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Thursday, July 9, 2026

यह खुशरंग दिनों की बात है

शिलॉन्ग से सोहरा की यात्रा शुरू हो चुकी थी। उत्साह, खुशी और गहरी शांति का हाथ थामे हम माँ बेटी निकल पड़े थे। यूं हम जानते तो थे कि सफ़र सुहाना होने वाला है लेकिन असल मजा उस जाने हुए के पार जाने का है। यात्राओं की सबसे सुंदर बात लगती है कि हमेशा कोई न कोई चौंकाने वाला मंजर यात्राओं के पास होता है। हमारे तमाम जाने हुए से, सोचे हुए से अलग कुछ अनोखा। जैसे कोई बंद मुट्ठी हो, जिसके खुलने का इंतज़ार हो। 

रात अच्छी गहरी नींद सो चुकने के बाद का यह ताज़ा दिन कमाल होने वाला था। और हम पूरी तरह से तैयार थे इस दिन को जी लेने के लिए। जैसे-जैसे हम सोहरा यानि चेरापूंजी की ओर बढ़ रहे थे, मौसम बदल रहा था। वही मौसम जिससे मिलने की बेकरारी थी। मन कुलांचे मार रहा था। बाहर का मौसम मन के मौसम की ओर हाथ बढ़ा रहा था। हम एक गहरी चुप में धँसे हुए मौसमों की कारस्तानी देख रहे थे। शिलॉन्ग से सोहरा की दूरी सिर्फ 55 किमी है। टैक्सी से यह दूरी 2 घंटे के अनुमानित समय में आराम से पूरी हो जाती है जिसमें बीच में आने वाले खूबसूरत रास्तों का आनंद लेने के लिए रुकना भी शामिल करें तो ज्यादा से ज्यादा 3 घंटे। 

असल में यह रास्ता इतना ज्यादा खूबसूरत है कि हर थोड़ी देर बाद लगता है कि यहाँ रुकना चाहिए, यहीं रुके रहना चाहिए। ऊंची विस्तृत पहाड़ियों के बीच खूबसूरत हरियाली और पर मँडराते बादल, जैसे दिल की धड़कनों की रफ्तार भी मध्ध्म हो जाए। कैब ड्राइवर अब्दुल भाई को अंदाजा है कि पर्यटक कैसे बावरे हो जाते हैं यहाँ इसलिए वो खुद ही बीच बीच में कैब रोक रहे थे। सच कह रही हूँ कितने ही वीडियो देखे हों, यात्रा वृतांत पढे हों लेकिन जहां होने का सुख है वहाँ होने का ही सुख है। और यह सुख न कभी शब्दों में ढल सकता है और न ही कैमरे में कैद हो सकता है। हम सिर्फ कोशिश करते हैं वर्तमान के लम्हों को भविष्य की स्मृतियों के लिए सहेजने की। सिर्फ एक बचकानी सी कोशिश। लेकिन यह बात जीकर जानी है कि बटोरना तो असल में जीवन ही है। 

क्या आप पानी लिख सकते हैं, इस तरह कि उसे पढ़कर प्यास बुझे। शायद दुनिया भर के लेखक इसी कोशिश में हैं, इसी साधना में कि एक रोज वो इस तरह पानी लिखना सीख पाएंगे कि उसे पढ़कर पढ़ने वालों की प्यास बुझेगी। इस तरह रोटी लिख पाएंगे कि पढ़ने वालों की उसे पढ़कर भूख मिटेगी। लेकिन यह कल्पना की बातें हैं। रोटी की भूख रोटी के बारे में पढ़कर नहीं, रोटी खाकर ही मिट सकती है। ठीक वैसे ही यात्रा का सुख यात्रा करके ही जाना जा सकता है। सवाल मन में यह भी आता है कि फिर मैं क्यों लिख रही हूँ आखिर। लेकिन जवाब मुझे अच्छे से पता है, यह लिखते हुए मैं उसे जिये हुए को फिर से जी रही हूँ। यह सब मेरे लिए ही, सिर्फ मेरे लिए। कि मैं कैसे लिख पाऊँगी उन बादलों के बारे में जो अब हमारी टैक्सी में आकर हमारे बीच बैठ गए थे, मंडरा रहे थे हमारे ऊपर, हथेलियों में, बालों में, पलकों में। सड़क लगभग दिखनी बंद हो चुकी थी और हम बादलों पर ही चल रहे थे। 

शायद बादलों के इसी खेल को देखने के लिए हमने यह मौसम चुना यहाँ आने का। न सही टूरिस्ट स्पॉट देख पाने का सुख मुझे ये बादलों के खेल देखने से कब फुर्सत। हमने बीच में कुछ जगहों पर रुककर तस्वीरें लीं और यह सोचकर हंस ही दिये कि यह जानते हुए भी हम दस परसेंट भी तसवीरों में नहीं उतार पाएंगे कोशिश करते रहते हैं। एक ब्रेक में हमने भुट्टा और पाइनएप्पल लिए। यह शायद पहाड़ों पर खाने का रिवाज है या कोई और बात यहाँ भुट्टे के स्वाद का अलग ही मजा होता है। 

