं. एक-दूसरे से मिले नहीं फिर भी पूरे हक से लड़ते हैं, झगड़ते हैं और मिलकर काम करते हैं. एक बड़ा सा परिवार है 'कविता कारवां' का जिसे स्नेह के सूत्र ने बाँध रखा है. वरना कौन निकालता है घर और दफ्तर के कामों, जीवन की आपाधापियों में से इतना समय. और क्यों भला जबकि अपनी पहचान और अपनी कविता को मंच मिलने का लालच तक न हो.

अक्सर लोग पूछते हैं कविता कारवां की टीम इसे करती कैसे है? कितने लोग हैं टीम में? खर्च कैसे निकलता है? तो हमारा एक ही जवाब होता है हमारी टीम में हजारों लोग हैं वो सब जो एक भी बैठक में शामिल हुए या इस विचार से प्यार करते हैं और हम इसे करते हैं दिल से. जब किसी काम में दिल लगने लग जाए फिर वो काम कहाँ रहता है. हम इसे काम की तरह नहीं करते, प्यार की तरह जीते हैं.

इस सफर में कई अवरोध आये, कुछ लोग नाराज भी हुए कुछ छोड़कर चले भी गए लेकिन 'कविता कारवां' उन सबसे अब भी जुड़ा है उन सबका शुक्रगुजार है कि उनसे भी हमने कितना कुछ सीखा है. हमें साथ चलना सीखना था, वही सीख रहे हैं. साथ चलने के सुख का नाम है 'कविता कारवां', कविताओं से प्रेम का नाम है 'कविता कारवां',

अपने 'मैं' से तनिक दूर खिसककर बैठने का नाम है 'कविता कारवां.'

हम पांचवी सालगिरह से बस कुछ कदम की दूरी पर हैं. उम्मीद है यह कारवां और बढ़ेगा...चलता रहेगा...नए साथी इसकी कमान सँभालते रहेंगे और दूसरे नए साथियों को थमाते रहेंगे... यह तमाम वर्गों में बंटी, तमाम तरह की असहिष्णुता से जूझ रही दुनिया को तनिक बेहतर तनिक ज्यादा मानवीय, संवेदनशील बनाने का सफर है जिसमें कविताओं की ऊर्जा हमारा ईंधन है

Wednesday, April 7, 2021

चाहे सोने के फ़्रेम में जड़ दो

-कृष्ण बिहारी नूर 

ज़िंदगी से बड़ी सज़ा ही नहीं
और क्या जुर्म है पता ही नहीं

इतने हिस्सों में बट गया हूँ मैं
मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं

ज़िंदगी मौत तेरी मंज़िल है
दूसरा कोई रस्ता ही नहीं

सच घटे या बढ़े तो सच न रहे
झूट की कोई इंतिहा ही नहीं

ज़िंदगी अब बता कहाँ जाएँ
ज़हर बाज़ार में मिला ही नहीं

जिस के कारन फ़साद होते हैं
उस का कोई अता-पता ही नहीं

कैसे अवतार कैसे पैग़मबर
ऐसा लगता है अब ख़ुदा ही नहीं

चाहे सोने के फ़्रेम में जड़ दो
आईना झूट बोलता ही नहीं

अपनी रचनाओं में वो ज़िंदा है
'नूर' संसार से गया ही नहीं.

Monday, April 5, 2021

वो न समझा है, न समझेगा...


सुबह में ढेर सारी रात अब तक घुली हुई है. शुष्क मौसम सुर्ख लिबास में दाखिल हुआ है. उसकी हथेलियों पर इन्द्रधनुष खिला हुआ है. जैसे फूलों में कोई होड़ हो खिलने की. रास्तों से गुजरते हुए मालूम होता है जैसे किसी ड्रीम सीक्वेंस में हों, पीले, गुलाबी, लाल फूलों से पटे पड़े रास्ते हवा के झोंकों के साथ उड़कर काधों पर आ बैठते हैं....हाँ हाँ...रास्ते फूलों के साथ एक अलग ही ठसक लिए.

भीतर का मौसम भी बदल रहा है. न जाने कितने पत्ते मन की शाखों से मुक्त हुए. अभी नयी कोपलों के फूटने की आहट तो कोई नहीं लेकिन कोई उदासी भी नहीं. भीतर कुछ बदलता हुआ महसूस कर रही हूँ. जिन चीज़ों को देख पगलाया करती थी अब सिर्फ मुस्कुरा देती हूँ. जिन बातों पर हफ़्तों सुबकना जारी रहता था अब उन बातों पर भी मुस्कुरा देती हूँ.

सुबह पंछियों की आवाजों पर कान टिकाये हुए चाय पीना मध्धम आंच पर पकता सुख है. इंतजार कोई नहीं... फरहत शहजाद गुनगुना रहे हैं...

