Monday, September 28, 2026

मुख़्तर सी बात है...

जागी आँखों में कोई ख़्वाब आ गया था। तमाम पहरेदारी, तमाम बाड़ेबंदी के बाद भी। जाने कैसे। जागी आँखों के ख़्वाब सोई आँखों के ख़्वाब से मुख़्तर होता है। नींद में कोई बुरा ख़्वाब देखो तो आँख खुलने पर राहत होती है कि चलो ख़्वाब था, बीत गया। अगर अच्छा ख़्वाब देखो तो जागने पर अच्छा महसूस होता है, चेहरे पर मुस्कुराहट खेलती रहती है। 

जागी आँखों के ख़्वाब अगर चुभने लगें तो वो अपना रंग नहीं बदलते, न तासीर बदलते हैं। फिर वो चुभते ही रहते हैं, सोते जागते। 

सितम्बर महीना जाने कैसी सी फितरत लिए आता है। कुछ जागी आँखों के ख़्वाब सोई आँखों के ख़्वाबों से टकराते फिरते हैं। धरती से लेकर आसमान तक फूलों ही फूल खिले हैं और दिल है कि जाने कैसे वसवसों में गुम है। 

दिल की दिमाग से कभी बनी ही नहीं। इन दिनों दिल, दिमाग और देह की आपस में बनती नहीं। सब अपनी अपनी धुन में हैं। कोई मेरी नहीं सुनता। मैं भी किसी की नहीं सुनती। यूं भी तो चल ही जाता है दुनिया का कारोबार। 

Sunday, September 20, 2026

सितम्बर की सुबह और मदर मैरी

सितम्बर महीने से जाने कैसा रिश्ता है। थोड़ा ख़ुश ख़ुश, थोड़ा उखड़ा-उखड़ा सा। ऐसा लगता है जीवन के सुख का स्वाद सबसे पहले सितम्बर में ही चखा और फिर उन सुखों से विरत होने का अभ्यास भी सितम्बर से ही शुरू हुआ। फिर भी कभी शिकायत वाला रिश्ता नहीं रहा।

सितम्बर के इस तीसरे इतवार की सुबह है। देहरादून के मौसम में सर्दियों के आने का सुर लगना शुरू हो चुका है। हथेलियां एक साथ नरम धूप और हरसिंगार के फूलों से भर उठती हैं। 

खुद से नाराज़ रहती हूँ इन दिनों। उलझी रहती हूँ। जीवन का सुर साधने की कोशिश में बार-बार भटक जाती हूँ। आज सुबह उठी तो बरसों बाद सितार उठाया। सिर्फ उठाने भर के सुख ने दिल को थोड़ी राहत दी। मैंने प्यार से उसे देखा, छुआ, तार मिलाए और मालकोश बजाने की कोशिश की...सिर्फ कोशिश। उस कोशिश भर ने मुझमें थोड़ी ऊर्जा भरी। फिर मैंने अरुंधति रॉय की किताब को उठाया और उसे देर तक देखती रही। इन दिनों पढ़ने का सुर भी बिखरा हुआ है इसलिए हिम्मत नहीं हुई कि एक और किताब शुरू करूँ और अधूरी छोड़ दूँ। 

हाथ में किताब लिए सामने खड़े हरसिंगार को देखती रही। ठहरी हुई सुबह में एक एक-कर झरते हरसिंगार देखना मेरी सुबहों का हासिल होता है। हर हल्के से हवा के झोंके के साथ कुछ फूल शाख से उतरते हैं और ज़मीन चूमने को व्याकुल हो उठते हैं। हवा के झोंके से पास रखी किताब के पन्ने उड़ने लगे। जिस लाइन पर नज़र पड़ी, वो थी...She chose September, that most excellent month, to make her move...

मैं इस किताब को अङ्ग्रेज़ी में पढ़ रही हूँ। और यह इस इतवार की मेहरबानी है कि एक सांस में 4 चैप्टर पढ़ चुकी हूँ। पहले भी इस किताब को शुरू किया था लेकिन तब बीच में अटक गयी थी। उम्मीद है इस बार ऐसा नहीं होगा और इस किताब के बहाने कम से कम पढ़ने की आदत का छूटा हुआ सुर तो लग ही जाएगा। 

Monday, September 14, 2026

प्रतिरोध का उजला स्वर है श्रुति कुशवाहा की कविताओं में


यह बात उन कविताओं की बाबत है जिन्होंने मेरे अनकहे को कहा, बेचैन रातों में साथ बैठकर बातें कीं, उजले दिनों में संग मुस्कुराईं और सवाल पूछने के वक़्त पर सबसे आगे खड़ी नज़र आईं। यह बात उन कविताओं की बाबत है जिन्हें मैंने रसोई में खाना बनाते वक़्त पढ़ा, यात्राओं के दौरान कभी एयरपोर्ट के लाउंज में तो कभी फ्लाइट में और कभी आधी रात को नींद खुलने पर पढ़ा। यह बात उस कविता संग्रह के बारे में है जो न जाने कितने शहरों की यात्राओं में साथ रहा। और देखिये न फिर भी लगभग बरस बीतने को है और मैंने इसके बाबत कुछ लिखा नहीं। ऐसा नहीं कि लिखना चाहा नहीं बस कि लिख सकी नहीं। हमेशा लिखकर लगा कि ठीक से नहीं लिखा, न्याय नहीं कर पा रही हूँ, संग्रह के साथ। अब भी वैसा ही है। सोचती हूँ कि यह मेरी सामर्थ्य का मामला भी तो हो सकता है। अच्छी रचनाएँ आपको ऐसी चुनौती देती हैं। अकसर अच्छी कविता स्तब्ध करती है कि उसे सुनने के बाद आप ताली बजाना भूल जाते हैं। इस संग्रह की कविताएं ऐसी ही हैं, वे पन्नों पर ख़त्म हो जाती हैं लेकिन भीतर चल पड़ती हैं।  वैसे भी कविताओं के प्रभाव को तालियों की गूंज से नहीं, आँखों में उतर आए बादलों से या भिंची हुई मुट्ठियों से ही समझा जा सकता है।

यह सारी बात है श्रुति कुशवाहा के नए कविता संग्रह 'सुख को भी दुख होता है' के बारे में।

इन दिनों लगकर पढ़ना काफी कम हुआ है। मन की स्थिति का दोष है, व्यस्तताओं का दोष है या उन रचनाओं का जिन्हें मैंने पढ़ने के लिए चुना, कहना मुश्किल है। मैं रचनाओं को दोषमुक्त करते हुए अपने मन का ही दोष मानती हूँ क्योंकि घोर व्यस्तताओं में भी खूब पढ़ा ही है। लेकिन इस पूरे विचलन वाले समय में जब पढ़ने का सुर बिखरा हुआ है मैं श्रुति की कविताओं के पास लौटती रही। हर बार इन कविताओं ने अपने भीतर आने दिया।

यह कवि की उस समर्थता की बात है जो अपने पाठक के बिखरे भटके मन को भी सहेज ले, और कहे कि तुम अकेली नहीं हो, मैं भी हूँ तुम्हारे साथ। यही बात कवि अपने समर्पण में लिखती हैं, 'कविता शब्दविलास नहीं, जीवन में उतारने वाली बात है।' जीवन जितना विकट है उसकी तफ़्तीश इन कविताओं में मिलती है। वह साहस मिलता है जहां आवाज़ को रोके जाना असंभव है। प्रतिरोध का स्वर किसी सुर की तरह साधा है कवि ने।

कविता लिखने की तैयारी के लिए स्पष्ट नज़रिया, किसी भी तरह के पूर्वाग्रहों से मुक्ति और साहस प्राथमिक तैयारी है। यह तैयारी संग्रह भरपूर दिखती है। कवि जीवन और समाज के उन हिस्सों को चिन्हित करती हैं जहां स्याह घेरा  जमा होने लगा है, जहां शब्दों की जुगाली के खेल चले रहे हैं और सामाजिक, राजनैतिक दोगलेपन का पाखंड  फलफूल रहा है। जहां मुखौटे बड़े और मजबूत होते जा रहे हैं।

मुझे इस संग्रह की कविताओं ने इसलिए ज्यादा मोहित किया क्योंकि इसमें शैलीगत कोई सनसनाहट की बजाय सादगी की ऐसी तुरपाई दिखती है जो उधड़े मन को सहेज दे।

ये कविताएं आत्मा के उस हिस्से से मुठभेड़ करती हैं जिसे दुनिया समाज और राजनीति के डर से हम सबने थोड़ा चाहे अनचाहे छुपा दिया है या। कविताएं झिंझोड़ती हैं कि उठो और सामना करो। इन कविताओं में सीला मन है, प्रतिरोध है और उजास की लालसा भी है।

चाहूँ तो कितनी ही कविताओं पर कितना कुछ लिख सकती हूँ लेकिन फिलवक़्त कुछ कविताओं का जिक्र भर कर रही हूँ यह समझते हुए भी कि जैसे लिखने वाले की एक यात्रा होती है वैसे ही पढ़ने वाले की भी एक यात्रा होती है। तो यह मेरी पाठकीय यात्रा की बात है।

अक्षरज्ञान से पहले मैंने माँ की ख़ुशबू पहचानी
और पिता की गोद में सुनी
संसार की सबसे सुंदर प्रेम कवितायें
मेरी तुतलाहट के प्रत्यत्तर में उनकी मुस्कान
आज भी मेरी भाषा की सबसे विश्वसनीय कवितायें हैं।
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एक दिन
रात बंद ताले सी न होगी स्त्री के लिए
उसी के पास होगी उसकी सारी चाबियाँ

एक दिन हम मनुष्य होना सीख जाएँगे। 
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सब सुख में पगा था
सब सुख में डूबा
मैंने इस सुख को मोड़कर सहेज लिया
कि अचानक सुख ने उचककर बाहर झाँका
फिर जाने क्या हुआ
मैंने बहुत कोशिश की
लेकिन सुख तब से लगातार रो रहा है

मैं एक बात जान पाई हूँ
सुख को भी दुख होता है।

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छूटना अगर कोई नियम है तो
मैं चाहती हूँ मुझसे ये नियम छूट जाए।
नींद इतनी जरूरी है कि
इसके लिए ईज़ाद हुई दवा
ग्यारह दिन न सोएँ तो हो सकती है मौत
यहाँ आप ‘दिन’ को रात ही समझिएगा
बिलकुल उसी तरह
जैसे कई लोग सरकार को राष्ट्र समझते हैं

सरकार अब नींद को लेकर काफ़ी सजग है
वो सुनिश्चित करती है कि सोई रहे जनता
सोए हुए लोग ख़तरा नहीं होते
इसलिए जगह-जगह खोल दिये हैं लोरी सेंटर
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अब वहाँ दिन का नाम रात है
कोयले का नाम फ़ूल
चीख का नाम संगीत
भूख का नाम रोटी
भय का नाम भक्ति
और तानाशाही का नाम लोकतन्त्र

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इस व्यवस्था में हथियार खिलौने बन गए
दुष्कर्म में तब्दील हुआ प्रेम
घुट्टी में पिलाई जाने लगी अफ़ीम
चीख को अब संगीत का दर्ज़ा मिला
और सबसे खतरनाक अपराधियों को राजनीति में संरक्षण
किसी की मदद करने पर तय हुआ जुर्माना
प्यासे को पानी पिलाना 'रेयर ऑफ द रेयरेस्ट' क्राइम माना गया।
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जितनी एलर्जी मुझे हिन्दू मुसलमान करने वालों से है
उतनी ही स्त्रीद्वेषी लोगों से भी
स्त्री को देवी और स्त्री को जूती समान मानने वाले समान हैं
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आत्महत्याओं की ख़बरों के बीच
तानाशाह सुना रहा है जीवन के उपदेश
लोग तालियाँ बजा रहे हैं।
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उसने प्रेम को हृदय में रखा
मान को ललाट पर
स्त्री का हृदय हमेशा घायल रहा
और जीवन भर दुखता रहा माथा

मानिनी स्त्री को राई भर प्रेम मिला...