बिना किसी जल्दबाज़ी के धीरे-धीरे चलते हुए हम आखिर सोहरा पहुँच गए। यहाँ चेरापूंजी के नाम का कोई बोर्ड नहीं है, हर जगह सोहरा है। इसके बारे में कहते हैं कि पहले इस जगह का नाम सोहरा ही था फिर अंग्रेजों ने इसका नाम चेरापूंजी किया, क्यों किया ये तो वही जानें लेकिन फिलहाल मेघालय सरकार ने इसे सोहरा ही घोषित कर दिया है। एक तो ये शहरों के नाम बदलने की राजनीति यह बात क्यों नहीं समझती कि यह बात कितनों की भावनाओं के साथ जुड़ी हुई है। 

खैर, बादलों वाले रास्ते से लगभग उड़ते हुए हम अपने गंतव्य पर पहुँच चुके थे। एक छोटे से गाँव में एक प्यारा सा होमस्टे था हमारा ठीहा। यह होमस्टे कुछ महिलाएं ही चलाती हैं। माँ और बेटी मुख्य तौर पर। यहाँ या तो कपल, सिंगल औरतें लड़कियां या परिवार ही रुक सकते हैं। सिंगल लड़कों या लड़कों के ग्रुप के लिए यह नहीं है। बहरहाल, प्यारी सी मुस्कुराहट के साथ हमारा स्वागत किया गया। कमरा बेहद प्यार से और सलीके से सजाया गया था। बादलों में छुपा हुआ वह घर और उस घर के एक हिस्से में हम। हमने पर्दे हटाये खिड़कियाँ खोलीं और बादलों को कमरे में आने दिया। बादल भी इसी इंतज़ार में थे शायद। जरा सी देर में कमरा बादलों से भर गया। बिटिया मेरी चाय के इंतजाम में लगी थीं और मैं बादलों के संग गुफ्तगू में। 

संग बने रहिए...बादलों का यह खेल तो अभी बस शुरू ही हुआ है। 


Friday, July 3, 2026

I love Shilong


ये शिलांग की सुबह है। इस सुबह में बीते दिन की पूरी धमक है, बीती शाम की सरगोशियां हैं, चमक है। सुबह की सैर पर निकली तो चलती ही गई, मानो शिलांग को अपने कदमों से भी जीना चाहती हूँ। किसी भी शहर की सुबह में उसकी रात की कहानी का पता होता है। बस उस पते का पता पूछने वाले कम ही होते हैं। अपने चलते हुए कदमों और दृश्यों में छुपी शहर की बतकही से मुख़ातिब थी। वही चाय का उठता धुआँ, कुछ घूमने निकले जोड़े, कुछ परिवार, कुछ ब्लॉगर कैमरे की क्लिक्स का महासागर।

कुछ लोग I love Shilong के सामने फोटो खिंचा रहे थे। एक प्रेमी जोड़े की तस्वीर उसके इसरार पर मैंने भी खींची। तभी चिप्स के पैकेट को वहीं फेंककर आगे बढ़ गए अंकल जी अपनी बीवी को डांटते हुए उधर से जाने लगे। ये अभी I Love Shilong के साथ फोटो खिंचवा रहे थे। मैंने अपना माथा पीट लिया। गुस्से से उन्हें घूरना चाहा लेकिन वो अपनी बीवी को किसी बात पर डांटने में व्यस्त थे। पास खड़ी की सोलह सत्रह साल की लड़की ने मेरे चेहरे के भाव पढ़ लिए थे शायद। वो मुझे देखकर मुस्कुराई और उसने खुद जाकर वह पैकेट उठा लिया।

कुछ दूरी आज के दिन के अख़बार के ढेर और कुछ अख़बार खरीदते और खबरों की दुनिया पर गुफ्तगू करते लोग दिखे। अख़बार पर बात करने वालों में ज़्यादातर स्थानीय लोग ही थे और इनमें महिलाएं एक भी नहीं थीं। महिलाएं कब और कहाँ कहाँ नहीं होतीं हैं, इसकी वजह पर नहीं जाऊँगी क्योंकि अगर गई तो बात जरा लंबी ही जाएगी। खैर, अख़बारों के पहले पेज पर जंतर मंतर की और अभिजीत दीपिके की तस्वीरें थीं।

शहर का कुछ पता नहीं था, किसी से पूछना भी नहीं था, गूगल से भी नहीं, तो जिधर भीड़ कम लगे और हरियाली ज्यादा दिखे उधर चल पड़ी। कुछ चर्च, कुछ लाइब्रेरी रास्ते में पड़ते गए। सड़कों की सफाई बराबर हो रही थी। सफाई कर्मचारी रात के निशान सड़कों से मिटा रहे थे। उन्हें अगले दिन के लिए तैयार कर रहे थे। तभी सड़क पर एक पिता और पुत्र पर नज़र पड़ी। पिता सड़क पर झाड़ू लगा रहा था, कूड़ा उठा रहा था और उसका छोटा सा बच्चा शायद डेढ़ या दो साल का होगा, कूड़ा उठाने के लिए थर्माकोल के डिब्बे में प्लास्टिक की खाली बोतल को फंसाकर बनाए गए कूड़ा इकट्ठा करने वाले डब्बे को खेल गाड़ी बनाकर खेलता दिखा। वह बहुत खुश था। खेलगाड़ी को खींचता, उसे गोल गोल घुमाता, उसमें कोई कूड़ा उठाकर रख देता फिर भागने लगता। उस बच्चे की मुस्कुराहट में यह सुबह डूब चुकी है।

