Wednesday, May 11, 2022

पंडित शिव कुमार शर्मा- पानी की आवाज़ का नाम


वो मेरा 20वां जन्मदिन था. उन दिनों जन्मदिन पर मिलने वाले तोहफों में पहले नम्बर पर किताबें होती थीं और दूसरे नम्बर पर कैसेट. ये नम्बर आपस में अदला बदला भी करते थे. सबको पता था कि किताबें और संगीत में मेरी जान बसती है. तो बीसवें जन्मदिन पर एक तोहफा मिला म्युज़िक टुडे की चार एल्बम का एक सेट. पंडित शिवकुमार शर्मा का 'वाटर', पंडित हरी प्रसाद चौरसिया का 'रिवर', जाकिर हुसैन का डेजर्ट और वनराज भाटिया का 'अर्थ'. देने वाले को यह पता था कि पानी मेरी कमजोरी है. बारिश की एक बूँद मुझे बावरी बना देती है. लेकिन उसे यह नहीं पता था कि वो मेरी ज़िन्दगी में एक नयी राह खोल रहा है.

बिलकुल संकोच नहीं यह कहने में कि फिलिप्स के उस टेप रिकॉर्डर में जिन कैसेट्स की रील सबसे ज्यादा घिसीं, फंसी उनमें से एक थी पंडित शिव कुमार शर्मा के 'वाटर' और हरि प्रसाद चौरसिया के 'रिवर' की. जीवन में पानी की आवाजों ने जगह इस कदर बना ली कि भीतर की नदी खूब खिलखिलाने लगी. उसने भीतर के जंगल को भी खूब हरा रखा. मैं जो थोड़ी सी जंगली, थोड़ी सी नदी सी बची रह गयी हूँ उनमें 20 वें जन्मदिन में मिले तोहफे में शिव कुमार शर्मा और हरि प्रसाद चौरसिया का बड़ा योगदान है.

चौरसिया जी से तो खैर एक दो मुलाकातें भी हासिल हुईं लेकिन शिव कुमार जी से मुलाकात संभव न हो सकी. लेकिन सच कहूँ जिस कदर उनका 'वाटर', 'माउन्टेन', 'वाकिंग इन द रेन' साथ रहता है ऐसा कभी लगा ही नहीं कि उनसे मिली नहीं हूँ. वैसे ज़ाकिर हुसैन साहब का डेजर्ट भी कमाल है. लेकिन आज बात शर्मा जी की.

वाटर सुनने के बाद यूँ हुआ कि संगीत की किताब का पहला पन्ना खुल गया हो जैसे. इसके बाद उन्हें ढूँढकर सुना, खूब सुना. मन खुश हुआ तब सुना, परेशान हुआ तब सुना. दोस्तों की महफिल में सुना, तन्हाई में सुना. पानी की आवाज़ का दूसरा नाम हैं शिव कुमार शर्मा जी.

शायद यही वजह रही कि शिव हरि की जोड़ी ने जितना संगीत रचा फिल्मों में भी वो मेरा फेवरेट हुआ. जिसमें सबसे पहले याद आता है 'सिलसिला', 'चांदनी' और 'लम्हे' का संगीत.

आज जब उनके जाने की ख़बरें नज़रों से गुजर रही हैं जाने क्यों एक नायकीनी सी बनी हुई है. मेरे लिए वो हमेशा से हैं और रहेंगे. वो जा नहीं सकते. सुबह से पानी की आवाज़ कान में पहने घूम रही हूँ. उनका होना हमेशा बना रहेगा. जीवन को सबसे मुश्किल दिनों में भी नमी को बचाए रखेगा. 

Tuesday, May 10, 2022

वो मुझमें रहती है मैं बनकर


आना सिर्फ एक शहर से दूसरे शहर आना नहीं होता. आना होता है सांस लेने में जिन्दगी बनकर. हमें खुद न पता हो हमारी प्यास का और कोई दरिया बहता चला आये प्यास बुझाने ऐसा भी होता है कभी. ऐसे ही दिन थे, छलके-छलके से अटके भटके से. न किसी से बात करे न मिलने का. बस कि अपनी चुप की नदी में चुपचाप पड़े रहने को दिल करे. ऐसे वक्त में किसी दोस्त का आना और अपनी पलकों से छूकर लम्हों को परों से हल्का बना देना क्या तो सुख है. सुख जिसका नाम है श्रुति.

यह श्रुति की भोपाल से देहरादून की यात्रा नहीं थी. यह एक एकल आत्मा की दूसरी एकल आत्मा तक की यात्रा थी. एकांत का सुंदर सुर लगा रहा इसमें. इस सुर में हम डूबते-उतराते रहे. कोई हड़बड़ी नहीं बस कि साथ का एहसास. उसे किसी टूरिस्ट स्पॉट देखने में कोई रुचि नहीं उसे सिर्फ मेरे पास रहना था.

जैसे कितने बरसों से ऐसे किसी साथ की तलाश थी. साथ जो घुल जाए वजूद में. घर में. शहर में. वो मुझे दूसरी नहीं लगती मेरा ही एक हिस्सा लगती. मुझसे बेहतर होकर जो मुझे मिला हो.

लम्बे अरसे से अकेले रहते हुए कुछ ऐसा हो गया है मन कि अब किसी का भी होना असहज करने लगा है. ऐसे में खुद को थोड़ा समेट लेती हूँ और किसी के साथ के बीतने का इंतजार करने लगती हूँ. लेकिन श्रुति तुम्हारे साथ होकर समझ में आया कि इकसार होना कैसा होता है. इसका कैसा तो सुख होता है. और सबसे सुंदर बात यह कि यह सब इतना एफर्टलेस है. जैसे एक ही वक़्त पर चाय की तलब लगना, एक ही वक़्त पर नज़रें उठाकर देखना एक-दूसरे को, एक ही वक़्त पर पलकें झपकाना और हथेलियों को थाम लेना. इकसार होना ऐसा ही होना चाहिए.

तुम्हारे साथ बैठकर खुद की जकड़नों को करीब से देखा है उनसे आज़ाद होने की तरफ पहला कदम बढ़ाया है. तुम्हारे साथ रहकर जाना है कि साथ होने के असल मानी कैसे होते हैं जब किसी के साथ होकर हम पहले से ज्यादा तरल और सरल होने लगते हैं, हमारे माथे की लकीरें चमक उठती हैं.

अब जबकि तुम चली गयी हो वापस तो देखो तो किस कदर छूट गई हो यहीं. बिखरी पड़ी हो घर के कोने-कोने में, शहर के हर हिस्से में, मेरी मुस्कुराहटों में.

Saturday, May 7, 2022

जीवन मुझे अभी और मांजना चाहता है...

- प्रतिभा कटियार

इस भोर में बीती रात की ख़ुशबू शामिल है. हाथ में चाय का कप लिए बौर से लदे पेड़ों को देखती हूँ. नयी कोंपलों से सज रही शाखों को देखती हूँ. मौसम आँखों पर बढ़िया चश्मा लगाये, फूलों की उठती गंध का इतर लगाये एकदम टशन में है. यह इश्क शहर है, देहरादून. फूलों में होड़ है खिलने की, रास्तों में मनुहार है गले लगने की. दस बरस हो गए मुझे इस शहर के इश्क़ में पड़े. दस बरस हो गये मुझे इस शहर में साँस लेते.

कितने किस्से हैं इस शहर और मेरे इश्क की दास्ताँ के. ये किस्से या तो यह शहर जानता है या मैं जानती हूँ. दस बरस पहले की बात है. जीवन से, रिश्तों से निराश टूटी-बिखरी अवसाद के घने अंधेरों में घिरी एक स्त्री को इस शहर ने आवाज़ दी, ‘आ जाओ’. जब खुद पर भरोसा न हो तब उनके भरोसे पर भरोसा करो जिन पर तुम्हें भरोसा है. यह बात एक बार प्रभात सर ने कही थी. बात साथ रह गयी. देहरादून से आवाज़ देने वाली स्वाति को भी शायद नहीं पता होगा कि उसकी आवाज़ में मेरी ज़िन्दगी बदल देने की ताकत है. दवाइयों की बड़ी सी पोटली लिए मैं इस शहर में दाखिल हुई. डरी, सहमी, सकुचाई. खुद पर रत्ती भर भी भरोसा नहीं बचा था. बस एक चीज बची थी आत्मसम्मान को सहेजने की इच्छा.

दवाइयों की गिरफ्त में सोयी रहने वाली इस टूटी-फूटी मन दशा की स्त्री को चाह थी कि सर पर हाथ फेर दे कोई और कह दे, ‘सब ठीक हो जाएगा. मैं हूँ’. और यह कहा शहर देहरादून ने. इस शहर ने मुझे मेरा होना महसूस कराया, मेरे भीतर धंसी अवसाद की परतों को आहिस्ता-आहिस्ता निकाला और मुझे आज़ाद किया. इस शहर के रास्तों ने मेरे आंसू संभाले, यहाँ की बारिशों ने मेरा माथा सहलाया. फूलों ने ज़िन्दगी में आस्था बनाये रखना सिखाया.

पहली बार कोई फैसला किया था अपने जीवन का जिसमें सिर्फ मैं शामिल थी और कोई नहीं. ऐसा फैसला जिससे कोई सहमत नहीं था. अच्छी खासी नौकरी, घर, अपना शहर सब छोड़ कर अनजान शहर जाने का फैसला आसान नहीं था. आसान नहीं था अविश्वास से भरे, लगातार पीड़ा देने वाले रिश्ते से हाथ छुड़ाकर निकलना. मेरे सामने अकेले अनजान शहर में छोटी सी बच्ची को लेकर आने के फैसले के मुकाबले तमाम सुविधाएँ थीं. शहर छोड़ने का, नए सिरे से सब शुरू करने का, संघर्ष की राह चुनने का विकल्प अंतिम विकल्प नहीं था. बहुत सारे और चमचमाते विकल्प भी थे लेकिन मैंने इस राह पर चलने को पहले विकल्प की तरह लिया क्योंकि मैं अपनी ज़िन्दगी को एक मौका देना चाहती थी. खुद को आज़मा कर देखना चाहती थी.

मैंने जीकर जाना है कि जब मन मुश्किल में हो तब अजनबी लोग, अनजान शहर बड़े मददगार होते हैं. अजनबी लोग आपसे सवाल नहीं करते, आपको बात-बात पर जज नहीं करते. वो आपको आपके अतीत के मद्देनजर नहीं परखते, वो आपको आज के व्यवहार व काम जानिब देखते हैं. इस शहर ने, यहाँ के लोगों की अजनबियत ने मरहम का काम किया.

पलटकर देखती हूँ, तो सारे ज़ख्म, सारी पीड़ाएं, सारी मुश्किलें मानो दोनों हाथों से आशीर्वाद दे रहे हों. मेरा सर झुक जाता है उनके आगे. उनके प्रति आभार से मन द्रवित हो जाता है कि क्या होती मैं अगर जीवन यूँ मुश्किल न होता. क्या होती मैं अगर जीवन में ठोकरें न मिली होतीं, धोखे न खाए होते. जब हम मरकर जीना सीखते हैं तब जीवन निखरता है, हम निखरते हैं. अब जब भी जीवन में कोई सुख का लम्हा आता है मैं उसका एक हिस्सा उन दुखों, उन चोटों को अर्पित करती हूँ जिन्होंने मुझे गढ़ा, जिन्होंने मजबूत बनाया.

यूँ देखा जाय तो ऐसा भी कुछ बुरा नहीं हुआ था मेरे साथ. जब अपने आसपास के लोगों को देखती हूँ तो सोचती हूँ इन सबके मुकाबले तो कितना कम सहा मैंने. ये सब लोग खासकर स्त्रियाँ कितना ज्यादा सहती हैं और उसे नॉर्मल होना ही मानती हैं. यह हमारी गढ़न की बाबत है. क्या पढ़े-लिखे लोग, क्या अनपढ़. क्या अमीर, क्या गरीब. यह सच में गढ़न का मामला ही है कि हमें सदियों से सहना सिखाया गया. वो हमारी आदत में है.

कितनी ही स्त्रियों को जानती हूँ जो गले तक दुःख, पीड़ा, अपमान से भरी हैं लेकिन एसर्ट करने की, उससे निकलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहीं. हिम्मत न जुटा पाने की बात मानती भी नहीं कि उस हिम्मत न जुटा पाने को तमाम तर्कों में छुपा देती हैं. कभी बच्चों की परवरिश तो कभी कुछ और.

मैंने हमेशा चाहा कि रिश्ते साफ़ होने चाहिए. जैसे ही उनमें सलवटें पड़ने लगती हैं, वो सड़ने लगते हैं वो नुकसान पहुँचाने लगते हैं. ऐसे रिश्ते सबसे ज्यादा नुकसान बच्चों को पहुंचाते हैं. जिन बच्चों की खातिर हम रिश्तों को सहेजते हैं वो ही बच्चे उन रिश्तों से चोटिल हो रहे होते हैं.

उलझनों से हाथ छुड़ाना आसान नहीं होता. इसमें एक ईगो भी होता है कि अरे मेरे साथ ऐसा कैसे हो सकता है. मैं सब संभाल लूंगी. फिर हम और ताकत झोंक देते हैं सब सुलझाने में गुनगुनाते हुए ‘सुलझा लेंगे उलझे रिश्तों का मांझा...’. इस सुलझा लेने की, सब ठीक कर लेने की जिद का हासिल होता है और चोट, और घाव. क्यों यह सब ठीक कर लेने की जिद महिलाओं में ही ज्यादा होती है?

एक रोज इस ‘ठीक’ शब्द से इत्मिनान से लम्बी बात की. और समझ यह आया कि ‘ठीक’ की गढ़न को हम वैसा ही देखते हैं जैसे समाज हमें दिखाता है. यानी ऐसा करो यह ठीक है, ऐसे जियो यह ठीक है. अगर ऐसा नहीं हुआ तो वह गलत है. यह भी होता है कई बार कि ‘मेरे मन का ठीक’ यह है लेकिन इसे कोई और लाकर मेरी हथेली पर रख दे. गलत है यह. अपना ठीक खुद ही ढूंढना होता है. उसके लिए खुद ही चलना पड़ता है. रेडीमेड वाला ठीक भरम होता है ठीक का. मुझे लगा मैं जिस ‘ठीक’ के पीछे भाग रही हूँ असल में वो ठीक है ही नहीं. और यह बात समझने में एक उम्र खर्च हो गयी.

जब अपने मन का ‘ठीक’ तलाशने की सोची तो ढेर सारी चुनौतियों ने घेर लिया. लेकिन मेरे हाथ में मेरी नन्ही बिटिया की उंगली थी. उससे ताकत मिलती थी. बस उसी नन्ही सी उंगली को थामकर निकल पड़ी अपने हिस्से की जमीं, अपने हिस्से का आसमां तलाशने. यह आसान नहीं था, मुश्किल था. बहुत मुश्किल था लेकिन जरूरी था. और आज कह सकती हूँ कि बहुत अच्छा भी था.

अपने इस सफर की बाबत लिखते हुए मैं सोच रही हूँ उन सारी स्त्रियों के बारे में जिनका हक़ है एक बेहतर ज़िन्दगी जीने का लेकिन जो बरसों से सिर्फ रिश्तों के भीतर घुट रही हैं. हिम्मत नहीं कर पा रहीं. हर रोज जिस रिश्ते की चुभन आपको बेध रही है, उसके बारे में बात करने की, उसे सम्भालने की कोशिश करने की भी कोई तो सीमा होती होगी. हम भारतीय स्त्रियों की वह सीमा बहुत मजबूत है.

ज्यादातर स्त्रियाँ कविताओं में, कहानियों में, भाषणों में, किटी पार्टी में तो मजबूत दिखती हैं लेकिन असल जीवन में हार मान जाती हैं. जो जैसा है उसे वैसे निभाते जाने की सदियों पुरानी कंडीशनिंग और कम्फर्ट के चलते उन्हें सहते जाना आसान च्वायस लगती है शायद.

यह बात कहकर नहीं कही जा सकती कि जीने के लिए एफर्ट करना पड़ता है, जोखिम लेने पड़ते हैं. लेने चाहिए. वरना सांस लेने और जीने के फर्क को समझे बगैर न जाने कितने लोग जी ही रहे हैं. इन दस बरसों में जीवन ने मुझे बहुत सिखाया. रुलाया या हंसाया लेकिन कभी बिसराया नहीं. हाथ थामे रहा. तब भी जब मैंने जीवन का हाथ छोड़ दिया. तब भी यह साथ ही रहा. आज जीवन मेरे बगल में बैठा मुस्कुरा रहा है. मेरे कप की चाय से चाय पी रहा है. मैं उसे कहती हूँ, ‘ज्यादा इतराओ नहीं, मैंने भी तुम्हें दिल से सहेजा है.’ उसकी मुस्कुराहट बड़ी हो गयी है.

