Tuesday, August 18, 2026

कबिरा सोई पीर है- हमारे समाज का आईना


नवीन जोशी- 
सघन संवेदनाओं और सामाजिक-राजनैतिक चेतना से सम्पन्न प्रतिभा कटियार कविताओं के अलावा कहानियां भी लिखती रही हैं। रूसी कवि मारीना त्स्वेतायेवा की जीवनी 'मारीना' में कविता एवं कवि-मन की उनकी समझ के साथ उनके गद्य ने भी ध्यान खींचा था। पिछले वर्ष प्रकाशित उनका पहला उपन्यास 'कबिरा सोई पीर है' भी प्रकाशन के बाद से चर्चा में है।

भारतीय समाज में गहरे पैठी वर्णाश्रमी संरचना और उससे उपजी मारक स्थितियां एवं अंतर्विरोध इस उपन्यास का केंद्रीय विषय हैं। घर-परिवार और समाज में स्त्रियों की स्थिति, पुरुष सत्ता द्वारा उनका दमन और क्रमश: उभरती स्त्री चेतना केंद्रीय विषय में गुंथे हुए हैं। प्रेम उनका प्रिय विषय है, इसलिए प्रेम कथा में इस सबको खूबसूरती से पिरोया गया है।

प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी कराने वाले एक कोचिंग संस्थान से कथा शुरू होती है। शुरूआती पृष्ठों में ही 'साला चमार कहीं का। आकर बैठ गया है सर पर', 'ब्राह्मण होकर आरक्षण का पक्ष ले रहा है तू? एक दिन यही आरक्षण तेरे सामने खड़ा होगा भूत की तरह', और 'मैं हर लड़की के, हर स्त्री के सम्मान के लिए लड़ता हूं, लड़ूंगा' जैसे वाक्यों से पाठक का सामना होता है और संकेत मिल जाता है कि यह कैसी लड़ाई का मैदान है।

समवय लड़के-लड़कियों में निश्छल दोस्ती, प्रेम, ईर्ष्या, झगड़े सब स्वाभाविक हैं। गरीब परिवारों में कोचिंग जाते बच्चे बेहतर भविष्य का सपना हैं। सपनों के अलग-अलग धरातल हैं। कोई परिवार ब्राह्मण है और कोई दलित। गरीबी बराबरी का मंच नहीं है। जाति की ऊंच-नीच उसे घोर असमान बनाती है।

प्रेम ऐसे बंधन नहीं देखता। वह असमान मंच पर पेंगें मारता झूलता रहता है। शुरू-शुरू में जो झटके आसानी से झेल जाता है प्रेम, वही खुरदुरी जमीन पर पैर रखते ही कभी जातीय ठोकर खाता है और कभी पुरुष के दम्भ की। कोचिंग सेंटर से शुरू हुआ दलित तृप्ति और ब्राह्मण अभुनव का प्रेम इसी नियति को प्राप्त होता है। 'हर लड़की का सम्मान करता हूं' कहने वाला अनुभव अपने भीतर भरे पाखण्ड को स्वीकार तो करता है लेकिन पितृसत्ता का चोला नहीं फेंक पाता। उसका प्रेम इसी बात से सूख जाता है कि तृप्ति आईएएस परीक्षा में पास हो गई लेकिन वह रह गया।

कथा सुखांत नहीं है लेकिन प्रेम में अपने प्रेमी से अधिक एक पुरुष से छली गई तृप्ति स्वाभिमान के मोर्चे पर मजबूत होती है। तमाम जिल्लत से मुक्त होने के लिए उसके पिता ने आत्महत्या का जो रास्ता चुना, वह तृप्ति का भी रास्ता बंद कर गया था लेकिन तृप्ति फिर खड़ी होती है। उसका फिर से संकल्पबद्ध होना, अफसर बन गए अनुभव के साथ संयोगवश हो गई भेंट के प्रतिरोध में ही जैसे सम्भव होता है। पुरुष दम्भ से वह ताकत ग्रहण करती है और आंसू पोछकर अगले समर के लिए कमर कसती है। यह उपन्यास का सबसे मजबूत पक्ष है।

कथा तृप्ति और अनुभव के प्रेम के इर्द-गिर्द एकरेखीय नहीं रहती। तृप्ति की बहन सीमा के वैवाहिक जीवन की भयावह स्थितियां स्त्रियों के व्यापक दर्द को स्वर देती हैं, जिसमें पत्नी से बलात्कार का विमर्श भी शामिल है। उसके भाई अंशुल की कहानी और अनुभव के पिता के दफ्तर के हालात जातीय नफरत और राजनीति के विरोधाभासों की पोल खोलते हैं। सुधांशु और कनिका का प्रेम और पारिवारिक द्वंद्व भी हमारे ही समाज का आईना है। इस तरह उपन्यास व्यापक संदर्भ और फलक ग्रहण करता है।

प्रतिभा का कवि पूरे उपन्यास पर छाया हुआ है- बीच-बीच में प्रयुक्त किए गए कवितांश, अध्यायों के शीर्षक और प्रत्येक किस्से की शुरूआत और अंत में दी गई शायरी इसका प्रमाण है। भाषा जरूर 'थोड़ा सा रोमानी हो जाएं' वाली छूट लेती है, जिसमें पहाड़ और नदी को भी साथ ले लिया गया है।

बढ़िया उपन्यास है और खूब पठनीय। प्रतिभा से भविष्य में और अच्छे उपन्यासों की उम्मीद बंधती है।
 
15 अगस्त 2026, लखनऊ।
(उपन्यास- कबिरा सोई पीर है', रचना- प्रतिभा कटियार, प्रकाशक- लोकभारती, प्रयागराज।)

Monday, August 10, 2026

मसूरी घुमक्कड़ी : इस बारिश में


उदास आँखों को उस रोज़ धुंध से भरी एक सड़क पर रख दिया था। वही सड़क जिसे दूर से टुकुर-टुकुर देखा करती थी। वही सड़क जो अक्सर ख़्वाबों में आती थी और हाथ पकड़कर उठाकर ले जाती थी।

आखिर एक रोज़ धुंध से भरी उस सड़क पर पाँव रख दिये। ख़्वाब में दिखने वाली सड़क पर जब हक़ीक़त में पाँव रखे तो जैसे दिल के सीले कोनों को तनिक रोशनी मिली हो।

उम्र का कुछ न कहिए ये न जाने कितने परतों में रूप बदल बदल कर रहती है। अचानक से मैंने खुद को किसी नन्ही बच्ची में तब्दील होते देखा, फिर कुछ देर में एक किशोरी वय में पर असल उम्र वाली मैं तो असल में कहीं नहीं थी। या शायद यही असल है कि जो जीवन हमसे जीने से छूट जाता है, वह फिर फिर लौटकर आता जरूर है। जैसे मुझसे बिना जिये बचपन छूट गया, जवानी भी छूट गई और अब इस अधेड़ सी उम्र में वह सारा कुछ क़रीब आकर बैठ जाता है।

सोचती हूँ, हमें इन गिरहों से आज़ाद कौन करता है, हम खुद ही तो।

उस रोज़ भी ऐसे ही एक बैकपैक लिया, जूते के तस्मे कसे और धुंध भरी सड़क का सदका उतारने चल पड़ी। हथेलियों में कोई प्लान नहीं था बस वीकेंड की छोटी सी फुर्सत थी । सामने दिखती पहाड़ों की रानी मसूरी और ढेर सारे डर, ट्रैफिक जाम में अटक जाने के, लैंडस्लाइड होने के और सबसे बड़ा डर मसूरी की आपाधापी में, भीड़ में खोने का। 14 बरस हो गए देहरादून में रहते, न जाने कितनी ही बार गई भी हूँ लेकिन मालरोड की भीड़ में खोई खोई मसूरी न मुझसे मिली, न मैं उससे मिल पाई।

