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Friday, December 9, 2022

कोई ख़ुशबू उग रही है


ढेर सारे कचनार खिले देखकर मेरा मन एकदम खिल उठा था. इन दिनों जिस शहर में रहती हूँ वहां कचनार इस तरह नहीं खिलते. वहां बुरांश खिलते हैं. वो भी मुझे पसंद हैं लेकिन जो रिश्ता कचनार से है उसमें एक अलग सी ही खुशबू है. कचनार से रिश्ता कचनार से रिश्ता होने जैसा ही है उसे बुरांश से रिश्ता होने की तरह नहीं सोचा जा सकता. यह सोचते हुए मैंने अपनी हथेलियाँ फूलों से भरी कचनार की डाल के नीचे रख दीं. उन्हें तोड़ने के लिए नहीं, बिना तोड़े उन फूलों से अपनी हथेलियाँ और उनकी खुशबू से अपने जीवन को भर लेने के लिए. मैंने ढेर सारी साँसें लीं. गहरी साँसें. नीचे गिरे एक फूल को उठाया और उसे जूड़े में टांक लिया. ऐसा लगा मैं भी थोड़ी सी कचनार हो गयी हूँ. बस जरा सी. कुछ देर पहले मैं जिन उदासियों के साथ यहाँ आई थी नदी के इस किनारे पर अब वो उदासी कम हो गयी है ऐसा महसूस हुआ.

उदासी से ऐसा रिश्ता है कि वो कम होती है या दूर जाती है तो लगता है वजूद का कोई हिस्सा दूर जा रहा हो. लेकिन वो इस कदर साथ रहती है कि उससे आजिज़ आ जाती हूँ और सोचती हूँ कि यह जाए कहीं तो साँस आये. अरे, कहीं घूम ही आये थोड़ी देर को.

अभी इस पल में कचनार और मैं मिलकर उदासी को तनिक दूर टहलने भेजने में कामयाब हो गए हैं. चाय पीने की इच्छा को मन में ही थामे जब नदी में गिरते सूरज को देख रही थी तो जाने कैसे उस शाम की खिड़की खुल गयी जब हमने साथ में एक रोज डूबते सूरज को देखा था.

‘साथ में’, ‘किसके साथ में’ के बगैर कितना अधूरा लगता है न? यह ‘किसके’ हालाँकि हमेशा अधूरा ही होता है फिर भी.

एक रोज इसी नदी के किनारे नदी में गिरते सूरज के सामने उसने मुझे चूम लिया था. सूरज का तमाम लाल रंग मेरे गालों पर उतर आया था और नदी का सारा पानी मेरी आँखों में. देह काँप उठी थी. बहुत देर तक बल्कि कई दिनों तक समझ नहीं आया कि मुझे अच्छा लगा था या बुरा.

कुछ समय बाद इतना समझ आया कि बुरा तो नहीं लगा था. लेकिन अच्छा लगा था यह समझने में सच में काफी समय लगा. फिर हमारी शामों में नदी का पानी बढ़ने लगा और गालों पर कचनार की रंगत खिलने लगी. एक रोज जब हम यूँ ही नदी के किनारे टहल रहे थे मैंने उससे कहा, ‘कचनार के फूल बारह महीने क्यों नहीं खिलते.’ वो चुप रहा.

और इस तरह एक सुंदर चुप के साथ एक रिश्ता पूरा हुआ.

इतने बरसों बाद कचनार देखते हुए क्या मुझे उस सम्बन्ध की याद आ रही है? वो क्या होता है किसी सम्बन्ध में जो किसी को याद आता है. बहुत बाद में यह बात समझ में आई कि वो होता है अधूरापन.

अधूरापन बहुत खूबसूरत होता है, उसमें असीम संभावनाएं होती हैं, उसमें एक मीठी कसक होती है जो स्मृति के पोखर में रंग बनकर घुल जाती है. हल्का सा कसैलापन भी होता है...कुछ वैसा जैसा सिगरेट पीने के बाद मुंह में घुला रह जाता है.

मुझे उस कसैलेपन से प्यार है यह बात देर में समझ में आई.

हर नए सम्बन्ध में उस कसैलेपन की ख़ुशबू आती है. वो अधूरापन खींचता है जिसमें पूरा होने की आशा छुपी है. यह जानते हुए भी पूर्णता कुछ भी नहीं सिवाय ऊब के हम उसी की तलाश में जाने क्यों भटकते रहते हैं. बदलते मौसम के साथ जब शाखों पर कोंपलें फूटती हैं मुझे लगता है इन शाखों पर कोई अधूरापन उग रहा है, वही कसैली ख़ुशबू जिसकी तलब जीवन को रहती है.