सांस सबके हिस्से आती है, जीवन सबके हिस्से नहीं आता. हालाँकि होता वो आसपास ही है. इन दस बरसों में मारीना का साथ रहा, रिल्के का साथ रहा. मौसम का साथ रहा. इन सारे साथ को महसूस कर सकूं इसके लिए मेरी माँ और मेरी बेटी का साथ रहा. मारीना कहती है, ‘जीवन जैसा है मुझे पसंद नहीं’ मैं उसके इस कहन का तात्पर्य कुछ ऐसे समझ पाती हूँ कि जीवन जैसा है उसे वैसे जीते जाने की बजाय उसे वैसा बनाओ जैसा उसे होना चाहिए, जैसा उसे तुम जीना चाहते हो. इसमें एफर्ट लगता है. कम्फर्ट टूटता है. हम टूटने से डरते हैं. मैं भी डरती रही. शायद अब भी डरती हूँ. लेकिन अब मैंने कुदरत पर भरोसा करना सीख लिया है. जब हम अपनी ज़िन्दगी के फैसले नहीं ले पाते तब कुदरत हमारी मदद करती है, बस उस मदद को देखना, समझना और अपनाना सीखना होता है.

मैं कोई बहुत मजबूत स्त्री नहीं थी. मुझे भी इसी समाज ने गढ़ा है. मुझे भी अच्छी लड़की बनकर जीना अच्छा लगता था. मैंने भी अच्छी बेटी, अच्छी बहू, अच्छी बीवी, अच्छी बहन, अच्छी भाभी बनने के लिए वो सब जतन किये जो फिल्मों में, धारावाहिकों में या आस-पड़ोस में देखे सुने थे. मैंने भी करवाचौथ के निर्जला व्रत किये, समर्पण के सुख का पाठ पढ़ते हुए जीने की कोशिश की. लेकिन कुदरत ने मेरे लिए कुछ और ही सोच रखा था शायद और तब मेरे ठहरे हुए जीवन में तूफ़ान आया. वो तूफ़ान जरूरी था. मध्यवर्गीय जड़ता भरे जीवन से निकलना मेरी जरूरत थी और मुझे इस बारे में पता भी नहीं था. वही सबको सुखी रखने में सुख ढूंढते हुए बूढ़ी हो जाने की मेरी पूरी तैयारी थी. तब कुदरत ने कहा, ‘उठो प्रतिभा’. मैंने मन ही मन सोचा. सब ठीक तो है. लेकिन यह जो सब ठीक है का भ्रम है न यही तोड़ना होता है. और उम्र भर इसे ही बचाए रखने के हम लाख जतन करते रहते हैं. कितनी ही बातों को अनदेखा करते हैं, कितने ही जख्मों से दोस्ती कर लेते हैं. मैंने भी कर ही ली थी शायद.

लेकिन जीवन को यह मंजूर नहीं था. वही जीवन जो इस वक़्त लैपटॉप में झाँक रहा है और कह रहा है मेरे बारे में और लिखो न. दुष्ट जीवन. प्यारा जीवन. तो जीवन को यह मंजूर नहीं था और वो मेरे जीवन में अविश्वास का, धोखे, अपमान का बवंडर लेकर चला आया. छोटे-छोटे दुखों के संग, गाहे-बगाहे होते रहने वाले छोटे-छोटे अपमानों के संग जीना सीखने में हम स्त्रियाँ माहिर होती हैं. हमें जगाने के लिए बड़े बवंडर जरूरी होते हैं. तो बस उस बवंडर के आगे मैंने घुटने टेकने से इनकार कर दिया और जीवन को चुन लिया. जीवन वो जिसमें अब और अपमान न हो, अविश्वास न हो. जीवन वो जो मेरा हो, जिसमें मैं हूँ. पहली बार निपट अकेले अपने लिए कोई फैसला लिया. और आज पलट कर देखती हूँ तो गर्व होता है अपने फैसले पर. अपनी यात्रा पर.

इन दस बरसों में मैंने सीखा कि हमें दुःख की आवाज़ सुननी नहीं आती. दुःख जो बेआवाज़ टूटता है. हमारे बेहद करीब मुस्कुराहट का लिबास पहने कोई उदास धुन गल रही होती है हम उसे पहचान नहीं पाते. हमें एक समाज के तौर पर यह सीखने की जरूरत है. मैंने जाना कि हम प्रवचन देने वाले लोग हैं. हर कोई प्रवचन की टोकरी उठाये आपके पास चला आएगा और आपको ज्यादा उदास करके चला जाएगा. कभी-कभी प्रवचनजीवियों ने उदासी को अपमानित भी किया है. एक दुःख का दूसरे दुःख से कम्पैरिजन करके हम क्या समझाना चाहते हैं पता नहीं. मैंने जीकर जाना है कि उदास व्यक्ति से कुछ भी कहने से बचना चाहिए लेकिन उसे सुनना जरूर चाहिए.

मुझे सुना अजनबी लोगों ने, रास्तों ने, मेरी डायरी ने. जिन्हें बिना जज किये, बिना ज्ञान दिए कोई सुनने वाला नहीं होता उनका जीवन सच में और ज्यादा मुश्किल होता होगा.

इन दस बरसों में मैंने समझा कि स्त्रियों को खूब एकल यात्राएँ करनी चाहिए. यूँ सबको ही करनी चाहिए लेकिन स्त्रियों को विशेषकर. क्योंकि स्त्रियों के पास ससुराल, मायके, शादी ब्याह या फिर फैमली ट्रिप के अलावा कोई अवसर नहीं होता यात्रा का. इस वजह से उन्हें जब अवसर मिलता भी है तो वो यात्रा की चुनौतियों को स्वीकार नहीं कर पातीं. मैंने जीकर जाना है कि जीने के लिए मरना भी जरूरी होता है. पानी का स्वाद प्यासे को ही पता होता है. धूप में भटकने के बाद ही छाया की तासीर समझ आती है. घुटने फोड़ने के बाद ही ठीक से चलने का शऊर आता है. और इसका कोई नियम नहीं कि कब, किसे, किस फैसले की ओर बढ़ना चाहिए. या रिश्तों से अलग होना ही जीवन है. रिश्तों में रहते हुए या रिश्तों के बिना आत्मसम्मान से समझौता तो नहीं किया जाना चाहिए.

यह तो नहीं जानती कि अब भी मैं कितनी मजबूत हो सकी हूँ लेकिन इतना जरूर जानती हूँ कि मेरी बेटी को मुझ पर, मेरे फैसलों पर गर्व है. मुझे सुकून है इस बात का कि मैंने कभी भी जीवन के किसी भी मोड़ पर दोहरा जीवन नहीं जिया. न लिखने में न जीने में. इसकी चुनौतियाँ कम नहीं थीं, कम नहीं हैं लेकिन उन चुनौतियों के बरक्स जो जरा सा सुख है न, सुकून है वो गाढ़ी कमाई है.

जीवन फिर सामने खड़ा है ढेर सारी नयी चुनौतियां, नई ठोकरों को लिए. मैं जानती हूँ वो मुझे अभी और मांजना चाहता है. मैं तैयार हूँ...

(वर्तमान साहित्य के अप्रैल 2022 के अंक में प्रकाशित आत्मकथ्य)


Friday, May 6, 2022

अभिसारिका

पेंटिंग- सुकांत दत्त साभार गूगल  

वह न रातरानी की गमक थी
न मोगरे की लहक
उसकी गुलमोहर सी आतिशी रंगत में 
आ मिली थी अमलतास की खिलखिलाहट 
धरती पर बजती रहती थी 
हरदम उसकी मुस्कुराहटों की पाज़ेब 

बारिश की धानी ओढ़नी 
लहरा रही थी इस छोर से उस छोर
उसके होंठों पर 
रखे थे हिमालय ने बर्फ के टुकड़े 
सूरज की पहली किरन ने 
सजाई थी उसकी मांग 

बेवजह मुस्कुराना 
मुस्कुराते ही जाना 
उसकी झोली में आ गिरा था 
ठीक उस वक़्त जब 
वो अपने जूड़े में लगाने के लिए 
बीन रही थी उदास फूल 

यह विरहणी के 
अभिसारिका बनने की रात थी 
नहीं वो तुम्हारे प्रेम में हरगिज़ नहीं 
तुमने तो गलती से 
उसके भीतर के इतर की शीशी को 
खोल भर दिया
यह प्रेम का इतर उसका अपना है  
लेकिन तुम अब उसकी खुशबू में  
महकते रहोगे उम्र भर 

अभिसारिका और विरहणी 
दोनों प्रेम की एक ही नदी का नाम हैं 
जो अपने समन्दर की तलाश में सदियों से 
बहे जा रही है...  

Wednesday, May 4, 2022

दुनिया को तुम्हारी आँखों की तरह होना चाहिए...



लाड़ो मेरी,
अब जबकि तुम बसंत के 18 रंग देख चुकी हो, तितलियों से तुम्हारी दोस्ती एकदम पक्की हो चुकी है, आसमान भर साहस तुम्हारी आँखों में रहने लगा है तो तुम्हें देखना एक अलग ही सुख से भरता है. तुम्हारी आँखों को देखती हूँ तो लगता है दुनिया को तुम्हारी आँखों की तरह खूबसूरत होना चाहिए. उम्मीदों और सपनों से भरी आँखे.

तुम्हें याद है तुम्हारे कुछ सवालों पर मैं तुमसे कहती थी समय आने पर इन पर बात करेंगे तो शायद अब वो समय आ गया है. और अब जबकि वो समय आ गया है मैं जानती हूँ तुम्हारे वो सवाल अब रहे ही नहीं हैं. सवालों के साथ ऐसा ही होता है. मैंने तो यही समझा है कि सवालों के जवाब तलाशने की हड़बड़ी नहीं करनी चाहिए बल्कि तसल्ली से उन सवालों के साथ रहना चाहिए. नए सवालों को उगने देना चाहिए. कई बार जिस सवाल का जवाब हम तलाश रहे होते हैं असल में वह सवाल होता ही नहीं है. सवाल तो कोई और होता है. और हम निरर्थक सी किसी खोज में जुटे होते हैं. सवालों की बाबत यह बात वाकई कमाल की है कि जीवन में सवालों के होने में हमारा होना बचा रहता है. कई बार साथ रहते-रहते सवालों के भीतर ही जवाब उगने लगते हैं.

लाड़ो मेरी, संभावना एक खूबसूरत शब्द है जो साहस से सजता है. इसके बाद कुछ भी मुश्किल नहीं रह जाता. मुझे ख़ुशी है कि तुम यह जान चुकी हो. हम दोनों ने मिलकर जो उम्मीदों के नन्हे-नन्हे बीज बोये थे वो अब तुम्हारी आँखों में उगने लगे हैं. तुम्हारी सपनों से भरी आँखों से दुनिया बेहद खूबसूरत दिखने लगी है. मैं जानती हूँ जिस तरह तुमने मुझे ढेर सारी नयी बातें सिखायीं, नया नज़रिया दिया दुनिया को देखने का उसका पूरी दुनिया को इंतज़ार है.

अब जबकि तुम पहली बार मुझसे दूर जा रही हो तो कितना कुछ ‘पहली बार’ होना तुम्हारे करीब आ गया है. तुम महसूस करोगी कि आसमान पहली बार हथेलियों में रखा हुआ है. तुम जानोगी सख्त धूप में खिलखिलाते गुलमोहर की हंसी का राज. पहली बार यूँ होगा कि ठोकर लगेगी तो खुद ही उठोगी और सीखोगी कि आने वाली ठोकरों से कैसे बचा जाता है. पहली बार होगा कि कोई सफ़ेद बुलबुला तुम्हें घेरे रहेगा. ऐसा ही बहुत सारा पहली बार मेरी ज़िन्दगी में भी आया है. पहली बार तुम्हें खुद से दूर जाते देखना...पहली बार तुम्हारे लौटने का इंतज़ार, पहली बार तुम्हारी हथेलियों को, पलकों की चूमने की इच्छा होना और चूम न पाना.

तुम अपने ज़िन्दगी के सफर में चल सको मन मुताबिक, कुछ भी किसी को भी साबित करने के दबाव से दूर बिलकुल अपने मन के क़रीब. कि इस दुनिया को सबसे ज्यादा तुम्हारे खुश होने का इंतज़ार है.

तुम्हारी
मम्मा

Tuesday, May 3, 2022

प्रीतम का कुछ दोष नहीं है...



ये ईद की सुबह है. सुबह में मोहब्बत के रंग घुले हैं. अलसाई आँखों ने बड़े बेमन से नींद से दामन छुड़ाया है. सुबह की चाय में आज अलग ही बात है. एक शांति है. सुकून है. देर तक देखती हूँ फलों से लदी डालियों को. कोई हलचल नहीं वहां. सामने सूरजमुखी के बागीचे में भंवरों की टोली डोल रही है. रात भर खिलखिलाती जूही भंवरों की मटरगश्ती देख मुस्कुरा रही है.

मैं अपनी हथेलियों को देखती हूँ. खाली हथेलियाँ. जीवन की नदी में एक-एक कर सब लकीरें गुमा आयीं हथेलियाँ. बिना लकीरों वाली हथेलियाँ खूबसूरत लग रही हैं. ये खाली हथेलियाँ अब नयी लकीरों की मुंतज़िर नहीं. ये लम्हों पर ऐतबार करना नहीं चाहतीं बस उन्हें दूर से देखना चाहती हैं. लम्हों की आवक-जावक जारी है. कोई लम्हा टूटकर गिरता है एकदम करीब जैसे कई बरस गिरा था पलाश का फूल. सिहरन महसूस होती है. दूर से बैठकर लम्हों को आते-जाते देखना सुख है. उनसे मुत्तासिर न होना अभ्यास है. यह ज़िन्दगी के रियाज़ से आता है.

सोचती हूँ लम्हों के कंधों पर उम्मीदों का बोझ न डालना भी तो सुख है. यह बेज़ारी तो नहीं. तो क्या यह निर्विकार होना है. सुख में होना और उससे मुब्तिला न होना. यह आसान नहीं. ज़िन्दगी का रियाज़ आसान नहीं. लेकिन क्या ज़िन्दगी आसान है?

एक दोस्त ने सुबह-सुबह नुसरत साहब की आवाज़ भेजी है. मैं उसे कहती हूँ नुसरत साहब तो असाध्य रोग हैं...लग जाए तो छूटता नहीं. वो हंस देता है. उसे मेरी बातें जरा कम समझ में आती हैं. वैसे मुझे ही कौन से अपनी बातें समझ आती हैं. सच कहूँ तो इस समझने ने बड़ा नुकसान किया है. तो जरा नासमझ होकर देखते हैं ज़िन्दगी के खेल...नुसरत साहब कह रहे हैं प्रीतम का कुछ दोष नहीं है...

जीवन ही तो प्रीतम है...और वो तो है निर्दोष...

Friday, April 29, 2022

पत्र जो दिल को छूते हैं

प्रतिभा भारद्वाज-

आज से पहले पत्र साहित्य को एक विधा के रूप में ही पढ़ा और समझा था। परंतु पत्र पढ़ने का पहला अनुभव इतना सुखद होगा यह मैंने 'वह चिड़िया क्या गाती होगी’ पढ़कर महसूस किया और समझा कि पत्र को इस रूप में भी लिखा जा सकता है।सभी पत्र बड़ी आत्मीयता से लिखे गए हैं बिल्कुल साफ़ पानी की तरह जिसमें प्यार है, यादें ।हैं ,करुणा है, गुस्सा है। 

अगर पत्रों के समय पर ध्यान दें तो पत्र ऐसे समय के हैं जिस समय लोग सिर्फ़ अपने बारे में सोच रहे थे। उस समय के ये पत्र भावुक कर देते हैं। मन में बार-बार यही आता है कि इतनी गहराई से भी इस समय को किसी ने जिया होगा, सोचा होगा उन लोगों के बारे में जो सिर्फ़ खाने के लिए परेशान होंगे।

ये पत्र सोचने पर मजबूर करते हैं कि जिस दौर को हम भूल रहे हैं। 'जमा कर रही हूँ स्मृतियाँ' इस पत्र को मैंने कई  बार पढ़ा और उस समय को याद किया। 'वो जमा कर रहे हैं आटा,दाल, चावल,मैं जमा कर रही हूँ स्मृतियाँ'। इस पुस्तक का पहला पत्र जो आपके मन को छू जाता है और आगे पढ़ने की जिज्ञासा भी जगाता है 'मैंने मृत्यु को छुआ है’इस पत्र को पढ़ते समय मन में बहुत सारे सवाल रह जाते हैं कि ऐसे कितने लोग होते होंगे जो इस तरह अपने भावों को लिख पाते होंगे क्या किसी ना किसी रूप में हर इंसान इन समस्याओं से गुजरता होगा। पुस्तक के सभी पत्र को पढ़ते हुए महसूस होता है कि ये पत्र लिखे नहीं गए जिए गये हैं। अपने आस-पास की घटनाओं और अपने जीवन के अनुभवों को बड़े ही आत्मीयता से लिखे गये हैं जिस कारण इन पत्रों से बड़ा जुड़ाव महसूस होता है।

Wednesday, April 20, 2022

तुम तो प्यार हो...



