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Monday, April 22, 2019

'ये कविताओं के पंख फ़ैलाने के दिन हैं '


'क' से कविता यह नाम नया है लेकिन इस भावना वाला काम तो मैं तकरीबन 60-65 सालों से कर रहा हूँ कि दूसरों की कविताओं को सुनाना. वहां भी दूसरों की कविताओं को सुनाना जहाँ मुझे आमंत्रित किया गया है मेरी अपनी कविताओं को सुनाने के लिये क्योंकि मुझे लगता है कि जो मुझसे भी अच्छी कवितायेँ लिखी गयी हैं वो भी उन सबको सुनानी चाहिए जो कविताओं से प्रेम करते हैं.' 
- नरेश सक्सेना 28 अप्रैल 'क' से कविता की दूसरी सालाना बैठक में 

'क से कविता क से क्या कहने. मेरा जो मानना है कि कविता को जन तक कैसे ले जाएँ उसका यह बहुत अच्छा उपक्रम है. जनता को कविता की समीक्षा करने का मौका मिलता है मेरे ख्याल से यह बहुत बड़ी बात है. कविता अगर जिन्दा रहेगी तो लिखने से ज्यादा ऐसे कार्यक्रमों से जिन्दा रहेगी. नये नए ज्यादा से ज्यादा लोगों का कार्यक्रम से जुड़ना ही कार्यक्रम की उपलब्धि है.
- लाल बहादुर वर्मा 28 अप्रैल 'क' से कविता की दूसरी सालाना बैठक में 

मुझे कार्यक्रम में आकर बहुत अच्छा लगा. मैं देहरादून का हूँ कविता के कार्यक्रम में इतने लोगों का जमा होना, बराबर बने रहना है यह बड़ी बात है. कार्यक्रम का कंटेंट, संचालन, पूरी बुनावट में जो तारतम्यता थी वो कमाल की थी. इसे जिस सादगी जिस सहज भाव से चलाया जा रहा है इसे ऐसे ही चलने दें.'
- हमाद फारुखी 28 अप्रैल 'क' से कविता की दूसरी सालाना बैठक में 

कविता प्रेम, सच्चाई, मनुष्यता की ओर ले जाती है. हम सबको मिलकर स्कूलों में कॉलेजों में इस तरह के कार्यक्रम को जाना चाहिए और हम सबको छात्रों को इससे जोड़ने का प्रयास करना चाहिए.-
इन्द्रजीत सिंह 28 अप्रैल 'क' से कविता

एक बेहद सादा सा, सुंदर सा भाव था मन में कि कोई ऐसा ठीहा हो जहाँ दो घड़ी सुकून मिले. रोजमर्रा की आपाधापी से अर्ध विराम सा ठहरना हो सके. जहाँ होड़ न हो, जहाँ तालियों का शोर न हो, जहाँ छा जाने की इच्छा न हो, बस हो मिलना अपनी प्रिय कविताओं से और कविता प्रेमियों से. (अपनी कविता के प्रेमियों से नहीं).और संग बैठकर पीनी हो एक कप चाय. इस विचार ने बहुत मोहब्बत के साथ कदम रखा शहर देहरादून ने 23 अप्रैल 2016 को और दो साल पूरे होते होते यह उत्तरकाशी, श्रीनगर, हल्द्वानी, रुद्रपुर, खटीमा, टिहरी, रुड़की, पौड़ी, अगस्त्यमुनि, गोपेश्वर, लोहाघाट (चम्पावत), पिथौरागढ़,बागेश्वर और अल्मोड़ा तक इसकी खुशबू बिखरने लगी. 

कब सुभाष लोकेश और प्रतिभा पीछे छूटते चले गए और रमन नौटियाल, भास्कर, हेम,पंत शुभंकर, ऋषभ, मोहन गोडबोले निशांत, प्रमोद, विकास, राजेश, नीरज नैथानी, नीरज भट्ट, सिद्धेश्वर जी, प्रभात उप्रेती, अनिल कार्की, महेश पुनेठा, मनोहर चमोली, गजेन्द्र रौतेला, भवानी शंकर, पियूष आदि इस कारवां को आगे बढ़ाने लगे पता ही न चला. गीता गैरोला दी तो सबकी प्यारी लाडली दी हैं उन्होंने इसकी मशाल जिस तरह थामी कि मोहब्बत की आंच थोड़ी और बढ़ गयी. 

देहरादून में नूतन गैरोला, राकेश जुगरान, नन्द किशोर हटवाल, नीलम प्रभा वर्मा दी ने लगातार अपने प्रयासों से और स्नेह से इसे सींचा. कल्पना संगीता, कान्ता, राकेश जुगरान, नन्द किशोर हटवाल, सतपाल गाँधी, सुरभि रावत, स्वाति सिंह, नन्ही तनिष्का सहित सैकड़ों लोग नियमित भागीदार बनते गये. कार्यक्रम की सफलता असल में शहर की सफलता है. देहरादून को अब बारिशें ही नहीं कवितायेँ भी सींच रही हैं. उत्तराखंड के अन्य शहरों को भी.

इस कार्यक्रम को व्यक्ति का नहीं, समूचे शहर का होना था. व्यक्तियों को इसमें शामिल होना था. कहीं पहुंचना नहीं था, कुछ हासिल नहीं करना था बस कि हर बैठकी का सुख लेना था, लोगों से मिलने का सुख, सुकून से दो घड़ी बैठने का सुख, प्यारी कविताओं को पढने का सुख, सुनने का सुख.

बोलने और लिखने की होड़ के इस समय में यह पढ़ने और सुनने की बैठकी बनी. लेखकों की नहीं पाठकों की बैठकी. शहरों ने इस कार्यक्रम को अपने लाड़ प्यार से सींचा. जो लोग बैठकों में शामिल होने आये थे वो इसके होकर रह गए. अब घर हो या दफ्तर कुछ भी प्लान करते समय महीने के आखिरी इतवार की शाम पहले ही बुक कर दी जाने लगी. बच्चे, युवा, साहित्यकार, बिजनेसमैन, गृहणी, शिक्षक सब शामिल हुए. सबने अपनी प्रिय कवितायेँ पढ़ीं, कितनों ने पहली बार पढ़ीं. कितनों ने ही यहाँ आकर समझा पढने का असल ढब. सुना कि किसी को कोई कविता क्योंकर अच्छी लगती है आखिर.