उदासी हर रिश्ते की ऊँगली थामे चलती है कभी पास, कभी दूर. वो जानती है जब दिन और रात का, खुशबू और नदी का यह खेल थमेगा तब उसे ही सहेजना होगा सबकुछ.

मैंने उदासी से नज़रें चुराकर एक कंकड़ी नदी की तरफ उछाल दी थी. कुछ छींटे मुझ तक उड़कर आये. जीवन के कुछ छींटे. उदासी दूर बैठकर मुझे टुकुर-टुकुर देख रही थी. उसके चेहरे पर मुस्कान थी, मेरे भी.

Wednesday, June 8, 2022

कहानी- मन और मना के बीच

- प्रतिभा कटियार

जो दिन उगा था वो कोई और था. जो दिन सामने है वो कोई और है और जो दिन चाहे थे वो कोई और ही दिन थे. वो दिन जाने कहाँ होंगे. अभी तो सामने एक दिन है जिसमें समूचा जीवन बिखरा पड़ा है. अच्छा या बुरा जैसा भी. जस का तस. किसी को उम्मीद नहीं थी कि ऐसा होगा. एकदम से. ज़िन्दगी संभलने का मौका तो देती कम से कम. लेकिन वो ज़िन्दगी है, मनमानी करना उसका प्रिय शगल है.

‘शोभा...शोभा...बाहर आजा बिटिया. खुद को अकेले बंद मत कर. हम सब हैं न. बाहर तो आ. तू अकेली नहीं है शोभा’ माँ शोभा का दरवाजा बड़ी देर से खटखटा रही थीं. कमरे के भीतर शोभा सोफे पर बैठी हुई थी. उसे अपने भीतर एक अलग किस्म की अनुभूति हो रही थी जिसे वो किसी के संग बांटना नहीं चाहती थी. जैसे सदियों से तीखी धूप में नंगे पाँव चलते किसी मुसाफिर को छाँव मिली हो कुछ वैसी सी अनुभूति.

‘माँ मैं ठीक हूँ. तुम जाओ. कुछ देर अकेले रहना चाहती हूँ.’ शोभा कहना चाहती थी लेकिन एक भी शब्द बोलने की इच्छा नहीं हो रही थी उसकी. जैसे कितनी मेहनत करनी पड़ेगी बोलने के लिए. ‘आप चलिए मैं आती हूँ.’ बमुश्किल बोला शोभा ने सिर्फ इसलिए कि दरवाजे पर लगातार पड़ती थप थप बंद हो.

वो आँखें मूंदकर लेट गयी. लेटी रही. गाल भीगते रहे उसके. रेंगते हुए आंसू कानों को छूकर निकले तो उसे गुदगुदी हुई. उसने आंसू पोंछे और मुस्कुराई. हालाँकि आँखें लगातार आंसू उगले जा रही थीं. इन्हें लम्बे समय बाद मानो आज़ादी मिली हो. शोभा अपने भीतर रिक्तता महसूस कर रही थी. एक ऐसी रिक्तता जिसकी उसे जाने कबसे तलाश थी. आंसू दुःख नहीं होते, दुःख की परिणिति होते हैं. कभी-कभी सुख की परिणिति भी होते हैं. इस समय ये दुःख की परिणिति हैं या सुख की पता लगाना मुश्किल है. खुद शोभा समझ नहीं पा रही कि वो उदास है या...?

नीचे उसके पति का पार्थिव शरीर रखा है. अभी कुछ घंटों पहले ही देहांत हुआ है. और ऊपर शोभा दुःख और सुख के बीच कहीं झूल रही है. वैसे उसे इतना अंदाजा तो है कि यह दुःख तो नहीं है. उसने देह पर एक हल्कापन जरूर महसूस किया. जब तक बच्चे नहीं आयेंगे यह मातम यूँ ही घर में पसरा रहेगा. वो इसी पल, इस मातम को उठाकर फेंक देना चाहती थी. घर को अपनी पसंद के लाल फूलों से सजाना चाहती थी. उसका मन हुआ धीमी-धीमी आंच पर देसी घी में देर तक, सुनहरी होने तक सूजी को भूने और उसका हलवा बनाये. उसकी नाक में देसी घी में भुनती हुई सूजी की खुशबू भी आने लगी. वह मन ही मन मुस्कुराई यह सोचकर कितने दिन हुए कुछ मन का खाए, यूँ घर की रसोई लगभग रेस्टोरेंट की तरह चलती है लेकिन उसकी भूमिका ऑर्डर के हिसाब से बनाने भर की ही है. बहुत दिन हुए कुछ मन का खाए. बहुत दिन हुए मन का पहने. बहुत दिन हुए कुछ मन का बोले. सोचते-सोचते शोभा को दुःख वाला रोना आ गया. वो फफक-फफक कर रो पड़ी. बहुत दिन हुए वो हंसी नहीं, बहुत दिन हुए उसने सांस नहीं ली. बहुत दिन हुए कि बहुत दिन हुए ही नहीं.
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सिनेमा की रील की तरह स्मृतियाँ रिवाइंड हो रही थीं. हर बात हू-ब-हू. शोभा ने पहली बार महसूस किया कि स्मृतियाँ रंगहीन नहीं होतीं. उनमें रंग भी होते हैं. ‘उनमें रंग होते हैं’ से ‘उनके रंग होते हैं’ यह बात अलग थी. जैसे जब वह अरुण से पहली बार मिली थी की स्मृति में शोभा की पीली साड़ी, अरुण की सफेद शर्ट और धधकती दोपहर का ताप भी शामिल था. जब वो दोनों हनीमून पर कश्मीर गये थे की स्मृति में पेड़ों से संगीत की तरह झरते सुनहरे चिनार के पत्तों का रंग और शिकारे में अरुण का हथेलियों में भरकर डल झील के फेंके गए पानी की स्मृति का गीलापन शामिल था.