पहाड़ों का असल सुख बारिशों में है, लेकिन खतरे भी हैं। तो इस बार जोखिम लिया। जोख़िम से याद आया, ज़िंदगी के सब सुख इस जोख़िम का दरवाजा खटखटाने के बाद ही हिस्से आए हैं। 2011 का अगस्त ही तो था जब ज़ीरो आत्मविश्वास और ढेर सारी डिप्रेशन की दवाइयों की पोटली लिए देहरादून आई थी। बिना घर पर किसी को बताए कितने ही चक्कर मसूरी के लगाये। कभी यूं भी हुआ कि चाय पीने निकले और मसूरी जाकर चाय पी। तब मसूरी पर पर्यटकों का इतना दबाव नहीं था। यहाँ आने पर कितनी बार ऐसा भी होता कि घास की किनारियों पर अटकी बूंदें सूरज की किरणों को गले लगाए बैठी होतीं और अपनी ऊष्मा जड़ित बूंदों से अप्रतिम आभा बिखेर रही होतीं थीं। और मैं अपलक देखती जाती। ऐसे मासूम से दृश्य ज़ेहन अपने रंगों और ख़ुशबू समेत बसते हैं, देखिये न 2011 की उस स्मृति की ख़ुशबू कैसी बिखरी हुई है।

ओह, भटक जाने की ये आदत भी न, मैं तो जोख़िम की बात कर रही थी न। तो शुभचिंतकों की तमाम सलाहों को बैकपैक के बाहर वाले हिस्से में संभाल के रखा और चल पड़ी।

देहरादून से मसूरी मात्र एक घंटे की दूरी पर है, पहुँचने की कोई जल्दी नहीं थी क्योंकि इस बार रास्तों से ही मिलना था मंज़िल का ऐसा था कि वो कहीं भी हो सकती थी, जहां मन कहे रुक जाओ, वहीं रुककर मंज़िल बना लें । मसूरी जाना है या लैंडोर यह भी तो तय नहीं था, तय था तो बस इतना कि रास्ते में उड़ते बादलों से रुक-रुक कर गपियाना है। बारिश होते हुए भी देखना है और बारिश के बाद रूई से उड़ते बादलों को पलकों पर सहेजना भी है।


सुबह की चाय के लिए पहुंचे झड़ीपानी फॉल वाले रास्ते पर मिलने वाले नर्सरी कैफे में। खूबसूरत सी नर्सरी के बीच में बैठने के सुंदर ठिकाने थे। कैफे अभी अंगड़ाई ही ले रहा था। बढ़िया बन मक्खन और चाय से दिन की शुरूआत हुई। जाने क्यों मन में यह वहम सा है कि अगर सुबह की पहली चाय अच्छी और सुकून से पीने को मिल जाये तो दिन का अच्छा शगुन होता है। सो शगुन तो हो गया था।

इन दिनों ‘मुसाफिर कैफे’ के चलते झड़ीपनी कैसल की भी काफी हाइप हो गई है तो सोचा जरा दर्शन करते चलते हैं। लेकिन इतराये शरमाये मियां कैसल अपने रौब में थे, किसी की इंट्री नहीं, सिर्फ रहने वालों के लिए। सोचा, चलो देख लेते हैं, ठीक लगा तो एक रात यहीं सही। सुंदर तो है यह जगह कोई शक नहीं लेकिन उफ़्फ़ कीमतें...हमने मुस्कुराकर टाटा किया और 19th सेंचुरी कैफे का रुख किया। यह एक खूबसूरत ठीहा है। बारिश हो रही थी इसलिए इनका आउटडोर बंद था और यही मेरे लिए ईनाम था। कुछ देर में बारिश रुकी और बादलों ने हमला ही बोल दिया। जैसे कह रहे हों, लो कितने बादल चाहिए तुम्हें। मैंने हँसकर कहा, बहुत सारे...और बादलों का गुच्छा मेरे सर से होकर गुज़र गया। मेघालय की याद ताज़ा हो गई।

ऐसा सुंदर एहसास कि खुद को खुद की ही ख़बर न रहे।

बादलों से गुफ़्तगू का दौर चलता रहा, चलता रहा...दूर से मसूरी को देख मुस्कुरा कर कहा, आ रही हूँ, जरा ठहरो तो सही।

पहाड़ों की रानी से मिलना :

हाथों की लकीरों में कुछ नहीं रखा। उन्हें तो न जाने कितनी नदियों, झरनों और समंदरों में एक एक कर गिरा आई हूँ। अब जो हथेलियों में दिखती हैं वो बस उन बहाई जा चुकी लकीरों की परछाईंया हैं। उस रोज बरसते मौसम में जब हथेलियों को बूंदों के आगे किया तो मन के भीतर कोई ख़ुशबू सी दाखिल हुई। यह कुछ नया उगने की आहट थी। क्या मेरी हथेलियों में कोई नई लकीर उग रही है, मैंने ध्यान से देखा, वहाँ कुछ भी नहीं था, बरसती बूंदों में एक बूंद और जा मिली, पलकों में अटकी बदलियों की रिहाई का वक़्त था शायद।

‘ओ मसूरी, तुम तो इतने करीब थी फिर भी इतनी देर क्यों लगाई गले से लगाने में।’ मैंने गिरती हुई बारिश की लड़ियों से लाड़ लड़ाते हुए पूछा। उसने मुस्कुरा कर जवाब दिया, ‘मैंने तो तुम्हें कई बरस पहले ही गले लगा लिया था, याद करो...बस तुम्हें स्पर्श के उस लम्स को महसूस करने में इतना वक़्त लग गया।’

मैं चुप की गलियों में गुम चुकी थी। सच ही तो है, मेरे सबसे गाढ़े मुश्किल वक़्त में कितनी बार सर पर हाथ फिराया तो था मसूरी ने, बस मैं ही समझी नहीं। शायद टूरिस्ट की भीड़, लंबे-लंबे ट्रैफिक जाम और रास्ते में होने वाले लैंड स्लाइड के चलते मैंने एक दूरी बना ली थी।
 
दिल चाहा मसूरी को आगे बढ़कर गले लगा लूँ।

बहरहाल, हम दोनों गले मिले। मैंने पूछा, ‘चाय पियोगी?’ अपनी बौछार मुंह पर फेंकते हुए उसने कहा ‘हाँ जरूर।’ बाल्कनी में बैठकर चाय पीते हुए देह पर सुकून और आलस को फिसलते महसूस किया। नींद की चादर ओढ़ी और नरम बिस्तर में लुढ़क गई।

नींद खुली तो वादियों में बादलों की मटरगश्ती चल रही थी। धुंध से कोई मीठी सी धुन उठ रही थी और मैं निर्मल वर्मा को याद करके मुस्कुरा दी। शहर की तमाम हलचल से दूर हमारे इस ठिकाने पर सिर्फ चिड़ियों की आवाज़ें सुनाई देती थीं, या पत्तों के सरसराने की। खुद का सिरा गुमाकर आई एक लड़की के लिए यह सब ऐसा था जैसे किसी की मेरे लिए मांगी गई कोई दुआ कुबूल हो गई हो।

शाम की चाय के बाद एक लंबी सैर के लिए निकली तो बारिश के बाद वाले मौसम की खुनक तारी थी। हरे के इतने शेड्स बिखरे पड़े थे कि क़ुदरत के चित्रकार के सजदे में झुकने को जी चाहा। पहाड़ियाँ जंगली फूलों से खिली हुई थीं। अपनी बालकनी में खिले एक छोटे से फूल को देखकर चिहुँकने वाले हम लोग कितने गरीब हैं कुदरत के इन नज़ारों के सामने।

जगह-जगह उगी फर्न की पत्तियाँ पत्तियाँ अपने हुनर में माहिर थीं। पेड़ों पर झूमती जंगली लताएँ, उनके तनों पर उगे फर्न जैसे पेड़ों को सजाने की जादूगरी सीखी हो। कई जगहों पर तो काई भी ऐसे उगी थी मानो कह रही हो, जो हिस्सा रह जायेगा उसे मैं सजाऊँगी, दीवारें हों, रास्ते हों या पेड़। शॉल को देह पर कसते हुए मैंने सोचा ऐसे ही मौसम को तो कहते हैं न मौसम का गुलाबी होना। भला हुआ किसी राजनीति से नहीं जुड़ा यह गुलाबी। वैसे कुछ भी हो हरे की दीवानी मैं आज गुलाबी ही पहनकर घूमने निकली थी। मौसम का जादू मेरे बालों में अटके बिना कैसे रहता।

