Showing posts with label निदा फ़ाज़ली. Show all posts
Showing posts with label निदा फ़ाज़ली. Show all posts

Sunday, September 5, 2010

थोड़ी बहुत तो जेहन में नाराजगी रहे


बदला न अपने आपको जो थे वही रहे
मिलते रहे सभी से मगर अजनबी रहे,

दुनिया न जीत पाओ तो हारो न खुद को तुम
थोड़ी बहुत तो जेहन में नाराजगी रहे

अपनी तरह सभी को भी किसी की तलाश थी
हम जिसके भी करीब रहे दूर ही रहे

गुजरो जो बाग से तो दुआ मांगते चलो
जिसमें खिले हैं फूल वह डाली हरी रहे.

- निदा फाजली

Tuesday, June 22, 2010

कौमी एकता और तवायफ


वो तवायफ
कई मर्दों को पहचानती है
शायद इसीलिये
दुनिया को ज्यादा जानती है
उसके कमरे में
हर म$जहब के भगवान की एक-एक तस्वीर
लटकी है
ये तस्वीरें
लीडरों की तकरीरों की तरह नुमाइशी नहीं
उसका दरवाजा
रात गए तक
हिंदू
मुस्लिम
सिक्ख
ईसाई
हर $जात के आदमी के लिए
खुला रहता है
खुदा जाने
उसके कमरे की सी कुशादगी
मस्जिद और मंदिर के आंगनों में कब पैदा होगी...
-निदा फाजली
(कुशादगी- विस्तार)