ये कुछ कविताओं के अंश भर हैं। पूरे संग्रह की हर कविता कई-कई बार पढ़ने का मन करता है। पूरा संग्रह पढ़ा जाना चाहिए। संग्रह 2025 में राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है।

एक ही गुजारिश है कृपया किताबें खरीदकर पढ़ें।

Friday, September 11, 2026

मौसम का पहला हरसिंगार खिला है


खाली हथेलियों में इन दिनों हरकत होने लगी है। जैसे कुछ रेंगता फिरता हो। देखती हूँ तो कुछ भी नहीं। वहम होगा शायद, हाँ वहम ही होगा। वरना इन लकीरों से खाली हथेलियों का तकदीर से कोई रिश्ता कबका ही टूट चुका है। तकदीर का तो पता नहीं, न जानती हूँ, न मानती ही हूँ लेकिन इन दिनों पैरों की हरकत अच्छी लगती है। बस कि चल पड़ने को बेताब। कोई उदासी, कोई मुश्किल, कोई दुविधा कि बस चल पड़ो, चलते रहो। पैदल चलना खूब बढ़ा है इन दिनों। शायद इसका असर मन पर भी पड़ा है।

मुझे सुधा जी और हरि जी मिले जीवन में। बड़े प्यारे लोग। सवाल न करने वाले लोग, देह की हरारत का पूछ मन का इलाज कर देने वाले लोग। इलाज न भी हो, सब ठीक हो जाएगा, सब ठीक ही है का भरोसा देने वाले लोग। बाज़ार के इस शोर में कोई आपको सुने यह बहुत है, फिर कोई समझ भी ले, और अनकहा भी समझ ले तो यह ख़ास ही तो है। छोटी सी मुलाक़ात हुई थी उनसे, पर असर साथ ही रहता है।

जीवन अपना ही है, मन भी। बस कि कहीं कोई फूल खिलता है और खिल उठती हूँ । कहीं कोई पत्ता झरता है और हथेलियाँ बढ़ा देती हूँ। एक पूरा जीवन जी चुके और शान से शाख़ से झरते उस पत्ते के आगे सजदा करती हूँ।  सीखना चाहती हूँ, हालात कैसे भी हों, खिलना ही है का सबक़। सलीके से झरने का सबक़।

 एक रोज़ चलते-चलते बीच रास्ते में दूब के जंगल के बीच छुपा सा एक नन्हा पौधा दिखा। और उस पर मुस्कुराता प्यारा सा फूल। वो ऐसे खिला था जैसे अपनी सामर्थ्य से ज्यादा खिलने की हुड़क हो उसमें। मैं देर तक वहीं बैठी रही। उसे देखती रही, उसे प्यार करती रही।

यही है जीवन। प्यार। खिलना, खिलखिलाना, झरना वो भी शान से।

खबरों से बचती फिरती हूँ अकसर। हाँ, सच कहा तुमने, कमजोर हूँ मैं। बहुत कमजोर। दुनिया के किसी भी कोने की उदास आँखें भीतर धंस जाती हैं, उनकी उदासी सोने नहीं देती। शायद हथेलियों में वह उदासी ही रेंग रही होगी, कि कुछ ख़बरें गुजर ही जाती हैं नज़रों के सामने से। आँखें मूँदने से हक़ीक़त तो नहीं बदलती।

रात भर नींद में कोई शोर बरपा रहा। कितनी कमजोर है वो इच्छा जो दुनिया के तमाम दुख सोख लेने से महरूम रह जाती है हर बार और अपने डेली रूटीन में उलझ जाती है। सोचती हूँ, मैं अगर इतनी कमजोर हूँ तो ईश्वर कितना कमजोर होगा। उसका तो फुलटाइम काम ही यही है, अन्याय से लोगों को बचाना और वो बेचारा खुद को नहीं बचा पा रहा।

सुबह में रात की उदासियाँ शामिल ही थीं लेकिन खिड़की खोली तो मौसम बदल चुका था। मौसम का पहला हरसिंगार खिला था...नज़र भर देख चुकने के बाद मैंने हरसिंगार के साथ दुआ की सबका दुख झरे, सबकी उम्मीद खिले...आमीन !

 

Tuesday, September 8, 2026

जीवन से बनती नहीं इन दिनों



कई दिनों से दिनों का कुछ पता नहीं। कई रातों से रातें भी लापता सी हैं। जीवन है कि अलसाए बच्चा सा ऊँघता हुआ पीठ पर बड़ा सा बस्ता लादे बिना मन के चला जा रहा है। मैंने खूब तलाशी ली अपनी पिछले दिनों और कुछ न मिला। न खुश होने की वजह कोई, न उदास होने की। न शिकायत किसी से। यूं यह अच्छा ही तो है कि बिना किसी तरह की खरोंच दिये कोई दिन गुज़र जाए, बिना आँखें नम किए कोई शब गुज़र जाए।

यूं खुश होने को कई बातों पर खुश हुआ जा सकता था। और न जाने कितनी ही वजहें थीं फफक फफक के रो लेने की। पर ऐसा कुछ न हुआ। ये किस कदर मुफ़लिसी के दिन हैं, कि साथ चलने को कोई उदासी भी नहीं, छूटने को कोई साथ भी नहीं। किसी ख़्वाब के टूट जाने का डर भी नहीं।

सामने खड़ा हरसिंगार खिलने की तैयारी में है। रातरानी अब भी वैसे ही महकती है। बस कि जीवन में चाय नहीं रही, आसमान से करने को कोई शिकायत नहीं, बारिशों में बहक जाने वाला मन नहीं रहा।  

ऐसा लगता है कोई मर गया है भीतर। वो जो लड़की थी जो खुश होने को मरी जाती थी। वो लड़की जो सड़कों पर नाचती फिरती थी, दरख्तों से लिपटकर गाया करती थी, जो नदियों और झरनों से बतियाया करती थी। वो लड़की अब भी उन सारी जगहों से गुजरती है, लेकिन अब वो खिलखिलाती नहीं। 

जीवन में कुछ न हो तो भी थोड़ी उदासी तो होनी ही चाहिए। ऐसी मुफ़लिसी का क्या करूँ कि जिसमें रोने की एक मुक्कमल वजह भी नहीं। 

यूं यह कमी पूरी करने में सियासतदान पूरे ज़ोरों से लगे हुए हैं, और सियासी हालात मुंह चिढ़ाते हुए कहते हैं, 'किस किस को रोओगी ...।'  

तकिये के नीचे से सूखे हुए मोगरे हटाती हूँ, उन सूखे हुए मोगरों से चिपके कुछ मुरझा चुके ख़्वाबों को भी। 

Friday, August 28, 2026

फिल्म “बंदर” के तीन बंदर ...


-ज्योति नंदा
फिल्म “बंदर” के तीन संवाद फिल्म की आत्मा है। मेरे लिए फिल्म इनहीं तीन बिंदुओं पे “तीन बंदरों’ की
तरह टिकी है.
पहला, “हमसब अपने ही जीवन के सर्कस के बंदर हैं।“
दूसरा, “हमसब सेक्सुअली रिप्रेसएड हैं”
तीसरा है तब आता है जब झूठे केस में फंसे समर (बॉबी देओल) स्वीकार करते हैं कि “मैं उस सीचुएशन
को ठीक से हैंडल नहीं कर पाया”
लेकिन इन तीनों बिन्दुओ में से सिर्फ फिल्म की टैग लाइन “हमसब अपने ही जीवन के सर्कस के बंदर
हैं।“ को ठहरने का मौका दिया गया है. बाकी दोनों को शब्दों में बाँध के हवा में छोड़ दिया गया
है।
“हमसब अपने ही जीवन के सर्कस के बंदर हैं।“ इस संवाद के गहरे अर्थ है। जिसे आप जीवन के
सूत्रवाक्य की तरह, जीवन की जटिलताओं को डिकोड करने में मददगार की तरह और सबसे ज्यादा
कठिन समय में खुद को संभालने के लिए थाम सकते हैं. इस लिहाज से ये महत्वपूर्ण कथन है. बिल्कुल
उसी तरह जैसे “सब किस्मत का खेल है, हमारे हाथ में क्या है?” सबकुछ हाथ से छूट जाने की स्थिति
में ये सूत्र हमे थमा दिया गया है। पीड़ा की असहनीय स्थिति से जीवन में वापिस लौट आने के लिए.

जहाँ कारणों और तर्कों की जगह नहीं बचती. ये कथन भी इस फिल्म में ऐसी ही स्थिति को बयां करता
दिखाया गया है। ऐसी बहुत सी कहानियां, फिल्मे होती हैं जिनमें कोई समाधान या द एंड जैसा नहीं हो
सकता. बंदर भी वही फिल्म है।

फिल्म के दूसरे हिस्से यानि मध्यांतर के बाद की फिल्म सिस्टम की खामियों को दर्शाती है. जेल के
सड़े हुए भयानक माहौल में, दुर्दांत अपराधियों के बीच उस इंसान को रख दिया जाए जिसने अब से पहले
छोटा-मोटा अपराध भी ना किया हो. और जो गलती हुई उसके बारे में जरा- सा भी आभास ना हो कि वो
भी कोई गलती थी. ऐसे में वो निश्चित ही पागलपन का शिकार हो जाएगा है। फिल्म के एक सीन में
समर (बॉबी दयोल ) की बहन वकील के साथ जेल में मिलने आती है।वे उससे सारी जानकारियाँ लेना
चाहते हैं जिससे की केस मजबूत हो सके। लेकिन अकल्पनीय परिस्थितियों का मारा समर सिर्फ रोता है
कुछ भी ठीक से नहीं बता पाता। वकील पूछता है “तुम्हारा भाई बेवकूफ है क्या?” बहन भी, जो भाई की
व्यवहारिक मासूमियत को हमेशा से जानती है बोल देती है “हाँ”. कहानी में यहाँ कुछ मिसिंग सा लगता
है। जिसे उसी कथन “हम सब अपने जीवन.... “ से समझाने की कोशिश की गई सी लगती है. बेहतर
होता की इस बात की कुछ और परतें खोली जातीं.

ऐसा ही दूसरा बिन्दु संवाद के रूप में है जो मेरी नजर में इस कहानी का केन्द्रबिन्दु है “वी आल आर
सेक्सुअली रिप्रेसएड” लेकिन ये डायलॉग परदे पर इतनी सरसरी तौर पर आता और चला जाता है की
समझ में ही नही आता कि दर्शक इससे क्या समझे?, ऐसा क्यों कहा गया? खासकर तब जबकि
निर्देशक अनुराग कश्यप हैं।

भारतीय समाज के लिए ये सिर्फ एक डायलॉग नहीं मानसिक बीमारी है। उस पर थोड़ा तो ठहरना बनता
था। कुछ गांठें खुलती तो समर मेहरोत्रा के भीतर बैठा कन्डीशंड स्त्रीद्वेष ज्यादा खुल कर आता.
हालांकि कि कुछ सीन्स में दिखाने की कोशिश भी की गई है। जैसे - जब वो नई गर्लफ्रेंड के साथ बैठा
है और एक्स गर्लफ्रेंड का मैसेज आते ही बहुत आसानी से, सहजता से झूठ बोलता है की प्रोड्यूसर का
फोन है। फोन पर गर्लफ्रेंड को स्टॉक करना। लेकिन ये सीन इस तरह से नहीं फिल्माए गए हैं की पुरुषों
की मानसिकता पर कोई सवाल उठ सके. ये सीन उसी तरह हैं जैसे कि “ये तो होता ही है”। एक और
अंतरंग क्षणों का सीन है समर कोई सेक्शुअल पोजीशन ट्राई करने को कहता है तो उसकी पार्टनर डर
जाती है “ऐसा करने में तो मेरा दम घुट जाएगा” जैसा की खबरों में है की इस फिल्म पर सेंसर की कैंची
चलने के बाद ही देश में रिलीज की गई। ऐसा लगता है कि सीन को दर्ज होने तक ठहरने नहीं दिया
गया. इस बात को ध्यान में रखते हुए, कह सकते हैं की फिल्म मे समर की जर्नी में उसके व्यक्तिगत
जीवन के हिस्से, खासकर सेक्शुअल बिहेवीयर वाले हिस्सों पर केची शायद ज्यादा चली। क्योंकि जो भी
दृश्य है उतना असर नहीं छोड़ पाते जितना जेल में हो रही मारकाट वाले दृश्य। कुछ इतने वीभत्स हैं कि
उनका असर तुरंत वही झटक देना चाहेंगे या नजरें हटाने पर मजबूर हो सकते हैं। जेल के माध्यम से
सीस्टम की खामियों वाला ये हिस्सा इतना लंबा है कि ऊब होने लगती है। ओटीटी प्लेटफॉर्म के दर्शकों
के लिए खासतौर पे सारे दृश्य देखे हुए से लगते हैं। जेल की क्राइम स्टोरीस ओटीटी के दर्शकों का प्रिय
विषय है।

एक दर्शक के नाते सिर्फ कयास ही लगाया जा सकता है की सेंसर की कैंची के कारण ही ऐसा हुआ
होगा। फिल्म ने देश विदेश में काफी ख्याति अर्जित की है। या फिर लेखक निर्देशक का क्राफ्ट से खेलने
के कारण भी हो सकता है, लगे की हमने तो अपनी बात कही लेकिन दर्शक वही लेकर गया जो उसे
देखना था. यानि फिल्म देख कर आपके साथ जेल की हिंसा ही ज्यादा ठहरती है। जबकि वो कहानी का
एक हिस्सा भर है। यहाँ मुझे बॉबी देओल को इस रोल के लिए चुने जाने पर भी संदेह है. लव मेकिंग
सीन में भी सपाट चेहरा और जेल में घट रहे जीवन से जो भीतर बदलाव हो रहे उसकी कोई झलक चेहरे
पर नहीं दिखती सिर्फ आखिरी सीन में एक दो सेकेंड बस.