जिस जगह जाने से हमेशा डरती हूँ, वह है माल रोड। कारण है भीड़। लेकिन आज इस बिना योजना वाली छोटी सी ट्रिप का सिरा मेरे हाथ में था ही नहीं और मैंने कुछ ही देर में खुद को माल रोड पर चलते हुए पाया। सिर्फ एक चाय पीने की इच्छा लिए हम माल रोड पर लंबी वॉक पर चलते गए चलते गए।

चाय की प्यालियों में खुशगवारी की मिठास काफी थी।

बादलों में मानो कोई होड़ थी एक-दूसरे से आगे निकलने की । मंत्रमुग्ध सी मैं उनके खेल को देख रही थी। जिस मसूरी को देहरादून से दूर से देखती रहती हूँ आज वहीं से देहरादून को जगमग करते हुए देख रही थी। कुदरत के इश्क़ का इत्र चारों तरह बिखरा पड़ा था।

यह रात कभी न बीतने वाली रात में तब्दील हो चुकी थी। याद की अंगूठी में जड़े चमचमाते नगीने सी रात। हम चलते, सांस लेते, बैठते, फिर गहरी सांस लेते फिर चलते। इस रात को घूंट घूंट पी रहे थे। रात की इतराहट देखते ही बन रही थी। हम चाय से पहले वॉक करते, चाय के बाद करते, वॉक के बाद चाय पीते और फिर वॉक करते। डिनर से पहले वॉक फिर डिनर के बाद वॉक। असल में ये सारी वॉक और कुछ नहीं थीं ये थी रात के जादू को समेटने का लालच। जब वॉक करते हुए थक गई तो बालकनी से मसूरी को ताकने लगी, फिर अपने कमरे से घाटी में चल रहे जादुई खेल को देखती रही। रात और नींद का रिश्ता टूट चुका था। नींद का इंतज़ार भी नहीं था।

जाग के इस खेल में मसूरी लगातार जीत रही थी और उसकी जीत पर मैं खिलखिला रही थी। पगली, जानती ही नहीं मैं उससे जीतने नहीं, हारने ही तो आई हूँ। इस बीच देर रात या सुबह शायद थोड़ी सी नींद आई। वादी में बादल अकड़ू बच्चों की तरह पीछे हाथ बांधे टहल रहे थे। कभी धूप का कोई कतरा दिखता जिसे बादल झट से ढँक लेता। बारिश आस पास थी लेकिन अभी आई नहीं थी।

सुबह की चाय के साथ निर्मल वर्मा और मैं मुस्कुरा रहे थे। ‘हर बारिश में’ उनकी किताब हाथ में थी। न जाने कितनी बार की पढ़ी हुई किताब। सामने बारिश का इंतज़ार था और हाथ में बारिश थी।एक पोस्टबॉक्स ने अपने आसपास तमाम फूल खिला लिए थे। वो गाढ़े लाल रंग का पोस्टबॉक्स फूलों के साये में कितने सारे संदेशों को सहेजे होगा, या उन यादों को सहेजे होगा शायद जब लोग चिट्ठियाँ लिखते थे, अपनी बातें लिखकर भेजा करते थे।
 खुद को समेटकर चलने का समय हो चला था। समान पैक करने में सबसे पहले मैंने हरा समेटा, फिर समेटा इस हरे से उगा गुलाबी। फिर मैंने समेटा अपना वो बिना जिया बचपन जो ऐसे मौकों पर निकल भागता है। फिर समेटीं एक किशोर युवती की डरी सहमी आँखें जिन्होंने डर से कभी ख्वाब नहीं देखे। चलते-चलते मेरी हथेलियों को मौसम की एक शोख डाल ने थाम लिया था, मानो पूछ रही हो, ‘फिर कब आओगी?’ मैंने अपनी पलकों में अटकी बदलियों को आज़ाद करते हुए कहा, ‘अरे जरा सा तो दूर है देहरादून, कभी भी आ जाऊँगी।’ जबकि जानती हूँ मुझे आने में पूरे पंद्रह बरस का समय लगा है। चलते वक़्त की विदाई का नेग देने हमेशा की तरह बारिश आ चुकी थी...

गुलाम अली साहब सुर लगा चुके थे, ‘दिल के लुटने का सबब, पूछो न सबके सामने...’ बादलों से भरी सड़क में हम गुम होने लगे थे।

Thursday, July 30, 2026

सो काफ़िर बे पीर...


- दिनेश कर्नाटक 
कबिरा सोई पीर है, जो जाने पर पीर।
जो पर पीर ना जानई, सो काफिर बे पीर।

(कबीर कहते हैं, जो दूसरे की पीड़ा को समझ सके, वही साधु- संत है, जो न समझ सके वह धर्म तथा हृदय हीन है।)
 
कबीर के दोहे की पंक्तियों से ही प्रतिभा कटियार ने अपने उपन्यास का नाम 'कबिरा सोई पीर है' रखा है, जो लोकभारती पेपरबैक्स से वर्ष 2025 में प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास में जातिवाद के नाम पर भेदभाव, अपमान, उत्पीड़न की वह पीड़ा है जो सब जगह व्याप्त है, मगर दिखाई नहीं देती। उपन्यास को पढ़ते हुए दिमाग में उत्तराखंड में पिछले दिनों पौड़ी में हुई केतन की हत्या, चंपावत में ड्राइवर के गले में जूते चप्पल की माला पहनाकर घुमाने तथा मेरठ का वह प्रसंग भी आंखों के सामने आता है, जहां रोड पर प्रदर्शन कर रहे लोगों से आगबबूला हुए एसपी साहब कैदी वैन के अंदर जाकर प्रदर्शनकारी को पीटने लगते हैं।

हम प्रायः लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि अब कहां होता है भेदभाव, अब तो सब ठीक है, मगर उसी समाज में हम, 'इन्हें तो बहुत सिर पर चढ़ा दिया गया है', आरक्षण पर गालियां तथा दुर्व्यवहार के अनेक रूप देखते सुनते रहते हैं।
उपन्यास के केंद्र में तृप्ति है जिसके पिता, भाई व बहन अपने-अपने जीवन में भेदभाव व उत्पीड़न झेलते रहते हैं। तृप्ति धैर्य व संयम से इन सब स्थितियों का सामना करते हुए कामयाब होकर सम्मान अर्जित करने का इरादा रखती है। उसे अनुभव और कनिका जैसे दोस्त मिलते हैं जो उसे हौंसला देते हैं।

उत्पीड़न का रूप जातिवाद ही नहीं है। सीमा और कनिका को स्त्री होने की वजह से दोहरी तरह का भेदभाव झेलना पड़ता है। अनुभव एक उदार और लोकतांत्रिक नौजवान है जो जातिवाद और भेदभाव के परे चीजों को देखता है, लेकिन पुरुषोचित अहं तथा सामाजिक ताने-बाने में वह बहुत आगे नहीं जा पाता। इस अंधेरे को तोड़ने की उम्मीद पैदा करते तृप्ति और अनुभव आखिरकार उसी का शिकार हो जाते हैं।

यह उपन्यास बाहर से बेहद शांत, शालीन और उदार दिखने वाले हमारे सामाजिक ताने-बाने के भीतर छिपे हुए सामंती तथा जातिवादी चेहरे को उजागर करता है। इस महत्वपूर्ण विषय पर लिखने के लिए प्रतिभा जी को बहुत-बहुत बधाई !

Thursday, July 23, 2026

इतनी नफरत, इतनी हिंसा

इतनी नफ़रत
इतनी नफ़रत
इतनी नफ़रत
आखिरी कितनी नफ़रत?

इससे नफ़रत 
उससे नफ़रत 
उससे नफ़रत 
आखिर किस किससे नफ़रत?

इतनी हिंसा 
इतनी हिंसा 
इतनी हिंसा 
आखिर कितनी हिंसा?