वो न समझा है, न समझेगा, मगर कहना उसे...

(इश्क शहर, मॉर्निंग राग)

Saturday, April 3, 2021

उम्रदराज लोगों का प्यार


बसंत के दिनों में
टहनियों को जोर से पकडे हुए पत्तों सा होता है
उम्रदराज लोगों का प्यार
संजीदा होता है जबकि
बेकरार होता है शरारती हो जाने को.

दुनिया भर की नसीहतों को जी चुका
उम्रदराज लोगों का प्यार
हर सांस सलीके से जीने
हर लम्हे को मजबूती से थाम लेने को उत्सुक होता है,

युवा प्रेमियों को देख मुस्कुराते हुए
ज़िंदगी से और सटकर बैठा होता है
बारिश में भीगने से
निमोनिया हो जाने से, डरता नहीं 
बस कि एक-दूसरे का साथ छूटने से डरता है
उम्रदराज लोगों का प्यार.

योगा क्लासेज हों, जॉगिंग ट्रैक, दवा की दुकानें, अस्पताल
या किसी की मातमपुर्सी की बैठक
इनकी निगाहें एक-दूसरे को कभी भी कहीं भी ढूंढ लेती हैं
और दिल की धड़कनें तेज हो जाती हैं

मधुमेह, रक्तचाप, थायरायड, घुटनों के दर्द के बीच
शाम को साथ में टहलने के लिए
वे चुनते हैं सबसे सुंदर और सलीकेदार लिबास
उन्हें आता है नफासत से पेश आना,

वो जान चुके हैं किसी को खोने का दुःख
इसलिए डरते हुए बढ़ाते हैं कदम एक-दूसरे की और
एक ही कॉटन कैंडी में ढूंढ लेते हैं
तमाम पीले लम्हों की रंगत.

झुर्रियों में सपने तलाशने की कला 
सीख लेता है उम्रदराज लोगों का प्यार.  

Sunday, March 14, 2021

उसके सपने में मेरा होना


मैं जब अपने सपने में नहीं थी
तब उसके सपने में महक रहा था मेरा होना
वो अपने सपने में सहेज रहा था
इस बड़ी सी दुनिया में मेरा एक छोटा सा कोना

मैं नींद में जब गहरे धंसी हुई थी
बारिश में तर-ब-तर हो रहा था मेरा कोना
खिलखिलाते हुए लाल फूल झाँक रहे थे खिड़की से 
मुस्कुरा रही थीं किताबें कॉफ़ी की खुशबू की संगत में
समन्दर की लहरों को छूकर आया था हवा का एक झोंका 
सहला रहा था मेरे गाल

वो मेरे चेहरे पर मुस्कुराहटें बो रहा था पूरी लगन से
और मैं नींद में धंसे हुए मुस्कुरा रही थी

मेरे सिरहाने बारिशें, हवा के झोंके, समन्दर की लहरें
चिड़िया की चहक, प्रेमिल साथ
कुल मिलाकर एक सुंदर दुनिया का सपना रखकर
वो चाय बना रहा था
और मैं इन तमाम सौगातों को समेटे
डूबने लगी थी प्रेम की नदी में...

मेरे होंठ बुदबुदा रहे थे उम्मीद
वो गुनगुना रहा था प्रेम.

मैं जब नींद में थी तब मैं उसके सपने में थी. 

(देवयानी के सुपुत्र अनि के लिए)

Saturday, February 27, 2021

मारीना- ऐसे भी कोई जाता है क्या

हफीज़ किदवई युवा रचनाकार, संन्कृतिकर्मी और जन पैरोकार हैं. वो हमेशा मुद्दों के भीतर से मानवीय पक्ष खोज कर लाते हैं, उनकी हिमायत करते हैं. हफीज़ की कलम में एक ख़ुशबू है, एक रौशनी है. वो अल्फाजों के सहारे दुनिया को रोशन करना चाहते हैं और महकाना चाहते हैं. उनकी खासियत यह है कि वो सिर्फ कलमकार नहीं हैं सड़कों पर उतरकर, लोगों के घरों तक पहुंचकर उधड़े हुए समय और समाज को रफू करने के प्रयास वो निरन्तर करते हैं. मारीना पर उनकी यह टिप्पणी जो सोशल मीडिया पर है उसे प्रतिभा की दुनिया में सहेज रही हूँ- प्रतिभा  

अरे ऐसे भी कोई जीता है, अरे यार ऐसे भी कोई मर सकता है, यही तो निकला था मुँह से मारीना को पहली बार पढ़ते हुए । इस किताब को आपको ज़रूर पढ़ना चाहिए । यह किताब दो कवयित्रीयों के बीच बातचीत का अनूठा काम है । एक बहुत पहले अपनी कविता कह गए,एक आज अपनी कविता अपने दिल में सँजोए हुए हैं । एक को हमने नही देखा,मगर जिसको हमने देखा,उसने उसे हमे दिखा दिया,जिसे हमने नही देखा था । यह किताब अद्भुत है ।