सिनेमाहाल तक “बंदर” के पहुँचने का कारण भी फिल्म में बॉबी देओल का होना है. यहाँ ये सवाल भी उठता है कि क्या भारतीय दर्शक हर तरह का सिनेमा देखने के लिए तैयार है? जहाँ उसे स्पूनफीड ना किया जाए बल्कि उसकी समझ और ग्रहण करने की क्षमता पर छोड़ दिया जाए। वो दर्शक जो इन दिनों सिनेमाहाल में दो घंटे बिना मोबाइल में झाँके नहीं रह पाते. वो दर्शक जो बंदर फिल्म में समर से शुरुआत से ही सिमपेथि बना लेता है। झूठा केस है को तुरंत सच मान लेता है। एक सीन में आई प्रतिक्रिया से ज्यादा साफ हो जाता है -- समर के घर को अपना स्पेस समझने वाला सीन या समर पर अपना अधिकार जताने वाले दृश्य देखते हुए हाल में बैठे पुरुष नायिका पर जोर का ठहाका लगाते. लेकिन क्लाइमेक्स में जब समर का व्यवहार थोड़ा और खुलता है, और उसका कनफेशन आता है “मैं उस सीचुएशन को ठीक से हैंडल नहीं कर पाया” (वो भी नेरेटर के वॉयस ओवर के रूप में आता है, सीधे संवाद के रूप में नहीं।) तब दर्शकों (पुरुष) में सन्नाटा छा जाता है वही जो कुछ ही मिनटों पहले ठहाके लगा रहे थे, लगा जैसे ये तो अप्रत्याशित था, जबकि इसके संकेत ऊपर बताए दृश्यों में मिलते हैं अगर कोई अनबायस होकर देखे। फिर जेल में जो उसके साथ घटता है उससे वापिस सिंपथी हो जाती है। 

शायद इसीलिए निर्देशक को स्टेटमेंट देना पड़ता है “ये फिल्म “एंटी मी टू” नहीं है. इस दौर के राजनीतिक समाजिक उथल-पुथल भरे माहौल में सिनेमा भी अन्य अभिव्यक्तियों की तरह अछूता नहीं है। बहुत से लेखक निर्देशक “ऐसा ही होता है” को कटघरे में खडा करने का साहस कर रहे हैं। जिनमें क्राफ्ट और कंटेन्ट में कौन ज्यादा महत्वपूर्ण है कि बहस भी लगातार जारी है. कुछ हफ्तों पहले फिल्म “माँ- बहन” आई थी. इसके क्राफ्ट पर सवाल उठाने वालों में भी इस बात पर एक राय थी कि फिल्म अपनी बात अच्छी तरह से कहने में सफल रही. फिल्म “बंदर” के बारे में ऐसा पूरे कान्फ़िडेन्स से नहीं कह सकते. इसलिए भी फिल्म देखी जानी जरूरी ही ताकि आप अपनी राय खुद बना सकें.

ज्योति नन्दा फिल्मों पर अपनी काफी स्पष्ट और बेबाक राय रखती हैं। फिल्में देखना, उनका विश्लेषण करना उन्हें पसंद है। वे कहानियां लिखती हैं, स्क्रिप्ट लिखती हैं, कुछ शॉर्ट फिल्मों का उन्होंने निर्माण भी किया है। थियेटर उनका प्यार है, कुछ महत्वपूर्ण नाटकों में उनकी भूमिकायें काफी सराही गई हैं। 

Email -jnanda1006@gmail.com

Tuesday, August 18, 2026

कबिरा सोई पीर है- हमारे समाज का आईना


नवीन जोशी- 
सघन संवेदनाओं और सामाजिक-राजनैतिक चेतना से सम्पन्न प्रतिभा कटियार कविताओं के अलावा कहानियां भी लिखती रही हैं। रूसी कवि मारीना त्स्वेतायेवा की जीवनी 'मारीना' में कविता एवं कवि-मन की उनकी समझ के साथ उनके गद्य ने भी ध्यान खींचा था। पिछले वर्ष प्रकाशित उनका पहला उपन्यास 'कबिरा सोई पीर है' भी प्रकाशन के बाद से चर्चा में है।

भारतीय समाज में गहरे पैठी वर्णाश्रमी संरचना और उससे उपजी मारक स्थितियां एवं अंतर्विरोध इस उपन्यास का केंद्रीय विषय हैं। घर-परिवार और समाज में स्त्रियों की स्थिति, पुरुष सत्ता द्वारा उनका दमन और क्रमश: उभरती स्त्री चेतना केंद्रीय विषय में गुंथे हुए हैं। प्रेम उनका प्रिय विषय है, इसलिए प्रेम कथा में इस सबको खूबसूरती से पिरोया गया है।

प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी कराने वाले एक कोचिंग संस्थान से कथा शुरू होती है। शुरूआती पृष्ठों में ही 'साला चमार कहीं का। आकर बैठ गया है सर पर', 'ब्राह्मण होकर आरक्षण का पक्ष ले रहा है तू? एक दिन यही आरक्षण तेरे सामने खड़ा होगा भूत की तरह', और 'मैं हर लड़की के, हर स्त्री के सम्मान के लिए लड़ता हूं, लड़ूंगा' जैसे वाक्यों से पाठक का सामना होता है और संकेत मिल जाता है कि यह कैसी लड़ाई का मैदान है।

समवय लड़के-लड़कियों में निश्छल दोस्ती, प्रेम, ईर्ष्या, झगड़े सब स्वाभाविक हैं। गरीब परिवारों में कोचिंग जाते बच्चे बेहतर भविष्य का सपना हैं। सपनों के अलग-अलग धरातल हैं। कोई परिवार ब्राह्मण है और कोई दलित। गरीबी बराबरी का मंच नहीं है। जाति की ऊंच-नीच उसे घोर असमान बनाती है।

प्रेम ऐसे बंधन नहीं देखता। वह असमान मंच पर पेंगें मारता झूलता रहता है। शुरू-शुरू में जो झटके आसानी से झेल जाता है प्रेम, वही खुरदुरी जमीन पर पैर रखते ही कभी जातीय ठोकर खाता है और कभी पुरुष के दम्भ की। कोचिंग सेंटर से शुरू हुआ दलित तृप्ति और ब्राह्मण अभुनव का प्रेम इसी नियति को प्राप्त होता है। 'हर लड़की का सम्मान करता हूं' कहने वाला अनुभव अपने भीतर भरे पाखण्ड को स्वीकार तो करता है लेकिन पितृसत्ता का चोला नहीं फेंक पाता। उसका प्रेम इसी बात से सूख जाता है कि तृप्ति आईएएस परीक्षा में पास हो गई लेकिन वह रह गया।

कथा सुखांत नहीं है लेकिन प्रेम में अपने प्रेमी से अधिक एक पुरुष से छली गई तृप्ति स्वाभिमान के मोर्चे पर मजबूत होती है। तमाम जिल्लत से मुक्त होने के लिए उसके पिता ने आत्महत्या का जो रास्ता चुना, वह तृप्ति का भी रास्ता बंद कर गया था लेकिन तृप्ति फिर खड़ी होती है। उसका फिर से संकल्पबद्ध होना, अफसर बन गए अनुभव के साथ संयोगवश हो गई भेंट के प्रतिरोध में ही जैसे सम्भव होता है। पुरुष दम्भ से वह ताकत ग्रहण करती है और आंसू पोछकर अगले समर के लिए कमर कसती है। यह उपन्यास का सबसे मजबूत पक्ष है।

कथा तृप्ति और अनुभव के प्रेम के इर्द-गिर्द एकरेखीय नहीं रहती। तृप्ति की बहन सीमा के वैवाहिक जीवन की भयावह स्थितियां स्त्रियों के व्यापक दर्द को स्वर देती हैं, जिसमें पत्नी से बलात्कार का विमर्श भी शामिल है। उसके भाई अंशुल की कहानी और अनुभव के पिता के दफ्तर के हालात जातीय नफरत और राजनीति के विरोधाभासों की पोल खोलते हैं। सुधांशु और कनिका का प्रेम और पारिवारिक द्वंद्व भी हमारे ही समाज का आईना है। इस तरह उपन्यास व्यापक संदर्भ और फलक ग्रहण करता है।

प्रतिभा का कवि पूरे उपन्यास पर छाया हुआ है- बीच-बीच में प्रयुक्त किए गए कवितांश, अध्यायों के शीर्षक और प्रत्येक किस्से की शुरूआत और अंत में दी गई शायरी इसका प्रमाण है। भाषा जरूर 'थोड़ा सा रोमानी हो जाएं' वाली छूट लेती है, जिसमें पहाड़ और नदी को भी साथ ले लिया गया है।

बढ़िया उपन्यास है और खूब पठनीय। प्रतिभा से भविष्य में और अच्छे उपन्यासों की उम्मीद बंधती है।
 
15 अगस्त 2026, लखनऊ।
(उपन्यास- कबिरा सोई पीर है', रचना- प्रतिभा कटियार, प्रकाशक- लोकभारती, प्रयागराज।)

Monday, August 10, 2026

मसूरी घुमक्कड़ी : इस बारिश में


उदास आँखों को उस रोज़ धुंध से भरी एक सड़क पर रख दिया था। वही सड़क जिसे दूर से टुकुर-टुकुर देखा करती थी। वही सड़क जो अक्सर ख़्वाबों में आती थी और हाथ पकड़कर उठाकर ले जाती थी।

आखिर एक रोज़ धुंध से भरी उस सड़क पर पाँव रख दिये। ख़्वाब में दिखने वाली सड़क पर जब हक़ीक़त में पाँव रखे तो जैसे दिल के सीले कोनों को तनिक रोशनी मिली हो।

उम्र का कुछ न कहिए ये न जाने कितने परतों में रूप बदल बदल कर रहती है। अचानक से मैंने खुद को किसी नन्ही बच्ची में तब्दील होते देखा, फिर कुछ देर में एक किशोरी वय में पर असल उम्र वाली मैं तो असल में कहीं नहीं थी। या शायद यही असल है कि जो जीवन हमसे जीने से छूट जाता है, वह फिर फिर लौटकर आता जरूर है। जैसे मुझसे बिना जिये बचपन छूट गया, जवानी भी छूट गई और अब इस अधेड़ सी उम्र में वह सारा कुछ क़रीब आकर बैठ जाता है।