उसे अभी अपने गालों से बहते हुए कान और गले तक पहुंचे गीलेपन में डल झील की स्मृति का गीलापन घुलता नजर आया. तब भी अनुभूति सुख की थी, अब भी. तब अरुण के होने का सुख था और अब...? पता नहीं. इस तब और अब के बीच थे जीवन के 26 बरस. इस तब और अब के बीच थे मनु और अम्बिका. इसी तब और अब के बीच था शोभा का लगातार गुम होते-होते खो जाना.

इन 26 बरसों में कितनी बार जी चाहा अलग हो जाए अरुण से लेकिन नहीं हो सकी. कभी खुद की हिम्मत नहीं हुई, कभी बच्चों का ख्याल आ गया और कभी जमाने का. वैसे ज्यादा खुद की हिम्मत न होना ही मुख्य कारण है जिसे जानने के बाद भी मानने का कभी मन न किया शोभा का. एक और बड़ा कारण था किसी मुक्कमल वजह का न होना. वजह जो मुकम्मल तो हो ही, बड़ी भी हो. जो दूसरों को बाद में पहले खुद को कन्विंस करे. यूँ ही तो कोई शादी से अलग नहीं हो जाता. हालाँकि आसान तो तब भी नहीं होता जब मुक्कम्मल और बड़ी वजहें होती हैं लोगों के पास. यहाँ शोभा के पास तो बहुत छोटी-छोटी सी वजहें थीं बेजार होने की. इतनी छोटी कि उन वजहों के चलते अलग होने के ख़याल पर भी न जाने कितनी बार अपराध बोध ने जकड़ा उसे. हालाँकि उन बेहद छोटी दिखने वाली वजहों ने शोभा को भीतर ही भीतर तोड़ना शुरू कर दिया था. इसी उहापोह में साथ साथ 26 बरस बीत गये जिसमें से साथ लगातार कम होता गया. और वो यही सुनती रही सबसे ‘यू आर सो लकी शोभा, योर हजबैंड इज सो हैंडसम यार. ही इज सो केयरिंग. कितना विनम्र है. कितनी मिठास है उसके बोलने में.’ और तो और कामवाली बाई भी बोलकर जाती, ‘भाभी आप बड़ी किस्मत वाली हो. भैया कित्ते अच्छे हैं.’ हर साल शादी की सालगिरह पर पार्टियाँ होती रहीं फेसबुक पर हैपिली मैरिड कपल की तस्वीरें अपलोड होती रहीं.

शोभा जानती है कि अरुण खराब व्यक्ति नहीं था. असल में वो अच्छा व्यक्ति था. शायद इतना अच्छा कि उसकी अच्छाइयों के साए में दम घुटने लगा था शोभा का. वो अच्छाईयां थीं या अच्छाइयों का ओढ़ा हुआ लबादा जिसकी धीरे-धीरे आदत पड़ जाती है जिसमें चुपके से आकर अहंकार भी शामिल हो जाता है. जो यह लबादा लादे होता है कई बार वो खुद भी नहीं जान पाता. हालाँकि अरुण जानता था लेकिन मानता नहीं था. यह ओढ़ा हुआ जमाने भर से छुप सकता है, पत्नी से नहीं. जैसे-जैसे शोभा उन अच्छा होने, दिखने, बने रहने के अहंकार की परतों को खोलती गयी अरुण से दूर होती गयी.

बच्चे भी माँ को ही गलत समझने लगे क्योंकि माँ के पास कोई मुखौटा नहीं था. लगभग हर बात मान जाने वाले पिता सारी फरमाइशें पूरी करने वाले पिता रोकने-टोकने वाली और दिन भर चिड़- चिड़ करने वाली माँ के मुकाबले ‘कूल’ थे.

