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Wednesday, April 7, 2021

चाहे सोने के फ़्रेम में जड़ दो

-कृष्ण बिहारी नूर 

ज़िंदगी से बड़ी सज़ा ही नहीं
और क्या जुर्म है पता ही नहीं

इतने हिस्सों में बट गया हूँ मैं
मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं

ज़िंदगी मौत तेरी मंज़िल है
दूसरा कोई रस्ता ही नहीं

सच घटे या बढ़े तो सच न रहे
झूट की कोई इंतिहा ही नहीं

ज़िंदगी अब बता कहाँ जाएँ
ज़हर बाज़ार में मिला ही नहीं

जिस के कारन फ़साद होते हैं
उस का कोई अता-पता ही नहीं

कैसे अवतार कैसे पैग़मबर
ऐसा लगता है अब ख़ुदा ही नहीं

चाहे सोने के फ़्रेम में जड़ दो
आईना झूट बोलता ही नहीं

अपनी रचनाओं में वो ज़िंदा है
'नूर' संसार से गया ही नहीं.

Wednesday, September 4, 2019

पत्नियाँ और प्रेमिकाएं- एकता नहर

1.
पत्नियां कर रही होती हैं अपडेट
डिजिटल कैमरे से कराए फोटोशूट
प्रेमिकाएं चुपके से सहेज रही होती हैं
प्रेमी के साथ आड़ी-तिरछी तस्वीरें

2.
पत्नियों के लॉकर में होते हैं
बहुमूल्य गहने
प्रेमिकाओं की अलमारी में
अनमोल प्रेम-पत्र

3.
पत्नियाँ मछली हैं, अक्वेरियम की
प्रेमिकाएं चिड़िया हैं, आसमान की
प्रेमिकाएं पालती हैं ख्वाब
प्रेमी के घर की मछली हो जाने का
पत्नियाँ चाहती हैं
प्रेमिकाओं की तरह फिर चिड़िया हो जाना

4.
प्रेमिकाएं भाग जाती हैं घर से
अपने प्रेमी के लिए
पत्नियां चाह कर भी रोक लेती हैं खुद को
अपने पति के लिए

5.
प्रेमिकाएं छिपाती हैं अपने एब
प्रेमी से पत्नी का दर्जा पाने के लिए
पत्नियां सीखती हैं रिझाने के तरीके
पति की प्रेमिका बन जाने के लिए

6.
एक दिन
पत्नी और प्रेमिका रोती हैं गले लगकर
आपस में करती हैं दुलार
एक पुरुष के लिए
वे एक-दूसरे की पूरक बन गयीं

(एकता नाहर पत्रकारिता और लेखन से जुड़ी हैं। उनका एक कविता संग्रह आ चुका है ‘सूली पर समाज’। वे दतिया मध्य प्रदेश से हैं।)

(साभार मेरा रंग)

Thursday, October 25, 2018

कोई हमें सताये क्यों


दिल ही तो है न संग-ओ-ख़ीश्त दर्द से भर न आये क्यों 
रोयेंगे हम हज़ार बार कोई हमें सताये क्यों 

दैर नहीं हरम नहीं दर नहीं आस्ताँ नहीं 
बैठे हैं रहगुज़र पे हम गैर हमें उठाये 

क्यों क़ैद-ए-हयात-ओ-बन्द-ए-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं 
मौत से पहले आदमी ग़म से नजात पाये क्यों 

'ग़ालिब"-ए-ख़स्ता के बग़ैर कौन से काम बन्द हैं 
रोइये ज़ार-ज़ार क्या कीजिये हाय-हाय क्यों.

- ग़ालिब 

Tuesday, July 10, 2018

यही तो है मौसम


जिन्दगी की तमाम आपाधापियों के बीच कोई दोस्त किसी दूर के शहर में होकर भी आपके जीवन की नमी को सहेज देता है, उम्मीद को टूटने से बचा लेता है. इन बॉक्स में कुछ इस तरह खिलती हैं उम्मीदें बिना किसी संवाद के. हमें अभी होना सीखना है कि किसी की जिन्दगी में कैसे हुआ जाता है, कैसे रहा जाता है और किस तरह जिंदगी को मानीखेज बनाया जाता है...

