Thursday, April 16, 2026

अप्रैल उम्मीद है


वो जो खिलखिला रहे हैं मोगरे इन दिनों
ये अप्रैल की आहट है
ये जो सारे दरवाजे खिड़की भेदकर 
चली आती है रातरानी की ख़ुशबू 
ये अप्रैल का दीवानापन है 
ये जो आँखों से निकल भागे हैं ख़्वाब 
मटरगश्ती करते फिर रहे हैं यहाँ से वहाँ 
ये अप्रैल की शरारत है 
ये जो समन्दर की लहरों को 
अंजुरियों में समेट लेने को व्याकुल है एक लड़की 
ये अप्रैल पर भरोसा है 
ये उड़ते हुए सेमल के फाहे 
आ बैठे हैं काँधों पर 
ये अप्रैल से उम्मीद है 

Sunday, April 12, 2026

कहानियों के फूल हक़ीक़त की धरती पर खिल उठे थे


मुझे ख़्वाब देखते लोग बहुत अच्छे लगते हैं। उनके पास से अलग ही ख़ुशबू आती है। न जाने क्यों लेकिन ख़ुद ख़्वाब देखने से डरती रही। डर ख़्वाब टूट जाने का। डर मेरे ख़्वाबों का उपहास उड़ाए जाने का। 

लगभग आधी ज़िंदगी जी चुकने के बाद सहमते हुए ख़्वाबों की ओर हाथ बढ़ाना शुरू किया। चारों तरह देखते हुए कि कोई ख़्वाब देखते हुए देख न ले। कोई देखेगा तो मज़ाक ही उड़ाएगा 'आईं बड़ी, इत्ते बड़े-बड़े ख़्वाब देखने।वालीं'। 

फिर मैंने अपनी दुनिया समेट ली। लोगों से दूरी बना ली। शब्दों से, कुदरत से दोस्ती कर ली। अपनी छोटी-छोटी कहानियों में अपने तमाम सपने लिखने लगी। इन कहानियों में मैं थी, मेरा मन था। वो जंगल थे जिन्हें मैंने देखा नहीं, वो रास्ते जिनसे मैं गुजरना चाहती थी, मुक्कमल प्रेम की चाहना जो ख़्वाब में भी पूरा होने को तैयार नहीं। इन कहानियों समंदर, नदी, झरने, फूल, बादल, बारिश सब भरपूर थे। और थी इस धरती को प्यार से भर देने की इच्छा। 
मैं अपनी कहानियों में सांस लेने लगी थी, मैंने देखा मैं खुश रहने लगी हूँ। इन कहानियों से एक ख़ुशबू आती है जो मुझे टूटने से बचा लेती है।

फिर ये कहानियाँ भी जज की जाने लगीं। इनका भी उपहास किया जाने लगा। और हम सब जानते हैं कि हमारा मनोबल हमारे सबसे करीबी लोग ही तोड़ते हैं। मेरी कहानियों के फूल मुरझाने लगे, मेरी कहानी की नदियां सूखने लगीं। 

कहानियाँ लिखना बंद होने लगा। एक रोज मैंने ख़ुद को ख़ुद से बिछड़ते पाया। मैं सूखी नदी के सीने से धंस जाती और देर तक सुबकती रहती। अमावस की रात में चाँद ढूंढती फिरती। एक रोज मैंने अपने सूखे मन पर कुछ बूंदें महसूस कीं। मेरी ही कोई कहानी हक़ीक़त में मेरा हाथ थामकर मुझे लेकर चल पड़ी। मैं उसके पीछे-पीछे हैरत से, वो मेरा हाथ थामे मुसकुराते हुए।

मैं समझ गयी, मेरी कहानियाँ हक़ीक़त की ज़मीन पर उतर भी सकती हैं। वो समंदर का किनारा, वो प्रेमी के कांधे से टिककर घंटो जाते हुए सूरज को देखना, तारों की छाँव में बिना बोले बस चलते जाना और सोचना कि एक दिन यूध्ध खत्म हो जाएंगे सारे, धरती पर सिर्फ प्यार बचेगा। 

कहानी कहती, 'उस प्यार को बचाने के लिए भी युध्ध तो करना पड़ेगा। युद्ध सबको लड़ना होगा, हर किसी को। किसी से नहीं, ख़ुद से। अपने भीतर पल रही हिंसाओं से। तरह-तरह की हिंसाओं से।'

'फिर?' मैं कहानी से पूछती। 
'फिर दुनिया में कोई किसी से नफ़रत नहीं करेगा।'  कहानी मुस्कुराती। मैं उसका हाथ थामे उसके पीछे पीछे चलते हुए मासूमियत से पूछती 'लेकिन यह तो यूटोपिया है न ? 