किसी से प्यार करने की क्या वजह होती है और प्यार न करने की क्या वजह होती है? जिसके बिना एक सांस भी लेना मुश्किल होता है ऐसा क्या हो जाता है कि उसी की उपस्थिति में सांस लेना मुश्किल हो जाता है. ये होने न होने के बीच का खेल था जिसे न शोभा समझ पाई न अरुण. गलत कोई नहीं था फिर भी सही कुछ न हो सका. हालाँकि दिखता सब सही ही रहा.

शायद आसान होता शोभा के लिए अरुण से अलग होना अगर अरुण एक बुरा व्यक्ति होता. मार पीट करता. कहीं अफेयर चला रहा होता. अशोभनीय व्यवहार करता. शराबी जुआरी होता या भरण पोषण के लायक न होता. लेकिन ऐसा कुछ नहीं था. हालाँकि तब भी कितना आसान होता कहना मुश्किल है. अपने आसपास वो तमाम स्त्रियों को देखती है जो तमाम बड़ी वजहों के उपलब्ध होने के बावजूद रोज अपने आत्मसम्मान की धज्जियां उड़ते देखकर भी मुस्कुराती रहती हैं. इनमें कामकाजी और गृहिणी दोनों ही स्त्रियाँ हैं. शोभा सहनशील तो बिलकुल नहीं थी, न उसकी परवरिश में सबकुछ सहकर भी घर जोड़े रखने वाली सलाहियतें थीं. वह कामकाजी और गृहिणी दोनों ही थी. शादी से पहले नौकरी करती थी शादी के बाद भी कुछ साल नौकरी की फिर अम्बिका के जन्म के समय नौकरी से ब्रेक लिया ‘अपनी मर्जी से’ और वो ब्रेक 21 साल लम्बा हो गया.

‘जैसा तुम्हारा मन हो वैसा करो’ को अरुण जुमले की तरह इस्तेमाल करता था. शुरू-शुरू में शोभा को यह बहुत एक्साइटिंग लगता था लेकिन धीरे-धीरे उसे समझ में आने लगा कि असल में ‘जैसा तुम्हारा मन हो वैसा करो...’ सिर्फ एक जुमला है. इसमें अरुण का मन ही शामिल है. शायद पति का मन ही पत्नी का मन होना चाहिए लेकिन शोभा इसे समझ नहीं सकी. वो अपने मन को भी बचाए रही और अरुण के मन को भी सहेजने का प्रयास करने लगी. लेकिन अरुण ने समझा दिया कि मन तो एक ही रहता है घर में चेहरे जरूर उसके दो होते हैं. शुरू-शुरू में इस बात पर प्यार आया करता था और फिल्मों के तमाम रोमैन्टिक सीन और गाने याद आया करते थे लेकिन धीरे-धीरे इसका दर्द उभरने लगा. शोभा समझ गयी थी कि अरुण के दो चेहरे हैं लेकिन दूसरा चेहरा सिर्फ शोभा को पता था. केयरिंग, लविंग, सॉफ्ट स्पीकिंग के पीछे एक डिक्टेटर का चेहरा. ‘जैसा तुम्हारा मन हो वैसा करो’ के पीछे अपने मन को थोपने वाला चेहरा.

अरुण सबका ख़याल रखने के लिए ही जाना जाता था. ऑफिस, परिवार, दोस्त, मोहल्ले वाले सब उसके केयरिंग होने के मुरीद थे. हर किसी के पास अरुण से मिली किसी मदद का कोई न कोई किस्सा था. फिर शोभा को क्या परेशानी थी? यही बात समझते-समझते 26 बरस बीत गये. वो खुद को अरुण की ज़िन्दगी में किसी कठपुतली जैसा पाती थी. सजी-धजी मुस्कुराती गुड़िया. जिस पर हमेशा इस बात का बोझ था कि कितनी किस्मत वाली है, कितना अच्छा पति मिला है उसे. यूँ कोई परेशानी थी भी नहीं, न किसी चीज़ की कमी थी बस हर वक़्त जैसे किसी सुनहरी जेल में होने जैसा एहसास होने लगा था. अरुण ने शोभा को एटीएम कार्ड दे रखे थे लेकिन उसके नोटिफिकेशन अरुण के पास जाते थे ठीक वैसे ही जैसे उसकी सांस लेने का भी नोटिफिकेशन अरुण के पास जाता हो. वो घबरा जाती कि आज शाम हिसाब में बताना पड़ेगा कि दो ज्यादा साँसे कहाँ खर्च कर दीं.