बादलों का नाम न हो,
अम्बर के गाँवों में 
जलता हो जँगल 
खुद अपनी छाँव में 
यही तो है मौसम 

तुम और हम 
बादलों के नग़में गुनगुनाएं 
थोड़ा सा रूमानी हो जाएं
मुश्किल है जीना 
उम्मीद के बिना 
थोड़े से सपने सजाएं 
थोड़ा सा रूमानी हो जाएं 

रास्ता अकेला हो, 
हर तरफ़ अंधेरा हो 
रात भी हो घात की, 
दिन भी लुटेरा हो 
यही तो है मौसम 
आओ तुम और हम 
हम दर्द को बाँसुरी बनाएं 
थोड़ा सा रूमानी हो जाएं...
(फिल्म थोड़ा सा रूमानी हो जायें)

https://www.youtube.com/watch?v=_C6WzQkKbys

Friday, March 17, 2017

ओढ़े हुए तारों की चमकती हुई चादर...


आहट सी कोई आए तो लगता है कि तुम हो
साया कोई लहराए तो लगता है कि तुम हो

जब शाख़ कोई हाथ लगाते ही चमन में
शरमाए लचक जाए तो लगता है कि तुम हो
संदल से महकती हुई पुर-कैफ़ हवा का
झोंका कोई टकराए तो लगता है कि तुम हो

ओढ़े हुए तारों की चमकती हुई चादर
नद्दी कोई बल खाए तो लगता है कि तुम हो

जब रात गए कोई किरन मेरे बराबर
चुप-चाप सी सो जाए तो लगता है कि तुम हो...

- जां निसार अख्तर

Monday, February 6, 2017

मैं तुम से प्यार करता हूँ...



- नाज़िम हिकमत 

घुटनों के बल बैठा 
मैं निहार रहा हूँ धरती,
घास,
कीट-पतंग,
नीले फूलों से लदी छोटी टहनियाँ.
तुम बसन्त की धरती हो, मेरी प्रिया,
मैं तुम्हें निहार रहा हूँ।

पीठ के बल लेटा
मैं देख रहा हूँ आकाश,
पेड़ की डालियाँ,
उड़ान भरते सारस,
एक जागृत सपना.
तुम बसन्त के आकाश की तरह हो, मेरी प्रिया,
मैं तुम्हें देख रहा हूँ।

रात में जलाता हूँ अलाव
छूता हूँ आग,
पानी,
पोशाक,
चाँदी.
तुम सितारों के नीचे जलती आग जैसी हो,
मैं तुम्हें छू रहा हूँ।

मैं काम करता हूँ जनता के बीच
प्यार करता हूँ जनता से,
कार्रवाई से,
विचार से,
संघर्ष से.
तुम एक शख़्सियत हो मेरे संघर्ष में,
मैं तुम से प्यार करता हूँ।

(अंग्रेज़ी से अनुवाद : दिगम्बर)

Friday, January 27, 2017

जब नहीं आए थे तुम...


- अली सरदार जाफरी

जब नहीं आए थे तुम, तब भी तो तुम आए थे
आँख में नूर की और दिल में लहू की सूरत
याद की तरह धड़कते हुए दिल की सूरत

तुम नहीं आए अभी, फिर भी तो तुम आए हो
रात के सीने में महताब के खंज़र की तरह
सुब्‍हो के हाथ में ख़ुर्शीद के सागर की तरह

तुम नहीं आओगे जब, ​फिर भी तो तुम आओगे
ज़ुल्‍फ़ दर ज़ुल्‍फ़ ​बिखर जाएगा, ​फिर रात का रंग
शब–ए–तन्‍हाई में भी लुत्‍फ़–ए–मुलाक़ात का रंग

आओ आने की करें बात, कि तुम आए हो
अब तुम आए हो तो मैं कौन सी शै नज़र करूँ
के मेरे पास सिवा मेहर–ओ–वफ़ा कुछ भी नहीं

एक दिल एक तमन्ना के सिवा कुछ भी नहीं


Wednesday, November 23, 2016

आँखें हँस दीं दिल रोया, यह अच्छी बरसात मिली...