कहानी मुझे हौसला देती, 'सपने देखने से न डर पगली। तू सपने लिख, क्या पता किसी दिन तेरे सपने हक़ीक़त बन खिल उठें।' यह सुनते हुए मैंने उस रोज अपने सबसे प्यारे सपने की हथेलियों को ज़ोर से अपनी हथेलियों में भींच लिया। मेरी आँखें बह निकली थीं, सुख से। सपने को सब पता होता है, उसने मुझे गले से लगा लिया। लहरों की आवाज़ कानों में घुल रही थी।

आसमान में तारे उस रोज झमककर खिले थे। सप्तऋषि मण्डल को देखते हुए हम ध्रुव तारे को ढूंढने लगे ताकि ख़्वाबों पर यक़ीन करना चाहिए इस बात पर ध्रुव तारे की मुहर लगा दी जाय। ध्रुव तारा मुस्कुरा रहा था।

अगली सुबह मैं नया ख़्वाब लिख रही थी....कि एक रोज़ धरती पर कोई किसी से नफ़रत नहीं करेगा, ईर्ष्या नहीं करेगा, कोई प्रेम से नफरत नहीं करेगा...

उस रोज चाँद आसमान से जाने को तैयार नहीं था। वो कहानी में लिखे ख़्वाब को किसी आयत की तरह  बुदबुदा रहा था। समंदर की लहरें करीब आकर बैठी थीं, एकदम शांत।

मैंने कहानी के अंत में लिखा...आमीन!

Friday, April 3, 2026

जीवन के पास क्या मरहम है?


खरगोशों की उदुक-फुदक दिन के उगने से पहले धरती को संवार रही है। अरसे बाद बालकनी से लटक कर लगभग कांधे से आ लगने को आतुर अशोक धरती को शोक मुक्त करने की प्रार्थना में मानो आँखें मूँदें खड़े हैं। धूप के कुछ कतरे इधर-उधर बिखरना शुरू हो चुके हैं।

इस सुबह में कल रात का कलरव भी दाखिल है। पूर्णमासी का चाँद मानो सुबह के करीब रखे चाय के कप को जरा सा सरकाकर बैठा ऊंघ रहा हो। मैं नन्हे अचंभे से चाय के कप को देख रही हूँ, जिसके दाहिनी तरफ सुबह की किरनें हैं और बायीं तरफ पूर्णमासी के चाँद की धज।

सुबह के वैभव को देखती हूँ तो खुशी गालों पर छलक़ने को आतुर होती है। ठीक उसी वक़्त कोई मध्धम सी सिसकी जो भीतर ही भीतर न जाने कबसे पल रही है आँखों के रास्ते बाहर आने का रास्ता ढूंढ लेती है। सिसकियाँ बेआवाज होती है, उन्हें भीड़ से डर लगता है। उन्हें आईने से भी डर लगता है। वे एकांत की फिराक में रहती हैं। वे फिराक में रहती हैं कि कब मैं भीड़ से तनिक हाथ छुड़ाऊँ और खुद के करीब आऊँ।

इस गहरी सिसकी में जमाने भर की औरतों की वेदना घुली है। इसमें मेरी बेबसी घुली है। जब्त है, आक्रोश है। मैं इससे आँखें नहीं चुरा सकती।

नन्हा सा सुख भी किसी कर्ज़ सा लगता है।

इस सुबह में प्यार है। साथ ही एक गुहार है। ईश्वर से प्रार्थना है, कि तुम हो, तो हो न यार। सारे पत्थर दिलों को मोम कर दो न। सारे हथियारों को फूलों में बदल दो न। सारे बस्तों में सपने भर दो, इस दुनिया को कुछ तो जीने लायक बना दो।

तो क्या मैं इतनी निराश हो चुकी हूँ कि किसी चमत्कार.का इंतज़ार करने लगी हूँ। मैं खबरें छुपाती फिरती हूँ, या खबरों से छुपती फिरती हूँ पता नहीं लेकिन जानती हूँ बच तो बिलकुल भी नहीं पाती।

अशोक के पेड़ों की कतारें जिस तरह प्रार्थनामय हैं मेरे हाथ अपने आप जुड़ गए हैं, ओ जीवन, जरा सा मरहम बन जा, जा जख्मी दिलों को गले से लगा ले। सामने ख़रगोश कुलांचे मार रहे हैं, सुबह पूरी तरह धरती पर बिखर चुकी है, लेकिन क्या अंधेरा पूरी तरह गायब हो चुका है।