समय का पंछी उदासी को कुतरने की कोशिश में लगा हुआ था. उदास आँखों में दुनिया जहाँ की नदियाँ लिए भटकती देह को बस एक हौसले ने थाम रखा था कि कोई है जो आयेगा, चुपचाप बैठेगा एकदम करीब. जिसके काँधे पर सर रख के बरस लेंगी कुछ बदलियाँ और साँसों को तनिक सुख मिलेगा. बस तिनका भर उम्मीद हो तो जीवन आसान होने लगता है. और फिर हुआ यूँ कि एक रोज शहर भोपाल चला आया शहर देहरादून से मिलने. भोपाल की झील का देहरादून की पहाड़ियों, नदियों और रास्तों से मुलाकात का मौसम आया. देहरादून यूँ ही बौराया हुआ था. आम और लीची के कच्चे फलों की खुशबू पूरी फिजां में इस कदर बिखरी हुई थी कि कोई कमजर्फ ही होगा जो इस खुशबू से बावरा न हो उठे. इस खुशबू में जब भोपाल के रास्तों की, झील की वहां के दोस्तों की खुशबू शामिल हुई तो देहरादून के मिजाज़ में जरा गुरूर की रंगत भी घुल गयी.

श्रुति कुशवाहा जिसका नाम है वो मेरे लिए भोपाल शहर है पूरा. मेरे लिए भोपाल का अर्थ श्रुति ही है. मैं यूँ भी शहरों को वहां रहने वाले लोगों के नाम से जानना पसंद करती हूँ. ये लड़की मोहब्बत में पगी हुई है. कबसे कहा था इसने कि जब आप बेटू को छोड़कर आएँगी न तब उदास होंगी लेकिन मैं होने नहीं दूँगी और मैं आ जाऊंगी.

और वो आ गयी है. पूरा शहर, घर का कोना-कोना उसकी ख़ुशबू में नहाया हुआ है. उसका होना भर उदासियों को दूर करने को काफी है. कहाँ कुछ कहना सुनना होता है, बस होने की तो जरूरत है. ऐसा सम लगा है इस मुलाकात में कि नेह से डबडब करती रहती हैं आखें. ज़िन्दगी क्या है सिवाय मोहब्बत के. दोस्त जब मोहब्बत की बारिशें लेकर आयें और आपको तर-ब-तर कर दें तो कहने सुनने को क्या रह जाता है.

मुझे लगता है कोई परेशान हो आसपास तो उसे कुछ कहना नहीं चाहिए, उसकी हथेलियों को थामकर घंटों बैठे रहना चाहिए. श्रुति यह जानती है. हम नदियों में पैर डाले नीले आसमान से झरती खुशबू में डूबे रहते हैं. मेरे काँधे पर उसका सर होता है और मेरी हथेलियों में उसकी हथेलियाँ. लगता है दुनिया सिमटकर इन हथेलियों में आ गयी है. शहर मुस्कुरा रहा है. मेरी आँखें नम हैं. देवयानी कहती है, 'तुम्हारा कुछ समझ नहीं आता, खुश होती हो तो भी रोती हो, दुखी होती हो तो भी.' ज्योति कहती है, 'तुम्हारा ऐसा होना ही नॉर्मल होना है.' संज्ञा कहती है, 'बेटू की चिंता छोड़ दो उसकी मासियाँ हैं यहाँ तुम बस खुद को संभालो.' विभावरी कहती है, 'आपको अब नए सिरे से ज़िन्दगी को जीना शुरू करना चाहिए.' सब दोस्त बस एक पुकार की दूरी पर हैं. सबने सब संभाल रखा है. मैं तो एकदम आज़ाद हूँ. डबडबाती आँखों में प्रेम ही प्रेम है. आसमान से जैसे कोई ख़्वाब बरस रहा है...

श्रुति तुम हो तो जीवन कितना सुंदर लगने लगा है यार.

Thursday, April 14, 2022

ये बूँदें कैसी हैं...

अपने होने की ख़ुशबू, अपने होने का एहसास तनिक और करीब सरक आया है. शब्दहीनता का जादू धीरे-धीरे खुल रहा है. यह जादू किसी तिलिस्म सा है, खींचता है अपनी ओर. जाने नहीं देता. एक डर बना रहता है कि एक रोज यह जादू टूट जायेगा. कोई शब्द आयेगा और इस नर्म जादू को तोड़ देगा. फिर क्या होगा? इन दिनों आवाज़ों से दूर रहना भला लगता है. लेकिन भीतर की आवाज़ों के साथ रहना बुरा नहीं लगता. सुन पा रही हूँ कि भीतर की आवाज़ें भी शोर नहीं हैं. संवाद नहीं हैं. कोई धुन है मध्धम सी जो थामे हुए है. 

पूरा शहर एक मादक खुशबू में डूबा हुआ है. रास्तों से गुजरते हुए जैसे कोई नशा उतरता जाता है भीतर. नए पत्तों की खुशबू, जंगल की खुशबू, फूलों की खुशबू और शायद इन्हीं में कहीं घुली है मेरे होने की खुशबू भी. मैंने अपने रास्तों को लम्बा कर लिया है और गति को धीमा. ख़ुशबू की संगत पर रास्ते लम्बे और लम्बे होते जाएँ तो इससे भला क्या होगा.  

सुख क्या है सिवाय इल्यूजन के. लेकिन इसमें आकर्षण बहुत है. हम जैसे ही सुख और दुःख से विरत करके खुद को एक ऐसी जगह रखते हैं जहाँ सूरज ढले तो अपनी पूरी धज से सूरज ही ढले, जहाँ झरनों की झर झर में झरे अपना मन भी कि कोई संवाद, कोई स्मृति इसमें शामिल न हो. हम इन दृश्यों को संवादों से, किसी के होने की ख्वाहिश से, खुद को उन दृश्यों में समाहित करने के लोभ से मैला कर देते हैं. लेकिन यह समझने में एक उम्र खर्च हो जाती है. 

सुख के छोटे-छोटे बुलबुले घेरे रहते हैं. मैं उन्हें देख मुस्कुराती हूँ. उनसे कहती हूँ, नहीं आऊंगी तूम्हारी तरफ कि तुम्हारा यह खेल अब समझ चुकी हूँ. मेरा ध्यान सूरज की तरफ है और कोई बुलबुला मेरे काँधे पर आकर बैठ जाता है. मैं उस पर ध्यान नहीं देना चाहती. जानती हूँ जैसे ही ध्यान दूँगी वो टूट जायेगा. मैं बेध्यानी में ही उसका ध्यान किये हूँ. खुद को भरमा रही हूँ. डूबते सूरज ने मेरी मुस्कुराहट को थाम लिया है. जाते-जाते वो मुझे बारिश थमा गया है...

खिड़की के बाहर तो सिर्फ बादल थे. मेरे चेहरे पर ये बूँदें कैसी हैं...

Tuesday, April 12, 2022

प्यार से भीगा मन, नयी आमद की ख़ुशबू


धूप अभी काम पर निकलने के लिए तैयार हो रही हो. उनींदी सड़कें फूलों की खुशबू ओढ़े हुए जाग और सोने के बीच आँखें मिचमिचा रही हैं. नन्हे बच्चों की अल्हड़ टोली सड़कों के आलस को तोड़ रही है. शरारती कबूतर एकांत को कुतरने की जुगत लगाते हुए लगातार गुटरगूं किये जा रहा है.

ज़िन्दगी ने नया लिबास पहना हुआ है. इतरा के सामने खड़ी मुस्कुरा रही है. ज़िन्दगी के ढब अक्सर समझ नहीं आते फिर भी अच्छी लगती है. अनचीन्हे लम्हों की तरफ दोस्ती के हाथ बढ़ाने का समय है. उत्सुकता और हैरानी की जुगलबंदी पर मन की संगत अभी बैठ नहीं रही. अभी सुर लगना बाकी है. ये नये सिरे से रियाज़ शुरू करने का समय है. मैं आने वाले समय की ओर निगाहें करती हूँ, बीते समय की पुकार को अनसुना करने की कोशिश करती हूँ. तभी शरारती कबूतर बीते समय की डाल से एक डंडी लेकर खिड़की पर आ बैठा है. वो घोसला बनाने की जुगत में है जिसे बीते वक्त के तिनकों से वो सजायेगा. मेरी आँखें बह निकली हैं. आने वाले लम्हों के मोह में हम कैसे बिसरा दें बीते हुए उन लम्हों को जिन्होंने अपनी आंच में पकाकर माटी को सोना किया है. अचानक बहती हुई आँखें ज़िन्दगी की तमाम मुश्किलों के आगे सज़दे में झुक जाती हैं...

तभी सर पर कोई हाथ महसूस होता है. सिसकियों को, हिचकियों को सहेजकर देखती हूँ कि कौन है...वो ख़्वाब है जो बरस रहा है...

ज़िन्दगी में जब जैसा जिया, जैसा महसूस किया उसे कहीं सहेज के धर आई थी. वो सब जिया हुआ मोती बन गया. अपनी कविताओं से, अपने लिखे से बहुत प्यार रहा हो ऐसा नहीं रहा कभी बस कि लिखने के सिवा कुछ आया नहीं सो लिखती रही. सच कहूँ कि न लिखती तो शायद मर जाती. तो जिन शब्दों ने जीवन बख्शा उन्हें यूँ समग्रता में देखना कैसा है अभी पता नहीं. महसूस करने की अलग यात्रा होती है. अभी तो बस शुक्रगुजारी है उन तमाम लम्हों की जिन्होंने ठोंका पीटा मुझे और चमकाया. शुक्रगुजारी है दोस्तों की जिन्होंने भरोसा हमेशा बनाये रखा. जिनके होते मैं बेफिक्र रही खुद से. जो मुझसे ज्यादा खुश होते हैं मेरे सुखों पर और मुझसे ज्यादा उदास मुश्किलों पर. जो हाथ पकड़कर निकाल लाते हैं वक्त की अंधी सुरंग से और हाथों में थमा देते हैं भरोसे का पीला फूल.

हाथ में लिए बैठी हूँ एक बरसता हुआ ख़्वाब जो अब सिर्फ मेरा नहीं है...

इस संग्रह का समर्पण लिखते हुए जितने चेहरे नज़रों से गुजरे उन सबके प्रति मन प्रेम से भरा हुआ है.

किताब के खूबसूरत प्रोडक्शन और सहज कम्युनिकेशन (एग्रीमेंट सहित तमाम बातों) के लिए रुद्रादित्य प्रकाशन का आभार.

Monday, April 4, 2022

सीखना है कितना कुछ

- प्रतिभा कटियार

हमें क्या अच्छा लगता है, क्या बुरा लगता है. किस बात पर हमें हंसी आती है किस बात पर गुस्सा आता है ये सब हमारे व्यक्तित्व को दर्शाने वाले पैरामीटर्स हैं. व्यक्ति अपने चेहरे, रंग, कद से नहीं बनता. न जाति, धर्म, लिंग से बनता है वह बनता है अपनी सोच से, अपने व्यवहार से. कोई नयी बात तो नहीं है यह लेकिन फिर भी इतनी दूरी सी क्यों लगती है इस बात से. बहुत सारी अच्छी बातें करने वाले भी जब किसी फूहड़ से चुटकुले पर हंस देते हैं तब असल में उनके बड़े से बौध्धिक व्यक्तित्व की कलई खुल जाती है.
एक समय था जब कॉमेडी शोज़ की शुरुआत हुई थी. टीवी पर ये शो काफी लोकप्रिय हुआ करते थे. हर घर में इनका बोलबाला था लेकिन मैंने ये कभी नहीं देखे. क्योंकि जब भी इन शोज़ के कुछ टुकड़े मेरी नज़र से गुजरे मुझे ये बहुत दिक्कत भरे लगे. फूहड़ और भद्दे. बॉडी शेमिंग से भरे, जेंडर बायस्ड से भरे चुटकुले कैसे हंसा सकते हैं हमें. लेकिन वह फूहड़ दौर फलते-फूलते यहाँ तक आ पंहुचा है कि वाट्स्प फ़ॉरवर्ड में ऐसे चुटकुले, वीडियो, मीम्स भरपूर जगह पाते हैं और लोग इनका जमकर लुत्फ़ लेते हैं. हाँ, सच में. स्त्री विरोधी चुटकुलों को स्त्रियाँ खूब फ़ॉरवर्ड करती हैं.
मैं समझना चाहती हूँ कि दिक्कत कहाँ है. हमारा सेन्स ऑफ ह्यूमर इतना क्रूर क्यों है. इतना फूहड़ क्यों है. ऐसा क्यों है कि स्टैंडअप कॉमेडी जैसी नयी खूब फल-फूल रही इंडस्ट्री जो एक जरूरी दखल भी देती है, राजनैतिक खलीफाओं से पंगा भी लेती है वो भी गालियों को सामान्य मानती है. गालियाँ वही सब की सब स्त्री विरोधी. इसके पीछे तर्क है कि यह तो नॉर्मल है. इस नॉर्मल को स्त्रियाँ भी अपनाने लगीं वो भी स्त्री विरोधी गालियों को ले आयीं व्यवहार में. क्या सच में ऐसा होना था? बात शुचितावादी अप्रोच की नहीं है बात उस हिंसा की है जो उन शब्दों में समाई है जिन्हें हम नॉर्मल तरह से एक्सेप्ट कर रहे हैं.
तो इस नॉर्मल की जड़ तक जाने की कोशिश करते हैं. जाने क्यों समाज की हर छोटी-बड़ी बुराई का हल शिक्षा के करीब नजर आता है. स्कूल के वो दिन याद करती हूँ जब हम खेलते-खेलते या चलते-चलते गिर जाते थे, हम चोट के दर्द से ज्यादा अपमान के दर्द से गुजरते थे. किसी को गिरते देखना हंसने को कैसे जन्म देता है और क्यों इसे कोई रोकता नहीं. कुर्सी खींचकर हटा देना और गिरा देना फिर हँसना. कैसे किसी का शरीर किसी की हंसी की वजह बनता है. मोटा, थुलथुल, गंजा, काला ये सब चुटकुलों का सामान कब और कैसे बना. कैसे बने चुटकुले पति पत्नी वाले जहाँ पति विक्टिम है और पत्नियाँ दुष्ट खलनायिकाएं या मूर्ख.
कपिल शर्मा शो के पास दर्शकों की बड़ी भीड़ है लेकिन वो कैसे हंसाता है, पुरुषों को स्त्री बनाकर उनकी बॉडी शेमिंग करके. सवाल यह नहीं कि वो क्या बेचकर पैसा कमा रहा है सवाल यह है कि हमें जिन बातों पर दुःख होना था, गुस्सा आना था उन पर हंसी क्योंकर आई.
जब ऐसे फूहड़ शो देखकर लोग हंस रहे होते थे तो मैं अचकचा कर उन हंसने वालों के चेहरे देखती थी, इन्हें हंसी क्यों आ रही है, गुस्सा क्यों नहीं आ रहा. फिर लगने लगा शायद मेरा सेन्स ऑफ ह्यूमर कमजोर है. मुझे किसी भी बात पर हंसी नहीं आती.
काफी पहले की बात है एक न्यूज़ चैनल के बड़े ही वरिष्ठ पत्रकार न्यूज़ प्रेजेंट करते हुए धीमे से तब मुस्कुरा दिए जब एक रैप वॉक में मॉल फंक्शनिंग हो गयी. कुछ सेकेण्ड की वो मुस्कुराहट ऐसी चुभी न कलेजे में कि आज तक उनकी तमाम अच्छी बातें, भाषणों से मुतास्सिर न हो सकी. नज़र में चढ़ने के लिए आपको बहुत मेहनत करनी होती है लेकिन नज़र से गिरने का बस एक लम्हा होता है.
हैरत है कि हम ऐसे समाज का हिस्सा हैं जहाँ हमें यह सब नहीं दिखता. महसूस नहीं होता. शिक्षा ने सिर्फ आपको ऑफिसर नहीं बनाना था, मोटा पैकेज, अच्छी सुविधाओं की राह नहीं खोलनी थी उसे बताना था कि किसी के गिरने पर हंसना गुनाह है, दौड़कर उसकी मदद करना जरूरत है. हालाँकि दौड़कर मदद करने को भी बाज़ार ने किस तरह मार्कशीट के नम्बरों में तब्दील किया कि मदद से मदद का भाव गुम हो गया, संवेदना क्षरित हो गयी और दौड़ना बचा रह गया. यह एक अलग ही विषय है जिस पर फिर कभी विस्तार से बात होगी. अभी तो सवाल यह है कि किसी के अपमान को हंसी का सामान बनाना तो क्रूरता है न? लेकिन इस खेल में हम सब शामिल हैं. बुरी तरह शामिल हैं.
पिछले दिनों पूरी दुनिया में जोर-शोर से महिला दिवस मनाया गया. हर साल मनाया जाता है. हर साल मेरे मन में यह ख्याल आता है कि काश हम स्त्री विरोधी चुटकुलों पर हंसना और स्त्रियों को निशाना बनाकर दी जाने वाली गालियों का उपयोग बंद कर पाते तो भी बहुत बड़ी राहत होती. लेकिन इस खेल में तो स्त्री पुरुष सब शामिल हैं. आधुनिक और बोल्ड होने के नाम पर स्त्रियाँ भी स्त्री विरोधी भाषा का उपयोग कर रही हैं. क्या हम सच में कुछ देख, समझ पाने की क्षमता विकसित नहीं कर पाए हैं?
फिर तो अभी बहुत लम्बा सफर बाकी है कि इंसानियत की बुनियादी तालीम अभी हमसे दूर है. यह जरूर लगता है कि अगर शिक्षक बिरादरी तनिक सचेत हो पाती इस ओर तो कुछ उम्मीद की जा सकती है. लेकिन हर उम्मीद का बोझ शिक्षकों पर डालना भी कहाँ का न्याय है आखिर वो भी तो इसी समाज का हिस्सा हैं. क्या सचमुच, इस तर्क के पीछे शिक्षक बिरादरी को छुप जाने की रियायत है या ठहरकर सोचने का वक़्त है कि कैसे इस तरह के व्यवहार की जड़ को ही हटाना होगा. हिंदी, अंग्रेजी, गणित, विज्ञान सीखते हुए कब और कैसे व्यवहार को नरम बनाये रखने वाली संवेदना कहीं छूट जाती है. इस तरह का व्यवहार शुरू स्कूल से नहीं होता. इसकी जड़ें, घरों में, परिवारों में, समाज में गहरे धंसी हैं लेकिन शायद स्कूलों में इस तरह के व्यवहार की निराई संभव है. इसके लिए सबसे पहले तो शिक्षक बिरादरी को अपने भीतर जमी खर-पतवार की निराई करनी ही होगी.
मेरी उम्मीद नयी पीढ़ी से सबसे ज्यादा है. बच्चे जब मिसोजिनी को समझ पाते हैं, जब वो टोकते हैं कि यह कोई चुटकुला नहीं है, यह क्रूरता है. कैसे किसी की सेक्सुअलिटी को रिस्पेक्ट देना है, कैसे और कब कोई जजमेंटल हो जाता है. कैसे शिक्षक के उदाहरण इन्सेंसटिव हैं, रेसिस्ट हैं तो लगता है हाँ, यही तो होना था. इसी की जरूरत है. इस पीढ़ी को यह जिम्मा लेना है और हमें भी समझना है कि वो क्या कह रहे हैं, क्यों कह रहे हैं. हमसे चूक कहाँ हो रही है.
समय है बहुत सारा अनलर्न करने का. अपने व्यवहार को उलट-पुलटकर देखने का. यक़ीन मानिए अगर यह प्रक्रिया शुरू हो गयी तो जिन बातों पर अभी हंसी आती है न उन पर रोना आने लगेगा और दुःख होगा कि कितना कम जानते थे हम अब तक.