फिलहाल मेरी हथेलियों में ख़ुशी का यह सिक्का है। इसे मैं कभी खर्च नहीं करूंगी। दुआ करूंगी कि दुनिया के सारे बच्चे यूं ही खुश हों, लेकिन कूड़ा बीनते हुए नहीं, स्कूल जाते हुए, पढ़ते हुए, खेलते हुए और इस लगभग बर्बाद हो चुकी दुनिया को थोड़ा बेहतर बनाते हुए।

सुबह की सैर में शहर का जो चेहरा दिखा वो रात के चेहरे से फर्क था कई मायनों में। रात में जिस मौज मस्ती की रवानगी थी सुबह में एक पुरसुकून ठहराव था। मैं इन सबहों की तलाश में ही तो निकली हूँ, इस पुरसुकून ठहराव की तलाश में। अपने चेहरे को आसमान की ओर करके लंबी गहरी सांस लेते हुए शहर को जज़्ब करने की कोशिश की। बारिश न जाने कहाँ थी कहाँ नहीं लेकिन ठीक उस वक़्त मेरे गालों पर एक बूंद टप्प से टपकी। कुदरत के ये करिश्मे मुझे बिखेर देते हैं। मैं उस लम्हे में वहीं बिखर गयी थी। वापस लौटते समय याद आया चाय तो पी ही नहीं, हालांकि कई जगह चाय बनती देखी थी शायद इच्छा नहीं रही थी। कमरे पर आकर कुछ देर पड़ी रही।
भीतर एक उत्साह था, आज हम चेरापूंजी जाने वाले हैं जिसे सोहरा भी कहा जाता है। एक गाना याद आया और एक लंबी शरारत भरी मुस्कुराहट चेहरे पर तैर गई, 'आज उनसे पहली मुलाक़ात होगी, फिर आमने सामने बात होगी...'

इसी गमक के साथ हम चेरापूंजी के लिए रवाना हुए। मौसम सुहाना था और सफर का इससे अच्छा सामना क्या होगा कि आपके साथ अच्छा मौसम चल पड़े और और अच्छा और अच्छा होता जाय। हम बादलों की गोद में समाने को बेताब थे....
(जारी...)

Tuesday, June 30, 2026

दिल कह रहा है, तुझसे ये रिश्ता जोड़ लूँ...


रिश्ता तो जुड़ चुका था। हम शिलॉन्ग पहुंच चुके थे। एक दिन में जैसे न जाने कितने दिन जी लिए थे हमने। कोई दिन ऐसे होते हैं कि जी करता है ख़त्म ही न हों। हम ऐसे दिनों को आस से देखते हैं बिना कुछ कहे, और कभी-कभी वो हमारी आँखों की सुन लेते हैं। यह ऐसा सा ही दिन था। और अभी तक ख़त्म नहीं हुआ था। कमरे पर पहुंचे तो चाय की जबर्दस्त तलब लगी, और जब चाय होगी तो पकौड़े तो लाज़िमी हुए। कुछ देर आरामदेह बिस्तर में धँसे हुए ज़िंदगी किसी रील सी घूमने लगी। 

रत्ती भर जीने के लिए कितना ज्यादा मरना पड़ता है। अपनी ही ख़्वाहिशों को पहचानने में एक उम्र गुज़र जाती है। कहाँ जानती कि मुझे धूप के सिक्कों से मोहब्बत है, कहाँ जानती थी मुझे बारिशों का स्वाद बेपनाह पसंद है कि मैं भीगना ही नहीं चाहती बारिशें पी जाना चाहती हूँ, कई बार लगता है बारिश हो जाना चाहती हूँ। कहाँ जानती थी कि खुद को महसूस करने के लिए खुद के साथ कुछ दूरी तय करना कितना ज़रूरी है। पिछले कुछ बरसों की छुटपुट यात्राओं के दौरान पाया कि जिस अंजान सी तलाश में भटक रही थी वो तो ये है। कुदरत से शदीद मोहब्बत। इंसानी मोहब्बत आपका दिल दुखा सकती है लेकिन कुदरत आपको कभी अकेला नहीं छोड़ती। हमेशा साथ चलती है कभी धूप बनकर कभी छाया बनकर। 

स्मृतियों के दरीचे खुले हुए थे जबकि वर्तमान अपनी सोंधी ख़ुशबू लिए सामने खड़ा था। चाय, पकौड़े सामने थे और हम आराम की मुद्रा में बिस्तर से निकले बगैर वहीं खाने की इच्छा से जूझते हुए। आखिर बिटिया ने वहीं बिस्तर पर चाय दी और पकौड़े भी। एक जरा सी ख़्वाहिश कोई बिना कहे समझ ले और पूरी कर दे तो कैसा तो पानी हो जाता है मन। ज़िंदगी भर कितने पकौड़े तले होंगे, कितनी चाय बनाई होगी कोई हिसाब नहीं लेकिन यूं इस सुकून से इस तरह इनका होना कमाल है। सोचो तो, मर्दों के लिए जो सुख रोज का है, जिस पर उनका ध्यान भी नहीं जाता वो हम औरतों को कितनी मेहनत से कमाना पड़ता है। 