यह कोई नया विचार नहीं था क्योंकि बहुत से लोग मिले जिन्होंने कहा कि ऐसा तो हम सालों से कर रहे थे. कुछ बैठकों में शामिल भी हुए हम कुछ के बारे में सुना भी. महेश पुनेठा पिथौरागढ़ में 'जहान-ए-कविता' चला ही रहे थे. भास्कर भी ऐसे तमाम प्रयोग करते रहे थे. हेम तो हैं ही प्रयोगधर्मी. फिर क्या ख़ास है इन बैठकों में. खास हुआ सबका जुडना. एक नयी जगह में बैठकी की सूचना परिवार में नए सदस्यों की आमद सा लगता.

उत्तराखंड ने इन बैठकों को अलग ही ऊँचाई दी. यहाँ हमें 'मैं' से दूर रहने वाली बात पर ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी. जो साथी शामिल हुए वो सब स्वयं 'मैं' से बहुत दूर थे दूर हैं. न शोहरत की तलाश, न पीठ पर किसी थपथपाहट की उम्मीद बस कि हर बैठक के बाद होना थोडा और समृद्ध, होना थोड़ा और मनुष्य, और तरल, और सरल.

इन बैठकों में शामिल लोग नाम विहीन से हो जाते थे, चेहरा विहीन. बिना तख्ती वाले लोग इतना सहज महसूस करते कि बैठकों का इंतजार रहने लगा. शहर ने बाहें पसारीं और कार्यक्रम को अपना लिया. हमें न कभी जगह की कोई परेशानी हुई न चाय की. जबकि न हमने चंदा किया न किसी से फण्ड लिया. सब कैसे इतनी आसानी से होता गया के सवाल का एक ही जवाब था प्रेम, कविताओं से प्रेम.

देहरादून में 28 अप्रैल को हुई दूसरी सालाना बैठक असल में राज्य स्तरीय बैठक न हो पाने के बाद आनन-फानन में मासिक बैठक से सालाना बैठक में बदल दी गयी. फिर न पैसे थे न इंतजाम कोई और न ही वक़्त. ज्यादातर साथी शहर में ही नहीं थे. लेकिन जब शहर किसी कार्यक्रम को अपना लेता है तो आपको ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ती. और यह किसी कार्यक्रम की किसी विचार की सबसे बड़ी सफलता होती है कि उसे व्यक्तिपरक होने से उठाकर समाज से जुड़ जाए. शहर के सारे लोग इसकी ओनरशिप लेते हैं. सबकी चिंता होती है कि कोई कमी न रह जाए. सब मिलकर काम करते हैं, सब मिलकर एक-दूसरे के होने को सेलिब्रेट करते हैं. मेहमान कोई नहीं होता, मेजबान सब. कोई मंच नहीं, माल्यार्पण नहीं, मुख्य अतिथि नहीं, दिया बाती नहीं, किसी का कोई महिमामंडन नहीं. जेब में चवन्नी नहीं थी लेकिन दिल में हौसला था तो निकल पड़े थे सफर
में और देखिये तो कि आज दो बरस में पूरा उत्तराखंड कविता की इन भोली बैठकियों से रोशन है.

क' से कविता की दूसरी सालाना बैठक में लोग मुम्बई से भी आये थे, दिल्ली से भी लखनऊ से भी और उत्तरकाशी से भी. कबीराना थी शाम...फक्कड़ मस्ती, गाँव दुआर पे कहीं बैठकर, चौपाल में, कुएं की जगत पर खेत के किनारे मेड पर बैठकर भी जैसे कबीरी हुआ करती होगी वैसी हो चलीं हैं कविताओं की ये बैठकियां. 
 

Sunday, February 24, 2019

सुर और शब्दों की संगत ने यादगार बनायी शाम



देश दुनिया के हालात मन बेचैन करने को उतावले थे ऐसे में कुछ पल को कविता की छांव में रख देने को जी चाहा तो 'क' से कविता की 34 वीं बैठक में ठौर मिला. इस बार की बैठक के संयोजन की जिम्मेदारी ली थी सप्तक कॉलेज ऑफ परफॉर्मिंग आर्ट्स की निदेशक स्वाति सिंह ने. बैठक हेतु प्रेम और इंसानियत के इर्द-गिर्द कवितायें पढ़ने का मन बना.

बैठक का आगाज़ रमन नौटियाल ने 'क' से कविता की बैठक की शुरुआत से लेकर अब तक की यात्रा और उद्देश्य के बारे में संक्षिप्त जानकारी देने और सभी का एक-दूसरे से परिचय देकर हुआ. कार्यक्रम में रामधारी सिंह दिनकर, कबीर, बशीर बद्र, केदारनाथ सिंह, केदारनाथ अग्रवाल, अश्वघोष, माखनलाल चतुर्वेदी, गीत चतुर्वेदी, गुलज़ार, पुष्कर, दुष्यंत कुमार, बहादुर शाह ज़फर, सुमित्रानंदन पंत, आशुतोष, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, अकबर इलाहाबादी, नज़ीर, शबीह अब्बास, मज़रूह सुल्तान पुरी, इंदीवर आदि कवियों व गीतकारों की रचनायें साझा की गयीं. अल्लाह तेरो नाम ईश्वर तेरो नाम भजन भी सुना और पुलवामा के शहीदों को स्मृति नमन भी किया. इस मौके पर नामवर जी को भी याद किया गया. संगीत की संगत थी तो बहुत से गीत तरन्नुम में प्रस्तुत किये गए.
कार्यक्रम में तूलिका, तनिष्का, शैलजा सहित कक्षा 2 में पढ़ने वाले  पार्थ सारथी जैसे नन्हे साथियो ने भी अपनी प्रिय कवितायेँ सुनायीं.