सोचती हूँ, हमें इन गिरहों से आज़ाद कौन करता है, हम खुद ही तो।

उस रोज़ भी ऐसे ही एक बैकपैक लिया, जूते के तस्मे कसे और धुंध भरी सड़क का सदका उतारने चल पड़ी। हथेलियों में कोई प्लान नहीं था बस वीकेंड की छोटी सी फुर्सत थी । सामने दिखती पहाड़ों की रानी मसूरी और ढेर सारे डर, ट्रैफिक जाम में अटक जाने के, लैंडस्लाइड होने के और सबसे बड़ा डर मसूरी की आपाधापी में, भीड़ में खोने का। 14 बरस हो गए देहरादून में रहते, न जाने कितनी ही बार गई भी हूँ लेकिन मालरोड की भीड़ में खोई खोई मसूरी न मुझसे मिली, न मैं उससे मिल पाई।

पहाड़ों का असल सुख बारिशों में है, लेकिन खतरे भी हैं। तो इस बार जोखिम लिया। जोख़िम से याद आया, ज़िंदगी के सब सुख इस जोख़िम का दरवाजा खटखटाने के बाद ही हिस्से आए हैं। 2011 का अगस्त ही तो था जब ज़ीरो आत्मविश्वास और ढेर सारी डिप्रेशन की दवाइयों की पोटली लिए देहरादून आई थी। बिना घर पर किसी को बताए कितने ही चक्कर मसूरी के लगाये। कभी यूं भी हुआ कि चाय पीने निकले और मसूरी जाकर चाय पी। तब मसूरी पर पर्यटकों का इतना दबाव नहीं था। यहाँ आने पर कितनी बार ऐसा भी होता कि घास की किनारियों पर अटकी बूंदें सूरज की किरणों को गले लगाए बैठी होतीं और अपनी ऊष्मा जड़ित बूंदों से अप्रतिम आभा बिखेर रही होतीं थीं। और मैं अपलक देखती जाती। ऐसे मासूम से दृश्य ज़ेहन अपने रंगों और ख़ुशबू समेत बसते हैं, देखिये न 2011 की उस स्मृति की ख़ुशबू कैसी बिखरी हुई है।

ओह, भटक जाने की ये आदत भी न, मैं तो जोख़िम की बात कर रही थी न। तो शुभचिंतकों की तमाम सलाहों को बैकपैक के बाहर वाले हिस्से में संभाल के रखा और चल पड़ी।

देहरादून से मसूरी मात्र एक घंटे की दूरी पर है, पहुँचने की कोई जल्दी नहीं थी क्योंकि इस बार रास्तों से ही मिलना था मंज़िल का ऐसा था कि वो कहीं भी हो सकती थी, जहां मन कहे रुक जाओ, वहीं रुककर मंज़िल बना लें । मसूरी जाना है या लैंडोर यह भी तो तय नहीं था, तय था तो बस इतना कि रास्ते में उड़ते बादलों से रुक-रुक कर गपियाना है। बारिश होते हुए भी देखना है और बारिश के बाद रूई से उड़ते बादलों को पलकों पर सहेजना भी है।


सुबह की चाय के लिए पहुंचे झड़ीपानी फॉल वाले रास्ते पर मिलने वाले नर्सरी कैफे में। खूबसूरत सी नर्सरी के बीच में बैठने के सुंदर ठिकाने थे। कैफे अभी अंगड़ाई ही ले रहा था। बढ़िया बन मक्खन और चाय से दिन की शुरूआत हुई। जाने क्यों मन में यह वहम सा है कि अगर सुबह की पहली चाय अच्छी और सुकून से पीने को मिल जाये तो दिन का अच्छा शगुन होता है। सो शगुन तो हो गया था।

इन दिनों ‘मुसाफिर कैफे’ के चलते झड़ीपनी कैसल की भी काफी हाइप हो गई है तो सोचा जरा दर्शन करते चलते हैं। लेकिन इतराये शरमाये मियां कैसल अपने रौब में थे, किसी की इंट्री नहीं, सिर्फ रहने वालों के लिए। सोचा, चलो देख लेते हैं, ठीक लगा तो एक रात यहीं सही। सुंदर तो है यह जगह कोई शक नहीं लेकिन उफ़्फ़ कीमतें...हमने मुस्कुराकर टाटा किया और 19th सेंचुरी कैफे का रुख किया। यह एक खूबसूरत ठीहा है। बारिश हो रही थी इसलिए इनका आउटडोर बंद था और यही मेरे लिए ईनाम था। कुछ देर में बारिश रुकी और बादलों ने हमला ही बोल दिया। जैसे कह रहे हों, लो कितने बादल चाहिए तुम्हें। मैंने हँसकर कहा, बहुत सारे...और बादलों का गुच्छा मेरे सर से होकर गुज़र गया। मेघालय की याद ताज़ा हो गई।

ऐसा सुंदर एहसास कि खुद को खुद की ही ख़बर न रहे।

बादलों से गुफ़्तगू का दौर चलता रहा, चलता रहा...दूर से मसूरी को देख मुस्कुरा कर कहा, आ रही हूँ, जरा ठहरो तो सही।

पहाड़ों की रानी से मिलना :

हाथों की लकीरों में कुछ नहीं रखा। उन्हें तो न जाने कितनी नदियों, झरनों और समंदरों में एक एक कर गिरा आई हूँ। अब जो हथेलियों में दिखती हैं वो बस उन बहाई जा चुकी लकीरों की परछाईंया हैं। उस रोज बरसते मौसम में जब हथेलियों को बूंदों के आगे किया तो मन के भीतर कोई ख़ुशबू सी दाखिल हुई। यह कुछ नया उगने की आहट थी। क्या मेरी हथेलियों में कोई नई लकीर उग रही है, मैंने ध्यान से देखा, वहाँ कुछ भी नहीं था, बरसती बूंदों में एक बूंद और जा मिली, पलकों में अटकी बदलियों की रिहाई का वक़्त था शायद।

‘ओ मसूरी, तुम तो इतने करीब थी फिर भी इतनी देर क्यों लगाई गले से लगाने में।’ मैंने गिरती हुई बारिश की लड़ियों से लाड़ लड़ाते हुए पूछा। उसने मुस्कुरा कर जवाब दिया, ‘मैंने तो तुम्हें कई बरस पहले ही गले लगा लिया था, याद करो...बस तुम्हें स्पर्श के उस लम्स को महसूस करने में इतना वक़्त लग गया।’

मैं चुप की गलियों में गुम चुकी थी। सच ही तो है, मेरे सबसे गाढ़े मुश्किल वक़्त में कितनी बार सर पर हाथ फिराया तो था मसूरी ने, बस मैं ही समझी नहीं। शायद टूरिस्ट की भीड़, लंबे-लंबे ट्रैफिक जाम और रास्ते में होने वाले लैंड स्लाइड के चलते मैंने एक दूरी बना ली थी।
 
दिल चाहा मसूरी को आगे बढ़कर गले लगा लूँ।

बहरहाल, हम दोनों गले मिले। मैंने पूछा, ‘चाय पियोगी?’ अपनी बौछार मुंह पर फेंकते हुए उसने कहा ‘हाँ जरूर।’ बाल्कनी में बैठकर चाय पीते हुए देह पर सुकून और आलस को फिसलते महसूस किया। नींद की चादर ओढ़ी और नरम बिस्तर में लुढ़क गई।

नींद खुली तो वादियों में बादलों की मटरगश्ती चल रही थी। धुंध से कोई मीठी सी धुन उठ रही थी और मैं निर्मल वर्मा को याद करके मुस्कुरा दी। शहर की तमाम हलचल से दूर हमारे इस ठिकाने पर सिर्फ चिड़ियों की आवाज़ें सुनाई देती थीं, या पत्तों के सरसराने की। खुद का सिरा गुमाकर आई एक लड़की के लिए यह सब ऐसा था जैसे किसी की मेरे लिए मांगी गई कोई दुआ कुबूल हो गई हो।

शाम की चाय के बाद एक लंबी सैर के लिए निकली तो बारिश के बाद वाले मौसम की खुनक तारी थी। हरे के इतने शेड्स बिखरे पड़े थे कि क़ुदरत के चित्रकार के सजदे में झुकने को जी चाहा। पहाड़ियाँ जंगली फूलों से खिली हुई थीं। अपनी बालकनी में खिले एक छोटे से फूल को देखकर चिहुँकने वाले हम लोग कितने गरीब हैं कुदरत के इन नज़ारों के सामने।

जगह-जगह उगी फर्न की पत्तियाँ पत्तियाँ अपने हुनर में माहिर थीं। पेड़ों पर झूमती जंगली लताएँ, उनके तनों पर उगे फर्न जैसे पेड़ों को सजाने की जादूगरी सीखी हो। कई जगहों पर तो काई भी ऐसे उगी थी मानो कह रही हो, जो हिस्सा रह जायेगा उसे मैं सजाऊँगी, दीवारें हों, रास्ते हों या पेड़। शॉल को देह पर कसते हुए मैंने सोचा ऐसे ही मौसम को तो कहते हैं न मौसम का गुलाबी होना। भला हुआ किसी राजनीति से नहीं जुड़ा यह गुलाबी। वैसे कुछ भी हो हरे की दीवानी मैं आज गुलाबी ही पहनकर घूमने निकली थी। मौसम का जादू मेरे बालों में अटके बिना कैसे रहता।

जिस जगह जाने से हमेशा डरती हूँ, वह है माल रोड। कारण है भीड़। लेकिन आज इस बिना योजना वाली छोटी सी ट्रिप का सिरा मेरे हाथ में था ही नहीं और मैंने कुछ ही देर में खुद को माल रोड पर चलते हुए पाया। सिर्फ एक चाय पीने की इच्छा लिए हम माल रोड पर लंबी वॉक पर चलते गए चलते गए।

चाय की प्यालियों में खुशगवारी की मिठास काफी थी।

बादलों में मानो कोई होड़ थी एक-दूसरे से आगे निकलने की । मंत्रमुग्ध सी मैं उनके खेल को देख रही थी। जिस मसूरी को देहरादून से दूर से देखती रहती हूँ आज वहीं से देहरादून को जगमग करते हुए देख रही थी। कुदरत के इश्क़ का इत्र चारों तरह बिखरा पड़ा था।

यह रात कभी न बीतने वाली रात में तब्दील हो चुकी थी। याद की अंगूठी में जड़े चमचमाते नगीने सी रात। हम चलते, सांस लेते, बैठते, फिर गहरी सांस लेते फिर चलते। इस रात को घूंट घूंट पी रहे थे। रात की इतराहट देखते ही बन रही थी। हम चाय से पहले वॉक करते, चाय के बाद करते, वॉक के बाद चाय पीते और फिर वॉक करते। डिनर से पहले वॉक फिर डिनर के बाद वॉक। असल में ये सारी वॉक और कुछ नहीं थीं ये थी रात के जादू को समेटने का लालच। जब वॉक करते हुए थक गई तो बालकनी से मसूरी को ताकने लगी, फिर अपने कमरे से घाटी में चल रहे जादुई खेल को देखती रही। रात और नींद का रिश्ता टूट चुका था। नींद का इंतज़ार भी नहीं था।

जाग के इस खेल में मसूरी लगातार जीत रही थी और उसकी जीत पर मैं खिलखिला रही थी। पगली, जानती ही नहीं मैं उससे जीतने नहीं, हारने ही तो आई हूँ। इस बीच देर रात या सुबह शायद थोड़ी सी नींद आई। वादी में बादल अकड़ू बच्चों की तरह पीछे हाथ बांधे टहल रहे थे। कभी धूप का कोई कतरा दिखता जिसे बादल झट से ढँक लेता। बारिश आस पास थी लेकिन अभी आई नहीं थी।

सुबह की चाय के साथ निर्मल वर्मा और मैं मुस्कुरा रहे थे। ‘हर बारिश में’ उनकी किताब हाथ में थी। न जाने कितनी बार की पढ़ी हुई किताब। सामने बारिश का इंतज़ार था और हाथ में बारिश थी।एक पोस्टबॉक्स ने अपने आसपास तमाम फूल खिला लिए थे। वो गाढ़े लाल रंग का पोस्टबॉक्स फूलों के साये में कितने सारे संदेशों को सहेजे होगा, या उन यादों को सहेजे होगा शायद जब लोग चिट्ठियाँ लिखते थे, अपनी बातें लिखकर भेजा करते थे।
 खुद को समेटकर चलने का समय हो चला था। समान पैक करने में सबसे पहले मैंने हरा समेटा, फिर समेटा इस हरे से उगा गुलाबी। फिर मैंने समेटा अपना वो बिना जिया बचपन जो ऐसे मौकों पर निकल भागता है। फिर समेटीं एक किशोर युवती की डरी सहमी आँखें जिन्होंने डर से कभी ख्वाब नहीं देखे। चलते-चलते मेरी हथेलियों को मौसम की एक शोख डाल ने थाम लिया था, मानो पूछ रही हो, ‘फिर कब आओगी?’ मैंने अपनी पलकों में अटकी बदलियों को आज़ाद करते हुए कहा, ‘अरे जरा सा तो दूर है देहरादून, कभी भी आ जाऊँगी।’ जबकि जानती हूँ मुझे आने में पूरे पंद्रह बरस का समय लगा है। चलते वक़्त की विदाई का नेग देने हमेशा की तरह बारिश आ चुकी थी...