Thursday, July 9, 2026

यह खुशरंग दिनों की बात है

शिलॉन्ग से सोहरा की यात्रा शुरू हो चुकी थी। उत्साह, खुशी और गहरी शांति का हाथ थामे हम माँ बेटी निकल पड़े थे। यूं हम जानते तो थे कि सफ़र सुहाना होने वाला है लेकिन असल मजा उस जाने हुए के पार जाने का है। यात्राओं की सबसे सुंदर बात लगती है कि हमेशा कोई न कोई चौंकाने वाला मंजर यात्राओं के पास होता है। हमारे तमाम जाने हुए से, सोचे हुए से अलग कुछ अनोखा। जैसे कोई बंद मुट्ठी हो, जिसके खुलने का इंतज़ार हो। 

रात अच्छी गहरी नींद सो चुकने के बाद का यह ताज़ा दिन कमाल होने वाला था। और हम पूरी तरह से तैयार थे इस दिन को जी लेने के लिए। जैसे-जैसे हम सोहरा यानि चेरापूंजी की ओर बढ़ रहे थे, मौसम बदल रहा था। वही मौसम जिससे मिलने की बेकरारी थी। मन कुलांचे मार रहा था। बाहर का मौसम मन के मौसम की ओर हाथ बढ़ा रहा था। हम एक गहरी चुप में धँसे हुए मौसमों की कारस्तानी देख रहे थे। शिलॉन्ग से सोहरा की दूरी सिर्फ 55 किमी है। टैक्सी से यह दूरी 2 घंटे के अनुमानित समय में आराम से पूरी हो जाती है जिसमें बीच में आने वाले खूबसूरत रास्तों का आनंद लेने के लिए रुकना भी शामिल करें तो ज्यादा से ज्यादा 3 घंटे। 

असल में यह रास्ता इतना ज्यादा खूबसूरत है कि हर थोड़ी देर बाद लगता है कि यहाँ रुकना चाहिए, यहीं रुके रहना चाहिए। ऊंची विस्तृत पहाड़ियों के बीच खूबसूरत हरियाली और पर मँडराते बादल, जैसे दिल की धड़कनों की रफ्तार भी मध्ध्म हो जाए। कैब ड्राइवर अब्दुल भाई को अंदाजा है कि पर्यटक कैसे बावरे हो जाते हैं यहाँ इसलिए वो खुद ही बीच बीच में कैब रोक रहे थे। सच कह रही हूँ कितने ही वीडियो देखे हों, यात्रा वृतांत पढे हों लेकिन जहां होने का सुख है वहाँ होने का ही सुख है। और यह सुख न कभी शब्दों में ढल सकता है और न ही कैमरे में कैद हो सकता है। हम सिर्फ कोशिश करते हैं वर्तमान के लम्हों को भविष्य की स्मृतियों के लिए सहेजने की। सिर्फ एक बचकानी सी कोशिश। लेकिन यह बात जीकर जानी है कि बटोरना तो असल में जीवन ही है। 

क्या आप पानी लिख सकते हैं, इस तरह कि उसे पढ़कर प्यास बुझे। शायद दुनिया भर के लेखक इसी कोशिश में हैं, इसी साधना में कि एक रोज वो इस तरह पानी लिखना सीख पाएंगे कि उसे पढ़कर पढ़ने वालों की प्यास बुझेगी। इस तरह रोटी लिख पाएंगे कि पढ़ने वालों की उसे पढ़कर भूख मिटेगी। लेकिन यह कल्पना की बातें हैं। रोटी की भूख रोटी के बारे में पढ़कर नहीं, रोटी खाकर ही मिट सकती है। ठीक वैसे ही यात्रा का सुख यात्रा करके ही जाना जा सकता है। सवाल मन में यह भी आता है कि फिर मैं क्यों लिख रही हूँ आखिर। लेकिन जवाब मुझे अच्छे से पता है, यह लिखते हुए मैं उसे जिये हुए को फिर से जी रही हूँ। यह सब मेरे लिए ही, सिर्फ मेरे लिए। कि मैं कैसे लिख पाऊँगी उन बादलों के बारे में जो अब हमारी टैक्सी में आकर हमारे बीच बैठ गए थे, मंडरा रहे थे हमारे ऊपर, हथेलियों में, बालों में, पलकों में। सड़क लगभग दिखनी बंद हो चुकी थी और हम बादलों पर ही चल रहे थे। 

शायद बादलों के इसी खेल को देखने के लिए हमने यह मौसम चुना यहाँ आने का। न सही टूरिस्ट स्पॉट देख पाने का सुख मुझे ये बादलों के खेल देखने से कब फुर्सत। हमने बीच में कुछ जगहों पर रुककर तस्वीरें लीं और यह सोचकर हंस ही दिये कि यह जानते हुए भी हम दस परसेंट भी तसवीरों में नहीं उतार पाएंगे कोशिश करते रहते हैं। एक ब्रेक में हमने भुट्टा और पाइनएप्पल लिए। यह शायद पहाड़ों पर खाने का रिवाज है या कोई और बात यहाँ भुट्टे के स्वाद का अलग ही मजा होता है। 

बिना किसी जल्दबाज़ी के धीरे-धीरे चलते हुए हम आखिर सोहरा पहुँच गए। यहाँ चेरापूंजी के नाम का कोई बोर्ड नहीं है, हर जगह सोहरा है। इसके बारे में कहते हैं कि पहले इस जगह का नाम सोहरा ही था फिर अंग्रेजों ने इसका नाम चेरापूंजी किया, क्यों किया ये तो वही जानें लेकिन फिलहाल मेघालय सरकार ने इसे सोहरा ही घोषित कर दिया है। एक तो ये शहरों के नाम बदलने की राजनीति यह बात क्यों नहीं समझती कि यह बात कितनों की भावनाओं के साथ जुड़ी हुई है। 

खैर, बादलों वाले रास्ते से लगभग उड़ते हुए हम अपने गंतव्य पर पहुँच चुके थे। एक छोटे से गाँव में एक प्यारा सा होमस्टे था हमारा ठीहा। यह होमस्टे कुछ महिलाएं ही चलाती हैं। माँ और बेटी मुख्य तौर पर। यहाँ या तो कपल, सिंगल औरतें लड़कियां या परिवार ही रुक सकते हैं। सिंगल लड़कों या लड़कों के ग्रुप के लिए यह नहीं है। बहरहाल, प्यारी सी मुस्कुराहट के साथ हमारा स्वागत किया गया। कमरा बेहद प्यार से और सलीके से सजाया गया था। बादलों में छुपा हुआ वह घर और उस घर के एक हिस्से में हम। हमने पर्दे हटाये खिड़कियाँ खोलीं और बादलों को कमरे में आने दिया। बादल भी इसी इंतज़ार में थे शायद। जरा सी देर में कमरा बादलों से भर गया। बिटिया मेरी चाय के इंतजाम में लगी थीं और मैं बादलों के संग गुफ्तगू में। 

संग बने रहिए...बादलों का यह खेल तो अभी बस शुरू ही हुआ है। 

(जारी....) 

Friday, July 3, 2026

I love Shilong


ये शिलांग की सुबह है। इस सुबह में बीते दिन की पूरी धमक है, बीती शाम की सरगोशियां हैं, चमक है। सुबह की सैर पर निकली तो चलती ही गई, मानो शिलांग को अपने कदमों से भी जीना चाहती हूँ। किसी भी शहर की सुबह में उसकी रात की कहानी का पता होता है। बस उस पते का पता पूछने वाले कम ही होते हैं। अपने चलते हुए कदमों और दृश्यों में छुपी शहर की बतकही से मुख़ातिब थी। वही चाय का उठता धुआँ, कुछ घूमने निकले जोड़े, कुछ परिवार, कुछ ब्लॉगर कैमरे की क्लिक्स का महासागर।

कुछ लोग I love Shilong के सामने फोटो खिंचा रहे थे। एक प्रेमी जोड़े की तस्वीर उसके इसरार पर मैंने भी खींची। तभी चिप्स के पैकेट को वहीं फेंककर आगे बढ़ गए अंकल जी अपनी बीवी को डांटते हुए उधर से जाने लगे। ये अभी I Love Shilong के साथ फोटो खिंचवा रहे थे। मैंने अपना माथा पीट लिया। गुस्से से उन्हें घूरना चाहा लेकिन वो अपनी बीवी को किसी बात पर डांटने में व्यस्त थे। पास खड़ी की सोलह सत्रह साल की लड़की ने मेरे चेहरे के भाव पढ़ लिए थे शायद। वो मुझे देखकर मुस्कुराई और उसने खुद जाकर वह पैकेट उठा लिया।