प्यार का रिश्ता कब डर का रिश्ता बना शोभा भी नहीं जान पायी. जब जानी तो इतना ही कि उसे घुटन होने लगी है. मायके जाओ तो वहां भी अरुण की तारीफों के किस्से. मम्मी तो एकदम फैन थीं अरुण की. उन्होंने कभी नहीं पूछा शोभा तू ठीक है न? हमेशा यही कहा क्या खूब भाग पाया है तूने.
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‘शोभा, शोभा बाहर आ जाओ बिटिया...सब तुझे पूछ रहे हैं. पंडित जी भी आ गए हैं.’ माँ फिर से दरवाजे पर थप थप करने लगी थीं. ‘मैं नहीं आऊंगी माँ.’ शोभा ने थोड़ी दृढ़ता के साथ कहा तो माँ का चौंकना लाज़िमी था. इस चौंकने में गुस्सा भी शामिल था ही. शोभा को तुरंत लग गया उसे कहना चाहिए था ‘नहीं आ पाऊंगी’ दृढ़ता से नहीं निरीहता से. तब शायद वो समझ पातीं. शायद स्पेस भी देतीं. ‘नहीं आऊंगी’ और ‘नहीं आ पाऊंगी’ के बीच पूरा सामाजिक अहंकार बसता है. लोग निरीहता थामने को तैयार बैठे रहते हैं लेकिन स्वाभिमान उन्हें सहन नहीं होता, आत्मविश्वास उनसे झेला नहीं जाता. यूँ तो किसी का भी लेकिन स्त्रियों का खासकर.

माँ भड़क चुकी थीं. पापा को बुला लिया था. ‘दिमाग खराब है इस लड़की का. पति मर गया है और इसे अपनी अलग ही पड़ी है.’ माँ बड़बड़ कर रही थीं. पापा माँ को समझा रहे थे, ‘सदमा लगा होगा उसे. कैसे देखेगी ये सब. समझो उसकी बात को. उसे अकेले छोड़ दो न’ पापा ने समझाने की कोशिश तो की लेकिन वो जानते थे कोशिश को बेकार ही जाना है. ‘छोड़ दो? अरे मैं क्या उसे कुछ करने को कह रही हूँ. बाहर आकर बैठ जाए बस. आने-जाने वाले सब उसे ही पूछ रहे हैं.’ माँ के सामने लोगों का पूछना एक विशाल पहाड़ बना खड़ा था. ‘उनसे कह दो कि सदमे से उसकी तबियत बिगड़ गयी’ पापा ने माँ को सुझाया. माँ को आइडिया ठीक लगा. वो चली गयीं. शोभा ने राहत की सांस ली और पापा को मन ही मन थैंक्यू बोला.
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शोभा को लगा उसके बदन पर जाने कितनी थकान चढ़ी है. वो नहाने चली गयी. उस दिन वो बहुत देर तक नहाती रही. नहाते हुए उसके कानों ने उसे गुनगुनाते हुए सुना. कितने अरसे बाद. कितना मीठा गाती थी वो. अरुण को उसका गाना इतना पसंद था कि जब भी दोस्तों की किसी महफिल में जाते शोभा से गाने को जरूर कहते या घर में कोई पार्टी या गेट टू गेदर हो तो भी. ‘साँसों की माला में सिमरूं मैं पी का नाम.’ शोभा का फेवरेट गाना था. वो गाते-गाते मुस्कुराकर जब अरुण की तरफ देखती तो अरुण के कंधे चौड़े हो जाते. उसमें गुरूर सा आ जाता.

धीरे-धीरे शोभा को लगने लगा कि उसका गाना अरुण के कंधे पर लगे स्टार्स को बढ़ाता है. उसे लगने लगा उसके पास ‘नो’ की कोई स्पेस है ही नहीं. मन नहीं, तबियत ठीक नहीं जैसी बातें महत्वहीन थीं. मनाने के सब तरीके आते थे अरुण को. लाड़, दुलार, रूठना, गुस्सा करना. शोभा का मन इन्हीं के बीच लगातार अपनी स्पेस खोता गया.

शोभा की बागडोर अरुण ने मजबूती से थाम रखी थी. इस बागडोर की जकड़ ऐसी थी कि इसकी जद में ज़िन्दगी का छोटे से छोटा लम्हा आता था. थोड़ी कमी-बेसी की कोई रियायत ही न हो जैसे. एक रोज एक पार्टी से आकर जब अरुण ने गुस्से में कहा, ‘तुम थोड़ा फ्रेश और चियरफुल नहीं लग सकती थीं. कैसी फूहड़ जैसी दिख रही थीं. और कितना खाना था तुम्हारी प्लेट में. कितनी बार बता चुका हूँ डीसेंट लोगों की प्लेट ठुंसी नहीं दिखती पार्टी में. भुख्खड़ की तरह टूट नहीं पड़ते हैं.’ अरुण की ‘बात’ ज्यादा अपमानजनक थी या ‘तरीका’ पता नहीं लेकिन शोभा रो दी थी. ‘मैंने कहा था मुझे मत ले जाओ आज पार्टी में. फीवर था सुबह से कैसे लगती फ्रेश और चियरफुल. और बुखार उतरा था तो मेरा मन कुछ तीखा खाने का हो रहा था भूख भी लगी थी.’ कहते-कहते शोभा जोर से रो पड़ी. ’मैंने सुबह से कुछ नहीं खाया था.’ उसने अरुण की ओर देखते हुए कहा.