गुलाम अली साहब सुर लगा चुके थे, ‘दिल के लुटने का सबब, पूछो न सबके सामने...’ बादलों से भरी सड़क में हम गुम होने लगे थे।

Thursday, July 30, 2026

सो काफ़िर बे पीर...


- दिनेश कर्नाटक 
कबिरा सोई पीर है, जो जाने पर पीर।
जो पर पीर ना जानई, सो काफिर बे पीर।

(कबीर कहते हैं, जो दूसरे की पीड़ा को समझ सके, वही साधु- संत है, जो न समझ सके वह धर्म तथा हृदय हीन है।)
 
कबीर के दोहे की पंक्तियों से ही प्रतिभा कटियार ने अपने उपन्यास का नाम 'कबिरा सोई पीर है' रखा है, जो लोकभारती पेपरबैक्स से वर्ष 2025 में प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास में जातिवाद के नाम पर भेदभाव, अपमान, उत्पीड़न की वह पीड़ा है जो सब जगह व्याप्त है, मगर दिखाई नहीं देती। उपन्यास को पढ़ते हुए दिमाग में उत्तराखंड में पिछले दिनों पौड़ी में हुई केतन की हत्या, चंपावत में ड्राइवर के गले में जूते चप्पल की माला पहनाकर घुमाने तथा मेरठ का वह प्रसंग भी आंखों के सामने आता है, जहां रोड पर प्रदर्शन कर रहे लोगों से आगबबूला हुए एसपी साहब कैदी वैन के अंदर जाकर प्रदर्शनकारी को पीटने लगते हैं।

हम प्रायः लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि अब कहां होता है भेदभाव, अब तो सब ठीक है, मगर उसी समाज में हम, 'इन्हें तो बहुत सिर पर चढ़ा दिया गया है', आरक्षण पर गालियां तथा दुर्व्यवहार के अनेक रूप देखते सुनते रहते हैं।
उपन्यास के केंद्र में तृप्ति है जिसके पिता, भाई व बहन अपने-अपने जीवन में भेदभाव व उत्पीड़न झेलते रहते हैं। तृप्ति धैर्य व संयम से इन सब स्थितियों का सामना करते हुए कामयाब होकर सम्मान अर्जित करने का इरादा रखती है। उसे अनुभव और कनिका जैसे दोस्त मिलते हैं जो उसे हौंसला देते हैं।

उत्पीड़न का रूप जातिवाद ही नहीं है। सीमा और कनिका को स्त्री होने की वजह से दोहरी तरह का भेदभाव झेलना पड़ता है। अनुभव एक उदार और लोकतांत्रिक नौजवान है जो जातिवाद और भेदभाव के परे चीजों को देखता है, लेकिन पुरुषोचित अहं तथा सामाजिक ताने-बाने में वह बहुत आगे नहीं जा पाता। इस अंधेरे को तोड़ने की उम्मीद पैदा करते तृप्ति और अनुभव आखिरकार उसी का शिकार हो जाते हैं।

यह उपन्यास बाहर से बेहद शांत, शालीन और उदार दिखने वाले हमारे सामाजिक ताने-बाने के भीतर छिपे हुए सामंती तथा जातिवादी चेहरे को उजागर करता है। इस महत्वपूर्ण विषय पर लिखने के लिए प्रतिभा जी को बहुत-बहुत बधाई !

Thursday, July 9, 2026

यह खुशरंग दिनों की बात है

शिलॉन्ग से सोहरा की यात्रा शुरू हो चुकी थी। उत्साह, खुशी और गहरी शांति का हाथ थामे हम माँ बेटी निकल पड़े थे। यूं हम जानते तो थे कि सफ़र सुहाना होने वाला है लेकिन असल मजा उस जाने हुए के पार जाने का है। यात्राओं की सबसे सुंदर बात लगती है कि हमेशा कोई न कोई चौंकाने वाला मंजर यात्राओं के पास होता है। हमारे तमाम जाने हुए से, सोचे हुए से अलग कुछ अनोखा। जैसे कोई बंद मुट्ठी हो, जिसके खुलने का इंतज़ार हो। 

रात अच्छी गहरी नींद सो चुकने के बाद का यह ताज़ा दिन कमाल होने वाला था। और हम पूरी तरह से तैयार थे इस दिन को जी लेने के लिए। जैसे-जैसे हम सोहरा यानि चेरापूंजी की ओर बढ़ रहे थे, मौसम बदल रहा था। वही मौसम जिससे मिलने की बेकरारी थी। मन कुलांचे मार रहा था। बाहर का मौसम मन के मौसम की ओर हाथ बढ़ा रहा था। हम एक गहरी चुप में धँसे हुए मौसमों की कारस्तानी देख रहे थे। शिलॉन्ग से सोहरा की दूरी सिर्फ 55 किमी है। टैक्सी से यह दूरी 2 घंटे के अनुमानित समय में आराम से पूरी हो जाती है जिसमें बीच में आने वाले खूबसूरत रास्तों का आनंद लेने के लिए रुकना भी शामिल करें तो ज्यादा से ज्यादा 3 घंटे। 

असल में यह रास्ता इतना ज्यादा खूबसूरत है कि हर थोड़ी देर बाद लगता है कि यहाँ रुकना चाहिए, यहीं रुके रहना चाहिए। ऊंची विस्तृत पहाड़ियों के बीच खूबसूरत हरियाली और पर मँडराते बादल, जैसे दिल की धड़कनों की रफ्तार भी मध्ध्म हो जाए। कैब ड्राइवर अब्दुल भाई को अंदाजा है कि पर्यटक कैसे बावरे हो जाते हैं यहाँ इसलिए वो खुद ही बीच बीच में कैब रोक रहे थे। सच कह रही हूँ कितने ही वीडियो देखे हों, यात्रा वृतांत पढे हों लेकिन जहां होने का सुख है वहाँ होने का ही सुख है। और यह सुख न कभी शब्दों में ढल सकता है और न ही कैमरे में कैद हो सकता है। हम सिर्फ कोशिश करते हैं वर्तमान के लम्हों को भविष्य की स्मृतियों के लिए सहेजने की। सिर्फ एक बचकानी सी कोशिश। लेकिन यह बात जीकर जानी है कि बटोरना तो असल में जीवन ही है। 

क्या आप पानी लिख सकते हैं, इस तरह कि उसे पढ़कर प्यास बुझे। शायद दुनिया भर के लेखक इसी कोशिश में हैं, इसी साधना में कि एक रोज वो इस तरह पानी लिखना सीख पाएंगे कि उसे पढ़कर पढ़ने वालों की प्यास बुझेगी। इस तरह रोटी लिख पाएंगे कि पढ़ने वालों की उसे पढ़कर भूख मिटेगी। लेकिन यह कल्पना की बातें हैं। रोटी की भूख रोटी के बारे में पढ़कर नहीं, रोटी खाकर ही मिट सकती है। ठीक वैसे ही यात्रा का सुख यात्रा करके ही जाना जा सकता है। सवाल मन में यह भी आता है कि फिर मैं क्यों लिख रही हूँ आखिर। लेकिन जवाब मुझे अच्छे से पता है, यह लिखते हुए मैं उसे जिये हुए को फिर से जी रही हूँ। यह सब मेरे लिए ही, सिर्फ मेरे लिए। कि मैं कैसे लिख पाऊँगी उन बादलों के बारे में जो अब हमारी टैक्सी में आकर हमारे बीच बैठ गए थे, मंडरा रहे थे हमारे ऊपर, हथेलियों में, बालों में, पलकों में। सड़क लगभग दिखनी बंद हो चुकी थी और हम बादलों पर ही चल रहे थे। 

शायद बादलों के इसी खेल को देखने के लिए हमने यह मौसम चुना यहाँ आने का। न सही टूरिस्ट स्पॉट देख पाने का सुख मुझे ये बादलों के खेल देखने से कब फुर्सत। हमने बीच में कुछ जगहों पर रुककर तस्वीरें लीं और यह सोचकर हंस ही दिये कि यह जानते हुए भी हम दस परसेंट भी तसवीरों में नहीं उतार पाएंगे कोशिश करते रहते हैं। एक ब्रेक में हमने भुट्टा और पाइनएप्पल लिए। यह शायद पहाड़ों पर खाने का रिवाज है या कोई और बात यहाँ भुट्टे के स्वाद का अलग ही मजा होता है। 

बिना किसी जल्दबाज़ी के धीरे-धीरे चलते हुए हम आखिर सोहरा पहुँच गए। यहाँ चेरापूंजी के नाम का कोई बोर्ड नहीं है, हर जगह सोहरा है। इसके बारे में कहते हैं कि पहले इस जगह का नाम सोहरा ही था फिर अंग्रेजों ने इसका नाम चेरापूंजी किया, क्यों किया ये तो वही जानें लेकिन फिलहाल मेघालय सरकार ने इसे सोहरा ही घोषित कर दिया है। एक तो ये शहरों के नाम बदलने की राजनीति यह बात क्यों नहीं समझती कि यह बात कितनों की भावनाओं के साथ जुड़ी हुई है। 

खैर, बादलों वाले रास्ते से लगभग उड़ते हुए हम अपने गंतव्य पर पहुँच चुके थे। एक छोटे से गाँव में एक प्यारा सा होमस्टे था हमारा ठीहा। यह होमस्टे कुछ महिलाएं ही चलाती हैं। माँ और बेटी मुख्य तौर पर। यहाँ या तो कपल, सिंगल औरतें लड़कियां या परिवार ही रुक सकते हैं। सिंगल लड़कों या लड़कों के ग्रुप के लिए यह नहीं है। बहरहाल, प्यारी सी मुस्कुराहट के साथ हमारा स्वागत किया गया। कमरा बेहद प्यार से और सलीके से सजाया गया था। बादलों में छुपा हुआ वह घर और उस घर के एक हिस्से में हम। हमने पर्दे हटाये खिड़कियाँ खोलीं और बादलों को कमरे में आने दिया। बादल भी इसी इंतज़ार में थे शायद। जरा सी देर में कमरा बादलों से भर गया। बिटिया मेरी चाय के इंतजाम में लगी थीं और मैं बादलों के संग गुफ्तगू में। 

संग बने रहिए...बादलों का यह खेल तो अभी बस शुरू ही हुआ है। 


Friday, July 3, 2026

I love Shilong


ये शिलांग की सुबह है। इस सुबह में बीते दिन की पूरी धमक है, बीती शाम की सरगोशियां हैं, चमक है। सुबह की सैर पर निकली तो चलती ही गई, मानो शिलांग को अपने कदमों से भी जीना चाहती हूँ। किसी भी शहर की सुबह में उसकी रात की कहानी का पता होता है। बस उस पते का पता पूछने वाले कम ही होते हैं। अपने चलते हुए कदमों और दृश्यों में छुपी शहर की बतकही से मुख़ातिब थी। वही चाय का उठता धुआँ, कुछ घूमने निकले जोड़े, कुछ परिवार, कुछ ब्लॉगर कैमरे की क्लिक्स का महासागर।