एक तरफ रूस की महान कवियत्री मारीना त्स्वेतायेवा हैं, जिनकी यह जीवनी है, दूसरी तरफ हैं हमारे लखनऊ की कवियत्री प्रतिभा कटियार,जिन्होंने इसे सलीके से हिंदी में गढ़ा है । यह किताब ऐसे लगता है कि मारीना ख़ुद प्रतिभा से कहकर लिखवा रही हों । कोई लेखक कैसे किसी दूसरे लेखक के दिल की धड़कन,चेहरे की शिकन और शरीर की थकन के बीच प्रेम की ताज़गी को ढूंढ सकता है । यह तो तब तक सम्भव नही है, जब तक लिखने वाले शरीर में लिखे जाने वाले कि आत्मा न उतर आए,यह अद्भत घटना प्रतिभा कटियार की कलम में घटित हुई है ।
मैंने बहुत धैर्य से उस किताब को पढ़ा, यह महीने भर से थी मेरे पास,मैं उसे रोज़ पढ़ना चाहता था । चाहता था कि किताब खत्म न हों,क्योंकि मारीना का अंत पता था,और चाहता था कि किताब लम्बी होती चली जाए,यही प्रतिभा जी ने भी किया होगा । वह भी किताब खत्म नही करना चाहती होंगी,वह भी अभी भी मारीना के साथ रहना चाहती होंगी,मगर यह नही हो सका,क्योंकि हमारी सीमाएं निर्धारित हैं।

फिल्मों में,वीडियोज़ में बहुत बार भावुक पल आने पर तो आंसू आते हैं मगर किताब पढ़ने पर इनका निकलना बहुत ही अलग बात है और मारीना पढ़ने पर कई दफा आँसू आए । कई दफा मन भारी हुआ,यह कहिए कि यह किताब पढ़ी जितनी जाएगी,उससे कहीं ज़्यादा ही जी भी जाएगी ।

हम किताब के कंटेंट में नही जाएँगे, यह आप खरीदकर पढ़िए,अमेज़न या किसी बुक शॉप से लीजिये । हम तो इस किताब को सिर्फ इसके एक बुकमार्क के लिए खरीद सकते थे,जो फ़ोटो में मौजूद हैं । ऐसे बहुत से बुकमार्क किताब में हैं, यह एक बेहतरीन परम्परा लेखिका ने डाली है, जिसे हम सबको बढ़ाना भी है ।

मारीना की जीवनी लिखकर प्रतिभा जी ने ऐतिहासिक काम कर डाला । उन्हें खुद नही पता होगा कि मारीना से जो वह बात कर रही थीं,वह पल ऐतिहासिक थे,वह वक़्त आने वाली नस्लों को कुछ बीज देने जैसा था । जब कभी मारीना का नाम फलक पर चमकेगा और उनका लिखा हमारी दहलीज़ पर पहुँचेगा, तब पीछे पीछे प्रतिभा भी पहुँचेंगी, क्योंकि ऊँचाई में छिपे इस सितारे की चमक हम सबके सामने उन्होंने ही बिखेरी है । यह किताब अद्भुत है, बहुत बहुत धन्यवाद प्रतिभा मैम इसे लिखने के लिए,इसे सोचने केलिए,हमे पता है इसका लिखना कितनी वेदना समेटे था ।

एक आखरी बात प्रतिभा जी के लिए ,मारीना की जीवनी का चुनाव इस ज़मीन पर केवल आप ही कर सकती थीं,क्योंकि उसकी ज़िन्दगी के पड़ाव,बदलाव और माथे की शिकन के बीच अल्फ़ाज़ बुनती उँगलियों को केवल आपका संवेदनशील हृदय देख सकता था । यह किताब हमारी पीढ़ी के लिए आपका उपहार है, बहुत बहुत धन्यवाद....

किताब मंगवाने का लिंक- https://www.amazon.in/-/hi/Pratibha-Katiyar/dp/8194436206/ref=sr_1_1?dchild=1&keywords=pratibha+katiyar&qid=1614405248&sr=8-1

Tuesday, February 23, 2021

दो चाय



पीले फूलों का मौसम फिर से लौट आया था. चारों तरफ वासंती बहार थी. फ्योली के फूलों ने रास्तों को यूँ सजाया हुआ था जैसे जब प्रेम की पालकी गुजरेगी तो वो उसके संग हो लेंगे. पुलम, नाशपाती, बुरांश, पलाश और आडू के फूलों ने समूचे पहाड़ों को किसी खूबसूरत काल्पनिक से दृश्य में परिवर्तित कर दिया था. लड़की ने अपना झोला कंधे से उतारकर किनारे स्टूल पर रखा और चाय वाले दादा को चाय बनाने को कहा. दो चाय.