कुछ दूरी आज के दिन के अख़बार के ढेर और कुछ अख़बार खरीदते और खबरों की दुनिया पर गुफ्तगू करते लोग दिखे। अख़बार पर बात करने वालों में ज़्यादातर स्थानीय लोग ही थे और इनमें महिलाएं एक भी नहीं थीं। महिलाएं कब और कहाँ कहाँ नहीं होतीं हैं, इसकी वजह पर नहीं जाऊँगी क्योंकि अगर गई तो बात जरा लंबी ही जाएगी। खैर, अख़बारों के पहले पेज पर जंतर मंतर की और अभिजीत दीपिके की तस्वीरें थीं।

शहर का कुछ पता नहीं था, किसी से पूछना भी नहीं था, गूगल से भी नहीं, तो जिधर भीड़ कम लगे और हरियाली ज्यादा दिखे उधर चल पड़ी। कुछ चर्च, कुछ लाइब्रेरी रास्ते में पड़ते गए। सड़कों की सफाई बराबर हो रही थी। सफाई कर्मचारी रात के निशान सड़कों से मिटा रहे थे। उन्हें अगले दिन के लिए तैयार कर रहे थे। तभी सड़क पर एक पिता और पुत्र पर नज़र पड़ी। पिता सड़क पर झाड़ू लगा रहा था, कूड़ा उठा रहा था और उसका छोटा सा बच्चा शायद डेढ़ या दो साल का होगा, कूड़ा उठाने के लिए थर्माकोल के डिब्बे में प्लास्टिक की खाली बोतल को फंसाकर बनाए गए कूड़ा इकट्ठा करने वाले डब्बे को खेल गाड़ी बनाकर खेलता दिखा। वह बहुत खुश था। खेलगाड़ी को खींचता, उसे गोल गोल घुमाता, उसमें कोई कूड़ा उठाकर रख देता फिर भागने लगता। उस बच्चे की मुस्कुराहट में यह सुबह डूब चुकी है।

फिलहाल मेरी हथेलियों में ख़ुशी का यह सिक्का है। इसे मैं कभी खर्च नहीं करूंगी। दुआ करूंगी कि दुनिया के सारे बच्चे यूं ही खुश हों, लेकिन कूड़ा बीनते हुए नहीं, स्कूल जाते हुए, पढ़ते हुए, खेलते हुए और इस लगभग बर्बाद हो चुकी दुनिया को थोड़ा बेहतर बनाते हुए।

सुबह की सैर में शहर का जो चेहरा दिखा वो रात के चेहरे से फर्क था कई मायनों में। रात में जिस मौज मस्ती की रवानगी थी सुबह में एक पुरसुकून ठहराव था। मैं इन सबहों की तलाश में ही तो निकली हूँ, इस पुरसुकून ठहराव की तलाश में। अपने चेहरे को आसमान की ओर करके लंबी गहरी सांस लेते हुए शहर को जज़्ब करने की कोशिश की। बारिश न जाने कहाँ थी कहाँ नहीं लेकिन ठीक उस वक़्त मेरे गालों पर एक बूंद टप्प से टपकी। कुदरत के ये करिश्मे मुझे बिखेर देते हैं। मैं उस लम्हे में वहीं बिखर गयी थी। वापस लौटते समय याद आया चाय तो पी ही नहीं, हालांकि कई जगह चाय बनती देखी थी शायद इच्छा नहीं रही थी। कमरे पर आकर कुछ देर पड़ी रही।
भीतर एक उत्साह था, आज हम चेरापूंजी जाने वाले हैं जिसे सोहरा भी कहा जाता है। एक गाना याद आया और एक लंबी शरारत भरी मुस्कुराहट चेहरे पर तैर गई, 'आज उनसे पहली मुलाक़ात होगी, फिर आमने सामने बात होगी...'

इसी गमक के साथ हम चेरापूंजी के लिए रवाना हुए। मौसम सुहाना था और सफर का इससे अच्छा सामना क्या होगा कि आपके साथ अच्छा मौसम चल पड़े और और अच्छा और अच्छा होता जाय। हम बादलों की गोद में समाने को बेताब थे....
(जारी...)

Tuesday, June 30, 2026

दिल कह रहा है, तुझसे ये रिश्ता जोड़ लूँ...


रिश्ता तो जुड़ चुका था। हम शिलॉन्ग पहुंच चुके थे। एक दिन में जैसे न जाने कितने दिन जी लिए थे हमने। कोई दिन ऐसे होते हैं कि जी करता है ख़त्म ही न हों। हम ऐसे दिनों को आस से देखते हैं बिना कुछ कहे, और कभी-कभी वो हमारी आँखों की सुन लेते हैं। यह ऐसा सा ही दिन था। और अभी तक ख़त्म नहीं हुआ था। कमरे पर पहुंचे तो चाय की जबर्दस्त तलब लगी, और जब चाय होगी तो पकौड़े तो लाज़िमी हुए। कुछ देर आरामदेह बिस्तर में धँसे हुए ज़िंदगी किसी रील सी घूमने लगी। 

रत्ती भर जीने के लिए कितना ज्यादा मरना पड़ता है। अपनी ही ख़्वाहिशों को पहचानने में एक उम्र गुज़र जाती है। कहाँ जानती कि मुझे धूप के सिक्कों से मोहब्बत है, कहाँ जानती थी मुझे बारिशों का स्वाद बेपनाह पसंद है कि मैं भीगना ही नहीं चाहती बारिशें पी जाना चाहती हूँ, कई बार लगता है बारिश हो जाना चाहती हूँ। कहाँ जानती थी कि खुद को महसूस करने के लिए खुद के साथ कुछ दूरी तय करना कितना ज़रूरी है। पिछले कुछ बरसों की छुटपुट यात्राओं के दौरान पाया कि जिस अंजान सी तलाश में भटक रही थी वो तो ये है। कुदरत से शदीद मोहब्बत। इंसानी मोहब्बत आपका दिल दुखा सकती है लेकिन कुदरत आपको कभी अकेला नहीं छोड़ती। हमेशा साथ चलती है कभी धूप बनकर कभी छाया बनकर। 

स्मृतियों के दरीचे खुले हुए थे जबकि वर्तमान अपनी सोंधी ख़ुशबू लिए सामने खड़ा था। चाय, पकौड़े सामने थे और हम आराम की मुद्रा में बिस्तर से निकले बगैर वहीं खाने की इच्छा से जूझते हुए। आखिर बिटिया ने वहीं बिस्तर पर चाय दी और पकौड़े भी। एक जरा सी ख़्वाहिश कोई बिना कहे समझ ले और पूरी कर दे तो कैसा तो पानी हो जाता है मन। ज़िंदगी भर कितने पकौड़े तले होंगे, कितनी चाय बनाई होगी कोई हिसाब नहीं लेकिन यूं इस सुकून से इस तरह इनका होना कमाल है। सोचो तो, मर्दों के लिए जो सुख रोज का है, जिस पर उनका ध्यान भी नहीं जाता वो हम औरतों को कितनी मेहनत से कमाना पड़ता है। 

पकौड़े अच्छे थे साथ ही लाल चाय भी। खाने के बाद कुछ देर और बिस्तर में दुबक गई तो आलस के एक झोंके ने पीठ सहला दी। सच्ची बड़ा आराम आया। घड़ी ने आठ बजाए तो हम माँ बेटी ने एक दूसरे को देखा और कुछ देर का टाइम खुद के लिए और ले लिया।  कुछ देर बाद उठे तो शरीर और मन दोनों ताजादम हो चुके थे। हम दिन का आखिरी हिस्सा जी भर के जीने के लिए तैयार थे। अब तक यह सर्च की जा चुकी थी कि कहाँ पर कौन सा खाना बेस्ट मिलता है। वैसे,खाना हमारे लिए प्रियोरिटी नहीं था, हमें तो शिलॉग की रात देखनी थी। 