कुछ लोग I love Shilong के सामने फोटो खिंचा रहे थे। एक प्रेमी जोड़े की तस्वीर उसके इसरार पर मैंने भी खींची। तभी चिप्स के पैकेट को वहीं फेंककर आगे बढ़ गए अंकल जी अपनी बीवी को डांटते हुए उधर से जाने लगे। ये अभी I Love Shilong के साथ फोटो खिंचवा रहे थे। मैंने अपना माथा पीट लिया। गुस्से से उन्हें घूरना चाहा लेकिन वो अपनी बीवी को किसी बात पर डांटने में व्यस्त थे। पास खड़ी की सोलह सत्रह साल की लड़की ने मेरे चेहरे के भाव पढ़ लिए थे शायद। वो मुझे देखकर मुस्कुराई और उसने खुद जाकर वह पैकेट उठा लिया।

कुछ दूरी आज के दिन के अख़बार के ढेर और कुछ अख़बार खरीदते और खबरों की दुनिया पर गुफ्तगू करते लोग दिखे। अख़बार पर बात करने वालों में ज़्यादातर स्थानीय लोग ही थे और इनमें महिलाएं एक भी नहीं थीं। महिलाएं कब और कहाँ कहाँ नहीं होतीं हैं, इसकी वजह पर नहीं जाऊँगी क्योंकि अगर गई तो बात जरा लंबी ही जाएगी। खैर, अख़बारों के पहले पेज पर जंतर मंतर की और अभिजीत दीपिके की तस्वीरें थीं।

शहर का कुछ पता नहीं था, किसी से पूछना भी नहीं था, गूगल से भी नहीं, तो जिधर भीड़ कम लगे और हरियाली ज्यादा दिखे उधर चल पड़ी। कुछ चर्च, कुछ लाइब्रेरी रास्ते में पड़ते गए। सड़कों की सफाई बराबर हो रही थी। सफाई कर्मचारी रात के निशान सड़कों से मिटा रहे थे। उन्हें अगले दिन के लिए तैयार कर रहे थे। तभी सड़क पर एक पिता और पुत्र पर नज़र पड़ी। पिता सड़क पर झाड़ू लगा रहा था, कूड़ा उठा रहा था और उसका छोटा सा बच्चा शायद डेढ़ या दो साल का होगा, कूड़ा उठाने के लिए थर्माकोल के डिब्बे में प्लास्टिक की खाली बोतल को फंसाकर बनाए गए कूड़ा इकट्ठा करने वाले डब्बे को खेल गाड़ी बनाकर खेलता दिखा। वह बहुत खुश था। खेलगाड़ी को खींचता, उसे गोल गोल घुमाता, उसमें कोई कूड़ा उठाकर रख देता फिर भागने लगता। उस बच्चे की मुस्कुराहट में यह सुबह डूब चुकी है।

फिलहाल मेरी हथेलियों में ख़ुशी का यह सिक्का है। इसे मैं कभी खर्च नहीं करूंगी। दुआ करूंगी कि दुनिया के सारे बच्चे यूं ही खुश हों, लेकिन कूड़ा बीनते हुए नहीं, स्कूल जाते हुए, पढ़ते हुए, खेलते हुए और इस लगभग बर्बाद हो चुकी दुनिया को थोड़ा बेहतर बनाते हुए।

सुबह की सैर में शहर का जो चेहरा दिखा वो रात के चेहरे से फर्क था कई मायनों में। रात में जिस मौज मस्ती की रवानगी थी सुबह में एक पुरसुकून ठहराव था। मैं इन सबहों की तलाश में ही तो निकली हूँ, इस पुरसुकून ठहराव की तलाश में। अपने चेहरे को आसमान की ओर करके लंबी गहरी सांस लेते हुए शहर को जज़्ब करने की कोशिश की। बारिश न जाने कहाँ थी कहाँ नहीं लेकिन ठीक उस वक़्त मेरे गालों पर एक बूंद टप्प से टपकी। कुदरत के ये करिश्मे मुझे बिखेर देते हैं। मैं उस लम्हे में वहीं बिखर गयी थी। वापस लौटते समय याद आया चाय तो पी ही नहीं, हालांकि कई जगह चाय बनती देखी थी शायद इच्छा नहीं रही थी। कमरे पर आकर कुछ देर पड़ी रही।
भीतर एक उत्साह था, आज हम चेरापूंजी जाने वाले हैं जिसे सोहरा भी कहा जाता है। एक गाना याद आया और एक लंबी शरारत भरी मुस्कुराहट चेहरे पर तैर गई, 'आज उनसे पहली मुलाक़ात होगी, फिर आमने सामने बात होगी...'

इसी गमक के साथ हम चेरापूंजी के लिए रवाना हुए। मौसम सुहाना था और सफर का इससे अच्छा सामना क्या होगा कि आपके साथ अच्छा मौसम चल पड़े और और अच्छा और अच्छा होता जाय। हम बादलों की गोद में समाने को बेताब थे....
(जारी...)

Tuesday, June 30, 2026

दिल कह रहा है, तुझसे ये रिश्ता जोड़ लूँ...


रिश्ता तो जुड़ चुका था। हम शिलॉन्ग पहुंच चुके थे। एक दिन में जैसे न जाने कितने दिन जी लिए थे हमने। कोई दिन ऐसे होते हैं कि जी करता है ख़त्म ही न हों। हम ऐसे दिनों को आस से देखते हैं बिना कुछ कहे, और कभी-कभी वो हमारी आँखों की सुन लेते हैं। यह ऐसा सा ही दिन था। और अभी तक ख़त्म नहीं हुआ था। कमरे पर पहुंचे तो चाय की जबर्दस्त तलब लगी, और जब चाय होगी तो पकौड़े तो लाज़िमी हुए। कुछ देर आरामदेह बिस्तर में धँसे हुए ज़िंदगी किसी रील सी घूमने लगी। 

रत्ती भर जीने के लिए कितना ज्यादा मरना पड़ता है। अपनी ही ख़्वाहिशों को पहचानने में एक उम्र गुज़र जाती है। कहाँ जानती कि मुझे धूप के सिक्कों से मोहब्बत है, कहाँ जानती थी मुझे बारिशों का स्वाद बेपनाह पसंद है कि मैं भीगना ही नहीं चाहती बारिशें पी जाना चाहती हूँ, कई बार लगता है बारिश हो जाना चाहती हूँ। कहाँ जानती थी कि खुद को महसूस करने के लिए खुद के साथ कुछ दूरी तय करना कितना ज़रूरी है। पिछले कुछ बरसों की छुटपुट यात्राओं के दौरान पाया कि जिस अंजान सी तलाश में भटक रही थी वो तो ये है। कुदरत से शदीद मोहब्बत। इंसानी मोहब्बत आपका दिल दुखा सकती है लेकिन कुदरत आपको कभी अकेला नहीं छोड़ती। हमेशा साथ चलती है कभी धूप बनकर कभी छाया बनकर। 

स्मृतियों के दरीचे खुले हुए थे जबकि वर्तमान अपनी सोंधी ख़ुशबू लिए सामने खड़ा था। चाय, पकौड़े सामने थे और हम आराम की मुद्रा में बिस्तर से निकले बगैर वहीं खाने की इच्छा से जूझते हुए। आखिर बिटिया ने वहीं बिस्तर पर चाय दी और पकौड़े भी। एक जरा सी ख़्वाहिश कोई बिना कहे समझ ले और पूरी कर दे तो कैसा तो पानी हो जाता है मन। ज़िंदगी भर कितने पकौड़े तले होंगे, कितनी चाय बनाई होगी कोई हिसाब नहीं लेकिन यूं इस सुकून से इस तरह इनका होना कमाल है। सोचो तो, मर्दों के लिए जो सुख रोज का है, जिस पर उनका ध्यान भी नहीं जाता वो हम औरतों को कितनी मेहनत से कमाना पड़ता है। 

पकौड़े अच्छे थे साथ ही लाल चाय भी। खाने के बाद कुछ देर और बिस्तर में दुबक गई तो आलस के एक झोंके ने पीठ सहला दी। सच्ची बड़ा आराम आया। घड़ी ने आठ बजाए तो हम माँ बेटी ने एक दूसरे को देखा और कुछ देर का टाइम खुद के लिए और ले लिया।  कुछ देर बाद उठे तो शरीर और मन दोनों ताजादम हो चुके थे। हम दिन का आखिरी हिस्सा जी भर के जीने के लिए तैयार थे। अब तक यह सर्च की जा चुकी थी कि कहाँ पर कौन सा खाना बेस्ट मिलता है। वैसे,खाना हमारे लिए प्रियोरिटी नहीं था, हमें तो शिलॉग की रात देखनी थी। 

दुकानें धीरे-धीरे बंद हो रही थीं और शहर जाग रहा था। चौक के पास लोग बस टहल रहे थे, घूम रहे थे, बैठे थे खड़े थे। कोई कुछ कर नहीं रहा था, बस वो वहाँ थे। न किसी को कहीं जाना था, न कुछ खरीदना था, न कुछ खाना था। मैंने महसूस किया कि लोग आपस में भी ज्यादा बात नहीं कर रहे हैं। बस वो एक-दूसरे का हाथ थामे साथ हैं। जैसे अपनेपन की कोई ख़ुशबू बिखरी हुई थी। 

हमने भी उस महकती शाम के हवाले खुद कर दिया। इधर से उधर भटकते हुए हमारे कानों में सुरीले गाने भी पड़ रहे थे। अक्सर आसपास संगीत रहता ही है लेकिन जाने क्यों यात्राओं का सुर ऐसा लगता है कि कोई गीत कोई गाना सुनने का खयाल तक नहीं आता। तो यह सुबह से कानों में पड़ा पहल गीत था। इस महकती चहकती सी शाम में यह अच्छा लग रहा था। समझ नहीं आ रहा था कि यह आवाज आ कहाँ से रही है। फिर अचानक नज़र पड़ी, कोई जिनके पास से कई बार गुज़र गए ये तो वही सज्जन गा रहे थे। चूंकि स्पीकर दूर कहीं थे तो शायद इसलिए ध्यान नहीं गया। दूसरे लोग उन्हें घेर के खड़े हों ऐसा भी नहीं था। वो अपनी धुन में बस गा रहे थे। असल में वो अपने संगीत को जी रहे थे। वो दृष्टि बाधित थे लेकिन उनके पास एक नज़र थी खुशी को पहचानने की, सलीका था उसे सेलिब्रेट करने का। कुछ लोग उनके सामने रखे बॉक्स में पैसे भी डाल रहे थे। लेकिन वो सिर्फ गा रहे थे...कुणाल गांजावाला की आवाज़ जिसे शायद भूल ही चुकी थी, उस रात से फिर से साथ हो ली है। पहले से ज्यादा अपनाइयत के साथ। अब उस आवाज़ में और न जाने क्या क्या शामिल हो चुका है...दिल कह रहा है, तुझसे ये रिश्ता जोड़ लूँ, तेरी धड़कनों को छू लूँ... जानती हूँ अब जब भी यह गाना सुनूंगी शिलॉन्ग की वह रात जाग उठेगी। 

घूमते फिरते वहाँ ढेर सारी पान वाली दुकानें दिखीं। हमारे यहाँ जैसी होती हैं वैसी नहीं, थोड़ी अलग। छोटे से स्टूल पर पारंपरिक वेश में बैठी महिलाएं और सामने छोटी सी मेज पर करीने से सजे हुए पान। एक नॉर्थ ईस्ट की कलीग की याद आ गई वो खूब पान खाती थी, वो ताम्बूल बोलती थी। मुझे भी पान खाने का चाव तो  है। खासकर नए शहरों में, क्योंकि हर शहर का मिजाज वहाँ के पान में भी होता है। यहाँ के पान या ताम्बूल का मिजाज अलग था। उस वक़्त तो मैंने पैक कराया था डिनर के बाद जब उसे खोला तो पाया यह तो एकदम अलग है। पान के पत्ते पर लगा हुआ थोड़ा सा चूना और बस। साथ में सुपारी के टुकड़े और कच्चे नारियल की कतरन। सुपारी तो खाई न गई नारियल की कतरन के साथ जरूर खाया थोड़ा सा और बाकी संभाल लिया। जानती थी यह थोड़ा-थोड़ा ही खाया जाएगा। यह लखनऊ या बनारस वाले पान से एकदम अलग था। 

किसी रात का तिलिस्म ऐसा होता है कि न हम चाहते हैं वह बीते न वह बीतती है। देर रात तक इधर से उधर घूमते हुए भूल ही गए थे कि हमें डिनर भी करना है। याद आया तो एक बेहतरीन रेस्तरां में खुद को पाया। एक अच्छा सा दिन, प्यारी सी शाम अच्छे से डिनर के साथ ही पूरा होना डिज़र्व करता है। 

हम उस प्यारे से दिन को पलकों में मूंदकर यह सोचते हुए सो गए कि अगला दिन चेरापूंजी का दिन होगा। मेरा बचपन का अनदेखा ख्वाब जो कल हक़ीक़त बनने वाला था। 

नींद सचमुच अच्छी सी आई थी...