चाय वाले दादा इधर-उधर देखने लगे. उन्हें लगा दूसरा कोई आने वाला होगा. हालाँकि पहाड़ों पर बहुत दूर से आने वाले दिख जाते हैं कम से कम चाय बनने की देरी भर की दूरी भर तो दिख ही जाते हैं लोग. फिर भी उन्होंने दो कप चाय चढ़ा दी. लड़की देर तक सामने वाली पहाड़ी पर खिलखिला रहे आडू के गुलाबी फूलों को देखती रही. कई बरस बीत गए इस बात को जब वो इसी पेड़ के नीचे खिलखिला कर हंस रही थी और लड़के ने पेड़ की डाल को थोड़ा सा नीचे खींच के छोड़ दिया था. डाल ने लड़के की शरारत को समझ लिया था. वो मुस्कुरा दी थी. और उसने ऊपर जाते हुए ढेर सारे गुलाबी फूल लड़की पर बरसा दिए थे. बरसते फूलों से नहा उठी थी लड़की और उसकी खिलखिलाहटों से वादियाँ नहा उठी थीं. लड़का चमत्कृत सा उस दृश्य को देख रहा था.

वो मोबाईल वाले कैमरों का दौर नहीं था. सारी तस्वीरें आँखों से खिंचकर ज़ेहन की हार्डडिस्क में सेव हो जाती थीं. अपनी तमाम खुशबू समेत. ज़ेहन की इस हार्ड डिस्क में कोई डिलीट बटन भी नहीं था. और यह अच्छा ही था. लड़की ने खुद को उस दृश्य में पैबस्त कई बार देखा था. लड़के की आँखों में. लड़के ने उस सुंदर दृश्य को देखते हुए पनीली हो आई अपनी आँखों को दृश्य से हटा लिया था. वह दृश्य उन दोनों के जीवन का सबसे सलोना दृश्य था. सबसे सलोना लम्हा.

हर बरस लड़की इस मौसम में इस दृश्य को इन खिलते हुए गुलाबी फूलों के आसपास तलाशती है. फूल खुद मानो उस वैभव को तलाशते हों हर बरस. लड़की के सामने रखी चाय में गुलाबी फूलों की परछाईं गिर रही थी. स्कूल जाते बच्चों ने लपककर उन फूलों की एक छोटी टहनी तोड़ ली थी. कुछ दूर जाकर उन्होंने वह फेंक दी थी कि उनका मन भर गया था शायद उस टहनी के वैभव से. लड़की का मन क्यों नहीं भरा इतने बरसों में. लडकी ने लपककर उस फूलों से भरी टहनी को उठाया और अपने साथ ले आई. चाय के कप के पास अब वह टहनी रखे हुए मुस्कुरा रही थी. टहनी उठाकर लौटते वक़्त लड़की ने सड़क पर झरकर गिरे फ्योली के फूल उठाकर जुड़े में सजा लिए थे. गुलाबी और पीले फूलों की जुगलबंदी में चाय की खुशबू बिखर रही थी. लड़की ने स्मृतियों की शाख से अपना मनपसन्द लम्हा उतारकर सामने सजा लिया था.

वह बारी-बारी से दोनों कप से चाय पी रही थी. चायवाले दादा ने पूछा,'बिटिया कोई और आने वाला है?' लड़की मुस्कुराई. 'नहीं दादा, जो आने वाला था वो वहीं गया है जहाँ उसे जाना चाहिए था.' दादा को कुछ समझ नहीं आया उन्होंने 'अच्छा' कहकर फिर से दूसरे ग्राहकों की चाय चढ़ा दी.

अख़बार में ख़बर थी, आपदा में बचाव के लिए गए लोगों का कोई पता नहीं...अख़बार कई बरस पुराना था या शायद नया ही. खबर बदली नहीं थी. लड़की की उदास आँखों ने चाय को देखा, और गटक लिया. पहाड़ पर पहाड़ सी आपदा आई. फिर न जाने कितने घर उदास हुए...लड़की ने चाय के दोनों कप रखते हुए दादा को पैसे दिए और फूलों से कहा, 'इस बरस ज्यादा खिलना है तुम्हें, कि उदास है मन का मौसम.' वो चलने को हुई तभी एक फूल उसके काँधे पर आहिस्ता से आकर बैठ गया. लड़की ने महसूस किया इस जहाँ या उस जहाँ...जहाँ भी है वहां लड़का जरूर मुस्कुराया है.