https://jansandeshtimes.net/view/5542/lucknow-city/

Friday, April 1, 2022

उम्मीद हमेशा बची रहती है



लड़की ने मुठ्ठियों को जोर से भींच रखा था. इस कदर कि अपने ही नाखूनों की चुभन से हथेलियाँ छिलने लगी थीं, खून रिसने लगा था. उसे अपनी हथेलियों में रखी लकीरों से डर लगता था. कितनी ही नदियों में, समन्दरों में उसने चाहा कि इन लकीरों को बहा दे लेकिन वो न बहीं, वहीं रहीं. लड़की का सपनों से ऐतबार उठे जमाना हुआ. वो अब सपने नहीं देखती. बीते दिनों देखे गए सपनों की किरचें बीनने में एक उम्र गुजार चुकने के बाद भी उसकी पोरों के जख्म भरे नहीं हैं अब तक. रिसते रहते हैं.

फिर भी ज़िन्दगी से भरोसा उठा नहीं उसका, न मोहब्बत से, न ख़ुशी से. कि उसने दुनिया को मोहब्बत में डूबे देखने के सपने को और बड़ा कर लिया. पूरी क़ायनात में उसने गुंजा दी अपनी खुश होने की ख्वाहिश कि उसके हिस्से के सुख सबके हों, उसके हिस्से की ख़ुशी सबको मिले.

जब भी कोई प्यार में डूबा जोड़ा देखती लड़की की आँखें सुख से बह निकलतीं. बच्चों के सर पर हाथ फिराते हुए उसे मिलता सुकून. अजनबी चेहरों को मुस्कुराहटों में मुब्तिला देख उसकी सांसें खिल उठतीं. व्यक्ति से समष्टि तक का सफर ऐसे ही शुरू होता हो शायद कि लड़की ने अपने तमाम सपनो को पूरी दुनिया के लिए आज़ाद कर दिया था.

हर बरस की तरह इस बरस भी पूरा शहर मंजरियों की मादक खुशबू में डूबा हुआ था. हर बरस की तरह इस बरस भी बच्चे अपने बस्तों में कॉमिक्स छुपा के स्कूल जा रहे थे और नई किताबों और नई ड्रेस का उत्सव मना रहे थे. हर बरस की तरह इस बरस भी मेहँदी हसन साहब फरहत शहज़ाद के लिखे को आवाज़ दे रहे थे कि कोंपले फिर फूट आयीं...नयी कोंपलों का मौसम खिलखिला रहा था.

लेकिन वो ज़िन्दगी ही क्या जो एक सम पर चले. बरसों पहले मुरझा चुकी सपनों की शाख हरियाने लगी. नयकीनी गज़ब की शै है. अपने तमाम डर हम इस नायकीनी के हवाले करके खुद को बचा लेना चाहते हैं. लेकिन सपनों की शाख पर अंखुआता वो नन्हा सा हरा जैसे मुस्कुरा कर कह रहा हो, उम्मीद हमेशा बची रहती है.

हाँ, उम्मीद हमेशा बची रहती है. फूटती कोंपलों के मौसम के आगे दुनिया के तमाम दुःख, तमाम नाउम्मीदी सजदे में है.

कोई ख़्वाब है जो बरस रहा है...

Wednesday, March 30, 2022

थोड़ा और बेहतर मनुष्य होना सिखाती है कथा नीलगढ़





- प्रतिभा कटियार

यह कथा नीलगढ़ है. इस कथा में मासूम पगडंडियां हैं, कुछ अनचीन्हे रास्ते हैं, अभाव में भी खुश रहने का योग सीख रहे लोग हैं, ढेर सारा प्रेम है और है एक-दूसरे पर भरोसा. महानगरीय जीवन जीते हुए, खबरें पलटते हुए, विचार विमर्श के मुद्दों संग अठखेलियाँ करते हुए जरा थमकर कथा नीलगढ़ सुनी जानी चाहिए. एक ही देश में जीते हुए इसी देश के किसी कोने के बारे में, वहां के लोगों के बारे में, उनके सुख-दुःख, संघर्षों के बारे में जानना किसी कथा सरीखा लग सकता है. यह विडम्बना नहीं तो और क्या है. देश की जीडीपी ग्रोथ से नीलगढ़ का कोई लेना-देना नहीं, विश्व के मानचित्र में कहाँ है भारत की विकास यात्रा का रथ इससे उसका कोई ताल्लुक नहीं उसे तो अपने दो वक्त के चूल्हा जलने की ही फ़िक्र है बस. रोजमर्रा के जीवन की ढेर सारी फिक्रों के बीच अजब सी बेफ़िक्री है नीलगढ़ में. यह बेफिक्री इस गाँव का मिजाज़ है जहाँ से आता है यह भोला सा मधुर वाक्य जो हाल-चाल पूछने पर लगभग सबके ही मुंह से बा तसल्ली निकलता है कि ‘सब मजेदारी है.’

यह कथा शुरू होती है फ्लैशबैक में जब ज़िन्दगी की बुनियादी चीज़ों के लिए संघर्षरत इस गाँव में दिल्ली से एक नवयुवक अनंत आता है. वो आता है अपने रिसर्च पेपर को लेकर किये जाने वाले शोध के सिलसिले में लेकिन इस गाँव में स्नेह का जो बिरवा मिला उस नवयुवक को संघर्षों की जो तपिश देखि उसने गांववालों के जीवन में कि वो वापस लौटकर जा न सका. यहाँ के लोगों का अभाव इस युवक को सालने लगा. उसे लगा उसका शोध तो पूरा हो जायेगा लेकिन इन गाँव के लोगों के जीवन में क्या बदलेगा भला. विचारों के झंझावत में उलझा यह युवा एक रोज अपने शोधपत्र के पन्नों को पुर्जा-पुर्जा कर हवा में बिखेर देता है. अपने चमचमाते भविष्य के सपने को किनारे करता है और नीलगढ़ के लोगों से दिल लगा बैठता है. उनके जीवन में कुछ सकारात्मक बदलाव कर सके ऐसी इच्छा के साथ गाँव में आकर बस जाता है. फिर क्या-क्या होता है, कैसे-कैसे होता है यही है समूची कथा.

इसे अगर किताब की तरह पढ़ेंगे तो सिर्फ खूबसूरत भाषा, शैली, व्यंजनात्मक लहजे में लिखे 33 अध्याय मिलेंगे जिन्हें पढ़ते हुए आपको निसंदेह बहुत अच्छा लगेगा. लेकिन अगर इसके पन्नों का हाथ थाम नीलगढ़ की यात्रा पर निकलेंगे तो नीलगढ़ की खुशबू मिलेगी, नदियाँ मिलेंगी, पोखर मिलेंगे. चिकना पत्थर मिलेगा, भूख मिलेगी, तीन दिन की भूख के बाद गुड़ की डली का स्वाद जबान पर महसूस होगा. त्यौहार मिलेंगे, शादी ब्याह मिलेंगे, गाँव की बिटिया की विदाई के वक़्त की रुलाई में फफक उठेंगे आप. इस किताब को पढ़ते हुए मिलेंगे ढेर सारे ऐसे वाकये जो अब तक के जाने समझे से कहीं आगे ले जाकर खड़ा कर देंगे.

हाँ, यह अचरज की ही तो बात है कि जब हर कोई सुंदर और सुरक्षित भविष्य के लिए जी तोड़ मेहनत कर रहा है कोई युवक नीलगढ़ से इश्क़ कर बैठता है. और जब इश्क़ किया तो फिर हद कैसी, भूख प्यास क्या, अपमान क्या और मान क्या. सिनेमा के दृश्यों की तरह खुलती है कथा नीलगढ़. इसकी गढ़न ऐसी है कि कभी चलते-चलते दुःख गए पांवों को आराम मिलता है इस कथा की छाँव में बैठकर. कभी किस्सागोई का स्वाद मिलता है, कभी कविता की नरमाई. कभी-कभी एहसास होता है कि हम किसी उपन्यास को पढ़ रहे हैं और आगे क्या होगा का भाव किताब छोड़ने ही नहीं देता. अगर यह फिक्शन होता तो कमाल का फिक्शन होता लेकिन यह फिक्शन नहीं है. यह समूचा जिया गया जीवन है. इसमें पाँव की जो बिंवाइयां हैं, भूख है, तकलीफें हैं, अभाव हैं, अपमान हैं वो लेखक की कल्पना का संसार नहीं इस देश के एक कोने का सच है. लेखक खुद इस किताब में कही जा रही कथा का नायक है हालाँकि लेखक ने खुद को नहीं नीलगढ़ के लोगों को, वहां के जीवन को ही नायक बनाया है.

अगर कोई नीलगढ़ में जाकर बस गये और उस गाँव में बदलाव के लिए कार्य करने वाले युवा अनंत गंगोला से बात करके यह किताब लिखता तब इतनी सुगढ़, परिमार्जित और साहित्यिक दृष्टि से भी समृद्ध किताब की कल्पना करना आसान था लेकिन चूंकि यह किताब खुद अनंत गंगोला ने लिखी है इसलिए कई बार हैरत भी होती है कि एक व्यक्ति कितना समृद्ध हो सकता है जीवन जीने के सलीके को लेकर भी उस सलीके की बाबत बात करने की बाबत भी और उसे किताब के रूप में दर्ज करने को लेकर भी. यह किताब साहित्य की तमाम विधाओं को अपने भीतर समेटने को आतुर दिखती है. कविता, कहानी, उपन्यास, डायरी, संस्मरण, यात्रा वृत्त.

कथा नीलगढ़ पढ़ते हुए यह समझा जा सकता है कि शिक्षा में काम करते हुए क्या नहीं करना है और क्या करना है. बहुत जानना अच्छे शिक्षक की निशानी नहीं बल्कि बच्चों को समझना, उनके मन को, उनके परिवेश को समझना, उनके भीतर की सीखने की इच्छा को सहेजना पहली जरूरत है. बच्चों को एक पूरा नागरिक मानना, उनकी इच्छा को उनकी सहमति असहमति को निर्णयों में शामिल करना और उन्हें सम्मान देना कितना जरूरी है यह बात शिक्षा के बड़े परिदृश्य से गायब ही दिखती है. बच्चों की गलतियों को किस तरह देखना है, उन्हें गलती करने के अवसर देना कितना जरूरी है और उन गलतियों से सीखना है हम बड़ों को, गलतियों के कारणों को जानकर उन कारणों पर काम करना है हम बड़ों को यह सिखाती है कथा नीलगढ़. असल में यह किताब एक बेहतर मनुष्य होना सिखाती है, बताती है कि अगर ठान ही लें हम कुछ करना तो राहें खुलती जाती हैं. एकला चलो रे...से शुरु हुए अनंत गंगोला के सफर में धीरे-धीरे तमाम लोग जुड़ते गए और यह एक कारवां बनता गया.

यह अचरज सहेज लिए जाना वाला है कि जिस गाँव के लोगों ने स्कूल का नाम भी नहीं सुना, जिन्हें खाने, पहनने की चुनौतियों से ही फुर्सत न थी उनसे जब पूछा गया कि इस गाँव में क्या बदलाव चाहते हैं तो वो कहते हैं, ‘स्कूल’. बतौर शिक्षक हर किसी को अपनी जिम्मेदारी की सघनता से जोड़ता है नीलगढ़वासियों का यह कहना. शिक्षा की जरूरत को समझने लगा है समाज का आखिरी व्यक्ति. अब जिम्मेदारी है शिक्षक की उस जरूरत को अपने होने से सहेज ले. शिक्षा की ओर कदम बढ़ा रहे पहली पीढ़ी के बच्चों का हाथ थाम सम्मान के साथ उन्हें मुख्यधारा में लायें. अगर संसाधनों से रहित एक गाँव में एक युवक उस गाँव के बच्चों को शिक्षित करने के लिए खुद के जीवन को झोंक सकता है बिना किसी वेतन के, बिना किसी सुविधा के तो जो पेशेवर शिक्षक हैं वो क्या नहीं कर सकते.

शिक्षक होना सिर्फ बच्चों को पढ़ाना नहीं होता, उनके अभिभावकों से जुड़ना, उनके दुःख-सुख में शामिल होना उनके जीवन की छोटी-छोटी लड़ाइयों में उनका साथ देना होता है. कोई कह सकता है कि किताब के लेखक अनंत गंगोला ने एक सनक की तरह नीलगढ़ में रहना चुना और वहां काम करना शुरू किया यह सबके लिए संभव नहीं. लेकिन अगर हम इस समाज में सचमुच कुछ सकारात्मक बदलाव चाहते हैं, देश समाज में जो हो रहा है उस पर चाय पीते हुए चर्चा करने से आगे बढ़कर कुछ करना चाहते हैं तो हम पायेंगे कि हमारे आसपास तमाम नीलगढ़ हैं. हम सबको अपने भीतर के उस अनंत को तलाशना है जो जीवन पर, प्रेम पर मनुष्यता पर भरोसा करता है और उसी भरोसे की उंगली थाम बदलाव के सफर पर चल पड़ता है.

इस किताब को पढ़ते हुए हमें अपने भीतर की उस यात्रा पर निकलने का अवसर मिलता है जीवन की आपाधापियों में जहाँ जाना हमसे छूट गया था. कथा नीलगढ पढ़ते हुए कई बार रोयें खड़े होते हैं, कई बार मन गुस्से से भर उठता है और कई बार बुक्का मारकर रोने का दिल करता है.

एक और बात इस किताब को ख़ास बनाती है वो है इसका प्रोडक्शन. एकलव्य प्रकाशन से प्रकाशित हुई इस किताब की बुनावट, बनावट बहुत ही कलात्मक है, बहुत सुंदर है.

किताब- सब मजेदारी है! कथा नीलगढ़
लेखक- अनंत गंगोला
प्रकाशक- एकलव्य प्रकाशनमूल्य- 175 रुपये

Sunday, March 27, 2022

टर्निंग प्वाइंट




जब आँखें नींद से बोझिल होने लगती हैं ठीक उसी वक़्त नींद न जाने कहाँ चली जाती है. फिर उन सपनों को टटोलते हूँ जिन्हें असल में नींद में आना था. उन सपनों में एक सपना ऐसा भी है जिससे बचना चाहती हूँ. लेकिन जिससे बचना चाहते हैं हम वो सबसे ज्यादा सामने आ खड़ा होता है. उस अनचाहे सपने से मुंह चुराने की कोशिश में रात बीतती है और सुबह होते ही कोयल जान खाने लगती है.
 
बालकनी की खिड़की खोलते ही मंजरियों की ख़ुशबू घेर लेती है. पूरा शहर इस ख़ुशबू में डूबा है इन दिनों. इस ख़ुशबू में एक दीवानगी है, उम्मीद है. कुछ रोज में ये शाखें जो मंजरियों से लदी पड़ी हैं फलों के बोझ से झुकने लगेंगी. फिर शहर फलों की ख़ुशबू में डूब जाएगा.