दुकानें धीरे-धीरे बंद हो रही थीं और शहर जाग रहा था। चौक के पास लोग बस टहल रहे थे, घूम रहे थे, बैठे थे खड़े थे। कोई कुछ कर नहीं रहा था, बस वो वहाँ थे। न किसी को कहीं जाना था, न कुछ खरीदना था, न कुछ खाना था। मैंने महसूस किया कि लोग आपस में भी ज्यादा बात नहीं कर रहे हैं। बस वो एक-दूसरे का हाथ थामे साथ हैं। जैसे अपनेपन की कोई ख़ुशबू बिखरी हुई थी। 

हमने भी उस महकती शाम के हवाले खुद कर दिया। इधर से उधर भटकते हुए हमारे कानों में सुरीले गाने भी पड़ रहे थे। अक्सर आसपास संगीत रहता ही है लेकिन जाने क्यों यात्राओं का सुर ऐसा लगता है कि कोई गीत कोई गाना सुनने का खयाल तक नहीं आता। तो यह सुबह से कानों में पड़ा पहल गीत था। इस महकती चहकती सी शाम में यह अच्छा लग रहा था। समझ नहीं आ रहा था कि यह आवाज आ कहाँ से रही है। फिर अचानक नज़र पड़ी, कोई जिनके पास से कई बार गुज़र गए ये तो वही सज्जन गा रहे थे। चूंकि स्पीकर दूर कहीं थे तो शायद इसलिए ध्यान नहीं गया। दूसरे लोग उन्हें घेर के खड़े हों ऐसा भी नहीं था। वो अपनी धुन में बस गा रहे थे। असल में वो अपने संगीत को जी रहे थे। वो दृष्टि बाधित थे लेकिन उनके पास एक नज़र थी खुशी को पहचानने की, सलीका था उसे सेलिब्रेट करने का। कुछ लोग उनके सामने रखे बॉक्स में पैसे भी डाल रहे थे। लेकिन वो सिर्फ गा रहे थे...कुणाल गांजावाला की आवाज़ जिसे शायद भूल ही चुकी थी, उस रात से फिर से साथ हो ली है। पहले से ज्यादा अपनाइयत के साथ। अब उस आवाज़ में और न जाने क्या क्या शामिल हो चुका है...दिल कह रहा है, तुझसे ये रिश्ता जोड़ लूँ, तेरी धड़कनों को छू लूँ... जानती हूँ अब जब भी यह गाना सुनूंगी शिलॉन्ग की वह रात जाग उठेगी। 

घूमते फिरते वहाँ ढेर सारी पान वाली दुकानें दिखीं। हमारे यहाँ जैसी होती हैं वैसी नहीं, थोड़ी अलग। छोटे से स्टूल पर पारंपरिक वेश में बैठी महिलाएं और सामने छोटी सी मेज पर करीने से सजे हुए पान। एक नॉर्थ ईस्ट की कलीग की याद आ गई वो खूब पान खाती थी, वो ताम्बूल बोलती थी। मुझे भी पान खाने का चाव तो  है। खासकर नए शहरों में, क्योंकि हर शहर का मिजाज वहाँ के पान में भी होता है। यहाँ के पान या ताम्बूल का मिजाज अलग था। उस वक़्त तो मैंने पैक कराया था डिनर के बाद जब उसे खोला तो पाया यह तो एकदम अलग है। पान के पत्ते पर लगा हुआ थोड़ा सा चूना और बस। साथ में सुपारी के टुकड़े और कच्चे नारियल की कतरन। सुपारी तो खाई न गई नारियल की कतरन के साथ जरूर खाया थोड़ा सा और बाकी संभाल लिया। जानती थी यह थोड़ा-थोड़ा ही खाया जाएगा। यह लखनऊ या बनारस वाले पान से एकदम अलग था। 

किसी रात का तिलिस्म ऐसा होता है कि न हम चाहते हैं वह बीते न वह बीतती है। देर रात तक इधर से उधर घूमते हुए भूल ही गए थे कि हमें डिनर भी करना है। याद आया तो एक बेहतरीन रेस्तरां में खुद को पाया। एक अच्छा सा दिन, प्यारी सी शाम अच्छे से डिनर के साथ ही पूरा होना डिज़र्व करता है। 

हम उस प्यारे से दिन को पलकों में मूंदकर यह सोचते हुए सो गए कि अगला दिन चेरापूंजी का दिन होगा। मेरा बचपन का अनदेखा ख्वाब जो कल हक़ीक़त बनने वाला था। 

नींद सचमुच अच्छी सी आई थी...

(जारी...)

Wednesday, June 24, 2026

तेरे लिए मौसम मंगाया है...


1998 में रिलीज हुई फिल्म 'सत्या' के एक गाने की यह लाइन कि 'मैंने तेरे लिए मौसम मंगाया है, तेरे लिए रस्ता बिछाया है...' इतनी ज्यादा अच्छी लगती थी कि ऐसा लगता काश कोई यह कहे मुझसे भी। रूमानियत वाले ऐसे ख़्वाबों की जिंदगी ने कायदे से बैंड बजाई और यह समझाया कि अपनी ख़्वाहिशों को किसी के भरोसे मत छोड़ो, खुद पकड़ो उनकी बागडोर और निकल पड़ो बस...

प्रकृति के क़रीब जाकर हमेशा यह महसूस हुआ है कि मेरे मन का वह प्रेमी और कोई नहीं यह क़ुदरत ही है। जब जितना और जैसा मौसम चाहा, भरपूर मिला। धीरे-धीरे ज़िंदगी के रास्ते भी बिछने लगे, वो रास्ते जो मेरे मन की दुनिया में जाते हैं। लेकिन उन रास्तों पर चलने से पहले या उनके मिलने से पहले हमें उन रास्तों की कितनी तलाश है यह जानना भी ज़रूरी है। पानी का पता प्यास से बेहतर कौन जानता है। और जैसा कि पहले भी कह चुकी हूँ, ज़िंदगी के लिए अपनी भूख प्यास को समझते, बूझते हुए जिंदगी ही गुज़र जाती है।

मेघालय मानो गुनगुना रहा था, 'मैंने तेरे लिए मौसम मंगाया है...' और मैं उसकी गुनगुन को सुनकर मुस्कुरा रही थी। बरसती बूंदें हथेलियों से सरकते हुए आत्मा तक पहुँच रही थीं।

रास्ता लंबा था। हमें तो भूख महसूस नहीं हुई लेकिन अब्दुल भाई की भूख ने गाड़ी रोकी। बारिश हल्की हुई। बिना छतरियों के थोड़ी सी वॉक करने के बाद खाने पहुंचे। हालांकि सच में कुछ भी खाने का मन नहीं था। मैंने छाछ और बेटू ने पेपर डोसा मंगाया और हम दोनों चुप होकर बैठ गए। हम दोनों माँ बेटी का सुर एकदम ठीक लग चुका था। यात्रा के दौरान चुप्पी का सुर। शब्द अक्सर सौंदर्य को खंडित करते हैं यह मेरा अनुभव रहा है। हम दोनों की चुप्पी का यह सुर पूरी यात्रा में लगा रहा। हमने बेहद मामूली बातें कीं और ज्यादा महसूस किया। एक दूसरे को भी और मौसम को भी।

कई बार चुपचाप खिड़की के बाहर देखते हुए हमने एक-दूसरे की हथेलियाँ थामीं, कहा कुछ भी नहीं। भाषा की चुनौती आने वाली थी क्योंकि यहाँ की भाषा से हम अनजान थे और हमारी भाषा से यहाँ के लोग। लेकिन पर्यटकों के कारण अब भाषा और भोजन काफी हद तक कॉमन होने लगा है। अङ्ग्रेज़ी और हिन्दी को तोड़-मरोड़ कर काम किया जा सकता है यह सुना था। और सच ही सुना था। 

खाने के बाद बिल देने के वक़्त हम माँ बेटी के भीतर का बचपन जाग उठा। मैंने ऑरेंज कैंडी जिसे बचपन में कंपट कहते थे लेने को हाथ बढ़ाया तो बेटू ने मैजिक पफ की तरफ। कुछ चॉकलेट और चिक्की के छोटे पाउच भी हमने लिए। खाने से ज्यादा इन चीजों को हथेलियों में भरने का सुख था। बचपन में इन्हीं ऑरेंज कैंडी, माफ कीजिये कंपट के लिए भी तो तरसे ही हुए थे हम। जिस भी उम्र में मिले छूटा हुआ जीवन उसे गले से लगा लेना चाहिए। 