मीना कुमारी एक ऐसा नाम है जो सिर्फ गुज़र नहीं जाता, वो एहसास से चिपक जाता है. उनकी अदायगी, उनके अल्फाज़ और ज़िन्दगी से उनका रिश्ता...कॉलेज के ज़माने में ये नज़्म इस कदर मेरे पीछे पड़ी थी कि इसी में मुब्तिला रहने की बेताबी थी...जैसे कोई नशा हो...हल्का हल्का सा...रगों में घुलता हुआ...घूँट घूँट हलक से उतरता हुआ...दर्द का नशा...मीना आपा ने इस नशे को भरपूर जिया...ज़िन्दगी ने उनके साथ मुरव्वत की ही नहीं और एक रोज़ आज़िज़ आकर उन्होंने ज़िन्दगी से कहा, 'चल जा री जिन्दगी...'

हिंदी कविता ने एक बार मीना आपा का जादू फिर से जगा दिया है...बेहद खूबसूरत है ये अंदाज़ ए बयां...रश्मि अग्रवाल जी ने उन्हें याद करते हुए अपने भीतर ही मानो ज़ज्ब कर लिया हो...बाद मुद्दत फिर से मीना आपा हर वक़्त साथ रहने लगी हैं....दिन हैं कि अब भी टुकड़े टुकड़े ही बीत रहे हैं...शुक्रिया मनीष इस अमानत को इस तरह संजोने के लिए....

- मीना कुमारी 

टुकड़े-टुकड़े दिन बीता, धज्जी-धज्जी रात मिली
जिसका जितना आँचल था, उतनी ही सौगात मिली

रिमझिम-रिमझिम बूँदों में, ज़हर भी है और अमृत भी
आँखें हँस दीं दिल रोया, यह अच्छी बरसात मिली

जब चाहा दिल को समझें, हँसने की आवाज सुनी
जैसे कोई कहता हो, ले फिर तुझको मात मिली

मातें कैसी घातें क्या, चलते रहना आठ पहर
दिल-सा साथी जब पाया, बेचैनी भी साथ मिली

होंठों तक आते आते, जाने कितने रूप भरे
जलती-बुझती आँखों में, सादा सी जो बात मिली


Tuesday, May 17, 2016

जो वैष्‍णव नहीं होंगे शिकार हो जाएंगे ...

-अंशु मालवीय

वैष्णव जन
आखेट पर निकले हैं!
उनके एक हाथ में मोबाइल है
दूसरे में देशी कट्टा
तीसरे में बम
और चौथे में है दुश्‍मनों की लिस्‍ट.

वैष्‍णव जन
आखेट पर निकले हैं!
वे अरण्‍य में अनुशासन लाएंगे
एक वर्दी में मार्च करते
एक किस्म के पेड़ रहेंगे यहां.

वैष्‍णव जन
आखेट पर निकले हैं!
वैष्‍णव जन सांप के गद्दे पर लेटे हैं
लक्ष्‍मी पैर दबा रही हैं उनका
मौक़े पर आंख मूंद लेते हैं ब्रह्मा
कमल पर जो बैठे हैं.

वैष्‍णव जन
आखेट पर निकले हैं!
जो वैष्‍णव नहीं होंगे
शिकार हो जाएंगे ...
देखो क्षीरसागर की तलहटी में
नसरी की लाश सड़ रही है.

Friday, May 6, 2016

बाकी सब कुछ माया हो...