पकौड़े अच्छे थे साथ ही लाल चाय भी। खाने के बाद कुछ देर और बिस्तर में दुबक गई तो आलस के एक झोंके ने पीठ सहला दी। सच्ची बड़ा आराम आया। घड़ी ने आठ बजाए तो हम माँ बेटी ने एक दूसरे को देखा और कुछ देर का टाइम खुद के लिए और ले लिया।  कुछ देर बाद उठे तो शरीर और मन दोनों ताजादम हो चुके थे। हम दिन का आखिरी हिस्सा जी भर के जीने के लिए तैयार थे। अब तक यह सर्च की जा चुकी थी कि कहाँ पर कौन सा खाना बेस्ट मिलता है। वैसे,खाना हमारे लिए प्रियोरिटी नहीं था, हमें तो शिलॉग की रात देखनी थी। 

दुकानें धीरे-धीरे बंद हो रही थीं और शहर जाग रहा था। चौक के पास लोग बस टहल रहे थे, घूम रहे थे, बैठे थे खड़े थे। कोई कुछ कर नहीं रहा था, बस वो वहाँ थे। न किसी को कहीं जाना था, न कुछ खरीदना था, न कुछ खाना था। मैंने महसूस किया कि लोग आपस में भी ज्यादा बात नहीं कर रहे हैं। बस वो एक-दूसरे का हाथ थामे साथ हैं। जैसे अपनेपन की कोई ख़ुशबू बिखरी हुई थी। 

हमने भी उस महकती शाम के हवाले खुद कर दिया। इधर से उधर भटकते हुए हमारे कानों में सुरीले गाने भी पड़ रहे थे। अक्सर आसपास संगीत रहता ही है लेकिन जाने क्यों यात्राओं का सुर ऐसा लगता है कि कोई गीत कोई गाना सुनने का खयाल तक नहीं आता। तो यह सुबह से कानों में पड़ा पहल गीत था। इस महकती चहकती सी शाम में यह अच्छा लग रहा था। समझ नहीं आ रहा था कि यह आवाज आ कहाँ से रही है। फिर अचानक नज़र पड़ी, कोई जिनके पास से कई बार गुज़र गए ये तो वही सज्जन गा रहे थे। चूंकि स्पीकर दूर कहीं थे तो शायद इसलिए ध्यान नहीं गया। दूसरे लोग उन्हें घेर के खड़े हों ऐसा भी नहीं था। वो अपनी धुन में बस गा रहे थे। असल में वो अपने संगीत को जी रहे थे। वो दृष्टि बाधित थे लेकिन उनके पास एक नज़र थी खुशी को पहचानने की, सलीका था उसे सेलिब्रेट करने का। कुछ लोग उनके सामने रखे बॉक्स में पैसे भी डाल रहे थे। लेकिन वो सिर्फ गा रहे थे...कुणाल गांजावाला की आवाज़ जिसे शायद भूल ही चुकी थी, उस रात से फिर से साथ हो ली है। पहले से ज्यादा अपनाइयत के साथ। अब उस आवाज़ में और न जाने क्या क्या शामिल हो चुका है...दिल कह रहा है, तुझसे ये रिश्ता जोड़ लूँ, तेरी धड़कनों को छू लूँ... जानती हूँ अब जब भी यह गाना सुनूंगी शिलॉन्ग की वह रात जाग उठेगी। 

घूमते फिरते वहाँ ढेर सारी पान वाली दुकानें दिखीं। हमारे यहाँ जैसी होती हैं वैसी नहीं, थोड़ी अलग। छोटे से स्टूल पर पारंपरिक वेश में बैठी महिलाएं और सामने छोटी सी मेज पर करीने से सजे हुए पान। एक नॉर्थ ईस्ट की कलीग की याद आ गई वो खूब पान खाती थी, वो ताम्बूल बोलती थी। मुझे भी पान खाने का चाव तो  है। खासकर नए शहरों में, क्योंकि हर शहर का मिजाज वहाँ के पान में भी होता है। यहाँ के पान या ताम्बूल का मिजाज अलग था। उस वक़्त तो मैंने पैक कराया था डिनर के बाद जब उसे खोला तो पाया यह तो एकदम अलग है। पान के पत्ते पर लगा हुआ थोड़ा सा चूना और बस। साथ में सुपारी के टुकड़े और कच्चे नारियल की कतरन। सुपारी तो खाई न गई नारियल की कतरन के साथ जरूर खाया थोड़ा सा और बाकी संभाल लिया। जानती थी यह थोड़ा-थोड़ा ही खाया जाएगा। यह लखनऊ या बनारस वाले पान से एकदम अलग था। 

किसी रात का तिलिस्म ऐसा होता है कि न हम चाहते हैं वह बीते न वह बीतती है। देर रात तक इधर से उधर घूमते हुए भूल ही गए थे कि हमें डिनर भी करना है। याद आया तो एक बेहतरीन रेस्तरां में खुद को पाया। एक अच्छा सा दिन, प्यारी सी शाम अच्छे से डिनर के साथ ही पूरा होना डिज़र्व करता है। 

हम उस प्यारे से दिन को पलकों में मूंदकर यह सोचते हुए सो गए कि अगला दिन चेरापूंजी का दिन होगा। मेरा बचपन का अनदेखा ख्वाब जो कल हक़ीक़त बनने वाला था। 

नींद सचमुच अच्छी सी आई थी...