‘अरे यार अब रोओ मत. देखो थोड़ी देर की तो बात थी. घर आकर खा लेती. अच्छा नहीं लगता यार. मैं नहीं चाहता कोई तुम्हें रत्ती भर भी कम आंके. मेरी वाइफ बेस्ट है.’ कहते-कहते अरुण का कन्धा तन गया, माथा चौड़ा हो गया. ‘एंड आई लव यू. यू नो दैट’ कहते हुए अरुण ने शोभा को चूम लिया. रोती हुए शोभा मुस्कुरा दी.

शोभा तो क्या दुनिया की कोई स्त्री कभी नहीं समझ पायी कि उसकी दासता की बेड़ियाँ प्यार के नाम पर सबसे ज्यादा कसी गयीं. तारीफें, सुन्दरता, गुणों की नुमाइश. ‘इतना प्यार तो करते हैं इनके लिए कुछ भी’ वाले भाव में निहाल होती स्त्रियों के चेहरे पर अवसाद की काली लकीरें खिंचने लगती हैं उन्हें खुद भी पता नहीं चलता. और एक दिन उन्हें पता चलता है कि प्रेम को भी शस्त्र की तरह इस्तेमाल करते हैं पति. बहुत सारी स्त्रियों को तो ज़िन्दगी भर पता नहीं चलता.
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नहाकर निकली तो देर तक खुद को आईने में देखती रही शोभा. उम्र की कितनी लकीरें उभर आई हैं चेहरे पर, बालों पर. इन लकीरों को आज़ाद छोड़ना सुखद है.

दोस्त, रिश्तेदार, ऑफिस के लोग, पड़ोसी सब जमा हो चुके थे. पूरा हॉल भरा था. यह हादसा इतना अचानक हुआ था कि कोई यक़ीन ही नहीं कर पा रहा था.

हालाँकि हर हादसा अचानक ही तो होता है. अरुण सुबह बाकायदा ऑफिस के लिए निकला. ऑफिस पहुंचकर कुछ फोन किये, एक मीटिंग की, कुछ फाइलें निपटाई. सुरेश को कॉफ़ी के लिए बोला. सुरेश कॉफ़ी लेकर लौटा तो सब खत्म हो चुका था. हॉस्पिटल ले जाया गया लेकिन वहां जो पहुंचा वो अरुण था ही नहीं अरुण की बॉडी थी. इंसान से बॉडी बनने में बस चंद साँसों का फासला ही तो है. पहला हार्ट अटैक था और पहला ही आखिरी हो गया. 51 साल की युवा उम्र में अरुण झटके से चला गया. वो हर काम में नफासत पसंद था और मरा भी नफासत से.

शाम होते-होते बच्चे आ गए तो शोभा कमरे से बाहर निकली. मनु और अम्बिका को गले लगाते हुए शोभा ने महसूस किया उसे बिलकुल रोना ही नहीं आ रहा है. बस फ़िक्र हो रही है कि सब काम निपट जाए जल्दी से. सब लोग चूंकि पहुँच गए थे तो शाम 6 बजे ही क्रियाकर्म के लिए अरुण को ले जाया जाना था. ‘मनु अभी छोटा है’ कहकर शोभा ने अंतिम संस्कार के लिए देवर रवि को कह दिया. जैसे ही शोभा ने रवि को कहा कि ‘तुम ही कर देना सारे काम’, रवि चौंका. उससे ज्यादा चौंकी माँ. शोभा ने महसूस किया कि चौंके तो वहां मौजूद सारे ही लोग हैं सिवाय मनु के. और कौन किससे ज्यादा चौंका यह अंदाजा लगाना फ़िलहाल मुश्किल था. लेकिन सास की भूमिका में माँ उतरी हुई थीं. सासू माँ चुपचाप कोने में बैठी सुबक रही थीं लेकिन माँ ने मोर्चा खोला हुआ था. ‘ऐसा कैसे. ऐसा थोड़े ही होता है. इसी दिन के लिए तो पुत्र होता है. अंतिम विधि तो मनु ही करेगा.’ पापा ने माँ को समझाना चाहा ‘कैसे करेगा वो, छोटा बच्चा है.’ तो माँ के तुणीर से एक-एक कर स्मृतियों के बाण निकलने लगे, ‘मेहता जी की डेथ हुई तो उनका बेटा 12 साल का, उसने ही तो किया था सब काम. और अपने पड़ोसी शर्मा जी जिनकी एक्सीडेंट में डेथ हुई उनका बेटा तो सिर्फ 3 साल का था लेकिन उसी से कराया गया क्रियाकर्म. बेटा होता ही इस दिन के लिए है.’ शोभा की माँ बोले जा रही थीं. मनु नानी की बात सुनकर समझने की कोशिश में नाकाम हो रहा था क्योंकि वो पापा की मृत्यु के सदमे से ही उबर नहीं पा रहा था. हालाँकि सदमा शब्द का अर्थ उसे ठीक-ठीक पता नहीं था. शोभा सोच रही थी ये सच में उसकी माँ हैं, इनकी हरकतें तो माँ वाली लग नहीं रहीं. उनके कहे में मिसेज अग्रवाल भी टपक पड़ीं, ‘अरे भाभी जी, दूर क्या जाना हमारे तो खुद के घर में इनकी बहन के देवर की डेथ हुई तो उसका बेटा गोद में था लेकिन उसी से कराया गया क्रियाकर्म.’ शोभा सबकी बातें सुनते हुए मनु को और अपनी सास को देख रही थी. न सास ने कुछ कहा न मनु ने. दोनों सुबकने के कर्म को जारी रखने की मशक्कत कर रहे थे. जब बीच में सुबकना रुक जाता तो जैसे उन्हें अपराधबोध होता और वो और तेज़ से सुबकने लगते. शोभा को हंसी सी आने लगी. उसने बमुश्किल अपनी हंसी को रोकते हुए माँ की और मिसेज अग्रवाल की बातों को बीच में ही रोकते हुए कहा, ‘किया होगा. लेकिन मेरा बेटा नहीं करेगा.’ शोभा जानती थी यह चर्चा चल गयी तो चलती ही जायेगी.