Thursday, March 19, 2026

दिल से दस तक


ऐसे रास्ते पर चलना जिसमें कोई होड़ न हो। जिस पर चलने वालों को कहीं पहुँचने की हड़बड़ी न हो। किसी को किसी से बेहतर साबित करने का कोई दबाव ही न हो। बस सुख हो साथ चलने का। हाँ, यह रास्ता है कविता कारवां का। कुछ कविता प्रेमियों ने सपना देखा किसी ढलती शाम में किसी पहाड़ी, किसी नदी किसी जंगल के तीरे बैठकर अपने दिल के बेहद क़रीब रहने वाली कविताओं को एक-दूसरे से साझा करने का। कवितायें भी अपनी नहीं, अपने प्रिय कवियों की। तो बस 2016 की एक शाम देहरादून के जसवंत मॉडल स्कूल में पहली बैठक हुई। तब से आज तक यह सिलसिला देश दुनिया में लगातार चल रहा है।

दिल ने कविता की देहरी पर दस्तक दी थी और कार्यक्रम की शुरुआत हुई थी। आज वह दिल की दस्तक दस वर्ष का सफर तय कर चुकी है।

इस सुंदर कान्सेप्ट को किसने शुरू किया, कैसे आगे बढ़ा यह बात लगातार अर्थहीन होती गई और यही इसकी सफलता है। हर वो शख्श जो एक बार बैठक में शामिल हुआ इस आयोजन का उतना ही owner हुआ जितना शुरुआत करने वाले कभी थे। फिर यह सिलसिला बढ़ता गया, जिम्मेदारियाँ एक से दूसरे को ट्रांसफर होती रहीं। शहर-दर-शहर बैठकियां होने लगीं।

आज दसवीं सालगिरह की दहलीज़ पर खड़े हुए सिर्फ एक एहसास तारी है, कितना प्यार मिला, कितने प्यारे लोग मिले, कितना सुकून मिला। जीवन में भला और क्या चाहिए होता है।

कविता कारवां हर कविता प्रेमी का अपना कार्यक्रम है। दुनिया भर से लोग इसमें जुड़े हुए हैं। कोई कुछ चाहता नहीं है, सिर्फ देता है अपना समय, प्यार और साझेदारी। हम नहीं जानते यह दुनिया कैसे बेहतर हो सकती है, बस इतना जानते हैं कि हम जहां हैं, वहाँ से शुरुआत हो सकती है।

कविता कारवां पर नाज़ है। यहाँ कोई ईर्ष्या नहीं, द्वेष नहीं, कोई राजनीति नहीं, सिर्फ और सिर्फ प्यार है और है अपनी प्यारी कविताओं के जरिये एक ख़ूबसूरत दुनिया का सपना देखना।

तो आइये, शामिल होते हैं कविता कारवां की दसवीं सालगिरह के उत्सव में और तलाशते हैं अपनी भूमिका इस दुनिया को मानवीय और करुणा से भरा हुआ बनाने की।

हैपी बर्थडे कविता कारवाँ!

Wednesday, March 18, 2026

उसने कहा, मैं हूँ न!

लाल टिब्बा का वैभव अब ब्लोगर्स और फोटोग्राफर के हवाले हो चुका है। दुर्लभ प्राकृतिक दृश्यों से घिरी जगह की खूबसूरती को सम्पूर्ण मौन और समर्पण में ही महसूस किया जा सकता है। शुरुआती दिनों में कई बरस पहले जब आती थी तब इतनी भीड़ नहीं होती थी। ख़ासकर ऊपर जहां बड़ी सी दूरबीन से हिमालय की रेंज को देखने का सुख रखा था। हम अक्सर मौसम के खुलने का इंतज़ार करते थे हालांकि दूधिया ओढ़नी में लिपटे पहाड़ों और जंगलों के सौंदर्य में गुम होते हुए बर्फ से लदे पहाड़ों को न देख पाने का मलाल नहीं ही हुआ कभी। 

अक्सर यहाँ चाय की प्यालियों में बादल का कोई टुकड़ा रखा देखा है। चलते हुए महसूस किया है कि पाँव ज़मीन पर नहीं बादलों पर पड़ रहे हैं। कल्पना में नहीं सच में। यही बात लैढ़ोर को खास बनाती है।  

लेकिन, हम जिस सुख की तलाश में पहाड़ों पर जाते हैं उसी सुख को नष्ट करने की अभिलाषा भी साथ लिए जाते हैं। जिस डाल पर बैठे हैं उसे ही काटने में लगे लोग हैं हम। लालच इतना कि दुनिया कि हर अच्छे पर अपनी नेम प्लेट लगाने को व्याकुल। बाज़ार को दोष देना कई बार खुद को बचाना भी लगता है। 

