तरह टिकी है.
पहला, “हमसब अपने ही जीवन के सर्कस के बंदर हैं।“
दूसरा, “हमसब सेक्सुअली रिप्रेसएड हैं”
तीसरा है तब आता है जब झूठे केस में फंसे समर (बॉबी देओल) स्वीकार करते हैं कि “मैं उस सीचुएशन
को ठीक से हैंडल नहीं कर पाया”
लेकिन इन तीनों बिन्दुओ में से सिर्फ फिल्म की टैग लाइन “हमसब अपने ही जीवन के सर्कस के बंदर
हैं।“ को ठहरने का मौका दिया गया है. बाकी दोनों को शब्दों में बाँध के हवा में छोड़ दिया गया
है।
“हमसब अपने ही जीवन के सर्कस के बंदर हैं।“ इस संवाद के गहरे अर्थ है। जिसे आप जीवन के
सूत्रवाक्य की तरह, जीवन की जटिलताओं को डिकोड करने में मददगार की तरह और सबसे ज्यादा
कठिन समय में खुद को संभालने के लिए थाम सकते हैं. इस लिहाज से ये महत्वपूर्ण कथन है. बिल्कुल
उसी तरह जैसे “सब किस्मत का खेल है, हमारे हाथ में क्या है?” सबकुछ हाथ से छूट जाने की स्थिति
में ये सूत्र हमे थमा दिया गया है। पीड़ा की असहनीय स्थिति से जीवन में वापिस लौट आने के लिए.
जहाँ कारणों और तर्कों की जगह नहीं बचती. ये कथन भी इस फिल्म में ऐसी ही स्थिति को बयां करता
दिखाया गया है। ऐसी बहुत सी कहानियां, फिल्मे होती हैं जिनमें कोई समाधान या द एंड जैसा नहीं हो
सकता. बंदर भी वही फिल्म है।
फिल्म के दूसरे हिस्से यानि मध्यांतर के बाद की फिल्म सिस्टम की खामियों को दर्शाती है. जेल के
सड़े हुए भयानक माहौल में, दुर्दांत अपराधियों के बीच उस इंसान को रख दिया जाए जिसने अब से पहले
छोटा-मोटा अपराध भी ना किया हो. और जो गलती हुई उसके बारे में जरा- सा भी आभास ना हो कि वो
भी कोई गलती थी. ऐसे में वो निश्चित ही पागलपन का शिकार हो जाएगा है। फिल्म के एक सीन में
समर (बॉबी दयोल ) की बहन वकील के साथ जेल में मिलने आती है।वे उससे सारी जानकारियाँ लेना
चाहते हैं जिससे की केस मजबूत हो सके। लेकिन अकल्पनीय परिस्थितियों का मारा समर सिर्फ रोता है
कुछ भी ठीक से नहीं बता पाता। वकील पूछता है “तुम्हारा भाई बेवकूफ है क्या?” बहन भी, जो भाई की
व्यवहारिक मासूमियत को हमेशा से जानती है बोल देती है “हाँ”. कहानी में यहाँ कुछ मिसिंग सा लगता
है। जिसे उसी कथन “हम सब अपने जीवन.... “ से समझाने की कोशिश की गई सी लगती है. बेहतर
होता की इस बात की कुछ और परतें खोली जातीं.
ऐसा ही दूसरा बिन्दु संवाद के रूप में है जो मेरी नजर में इस कहानी का केन्द्रबिन्दु है “वी आल आर
सेक्सुअली रिप्रेसएड” लेकिन ये डायलॉग परदे पर इतनी सरसरी तौर पर आता और चला जाता है की
समझ में ही नही आता कि दर्शक इससे क्या समझे?, ऐसा क्यों कहा गया? खासकर तब जबकि
निर्देशक अनुराग कश्यप हैं।
भारतीय समाज के लिए ये सिर्फ एक डायलॉग नहीं मानसिक बीमारी है। उस पर थोड़ा तो ठहरना बनता
था। कुछ गांठें खुलती तो समर मेहरोत्रा के भीतर बैठा कन्डीशंड स्त्रीद्वेष ज्यादा खुल कर आता.
हालांकि कि कुछ सीन्स में दिखाने की कोशिश भी की गई है। जैसे - जब वो नई गर्लफ्रेंड के साथ बैठा
है और एक्स गर्लफ्रेंड का मैसेज आते ही बहुत आसानी से, सहजता से झूठ बोलता है की प्रोड्यूसर का
फोन है। फोन पर गर्लफ्रेंड को स्टॉक करना। लेकिन ये सीन इस तरह से नहीं फिल्माए गए हैं की पुरुषों
