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Saturday, July 29, 2023

तरला के बहाने

खाना बनाना मुझे खूब पसंद है। शायद बचपन से ही। नयी-नयी रेसिपी बनाना और उसे खिलाकर खाने वाले का मुंह देखना कि कैसी बनी है, अगर अच्छी बनी है सुन लिया तो खुशी से झूम उठना। क्या यह मेरी बात है सिर्फ? नहीं यह लगभग हर स्त्री की, हर लड़की की बात है। अच्छी कुकिंग, घर की साज संभाल, खुद को सुंदर ढंग से प्रस्तुत करना। इनमें सुख की तलाश। यहीं से शुरू, यहीं पर कहानी ख़त्म। 

लेकिन सच्चाई की परत धीरे-धीरे खुलती है। एक रोज मैंने महसूस किया कि मुझे खाना बनाने में खास मजा नहीं आ रहा। आँख खुलते ही किचन में पहुँचना अखरने लगा। उलझन होने लगी। लेकिन क्या इस उलझन का कोई विकल्प था। नहीं। खाना बनाना, घर संभालना तो स्त्री के साथ रक्तमज्जा की तरह चिपका हुआ है। जब तक है जान किचन और घर ही है सारा जहान। 

आप डॉक्टर बन जाएँ, इंजीनियर बन जाएँ, किसी कंपनी की सीईओ बन जाएँ, चाँद पर चली जाएँ किचन तो आपके हवाले है ही, रहेगा ही।  इसका कोई विकल्प नहीं। अगर थोड़ा लिबरल साथी या घरवाले हुए तो कभी जब उनका मन हुआ तो थोड़ा हाथ बंटा दिया। इस हाथ बंटाने का गर्व हाथ बंटाने वाले में तो खूब था ही उन स्त्रियॉं को भी कम न हुआ जिनका हाथ बंटाया गया। उन्होंने गर्व से भरकर कहा, 'मेरे ये तो बहुत अच्छे हैं कभी कभी चाय बना देते हैं मेरे लिए कभी खाना भी बना देते हैं।' मासूम औरतें। 

न जाने कितने सवाल हैं मन में। छोटी-छोटी चीज़ें जिनसे जीवन बनता है। जब मैंने पहली बार कुक रखने की बात रखी तो पूरे परिवार ने ऐसे देखा जैसे कोई गुनाह हो गया हो। 

ख़ैर, मैंने तो गुनाहों की राह पर कदम रख ही दिये थे। सो कुक लग गयी। घर के मर्दों ने ही नहीं स्त्रियों ने भी पुरजोर विरोध किया। हम नहीं खाएँगे कुक के हाथ का खाना से लेकर न जाने क्या-क्या। धीरे-धीरे स्वीकृति मिली। लेकिन हमेशा यह स्वर रहता कि खाने में स्वाद नहीं है। मैं मुस्कुराकर कहती, इस बहाने यह तो याद आया आप लोगों कि अब तक घर की स्त्रियाँ जो बनाती थीं जिस पर ध्यान तक दिये बिना या सिर्फ कमियाँ निकालते हुए खाते रहे असल में उसकी वैल्यू क्या है। 

ये सब क्यों कह रही हूँ मैं अब? क्योंकि अभी-अभी फिल्म 'तरला' देखकर ख़त्म की है। फिल्म पूरा एक जीवन है। खाना जब घर की चारदीवारी से बाहर निकलता है तब क्या होता है। तरला एक सीधी सी हाउस वाइफ है। घर परिवार बच्चा यही उसकी दुनिया है। इस दुनिया के बीच उसके भीतर कुछ करने की इच्छा मध्धम आंच पर पकती रहती है। शादी की दसवीं सालगिरह पर तीन बच्चों और पति के साथ केक काटते हुए, मोमबत्ती जलाते हुए कोई सपना बुझता हुआ उसे महसूस होता है। तरला का पति नलिन एक समझदार और पत्नी को समझने वाला उसका साथ देने वाला व्यक्ति है। फिर भी वो समझ नहीं पाता कि उसकी पत्नी का सपना किस तरह बुझ रहा है। 