रवि ने कहा, ‘लेकिन भाभी?’ ‘तुझे भी कोई दिक्कत है क्या?’ शोभा ने रवि को लगभग डपटते हुए कहा. अम्बिका जो यह सब सुन रही थी बोली, ‘मम्मा मैं तो छोटी नहीं हूँ मैं कर सकती हूँ क्या?’ अम्बिका ने सुबकते हुए कहा तो शोभा की देर से सूखी आँखों में बदलियाँ तैर गयीं. वो अब तक मनु को चिपकाये खड़ी थी उसने बढ़कर अम्बिका को बाँहों में भींच लिया. उसने दृढ़ता से कहा, ‘नहीं तेरे रवि चाचा ही करेंगे और अब इसमें कोई बहस नहीं होगी. अगर तेरी दादी को कोई दिक्कत हो तो और बात है.’ उसने सासू माँ की और देखते हुए कहा. सासू माँ ने सर हिलाते हुए मौन में ही जवाब दिया कि उन्हें कोई दिक्कत नहीं. अरुण की माँ की स्वीकृति मिलते ही बात खत्म हो गयी.

इधर अरुण की देह घर से गयी, उधर घर में रुदाली का भूचाल सा आया. शोभा ने देखा वो लोग ज्यादा जोर से रो रहे थे जिन्हें अरुण से ज्यादा कोई निस्बत भी नहीं थी. उसने बच्चों को अपनी बाँहों में कस लिया. 3 साल से हॉस्टल में रह रहा है मनु. पांचवीं के बाद ही भेज दिया था अरुण ने. अम्बिका को भी भेज दिया था. बच्चे पास रहे ही नहीं ज्यादा. मनु को गले लगाते हुए शोभा को जोर का रोना आया. वो रोना पहली बार मनु के हॉस्टल जाने की याद को याद करके आया था. कैसे गैया से बछड़े को अलग किया था अरुण ने. न बच्चा जाना चाहता था, न माँ भेजना चाहती थी लेकिन पापा ने बेस्ट स्कूलिंग के नाम पर भेज दिया बोर्डिंग स्कूल. उसने रोते-रोते ही मन में सोचा अब बच्चों को यहीं अपने पास बुला लेगी.

उसे यह सोचकर ही इतनी राहत हुई कि अगर उसने यह सोचा है तो वो अब कर भी सकती है कोई परमिशन नहीं लेनी किसी की, कोई मना नहीं करेगा अब उसे. मन और मना के बीच का फासला मिट गया सा लगा शोभा को.

Sunday, February 6, 2022

एक प्यारी सी पाती

पाठकीय प्रतिक्रियाओं को मैं सार्वजनिक नहीं करती, उनके नेह में भीग लेती हूँ, दिल में सहेज लेती हूँ. लेकिन कहानी 'बकरियां जात नहीं पूछतीं' कहानी पर मिली यह प्रतिक्रिया चूंकि सार्वजनिक मंच पर मिली तो इसे यहाँ सहेज रही हूँ. दिल प्रेम से भरा है. पाठक ही बताते हैं कि हम लिखने के तौर पर सही रास्ते पर जा भी रहे हैं या नहीं. सुंदर चूंकि शिक्षक भी हैं इसलिए उनकी प्रतिक्रिया और भी महत्वपूर्ण हो जाती है इसलिए कि वो इस कहानी के मर्म के ज्यादा करीब पहुँच पाए. शुक्रिया सुंदर भाई!