इस बार की बैठक में सतेंद्र शर्मा, हृदयेश जोशी, प्रवीण भट्ट, दीपिका पांथरी, आसिम चौधरी, रिया शर्मा, कुसुम भट्ट, नीरज डंगवाल आदि नए दोस्त भी 'क' से कविता परिवार का हिस्सा बने.


वक़्त खत्म होता जा रहा था लेकिन बैठक समेटने का किसी का मन नहीं हो रहा था. कुछ पल की सही राहत तो थी इस बैठक में और थे ढेर सारे सपने इस धरती को कविताओं से, प्रेम से, सौंदर्य से, संगीत से भर देने के.

गीता गैरोला जी ने सभी साथियों का आभार प्रकट करते हुए आने वाली बैठकों को और बेहतर करने और नए युवा साथियो को जोड़ने की बात कहते हुए कार्यक्रम के समापन की घोषणा की. 

Sunday, October 28, 2018

'क' से कविता एक सुंदर मीठी सुबह से दिन का आगाज़


अक्टूबर में उतरता है मौसम हथेलियों पर, कन्धों पर, धरती पर. अक्टूबर में इंतजार शुरू होता है वादियों के शगुनों वाली बर्फ से भर जाने का, नाउम्मीदियों के उम्मीदों से बदल जाने का. अक्टूबर से शुरू होता है उत्सव का सिलसिला जो जोड़ता है मन के उत्सव से, जिन्दगी को सुंदर बनाने के ख्वाब को और मजबूती से थाम लेने से. ‘क’ से कविता की 30 वीं बैठक में भी देहरादून के कविता प्रेमियों ने उम्मीदों के ऐसे ही रंग चुने. इस बार ‘पोयट्री विद वॉक’ का विचार बना और इसके लिए सुबह का वक्त चुना गया. इस विचार का जिस तरह स्वागत हुआ उसने उत्साह बढ़ा दिया. सुबह की ताज़ा हवा में हरसिंगार के फूलों के बीच से गुजरते हुए, गिलहरियों की चुलबुली शरारतों को नजरों में भरते हुए कुछ देर को ही सही सभी कविता प्रेमियों ने खुद को तमाम तनाव से मुक्त और ऊर्जा से लबरेज महसूस किया. सबसे पहले ‘क’ से कविता के विचार को साझा किया गया कि किस तरह 23 अप्रैल 2016 को देहरादून में शुरू हुई पहली बैठकी का सिलसिला आज समूचे उत्तराखंड में फ़ैल चुका है. समूचे उत्तराखंड में 17 अलग अलग जगहों पर बैठकें होती हैं और हर शहर की अपनी स्वायत्ता है. सिर्फ दो ही मूल बातें हैं ‘क’ से कविता के कॉन्सेप्ट की पहली यहाँ अपनी कविता नहीं पढ़नी और दूसरी इसकी सादगी. मूल विचार इन बैठकों में शामिल होते हुए और इन्हें आयोजित करते हुए भी किसी भी तरह के तनाव से खुद को दूर कर पाना और जिन्दगी के थोड़ा और करीब जा बैठने की कोशिश होती है.


इसी कोशिश के चलते सबसे पहले सभी साथियों ने गांधी पार्क का पूरा चक्कर लगाया, पार्क में मौजूद फूलों, पेड़ों, पंछियों को महसूस किया. जिन्दगी में पहले से मौजूद कितनी ही कविताओं से हम रू-ब-रू होते होते रह जाते हैं उन्हीं लम्हों के करीब जाने की यह कोशिश थी. इसके बाद ‘क’ से कविता जो अब लगभग तीन वर्ष पूरे करने की यात्रा में है इसे किस तरह और बेहतर बनाया जाय इस बारे में सभी साथियों ने अपने विचार रखे. नन्ही तूलिका और तनिष्का ने बताया कि उन्हें ‘क’ से कविता की बैठकों का पूरे महीने इंतजार रहता है और उन्हें यहाँ बहुत कुछ सीखने को मिलता है.

कविता पाठ का सिलसिला शुरू हुआ संतोष अर्श की गजल से जो इब्ने इंशा, केदारनाथ अग्रवाल, जावेद अख्तर, विजय गौड़, अदनान कफील, ममता से होते हुए बहुत सारे अन्य कवियों तक पहुंचा. अनत में एक मोहक भजन और मोहन गोडबोले के बेहद सुरीले बांसुरी वादन के साथ बैठक का समापन हुआ.

सभी साथियों ने कहा ‘यह सुबह यादगार हुई.’

Thursday, April 26, 2018

‘क' से कविता की अल्मोड़िया चाल


‘​क से कविता’ आयोजित करने वाले भी भली—भांति जानते हैं कि वह अचानक नए लोगों को खड़ा कर रही है। दरअसलए उत्तराखंड की जमीन में मौजूद साहित्यानुराग की उर्वर शक्ति ही इसकी बुनियाद बनाती है। लोग हैं इसलिए वे कविता को आमंत्रित करते हैं.
उत्तराखंड के सभी जनपदों में ‘क से कविता’ मंच गठित
- भास्कर उप्रेती 

आख़िरकार अल्मोड़ा नगर में 25 मार्च को ‘क से कविता’ की शुरुआत हो गयी. शुरुआत भी एक मुकम्मल शुरुआत. इधर ‘क से कविता’ ने ‘ए’ से शुरू होने वाले अल्मोड़ा में अपना परचम लहराया, उधर महान कविताफरोश सुभाष रावत ने लंबी और गहरी साँस ली। उन्होंने जब गहरी संतोष भरी साँस ली तो हम सब कविता प्रेमियों को भी अपनी खुदी पर नाज हो आया. क्यों न होता ? उत्तराखंड ऐसा प्रदेश बन गया था, जहाँ अब हर जिले में कविताएं हो रही थीं। फ्रीफंड की कविताएं. मार्च के महीने में साहित्य के कई मठों में कवियों पर खूब फंड उड़ेला जाता है। यहाँ जनता अपना प्यार कविताओं पर उंडेल रही थी।