फ़र्ज़ करो हम अहल-इ-वफ़ा हों फ़र्ज़ करो दीवाने हों
फ़र्ज़ करो यह दोनों बातें झूठी हों अफ़साने हों

फ़र्ज़ करो ये जी की बिपदा जी से ज़ोर सुनाई हो
फ़र्ज़ करो अभी और हो इतनी आधी हमने छुपाई हो

फ़र्ज़ करो तुम्हें खुश करने के ढूंढे हमने बहाने हों
फ़र्ज़ करो यह नैन तुम्हारे सुचमुच के मयखाने हों

फ़र्ज़ करो यह रोह है झूठा झूटी प्रीत हमारी हो
फ़र्ज़ करो इस प्रीत के रोग में सांस भी हम पे भारी हो

फ़र्ज़ करो यह जोग बिजोग का हमने ढोंग रचाया हो
फ़र्ज़ करो बस यही हकीकत बाकी सब कुछ माया हो

(इंशा जी का नाम लो बस इश्क सी सांसत होती है...आवाज़ छाया गांगुली की...शाम हमारी, याद तुम्हारी...सब कितना घुलमिल गया है, शाम मुकम्मल सी...जाते हुए रात के आगोश में आहिस्ता आहिस्ता...)

Sunday, March 13, 2016

तो मुझे तुम से कुछ नहीं कहना है...



सर्वेश्वरदयाल सक्सेना




यदि तुम्हारे घर के
एक कमरे में आग लगी हो
तो क्या तुम
दूसरे कमरे में सो सकते हो?
यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में
लाशें सड़ रहीं हों
तो क्या तुम
दूसरे कमरे में प्रार्थना कर सकते हो?
यदि हाँ
तो मुझे तुम से
कुछ नहीं कहना है।

देश कागज पर बना
नक्शा नहीं होता
कि एक हिस्से के फट जाने पर
बाकी हिस्से उसी तरह साबुत बने रहें
और नदियां, पर्वत, शहर, गांव
वैसे ही अपनी-अपनी जगह दिखें
अनमने रहें।
यदि तुम यह नहीं मानते
तो मुझे तुम्हारे साथ
नहीं रहना है।

इस दुनिया में आदमी की जान से बड़ा
कुछ भी नहीं है
न ईश्वर
न ज्ञान
न चुनाव
कागज पर लिखी कोई भी इबारत
फाड़ी जा सकती है
और जमीन की सात परतों के भीतर
गाड़ी जा सकती है।

जो विवेक
खड़ा हो लाशों को टेक
वह अंधा है
जो शासन
चल रहा हो बंदूक की नली से
हत्यारों का धंधा है
यदि तुम यह नहीं मानते
तो मुझे
अब एक क्षण भी
तुम्हें नहीं सहना है।

याद रखो
एक बच्चे की हत्या
एक औरत की मौत
एक आदमी का
गोलियों से चिथड़ा तन
किसी शासन का ही नहीं
सम्पूर्ण राष्ट्र का है पतन।

ऐसा खून बहकर
धरती में जज्ब नहीं होता
आकाश में फहराते झंडों को
काला करता है।
जिस धरती पर
फौजी बूटों के निशान हों
और उन पर
लाशें गिर रही हों
वह धरती
यदि तुम्हारे खून में
आग बन कर नहीं दौड़ती
तो समझ लो
तुम बंजर हो गये हो-
तुम्हें यहां सांस लेने तक का नहीं है अधिकार
तुम्हारे लिए नहीं रहा अब यह संसार।

आखिरी बात
बिल्कुल साफ
किसी हत्यारे को
कभी मत करो माफ
चाहे हो वह तुम्हारा यार
धर्म का ठेकेदार,
चाहे लोकतंत्र का
स्वनामधन्य पहरेदार।



(बना रहे बनारस से साभार )

Tuesday, October 27, 2015

वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ जिसमें न मौका सिसकी का



वो काम भला क्या काम हुआ जिसका बोझा सर पे हो
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ जिसका चर्चा घर पे हो

वो काम भला क्या काम हुआ जिसमे साला दिल रो जाये
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ जो आसानी से हो जाये

वो काम भला क्या काम हुआ जो मजा नहीं दे विह्स्की का
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ जिसमें न मौका सिसकी का

वो काम भला क्या काम हुआ जिसकी न शक्ल इबादत हो
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ जिसकी दरकार इज़ाज़त हो

वो काम भला क्या काम हुआ जो कड़वी घूँट सरीखा हो
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ जिसमे सब कुछ मीठा हो

- पियूष मिश्र


Sunday, April 19, 2015

हमेशा देर कर देता हूं मैं...