इन सबके बीच मैं नींद तलाशते हुए कोयल से झगड़ा करुँगी.

उसे अपनी कशमकश की बाबत कुछ नहीं बताउंगी. किसी को नहीं बताउंगी कि मुझे किसी से कोई भाषण नहीं सुनना. हाँ, जानती हूँ कि जिदंगी एक ब्लाइंड टर्न पर है, उस पार न जाने क्या होगा की धुकधुकी, उदासी, उम्मीद सब मिलजुल कर मन का ऐसा कॉकटेल बना रहे हैं कि क्या कहूँ. सोचती हूँ, कहीं छुप जाऊं, दूर से देखूं खुद को. इस मोड़ के पार होने तक आँखें बंद किये रहूँ लेकिन आँखें बंद करने का ऑप्शन नहीं है. खुली आँखों से यह मोड़ पार करना है...उस पार क्या पता मीठी नींद हो, थोड़ी कम बेचैनी हो और हो कुछ ऐसा जिसे देख दिल कहे, अरे, यही...बस इसी की तो तलाश थी...

रात गुज़ारिश के 'ये तेरा ज़िक्र है या इत्र है' के साए में बीती और सुबह 'सौ ग्राम ज़िन्दगी' गुनगुना रही है.
मैं उम्मीद के काँधे पर सर टिकाये हूँ और कोयल कमबख्त जली जा रही है, कूके जा रही है...

https://www.youtube.com/watch?v=saH2Shlup1Q

Saturday, March 19, 2022

बेआवाज टूटता है कोई दुःख


यूँ ख़ुशी के साथ हल्की उदासी की रेख हमेशा ही चलती है. इन दिनों यह बढ़ गया है. एक युवा अचानक उठकर चल दिया अनंत की यात्रा पर. क्या दुनिया का कोई शब्द, कोई बात उसे जरा भी कम कर पाने में सक्षम है. दुनिया की तमाम इबारतें, तमाम शब्दकोष रुआंसे हैं, मौन हैं, उस दुःख के आगे सजदे में हैं. कोई लौटा नहीं सकता उसे जो अब स्मृति के देश का वासी हो गया है. कितने लम्हे जीने थे अभी साथ में, कितने सपने साथ देखने थे, कितना कुछ था जो छूट गया. जैसे बजते हुए एक मीठा राग अचानक साज बिखर गया, टूट गया. वह राग टूटा ही रहेगा अब.

कितना कुछ होना था इस जीवन में
जो हुआ ही नहीं
कितना कुछ था जो अधूरा छूट गया
कितनी शिकायतें
जिनकी कभी सुनवाई न हुई
कितने रास्ते पथिकों के इंतजार में रहे
कितने सुख रखे-रखे ऊंघते रहे
और एक दिन उनके गालों पर
झुर्रियां उग आयीं
कितनी चुप्पियाँ शब्दों के ढेर के नीचे
बेआवाज कराहती रहीं

कितना कुछ होना था इस जीवन में
जो हुआ ही नहीं
कि ढेर सपने होने थे सबकी आँखों में
प्रेम के, मनुहार के, मेलजोल के
और उनमें झोंक दी गयी हिंसा, घृणा, लिप्सा
कितने कदम चलना था साथ एक लय में
और बिना किसी लय के भागते ही रहे कदम
किसी के दुःख में बैठना था
उसके काँधे से सटकर चुपचाप
और हम तलाशते रहे शब्द
हम एक जरा सी दूरी तय न कर सके
जबकि कोई लांघकर चला गया
समूचा जीवन, समूचा मोह

होना तो यह था कि
उदास हथेलियों को लेकर अपने हाथ में
कोई कहता कि मैं हूँ न...
और सचमुच जीवन में
खिल उठता बसंत इन्हीं तीन शब्दों से
लेकिन तमाम उम्र उम्मीद के
टूटने की आवाजें बटोरने में गुजर गयी
कितना कुछ होना था इस जीवन में
जो हुआ ही नहीं.

Wednesday, March 16, 2022

प्रेम के प्रेम में होना


इस तस्वीर को देखती हूँ तो भीतर कुछ भरावन सी महसूस होती है. सघन प्रेम का स्वाद है इस तस्वीर में. जैसे जिए जा रहे एक लम्हे में डूबे हुए दो लोगों की कोमल छवि को सहेज लिया हो किसी ने. इतने सुभीते से कि जिए जा रहे लम्हे को ख़बर भी न हो.

इस तस्वीर में तीन प्रिय लेखक हैं. एक हैं मेरे प्रिय लेखक मानव, दूसरे हैं मेरे प्रिय लेखक विनोद कुमार शुक्ल और तीसरे जो कि असल में पहले हैं मानव के प्रिय लेखक. पाठक इस तरह अपने लेखक के साथ खुद को जोड़ता चलता है जहाँ एक त्रयी बनती है, अपनेपन की एक धुन बनती है.

मानव को उनकी पहली पुस्तक के प्रकाशन के बहुत पहले से पढ़ रही हूँ. वो मुझे बहुत अपने से लगते हैं. उनके लिखे में एक ख़ास बात है वो यह कि ज़िन्दगी की तमाम उलझनों के बीच जब-जब पढ़ने-लिखने की खिड़की बंद हुई, कुछ भी लिखना पढ़ना स्थगित हुआ, सोचना समझना मुश्किल हुआ तब भी मानव को पढ़ने की राह खुली ही मिलती थी. उनकी ब्लॉग पोस्ट्स को कई-कई बार पढ़ा है. उनके नाटकों को पढ़ा है, नाटकों को देखा है, कविताओं से बातें की हैं. ऐसे ही शायद मानव ने विनोद कुमार शुक्ल को पढ़ा होगा. शायद नहीं यकीनन. इससे ज्यादा ही शायद.

आत्मीयता की ऐसी गढ़न, ऐसी खुशबू बेहद स्वाभाविक होती है. इसे चाहकर रचा नहीं जा सकता. जैसे किसी को चाहकर प्रेम नहीं किया जा सकता. वो तो बस हो जाता है. यह उसी हो गये प्रेम की तस्वीर है. इस तस्वीर में उस पाठक के सुख की बाबत लिखा नहीं जा सकता जो इन दोनों के प्रेम में हो.

ऐसा ही अनुभव मुझे मारीना और रिल्के की बाबत हुआ था. मेरी प्रिय लेखिका मारीना और मेरे प्रिय लेखक रिल्के. जब मुझे मारीना और रिल्के के पत्र पहली बार पढ़ने को मिले थे मैं ख़ुशी से झूम उठी थी. नाचती फिरती थी. जैसे कोई खजाना मिल गया हो. मुझे याद है मारीना किताब पर काम का सबसे पहला हिस्सा उन्हीं पत्रों से शुरू हुआ था. यह अजब सी ख़ुशी होती है. इस ख़ुशी में एक गढ़न होती है, एक खुशबू होती है, कोई संगीत होता है. इस ख़ुशबू में रच-बस जाने का मन करता है. इस संगीत में डूबे रहने का जी चाहता है.

विनोद जी के स्नेहिल एक्सप्रेशन और मानव का उनके लाड़ में लिपटा हुआ होना. विनोद जी से मिलने की मेरी इच्छा को कुछ ठौर मिलता है इस तस्वीर में. मैं इस तस्वीर के प्रेम में हूँ.

चाय की तलब ज़िन्दगी की तलब है

सुख की परत बहुत हल्की सी होती है. लेकिन बहुत आकर्षण होता है उसमें. हम खिंचे चले जाते हैं उसकी ओर. उसके भीतर गाढ़ा दुःख जमा होता है. वो दुःख हमारे साथ हो लेता है. हम उसके साथ हो लेते हैं. शुरू-शुरू में उस दुःख में भी सुख की ख़ुशबू मौजूद मिलती है. धीरे-धीरे वो ख़ुशबू विलीन होती जाती है. दुःख की अपनी ख़ुशबू उगने लगती है. हमें वो अच्छी लगने लगती है. हमें दुःख की आदत होने लगती है. तब भी जब हम उस दुःख से निकलना चाहते हैं अनजाने कहीं इच्छा रहती है कि वो दुःख हममें बचा रहे, चाहे थोड़ा सा ही. एक रोज एहसास होता है कि इस दुःख के बिना तो हमारा अस्तित्त्व ही नहीं रहा. इसके बिना हम रहेंगे कैसे, जियेंगे कैसे. फिर हम कंधे चौड़े करते हैं, खुद को दुःख से मुक्त करने के लिए तैयार करते हैं और एक रोज...

...एक रोज हम सच में दुःख से आज़ाद हो जाते हैं. अब न कोई इंतज़ार, न कोई पीड़ा न कोई मुक्ति की इच्छा. जीवन एकदम खाली हो जाता है. इतना खाली जिसकी न हमें आदत थी न अनुभव. खाली पड़े पेड़ों की शाखों की तरह इस उम्मीद में कि कोई कोंपल फूटेगी...

फिर हम उस दुःख की याद को याद करते हैं. वो याद नहीं आता, वो जा चुका है. 

जब जीवन से सुख और दुःख दोनों जा चुके हों तब जीवन कितना मुश्किल होता है यह जीकर ही जाना जा सकता है. अब स्मृतियों को खुरचने से भी दुःख वापस नहीं आता...खाली आँखों में न कोई सपना, न कोई आंसू.

देह जैसे साँसों का बोझ ढो रही हो. कि सांस है तो जीने की जिम्मेदारी है जिसे सलीके से जीना है. जीना क्यों है लेकिन...इसका जवाब मिलता है कि मरना भी क्यों है आखिर. इस सबके बीच जीवन दूर कहीं मुस्कुरा रहा होता है. हमें सुख और दुःख के खेल में उलझाकर वो रामनारायण की टपरी पर चाय सुड़क रहा है. 

कदम चाय की टपरी की ओर अनायास बढ़ने लगते हैं लेकिन रामनारायण की टपरी जिस क्षितिज पर है वहां पहुँचने की यात्रा अनवरत चलते जानी है...चाय की तलब असल में ज़िन्दगी की तलब है.  

Monday, March 7, 2022

सीख रही हूँ

कितनी खुशनुमा होती हैं वो सुबहें जब आँख खुले और इनबॉक्स पाठकों के प्यार से इतराता हुआ मिले. ढेर सारे ख़त, ढेर सारा प्यार. यही अमानत है.
 
अपनी ही राख से फिर-फिर उगना
उगाती रही जो फसलें जतन से
उन फसलों को काटना भी खुद
और मोल तोल कर दाम भी लेना
सीख रही हूँ
 
लज्जा, विनम्रता, सहनशीलता के जो गहने
लाद दिए थे न मुझ पर
उनके बोझ से मुक्ति पाकर
आज़ादी की सांसें लेना
अपने लिए खुद ही रास्ते चुनना
उन पर सरपट भागते फिरना
ठोकर खाना, उठना, फिर चलना
सीख रही हूँ

मिसेज फलां-फलां वाली पट्टी को
झाड़ पोंछकर
अपने नाम को सजाकर लिखना
बच्चों के दस्तावेजों में
एक तुम्हारे नाम की खातिर
तुम संग रहने, हर पल सहने
से बाहर आना सीख रही हूँ

तुम्हारी कहानियों, कविताओं,
उपन्यासों की नायिका बनकर
बहुत रह चुकी, ऊब चुकी
अब खुद की रचनाओं की
नायिका बनना
अपने लिखे पर अपने ही
हस्ताक्षर करना सीख रही हूँ

अपनी सुबहों, अपनी शामों को
अपने ही नाम करना
खुद संग जीना, खुद संग रहना
सूरज की किरनों को ओढ़ देर तक
समन्दर की लहरों को तकना सीख रही हूँ...

(आज के दैनिक जागरण में प्रकाशित)

Saturday, March 5, 2022

कहानी- सात बजकर दस मिनट



-ज्योति नंदा
घड़ी में सात बजकर दस मिनट हुए थे जब माँ अपने मायके जाने के लिए घर से निकली थी। जब सूचना मिली ‘नानाजी की तबियत ठीक नहीं है आकर मिल लो’ तब भी घड़ी में सात बजकर दस मिनट हो रहे थे। माँ के कमरे में रखी उस टेबल क्लॉक में तब भी सात बजकर दस मिनट और तेरह सेकंड बजते थे जब वह स्कूल से घर लौटने की प्रतीक्षा करते हुए मेरे लिए पसंदीदा पकवान बना रही होती थी। पूजा करते, सफाई करते, गमलों की देखभाल करते, बाजार से सामान खरीदते वक्त, हर काम सात बजकर दस मिनट पर। उसके हल्के रंग की साड़ियों से मैच करते आसमान में तपता सूरज हो या मेरी ड्रॉइंग कॉपी में सावन और बसंत के गाढ़े रंगों वाली सीनरी जैसी चमक का मौसम, उसने कभी किसी से नहीं पूछा कि समय क्या हो रहा है।

समय को बीतने के लिए घड़ी की जरूरत नहीं होती।

कक्षा दस तक मेरे पास घड़ी नहीं थी, जरूरत ही नहीं महसूस हुई। कलाई घड़ी मिली मगर जरूरत की वजह से नहीं बल्कि मेरे जन्मदिन पर उपहार स्वरूप मामाजी ने दी थी। उस घड़ी माँ की आवाज में जो औपचारिकता और दयनीयता थी वो मुझे नहीं भूलती, ‘इसकी क्या जरूरत थी भाईसाब, आपका आशीर्वाद ही काफी है।’ मामा ने बहुत लाड़ से कहा था ‘मेरा भांजा है उसे गिफ्ट नहीं दे सकता क्या,

सात बजकर दस मिनट बताने वाली घड़ी के अलावा अब मेरी दराज में रखी रिस्ट वॉच भी थी जो सिर्फ दोस्तों में रौब जमाने काम आती थी।

स्कूल जाने के लिए माँ मुझे सुबह उठा देती थी। और शाम को खेलने कब जाना है, ये खुद समझ आ जाता था जब वो हर दिन घर के सारे काम निपटाकर, थकान उतारने के लिए अपने कमरे में जाती और दोपहर की एक तय झपकी के बाद उठती थी और बाजार जाने के लिए निश्चित समय पर तैयार होती। मैं समझ जाता था कि मेरे खेलने का समय हो गया।

स्कूल की पढ़ाई पूरी होने तक हम दोनों एक-दूसरे का समय थे।
इंजीनियरिंग कॉलेज में आने तक मेरा और घड़ी का नाता दूर का ही रहा। माँ के सात बज कर दस मिनट पर जीवन सुरक्षित था।
एक दिन वो भी आ गया जो हर एक मध्यवर्गीय नौजवान के जीवन मे कभी न कभी आता ही है। वास्तव में बेटों को पाला ही जाता है इसी दिन के लिए।

मैं भी पहली नौकरी के लिए दूसरे शहर जाने को तैयार था। घड़ी में सात बजकर दस मिनट हो रहे थे मैंने माँ से कहा ‘ये टेबिल क्लॉक बनवा दूँ।‘

अपनी अनुपस्थिती को टिक-टिक से भरने की कोशिश थी शायद। माँ ने मुझे यूँ देखा जैसे मैंने ऐसी इच्छा जाहिर कर दी जिसे वो चाहकर भी पूरा नहीं कर सकती। जान से ज्यादा प्यारी इकलौती संतान की छोटी सी इच्छा चाहकर भी पूरी न कर पाने का दर्द उसकी आँखों में मुझसे देखा न गया और मैंने मुँह फेर लिया। उसने मेरा मन रखने के लिए कह दिया ‘बैठक में एक घड़ी टाँग दे’ मैंने वैसा ही किया और चला गया।

दूसरे शहर आकर मैं चकित सा होने लगा हूँ। मेरी घड़ी में अब रोज सुबह के नौ बजते हैं। कभी कभी शाम के छः बजते हैं। जब ऑफिस का काम जल्दी निपट जाता है। ऐसे ही एक रोज नये शहर का आसमान ताकते झील किनारे टहलते हुए अचानक घड़ी पर नजर गई ठीक सात बजकर दस मिनट हो रहे थे । मुझे लगा मेरी घड़ी बंद पड़ गयी है। फिर टिक टिक सुनी पर घबराहट और बढ़ गई। दिमाग खुद को समझाने मे उलझता जाता कि क्यों परेशान हो, ये वक्त घड़ी में पहली बार तो नहीं बजा है, लेकिन ये इस घड़ी में क्यों बजा ये तो माँ का समय है। जाने कैसी बेचैनी, कितने सवाल, ढेरों जवाब सीने में उफनती धड़कन और टिक-टिक सब गड्मड्...। लगा अब एक कदम भी आगे नही बढ़ा पाऊँगा, सब ठहर जायेगा मेज घड़ी की तरह । घबराहट में कलीग को बुला लिया। बहुत मुश्किल से खुद को संयत कर झील किनारे बेंच पर बैठे हुए उसके कदमों को अपनी ओर बढ़ते हुए देख रहा हूँ ऐसा लग रहा है घड़ी की सुइयाँ चल रही हैं। सुचित्रा के आते ही कब साढ़े नौ बज गये पता नहीं चला।