Friday, February 19, 2021

और अंत में अंतिमा


जैसे मुझे पता था कि वहां पहुँचते ही सब खत्म हो जायेगा. इसलिए मैं उस जगह से बस कुछ कदम दूर पर ही रुक गयी. यह रुकना फिर देर तक रुके रहना बनता गया. मैंने इस तरह के सुख को कभी महसूस नहीं किया था. यह कित्ता बड़ा सुख था कि जहाँ पहुंचने की शदीद इच्छा है उस जगह के मुहाने पर पहुंचकर ठहरे हुए होना. आश्वस्ति यह कि बस दो कदम बढ़ाये और पहुँच गए. लेकिन उसके बाद क्या? उसके बाद फैला एक निर्जन सन्नाटा और कुछ उदासी कि अब इस तरह कुछ कदम बढ़ाकर पहुँचने की जगह कोई नहीं बची. इसी उहापोह में अंतिमा के अंत के दरवाजे पर खुद को रख दिया. बहुत सारे काम के सैलाब से गुजरते हुए अंतिमा को थामे रखना मानो सुख हो. एक रोज़ ऋषिकेश के त्रिवेणी घाट पर भी पलट लिए कुछ पन्ने. लेकिन पढ़े नहीं.
 
फिर एक रोज़ रातरानी की खुशबू ने अंतिमा के पन्ने पलट दिए और मैं एक साँस में सब पढ़ गयी. जैसे चाय पीते हैं अंतिम घूँट. पीने का सुख और खत्म हो गयी की उदासी एक साथ महसूस करते हुए. आखिरी पन्ने के सामने बैठी ही थी कि कबूतर का जोड़ा घर में आ गया. मैंने चोरी से एक निगाह उन पर डाली और वापस पढ़ने लगी. रोहित, पवन, बंटी सबके चेहरे आपस में टकराने लगे. अब यह बंटी कहाँ से आ गया. यह तो दूर बहुत दूर बैठा था. अंतिमा मुझे शुरू से जानी पहचानी लग रही थी इसलिए उसने चौंकाया नहीं. किसी उपन्यास के खत्म होने के बाद खुद को एक असीम शांति से भरते हुए महसूस करती हूँ. उस शांति में चाय पीना सुख है. मैंने अंतिमा की ओर मुस्कुराकर देखा और चाय चढ़ा दी. मैंने तीन कप चाय क्यों चढ़ाई? एक मेरी, एक अंतिमा की और तीसरी कैथरीन की. आईने में देखा तो खुद के चेहरे में जंग हे का चेहरा उगता मालूम हुआ. वो जंग हे जिन्हें मैंने देखा नहीं. मुझे कुछ ही देर में लगा मैं जंग हे हूँ और मेरे सामने सोफे पर अंतिमा और कैथरीन खामोश बैठी हैं. कैथरीन का चेहरा कितना ज्यादा चमक रहा है और अंतिमा थोड़ी सी नींद में लग रही है. दोनों एक-दूसरे से बात करने की इच्छा में मौन से भर गयी हैं. अब टेबल पर तीन कप चाय है. और मैं वहां कहीं नहीं हूँ. जंग हे कहती हैं, ‘तुम दोनों बहुत प्यारी हो.’अंतिमा मुस्कुरा देती है जैसे कह रही हो कि वह जानती है कि वह खूबसूरत है. जबकि कैथरीन चुपचाप चाय की सिप लेते हुए अपने मौन में कहती है कि उसे इस बात से कुछ फर्क नहीं पड़ता. देर तक चुप्पी से थक कर जंग हे यू लर्न कविता पढने लगती हैं. मिसेज वर्मा किसी के ख्याल में नहीं हैं रोहित भी नहीं, पवन भी नहीं, दुष्यंत भी नहीं. अरु को समझ में नहीं आ रहा कि यह हो क्या रहा है तभी कबूतरों का जोड़ा फुर्र से उड़ जाता है. वो दिन में सुस्ताती रातरानी की बेल के पास बैठकर एक-दूसरे की गर्दन पर गर्दन रख देते हैं. उनकी गर्दन का चमकता नीला अंतिमा की ड्रेस के जैसा नीला है कैथरीन की आँखों के जैसा नीला और जंग हे की अंगूठी में जड़ें नीलम जैसा.
मैं 'अंतिमा‘ पढ़ चुकने के बाद उदास नहीं हूँ. क्योंकि अब मेरे हाथ में ‘चलता फिरता प्रेत है...’