लाल टिब्बा का वैभव इस बार लोगों की भीड़ में, खुद को अच्छे अच्छे पोज में फोटो में कैद कर लेने की हड़बड़ी में और ढेर सारा खाना पीना करने में गुम होता दिखा। वो जगह जो मेडिटेटिव हुआ करती थी अब कैफे में बदल गयी है। खाना और फोटोग्राफी की होड़ मिलकर जैसे शांत पानी में कंकड़ी मार रहे थे। 

जगह की कमी थी और लोग इंतज़ार की लाइन में थे। सूरज अपने पूरे वैभव के साथ डूब रहा था और लोग अपनी कॉफी, अपने खाने का ऑर्डर करने में बिज़ी थे। 

वहाँ जमा तमाम लोगों में मुझे एक भी ऐसा नहीं दिखा जो प्र्कृति इस अनमोल लम्हे के सजदे में हो, जो इस सुख को आत्मसात करते हुए छलक पड़ा हो, जिसने अपने भीतर कुछ पिघलते हुए महसूस किया हो। 

जिस जगह बैठकर कभी सुख से छलक पड़ा करती थी आज उस जगह के खो जाने का दुख तारी होने लगा था। एक बार फिर यह बात पुख्ता हुई कि टिकट कटाकर निकल पड़ने से आप यात्रा का सुख ले पाएंगे यह बात अधूरी है। यात्रा की तैयारी पहले भीतर करनी होती है। वरना सोशल मीडिया तो अपडेट हो जाएगा लेकिन जीवन अपडेट नहीं हो पाएगा। 

मन की इस उथल-पुथल और बेचैनी को कौन सुनता वहाँ सिवाय मौसम के। सो ठंडी हवा के झोंके ने कंधे सहलाते हुए कहा, 'परेशान न हो मैं हूँ न।' मैंने चलना शुरू कर दिया...ठंड ने गाल सहलाये तो साथ लाई हुई शाल मुस्कुरा उठी।   

जारी...

Tuesday, March 17, 2026

उसने मेरा हाथ थाम लिया था

सूरज ढलते ढलते उदास शाम का सिरा थमा गया था। दिन के जाने और रात के आने के बीच का यह छोटा सा वक्फ़ा अपने भीतर न जाने कितनी उथल पुथल समेटे होता है। किसी के जाने और आने के बीच का वो हिस्सा जिसमें न जाने कितने संशय सांस ले रहे होते हैं। विगत की हथेलियाँ छूट नहीं रही होतीं और आगत की आहट का कोई पता नहीं होता। 

देवदार के घने जंगलों के बीच रोशनी और अंधेरे के रंग खेल खेल रहे थे। यह आँख मिचौली का खेल नहीं था, यह खेल था सांस के आने और जाने के बीच जरा सा सुस्ता लेने का। लैंढ़ोर न जाने कितनी बार आई हूँ लेकिन आने और आने में फर्क होता है। इस बार का आने खुद से ख़ुद को रिहा करने के लिए जरूरी था। मैं उन रास्तों पर चलते हुए जीवन की उन पगडंडियों की स्मृतियों को भी पार कर रही थी जिन पर चलकर मेरा वजूद बना है। 

जंगल की ख़ुशबू को थाम लेने को व्याकुल हथेलियाँ ख़ुद पर हंस रही थीं। ख़ुशबू को भला कोई थाम सकता है? क्या उसकी कोई तस्वीर ली जा सकती है? नहीं, ख़ुशबू को सिर्फ जिया जा सकता है। एक जगह बैठकर मैं देवदार और आसमान की गुफ्तगू को होते हुए देख रही थी। मेरे पीछे जीवन और मृत्यु का मंत्र बुदबुदा रही थीं कब्रें। उन कब्रों में सोये हुए लोग सुकून में तो होंगे शायद। 

जब सब कुछ इतना फ़ानी है तो झगड़ा किस बात का है आखिर। झगड़े का संसार हमारा बनाया हुआ है। झगड़ा कितना बेवजह यह बताने को कुदरत हमेशा तैयार रहती है। टट्टू पर बैठा खिल खिल करता बच्चा, उसके साथ चलता पिता, फोटो का ठीक ठीक एंगल ढूंढती माँ की खुशी, जीवन पर भरोसा है। वह भरोसा जिसे दुनिया भर के समझदार लोग लगातार तोड़ने पर लगे हैं। 

चलते-चलते पूरी धरती नाप लेना चाहती हूँ। इन दिनों पाँव थकते नहीं हैं। असल में जितना चलती हूँ मन को उतनी रिहाई मिलती है। चलना रास्तों से रिश्ता बनाना है, ख़ुद के करीब लाता है। चलते हुए चुप रहना किसी ध्यान में होने जैसा होता है। यह हाल ही में जाना है। अपने हाल में जाने हुए को मुट्ठियों में कैद कर लेना चाहती हूँ। फिर ख़ुद की बेवकूफी पर हंस देती हूँ। जो कुछ भी दुनिया में अच्छा है उस पर कब्जेदारी की हमारी फितरत। 