उस दिन के बाद से समय दौड़ने लगा। हर काम जल्दी-जल्दी निपटा कर शाम का इंतज़ार करने लगा। एक बार फिर साबित हुआ कि समय को बीतने और ठहरने के लिए घड़ी की जरूरत नहीं होती। सात बजकर दस मिनट कब बजे ध्यान नहीं जाता। माँ की चिन्ता होती तो फुर्र से उड़कर उनके पास पहुँच जाता। ये सुनिश्चित कर वापस लैाट आता था कि दीवार घड़ी की टिक टिक ने माँ से सात बजकर दस मिनट को कोई नुकसान नहीं पहुँचाया है।

मेरी दुनिया में कुछ नयी घड़ियाँ शामिल हो गई हैं। उनमें से सुचित्रा की घडियाँ दिल के करीब आ गईं हैं। अक्सर इतवार का दिन उसके घर ही बीतने लगा। उस घर में ढेर सारी घड़ियाँ हैं। दीवार पर, मेज पर, कोने में सजी संवरी, आधुनिक ऐंटीक हर तरह की समय के साथ चलती हुई घड़ियाँ। एक दीवार पर वो पेंटिग भी है जिसमें पेंटर ने घड़ी को पिघलते हुए चित्रित किया है। उसकी माँ से मिलकर बहुत अलग अनुभव होता है, माँ ऐसी भी होती है। दोस्त जैसी। सुचित्रा से बातों के दौरान पहली बार सुना ‘सिंगल पैरेंट’। ये दो शब्द अपने जीवन से जुड़े भी लगे और नहीं भी। सुचित्रा की माँ ने उसे अकेले पाला था, जैसे ‘तुम्हारी माँ ने तुम्हें’ वो अक्सर कहती थी। पर मैं यह बात अपने बारे में निश्चित तौर पर नहीं कह सकता था। हमारे साथ सात बजकर दस मिनट भी था हर समय प्रॉक्सी पैरेंट की तरह।

सुचित्रा बताती है माँ को घड़ियों का बहुत शौक है। ये जो क्लासिक घड़ी मेरी कलाई पर देख रहे हो ये उन्हीं के कलेक्शन से है। उसने अपनी सुडौल कलाई दिखाते हुए कहा। ‘ये भी अजीब शौक है फिजूलखर्ची वाला। सारी घड़ियाँ एक वक्त पर एक समय बताती हैं’ मैंने ईर्ष्या से कहा। उसने समझाया ‘हाँ! पर ये उन्हें पसंद है। जैसे अधिकतर औरतों को गहनों का शौक होता है उसी तरह उन्हें घड़ियाँ पहनना और घर में सजाना अच्छा लगता है। माँ अपने शौक को लेकर बहुत पर्टिकुलर है। किसी से नहीं पूछती, किसी पर निर्भर नहीं हैं. वो बोलती जा रही थी....’ममा ने मुझे बचपन में भी कभी ये कह कर नहीं डराया ‘कर लो शैतानी जितनी करनी है नौ बजने दो आने दो पापा को फिर पता चलेगा...’

मैं अपनी माँ के बारे में सोचने लगा। माँ के शौक भी होते हैं ‘मेरी माँ को क्या पसंद था’.
‘पता नही।’
बहुत जोर डालने पर भी नहीं याद आया ऐसा कुछ भी जिसे शौक कहा जा सके। एक बार उन्हें शहर घुमाने ले गया था, मुझे लगा उन्हें अच्छा लगेगा। पर मैंने महसूस किया उनका मन तो वहीं अटका था। देाबारा मैंने भी जानने की कोशिश नहीं की कि उन्हें क्या पसंद है क्या नहीं हर हफ्ते मिलने चला जाता और फिर चुपचाप अपने काम पर लौट आता। धीरे- धीरे समय की कमी होने लगी है मुझे। अब केवल छुट्टियों में ही माँ के पास आना होता है। कभी-कभी माँ पर गुस्सा भी आने लगा है। झगड़ा करने को मन करता। क्या है ये ‘बस हर समय सात बजकर दस मिनट, लेकिन माँ से झगड़ा करना तो क्या, किसी तरह की असहमति की संभावना भी नहीं थी क्योंकि वो मेरी हर बात से सहमत थी। मैं अपने अंदर पनपते गुस्से और उठते सवालों पर अपराधबोध से भर जाता हूँ। क्यों माँ से नाराज होने लगा हूँ, वो माँ जिसने कभी किसी गलत आदत या झूठ बोलने पर भी पीटना तो दूर की बात डाँटा तक नहीं। यहाँ तक कि एक बार चोरी की लत लग गई और माँ को पता तब चला जब टीचर ने उन्हें बुलाकर शिकायत की। तब भी उसने ऐसे दिखाया जैसे कुछ पता ही न हो। ऐसी सीधी-सादी बेचारी माँ पर गुस्सा कैसे किया जाय।

जबकि सभी लोग उनसे बहुत हमदर्दी रखते थे। और अब सोचता हूँ कि माँ को इस दया से कभी कोई दिक्कत क्यों नही थी।
माँ ने कभी नहीं कहा कि मेरे जाने से घर सूना लगता है। नौकरी के साल भर होते-होते मैंने देखा उनकी सेहत गिर रही है। दुबला पतला शरीर और ज्यादा मुरझाया, बेजान सा दिखने लगा। मामा ने डाँटते हुए समझाया ‘वो तो ऐसी ही है कुछ कहती नहीं तो क्या तुम्हें दिखता नहीं तुम्हें पालपोस कर बड़ा करने में कितनी तपस्या की है उसने अब जवान बेटे के कंधों का सहारा उसका हक़ है।’ एक बार फिर ग्लानि से भर गया। अधिकारियों से माँ की बीमारी और अकेलेपन की दुहाई दे किसी तरह तबादला वापिस अपने शहर में करा लिया। और साथ ही सुचित्रा के साथ शादी का फैसला भी। माँ आज मुस्कुराई शायद पहली बार उसकी आँखो में पनीली सी चमक दिखी।

बारात चढ़ने का समय हो रहा था माँ अपने कमरे में सात बजकर दस मिनट के सामने खड़ी बुदबुदा रही थी ‘ऐसी भीड़भाड़ और शोर इक्कीस बरस पहले हुई थी।’ मामी उन्हें ढूढँते हुए ठीक समय कमरे में पहुँची और सुन लिया। नाराज भी हुईं कि उन्होने शुभ मौके की बराबरी अनहोनी से क्योंकि, बात कमरे से बाहर भी कुछ लोगों तक पहुँच गई सभी के मन में माँ के लिए आश्चर्य मिश्रित दया भर गई। वे सब नहीं जानते कि जब पूरी ज़िन्दगी सात बजकर दस मिनट तेरह सेकंड पर बीत रही है तो ये अवसर कैसे साझा नहीं होगा। इ..ई ’माँ ने बेहोश होने से पहले कहा कुछ देर में डॉक्टर माँ को होश में ले आये। उनकी बहू ने घबराकर बताया ‘आज शाम ही घड़ी रिपेयर करने को देकर आई हूँ, बंद घड़ी का घर में होना अशुभ होता है।’ उस रात मैं माँ के पास ही रहा। बार-बार उनकी धड़कनें सुनता और टबल क्लॉक की खाली जगह देखकर खो जाता जैसे किसी ने समय मे सेंध लगा दी हो। मैं तो नई घड़ियों का अभ्यस्त हो गया हूँ पर माँ सोचते- सोचते आँख लग गई।

अगली सुबह मैं और सुचित्रा जगे पर माँ नहीं। जैसे इक्कीस बरस पहले पिताजी की सांसें टूट गईं थी और उनकी र्निजीव देह भहराकर गिरते हुए मेज की उस खाली जगह पर रखी घड़ी से टकराई थी सात बजकर दस मिनट तेरह सेकंड पर।

(लेखिका ने कई वर्षों तक विभिन्न हिन्दी अखबारों हिन्दुस्तान, स्वतंत्र भारत, जनसत्ता, नई दुनिया आदि में स्वतंत्र लेखन किया। थोड़े समय र॔गमंच से जुड़ाव। 2017 से फिल्म निर्माण के क्षेत्र में कथा पटकथा लेखन जारी। "रंगम फिल्मस" से जुड़कर ‘कॉटन कैंडी’ ‘वाशरूम’ ‘दोहरी सोच’ तथा एक निर्माणाधीन शॉर्ट फिल्म की पटकथा भी लिखी। 2020 मे उपन्यास A son never forgets का हिन्दी अनुवाद ("पदचिह्न") प्रकाशित। लेखन के साथ वर्तमान में आकाशवाणी लखनऊ में समनुदेशी उद्घोषिका के रूप में कार्यरत।)

Wednesday, March 2, 2022

उदास समय और बदली हुई लड़ाइयाँ


- प्रतिभा कटियार
बहुत दिन हुए कि बहुत दिन नहीं हुए. ऐसा लगता है समय कहीं ठहरा हुआ है. फिर लगता है ठहरा ही रहता तो भी ठीक होता शायद. कभी-कभी समझ में नहीं आता दुःख है या उदासी. या दोनों ही हैं. हाँ, वही वजह जो होते हुए भी नहीं है. हिज़ाब का मुद्दा. अपनी भूमिका को तलाशती हूँ. क्या सोचती हूँ, क्या चाहती हूँ, किस तरफ हूँ. जाहिर है मैं किसी भी तरह की पर्देदारी की तरफ नहीं हूँ चाहे वो घूँघट हो नकाब. मैं किसी भी तरह के ऐसे परम्परागत पहनावे का समर्थन इसलिए नहीं करती क्योंकि उसे समाज ने ठीक माना है. जिसे जो पहनना है, जैसे रहना है यह नितांत निजी मसला है. लेकिन जैसे ही यह ‘निजी’ की बात आती है इसमें ढेर सारी कंडीशनिंग आ जाती है, ढेर सारा सामाजिक हिसाब-किताब, दबाव. और फिर वही बात कि हम नहीं जानते कि हमारी मर्जी बनकर जो हमारे भीतर है वो असल में समाज की पहले से सोची हुई तय की हुई बात है, व्यवहार है. तो इस लिहाज से हिजाब के समर्थन या न समर्थन की बात ही नहीं, जिसकी जो मर्जी हो वो पहने. लेकिन जिसकी मर्जी न हो उस पर कोई दबाव भी न बनाये.

अगर सच में कोई बदलाव चाहिए तो मर्जी को सच में उनकी ही मर्जी होने देना होगा. हम सब इसके शिकार हैं. हमारा पूरा आचरण, व्यवहार, खान-पान भाषा, बोली, लिबास, संस्कृति, त्योहार सब इसके दायरे में है. आज जब हिजाब को राजनैतिक उपयोग के लिए इस तरह चर्चा में लाया गया है तो उन सबके साथ ही पाती हूँ जो हिजाब पहनने को अपना हक मानती हैं. यह बिलकुल वैसा ही है जैसे सबरीमाला मंदिर में स्त्रियों के प्रवेश को लेकर बात थी. तब भी समझ नहीं आ रहा था कि मैं इन स्त्रियों के मंदिर में जाने की लड़ाई में साथ क्यों हूँ जबकि मेरी तो किसी मन्दिर-मस्जिद, चर्च, गुरूद्वारे में कोई आस्था है नहीं. बात वही सबके बराबर के हक की. लोकतांत्रिक व्यवहार की. हिजाब के खिलाफ जो हैं वो क्या घूँघट के खिलाफ भी हैं? वो क्या चूड़ियों और सिन्दूर के खिलाफ भी हैं. और क्यों होना है खिलाफ? समझ विकसित करनी है जिसके लिए शिक्षा की जरूरत पड़ेगी. शिक्षा जो बायस्ड न हो, अपनी मर्जी के मायने समझाए, सवाल करना, तर्क करना सिखाये.

फिर खुद पर हैरत होती है. क्या इतने बड़े राजनैतिक स्टंट का ऐसे मासूम सवालों से मुकाबला किया जा सकता है. होना तो यह था कि इल्म की रौशनी में हम सबको ऐसी तमाम रूढ़ियों, परम्पराओं से मुक्त होना था जिनका कोई अर्थ नहीं लेकिन हुआ यह कि उन्हीं रूढ़िगत ढांचों को जिन्हें गिराना था उनकी पैरवी करनी पड़ रही है कि भाई पहनने दो हिजाब, जाने दो मंदिर. कोई जरूरी नहीं कि जो हिजाब में है उसकी सोच स्वतंत्र न हो, बिलकुल वैसे ही जैसे कोई जरूरी नहीं कि जो लिबास और जबान से मॉर्डन दिख रहा है वो विचारों में, सोच में भी मॉर्डन हो.

यही है असल राजनीति. हमारी लड़ाई ही बदल दे जो. हमारी खड़े होने की दिशा ही बदल दे. कि जब हमें एक-दूसरे को समझना हो. एक-दूसरे के दुःख पर मरहम रखना हो तब हम एक-दूसरे के प्रति नफरत से भर उठें.

रवीश कुमार ने अपनी एक पोस्ट में लिखा कि एक बच्ची का उनके पास मैसेज आया कि छात्रों के वाट्स्प समूह में वो शिक्षिका सांप्रदायिक भेदभाव वाले मैसेज फॉरवर्ड करती हैं. शिक्षिका हैं वो उन्हें तो इन दीवारों को तोड़ना था वो मजबूत कर रही हैं, नयी दीवारें खड़ी कर रही हैं. इन्हीं जैसे शिक्षकों के विद्यार्थी होंगे वो जो भगवा लहराते हुए हिज़ाब की खिलाफत कर रहे थे. दुःख होता है, उदासी होती है. कैसे हो गए हम, हमें ऐसा तो नहीं होना था.

हमारी लड़ाइयाँ तो कुछ और होनी थीं और उन्हें बना कुछ और दिया गया है. हम न लड़ें तब भी उन्हीं की जीत है और हम बदल दिए गए हालात में बदले हुए मुद्दों के लिए लड़ें तो भी जीत उन्हीं की है.

इस उदासी में एक ही उम्मीद है शिक्षा व शिक्षक. शिक्षकों को अपनी असल भूमिकाओं को समझना होगा, अपने व्यवहार, सोच और तरीकों को पलट-पलट कर देखना होगा कि कहीं, जाने-अनजाने वो ऐसा कोई व्यवहार तो नहीं कर रहे जो एक पूरी पीढ़ी को उलझा रहा हो.

शिक्षा सिर्फ मार्कशीट में दर्ज नम्बर भर नहीं होती वो होती है जीवन को देखने की दृष्टि, मनुष्य होने की संवेदना. क्या हममें वो है? इस प्रश्न पर हम सब पढ़े-लिखे लोगों को एकांत में सोचने की जरूरत है, वरना पब्लिक फोरम में तो सबसे ज्यादा असंवेदनशील लोगों ने अपने भाषणों से लोगों को खूब रुलाया है और तालियाँ बटोरी हैं.

Wednesday, February 16, 2022

न पूछ परीज़ादों से



कल रात 12 बजे के करीब ‘परिज़ाद’ का आखिरी एपिसोड देखा. मैंने खुद को ख़ुशी के आंसुओं में तर इस कदर कब कुछ देखते हुए पाया था याद किया तो जल्दी से कुछ याद नहीं आया.

इस सीरीज का अंतिम सिरा जब रात के 12 बजे हाथ से छूटता है तो लगता है कितना हल्का महसूस कर रही हूँ. दो दिन पहले बीते वैलेंटाइन डे को मुंह चिढ़ाती एक अलग सी कहानी. प्रेम क्या है आखिर, कैसा होता है, कैसे निभाया जाता है, बिना सम्मान के भला कौन सा प्रेम...जैसे तमाम सवाल ढुलक जाते हैं. परिज़ाद से प्यार हो जाता है. दुनिया ने जिसे खोटा सिक्का कहकर हमेशा नकारा, जो गुरबत की गलियों में पला बढ़ा. ख़्वाब देखने से पहले पलकें झुका लेने वाला, बेहद अंडर कांफिडेंट परिज़ाद भीतर से इतना खूबसूरत, भोला और भला इंसान है कौन न प्यार कर बैठे उसे. सारी दुनिया उसके गहरे रंग, सादा से रूप के आगे उसकी काबिलियत उसके हुनर को दुत्कारती रही लेकिन उसने किन्ही भी हालात में भीतर की नदी को सूखने नहीं दिया, अपने भीतर की अच्छाई को खुद से दूर जाने नहीं दिया. ऐसा करने के लिए उसने कुछ प्रयास नहीं किया क्योंकि वो तो ऐसा ही था उसे वैसा ही होना आता था. मुझे कुछ पसंद आ जाए तो मैं बिंज वाच करती हूँ. परिज़ाद इन दिनों सोते-जागते साथ रहा. उसकी आँखे, उसकी चाल उसकी आवाज़, उसकी पोयट्री सब साथ चलते हैं. उसके संघर्ष नहीं रुलाते, प्यार रुलाता है. सच में किसी ख़्वाब सा लगता है परिज़ाद का होना. ऐसे ख़्वाब बचाए जाने चाहिए, हमें बहुत सारे परिज़ाद चाहिए. परिज़ाद को पसंद करना ज़िन्दगी को, पोयट्री को, इंसानियत को प्यार करना है.
 