की मानसिकता पर कोई सवाल उठ सके. ये सीन उसी तरह हैं जैसे कि “ये तो होता ही है”। एक और
अंतरंग क्षणों का सीन है समर कोई सेक्शुअल पोजीशन ट्राई करने को कहता है तो उसकी पार्टनर डर
जाती है “ऐसा करने में तो मेरा दम घुट जाएगा” जैसा की खबरों में है की इस फिल्म पर सेंसर की कैंची
चलने के बाद ही देश में रिलीज की गई। ऐसा लगता है कि सीन को दर्ज होने तक ठहरने नहीं दिया
गया. इस बात को ध्यान में रखते हुए, कह सकते हैं की फिल्म मे समर की जर्नी में उसके व्यक्तिगत
जीवन के हिस्से, खासकर सेक्शुअल बिहेवीयर वाले हिस्सों पर केची शायद ज्यादा चली। क्योंकि जो भी
दृश्य है उतना असर नहीं छोड़ पाते जितना जेल में हो रही मारकाट वाले दृश्य। कुछ इतने वीभत्स हैं कि
उनका असर तुरंत वही झटक देना चाहेंगे या नजरें हटाने पर मजबूर हो सकते हैं। जेल के माध्यम से
सीस्टम की खामियों वाला ये हिस्सा इतना लंबा है कि ऊब होने लगती है। ओटीटी प्लेटफॉर्म के दर्शकों
के लिए खासतौर पे सारे दृश्य देखे हुए से लगते हैं। जेल की क्राइम स्टोरीस ओटीटी के दर्शकों का प्रिय
विषय है।
एक दर्शक के नाते सिर्फ कयास ही लगाया जा सकता है की सेंसर की कैंची के कारण ही ऐसा हुआ
होगा। फिल्म ने देश विदेश में काफी ख्याति अर्जित की है। या फिर लेखक निर्देशक का क्राफ्ट से खेलने
के कारण भी हो सकता है, लगे की हमने तो अपनी बात कही लेकिन दर्शक वही लेकर गया जो उसे
देखना था. यानि फिल्म देख कर आपके साथ जेल की हिंसा ही ज्यादा ठहरती है। जबकि वो कहानी का
एक हिस्सा भर है। यहाँ मुझे बॉबी देओल को इस रोल के लिए चुने जाने पर भी संदेह है. लव मेकिंग
सीन में भी सपाट चेहरा और जेल में घट रहे जीवन से जो भीतर बदलाव हो रहे उसकी कोई झलक चेहरे
पर नहीं दिखती सिर्फ आखिरी सीन में एक दो सेकेंड बस.
सिनेमाहाल तक “बंदर” के पहुँचने का कारण भी फिल्म में बॉबी देओल का होना है. यहाँ ये सवाल भी उठता है कि क्या भारतीय दर्शक हर तरह का सिनेमा देखने के लिए तैयार है? जहाँ उसे स्पूनफीड ना किया जाए बल्कि उसकी समझ और ग्रहण करने की क्षमता पर छोड़ दिया जाए। वो दर्शक जो इन दिनों सिनेमाहाल में दो घंटे बिना मोबाइल में झाँके नहीं रह पाते. वो दर्शक जो बंदर फिल्म में समर से शुरुआत से ही सिमपेथि बना लेता है। झूठा केस है को तुरंत सच मान लेता है। एक सीन में आई प्रतिक्रिया से ज्यादा साफ हो जाता है -- समर के घर को अपना स्पेस समझने वाला सीन या समर पर अपना अधिकार जताने वाले दृश्य देखते हुए हाल में बैठे पुरुष नायिका पर जोर का ठहाका लगाते. लेकिन क्लाइमेक्स में जब समर का व्यवहार थोड़ा और खुलता है, और उसका कनफेशन आता है “मैं उस सीचुएशन को ठीक से हैंडल नहीं कर पाया” (वो भी नेरेटर के वॉयस ओवर के रूप में आता है, सीधे संवाद के रूप में नहीं।) तब दर्शकों (पुरुष) में सन्नाटा छा जाता है वही जो कुछ ही मिनटों पहले ठहाके लगा रहे थे, लगा जैसे ये तो अप्रत्याशित था, जबकि इसके संकेत ऊपर बताए दृश्यों में मिलते हैं अगर कोई अनबायस होकर देखे। फिर जेल में जो उसके साथ घटता है उससे वापिस सिंपथी हो जाती है।
Email -jnanda1006@gmail.com




.jpeg)


.jpeg)
.jpeg)

.jpeg)
.jpeg)








.jpeg)

.jpeg)




.jpeg)



.jpeg)
.jpeg)

.jpeg)