यह मेरा जाना हुआ है, यह व्यक्ति मेरा है, यह जगह मेरी है, यह घर मेरा है...सारा झगड़ा मैं का है। ख़यालों के गहरे समंदर में डूबे हुए मैं अपने भीतर धँसती जा रही थी। भीतर धँसते जाने का अर्थ है अपने भीतर छुपा कर रखी उस क़ीमती शय जिसका नाम उदासी है को छू लेना। 

मेरी आँखें बह निकली थीं और इस बात की खबर गालों के अलावा किसी को नहीं थी। लैंढ़ोर की हवा मरहम सी बन चुकी थी। भीतर का अंधेरा खाली हो रहा था और बाहर उगा रहा ताजा अंधेरा रोशनी बनकर भीतर प्रवेश कर रहा था। 

युवा खिलखिलाहटों का सैलाब उधर से गुजरा तो लगा ढेर सारे फूल खिले हों। उनकी हंसी से एक फूल चुराकर मैंने अपने बालों में टाँक लिया था...

लैढ़ोर ने हाथ थाम लिया था। 

(जारी...) 

Monday, March 16, 2026

लैढ़ोर- ख़्वाब का खुलता सिरा



चलते-चलते अचानक पाँव अचानक मुड़ गया। मीठे दर्द की लहर सी उठी। टीस देह में उतर गयी। जिस वक़्त यह हुआ सूरज दिन के रजिस्टर पर अपनी दिहाड़ी पूरे होने के सिग्नेचर कर रहा था। देवदार के पेड़ अपनी गर्दन उठाए कुछ इस गलतफहमी को जी रहे थे मानो वो सामने खड़े हिमालय से ज़्यादा ऊंचे हों। हालांकि उनकी लहराती झूमती शाख़ों को ऐसा कोई गुमान नहीं था, वे बस अपने होने में ही खुश थीं। ढेर सारे टूरिस्ट पहाड़ी की ओट में जाते सूरज को अपने-अपने मोबाइल में कैद करने की जुगत लगा रहे थे। इस जुगत लगाने में उनका उस लम्हे को जीना लगभग छूटा जा रहा था।

मेरे पाँव के मुड़ने की ख़बर मेरे क़रीब खड़े मेरे दोस्त को नहीं हुई लेकिन उफ़क में अटके सूरज को हो गई। उसके घर जाने की स्पीड में ब्रेक लग गया। उसने पलकें झपकाकर पूछा, 'क्या हुआ?' 
मैं हंस दी। 'कुछ नहीं' कहकर वहीं उसी पहाड़ी के किनारे बैठ गई।
सूरज नाराज़ होकर बदली में छुप गया।

मैं जानती हूँ इसके ये खेल, मैंने दर्द को घूंटते हुए कहा, 'तुझे कुछ देर और रोकना था, बस इसलिए। देख, तू रुक गया न?' बदली से झाँकते हुए उसने अपनी नाराज़गी को कुछ यूं लपेटा, जैसे पड़ोस वाली आंटी ने शाल लपेटा।

मैंने उस हँसकर दिखाया, देख मैं ठीक हूँ। उसने मेरी पीठ पर धौल देते हुए कहा, 'मुझसे न छुपा, मैं सब जानता हूँ।
अब संभलकर घर जा, आराम कर।'

'पहले तू तो जा। देख कितने सारे लोग तेरे जाने को देखने को व्याकुल हैं'। वो हंसकर चल दिया। जाते-जाते अपनी रोशनी मेरे दर्द पर रख दी थी उसने।

दर्द में थोड़ी राहत तो आई थी।

Saturday, March 14, 2026

सुख को नाराज़ होते देखा है कभी?

खुद से इतनी शिकायतें रहती हैं कि मुंह चुराती फिरती हूँ। मानो खुश रहना कोई गुनाह हो। जब-जब रत्ती भर सुख हुआ, उसके छूटने के दुख ने इतना विचलित किया कि सुख के गाल पर मानो कोई स्क्रेच आ गया हो। वो मुझे घूर के देखता और मुंह फेर लेता। सुख को नाराज़ होते देखा है कभी? 