Thursday, February 4, 2021

गुमनाम कवयित्री की जीवनी

-वीरेन्द्र यादव

रूस की लगभग अलक्षित और लंबे समय तक गुमनाम रही लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण कवयित्री मारीना त्स्वेतायेवा की युवा लेखिका प्रतिभा कटियार द्वारा लिखित जीवनी 'मारीना' को पढ़ते हुए यह तथ्य बार बार उद्वेलित करता है कि चमकदार दिखते और लुभाते इतिहास के पीछे कितने अदीठ अंधेरे छिपे होते हैं.मुझे लगता है कि 'मारीना' की इस जीवनी का टेक्स्ट जितना महत्वपूर्ण है उससे कम महत्वपूर्ण नहीं है इसका सबटेक्स्ट. मारीना रिल्के और बारिस पास्तरनाक की प्रेमिका थी तो गोर्की की प्रशंसिका. पुश्किन की कविता उसकी प्रेरणा थी तो मैन्डेलस्ताम और अख्मातोवा उसके प्रिय समकालीन . सोवियत क्रांति की उथलपुथल ने उसे जिस त्रासद नियति का शिकार बनाया उसे आज भी पढ़ना अवसादकारी है. वह अपने वतन रुस से क्रांति पूर्व और पश्चात की परिस्थितियों के चलते उस दौर के अन्य रुसी बौद्धिकों की तरह देशबदर होने के लिए अभिशप्त थी. कविता व साहित्य उसकी प्राणवायु थी और प्यार उसकी सांस. प्यार में वह समझ, सहजता और स्वच्छंदता की कायल थी.वह रुसी क्रांति की गायक नहीं थी और क्रांति से उपजी अराजकता के प्रति अपनी कविताओं में आलोचनात्मक थी, लेकिन रुस से उसे अगाध प्रेम था. विडम्बना यह थी कि 'उस दौर में रुस से प्रेम के सीधे अर्थ नहीं थे. कोई इसे बोल्शेविक नजरिये से देख रहा था तो कोई राजशाही के समर्थन के नजरिये से'. मारीना न बोलशेविक समर्थक थीं और न राजशाही की. फिर भी उसे अपने देश से आत्मीयता के बजाय दुराव व हताशा ही मिली. वह गोर्की की प्रशंसक थी उन्हें काबिल, विनम्र और इंसानियत का पैरोकार मानती थी लेकिन गोर्की की दृष्टि में वह संदेहास्पद और गैर भरोसेमंद थी. पास्तरनाक से वह प्रेम में थी, लेकिन वे भी उसके मददगार नहीं सिद्ध हुए. उसके जीवन में एक दौर ऐसा भी था कि वह एक जोड़ी कपड़े और जूते की मोहताज थी.

एक बेटी की देखभाल करती मारीना दूसरी बेटी की अंत्येष्टि में शामिल होने से वंचित रही. स्टालिन की गुप्तचर एजेंसी ने उसके पति, बेटी और बेटे को अलग अलग समय पर गिरफ्तार किया. अंततः मारीना को अपने देश की नागरिकता तो मिली लेकिन उसके जीवन का त्रासद अंत उसकी आत्महत्या में हुआ. उसकी आत्महत्या के सूत्र मायकोवस्की और एसेनिन के आत्मघात से भी कहीं न कहीं जुड़ते हैं. मारीना को दफ्न किए जाने की जगह का पता तो नहीं चल सका लेकिन प्रतिभा कटियार ने उसे अपनी इस किताब द्वारा हिंदी पाठकों के समक्ष जीवित कर दिया है.मारीना की यह जीवनी जिस समर्पित भाव और बिना किसी निर्णायक मुद्रा के प्रतिभा ने लिखी है उसके लिए वह बधाई की पात्र हैं. इस जीवनी का महत्व यह भी है कि यह राजनीति और साहित्य के कई अनुत्तरित प्रश्नों को एक बार फिर शिद्दत के साथ प्रस्तुत करती है. इसका पढ़ना कई तरह से अवसादग्रस्त और बेचैन करने वाला है. हमारे शहर की लेखिका प्रतिभा कटियार का इसका निमित्त बनना सुखद है. एक बार फिर प्रतिभा कटियार को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ.
संवाद प्रकाशन , मेरठ से प्रकाशित इस पुस्तक का मूल्य 300 रु. है.

लखनऊ में ‘मारीना’