(जारी...)

Wednesday, June 24, 2026

तेरे लिए मौसम मंगाया है...


1998 में रिलीज हुई फिल्म 'सत्या' के एक गाने की यह लाइन कि 'मैंने तेरे लिए मौसम मंगाया है, तेरे लिए रस्ता बिछाया है...' इतनी ज्यादा अच्छी लगती थी कि ऐसा लगता काश कोई यह कहे मुझसे भी। रूमानियत वाले ऐसे ख़्वाबों की जिंदगी ने कायदे से बैंड बजाई और यह समझाया कि अपनी ख़्वाहिशों को किसी के भरोसे मत छोड़ो, खुद पकड़ो उनकी बागडोर और निकल पड़ो बस...

प्रकृति के क़रीब जाकर हमेशा यह महसूस हुआ है कि मेरे मन का वह प्रेमी और कोई नहीं यह क़ुदरत ही है। जब जितना और जैसा मौसम चाहा, भरपूर मिला। धीरे-धीरे ज़िंदगी के रास्ते भी बिछने लगे, वो रास्ते जो मेरे मन की दुनिया में जाते हैं। लेकिन उन रास्तों पर चलने से पहले या उनके मिलने से पहले हमें उन रास्तों की कितनी तलाश है यह जानना भी ज़रूरी है। पानी का पता प्यास से बेहतर कौन जानता है। और जैसा कि पहले भी कह चुकी हूँ, ज़िंदगी के लिए अपनी भूख प्यास को समझते, बूझते हुए जिंदगी ही गुज़र जाती है।

मेघालय मानो गुनगुना रहा था, 'मैंने तेरे लिए मौसम मंगाया है...' और मैं उसकी गुनगुन को सुनकर मुस्कुरा रही थी। बरसती बूंदें हथेलियों से सरकते हुए आत्मा तक पहुँच रही थीं।

रास्ता लंबा था। हमें तो भूख महसूस नहीं हुई लेकिन अब्दुल भाई की भूख ने गाड़ी रोकी। बारिश हल्की हुई। बिना छतरियों के थोड़ी सी वॉक करने के बाद खाने पहुंचे। हालांकि सच में कुछ भी खाने का मन नहीं था। मैंने छाछ और बेटू ने पेपर डोसा मंगाया और हम दोनों चुप होकर बैठ गए। हम दोनों माँ बेटी का सुर एकदम ठीक लग चुका था। यात्रा के दौरान चुप्पी का सुर। शब्द अक्सर सौंदर्य को खंडित करते हैं यह मेरा अनुभव रहा है। हम दोनों की चुप्पी का यह सुर पूरी यात्रा में लगा रहा। हमने बेहद मामूली बातें कीं और ज्यादा महसूस किया। एक दूसरे को भी और मौसम को भी।

कई बार चुपचाप खिड़की के बाहर देखते हुए हमने एक-दूसरे की हथेलियाँ थामीं, कहा कुछ भी नहीं। भाषा की चुनौती आने वाली थी क्योंकि यहाँ की भाषा से हम अनजान थे और हमारी भाषा से यहाँ के लोग। लेकिन पर्यटकों के कारण अब भाषा और भोजन काफी हद तक कॉमन होने लगा है। अङ्ग्रेज़ी और हिन्दी को तोड़-मरोड़ कर काम किया जा सकता है यह सुना था। और सच ही सुना था। 

खाने के बाद बिल देने के वक़्त हम माँ बेटी के भीतर का बचपन जाग उठा। मैंने ऑरेंज कैंडी जिसे बचपन में कंपट कहते थे लेने को हाथ बढ़ाया तो बेटू ने मैजिक पफ की तरफ। कुछ चॉकलेट और चिक्की के छोटे पाउच भी हमने लिए। खाने से ज्यादा इन चीजों को हथेलियों में भरने का सुख था। बचपन में इन्हीं ऑरेंज कैंडी, माफ कीजिये कंपट के लिए भी तो तरसे ही हुए थे हम। जिस भी उम्र में मिले छूटा हुआ जीवन उसे गले से लगा लेना चाहिए। 

एक कंपट मुंह में रखा और स्कूल के बाहर ठेले पर कंपट बेचने वाले भैया की धुंधली तस्वीर कौंध गई, और कौंध गयी 25 पैसे का सिक्का तलाशते हाथ और न मिलने पर मायूस होती आंखें। इसी स्मृति के साथ वो दिल के आकार वाले काँच के ज़ार में रखे केक और क्रीम रोल भी याद आ गए जिन्हें खरीद पाना ख़्वाब ही रहा बस ललचाई नज़र से देखते ही रहे। हंसी आती है यह सोचकर कि अब जब भी क्रीम रोल मिलता है चाव से खाती हूँ, असल में उसे खाते हुए बचपन का छूटा हुआ हिस्सा जीती हूँ। 

अभी बचपन की इन बचपने से भरपूर स्मृतियों के साथ खिलवाड़ चल ही रहा था कि सामने एक विशाल सा हरा समंदर दिखा। हम शिलोंग पहुँच चुके थे। यह शिलोंग का पोलो ग्राउंड था। इतना हरा कि बस आँखें ठहर जाएँ। 
लेकिन इतनी बारिश में कैसे घूमेंगे यहाँ के सवाल के साथ बिटिया ने मेरी तरफ देखा। मैंने हँसते हुए कहा, 'अरे मौसम अपनी बात मानता है, अभी बारिश रुकवाते हैं। ओ सुनो जरा, थोड़ी देर को रुकना तो बरसने से...' ड्रामेबाजी से भरे अंदाज में कहकर मैं खूब हंस पड़ी। बिटिया भी हंस पड़ी। लेकिन कुछ ही देर में सचमुच बारिश रुक गई। और ऐसा पहली बार नहीं हो रहा था जब मौसम मेरे मन के मुताबिक अपने रंग बदल रहा था। अब तो दोस्तों में यह बात मशहूर ही है बल्कि दोस्तों ने ही मशहूर की है कि ये अपने मौसम साथ लिए चलती हैं....बेटू ने भी चिहुँककर कहा, 'आपके मौसम ने आपकी बात मान ली'। हम दोनों खुश-खुश उस हरे समंदर के भीतर डूबने के लिए निकल गए। 

नीले गुलमोहर जिसका बोटिनिकल नाम जेरकेंडा है की छटा देखते ही बन रही थी। अभी बरस कर थमी बूंदों को पत्तियों ने अपनी हथेलियों पर सहेजा हुआ था। घास के मुहाने पर अटकी बूंदें जैसे किसी जौहरी ने अपनी कला का नायाब नमूना बनाते हुए घास के सिरों को हीरे सी बूंदों से जड़ दिया हो। और हीरे की कनी से सजी बूंदों को न कोई गुमान न घास को। हवा का एक झोंका आता और घास इतराते हुए उन हीरे सी बूंदों को ऐसे झटक देती मानो निर्विकार ही हो किसी भी सज्जा से। और यही उस सज्जा का सबसे सुंदर पहलू था। 

हम माँ बेटी तितलियाँ हो गयी थीं। उस हरे समंदर में उड़ती फिर रही थीं। हम मछलियां हो गई थीं, डुबकियाँ लगातीं और गहरे उतर जाने को बेताब। बरसने के बाद का खुला मौसम पूरे ग्राउंड में खिल खिला रहा था। और सबसे सुंदर बात यह थी कि यहाँ लोग कम थे। जो थे वो बेहद इत्मीनान से या तो बैठे हुए थे, या घूम रहे थे। ऐसे सौंदर्य पर खामोशी की संगत हो तो कमाल होता है। इतनी शांति कि अपनी साँसों की आवाज़ सुनाई दे, ऐसी चमक कि अपनी आत्मा का हर हिस्सा चमक उठे। 

ज़िंदगी ने मेरा हाथ थामा और पूछा, 'तुम्हें मुझसे बड़ी शिकायतें थीं न?' मैंने उसके कांधे पर सर रखते हुए कहा, 'तुमसे ही तो प्यार भी है न?' 
हम दोनों मुस्कुरा दिये....मेरी हथेलियों में घास से टूटकर गिरी ओस की बूंदें थीं। हाँ, हथेलियों से जबसे लकीरें झरकर गिर गईं, या मैंने गिरा दीं तबसे हथेलियाँ सूरज की किरणों से, ओस की बूंदों से, फूलों की ख़ुशबू से लबरेज रहती हैं। मैंने अपनी हथेलियों को अपनी दोनों पलकों पर रखा, और पूरे चेहरे को हथेलियों में रख दिया। जैसा दुआ पढ़ने के बाद पलकों पर रखते हैं हथेलियाँ। 

होंठ बुदबुदा रहे थे, शांति हो, प्यार हो, ख़्वाब  हों और ख़्वाबों की ताबीर हो... 

(जारी...)

Sunday, June 21, 2026

स्वाद एक कारा है


                                                        तस्वीर इन्टरनेट से साभार

 यह इतवार की सुबह है। जाने कहाँ से इतना सारा तनाव आ गया है। लंबे समय से एक चिड़चिड़ाहट तारी है जिसे फुल इगनोर करने पर लगी हूँ। यह चिड़चिड़ाहट रसोई से है, घर के कामों से है। 


बचपन से रोज सुबह आँख खुलते ही किचन में काम करते हुए माँ को ही देखा था। मैं ठीक से जग भी नहीं पाती थी कि आधा खाना बन चुका होता था। चूंकि मेरी माँ भी वर्किंग रही हैं, उनकी घड़ी और उनकी गति के बीच समायोजन के बीच ही मेरे बचपन की शुरुआत हुई। जब वो डेली पैसेंजर थीं और सुबह की ट्रेन से दफ्तर जाती थीं तो सुबह 6 बजे सारे घर का काम निपटाकर, खाना बनाकर, गमलों में पानी डालकर रेडी होकर स्टेशन को निकल जाती थीं। 

फिर लखनऊ में उन्हें उसी शहर में जाना होता था तब यह राहत सुबह के 6 बजे से खिसक कर 8.30 बजे पर आ गई। लेकिन तब तक काम भी काफी बढ़ चुका था। और इन दिनों कोई हाउस हेल्प नहीं हुआ करती थी। तो जैसे जैसे मैं बड़ी हुई खुद को माँ कि हेल्प के लिए हाथ बँटाना शुरू किया। धीरे-धीरे माँ के हाथ के काम अपने हाथ में लेते गई। कॉलेज, पढ़ाई, घर के काम...यह सब सामान्य है। 

घर के काम कभी बोझ नहीं लगे, खाना बनाने में मजा आता था। नई चीज़ें बनाना खिलाना और तारीफ़ें बटोरना। माँ को देखकर हुआ या जीवन की गति ही ऐसी मिली कि काम करने की गति काफी तेज़ रही। फटाफट खाना बनाना, फटाफट पोछा लगा लेना। सब कुछ फटाफट। बाद मुद्दत समझ आया कि मैं तो एक ट्रैप में हूँ।  

सलाद और होता तो मजा आ जाता है, पकौड़े बन जाएँ तो मजा आ जाय। तुम पालक पनीर बहुत अच्छा बनाती हो, और पाव भाजी, और... चाय तो तुम्हारे ही हाथ की पिएंगे जैसे जुमलों वाला ट्रैप। और अपनी खुशी से एक पैर पर नाचते हुए लोगों के स्वाद पर खुद को निछावर करने की खुशी महसूस करने वाला ट्रैप। 