कविता कहने के लिए लोग घरों से निकल पड़ते हैं या कविताओं को होस्ट करने के लिए घरों में बुलाते हैं। कवि समाज के लोग नहीं, यह लोग हैं फकत कविताप्रेमी लोगण् जोअपनी नहीं दूसरों की कविताएं पढ़ते हैं. वे जगह—जगह की कविताएं पढ़ते हैं। लोक की कवितायेँ, जन की कवितायेँ, हिंदी की कवितायेँ, भारतीय भाषाओं की कवितायेँ, विश्व भाषाओं की कविता। नारी कविता, दलित कविता, गोरी कविता, काली कविता।

कोई भी पूछना चाहेगा कविता क्यों? कविता ही क्यों
मगर हमने इस सवाल का उत्तर कभी नहीं तलाशना चाहा कविता को खुद बताने दो।

सुभाष भाई पिछले दो साल से अपने सपने को लेकर हर शनिवार दिल्ली से भागे चले आते हैं। कभी पिथौरागढ़, कभी अगस्त्यमुनि तो कभी उत्तरकाशी। 1994 में उत्तराखंड आन्दोलन के दौरान उनकी थियेटर टीम ने एक नाटक जगह—जगह किया था। उसका नाम था मिशन 2020। नाटक एक प्रदेश के रूप में अवतरित हो रहे उत्तराखंड की खूबियाँ बताता था। उत्तराखंड बना नहीं था, उसे बनना था। लेकिन, उस समय उसके बीज जिस भांति अंकुरित हो रहे थे, उससे शेक्सपियर के जूलियट सीजर नाटक सी डरावनी ध्वनियाँ गूँज रही थीं। आज का उत्तराखंड वही है जो कला दर्पण का नाटक भविष्यवाणी में कह रहा था। मगर, ऐसा ही उत्तराखंड चाहिए था हमें।

हमें तो रामगढ़ की चोटी पर बैठे टैगोर वाला उत्तराखंड चाहिए था। हमें महादेवी का उमागढ़ वाला उत्तराखंड चाहिए था। हमें चंद्रकुंवर बर्त्वाल वाला हिमवंत चाहिए था। हमें लैंसडाउन की उकाव से उमड़ते नागार्जुन के घिरते बादल चाहिए थे। हमें स्वामी मन्मथन और प्रो. डी.डी. पंत के सपनों का विश्वविद्यालय चाहिए था, गिर्दा का ‘धुर जंगल फूल फूलो यस जतन करुलो’ और ‘हाँ न पटरी माथा फोड़े ऐसा हो स्कूल हमारा’ वाला प्रान्त चाहिए था। उसमें गुमानी के ‘काफल’ चाहिए थे, मोहन उप्रेती के हुड़के की थाप होनी थीं। घाटियों और धुरों में पंडित उदयशंकर का आलाप सुनाई पड़ना था। मगर हो न सका।

जो था और है वह है पस्ती थियेटर ठप, जनगीत चुप, लेखक गायब, कवि लापता। पत्रकार पतित, शिक्षक गैर—हाज़िर। दोष किसको ? सरकार का सरकार जिसके बारे में सब कहते हैं उनकी हो नहीं सकती, उनके लिए कुछ कर नहीं सकती।

बातें थीं, चिंताएं थीं। शोक था, विलाप था, मगर पहल नहीं थी। पहल करें भी तो करें कैसे? तानाशाह का भय कंपित करता था। चेतन, अर्द्धचेतन, अवचेतन सब एक नियति के शिकार।

इसी बीच देहरादून में कुछ प्राणियों ने एक यूटोपिया रचा। जैसे शमशेर कहते थे न ‘कविता न सही’ हाथ की छटपटाहट ही सही. बैठे—ठाले इन प्राणियों को सपना आया. ‘प्रतिरोध न सही, कविता ही सही. कविता होने लगी। देहरादून से यह हल्द्वानी पहुँची। फिर उत्तरकाशी, टिहरी, श्रीनगर, पौड़ी, अगस्त्यमुनि, रुद्रपुर, खटीमा, लोहाघाट, रुड़की, पिथौरागढ़, बागेश्वर और अब अल्मोड़ा, अल्मोड़ा ‘अ’ से और ‘ए’ से शुरू होता है, लेकिन अल्मोड़ा को शुरू होने में थोड़ा टैम लग गया।

पाश कहते हैं न, ‘सपनों के लिए लाज़िमी है झेलने वाले दिलों का होना’ कविता के सपने उन्हें कैसे आएंगे जो कभी बेचैन नहीं होते। लेकिन रेत में अपनी मुंडी घुसेड़ देने से तो अच्छा है कविता ही पढ़ लें। अपनी बेचैनी को कोई ठौर तो मिले. दुनिया से रुखसत होते हुए यह तो कहा जा सकेगा कि नहीं बदल सके हम दुनिया यारो, मगर हमने सपनों के बीज तो जगह—जगह फेर दिये. सपने बचे रहेंगे तो बदलने की भी कूबत बनी रहेगी।

खैर थोड़ी सी बात ‘क से कविता’ की अल्मोड़िया चाल की। 25 मार्च की सुबह नौकरी के काम से मैं रुद्रपुर के कॉर्बेट इन में पड़ा हुआ था। पता नहीं किस गरज से मैंने कमरे की चिटकनी नहीं लगायी। सुबह के खर्राटों में मेरे मोबाइल की चीख उठी। किसी तरह सिकुड़ते—सिकोड़ते हुए मोबाइल उठाने को होता हूँ तो खुली आँखें अचंभित हो उठती हैं। मेरे सामने एक स्मार्ट सा आदमी अपनी दंतमाला खोले मुस्कान बिखेर रहा था। मन से एक आवाज आई. ओह यह कविता का विदूषक! जी हाँ कविताफरोश सुभाष रावत वह और पहले आ चुके थे. फ्रेश हो चुके थे। अब हाज़िर हो रहे हैं।