(जारी...)

Wednesday, June 24, 2026

तेरे लिए मौसम मंगाया है...


1998 में रिलीज हुई फिल्म 'सत्या' के एक गाने की यह लाइन कि 'मैंने तेरे लिए मौसम मंगाया है, तेरे लिए रस्ता बिछाया है...' इतनी ज्यादा अच्छी लगती थी कि ऐसा लगता काश कोई यह कहे मुझसे भी। रूमानियत वाले ऐसे ख़्वाबों की जिंदगी ने कायदे से बैंड बजाई और यह समझाया कि अपनी ख़्वाहिशों को किसी के भरोसे मत छोड़ो, खुद पकड़ो उनकी बागडोर और निकल पड़ो बस...

प्रकृति के क़रीब जाकर हमेशा यह महसूस हुआ है कि मेरे मन का वह प्रेमी और कोई नहीं यह क़ुदरत ही है। जब जितना और जैसा मौसम चाहा, भरपूर मिला। धीरे-धीरे ज़िंदगी के रास्ते भी बिछने लगे, वो रास्ते जो मेरे मन की दुनिया में जाते हैं। लेकिन उन रास्तों पर चलने से पहले या उनके मिलने से पहले हमें उन रास्तों की कितनी तलाश है यह जानना भी ज़रूरी है। पानी का पता प्यास से बेहतर कौन जानता है। और जैसा कि पहले भी कह चुकी हूँ, ज़िंदगी के लिए अपनी भूख प्यास को समझते, बूझते हुए जिंदगी ही गुज़र जाती है।

मेघालय मानो गुनगुना रहा था, 'मैंने तेरे लिए मौसम मंगाया है...' और मैं उसकी गुनगुन को सुनकर मुस्कुरा रही थी। बरसती बूंदें हथेलियों से सरकते हुए आत्मा तक पहुँच रही थीं।

रास्ता लंबा था। हमें तो भूख महसूस नहीं हुई लेकिन अब्दुल भाई की भूख ने गाड़ी रोकी। बारिश हल्की हुई। बिना छतरियों के थोड़ी सी वॉक करने के बाद खाने पहुंचे। हालांकि सच में कुछ भी खाने का मन नहीं था। मैंने छाछ और बेटू ने पेपर डोसा मंगाया और हम दोनों चुप होकर बैठ गए। हम दोनों माँ बेटी का सुर एकदम ठीक लग चुका था। यात्रा के दौरान चुप्पी का सुर। शब्द अक्सर सौंदर्य को खंडित करते हैं यह मेरा अनुभव रहा है। हम दोनों की चुप्पी का यह सुर पूरी यात्रा में लगा रहा। हमने बेहद मामूली बातें कीं और ज्यादा महसूस किया। एक दूसरे को भी और मौसम को भी।

कई बार चुपचाप खिड़की के बाहर देखते हुए हमने एक-दूसरे की हथेलियाँ थामीं, कहा कुछ भी नहीं। भाषा की चुनौती आने वाली थी क्योंकि यहाँ की भाषा से हम अनजान थे और हमारी भाषा से यहाँ के लोग। लेकिन पर्यटकों के कारण अब भाषा और भोजन काफी हद तक कॉमन होने लगा है। अङ्ग्रेज़ी और हिन्दी को तोड़-मरोड़ कर काम किया जा सकता है यह सुना था। और सच ही सुना था। 

खाने के बाद बिल देने के वक़्त हम माँ बेटी के भीतर का बचपन जाग उठा। मैंने ऑरेंज कैंडी जिसे बचपन में कंपट कहते थे लेने को हाथ बढ़ाया तो बेटू ने मैजिक पफ की तरफ। कुछ चॉकलेट और चिक्की के छोटे पाउच भी हमने लिए। खाने से ज्यादा इन चीजों को हथेलियों में भरने का सुख था। बचपन में इन्हीं ऑरेंज कैंडी, माफ कीजिये कंपट के लिए भी तो तरसे ही हुए थे हम। जिस भी उम्र में मिले छूटा हुआ जीवन उसे गले से लगा लेना चाहिए। 