हमेशा देर कर देता हूं मैं हर काम करने में
ज़रूरी बात कहनी हो, कोई वादा निभाना हो
उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो
हमेशा देर कर देता हूं मैं...

मदद करनी हो उस की यार की ढाढस बंधाना हो
बहुत ही दूर रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो
हमेशा देर कर देता हूं मैं...

किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो
हक़ीकत और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो
हमेशा देर कर देता हूं मैं...

- मुनीर नियाज़ी 

Friday, January 23, 2015

हम ख़ुदा तुमको बना लेंगे, तुम आओ तो सही



तुमको हम दिल में बसा लेंगे, तुम आओ तो सही
सारी दुनिया से छुपा लेंगे, तुम आओ तो सही

एक वादा करो अब हमसे ना बिछड़ोगे कभी
नाज़ हम सारे उठा लेंगे, तुम आओ तो सही

बेवफा भी हो, सितमगर भी, जफापेशा भी
हम ख़ुदा तुमको बना लेंगे, तुम आओ तो सही

राह तारीक है और दूर है मंजि़ल लेकिन
दर्द की शम्में जला लेंगे, तुम आओ तो सही...

- मुमताज़ मिर्जा

Thursday, November 6, 2014

ये चाँद बीते ज़मानों का आइना होगा...



करोगे याद तो हर बात याद आएगी
गुज़रते वक्त की हर मौज ठहर जाएगी

ये चाँद बीते ज़मानों का आइना होगा
भटकते अब्र में चेहरा कोई बना होगा,
उदास राह कोई दास्ताँ सुनाएगी

बरसता-भीगता मौसम धुआं-धुआं होगा
पिघलती शम्मों पे दिल का मेरे गुमां होगा,
हथेलियों की हिना याद कुछ दिलाएगी

गली के मोड़ पे सूना सा कोई दरवाज़ा
तरसती आँखों से रस्ता किसी का देखेगा,
निगाह दूर तलक जा के लौट आएगी...

-  बशर नवाज़ 

(चाँद पूरणमाशी का, तस्वीर हमारी )

Tuesday, September 30, 2014

और पलको पे उजाले से झुके रहते हैं....


हम ने देखी है उन आखों की महकती खुशबू
हाथ से छूके इसे रिश्तो का इल्जाम ना दो 
सिर्फ एहसास है ये रूह से महसूस करो 
प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम ना दो 

प्यार कोई बोल नहीं, प्यार आवाज नहीं 
एक खामोशी है सुनती है कहा करती है
 न ये बुझती है, न रुकती है, न ठहरी है कही 
नूर की बूँद है, सदियों से बहा करती है 

मुस्कराहट सी खिली रहती है आँखों में कही
और पलको पे उजाले से झुके रहते हैं 
होंठ कुछ कहते नहीं, कापते होठों पे मगर
कितने खामोश से अफसाने रुके रहते हैं...



Wednesday, March 19, 2014

चूंकि मैं ये सवाल उठाता हूँ ....


वे चाँद पर जायेंगे
और उससे भी आगे उन ऊंचाइयों तक
जिन्हें दूरबीनें भी नहीं पकड़ सकतीं

लेकिन ज़मीन पर
आख़िरकार कब कोई भी भूखा नहीं होगा
या किसी से ख़ौफ़ नहीं खायेगा
या कब लोग यहाँ-वहाँ धक्के नहीं खायेंगे
दुत्कारे नहीं जायेंगे
उनके हक़ मारे नहीं जायेंगे?
चूंकि मैं ये सवाल उठाता हूँ
कम्युनिस्ट कहा जाता हूँ

- नाज़िम हिक़मत

Sunday, August 18, 2013

तुमसे ही होती है गुलज़ार जिंदगियां...




प्यार के आँगन में गिरा था जो पहला ख़त
वो तुम्हारा था
ज़ेहन के दरीचों में ज़ज्ब हुई थी जो आवाज
वो तुम्हारी थी
सिरहाने झरती थीं जो शबनमी रातें
वो सौगात तुम्हारी थी
चाँद से दिल लगाना
हवाओं को पहनना कानों में
बांधना ख्वाबों की पाजेब,
उड़ते फिरना आसमान के आखिरी छोर तक
सब सिखाया तुमने
गुलज़ार कहते हैं लोग तुमको

कि तुमसे ही होती है गुलज़ार जिंदगियां
जन्मदिन मुबारक हो गुलज़ार साब!