शायद यह बात उन्होंने निम की ट्रेनिंग में सीखी होगी। सीधे रिपोर्ट करते हुए कहते हैं—जी हाँ हम पहुँच चुके हैं। हेम पंत कुछ ही मिनटों में हाज़िर होते होंगे। हम ठीक 6 बजे यहाँ से रवाना हो जायेंगे। मेरे मन से आवाज आई— ‘यह साँचे में ढला हुआ आदमी कैसे कविता का आदमी हो गया। ‘कविता का आदमी तो शर्तिया बेतरतीब होना चाहिए। बहरहाल हेम भी उस समय प्रकट हो गए। वो भी इनसे कम नहीं हैं। सुभाष दा चलो लेट नहीं होना है। 10 बजे शुरू हो जाएगा।

मुझे याद आया कि बीते दिन यह योजना बनी थी कि अल्मोड़ा में ‘क से कविता’ करने के लिए सुभाष दा और हेम रानीखेत के बाटे अल्मोड़ा पहुँचेंगे। अल्मोड़ा में नीरज भट्ट जी—जान से कविता कराने को जुटे हुए हैं। मैंने दोनों को शुभकामनाएं दीं, ‘कविता का अंतिम किला’ फतह करने के लिए। अंतिम इस मायने में कि अब तक 12 जिलों में ‘क से कविता’ होने लगी थी।

मेरे खाप में लटपटी नींद चपड़—चपड़ कर रही थी। मैं सोने की कोशिश करने लगा मगर तभी पता नहीं क्यों मृणाल पाण्डे की किताब का टाइटल मेरे जेहन में गूँज पड़ा। ‘ओ रे अल्मोड़ा’। मैं अचकचाकर बैठ गया। मैंने मोबाइल से सुभाष दा को धात लगायी, मुझे भी ले जाओ, मेरा मन भी आने का कर रहा है। वहां से दोनों खितखित करने लगे। देखा कविता का कमाल! मैं झटपट तैयार हुआ और हम कार में जा घुसे। सुभाषदा रोडवेज की बस से अब तक कविता—धर्म के प्रचार—प्रसार को गए हैं। पिछली दफा तो वे मेरी बाइक की पीठ पर बैठकर बागेश्वर पहुंचे थे। जहाँ से फिर भराड़ी पहुँच गए। फिर गरुड़—कौसानी होते हुए वापिस दिल्ली की बस में जा घुसे थे। हम उनकी बहादुरी की सान में धार लगाते रहे। मगर इस बार हेम ने तय किया था कि कविता के होलटाइमर को थोड़ा आराम के साथ कविता—स्थल तक ले जाया जाए।

मटकोटा मोड़ से गुजरते हुए हमें पहले पत्रकार जगमोहन रौतेला और फिर मीडिया—गुरु भूपेन सिंह की भी फाम हो आई। ‘चलोगे? पहले रानीखेत में उमेश डोभाल और फिर अल्मोड़ा की धार में कविता कौन भला ऐसा रोमानी सपन ठुकराए। जग्गू दादा बोले, यार वैसे तो फूफाजी की तेरहवीं हैं, लेकिन वहां भी चलूँगा तो ठीक ही हुआ। भुप्पी दा बोले ‘अरे मुझे डिस्टर्ब क्यों कर देते हो बार—बार, अब कह रहे हो तो जाना ही पड़ेगा। इस तरह हम पांच जन हल्द्वानी से हो गए। उस दिन तो ऐसा लग रहा था मानो किसी से भी कविता के लिए चलने को कहते चल ही देता।

रानीखेत में हम ख़राब वक़्त शुरूहोने से ठीक पहले पहुँचे। सौज्यू की बकेट पर बनी सुंदर और सार्थक कलाकृतियों को देख मन प्रसन्न हो उठा। ललित कोठियाल ने टीम हल्द्वानी की चिप लगाकर हम लोगों का ग्रुप फोटो खेंचा। सभागार में हालाँकि चारु तिवारी बोलकर निमा चुके थे। लेकिन शेखर दा मंद—मंद लौ में सुलगरहे थे। उत्तराखंड की दशा, दिशा, दृष्टि का समूचा—समग्र आख्यान। हमारा रिवीजन हो गया। उनसे तो एक ही बात सौ—सौ बार सुनने का मन करता है। राजदूत भंडारी जी जैसे ही संस्कृत का उच्चार करते हुए आये तो हमने बाहर निकलकर गढ़वाल के ओने—कोने से पहुंचे मित्रों से मिलने—भेंटने का लुत्फ़ उठाया। देहरादून से योगेश दा ‘भट्ट’ अपनी अदा के साथ आये थे। मनीष सुन्द्रियाल हमेशा की तरह मौजूद थे। व्योमेश जुगरान जी से सकल रूप में पहली भेंट थी। एक कोने से अपने 23 साल पुराने दगड़ीयों के साथ अरुण कुकसाल टिमटिमा रहे थे। महेश पाण्डेय जी और पी.सी. तिवारी जी की शिकायतों ने भी हमें और परिपूर्ण किया। अंदर पुरस्कारों का रेला शुरु हुआ। इधर से गीता गैरोला दीदी की टोली जीप भरकर आ धमकी। साथ में पंखुड़ी और सुमन केसरी। हम धन्य हुए। गीता दी जहाँ न पहुंचें वो कार्यक्रम ही क्या।

नीरज बार—बार समय से आने का अलार्म बजा रहे थे तो हम खिसक लिए। भूपेन सिंह को वहीं छोड़ना पड़ा क्यूंकि उन्हें मीडिया के हालातों पर कुछ जरूरी बात वहाँ रखनी थीं। कठपुड़िया में दाल—भात खाया। पहाड़ी खाना खिलाने की जिरह की मगर दाज्यू बोले कोई नहीं खाता सैप अब आप कह रहे होए लेकिन यहाँ के गिराक तो अरहर की दाल ही मांगने वाले हुए। छोटे स्टेशन के लिहाज़ से बहुत सारी खाने की दुकानें हैं यहाँ लेकिन सब के बाहर मोमो के ही चिट लटके हैं।