एक कंपट मुंह में रखा और स्कूल के बाहर ठेले पर कंपट बेचने वाले भैया की धुंधली तस्वीर कौंध गई, और कौंध गयी 25 पैसे का सिक्का तलाशते हाथ और न मिलने पर मायूस होती आंखें। इसी स्मृति के साथ वो दिल के आकार वाले काँच के ज़ार में रखे केक और क्रीम रोल भी याद आ गए जिन्हें खरीद पाना ख़्वाब ही रहा बस ललचाई नज़र से देखते ही रहे। हंसी आती है यह सोचकर कि अब जब भी क्रीम रोल मिलता है चाव से खाती हूँ, असल में उसे खाते हुए बचपन का छूटा हुआ हिस्सा जीती हूँ। 

अभी बचपन की इन बचपने से भरपूर स्मृतियों के साथ खिलवाड़ चल ही रहा था कि सामने एक विशाल सा हरा समंदर दिखा। हम शिलोंग पहुँच चुके थे। यह शिलोंग का पोलो ग्राउंड था। इतना हरा कि बस आँखें ठहर जाएँ। 
लेकिन इतनी बारिश में कैसे घूमेंगे यहाँ के सवाल के साथ बिटिया ने मेरी तरफ देखा। मैंने हँसते हुए कहा, 'अरे मौसम अपनी बात मानता है, अभी बारिश रुकवाते हैं। ओ सुनो जरा, थोड़ी देर को रुकना तो बरसने से...' ड्रामेबाजी से भरे अंदाज में कहकर मैं खूब हंस पड़ी। बिटिया भी हंस पड़ी। लेकिन कुछ ही देर में सचमुच बारिश रुक गई। और ऐसा पहली बार नहीं हो रहा था जब मौसम मेरे मन के मुताबिक अपने रंग बदल रहा था। अब तो दोस्तों में यह बात मशहूर ही है बल्कि दोस्तों ने ही मशहूर की है कि ये अपने मौसम साथ लिए चलती हैं....बेटू ने भी चिहुँककर कहा, 'आपके मौसम ने आपकी बात मान ली'। हम दोनों खुश-खुश उस हरे समंदर के भीतर डूबने के लिए निकल गए। 

नीले गुलमोहर जिसका बोटिनिकल नाम जेरकेंडा है की छटा देखते ही बन रही थी। अभी बरस कर थमी बूंदों को पत्तियों ने अपनी हथेलियों पर सहेजा हुआ था। घास के मुहाने पर अटकी बूंदें जैसे किसी जौहरी ने अपनी कला का नायाब नमूना बनाते हुए घास के सिरों को हीरे सी बूंदों से जड़ दिया हो। और हीरे की कनी से सजी बूंदों को न कोई गुमान न घास को। हवा का एक झोंका आता और घास इतराते हुए उन हीरे सी बूंदों को ऐसे झटक देती मानो निर्विकार ही हो किसी भी सज्जा से। और यही उस सज्जा का सबसे सुंदर पहलू था। 

हम माँ बेटी तितलियाँ हो गयी थीं। उस हरे समंदर में उड़ती फिर रही थीं। हम मछलियां हो गई थीं, डुबकियाँ लगातीं और गहरे उतर जाने को बेताब। बरसने के बाद का खुला मौसम पूरे ग्राउंड में खिल खिला रहा था। और सबसे सुंदर बात यह थी कि यहाँ लोग कम थे। जो थे वो बेहद इत्मीनान से या तो बैठे हुए थे, या घूम रहे थे। ऐसे सौंदर्य पर खामोशी की संगत हो तो कमाल होता है। इतनी शांति कि अपनी साँसों की आवाज़ सुनाई दे, ऐसी चमक कि अपनी आत्मा का हर हिस्सा चमक उठे। 

ज़िंदगी ने मेरा हाथ थामा और पूछा, 'तुम्हें मुझसे बड़ी शिकायतें थीं न?' मैंने उसके कांधे पर सर रखते हुए कहा, 'तुमसे ही तो प्यार भी है न?' 
हम दोनों मुस्कुरा दिये....मेरी हथेलियों में घास से टूटकर गिरी ओस की बूंदें थीं। हाँ, हथेलियों से जबसे लकीरें झरकर गिर गईं, या मैंने गिरा दीं तबसे हथेलियाँ सूरज की किरणों से, ओस की बूंदों से, फूलों की ख़ुशबू से लबरेज रहती हैं। मैंने अपनी हथेलियों को अपनी दोनों पलकों पर रखा, और पूरे चेहरे को हथेलियों में रख दिया। जैसा दुआ पढ़ने के बाद पलकों पर रखते हैं हथेलियाँ। 

होंठ बुदबुदा रहे थे, शांति हो, प्यार हो, ख़्वाब  हों और ख़्वाबों की ताबीर हो... 

(जारी...)