Wednesday, June 5, 2013

मायूस तो हूं वायदे से तेरे



मायूस तो हूं वायदे से तेरे
कुछ आस नहीं कुछ आस भी है,
मैं अपने ख्यालों के सदके
तू पास नहीं और पास भी है.

दिल ने तो खुशी माँगी थी मगर,
जो तूने दिया अच्छा ही दिया.
जिस गम को तअल्लुक हो तुझसे,
वह रास नहीं और रास भी है.

पलकों पे लरजते अश्कों में,
तसवीर झलकती है तेरी.
दीदार की प्यासी आँखों को, 
अब प्यास नहीं और प्यास भी है.
- साहिर लुधियानवी 
 

Friday, May 31, 2013

रात गुलज़ार के संग काट आयी, बाबुषा


कुछ लोग बड़े सलीके से जिन्दगी की नब्ज को थामते हैं। सहेजते हैं घर के कोने, तरतीब से सजाते हैं ख्वाब पलकों पर. सब कितना दुरुस्त होता है उनकी जिन्दगी में लेकिन एक रोज जिन्दगी उठ के चल देती है और आ ठहरती है कुछ बीहड़, अस्त व्यस्त, बेफिक्र अलमस्त लोगों के दरवाजे पर. कुछ इस तरह जैसे कोई दरगाह पर  ठौर पाता है। जिदंगी को ठेंगे पर रखने वाले लोगों के आँचल में ही जिन्दगी को भी पनाह मिलती है। वो जब जब दर्द से सराबोर होती है तो उँगलियों से लहू रिसता है पन्नों  पर और न जाने कितनी रूहें भीग जाती हैं। कितना सहना पड़ता है न बेसलीका होने के लिये. उसकी दोनों हथेलियों को थामे हुए बैठी हूँ और देख रही हूँ कि बेसलीका सी इस लड़की ने भले ही किचन संभालना न सीखा हो लेकिन किचन से लेकर घर का हर कोना सँभालने वालों को वो किस तरह एक आवाज से संभाले हुए है. कौन कहता है मोहब्बत से पेट नहीं भरता, यहाँ तो रोटी, पानी, दवा, दारू सब मोहब्बत से ही चले जा रहा है, बिंदास चले जा रहा है. आज इस वक़्त उसकी हथेलियों की गर्मी की महसूस करते हुए, उसकी रूह की नमी में डूबते उतराते हुए बड़े बेमन से यही दुआ देती हूँ कि खुदा तेरे दर्द में कोई कमी न रखे।
 आज उसी की एक नज़्म आस पास रेंग रही है. - प्रतिभा 











"नहीं, तुम 'माया' तो नहीं !
उसके कान का बुंदा हो तुम तो, बाबुषा
जो महेंदर की क़मीज़ से लिपटा पड़ा है"
कहते हुए निकल गया सड़कों का मसीहा

रातें जो रात सी नहीं, सुफ़ैद सी हैं
ये धुंध है, कुछ और नहीं, सिगरेट की है
कहता है, फेफड़ों में नहीं भर सका तुम्हें
जलती हो, कोयले वाली कच्ची आग हो जैसे
सो यूँ किया कि साँसों से बाहर किया तुम्हें
जो धुंध पड़ी, क्या गुनाह है, बाबुषा ?

हह !

धूप चढ़ते ही तो बह जाएगा ये नाम मेरा
कार के शीशे पे लिक्खा हुआ यूँ 'बाबुषा'
हाँ, अब जाओ तुम तो ढूँढू अलमारी में
गुमी क़मीज़ जिस पे उलझा है इक बुंदा
सुनो, क़सम है तुम्हे मेरी, यूँ सरे-महफ़िल
तड़प के अब न कभी कहना तुम, 'बाबुषा'