फिर अचानक एक रोज ज़िंदगी बदलती है तरला की जब आसपास की स्त्रियाँ उससे खाना बनाना सिखाने का आग्रह करती हैं। क्योंकि एक लड़की ने तरला से सीखी रेसिपी बनाकर अपनी सास को खिलाकर नौकरी करने की अनुमति हासिल कर ली थी। बात अजीब है वही किसी की सहमति के लिए पेट के रास्ते होकर जाने वाली बात। 

तरला कुकिंग सिखाने को ज़िंदगी की खिड़की खोलने के तौर पर देखती है। वो कुकिंग सिखाने से पहले कहती हैं कि अपने सपनों को पकड़कर रखना है। फिल्म आगे बढ़ती है। तरला की कुकिंग क्लासेज चल पड़ती हैं। फिर अवरोध आते हैं और कुकिंग क्लासेज बंद हो जाती हैं। फिर कुक बुक निकाली जाती है जिसके लिए पति नलिन पूरा सहयोग करते हैं। कुक बुक कैसे फ्लॉप से हिट की तरफ जाती है। फिर कुकरी शो की तरफ और कैसे अनजाने ही कहानी में अभिमान की कहानी आ मिलती है। 

पति का सहयोग ठंडा होने लगता है। घर उपेक्षित होने लगता है जिसके ताने तरला को मिलने लगते हैं। माँ, पति, बच्चे सब उसे गिल्ट देने लगते हैं। माँ कहती है, 'तुम जो भी हो उसे बाहर छोड़कर घर आया करो, औरत का पहला काम घर संभालना है।' 

फिल्म कई दरीचे खोलती है जिसमें ढेर सारे नन्हे सवाल जगमगाते हैं। कुकिंग सीखने आने वाली सारी लड़कियां ही हैं। तरला की किताब को पढ़कर प्रोफेशनल उपयोग करने वाला एक लड़का है। 

खाना बनाना सिर्फ स्त्रियों का ही काम क्यों है, घर संभालना कब तक सिर्फ स्त्रियों के मत्थे मढ़ा रहेगा। क्यों बच्चे की बीमारी या घर पर समय पर सब्जी न आने, पर्दे या बेडशीट गंदे होने की ज़िम्मेदारी औरतों के सर मढ़ी जाती रहेगी। 

सारी दुनिया को खाना बनाना सिखाती हो घर में भी खाना बनाया करो। अब कर तो लिया इतना बस भी करो। घर और बच्चों को समय दो। तुम बाहर जो भी झंडे गाड़ो लेकिन घर में तुम बीवी, बहू, माँ ही हो ये कभी मत भूलो और घर की ज़िम्मेदारी संभालो। 

ये सब कितनी उलझन वाली बातें हैं। अब भी। 

तरला दलाल ने किस तरह एक सफर तय किया। किसी मुकाम पर पहुँचीं कहानी यह नहीं है। कहानी मुकाम पर पहुँचना नहीं है, कहानी सपने देखना है, उन्हें मरने न देना है, उन सपनों के लिए एफर्ट करना है। कहानी है कि क्या हम उन्हें सच में जरा भी समझते हैं जिन्हें प्यार करने का दावा करते हैं। 

मैं जानती हूँ 'अरे दो ही रोटी तो बनानी है इसके लिए कुक क्यों रखना' या 'इनकी तो ऐश है कुछ करना ही नहीं। कुक तक तो लगा रखी है' जैसे तानों की बरसात जब तब हो ही जाती है। और ये ताने देने वाली स्त्रियाँ भी कम नहीं हैं। माने खाना न बनाया तो किया ही क्या, और खाना बनाना भी कोई काम है जैसे विरोधाभास के बीच अभी हम नए समय के लिए नयी सोच के लिए तैयार हो रहे हैं। 

जब देख रही यह फिल्म तब नाश्ता बना रही थी और मुस्कुरा रही थी। कुकिंग करना अच्छा या बुरा है की बात नहीं है बात उस च्वाइस की है जो स्त्रियों के पास नहीं है और पुरुषों के पास है।  

तरला के बहाने हमें अपने आसपास को जरा खंगालना चाहिए। 

फिल्म के अंत में तरला के पति की बात असल में पूरे जमाने की बात है जिसे थोड़ा ध्यान से सुनने की जरूरत है। फिल्म अच्छी है, बिना लाउड हुए अपनी बात कहती है और जीवन को कैसे मीठा बनाएँ इसकी रेसिपी बताती है।