Tuesday, June 16, 2026

पहली मुलाक़ात का तिलिस्म

गुवाहाटी एयरपोर्ट की सबसे खूबसूरत बात यह लगी कि न कोई ज्यादा भीड़ न आपाधापी। संभवतः हमारी फ्लाइट सुबह की थी इसलिए भी ऐसा हो। एक सुकून, एक ख़ामोशी और तसल्ली सी दिखी। हर एयरपोर्ट की अपनी कुछ अलग सी पहचान होती ही है। और अगर हम पहली बार उस एयरपोर्ट पर होते हैं तो तस्वीरों का मोह भी होना लाज़िम है। एयरपोर्ट पर जो सज्जा थी उसमें असम ज्यादा था या मेघालय यह नहीं पता लेकिन उसमें एक बारीकी और तरतीब थी। 

गुवाहाटी एयरपोर्ट से हमें शिलॉन्ग जाना था। एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही गर्मी से सामना हुआ। ये अपेक्षित तो बिलकुल भी नहीं था। देश की राजनैतिक गर्मी का असर यहाँ के मौसम पर भी पड़ रहा है शायद सोचते हुए हम माँ बेटी कैब के भीतर दुबक गए। सफर की थकान और तेज़ चिलकती धूप का असर था शायद बिटिया तुरंत सो गई और कुछ देर में मैं भी। 

छोटी सी झपकी के बाद आँख खुली तो मौसम बदलने लगा था। 'वेलकम टू मेघालय' का बोर्ड बारिश की फुहारों के बीच ही दिखा। यह हमारा मेघालय में स्वागत था। बरसता भीगता मौसम। ऐसी चिहुँक उठी मन में। मन बावरा हो उठा। फाइनली मैं मेघालय में हूँ। 

उमियम झील : मेघालय आने की योजना में मेरे मन में कोई योजना नहीं थी। मुझे सिर्फ बादल और बारिशों से मिलना था और उनके हाथों में हाथ डालकर घूमते फिरना था। फिर भी योजनाओं की बाढ़ चारों तरफ थी। ये देखना वो देखना। रील्स से लेकर चैट जीपीटी तक सक्रिय थे। साथ ही सक्रिय थे वो लोग जो आकर गए थे। इस सक्रियता से यह हुआ कि मुझे कुछ जगहों के नाम पता चल गए। वहाँ जाऊँगी या नहीं यह पक्का तय नहीं था। लेकिन उमियम झील रास्ते में ही पड़ती थी और पानी वाली सारी जगहों के लिए तो हमेशा हाँ ही होती है। 


हमारे ड्राइवर अब्दुल भाई ने उमियम के सामने से सर्रर्र से गुजरते हुए बताया कि ये है वो झील। मैंने सोचा क्या ऐसे देखते हैं झील। मुझे लोनावला का ब्रिज याद आया हम बस गुजरे उधर से, ठहरकर निगाह भर देखा भी नहीं। वो हुड़क अभी तक फंसी हुई है। 

मैंने अब्दुल भाई से कहा, जरा रुकिए कुछ देर। वो बोले बारिश है मैडम कहाँ जाएंगी। मैंने आप फिकर न करिए, आप बस रुकिए। वो थोड़ा आगे जाकर रुक गए। बिटिया के बैग से दो छतरियाँ निकलीं। हमने छतरियाँ और पैरासीटामॉल सबसे पहले रखे थे। हम जानते थे छतरियाँ ज्यादा देर टिकेंगी नहीं और उसके बाद पैरासीटामाल ही काम आएगी। खैर, अभी तो छतरी ही काम आई। हम दोनों बरसते मौसम में आधे भीगते आधे झूठ-मूठ में खुद को बचाते उमियम के किनारे टहलने लगे। झील पर बारिश होते देख 'समंदर पर बारिश' की याद हो आई। एक ही बारिश के कितने रूप हैं, पहाड़ू पर अलग, जंगल पर अलग, झीलों पर अलग, समंदर पर अलग और सड़कों पर एकदम अलग। मुझे फूलों पर गिरती बारिश की याद भी ताजा हो आई। 



उमियम का विस्तार खूब बड़ा है। ऐसा लग रहा था वो हल्की रिमझिम की चादर ओढ़े कच्ची सी नींद में है। किनारे कुछ लोग छतरियाँ लगाए शायद मछ्ली पकड़ने की फिराक में थे। पल पर से गाडियाँ गुजर रही थीं लेकिन कोई शोर नहीं था। झील के ठीक सामने पहाड़ियों पर बादलों की धमाचौकड़ी मची हुई थी। बावरा मन सब कुछ को पी लेने को आतुर था। सारा सौन्दर्य, सारी छुअन, सारे बादल, सारे पानी। और शायद हम पी भी रहे थे। इसीलिए तो भीतर का सारा कचरा झाड़कर आए थे कि भीतर हर कोने में मौसम की जगह हो। 


हम लगभग पूरी झील का चक्कर काटने की फिराक में थे। उन्हीं रास्तों पर फिर फिर लौटना, फिर फिर दृश्यों को आँखों में समेट लेना जारी था। पूरे रास्ते में उँगलियों की पोरों पर, हथेलियों में बारिश समेटने को बेताब रही। ऐसा लग रहा था हर बूंद मेरी सूखी रूह पर मरहम है। 

बारिशें मुझे हमेशा से बेहिसाब चाहिए थीं...बस उस बेहिसाब होने में बेमौसम की बरसात और किसी का घर तबाह करने वाली बरसात हरगिज़ नहीं थी। 

फ़िलवक्त बूंदों ने लाड़ लड़ाते हुए कहा, मेघालय आई हो, सुखी होकर ही जाओगी। और सुख मेरी देह पर रेंगने लगा था। 

(जारी...)