मैं उसके नाराज़ होने से उदास तो होती हूँ लेकिन उसे मना नहीं पाती। जाने कहाँ से प्रेमी की यह आदत मुझमें छूट गई। 

बाज दफा तमाम शिकायतें होती ही इसलिए हैं कि उन्हें मान मिले, उनकी परवाह की जाय। देखा है अक्सर झगड़ों की वजह इतनी मामूली होती हैं कि हैरत होती है कि भला इस बात पर कोई कैसे झगड़ सकता है लेकिन जो इश्क़ के खेल से वाकिफ हैं वो जानते हैं ये झगड़ा नहीं प्रेम है। वजह पर मत जाओ, प्यार पर जाओ। जब प्रेमी रूठे तो रूठने की वजह मत तलाशो, तर्क मत करो बस बाहों में भर लो। एक स्नेहिल स्पर्श हज़ार मर्ज की दवा होती है। 

सब जानते हुए भी सुख की हथेलियाँ थाम नहीं पाती, हालांकि चाहती हूँ उसके कंधे पर सर टिकाकर बची हुई उम्र गुज़ार दूँ। प्रेम में मान बहुत होता है। सुना था मानिनी प्रेमिकाओं का माथा हमेशा उन्नत होता है और उनके चेहरे पर अलग ही चमक होती है। क्या मेरे चेहरे पर वह चमक है? आईना देखती हूँ और मुस्कुरा देती हूँ। 

मेरा रूठा हुआ सुख मुझे आईने में देख अपना रूठना भूल जाता है। क़रीब आकर खड़ा हो जाता है। बिलकुल सटकर। हम दोनों साथ में अच्छे लगते हैं मैंने मन में सोचा। मेरा ऐसा सोचते ही खिड़की से हवा का झोंका कमरे में दाखिल हुआ। आईने में मेरे सिवा कोई नहीं था। 

कमरे में भी कोई नहीं। घबराकर इधर-उधर देखा, वो कहीं नहीं था। वो जा चुका था। नहीं जानती थी कि फिर वापस आएगा या नहीं। एक पूरा बरस या शायद उससे ज्यादा ही बीत गया उसे गए। वो सुख था पढ़ने का सुख, लिखने का सुख, संगीत का सुख, जीने का सुख। सुबह की चाय के साथ देर तक बारिश देखने का सुख, परिंदों के खेल देखने का सुख। मैंने सबको नाराज़ कर दिया और खुद को काम में झोंक दिया। 

किताबें पास होने से आप उन्हें पढ़ लेंगे यह संभव नहीं। कई बार किताबों को पलटा, कुछ पन्नों का सफर तय किया और फिर जाने कहाँ खो गई। वो किताबें अच्छी हैं, मेरा ही सुर बिगड़ा हुआ है। 

आज इस सुबह में जब आबिदा को कबीर गाते सुन रही हूँ तो महसूस हो रहा है कि कोंपलें सिर्फ बाहर नहीं फूट रही हैं। शायद मेरे सुख दरवाजे पर हैं। शायद वो लौटना चाहते हैं। शायद वो भी मुझे मिस कर रहे होंगे। अजीब सा दीवानापन है इस सुबह में। थोड़ी सी हड़बड़ी भी। ज्यादा सुकून है। 

सोच रही हूँ चाय का पानी पहले चढ़ाऊँ या दरवाजा पहले खोलूँ? सुबह की चाय पिये कई महीने बीत चुके हैं। आखिर दरवाजा पहले खोलते हूँ, कहने को वहाँ कोई नहीं लेकिन मैं जानती हूँ एक जीवन है जो रूप बदलकर बिना दस्तक दिये आने की फिराक में है। 

चाय का पानी चढ़ा दिया है, दो कप चाय का पानी। आबिदा आपा मुस्कुराकर गा रही हैं, भला हुआ मोरी मटकी फूट गई....

Thursday, March 12, 2026

क्या मुझे नींद आएगी


कई रोज से एक ख़ुशबू को थामे चल रही हूँ। उगते सूरज की ख़ुशबू। नई कोंपले फूटने की ख़ुशबू। सड़कें झरे हुए फूलों से भर उठी हैं। जिन रास्तों से गुजरती हूँ मेरे सर पर आसमान के साथ-साथ फूलों का एक सैलाब सा छाया होता है। मेरे दायीं तरफ फूलों की कतारे हैं और बाईं तरफ आम, लीची की बौर। पूरा शहर फिर से नये उगने की ख़ुशबू में डूबा है।

सारे दिन शहर का मौसम मुझे देश दुनिया के मौसम से, ख़बरों से बचाए रहता है। शाम होते-होते सब बिखरने लगता है। ख़बरों के छींटे कानों में पड़ते हैं और कानों से खून रिसने लगता है। अंधेरा छाने लगता है आँखों के आगे। नींद आ तो जाती है लेकिन बुरे ख़्वाब के चलते टूट जाती है। सोचती हूँ ख़्वाब ज्यादा बुरा था या हक़ीकत ज्यादा बुरी है।