एक कंपट मुंह में रखा और स्कूल के बाहर ठेले पर कंपट बेचने वाले भैया की धुंधली तस्वीर कौंध गई, और कौंध गयी 25 पैसे का सिक्का तलाशते हाथ और न मिलने पर मायूस होती आंखें। इसी स्मृति के साथ वो दिल के आकार वाले काँच के ज़ार में रखे केक और क्रीम रोल भी याद आ गए जिन्हें खरीद पाना ख़्वाब ही रहा बस ललचाई नज़र से देखते ही रहे। हंसी आती है यह सोचकर कि अब जब भी क्रीम रोल मिलता है चाव से खाती हूँ, असल में उसे खाते हुए बचपन का छूटा हुआ हिस्सा जीती हूँ। 

अभी बचपन की इन बचपने से भरपूर स्मृतियों के साथ खिलवाड़ चल ही रहा था कि सामने एक विशाल सा हरा समंदर दिखा। हम शिलोंग पहुँच चुके थे। यह शिलोंग का पोलो ग्राउंड था। इतना हरा कि बस आँखें ठहर जाएँ। 
लेकिन इतनी बारिश में कैसे घूमेंगे यहाँ के सवाल के साथ बिटिया ने मेरी तरफ देखा। मैंने हँसते हुए कहा, 'अरे मौसम अपनी बात मानता है, अभी बारिश रुकवाते हैं। ओ सुनो जरा, थोड़ी देर को रुकना तो बरसने से...' ड्रामेबाजी से भरे अंदाज में कहकर मैं खूब हंस पड़ी। बिटिया भी हंस पड़ी। लेकिन कुछ ही देर में सचमुच बारिश रुक गई। और ऐसा पहली बार नहीं हो रहा था जब मौसम मेरे मन के मुताबिक अपने रंग बदल रहा था। अब तो दोस्तों में यह बात मशहूर ही है बल्कि दोस्तों ने ही मशहूर की है कि ये अपने मौसम साथ लिए चलती हैं....बेटू ने भी चिहुँककर कहा, 'आपके मौसम ने आपकी बात मान ली'। हम दोनों खुश-खुश उस हरे समंदर के भीतर डूबने के लिए निकल गए। 

नीले गुलमोहर जिसका बोटिनिकल नाम जेरकेंडा है की छटा देखते ही बन रही थी। अभी बरस कर थमी बूंदों को पत्तियों ने अपनी हथेलियों पर सहेजा हुआ था। घास के मुहाने पर अटकी बूंदें जैसे किसी जौहरी ने अपनी कला का नायाब नमूना बनाते हुए घास के सिरों को हीरे सी बूंदों से जड़ दिया हो। और हीरे की कनी से सजी बूंदों को न कोई गुमान न घास को। हवा का एक झोंका आता और घास इतराते हुए उन हीरे सी बूंदों को ऐसे झटक देती मानो निर्विकार ही हो किसी भी सज्जा से। और यही उस सज्जा का सबसे सुंदर पहलू था। 

हम माँ बेटी तितलियाँ हो गयी थीं। उस हरे समंदर में उड़ती फिर रही थीं। हम मछलियां हो गई थीं, डुबकियाँ लगातीं और गहरे उतर जाने को बेताब। बरसने के बाद का खुला मौसम पूरे ग्राउंड में खिल खिला रहा था। और सबसे सुंदर बात यह थी कि यहाँ लोग कम थे। जो थे वो बेहद इत्मीनान से या तो बैठे हुए थे, या घूम रहे थे। ऐसे सौंदर्य पर खामोशी की संगत हो तो कमाल होता है। इतनी शांति कि अपनी साँसों की आवाज़ सुनाई दे, ऐसी चमक कि अपनी आत्मा का हर हिस्सा चमक उठे। 

ज़िंदगी ने मेरा हाथ थामा और पूछा, 'तुम्हें मुझसे बड़ी शिकायतें थीं न?' मैंने उसके कांधे पर सर रखते हुए कहा, 'तुमसे ही तो प्यार भी है न?' 
हम दोनों मुस्कुरा दिये....मेरी हथेलियों में घास से टूटकर गिरी ओस की बूंदें थीं। हाँ, हथेलियों से जबसे लकीरें झरकर गिर गईं, या मैंने गिरा दीं तबसे हथेलियाँ सूरज की किरणों से, ओस की बूंदों से, फूलों की ख़ुशबू से लबरेज रहती हैं। मैंने अपनी हथेलियों को अपनी दोनों पलकों पर रखा, और पूरे चेहरे को हथेलियों में रख दिया। जैसा दुआ पढ़ने के बाद पलकों पर रखते हैं हथेलियाँ। 

होंठ बुदबुदा रहे थे, शांति हो, प्यार हो, ख़्वाब  हों और ख़्वाबों की ताबीर हो... 

(जारी...)

Sunday, June 21, 2026

स्वाद एक कारा है


                                                        तस्वीर इन्टरनेट से साभार

 यह इतवार की सुबह है। जाने कहाँ से इतना सारा तनाव आ गया है। लंबे समय से एक चिड़चिड़ाहट तारी है जिसे फुल इगनोर करने पर लगी हूँ। यह चिड़चिड़ाहट रसोई से है, घर के कामों से है। 


बचपन से रोज सुबह आँख खुलते ही किचन में काम करते हुए माँ को ही देखा था। मैं ठीक से जग भी नहीं पाती थी कि आधा खाना बन चुका होता था। चूंकि मेरी माँ भी वर्किंग रही हैं, उनकी घड़ी और उनकी गति के बीच समायोजन के बीच ही मेरे बचपन की शुरुआत हुई। जब वो डेली पैसेंजर थीं और सुबह की ट्रेन से दफ्तर जाती थीं तो सुबह 6 बजे सारे घर का काम निपटाकर, खाना बनाकर, गमलों में पानी डालकर रेडी होकर स्टेशन को निकल जाती थीं। 

फिर लखनऊ में उन्हें उसी शहर में जाना होता था तब यह राहत सुबह के 6 बजे से खिसक कर 8.30 बजे पर आ गई। लेकिन तब तक काम भी काफी बढ़ चुका था। और इन दिनों कोई हाउस हेल्प नहीं हुआ करती थी। तो जैसे जैसे मैं बड़ी हुई खुद को माँ कि हेल्प के लिए हाथ बँटाना शुरू किया। धीरे-धीरे माँ के हाथ के काम अपने हाथ में लेते गई। कॉलेज, पढ़ाई, घर के काम...यह सब सामान्य है। 

घर के काम कभी बोझ नहीं लगे, खाना बनाने में मजा आता था। नई चीज़ें बनाना खिलाना और तारीफ़ें बटोरना। माँ को देखकर हुआ या जीवन की गति ही ऐसी मिली कि काम करने की गति काफी तेज़ रही। फटाफट खाना बनाना, फटाफट पोछा लगा लेना। सब कुछ फटाफट। बाद मुद्दत समझ आया कि मैं तो एक ट्रैप में हूँ।  

सलाद और होता तो मजा आ जाता है, पकौड़े बन जाएँ तो मजा आ जाय। तुम पालक पनीर बहुत अच्छा बनाती हो, और पाव भाजी, और... चाय तो तुम्हारे ही हाथ की पिएंगे जैसे जुमलों वाला ट्रैप। और अपनी खुशी से एक पैर पर नाचते हुए लोगों के स्वाद पर खुद को निछावर करने की खुशी महसूस करने वाला ट्रैप। 

कोई साथ की लड़की जब यह कहे कि उसे खाना बनाना नहीं आता, या बनाने में ऊब लगती है तो उसे जज करने या उसे नसीहत देने वाला ट्रैप, असल में उस बात को न समझ पाने वाला ट्रैप। 