Tuesday, October 3, 2017

चोटिल चन्द्रमा चल रहा है- डॉ. स्कंद शुक्‍ल


डॉ. स्कंद  शुक्‍ल को पढ़ना अलग तरह का अनुभव देता है. संवेदना, ज्ञान और जानकारियों का ऐसा सामंजस्य अमूमन कम ही देखने को मिलता है. और भाषाई कौशल तो है ही. यूँ तो वो रुमेटोलॉजिस्ट और इम्यूनोलॉजिस्ट हैं
लेकिन उनकी लेखनी ने उन्हें दिलों का डॉक्टर बना रखा है. उनकी बातों से कई बार मेरी असहमतियां भी होती हैं लेकिन उनके लिखे का आकर्षण असहमतियों का सौन्दर्य बढ़ाता ही है....पाठक होने के अलावा उनसे एक और रिश्ता है मेरा वो है लखनऊ का रिश्ता. आज 
स्कंद  शुक्ल ने अपनी कहानी 'प्रतिभा की दुनिया 'के लिए देकर उन्होंने इस लखनवी रिश्ते को मान दिया है.- प्रतिभा
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ढेला किसी मेढक-सा उस झील की सतह पर उछलता निकल गया था। दो-तीन-चार छलाँगें और गुडुप्प !
"कहाँ तक पहुँचाना है ?" मैंने पूछा था।
"और आगे ?"
"कितना आगे ?"

उसने आँखें उचकायीं मानो किसी तरुण हंसिनी ने अपने पंख फैलाये हों। चेहरे पर उड़ान।

"फेंका गया पत्थर नीचे क्यों आता है, विधु ?"
"क्योंकि धरती उसे खींच लेती है।"
"क्यों खींच लेती है ?"
"क्योंकि उसमें गुरुत्व है।"
"तो तुरन्त क्यों नहीं खींचती ?"
"क्योंकि तुमने उसमें अपने हाथ की ताक़त भरी है। जब तक उसमें तुम्हारी दी ऊर्जा है , वह धरती के ऊपर किसी पक्षी-सा उड़ रहा है। और फिर धीरे-धीरे नीचे-नीचे , और नीचे और धड़ाम।" मैं अपनी मुट्ठी को हथेली पर गिराता हूँ।

"तो सारा मामला खिंचावों के बीच लड़ाई का है। कौन किसे कितना खींच ले जाए।"
"हाँ।"
उसे इतनी छोटी सहमति नहीं चाहिए थी।
"तो अगर किसी कंकड़ को आसमान की सैर करानी हो इस तरह कि वह घर ही न लौटे तो क्या करें ?"
"तो इतनी तेज़ फेंको कि धरती उसे वापस न खींच पाये। वह जाए , जाए , जाए और धरती का एक पूरा चक्कर लगा आए। चाँद की तरह।"
"चाँद धरती का चक्कर लगाता है न। रोज़। लेकिन गिरता नहीं कभी।बस दिखता है। घूमता हुआ। रात को। कभी पूरा , कभी आधा। कभी पतला , कभी मोटा।

चाँद नहीं गिरेगा। क्योंकि वह घूम रहा है धरती के चारों ओर। उसकी माशूक़ा गोल है। वह ख़ुद भी गोल चक्कर लगा रहा है। वह धरती पर गिरता हर दिन है , लेकिन पहुँचता नहीं उस पर। यही विधु-वसुधा की कथा का वर्तुल है। जिसमें गोल देह हैं , गोल रास्ते हैं और कभी न मिलने , केवल देखने की सुखद विडम्बना।"
"सुखद विडम्बना ?"
"हाँ , सुखद विडम्बना। चाँद रुक गया तो वह धरती के गले लग जाएगा। और मर जाएँगे हम-सब। धरती निपूती हो जाएगी।"
वसुधा का ढेला अबकी बार बहुत दूर गया है। दूर , बहुत दूर। पानी को बिना छुए। और फिर ओझल। न जाने कहाँ। तभी वह झील के उस पार के पेड़ों की ओर इशारा करती है।
"वह देखो। मैंने अपने नन्हें मुसाफ़िर को चाँद पर पहुँचा दिया। अब वह कभी नहीं लौटेगा। घूमता रहेगा सदा चारों ओर अपनी धरती के।"

चाँद काले पेड़ों के पार से लुकछिप कर झाँक रहा था। उसकी देह पर एक और नये पत्थर की मार थी...