-कौशल किशोर
‘मारीना’ कवि-कथाकार-पत्रकार प्रतिभा कटियार की हिन्दी के पाठकों के लिए खोज है। यह उस कवि की तलाश है जो अपने देश रूस से बेइन्तहां प्यार करती थी। पर उसके देश ने क्या दिया? विस्मृति। उसे भुला दिया और उसकी याद भी आई तो मरने के बाद। यह कृति रूस की महान कवयित्री मारीना त्स्वेतायेवा के युग और जीवन पर केन्द्रित है। पिछले साल 2020 में संवाद प्रकाशन, मेरठ से आई। इसमें प्रतिभा की प्रतिभा छलछलाती हुई दिखती है।
मरीना को जो जीवन मिला, वह त्रासदी से भरा था। लगातार एक शहर से दूसरे शहर, एक जगह से दूसरी जगह, एक देश से दूसरे देश। यह न थमने वाला सिलसिला था। इसमें संघर्ष ही संघर्ष था। इसमें रोटी के जुगाड़ से लेकर जिन्दगी की छोटी से छोटी जरूरतें शामिल थीं। यह तो शब्द और कविता थी जिसने उसे सहारा दिया। खत और डायरी का साथ मिला। उसके दो प्रिय शगल थे - ख्वाबों से बात करना और खत लिखना। यह न होता तो वह कब की खत्म हो गई होती।
मृत्यु हमेशा उसके पास रही, साथ रही। मृत्यु में ही उसने जीवन देखा और उसे जीवन के कैद में महसूस किया। लोग अपना जन्मदिन मनाते हैं, सुखमय जीवन की कामना करते हैं। पर यहां कहानी उलटी है। वह अपने स़त्रहवें जन्मदिन पर मृत्यु की कामना करती है। 14 साल की उसकी उम्र थी जब मां गई। पिता का साथ 25 वें साल में छूटा। सबसे दर्दनाक मौत अपनी छोटी बेटी का देखने को मिला। विडम्बना यह कि उसकी मौत के बाद उससे वह मिल भी न पाई। वह बड़ी बेटी को नहीं छोड़ सकती थी जो जीवन और मृत्यु के बीच थी।
मरीना की दुनिया प्रेम से भरी थी। कह सकते हैं कि वह प्रेम के लिए ही बनी थी। उसे लगता कि प्रेम ही उसे बचा सकता है। उसका प्रेम पुश्किन से था। नेपोलियन के प्रति उसका आकर्षण था। पहला प्रेम किशोरावस्था में हुआ। सर्गेई से पिता की इच्छा के विरुद्ध जाकर शादी की। यह प्रेम विवाह था। उसे निभाया। उस पर कविता लिखी। प्रेम की उसकी दुनिया में रिल्के हैं, बोरिस पास्तरनाक हैं और भी कई हैं। प्रेम उसके यहां बहती नदी है।
मारीना की कविताई का दौर 13 साल की उम्र से शुरू हुआ। मां चाहती थी कि वह पियानो सीखे। उसका लगाव संगीत से हो लेकिन उसका प्रेम तो शब्दों से था। 17 साल की उम्र में पहला संग्रह ‘द इवनिंग एल्बम’ आया। ‘द फ्रेंड’, ‘पोयम फॉर यूथ’, ‘साइकिल’ जैसी कविता श्रृंखला से लेकर ‘द जार और मैडम’ जैसी अनगिनत कृतियों से उसने साहित्य की दुनिया को समृद्ध किया। रूस के लोकजीवन और लोक संस्कृति से उसका भावनात्मक लगाव था। वह कविता को देश के पार, भाषा के पार जाकर देखती थी। कवि को वह बन्धनमुक्त देखना चाहती थी। उसकी काव्य प्रतिभा से लगता है कि वह इस दुनिया की नहीं बल्कि इसके पार की है।
मारीना का समय दुनिया का सबसे हलचल, उथल-पुथल, उलझाव से भरा था। उसमें उसने विस्थापन, निर्वासन झेला। 17 साल अपने देश से बाहर रहना पड़ा। इतिहास के बारे में बातें करना और इतिहास जीना दो अलग चीजें हैं। वह इतिहास मारीना का वर्तमान था। वह ऐसा था जहां उसके लिए मृत्यु में ही मुक्ति थी। उसने यही चुना और परिदृश्य से ओझल हो गयी। वह इस तरह ओझल हुई कि पता ही नहीं कि उसे किस कब्रिस्तान में दफनाया गया। उसे मृत्यु के कई बरस बाद जाना गया, उसकी कविता को पहचाना गया। वह प्रतिष्ठित हुई। उसका मूल्यांकन करते हुए यहां तक कहा गया कि वह तो नोबल पुरस्कार की हकदार थी। उसका जीवन और संघर्ष और अन्त में मृत्यु का आलिंगन उस वक्त की राजनीति और सत्ता व संस्कृति की संरचना पर भी टिप्पणी है।