खैर हम थोड़ी देर में कोसी पुल की तारीफ करते—करते स्यालीधार पहुँच गए। अब जाकर कविता पर बात फोकस हुई। सुभाष दा का निर्देश हुआ नीरज को फोन लगाकर पूछो कितने आए। कितने वाला सवाल बहुत जरूरी था. अल्मोड़ा में कविता को कैसे देखा जाएगा जाने. इसी बीच हेम को कल्याण मनकोटी ने आने की इत्तिला दी. अब हम एक—एक क्षण में और सुनना चाहते थे। लोग जुड़ रहे थे, मगर कितने आएंगे टोटल धुंधलका था। हमने मित्र पुलिस की अनुपस्थिति देखकर माल रोड की बाइक पार्किंग में कार घुसेड़ दी और दौड़े—दौड़े जी.जी.आइ.सी. की सीढ़ियाँ उतरनी शुरू कीं ताने से अंदर देखा कुछ लोग थे। फिर हाल में पहुंचे ठीक—ठाक लोग थे।

नीरज को भी ठीक-ठीक नहीं पता था. कविता क्या बला है. हल्की बूंदाबादी शुरू हो चुकी थी पर हौले—हौले लोग बढ़ ही रहे थे। संख्या 25 पार हुई तो हमने सभा शुरू करने की घोषणा की। चेहरे के अंदर चेहरे पढ़ने में अल्मोड़यों का कोई सानी है ? धीर—गंभीर चेहरों के भीतर बैठा प्रश्नवाचक जानने को उत्सुक था कि आखिर ये क्या बेचने आये हैं और क्या भिड़ा के जाना चाहते हैं। इनमें दुकानदार थे, छात्र थे, शिक्षक थे, इंजीनियर थे समाजसेवी थे। नीरज जैसे अपरिभाषित युवा भी थे। टुकुर—टुकुर ताक रहे नीरज पंत जी को कुछ—कुछ आईडिया था प्रभात उप्रेती जी की सिफारिशी सूचनाओं की वजह से। मगर, बाकी सबकी आँखों में प्रश्न अधिक थे। हम थोड़ा तो ताड़ गए, यहाँ ऐसे ही दाल नहीं गलेगी।

अल्मोड़ा एक नाम नहीं एक विचार है

अल्मोड़ा हम सबके लिए उत्तराखंड के लिए और कहना चाहिए नार्थ इंडिया के लिए प्रेरणा का स्रोत रहा है। और हम बेहद खुश हैं कि आज हम अल्मोड़ा में हैं। तने हुए चेहरे थोड़ा मुलायम पड़े। मगर क्या अल्मोड़ा में अल्मोड़ा है। हम पूछने आए हैं जिसे हम अल्मोड़ा नाम से जानते हैं, क्या यह वही अल्मोड़ा है। पी.सी. जोशी का अल्मोड़ा, हुड़किया वकील वाला, मोहन उप्रेती वाला। सुमित्रानंदन पंत वाला। गौरीदत्त पांडेय वाला। खुशीराम वाला ? वही अल्मोड़ा है जहाँ गुरदत्त को, जोहरा को और बलराज साहनी को पंडित उदयशंकर ने साधा था। निश्चित रूप से इस आक्रामकता से प्रश्नवाचक सामान्य मुद्रा में आ गए। हमने बताने की बजाय पूछने की कोशिश की। हमें अफ़सोस है अल्मोड़ा में कविता शुरू होने में वक़्त लग गया। मगर क्या कोई कविता अल्मोड़े के बगैर पूरी हो सकती है? हम इसीलिए यहाँ आये हैं।

सच में यह कोई पेंतरेबाजी वाला मामला नहीं था। हमें वाकई जानना था कि वो अल्मोड़ा जिसे दुनिया जानती है, आज इतना चुप क्यों है। वीर बालकों के जोखिमों वाला अल्मोड़ा इतना नपा-तुला क्यों है ? इस शुरुआती बातचीत के बाद हम सब एक धरातल पर थे। हम यह मान रहे थे कि अल्मोड़े को चुप नहीं रहना चाहिए और समय आ गया है कि अल्मोड़ा बोले. सबको जगाने वाला अल्मोड़ा आज चुप नहीं रह सकता। सुभाष दा ने कविता कविता की घंटी बजायी और उधर अल्मोड़ा की आवाज सुलगने लगी। पहले धीमी—धीमी, फिर मध्यम और फिर गगन हिलोर कर।

नीरज पांगती से सुनाना शुरू किया। पांगती ने पाश की ‘सबसे खतरनाक’ सुनाई. महेंद्र ठकुराटी ने मीरा के छंद गाये। नीरज पंत ने सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की ‘तुम सोचते होगे’ और बल्ली सिंह चीमा की ‘भूख से लड़ते हुए इंसान’ पेश की। मनीष पंत ने योगेश की कविता ‘नहीं दवाई अम्मा’। मोतीप्रसाद साहू ने अवध बिहारी श्रीवास्तव की ‘मंडी चले कबीर’, चंद्रा उप्रेती ने महाश्वेता देवी की ‘आ गयी तुम’, ललित योगी ने जयशंकर प्रसाद की ‘सब जीवन बीता जाता है’ सुनाई। राजेंद्र भट्ट ने गिर्दा की ‘ततुक नी लगा उदेख’ गाई तो हेम ने हीरा सिंह राणा की ‘लस्का कमर बाँधा’ गाई. दीपा गुप्ता ने हरिवंशराय बच्चन की ‘दिन जल्दी जल्दी ढलता है’, प्रतिभा ने देवल आशीष की ‘प्रिय तुम्हारी सुधि को मैंने’, नीरज भट्ट ने चंद्रकुंवर बर्त्वाल और दुष्यंत कुमार, जगमोहन रौतेला ने मदन मोहन डुकलान, भास्कर ने केदारनाथ सिंह की, सुभाष रावत ने कैश जौनपुरी की ‘मैं नमाज नहीं पढूंगा’ सुनाई। लक्ष्मी आश्रम कौसानी से आई मीनू ने अपने मधुर कंठ से ‘मैं तुमको विश्वास दूं, तुम मुझको विश्वास दो’ गाकर सभी के कंठ को समवेत कोरस में बदल दिया. खैर 28 जनों में से 25 ने कविताएं पढ़ीं और अल्मोड़ा में ‘क से कविता’ का शानदार आगाज हो गया। अलग-अलग तेवर और कलेवर की कविताएं सामने आयीं. यह खुद से या समूह के विवेक से ही हो गया कि इसमें भिन्नता और विविधता को जगह मिल पाई।