Friday, June 12, 2026

मैंने सपने में तुम्हें देखा था


मेघालय....मेघों का घर। कब बादलों से प्यार हुआ, कब बारिशों के लिए दीवानगी पैदा हुआ कुछ याद नहीं। याद है तो बस इतना ही ज़िंदगी शुरू ही काफी देर से हुई। आधी ज़िंदगी जी चुकने के बाद ज़िंदगी का एक सिरा हाथ आया और तब खुद से दोस्ती होनी शुरू हुई। अपना अच्छा बुरा दिखना शुरू हुआ। 

बचपन कोई कमाल का नहीं था, लेकिन शायद था भी। कि बचपन के खेल, सखा सहेलियों के नाम पर किताबें ही याद हैं। ओ हेनरी, चेखव, प्रेमचंद शुरुआती लेखक थे जिनसे दोस्ती हुई फिर ये लिस्ट बढ़ती गई। कुछ लेखकों के प्रति दीवानगी बढ़ती गई। इन सबके बीच कॉलेज के किस्से, ज़िंदगी के वो हिस्से जहां उम्र की अठखेलियाँ सांस लेती हैं वो सब गायब रहीं। 

पिछले एक दशक से ज़िंदगी का सिरा थामा और पाया कि ज़िंदगी तो किताबों के बाहर भी बहुत सुंदर है। लेकिन यह सुंदरता लोगों के करीब जाने पर टूटती है और प्र्कृति के क़रीब जाने पर निखरती है।  


देहरादून के मौसम ने मुझे बताया कि मेरे भीतर दीवानगी किन चीजों के लिए है, मेरी तलाश क्या है आख़िर। इस तलाश में मौसम क़रीब आता गया और लोग कम होते गए। अब जो सुख था आँखें डबडबाने के लिए काफी थे। घंटों चुपचाप आसमान देखते हुए महसूस हुआ यह ख़ामोशी मेरी तलाश थी, मुझे पता ही नहीं था। याद आया बचपन में मेहमान घर आने पर कैसी घबराहट होती थी। किसी शादी या दूसरे फङ्क्शन में जाने के नाम पर क्यों आँसू ही आ जाते थे। घर के काम करने, घंटों खाना बनाने ने मुझे लोगों से बात करने से थोड़ा तो बचाया था। 

जगजीत सिंह की गज़लें सुनते हुए पूरे घर का पोछा लगाना फेवरेट काम हुआ करता था। वह शायद मेरे बनने के दिन थे, जो ठीक से बन न सके। वरना भला मुझे कैसे पता न चला कि मुझे मौसम चाहिए, ढेर सारे मौसम। ठंड का कोहरा, बारिशों की बौछारें और तपती गरमियाँ। खुद को पहली बार तलाशा अपनी ही कहानियों में। प्रेम और प्रकृति की उन कहानियों में मुझे जिस कदर सुख मिलता था बताना मुश्किल है। हालांकि उन कहानियों का उपहास भी कम नहीं उड़ाया गया। लेकिन मैं कैसे बताती वो कहानियाँ मेरा जीवन हैं। न लगें किसी को अच्छी न सही, मैं जीना तो नहीं छोड़ सकती न। 

ऐसे ही उलझते बिखरते दिनों में मैंने एक रोज ट्रैवल ब्लॉग देखते हुए मेघालय का ब्लॉग देखा, कनिष्क गुप्ता का। मैं जैसे सुध बुध बिसराने लगी थी। जब भी मन उदास होता मैं उस ब्लॉग को खोल लेती और देखने लगती। देखते देखते ही याद आया कि मेघालय और चेरापूंजी के बारे में जनरल नॉलेज के सवाल के लिए पढ़ाते हुए माँ ने कितनी डांट लगाई थी। सही जवाब न देना डांट खाने कभी कभी मार खाने के लिए भी पर्याप्त वजह होती थी उन दिनों। 


इम्तिहान में शायद मैंने एक नंबर का जवाब गलत किया हो लेकिन ज़िंदगी में चेरापूंजी ठहर चुका था। जैसे अनजाने प्रेमी से प्यार होता है वैसा ही कुछ मेरा रिश्ता चेरापूंजी से बनने लगा। मुझे सपने में बादल आते, मैं उन्हें पकड़ने को हाथ बढ़ाती और दीवार पर टंगी घड़ी 'ऑफिस जाने का टाइम हो गया है 'कहकर आँखें दिखाती। 

क़रीब 5 बरस मैंने मेघालय जाने के सपने को अपनी पलकों में सहेजा है। और आख़िर 2026 का जून महीना उस ख़्वाब की ताबीर लेकर आया। यह यात्रा कई लिहाज से अलहदा थी। यह हम माँ बेटी की पहली यात्रा थी साथ में। इसके पहले हम दोनों लंदन गए थे लेकिन तब सिर्फ जाना और आना ही अकेले था। इस यात्रा की पूरी ज़िम्मेदारी बिटिया रानी ने उठाई थी। मैं एकदम बेफिक्र थी। 

और यह कोई छोटा सुख नहीं था।
(जारी....)