नानी की कहानी में प्यार का जिक्र यूं होता था जैसे दाल में नमक का। बिना नमक की कोई दाल हुई भला, वैसे ही बिना प्यार के कोई ज़िंदगी हुई भला। सम्मान और प्यार हर इंसान की जरूरत है। रोटी भी बिना सम्मान के मिले तो बुरी ही लगती है ये बात और है कि मुफ़लिसी ने सम्मान को पीछे धकेलने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

जब सबको प्यार चाहिए तो ये नफ़रत कौन परोस रहा है। इतनी नफ़रत कि इंसान को इंसान ही न समझें। दुनिया की नफ़रत के बारे में ड्राइंगरूम या सोशल मीडिया पर मोर्चा खोलने या ज्ञान देने के बाद वक़्त मिले तो यह ज़रूर सोचना चाहिए कि एक व्यक्ति के रूप में हमारे भीतर कितनी हिंसा है। हमने कितनी बार हिंसक व्यवहार किया। किसके साथ किया। हिंसा को किस तरह समझा।

एक लंबी चुप्पी, उपेक्षा, उपहास क्या कम हिंसक होती है?

हमारे भीतर जो आक्रोश है वो किसके प्रति है? Powerless के प्रति ही तो। यही सारा खेल है। इसे समझने की बजाय इसमें फँसते जा रहे हैं हम सब। नफ़रत का यह चक्रव्यूह सबको घेरता जा रहा है। ऐसा चक्रव्यूह जिससे निकलने का रास्ता कोई नहीं जानता।

इस चक्रव्यूह की गिरफ्त बढ़ती जा रही है। हम एक अंधी सुरंग में जाते जा रहे हैं। धरती पर खून के छींटे बढ़ते जाते हैं और मन पर स्याह अंधेरा घिरता जाता है।

मैं खिलती हुई कोंपलों को देख ही रही थी कि खेल के मैदान में खेलता एक बच्चा ठोकर खाकर गिर गया। तभी एक दूसरे बच्चे ने आकर उसे उठाया और उसकी धूल झाड़ी।

मैं न तो गिरने वाले बच्चे का धर्म या जाति जानती थी, न उसे उठाने वाले बच्चे की। बस उन दोनों के चेहरे की मुस्कुराहट को और साथ खेलने को देख रही थी। तेज हवा के झोंके से वोगेनवेलिया के फूल शाखों से छूटकर मेरे काँधों पर आ बैठे थे।

क्या मुझे आज कुछ अच्छी नींद आएगी?

Saturday, February 28, 2026

हम दोनों प्यार में थे




अज़ान की आवाज़ के साथ मैंने 
पार किया रास्ता 
प्रार्थना की पंक्तियों के साथ 
तुम आगे बढ़े 

हम मिले गिरजे की उन सीढ़ियों पर 
जहां न जाने कितने नाउम्मीद
लोगों के कदमों के निशान थे 
कितनी उदासियों का ठौर था 
कितने कनफेशन सर झुकाये बैठे थे 

हमने एक दूसरे को थामने से पहले 
उन तमाम नाउम्मीदियों को थामा 
हमने एक दूसरे को चूमने से पहले 
उन सीढ़ियों को चूमा 

उतरते दिन की रोशनी 
ने हम दोनों को ढँक लिया था। 

हम दोनों सजदे में थे 
हम दोनों प्यार में थे।  


Tuesday, February 10, 2026

फ़रवरी का महीना और प्यार की बातें


प्रेम के इस महीने में 
ऐसे पुरुषों से सवाल करना 
लगभग गुनाह है 
जो अपना प्रेम स्त्रियों पर उलीचने को 
लगभग बेसब्र हुए जा रहे हैं 

जो मजे से हँसकर कहते हैं 
मेरे पास बहुत प्रेम है 
और मैं सारे जमाने की औरतों में 
बांटना चाहता हूँ 
उनसे यह पूछना 
कि इस सारे जमाने में 
उनके घर की स्त्रियाँ भी शामिल हैं क्या 
प्रेम के महीने का मज़ा किरकिरा कर देगा। 

कोई लॉन्ग ड्राइव पर ले जाए 
तो मुस्कुराकर चली जाइए 
उनसे यह न पूछिये कि मुझसे पहले 
जो लड़की कार की इस सीट पर बैठी थी 
वो अब कैसी है, क्या तुम्हें मालूम है? 

जब वो कहें कि 'तुम्हारी बहुत याद आती है' 
तब उनसे यह पूछना अभद्रता होगी कि 
यह मैसेज अभी-अभी तुमने कितनों को भेजा है 

जब वो आपको प्रेम भरी निगाहों से देख रहे हों 
आपकी हथेलियों को थामकर 
दूर तक साथ चलने के वादे कर रहे हों 
आप यह पूछने की गुस्ताखी कैसे करेंगी 
कि जिसे जीवन भर साथ चलने के वादे के साथ 
घर लाये हो, उसका क्या?