‘क से कविता’ के कुछ नियम बनाये गए हैं या कहें वह नियम नैसर्गिक रूप से विकसित होते गए हैं। सुभाष ने बताया कि अपनी नहीं, अपने दोस्त की नहीं, अपनी पसंद की बड़ी कविता यह पहली शर्त है। दूसरा, किसी भी बैठक में कोई अध्यक्ष नहीं, कोई विशेष नहीं। बराबर सभी सम्मानीय। तीसरा, एक व्यक्ति की एक ही कविता। चौथा, जगह ऐसी चुनें जो सबको भाये। जहाँ सब आना पसंद करें। उन्होंने बताया कि कविता को लिखकर या प्रिंट कराकर साथ लायें। कविता स्थल पर पहुंच कर कविता ढूंढना कविता की गंभीरता को कम करता है। एक नियम यह भी बताया गया कि समूह में यदि कोई बड़ा कवि भी है तो भी उसकी कविता कोई और नहीं पढ़ सकेगा। हाँ कवि की अनुपस्थिति में उसकी कविता लायी जा सकती है. मीडिया में छपने—छपाने की रस्म से बचा जाएगा। मीडिया को जब तक खुद इसे कवर करना जरूरी न लगे, तब तक कोई मीडिया के पास नहीं जायेगा। कविता को साहित्यिकों और उनके संस्कारों से बचायेंगे।

हल्द्वानी की पहली बैठक में एक विचित्र अनुभव हुआ था. कार्यक्रम में थोड़ा विलंब से आये तारा चन्द्र त्रिपाठी और अनिल भोज ने अचानक अपनी कविताएं पढ़ना शुरू कर दीं। बीच में किसी ने आगाह किया कि यहाँ अपनी कविता पढ़ने का नियम नहीं हैं, तो दोनों वरिष्ठजन रुष्ठ हो गए। तब किसी ने कहा, अरे चलेगा, एक आध तो चल सकती हैं, सीनियर आदमी हैं। तब सुभाष ने कड़ा स्टैंड लेते हुए कहा कि बिल्कुल नहीं चलेगी। नहीं लाये हैं तो कोई बात नहीं। सुन भी तो सकते हैं। बाकी लोग लाये हैं, उन्हें सुनेंगे। उस दिन हल्द्वानी में सुभाष दा का यह स्टैंड कईयों को थोड़ा अखरा तो सही, लेकिन आगे इसने हमारी बड़ी मदद की। हल्द्वानी में ही नहीं और जगह भी। लोगों को खासकर साहित्यिकों को अपनी कविता सुनाने की आदत हो गयी है। यह आदत डी.एन.ए. में ही शामिल हो गयी है। इस आदत ने कविता का बड़ा नुकसान किया है। ‘क से कविता’ आंदोलन के इन नियमों की वजह से कई बार बड़े कवियों की प्रतिभागिता से वंचित रहना पड़ता है। लेकिन वह यदि दूसरे की कविता सुनने नहीं आ सकते, ऐसा कलेजा नहीं रख सकते तो हम उनसे वंचित रहना ही पसंद करते हैं। इसका बड़ा लाभ यह हुआ है कि कविता का संकुचित लगने वाला दायरा अब काफी चौड़ा गलियारा बन गया है। शुरुआत में लोग अपनी पाठ्य पुस्तक के ज़माने वाली कविता भी ले आते हैं। फिर कॉलेज के दिनों की रोमानी कविता और शायरियां। कुछ लोग जिनका साहित्य की दुनिया से कम एक्सपोजर रहा होता है, भजन—कीर्तन टाइप भी ले आते हैं। लेकिन धीरे—धीरे कविता की तलाश शुरू हो जाती है. घर में मौजूद सामग्री कम लगने लगती है. समूह में आई एक भी अच्छी कविता लोगों को अपनी रुचि का परिष्कार करने के लिए प्रेरित करती है। फिर अच्छी से अच्छी कविता लाने की होड़ मच जाती है। इस परिष्करण के लिए किसी आलोचना, समालोचना, सौन्दर्यबोध या प्रवचन की जरूरत नहीं पड़ी। लोग बिना कहे खुद के विवेक से समझते जाएँ, यही सबसे बढ़िया समझ है।

‘क से कविता’ का पहला साल पूरा हुआ तो प्रदेश भर के कविता प्रेमी मार्च 2017 में दून विश्वविद्यालय, देहरादून में एकत्र हुए थे। एक बड़ा जलसा हुआ था। जैसे अपने शहर में हम अपने आप से आते हैं, वैसे ही वहां भी पहुंचे। ‘​क से कविता’ आंदोलन को एक शक्ल देने में जुटी रही प्रतिभा कटियार और गीता गैरोला ने इस आयोजन को कविता के बड़े उत्सव के रूप में कल्पित किया, यहाँ से मिली ऊर्जा ने इसे नई—नई जगहों में फ़ैलने की प्रेरणा दी। देहरादून में अब तक लगातार 25 बैठकें, जबकि हल्द्वानी—रुद्रपुर में 18 बैठकें हो चुकी हैं।

कुछ जगहों पर लोगों ने इसके अपने फॉर्मेट भी बनाए हैं। जैसे किसी कविता को मंचित करके प्रस्तुत करना या किसी बार एक ही कवि की अनेकों कविताएं पढ़ना। या सबके द्वारा किसी महाकाव्य के अंश पढ़ना। कविता वीडियो देखना और बनाना। कविताओं को पोस्टर में लाना निश्चित रूप से कविता के प्रसार के लिए ऑनलाइन माध्यमों का काफी इस्तेमाल होता है। यूनिट स्तर, प्रदेश स्तर और राष्ट्रीय स्तर पर इसके अलग—अलग मंच हैं। जहाँ यह द्विगुणित—बहुगुणित होती रहती है। ‘क से कविता’ हैदराबाद, लखनऊ, दिल्ली, गुड़गाँव, पुणे, मस्कट, न्यूयॉर्क आदि तक भी पहुंची है। मगर, इसका जो रूप उत्तराखंड में देखने को मिला है वह नायाब है। यहाँ ये निरंतरता के साथ हो रही है और इसका फैलाव भी हो रहा है। कई बार साथी मजाक करते हैं, कुछ लोग हर प्रदेश में एक पार्टी की सरकार लाने में लगे हैं और कुछ लोग देश के कोने—कोने में कविता प्रदेश बनाने का काम कर रहे हैं। काश इस देश में एक दिन कविता का राज हो!