परिज़ाद देखने का सुझाव करीब तीन दिन पहले डा अनुराग आर्या ने दिया था. डा अनुराग के सुझाव से पहले जब भी कुछ देखा है मन खुश-खुश सा हुआ है. शुक्रिया डा अनुराग. आगे भी ऐसे ही सजेस्ट करते रहियेगा.
परिज़ाद एक पाकिस्तानी सीरीज है जो यूट्यूब पर उपलब्ध है.


Saturday, February 12, 2022

अब पहुंची हो तुम




आखिर मुझ तक भी पहुँच ही गयी 'अब पहुंची हो तुम'.
एक सप्ताह से छुट्टियों की राह ताक रही हैं 7 किताबें. आज सब पैकेट खुले हैं. धूप खिली है. सुबह की पहली चाय के साथ महेश पुनेठा जी की कविताओं का साथ रहा. महेश जी को पहले से पढ़ती रही हूँ लेकिन इस तरह संग्रह में पढ़ने का सुख अलग है. ये कवितायें सखा भाव से बिना किसी हो हल्ले के करीब आकर बैठ जाती हैं. इन्हें पढ़ते हुए महसूस होता है कि ऐसा ही तो हम भी सोच रहे थे. अरे, यह तो मेरी ही बात है. मेरे तईं बड़ी रचना वो है जो अपने पाठकों का हाथ थाम ले, उनके दिल में जगह बना ले. पाठकों के भीतर हलचल पैदा करे उन्हें परिमार्जित भी करे. और यह सब इतना अनायास हो कि पाठक समझ भी न पाए कि कब उसके भीतर की गिरहों को कोई खोल गया है.
ये कवितायें जीवन के नन्हे नन्हे लम्हों को सहेजती हैं. सहजता से बड़ी बात करती हैं. कवि भी वही जीवन जीता है जो जीते हैं बाकी सब, वही सब देखता सुनता है जो देखते सुनते हैं बाकी सब. कवि की संवेदना और उसका व्यापक नजरिया उसी देखे सुने को सहेज कर सुभीते से सामने रख देता है. वो रसोई की खदबदाहट को जिस तरह सुनते हैं वह आसान नहीं. वह गहन संवेदना की मांग करता है. स्त्रियाँ, पहाड़, राजनीति, नदी, जंगल, गोरु सब उनकी कविताओं में मिलते हैं. उनकी कविताओं में लोक की खुशबू है, अपनापन है, देश समाज की चिंताएं हैं. महेश जी की कवितायें सरलता से बड़ी बात करने वाली कवितायें हैं. मुझे यकीन है ये कवितायें आम पाठकों से लेकर कविता के सुधी परिमार्जित पाठकों तक का प्यार पायेंगी.
कुछ कविता अंश-
वह सुख लिखने लगी
सोचती रही
सोचती रही
सोचती रह गयी
फिर
वह दुःख लिखने लगी
लिखती रही
लिखती रही
लिखती ही रह गयी.
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सड़क
अब पहुंची हो तुम गाँव
जब पूरा गाँव शहर जा चुका है.
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लम्बा अरसा गुजर गया है
सब्जी की टोकरीऔर दाल के डिब्बे
सीधे मुंह बात नहीं करते मुझसे
और खाली जेब मैं भी
उनसे कहाँ आँख मिला पाता हूँ.
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पिछली बार उन्होंने घोषणा की थी
हम तुम्हारा भला चाहते हैं
कुछ सालों में ही
हमारे खेतों से
हमारे अपने बीज गायब हो गए
हमारे अपने कीटनाशक गायब हो गये
हमारी अपनी खाद गायब हो गयी
बस बाख गयी केवल किसानी
अबकी वो फिर बोले हैं
हम तुम्हारा भला चाहते हैं.
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देखता हूँ
जहाँ जले हैं
सबसे अधिक दिए
मोमबत्तियां
विद्युत् मालाएं और बल्ब
पाता हूँ
वहीँ छुपा है
सबसे अधिक अँधेरा.
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सत्ताएँ
डरती रही हैं
सत्य से
अहिंसा से
और सबसे अधिक
प्रेम से.
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कुछ लोग किताबों को
ऐसे पढ़ते हैं
जैसे किसान अपने बीजों को
बोने से पहले
भिगो लेते हैं पानी में
उन्हें ही डालते हाँ खेतों में
जो बैठ जाते हैं तले में
तैरने वालों को
खिला देते हैं जानवरों को
उनके जीवन में किताबें
फसलों की तरह लहलहाती रहती हैं.
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गांवों को जोड़ती हैं
लड़खड़ाती पगडंडियाँ
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लोकतंत्र के लोहे पर
आन्दोलन देते हैं धार
सत्ता पर कुंडली मारे
उन पर करते नित वार हैं
लोकतंत्र उनकी मजबूरी है
इसलिए कहते
धार गैर जरूरी है.
किताब समय साक्ष्य प्रकाशन से प्रकाशित हुई है.


Monday, February 7, 2022

कहानी- थैंक यू


पिंक साड़ी पहनूं या ब्लैक? या फिर ग्रीन वाली? साड़ी में आंटी जी तो नहीं लगने लगूंगी मैं? जींस कुर्ता पहन लूं स्मार्ट लगेगा. नहीं वो काफी कैजुअल हो जायेगा. मैं दिखना स्पेशल चाहती हूँ लेकिन लगूं कैजुअल सी. यानी कैजुअल स्मार्ट. क्या करूँ...क्या करूँ....पूरे बिस्तर पर साड़ियाँ कुरते दुप्पट्टे बिखरे हुए थे. पूरी ड्रेसिंग टेबल पर झुमके, चूड़ियाँ, कड़े अंगूठियों की नुमाइश लगी थी. रेवती को कुछ समझ ही नहीं आ रहा था वो कैसे तैयार हो, क्या पहने. घर के बाहर लगी मधुमालती रेवती की हैरानी पर मुस्कुराये जा रही थी. उस पर बैठी चिड़िया देर से जाने कहाँ देख रही थी. चिड़ियों की भी उलझनें होती होंगी क्या? चिड़िया उलझन में होती होगी तो क्या करती होगी? पता नहीं. लेकिन चिड़िया की उलझन रेवती की उलझन जैसी तो नहीं होती होगी. माने क्या पहने.

यूँ तो यह राग हमेशा का है. जैसे ही कोई फंक्शन या कोई कार्यक्रम का इनवाइट आता है सबसे पहला सवाल क्या पहने? पिछले कुछ बरसों में यह सवाल लगातार बड़ा होता जा रहा है. जबकि कॉलेज के दिनों में यही रेवती बिंदास घूमती थी. जो मिल गया पहन लिया, बालों को उमेठ के जूडा बना लिया और कॉलेज पहुँच गयी. एक बार तो स्लीपर में ही पहुँच गयी थी कॉलेज. अलका ने जब ध्यान दिलाया तब रेवती को होश आया. रेवती के बाल बहुत लम्बे और घने थे, अब भी हैं, कॉलेज के ज़माने में तो गजब ही थे. लेकिन मजाल है उसने उन बालों को सलीके से सहेजा हो कभी, कसी चोटी या जूडा वो भी लापरवाही से बनाया हुआ बस इतना ही. जैसे यह भी बोझ हो.

शादी के बाद सजना-संवरना शुरू हुआ लेकिन मन कभी नहीं लगा उसका इस सबमें. बस जरूरत की तरह करती गयी. बिटिया अनु जब बड़ी होने लगी तो याद दिलाने लगी ‘क्या मम्मा आप ठीक से तैयार ही नहीं होती. कितनी सुंदर हो आप और ठीक से तैयार ही नहीं होतीं.’ रेवती को हंसी आ जाती. फिर उसने पैरेंट टीचर मीटिंग में जाने के लिए तैयार होना शुरू किया. लेकिन पिछले एक बरस से उसका सजने-सँवरने को लेकर रुझान बढ़ गया है. हालाँकि यह कोई नहीं जानता कि पिछले एक बरस में उसकी उदासी भी बढ़ रही है.

लेकिन अभी समस्या यह है कि आज जिससे मिलने जाना है वो कोई मामूली शख्स तो है नहीं वो है पिया की सहेली. कितना फ़िल्मी लग रहा है रेवती यह सोचकर मन ही मन मुस्कुराई. इस मुस्कराहट में न जाने कितनी उदासी थी कि पलकों में आने से छुप न सकी. क्या करे ऐसा, क्या कहे वो मानसी को कि फ़िल्मी न लगे. हाँ यही नाम है उसका. रेवती ने खुद मानसी को बुलाया है. आज शाम 4 बजे उससे इंडियन कॉफ़ी हाउस में मुलाकात तय हुई है. अभी बज रहा है 12. पहले वाला समय होता तो वो कहती पूरे चार घंटे हैं अभी जाने में तब तक एक नींद सो लेती हूँ लेकिन अब उसे लग रहा है कि सिर्फ 4 घंटे हैं. तैयार होने का इतना दबाव उसने अपने ऊपर कभी महसूस नहीं किया. क्यों वो एक स्त्री के कांपटीशन में खुद को धकेल रही है उसने खुद से पूछा. पिछले एक बरस से खुद को इसी कांपटीशन में ही पा रही है वो. थक गयी है अनजानी रेस में दौड़ते-दौड़ते. क्यों स्त्रियाँ एक-दूसरे से प्रतियोगिता में ईर्ष्या में द्वेष में उतर जाती हैं प्रेमिका और पत्नी के रूप में आमने-सामने होते ही. कोई असुरक्षा ही होती है जो यह सब करवाती है. उस पुरुष को खोने की असुरक्षा जो दोनों की ज़िन्दगी में महत्व पाने लगा है. देवता तब तक ही तो देवता है जब तक भक्त हैं. सोचते-सोचते मुस्कुरा दी रेवती.

मानसी और प्रशांत एक ही दफ्तर में काम करते हैं. दोनों की अच्छी दोस्ती थी. इस दोस्ती के बारे में रेवती को भी खूब पता था. लेकिन उस दोस्ती के बीच प्रेम ने कब जगह बना ली यह सबसे बाद में पता चला रेवती को. पत्नी को पति के अफेयर के बारे में पता चले तो है तो यह एक विस्फोटक घटना लेकिन घटी सामान्य तरह से ही. रेवती ने बिलकुल रिएक्ट नहीं किया. घर परिवार रिश्ता सब सामने चलता रहा. इतना सामान्य कि प्रशांत को हैरत होने लगी. रेवती इस रिश्ते के बारे में जानते ही आत्मविश्लेष्ण में चली गयी. क्यों हुआ होगा ऐसा? क्यों प्रशांत किसी और स्त्री की ओर गया. प्यार तो वो बहुत करता था उसे. वो भी प्रेम करती थी. फिर क्या हो गया बीच में. इस घटना के बाद रेवती ने खुद पर ध्यान देना शुरू किया, सजना-संवरना शुरू किया.

इकोनोमिक्स में टॉपर रही रेवती सक्सेना ब्यूटी पार्लर के चक्कर लगाने लगी. प्रशान्त उसे हैरत से देखता और खुश होता. रेवती खुश होती कि प्रशांत अब भी उस पर ध्यान दे रहा है वरना किसी और के प्रेम में डूबा व्यक्ति कहाँ देखता है अपनी पत्नी की ओर. इस बात को शुभ संकेत मान वो प्रशांत को वापस लौटा लाने की रेस में और तेज़ और तेज़ दौड़ने लगी. घर प्रशांत के पसंद के पकवानों की खुशबू से और ज्यादा महकने लगा. वो खुद प्रशांत की पसंद के रंगों से सजने लगी. अनु कहती कहती ‘पापा मम्मा इज सो चेंज्ड न?’ प्रशांत हंसकर कहता, ‘हाँ चलो अब आई तो अक्ल तेरी माँ को.’

सजने-संवरने की इस प्रक्रिया में उसने अपनी बड़ी-बड़ी आँखों में पहली बार झाँक कर देखा. नहीं पहली बार नहीं शादी के बाद पहली बार. वहां उसे कोई सपना नहीं मिला. एक भी नहीं. वो सपने कहाँ गए सारे के सारे जो आँखों में इस कदर भरे थे कि छलकते रहते थे. कॉलेज के टाइम तो न जाने कितने सपने थे इन आँखों में. ये सपनों वाला राजकुमार राजकुमारी के सपने क्यों चुरा लेता है? वो उन सपनों का क्या करता है. रेवती अपनी सपनों से खाली आँखों में डूबने उतराने लगी.

कैसे दौड़ती भागती-फिरती थी वो. कॉलेज की कोई इवेंट रेवती सक्सेना और अलका मिश्रा के बिना संभव ही नहीं होती थी. दोनों पक्की सहेलियां और दोनों एक दूसरे की सबसे बड़ी कांपटीटर भी. डिबेट हो, डांस, स्पोर्ट्स हो या थियेटर इन दोनों के नाम का डंका बजता था. सारी एक्टिविटी में जोर-शोर से शामिल होने वाली ये राजकुमारियां इम्तिहानों में भी बाजी मार लेतीं.

लेकिन जरूरी नहीं कि हर जगह से गोल्ड मैडल बटोरने वालों के पास ज़िन्दगी को समझने की भी समझ हो. कॉलेज के बाद कॉम्पटीशन दिए. पीसीएस के कुछ प्रीलिम कुछ मेंस निकाले तभी एक ‘अच्छा रिश्ता’ आ गया. लड़के ने पीसीएस क्लियर किया हुआ था. रेवती को पहली ही मुलाकात में प्रशांत अच्छा लगा. उसकी खुली सोच, विचारों में स्पष्टता और दकियानूसी रिवाजों से उसकी नाराज़गी ने रेवती को काफी इम्प्रेस किया. प्रशांत को भी रेवती का स्वाभाविक होना बिना लाग-लपेट के अपनी बात कहना और उसकी सादगी पसंद आई. ‘अच्छा रिश्ता’ पक्का हो गया और मिस रेवती हो गयीं मिसेज रेवती प्रशांत. आजकल यह भी एक ट्रेंड है प्रेम में अपने पति का नाम अपने नाम के साथ लगाना और अपने सरनेम को न छोड़ना. अजब सा प्रोग्रेसिव होना है ये कि पति का सरनेम या तो अपने सरनेम के साथ चिपक जाता है या पति का नाम चिपक जाता है या दो दो सरनेम लगाने लगी हैं लडकियां. रेवती ने कहा वो दोनों में से किसी सरनेम को नहीं लगाएगी. प्रशांत का नाम लगाएगी. क्योंकि प्रेम तो वो प्रशांत से करती है उसके सरनेम से तो नहीं. यह भी उसका छद्म प्रगतिशील होना ही था यह बात उसे काफी बाद में समझ में आई. क्योंकि प्रेम नाम या सरनेम अपने नाम से चिपकाना है ही नहीं. और अगर है तो इसका अर्थ यह हुआ कि पुरुष प्यार करते ही नहीं स्त्रियों को क्योंकि न तो वो पत्नी का नाम अपने नाम से जोड़ते हैं न सरनेम. सब कुछ जानते बूझते भी शादी के बाद का उबालें खाता प्रेम और शोबिज़ का नशा ज्यादा सिन्दूर लगाने और पति के नाम को अपनी पहचान से जोड़ना अच्छा लगता है की परिभाषा गढ़ लेता. तो रेवती भी उस उफनते प्रेम में क्यों न डूबती भला.

अच्छा हनीमून बीता, उसके बाद अच्छा जीवन बीतने लगा. रेवती को शादी के बाद लगा उसके पंख कटे नहीं हैं, और खुल गए हैं. इस घर में तो माँ की रोक-टोक भी नहीं थी. प्रशांत केयरिंग था. अब भी है. रेवती ने शादी के बाद भी काम्पटीशन देने की धुन को कुछ दिन जिन्दा रखा लेकिन बहुत जल्दी वह धुन नयी-नयी शादी के नशे में पिघल गयी. जैसे ही वो रात को किताबें खोलती प्रशांत उसे बाहों में खींच लेता. दिन घर की देख रेख में निकल जाता. असल बात यह थी कि उसका मन भी नहीं लग रहा था किताबों में.

सब ठीक चलते-चलते ‘कुछ’ हो जाता है जिसे हम कहते हैं कि ठीक नहीं है. वो क्या होता है. ‘ठीक’ को जब वो ठीक होता है हम सम्भाल क्यों नहीं पाते. या हमें पता नहीं चलता कि वो जो ‘ठीक’ लग रहा था वो ‘ठीक’ है ही नहीं. असल ठीक तो यह है जिसे अब दुनिया गलत कह रही है.

रेवती को जबसे प्रशांत और मानसी के बारे में पता चला है वो ऐसे ही सवालों को घुमा-घुमा कर देखती रहती है. जवाब की आशा में नहीं एक ऐसे सवाल की आशा में जो उसे इस उलझन से निकाल ले.