कोई साथ की लड़की जब यह कहे कि उसे खाना बनाना नहीं आता, या बनाने में ऊब लगती है तो उसे जज करने या उसे नसीहत देने वाला ट्रैप, असल में उस बात को न समझ पाने वाला ट्रैप। 

बाद मुद्दत यह समझ आया कि यह जो रसोई है, यह स्त्रियों की नियति नहीं है, बना दी गई है। स्वाद एक जेल है, स्त्रियों की जेल। जिस जेल में तारीफ़ों की सलाखें सख्त हैं, जो अपनी ही जेल में बाखुशी कैद रखने की तैयारी है। तारीफ़ें न भी हों तो भी। 

मुझे याद नहीं पिता ने कब माँ से कहा कि, 'तुम ये चीज़ बहुत अच्छी बनाती हो' माँ की शिकायत यही रही कि कभी जो तारीफ कर दी हो। तारीफ समझने का एक तरीका माँ को यह मिला कि अगर ठीक से खा लिया या सब खत्म कर दिया बिना यह सोचे कि बाकियों के लिए कुछ बचा भी है नहीं, तो खुश हो जाओ कि अच्छा बना है, अगर छोड़ दिया थाली में तो समझो मन का नहीं बना। 

परेशानी खाना न बनाना पड़े की भी हो सकती थी समझ ही नहीं पाये, परेशानी यह हुई कि कम से कम तारीफ तो कर दिया करो। 

पहली बार जब कुक लगने की बात हुई तो घर में घोर संग्राम हुआ। हालांकि कुक लगने की बात माँ ने की भी नहीं, क्योंकि एक समय में वो भी इसके खिलाफ थीं, जाने कैसा बनाएगी, स्वाद नहीं होगा उसके हाथ में आदि आदि। पिता ने हड़ताल कर दी उसके हाथ का नहीं खाएँगे। फिर जैसे तैसे कुक लगी, तो रोज शिकायत कि उसके हाथ में स्वाद नहीं है। 

यानि जिस स्वाद पर जीवन भर चुप्पी रही, वह अब समझ आया कि, था। 

ऐसी लड़ाई शादी के बाद मैंने भी झेली, पति और सास का अबोला सहा और आखिर उन्हें कुक के लिए नहीं मना पाई। 

कुल कहानी यह है कि स्वाद एक जेल है। स्त्रियों की जेल। और स्त्रियों को ही इसे तोड़ना होगा। लेकिन तोड़ नहीं पा रही हैं। सुबह आँख खुलते ही जब खुद के लिए ही सही किचन में खुद को देखती हूँ तो सोचती हूँ यह कारा कितनी मजबूत है। 

मैं अपनी सुबह चाय और पंछियों की आवाज़ के साथ चाहती हूँ लेकिन ऐसा कम ही हो पाता है....क्यों कम हो पाता है, यह सवाल खुद से पूछती हूँ...

जो पुरुष मैं तो बना लेता हूँ, की हुंकार भरते हैं और महीने में एक दिन या हफ्ते में एक दिन अपनी मर्जी से अपने मूड के मुताबिक कभी कुकिंग कर देते हैं यह उनके लिए नहीं है। मैं उनकी कुकिंग को गिनती ही नहीं। और जो महिलाएं यह कहकर खुश हैं, कि मेरे ये तो कभी कभी चाय बना देते हैं, या मुझे अच्छा लगता है उनके लिए बनाना तो उनसे यही कहना है कि बहन, अभी तुम जेल में आनंद ले रही हो, अच्छा हो तुम्हारा भ्रम न टूटे। 

आग लगे ऐसे स्वाद को जिसने एक स्त्री को जीवन भर की रसोई की कैद में डाल रखा है।  

Saturday, June 20, 2026

कॉकटेल-2 : मिसोजिनी से भरपूर घटिया मसाला



अकसर जो चीज़ें अच्छी नहीं लगतीं उनके बारे में बात नहीं करती। देखने में टाइम वेस्ट करने के बाद उसके बारे में बात करके और टाइम क्यों वेस्ट करूँ आखिर। लेकिन हमारी फिल्मची दोस्त ज्योति नन्दा ने कहा, कुछ तो लिखो तो लिख रही हूँ।

ज्योति की ही पिछली पोस्ट से बात शुरू करती हूँ। नीयत। जिसे समझ और अप्रोच भी कह सकती हूँ। फिल्म बनाने के पीछे की नीयत क्या है, और देखने वाले की नीयत क्या है। यहीं से सारी बात शुरू होती है। किसे क्या और कैसा लगता है।

कॉकटेल 2, से ज्यादा उम्मीद तो थी नहीं क्योंकि लव रंजन का अप्रोच पहले ही काफी निराश करता रहा है। कॉकटेल वन में भी उसका खासा असर था। यहाँ भी अप्रोच वही है। लव रंजन को लड़कियों से कोई खास दिक्कत लगती है। उन्हें लड़कियों को डीमीन करने के तमाम रचनात्मक तरीके आते हैं। और उनके हीरो बेचारे, पाक दामन, संस्कारी टाइप होते हैं। कोई दिक्कत नहीं कि आपका हीरो कैसा है लेकिन हीरो को आपके जैसा आदर्श हीरो होने के लिए लड़कियों को क्यों डीमीन करना है भाई।

फिल्म खूब सजा धजा, रंगा पुता कचरा है। दो लड़कियां हैं, एक लड़के पर मरती हैं। बिलो द बेल्ट तरीके आज़माती हैं लड़के को परखने को। फिर आपस में बिल्लियों की तरह लड़ती हैं। और लड़का अंत में चमचमाता हुआ संस्कारी बालक शादी शादी खेलने लगता है। वही लड़का जो शादी में विश्वास नहीं करता है।
अंत में मंगलसूत्र जिंदाबाद, आज़ाद लड़कियों का कैरेक्टर एसेसनेशन, उन्हें ओब्जेक्टीफाई करना। प्यार और रिश्तों पर लंबे लंबे दार्शनिक लेक्चर जिनका कोई अर्थ नहीं।

महंगे सेट, दमकते शूट, गाने, सब मिलकर भी कुछ नहीं कर पाते। कृति सेनन कमाल लगी हैं लेकिन उनका रोल थोड़ा डिग्निटी से लिखा जाना था।

इतना ही टाइम इस पर खर्च कर सकती हूँ। टाटा।

(नोट- फिल्म एक्स्पर्ट नहीं हूँ। यह समीक्षा भी नहीं है। बस मेरी भड़ास है।)

Tuesday, June 16, 2026

पहली मुलाक़ात का तिलिस्म

गुवाहाटी एयरपोर्ट की सबसे खूबसूरत बात यह लगी कि न कोई ज्यादा भीड़ न आपाधापी। संभवतः हमारी फ्लाइट सुबह की थी इसलिए भी ऐसा हो। एक सुकून, एक ख़ामोशी और तसल्ली सी दिखी। हर एयरपोर्ट की अपनी कुछ अलग सी पहचान होती ही है। और अगर हम पहली बार उस एयरपोर्ट पर होते हैं तो तस्वीरों का मोह भी होना लाज़िम है। एयरपोर्ट पर जो सज्जा थी उसमें असम ज्यादा था या मेघालय यह नहीं पता लेकिन उसमें एक बारीकी और तरतीब थी। 

गुवाहाटी एयरपोर्ट से हमें शिलॉन्ग जाना था। एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही गर्मी से सामना हुआ। ये अपेक्षित तो बिलकुल भी नहीं था। देश की राजनैतिक गर्मी का असर यहाँ के मौसम पर भी पड़ रहा है शायद सोचते हुए हम माँ बेटी कैब के भीतर दुबक गए। सफर की थकान और तेज़ चिलकती धूप का असर था शायद बिटिया तुरंत सो गई और कुछ देर में मैं भी। 

छोटी सी झपकी के बाद आँख खुली तो मौसम बदलने लगा था। 'वेलकम टू मेघालय' का बोर्ड बारिश की फुहारों के बीच ही दिखा। यह हमारा मेघालय में स्वागत था। बरसता भीगता मौसम। ऐसी चिहुँक उठी मन में। मन बावरा हो उठा। फाइनली मैं मेघालय में हूँ। 

उमियम झील : मेघालय आने की योजना में मेरे मन में कोई योजना नहीं थी। मुझे सिर्फ बादल और बारिशों से मिलना था और उनके हाथों में हाथ डालकर घूमते फिरना था। फिर भी योजनाओं की बाढ़ चारों तरफ थी। ये देखना वो देखना। रील्स से लेकर चैट जीपीटी तक सक्रिय थे। साथ ही सक्रिय थे वो लोग जो आकर गए थे। इस सक्रियता से यह हुआ कि मुझे कुछ जगहों के नाम पता चल गए। वहाँ जाऊँगी या नहीं यह पक्का तय नहीं था। लेकिन उमियम झील रास्ते में ही पड़ती थी और पानी वाली सारी जगहों के लिए तो हमेशा हाँ ही होती है। 


हमारे ड्राइवर अब्दुल भाई ने उमियम के सामने से सर्रर्र से गुजरते हुए बताया कि ये है वो झील। मैंने सोचा क्या ऐसे देखते हैं झील। मुझे लोनावला का ब्रिज याद आया हम बस गुजरे उधर से, ठहरकर निगाह भर देखा भी नहीं। वो हुड़क अभी तक फंसी हुई है। 

मैंने अब्दुल भाई से कहा, जरा रुकिए कुछ देर। वो बोले बारिश है मैडम कहाँ जाएंगी। मैंने आप फिकर न करिए, आप बस रुकिए। वो थोड़ा आगे जाकर रुक गए। बिटिया के बैग से दो छतरियाँ निकलीं। हमने छतरियाँ और पैरासीटामॉल सबसे पहले रखे थे। हम जानते थे छतरियाँ ज्यादा देर टिकेंगी नहीं और उसके बाद पैरासीटामाल ही काम आएगी। खैर, अभी तो छतरी ही काम आई। हम दोनों बरसते मौसम में आधे भीगते आधे झूठ-मूठ में खुद को बचाते उमियम के किनारे टहलने लगे। झील पर बारिश होते देख 'समंदर पर बारिश' की याद हो आई। एक ही बारिश के कितने रूप हैं, पहाड़ू पर अलग, जंगल पर अलग, झीलों पर अलग, समंदर पर अलग और सड़कों पर एकदम अलग। मुझे फूलों पर गिरती बारिश की याद भी ताजा हो आई। 



उमियम का विस्तार खूब बड़ा है। ऐसा लग रहा था वो हल्की रिमझिम की चादर ओढ़े कच्ची सी नींद में है। किनारे कुछ लोग छतरियाँ लगाए शायद मछ्ली पकड़ने की फिराक में थे। पल पर से गाडियाँ गुजर रही थीं लेकिन कोई शोर नहीं था। झील के ठीक सामने पहाड़ियों पर बादलों की धमाचौकड़ी मची हुई थी। बावरा मन सब कुछ को पी लेने को आतुर था। सारा सौन्दर्य, सारी छुअन, सारे बादल, सारे पानी। और शायद हम पी भी रहे थे। इसीलिए तो भीतर का सारा कचरा झाड़कर आए थे कि भीतर हर कोने में मौसम की जगह हो। 


हम लगभग पूरी झील का चक्कर काटने की फिराक में थे। उन्हीं रास्तों पर फिर फिर लौटना, फिर फिर दृश्यों को आँखों में समेट लेना जारी था। पूरे रास्ते में उँगलियों की पोरों पर, हथेलियों में बारिश समेटने को बेताब रही। ऐसा लग रहा था हर बूंद मेरी सूखी रूह पर मरहम है। 

बारिशें मुझे हमेशा से बेहिसाब चाहिए थीं...बस उस बेहिसाब होने में बेमौसम की बरसात और किसी का घर तबाह करने वाली बरसात हरगिज़ नहीं थी। 

फ़िलवक्त बूंदों ने लाड़ लड़ाते हुए कहा, मेघालय आई हो, सुखी होकर ही जाओगी। और सुख मेरी देह पर रेंगने लगा था। 

(जारी...)