उत्तराखंड में हर जिले में कविता होने का यह मतलब कतई नहीं है; जिसे ‘​क से कविता’ आयोजित करने वाले भी भली—भांति जानते हैं कि वह अचानक नए लोगों को खड़ा कर रही है। दरअसलए उत्तराखंड की जमीन में मौजूद साहित्यानुराग की उर्वर शक्ति ही इसकी बुनियाद बनाती है। लोग हैं इसलिए वे कविता को आमंत्रित करते हैं. लोग खुद कुछ कर रहे हैं इसलिए वे इस आंदोलन से जुड़ना चाहते हैं। लक्ष्मी आश्रम की एक छात्रा ने हमसे कहा, अरे आप लोग तो हमारा ही काम कर रहे हैं। हम लोग भी आजकल गीतों की यात्रा पर निकले हैं, गाँव—गाँव जा रहे हैं लेकिन यह भी सच है कि लोग बिखरे हुए हैं। लोग साहित्य के कर्मकांडी रस्मो—रिवाज से इतने आजिज आ चुके हैं कि उन्हें उसमें ताजगी की उम्मीद ही नहीं लग रही. समाज का सांस्कृतिक विघटन कला और कलाबोध के विघटन को भी जन्म देता है। मगर यह शक्ति भी कला में ही है जो टूटे—बिखरे को जोड़ देता है। अभी-अभी तक गिर्दा इसका जीवंत उदाहरण थे, जो तरह—तरह की सूत को कातने वाली तकली थे। इस तकली का हमारे बीच से अनुपस्थित हो जाना एक खालीपन दे गया।

उत्तराखंड में और जगहों की भांति अल्मोड़ा के प्रश्नवाचक साथियों को भी ‘क से कविता’ का विचार बहुत भा गया। एक साथी तो इतने भावुक हो गए कि बोलने लगे, हमेशा ही दूसरों की कविताओं को सुनता आया हूँ। कभी सोचा भी नहीं था कि एक दिन खुद भी दूसरों को सुनाऊंगा। हम अपनी न सही, अपनी पसंद की कविता दूसरों को सुना सकते हैं, उनसे साझा कर सकते हैं, यह विचार खुद में अदभुत है।

यह भावना हमें कई जगह दिखी है। ऐसे साथी मिल जाते हैं जिनकी डायरियों में बेहतरीन कविताओं का सत्व है. ऐसी डायरियां आखिर कब बोलेंगी। वो चयन और परख किसके काम आएगी। कब तक लिखने वाले पढ़ने वालों पर हावी रहेंगे। और लिखे हुए का परीक्षण कैसे होगा ? यह काम ही ‘क से कविता’ कर रही है। यह साहित्य के जनतांत्रिकरण का आन्दोलन है। यह पढ़ने—लिखने की संस्कृति का एक ताजा आंदोलन है।

कर्बला के मोड़ से उतरते उतरते हम सब अचानक ही और एक साथ हँस दिये, तो हो गया। एक ने कहा। दूसरे ने कहा तो कुछ करने लगो तो कुछ हो ही जाता है. तीसरे ने कहा कविता ने शोकाकुल आत्माओं को मुक्ति दे दी। अगले ने इस बात का प्रतिकार किया नहीं जनाब इस आंदोलन ने कवियों और लेखकों की जकड़न से कविता को मुक्ति दी। हां कविता सही हाथों में आनी शुरू हुई है। तरह—तरह के विचार, विश्लेषण मगर कविता को वाकई नयी ऑक्सीजन तो मिल ही गयी, यह एक तथ्य है। हम अल्मोड़ियों की तरह बोलने लगे थे। ‘लैन करणक मन ज ह्वोलो तो कसिक नी होल, ह्व़े जाल, अल्मोड़िया चाल दरअसल वो चाल है जो किसी भी परिस्थिति में पिटना और पराजित होना पसंद नहीं करती. जुगतकि चक्रव्यूह को भेद लें.

हमने ‘क से कविता की माँ ; मनीष गुप्ता ने प्रतिभा कटियार को यही नाम दिया था. को अल्मोड़ा की बैठक के कुछ फोटो ‘व्हाट्सएप’ की. फिर और कुछ जिलों के साथियों को लोग पूछते ही हैं कहाँ से आया कविता का यह मंच ? कुछ लोग पूछते हैं कौन है मुखिया ? साहित्य की गलियों में फिरने वाले कुछ जासूस खुलासा करते हैं कि मनीष गुप्ता का है, कि नए ‘क से कविता’ एक स्वतंत्र विचार है। सही मायनों में यह पाठकों का मंच है. मनीष का एक मंच है जो कि एक निजी यू ट्यूब चैनल है. ‘हिन्दी कविता’ नाम से वे अपनी तरह से हिंदी कविता की सेवा करते हैं. और कहना चाहिए उन्होंने वीडियो माध्यम से और नामी लोगों से कविताएं पढ़ा कर नई ऊर्जा का संचार किया है। मनीष, प्रतिभा, लोकेश और सुभाष दा की बातचीत में पल रहे विचार के शुरुआती साक्ष्य भी रहे. फिर इसमें गीता गैरोला, नूतन गैरोला, प्रभात उप्रेती आदि अनेक जनों के सुझाव जुड़े और आज यह इस शक्ल में है।