शिलॉन्ग से सोहरा की यात्रा शुरू हो चुकी थी। उत्साह, खुशी और गहरी शांति का हाथ थामे हम माँ बेटी निकल पड़े थे। यूं हम जानते तो थे कि सफ़र सुहाना होने वाला है लेकिन असल मजा उस जाने हुए के पार जाने का है। यात्राओं की सबसे सुंदर बात लगती है कि हमेशा कोई न कोई चौंकाने वाला मंजर यात्राओं के पास होता है। हमारे तमाम जाने हुए से, सोचे हुए से अलग कुछ अनोखा। जैसे कोई बंद मुट्ठी हो, जिसके खुलने का इंतज़ार हो।
रात अच्छी गहरी नींद सो चुकने के बाद का यह ताज़ा दिन कमाल होने वाला था। और हम पूरी तरह से तैयार थे इस दिन को जी लेने के लिए। जैसे-जैसे हम सोहरा यानि चेरापूंजी की ओर बढ़ रहे थे, मौसम बदल रहा था। वही मौसम जिससे मिलने की बेकरारी थी। मन कुलांचे मार रहा था। बाहर का मौसम मन के मौसम की ओर हाथ बढ़ा रहा था। हम एक गहरी चुप में धँसे हुए मौसमों की कारस्तानी देख रहे थे। शिलॉन्ग से सोहरा की दूरी सिर्फ 55 किमी है। टैक्सी से यह दूरी 2 घंटे के अनुमानित समय में आराम से पूरी हो जाती है जिसमें बीच में आने वाले खूबसूरत रास्तों का आनंद लेने के लिए रुकना भी शामिल करें तो ज्यादा से ज्यादा 3 घंटे।
असल में यह रास्ता इतना ज्यादा खूबसूरत है कि हर थोड़ी देर बाद लगता है कि यहाँ रुकना चाहिए, यहीं रुके रहना चाहिए। ऊंची विस्तृत पहाड़ियों के बीच खूबसूरत हरियाली और पर मँडराते बादल, जैसे दिल की धड़कनों की रफ्तार भी मध्ध्म हो जाए। कैब ड्राइवर अब्दुल भाई को अंदाजा है कि पर्यटक कैसे बावरे हो जाते हैं यहाँ इसलिए वो खुद ही बीच बीच में कैब रोक रहे थे। सच कह रही हूँ कितने ही वीडियो देखे हों, यात्रा वृतांत पढे हों लेकिन जहां होने का सुख है वहाँ होने का ही सुख है। और यह सुख न कभी शब्दों में ढल सकता है और न ही कैमरे में कैद हो सकता है। हम सिर्फ कोशिश करते हैं वर्तमान के लम्हों को भविष्य की स्मृतियों के लिए सहेजने की। सिर्फ एक बचकानी सी कोशिश। लेकिन यह बात जीकर जानी है कि बटोरना तो असल में जीवन ही है।
क्या आप पानी लिख सकते हैं, इस तरह कि उसे पढ़कर प्यास बुझे। शायद दुनिया भर के लेखक इसी कोशिश में हैं, इसी साधना में कि एक रोज वो इस तरह पानी लिखना सीख पाएंगे कि उसे पढ़कर पढ़ने वालों की प्यास बुझेगी। इस तरह रोटी लिख पाएंगे कि पढ़ने वालों की उसे पढ़कर भूख मिटेगी। लेकिन यह कल्पना की बातें हैं। रोटी की भूख रोटी के बारे में पढ़कर नहीं, रोटी खाकर ही मिट सकती है। ठीक वैसे ही यात्रा का सुख यात्रा करके ही जाना जा सकता है। सवाल मन में यह भी आता है कि फिर मैं क्यों लिख रही हूँ आखिर। लेकिन जवाब मुझे अच्छे से पता है, यह लिखते हुए मैं उसे जिये हुए को फिर से जी रही हूँ। यह सब मेरे लिए ही, सिर्फ मेरे लिए। कि मैं कैसे लिख पाऊँगी उन बादलों के बारे में जो अब हमारी टैक्सी में आकर हमारे बीच बैठ गए थे, मंडरा रहे थे हमारे ऊपर, हथेलियों में, बालों में, पलकों में। सड़क लगभग दिखनी बंद हो चुकी थी और हम बादलों पर ही चल रहे थे।
शायद बादलों के इसी खेल को देखने के लिए हमने यह मौसम चुना यहाँ आने का। न सही टूरिस्ट स्पॉट देख पाने का सुख मुझे ये बादलों के खेल देखने से कब फुर्सत। हमने बीच में कुछ जगहों पर रुककर तस्वीरें लीं और यह सोचकर हंस ही दिये कि यह जानते हुए भी हम दस परसेंट भी तसवीरों में नहीं उतार पाएंगे कोशिश करते रहते हैं। एक ब्रेक में हमने भुट्टा और पाइनएप्पल लिए। यह शायद पहाड़ों पर खाने का रिवाज है या कोई और बात यहाँ भुट्टे के स्वाद का अलग ही मजा होता है।
बिना किसी जल्दबाज़ी के धीरे-धीरे चलते हुए हम आखिर सोहरा पहुँच गए। यहाँ चेरापूंजी के नाम का कोई बोर्ड नहीं है, हर जगह सोहरा है। इसके बारे में कहते हैं कि पहले इस जगह का नाम सोहरा ही था फिर अंग्रेजों ने इसका नाम चेरापूंजी किया, क्यों किया ये तो वही जानें लेकिन फिलहाल मेघालय सरकार ने इसे सोहरा ही घोषित कर दिया है। एक तो ये शहरों के नाम बदलने की राजनीति यह बात क्यों नहीं समझती कि यह बात कितनों की भावनाओं के साथ जुड़ी हुई है।
खैर, बादलों वाले रास्ते से लगभग उड़ते हुए हम अपने गंतव्य पर पहुँच चुके थे। एक छोटे से गाँव में एक प्यारा सा होमस्टे था हमारा ठीहा। यह होमस्टे कुछ महिलाएं ही चलाती हैं। माँ और बेटी मुख्य तौर पर। यहाँ या तो कपल, सिंगल औरतें लड़कियां या परिवार ही रुक सकते हैं। सिंगल लड़कों या लड़कों के ग्रुप के लिए यह नहीं है। बहरहाल, प्यारी सी मुस्कुराहट के साथ हमारा स्वागत किया गया। कमरा बेहद प्यार से और सलीके से सजाया गया था। बादलों में छुपा हुआ वह घर और उस घर के एक हिस्से में हम। हमने पर्दे हटाये खिड़कियाँ खोलीं और बादलों को कमरे में आने दिया। बादल भी इसी इंतज़ार में थे शायद। जरा सी देर में कमरा बादलों से भर गया। बिटिया मेरी चाय के इंतजाम में लगी थीं और मैं बादलों के संग गुफ्तगू में।
संग बने रहिए...बादलों का यह खेल तो अभी बस शुरू ही हुआ है।
(जारी....)




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