एक बरस से वो जानती है इस रिश्ते के बारे में लेकिन कभी रिएक्ट नहीं किया. वो जानती है कि रिएक्ट करने से कुछ नहीं होगा. रेवती ने खुद को सजाने-सँवारने और प्रशांत का ध्यान फिर से अपनी ओर खींचने की कोशिश तो शुरू कर दी लेकिन उसने महसूस किया कि उसे कुछ ख़ास दुःख नहीं हुआ उनके रिश्ते के बारे में जानकर. वो खुद को बार-बार टटोलती कि आखिर गड़बड़ कहाँ है. ऐसे मौकों पर फिल्मों और धारावाहिकों में पत्नियाँ जिस तरह तड़प-तड़प के जान देने पर उतारू हो जाती हैं ऐसा उसके साथ कुछ नहीं हो रहा है. न ही मानसी को ऊट-पटांग बोलने का उससे सौतिया डाह महसूस करने जैसा कुछ हो रहा है. रेवती जो सजने-संवरने और पति को वापस लाने की जंग में उतर गयी थी उसमें भी उसकी इच्छा नहीं धारावाहिकों का असर ही ज्यादा था.

साड़ियों और गहनों के बीच पसरे हुए रेवती के मन में न जाने कितने ख्याल उतरा रहे थे. लेकिन किसी भी ख्याल में न दुःख था न ईर्ष्या हाँ एक उदासी थी. लेकिन लोग तो कहते हैं कि ईर्ष्या तो प्रेम की पहचान होती है तो क्या उसे प्रेम ही नहीं था प्रशांत से? यानी इतने सालों से जिसके साथ प्रेम है सोचकर जीती आ रही थी उससे प्रेम ही नहीं था. कुछ तो गड़बड़ है. या तो उसे प्रेम नहीं था या प्रेम को नापने वाला समाज का थर्मामीटर गलत है. क्योंकि प्रेम जिसे कहता है जमाना वो तो था, सेक्स, घूमना फिरना, सरप्राइज गिफ्ट, आउटिंग और भी बहुत कुछ. लेकिन ये सब होने पर प्रेम भी होगा ही इसकी कोई गारंटी है क्या?

उसने गुलाबी साड़ी को परे धकेलते हुए खुद से कहा, ‘क्या हो गया है मुझे? ये मैं तो नहीं. मैं किस रेस में दौड़ रही हूँ. बाहर धूप चटख होती जा रही थी भीतर रेवती के भीतर मंथन चल रहा था. शादी मन से की, शादी के बाद जो भी किया मन से किया फिर भी उसे सुकून क्यों नहीं. कहीं उसे अपने मन को समझने में गलती तो नहीं हुई.

मानसी से क्या कहेगी वो ‘मेरे पति को छोड़ दे कुलच्छिनी..’ ऐसा कुछ. उसे जोर से हंसी आ गयी. ज़िन्दगी कितनी फ़िल्मी है यार. और हर मौके पर कोई फ़िल्मी डायलॉग भी टिका देती है. अचानक उसे लगा कि उसे क्यों मिलना चाहिए से मानसी से? लेकिन अब तो मुलाकात तय हो गयी है, जाना तो पड़ेगा. उसने बिखरी हुई साड़ियों, ज्वेलरी की ओर देखा. क्यों वो मानसी के काम्पटीशन में है? पिछले साल भर से वो कर क्या रही है. खुद को आईने मेकअप और ब्यूटी पार्लर को झोंक दिया. क्या इस तरह वो प्रशांत को वापस पाना चाहती है? पहले कभी पाया था क्या? क्या इसमें प्रशांत की गलती है? मानसी की? या रेवती की? सेल्फ ब्लेमिंग हिन्दुस्तानी औरतों का पहला रिएक्श्न होता है इसके बाद दूसरा रिएक्श्न होता है दूसरों पर आरोप मढ़ना. और ये दूसरा अगर कोई स्त्री है तब तो काम बहुत आसान हो जाता है मढ़ने का. ये पहला दूसरा आपस में अदलता-बदलता रहता है. रेवती ने भी सेल्फ ब्लेमिंग को सेल्फ ग्रूमिंग में बदलना शुरू किया.

‘मैं किसी रेस में नहीं हूँ....’ रेवती बडबडाई. उसने खुद को जो कहते हुए सुना उसे वह सुनने की कबसे इच्छा थी. उसकी आँखें बह निकलीं. दो बजने को हो आये थे. अनु के स्कूल से आने का वक़्त हो गया था. उसने फटाफट जींस और कुर्ता चढ़ाया. गर्मी इतनी थी कि बालों का जूडा ही उसे सूझा. अब वो किसी रेस में नहीं थी. लेकिन अपनी खूबसूरत आँखों और लम्बे घने बालों का वो कुछ नहीं कर सकती थी. उसने आई लाइनर उठाकर किनारे रख दिया. लिपस्टिक भी उसने होठों से बस छूकर रख दी. अनु स्कूल से आई तो उसने चेंज कराकर उसे खाना दिया और कमरा समेटने लगी. अनु ने मम्मा को तैयार देखकर कहा, ‘मम्मा आप कहीं जा रही हो?’ ‘मैं नहीं जा रही बेटा हम जा रहे हैं. मुझे एक आंटी से मिलना है तो आपको नानी के घर छोडकर मैं वहां जाऊंगी. फिर शाम को तुम्हें वहां से ले लूंगी. तुम नानू को आज चेस में हराना तब तक’ ‘हाँ खूब मजा आएगा’ अनु ने खुश होकर कहा.

अनु का कुछ सामान गाड़ी की पीछे वाली सीट पर डालकर रेवती माँ के घर को निकल पड़ी. माँ के घर पर अनु को ड्रॉप करके रेवती ने गाड़ी कॉफ़ी हाउस की तरफ मोड़ दी.

क्या मानसी के दिमाग में भी ऐसा ही कुछ चल रहा होगा? क्या वो ख़ास तरह से तैयार हुई होगी? क्या वो नर्वस हो रही होगी? लेकिन वो क्यों नर्वस होगी वो तो प्रेम में है, नर्वस तो मुझे होना चाहिए. प्रेमिका और पत्नी...कैसे खांचे हैं न? अगर मैं जा रही होती राहुल से मिलने...राहुल अचानक कैसे नाम याद आ गया. कॉलेज के ज़माने का उसका धुआंधार प्रेमी. रेवती के चेहरे पर सड़क के दोनों किनारों पर खिले कचनार के फूलों सी मुस्कान तैर गयी. जैसा वो राहुल के साथ फील करती थी वैसा प्रशांत के साथ कभी उसे महसूस नहीं हुआ. हालाँकि कभी कोई कमी भी महसूस नहीं हुई. ये होने और न होने के बीच क्या होता है जो जीवन बदल के रख देता है. जिसका कोई नाम नहीं है. जिसे कोई पहचानता भी नहीं.

क्या मानसी को वो ‘कुछ’ मिल गया है. क्या वो ‘कुछ’ रेवती से खो गया है. क्या वो रेवती के हाथ से फिसलकर मानसी के पास चला गया है. अगर ऐसा है तो उसे कुछ महसूस क्यों नहीं हो रहा है कि ‘कुछ’ चला गया है. ऐसे मौकों पर पत्नियां सामान्य तौर पर बहुत आहत होती हैं. उन आहत पत्नियों के पास क्या वो ‘कुछ’ रहा होता है. और यह कुछ सिर्फ स्त्रियों के हिस्से से ही फिसल जाता है क्या? वो जो आहत होता है वो पत्नी होने का अहंकार होता है या प्रेम? क्या पुरुषों के हिस्से से नहीं फिसलता वो ‘कुछ’. क्या प्रशांत को मानसी के संग वो ‘कुछ’ महसूस हुआ होगा जो रेवती के पास नहीं हुआ. पता नहीं. लेकिन रेवती को इतना पता है कि न तो ईर्ष्या हुई मानसी से न उस पर गुस्सा आया. क्या प्रेमिकाओं को पत्नियों पर भी गुस्सा आता होगा? यही सब सोचते हुए रेवती की कार कॉफ़ी हाउस की पार्किंग में आ गयी. किसी ने गाड़ियाँ उलटी सीधी लगायी हुई थीं. देर तक हार्न बजने के बाद गार्ड आया तो रेवती गार्ड को कार की चाबी देकर आगे निकल गयी यह कहकर कि गाड़ी लगवाकर चाबी रिसेप्शन पर छोड़ दे.

जैसे ही रेवती अंदर पहुंची उसे साइड वाली टेबल पर मानसी बैठी दिखी. सांवली सी इकहरे बदन की लड़की. उसे देख बिलकुल नहीं लग रहा था कि उसने इस मुलाकात के लिए खुद को विशेष तौर पर तैयार किया हो. रेवती के चेहरे पर आत्मविश्वास था जो मानसी के चेहरे पर जरा कम था. यह रिश्तों में बन गयी जगहों का अंतर भर था. इन हालात में अगर प्रशांत होता तो उसके चेहरे पर क्या होता. अगर मानसी सामने है तब और अगर राहुल सामने होता तब? रेवती को हंसी आ गयी.

‘हैलो, मुझे ज्यादा देर तो नहीं हुई न?’ रेवती ने सामने वाली कुर्सी पर बैठते हुए कहा.

‘हाय, एकदम देर नहीं हुई आपको. दरअसल, आप टाइम पर हैं मैं ही थोड़ा जल्दी आ गयी थी.’ मानसी बोली.

‘गर्मी काफी हो रही है. एसी बेअसर हो गए लगते हैं’ रेवती ने कहा. जब बात का कोई सिरा नहीं मिलता तब मौसम की बात करना हमेशा मदद करता है. कोई भी मौसम हो उसके बारे में बात की जा सकती है.

‘जी आप कुछ कहना चाहती थीं?’ मानसी ने सीधे मुद्दे पर आने की कोशिश की.

‘कुछ ख़ास नहीं. बस मिलना चाहती थी.’ रेवती ने सहजता से जवाब दिया.

‘कॉफ़ी और्डर कर लें? कौन सी पियोगी?’ रेवती ने पूछा.
‘वैसे मैं एक कॉफ़ी पी चुकी हूँ लेकिन दोबारा पी सकती हूँ बहुत अच्छी होती है यहाँ की फिल्टर कॉफ़ी.’ मानसी ने भरसक कोशिश करते हुए संयत आवाज़ में कहा.
‘हाँ, फिल्टर कॉफ़ी गजब होती है यहाँ की. कॉफ़ी बीन्स की जो ख़ुशबू होती है वो कहीं और नहीं मिलती.’ रेवती ने मानसी की बात में अपनी सहमति मिलाते हुए कहा.
‘वाह! हमारी पसंद तो मिलती है.’ मानसी ने कहा. उसके मुंह से निकल तो गया लेकिन समझ में आ गया कि गड़बड़ बात निकल गयी है. वो संकोच में एकदम से धंस गयी.
रेवती ने हँसते हुए उसे सहज किया. ‘हाँ पसंद तो मिलती है तभी तो हम यहाँ हैं एक साथ फिल्टर कॉफ़ी पीने.’
‘सॉरी...वो...’ मानसी ने झेंपते हुए कहा.
‘भैया दो फिल्टर कॉफ़ी ला दीजिये और एक पानी की बाटल. थोड़ी ठंडी.’ रेवती ने कॉफ़ी ऑर्डर की अब बात शुरू की जा सकती थी. हालाँकि दोनों में से किसी को पता नहीं था कि क्या बात करनी है.
‘इस मौसम की सबसे सुंदर बात जानती हो क्या है? दहकते गुलमोहर, अमलतास. ऐसा लगता है मौसम से टक्कर ले रहे हों, या कह रहे हों कि तुमसे प्यार है.’ रेवती ने फिर से मौसम का सिरा उठाया बात के लिए.
‘जी’ मानसी का मन मुख्य बात पर लगा हुआ था. उसे लग रहा था ‘कब शुरू होंगी ये आखिर तो इन्हें गालियाँ ही देनी हैं, मुझे ऊट-पटांग ही बोलना है. पता नहीं मैं कितना सह पाऊंगी. कोशिश करूंगी कि उन्हें हर्ट न करूँ, जवाब न दूं लेकिन बहुत बोला तो सह नहीं पाऊंगी.’ मानसी मन ही मन सोच रही थी. प्रशांत ने भी उसे चुपचाप सब सुन लेने को कहा था. उसे गुस्सा आया था इस बात पर. क्या उन्होंने अपनी पत्नी को बोला होगा चुपचाप सब सुनने को. मुझे क्यों बोला. मैं प्रेमिका हूँ तो मेरा सम्मान कम है, वो पत्नी हैं तो उनका सम्मान ज्यादा है. क्यों? मानसी के मन की उथल-पुथल उसके चेहरे से ज़ाहिर होने लगी थी.
‘इतना मत सोचो. मैं बता देती हूँ मैंने तुम्हें क्यों बुलाया है.’ रेवती ने मुस्कुराते हुए मानसी की मन ही मन चलने वाली उलझन को सुलझाने की पहल की. मानसी की मानो चोरी पकड़ी गयी.
‘आप तो मन के भीतर का भी पढ़ लेती हैं?’ मानसी ने संकोच से भरते हुए कहा.
रेवती हंस दी. ‘मैंने तुम्हें थैंक यू कहने के लिए बुलाया है.’ रेवती ने कहा और एक गहरी सांस ली. वेटर ठंडे पानी की बोतल रख गया था उसने गटगट पानी पिया.
‘क्या?’ मानसी ये सुनने को एकदम तैयार नहीं थी. उसने चौंकते हुए कहा.
‘हाँ, सच्ची वाला थैंक यू मानसी. डायरेक्ट दिल से. तुम्हें पता है मैं एक लम्बी गहरी नींद में थी सालों से. तुमने मुझे जगाया. अब समझ में आया कि यह नींद कुछ ज्यादा ही लम्बी हो गयी. तो तुम्हारा थैंक यू तो बनता है न.’ रेवती ने जो कुछ भी कहा वह उसने सोचा नहीं था. वह खुद को यह कहते हुए सुन रही थी और उसे अच्छा लग रहा था.
‘लेकिन...’ मानसी अभी भी अटकी हुई थी. मतलब ऐसा कौन कहता है.
लेकिन रेवती की मुस्कान बता रही थी कि वो जो कह रही है उसमें सच्चाई है. मानसी को राहत से ज्यादा हैरत हुई. कॉफ़ी आ गयी. दोनों चुपचाप कॉफ़ी पीने लगीं.
‘तो क्या आप प्रशांत को छोड़ देंगी?’ मानसी जानना चाहती थी कि रेवती के मन में चल क्या रहा है.
रेवती जोर से हंस पड़ी. रेवती हँसते हुए इतनी खूबसूरत लगती है कि कोई भी उस पर मुग्ध हो सकता है. प्रशांत कहता तुम्हारी हंसी मोगरे के फूलों सी है सुंदर और महकती हुई. आज वही मोगरे सी हंसी मानसी को घेरे थी.
‘छोड़ दूँगी? किसे? प्रशांत को? मैंने उसे पकड़ा ही कब है? छोड़ना क्या होता है मानसी. पकड़ना क्या होता है.
मैं तो बस इतना जानती हूँ कि तुमने मुझे एक गहरी लम्बी नींद से जगा दिया. खुद से बहुत दूर चली गयी थी मैं...और मुझे पता भी नहीं चला.’

कॉफ़ी खत्म होने को थी. बिल दिया जा चुका था. मानसी कॉफ़ी हाउस की दीवार पर टंगी नीले रंग की पेंटिंग को देख रही थी जिसमें एक स्त्री बुहार रही थी. उसी नीले रंग से नीला लिए बैठी थी सामने एक स्त्री जो जीवन में आये छिछले सुखों को बुहार रही थी.

रेवती काफी हल्का महसूस कर रही थी और मानसी को पता नहीं वो कैसा महसूस कर रही थी. रेवती ने मानसी की तरफ बाहें फैलायीं तो मानसी उनमें हिचकते हुए समा गयी.
‘आपसे किसे प्यार न हो जाए भला’ मानसी ने अपनी भीगी पलकें पोंछते हुए कहा.

रेवती मुस्कुरा दी. उसने रिसेप्शन से अपनी कार की चाभी ली और कॉफ़ी हाउस से बाहर निकली तो बाहर का मौसम बदल चुका था. धूप कहीं छुप गयी थी. हवाओं में ठंडक उतर आई थी. गार्ड को चाबी देकर उसने कहा गाड़ी निकलवा दे और वो बाहर खड़ी होकर इंतज़ार करने लगी. उसने इंतज़ार करते हुए खुद को बहुत हल्का महसूस किया जैसे वो फिर से कॉलेज वाली रेवती होने लगी थी. उसने हवा के झोंकों से टूटकर गिरते कचनार अपनी हथेलियों में भर लिए. उसने देखा एक फूल उसके कंधे पर भी आ बैठा है. रेवती की मुस्कुराहट बढ़ गयी. वो घर आई तो अनु एकदम तैयार थी चलने के लिए. माँ ने चाय पीने को कहा तो उसने अनु के सर पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘आज चाय नहीं माँ आज मैं और अनु पार्टी करेंगे आइसक्रीम खायेंगे.’
‘येहे हे हे....’ अनु एकदम से बहुत खुश हो गयी.