जब वो रिश्ते में ईमानदार होने की बात कहें 
तो बस मुस्कुराइये यह सोचते हुए कि 
उनका आपके साथ होना
उनकी बेईमानी का पहला सुबूत है

आखिर यह प्रेम का महीना है 
प्रेम के महीने में सवाल नहीं पूछे जाते 
प्रेम किया जाता है। 

लेकिन, यह सबकुछ क्या सचमुच प्रेम है 
हमेशा और प्रेम के इस महीने में भी  
यह सवाल सिर्फ खुद से पूछना मेरी जान। 

Saturday, February 7, 2026

पापा अब ठीक हो रहे हैं


सुबहें फिर से नज़र आने लगी हैं। रातों का अंधेरा अब डरा नहीं रहा। दूरियों के कारण रुकती हुई सांसें अब बेहतर हैं, जब पिता की कलाई हाथ में है। पापा अब ठीक हो रहे हैं। वो ठीक हो रहे हैं तो बिखरा हुआ जीवन सम पर लौट रहा है। शुभचिंतकों की शुभकामनाएं और डॉक्टर्स के एफर्ट्स मिलकर काम कर रहे हैं।

एक सप्ताह हुआ। हाँ, पिछले शनिवार यानि 31 जनवरी की शाम, पापा को हार्ट अटैक आया। एक ही पल में सब उलझ गया। उदास या परेशान होने का समय कहाँ होता है उस वक़्त, उस वक़्त तो बस संभालने का समय होता है। परेशान होना का जिम्मा उन्हें मिलता है जो दूर होते हैं। देहरादून से लखनऊ पहुँचने का समय इतना लंबा कभी नहीं लगा। राहत थी कि भाई है, सब ठीक कर लेगा, बड़ी राहत यह भी कि वो अकेला नहीं है उसके दोस्तों की पूरी फौज है उसके साथ, राहत थी कि माँ अकेली नहीं है इस गाढ़े वक़्त में। राहत कि भाभी मुझसे पहले पहुँच चुकी थी। इन तमाम राहतों ने हौसला दिया और पापा के पास पहुँचने तक का समय तनिक आसान किया।

पापा के दोस्तों ने साहस दिया, साथ दिया।

अब पापा ठीक हो रहे हैं। घर आ गए हैं। बड़ी मुसीबत आई थी...लेकिन अब जबकि सब ठीक होने की तरफ है, सोचती हूँ, तो पापा की मुस्कुराहट हौसला देती है और उनका वो सर्जरी के बाद चेतन होते ही किताब और चश्मा मांगना भी गुदगुदाता है।

हम सब असल में पापा की हिम्मत से बने हैं, उनके ही हौसले से चलते हैं। पापा के शीघ्र स्वास्थ्य लाभ के लिए आप सब की शुभकामनाएँ लगातार चाहिए।

इस दौरान जिन लोगों के फोन नहीं उठा सके उनसे क्षमा, उम्मीद है समझेंगे आप।

Saturday, January 24, 2026

नानी कहती थीं...


नानी कहती थीं कि बिटिया 
कुछ बातों के बारे में लोग बात करेंगे नहीं 
कुछ बातों के बारे में बात कर नहीं पाएंगे   
और जिन बातों के बारे में बात करेंगे  
वो लगभग निरर्थक होंगी 
जो बातें निरर्थक होंगी 
वो सबसे ज्यादा सुनी जायेंगी।  

सबसे पीड़ित व्यक्ति 
अपनी पीड़ा की बात नहीं सुनेगा 
उसके सामने दूसरे की पीड़ा को 
मनोरंजन बनाकर परोस दिया जायेगा  
वो अपनी भूखी अंतड़ियों को 
बांधकर
हिंसा के दृश्यों में उगाये गए 
आनंद के सागर में गोते लगाएगा।   

वो यह नहीं समझ पाएगा कि वो जो दूसरा है 
जिसकी पीड़ा में ढला मनोरंजन उसे 
गुदगुदा रहा है 
वो और कोई नहीं, वो खुद है 

नानी कहती थीं  कि 
देखना, बाज़ार में सबसे ज्यादा दुख बिकेगा 
लेकिन दुख टिकेगा नहीं 
दुख की कमी सरकार पड़ने नहीं देगी 
दुख को मनोरंजन में बदलने का काम 
संसद तक जा पहुंचेगा। 

देखना एक दिन मनुष्य की पीड़ा चुटकुला हो जाएगी 
और चुटकुला सुनते हुए लोगों को देखना दुख होगा। 

नानी कहती थीं...