प्रतिभा की किताब इसी ‘मारीना’ की कथा है। यह जीवनी मात्र नहीं है। यह उसकी संघर्ष कथा, त्रासदी कथा, स्वप्न कथा, प्रेम कथा, काव्य कथा, आत्मकथा सबको समेटती है। बीच बीच में ‘बुक मार्क’ के रूप में टिप्पणियां कृति को जीवन्त है और पाठ को रोचक बनाती हैं। मरीना में प्रतिभा समाहित है। वह जिस तरह मारीना से इश्क करती है, यह उसकी दास्तां है। वह मारीना में अपने को पाती है, उसे रचती है, उससे बतियाती है, बहसती है, सवाल करती है और उसमें समा जाती है। इसीलिए यह अनूठी कृति बन पाई है। यह हिन्दी के उन पाठकों के लिए अनुपम भेंट है जिनकी विश्व साहित्य को जानने, समझने व पढ़ने की रूचि है।
 24 जनवरी के खुशगवार शाम में प्रतिभा के इस ‘मारीना’ से उसके अपने शहर लखनऊ के लोगों की मुलाकात हुई। आसमान साफ था। कई दिनों के बाद धूप खिली थी। इस अवसर पर प्रतिभा की इस कृति की सात साल की रचना यात्रा के संग-साथी शामिल थे। उसकी दोस्त ज्योति थी तो मम्मी भी थी जिन्होंने पल-पल का ख्याल रखा। बेटी ख्वाहिश इस पूरे लम्हे को अपने मोबाइल कैमरे में कैद कर लेने में जुटी थी। ‘मारीना’ के विमोचन का यह कार्यक्रम मानस नगर, हजरतगंज के एक खुले परिसर में सम्पन्न हुआ। अध्यक्षता आलोचक वीरेन्द्र यादव ने की। संचालन किया कवि व जसम उत्तर प्रदेश के कार्यकारी अध्यक्ष कौशल किशोर ने। वक्ता थे इप्टा के राष्ट्रीय महासचिव राकेश, आलोचक नलिन रंजन, कवि व पत्रकार सुभाष राय, कवि भगवान स्वरूप कटियार, कवयित्री विमल किशोर व सीमा सिंह और तारा कटियार। इस मौके पर कवि-कथाकार शालिनी सिंह, कवि-कथाकार तरुण निशान्त, युवा लेखक हाफिज किदवई आदि कई लोग मौजूद थे। आयोजन जन संस्कृति मंच का था।
प्रतिभा कटियार ने अपने शहर लखनऊ में ‘मारीना’ को पाकर बेहद खुश थी। उसने बताया कि उसने कैसे मरीना को जाना और कैसे जानती चली गई। उसने सात साल की लम्बी रचना प्रक्रिया की दास्तां सुनाई। मम्मी ने कैसे ख्याल रखा। मित्रों के साथ व सुझाव को भी याद किया। सर्वोपरि डा वरयाम सिंह के प्रेरक सहयोग के बारे में बताया कि अगर उनका साथ न मिला होता तो मारीना तक पहुंचना असंभव था। वे ही थे जिसकी वजह से यह संभव हो पाया। उन्होंने जितेन्द्र रघुंवशी, अशोक पाण्डेय सहित कई रचनाकारों के सहयोग-सुझाव को याद किया। कार्यक्रम के बाद प्रतिभा कटियार ने सोशल मीडिया पर लिखा भी ‘मारीना ने मेरे कान में चुपके से कहा- तुम्हारे शहर के लोगों ने समझा, मुझे प्यार किया। उन्हें शुक्रिया कहना। मैंने उससे हंसकर कहा कि हां, मैंने उन्हें शुक्रिया कहा है। हालांकि शुक्रिया नाकाफी होता है ऐसे अवसरों पर।’
तो यह कहानी है प्रतिभा कटियार की ‘मारीना’ की। जैसा पहले ही कहा कि इसमें प्रतिभा की ‘प्रतिभा’ प्रस्फुटित होकर सामने आई है। ऐसी कृति के लिए प्रतिभा को हार्दिक बधाई, दिली मुबारकबार वह शुभकामनांए। प्रतिभा की अगली किताब का बेसब्री से इंतजार रहेगा।





लखनऊ के दोस्तों से मिली मारीना



Pratibha Katiyar ने चर्चित रूसी रचनाकार
मारीना के जीवन और युग को दस साल में डिस्कवर किया है।हाल ही में संवाद प्रकाशन से प्रकाशित किताब #मारीना की रचना -प्रक्रिया को उन्होंने आज हम-सबसे शेयर किया।शिरोज हैंगाउट,गोमतीनगर,लखनऊ,में उनके साथ कथाकार किरण सिंह, कथाकार और कवयित्री उषा राय Usha Rai और नाटककार प्रदीप घोष Pradeep Ghosh के साथ मैं भी मौजूद था।
लगन, लगाव और जूनून के साथ मारीना और उसके समय को उन्होंने ऐसा उकेरा है कि मानो उनके हाथ में टाइम मशीन आ गई हो। इस किताब से मारीना की ज़िन्दगी हिन्दुस्तानियों के सामने साकार हो सकी है। दस साल तक प्रतिभा जी मारीना को अपने साँसों में महसूस करती रहीं।मारीना से प्यार और तकरार का दिलचस्प नज़ारा है यह किताब।