बाद मुद्दत यह समझ आया कि यह जो रसोई है, यह स्त्रियों की नियति नहीं है, बना दी गई है। स्वाद एक जेल है, स्त्रियों की जेल। जिस जेल में तारीफ़ों की सलाखें सख्त हैं, जो अपनी ही जेल में बाखुशी कैद रखने की तैयारी है। तारीफ़ें न भी हों तो भी। 

मुझे याद नहीं पिता ने कब माँ से कहा कि, 'तुम ये चीज़ बहुत अच्छी बनाती हो' माँ की शिकायत यही रही कि कभी जो तारीफ कर दी हो। तारीफ समझने का एक तरीका माँ को यह मिला कि अगर ठीक से खा लिया या सब खत्म कर दिया बिना यह सोचे कि बाकियों के लिए कुछ बचा भी है नहीं, तो खुश हो जाओ कि अच्छा बना है, अगर छोड़ दिया थाली में तो समझो मन का नहीं बना। 

परेशानी खाना न बनाना पड़े की भी हो सकती थी समझ ही नहीं पाये, परेशानी यह हुई कि कम से कम तारीफ तो कर दिया करो। 

पहली बार जब कुक लगने की बात हुई तो घर में घोर संग्राम हुआ। हालांकि कुक लगने की बात माँ ने की भी नहीं, क्योंकि एक समय में वो भी इसके खिलाफ थीं, जाने कैसा बनाएगी, स्वाद नहीं होगा उसके हाथ में आदि आदि। पिता ने हड़ताल कर दी उसके हाथ का नहीं खाएँगे। फिर जैसे तैसे कुक लगी, तो रोज शिकायत कि उसके हाथ में स्वाद नहीं है। 

यानि जिस स्वाद पर जीवन भर चुप्पी रही, वह अब समझ आया कि, था। 

ऐसी लड़ाई शादी के बाद मैंने भी झेली, पति और सास का अबोला सहा और आखिर उन्हें कुक के लिए नहीं मना पाई। 

कुल कहानी यह है कि स्वाद एक जेल है। स्त्रियों की जेल। और स्त्रियों को ही इसे तोड़ना होगा। लेकिन तोड़ नहीं पा रही हैं। सुबह आँख खुलते ही जब खुद के लिए ही सही किचन में खुद को देखती हूँ तो सोचती हूँ यह कारा कितनी मजबूत है। 

मैं अपनी सुबह चाय और पंछियों की आवाज़ के साथ चाहती हूँ लेकिन ऐसा कम ही हो पाता है....क्यों कम हो पाता है, यह सवाल खुद से पूछती हूँ...

जो पुरुष मैं तो बना लेता हूँ, की हुंकार भरते हैं और महीने में एक दिन या हफ्ते में एक दिन अपनी मर्जी से अपने मूड के मुताबिक कभी कुकिंग कर देते हैं यह उनके लिए नहीं है। मैं उनकी कुकिंग को गिनती ही नहीं। और जो महिलाएं यह कहकर खुश हैं, कि मेरे ये तो कभी कभी चाय बना देते हैं, या मुझे अच्छा लगता है उनके लिए बनाना तो उनसे यही कहना है कि बहन, अभी तुम जेल में आनंद ले रही हो, अच्छा हो तुम्हारा भ्रम न टूटे। 

आग लगे ऐसे स्वाद को जिसने एक स्त्री को जीवन भर की रसोई की कैद में डाल रखा है।  

Saturday, June 20, 2026

कॉकटेल-2 : मिसोजिनी से भरपूर घटिया मसाला



अकसर जो चीज़ें अच्छी नहीं लगतीं उनके बारे में बात नहीं करती। देखने में टाइम वेस्ट करने के बाद उसके बारे में बात करके और टाइम क्यों वेस्ट करूँ आखिर। लेकिन हमारी फिल्मची दोस्त ज्योति नन्दा ने कहा, कुछ तो लिखो तो लिख रही हूँ।

ज्योति की ही पिछली पोस्ट से बात शुरू करती हूँ। नीयत। जिसे समझ और अप्रोच भी कह सकती हूँ। फिल्म बनाने के पीछे की नीयत क्या है, और देखने वाले की नीयत क्या है। यहीं से सारी बात शुरू होती है। किसे क्या और कैसा लगता है।

कॉकटेल 2, से ज्यादा उम्मीद तो थी नहीं क्योंकि लव रंजन का अप्रोच पहले ही काफी निराश करता रहा है। कॉकटेल वन में भी उसका खासा असर था। यहाँ भी अप्रोच वही है। लव रंजन को लड़कियों से कोई खास दिक्कत लगती है। उन्हें लड़कियों को डीमीन करने के तमाम रचनात्मक तरीके आते हैं। और उनके हीरो बेचारे, पाक दामन, संस्कारी टाइप होते हैं। कोई दिक्कत नहीं कि आपका हीरो कैसा है लेकिन हीरो को आपके जैसा आदर्श हीरो होने के लिए लड़कियों को क्यों डीमीन करना है भाई।

फिल्म खूब सजा धजा, रंगा पुता कचरा है। दो लड़कियां हैं, एक लड़के पर मरती हैं। बिलो द बेल्ट तरीके आज़माती हैं लड़के को परखने को। फिर आपस में बिल्लियों की तरह लड़ती हैं। और लड़का अंत में चमचमाता हुआ संस्कारी बालक शादी शादी खेलने लगता है। वही लड़का जो शादी में विश्वास नहीं करता है।
अंत में मंगलसूत्र जिंदाबाद, आज़ाद लड़कियों का कैरेक्टर एसेसनेशन, उन्हें ओब्जेक्टीफाई करना। प्यार और रिश्तों पर लंबे लंबे दार्शनिक लेक्चर जिनका कोई अर्थ नहीं।

महंगे सेट, दमकते शूट, गाने, सब मिलकर भी कुछ नहीं कर पाते। कृति सेनन कमाल लगी हैं लेकिन उनका रोल थोड़ा डिग्निटी से लिखा जाना था।

इतना ही टाइम इस पर खर्च कर सकती हूँ। टाटा।

(नोट- फिल्म एक्स्पर्ट नहीं हूँ। यह समीक्षा भी नहीं है। बस मेरी भड़ास है।)

Tuesday, June 16, 2026

पहली मुलाक़ात का तिलिस्म

गुवाहाटी एयरपोर्ट की सबसे खूबसूरत बात यह लगी कि न कोई ज्यादा भीड़ न आपाधापी। संभवतः हमारी फ्लाइट सुबह की थी इसलिए भी ऐसा हो। एक सुकून, एक ख़ामोशी और तसल्ली सी दिखी। हर एयरपोर्ट की अपनी कुछ अलग सी पहचान होती ही है। और अगर हम पहली बार उस एयरपोर्ट पर होते हैं तो तस्वीरों का मोह भी होना लाज़िम है। एयरपोर्ट पर जो सज्जा थी उसमें असम ज्यादा था या मेघालय यह नहीं पता लेकिन उसमें एक बारीकी और तरतीब थी। 

गुवाहाटी एयरपोर्ट से हमें शिलॉन्ग जाना था। एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही गर्मी से सामना हुआ। ये अपेक्षित तो बिलकुल भी नहीं था। देश की राजनैतिक गर्मी का असर यहाँ के मौसम पर भी पड़ रहा है शायद सोचते हुए हम माँ बेटी कैब के भीतर दुबक गए। सफर की थकान और तेज़ चिलकती धूप का असर था शायद बिटिया तुरंत सो गई और कुछ देर में मैं भी। 

छोटी सी झपकी के बाद आँख खुली तो मौसम बदलने लगा था। 'वेलकम टू मेघालय' का बोर्ड बारिश की फुहारों के बीच ही दिखा। यह हमारा मेघालय में स्वागत था। बरसता भीगता मौसम। ऐसी चिहुँक उठी मन में। मन बावरा हो उठा। फाइनली मैं मेघालय में हूँ। 

उमियम झील : मेघालय आने की योजना में मेरे मन में कोई योजना नहीं थी। मुझे सिर्फ बादल और बारिशों से मिलना था और उनके हाथों में हाथ डालकर घूमते फिरना था। फिर भी योजनाओं की बाढ़ चारों तरफ थी। ये देखना वो देखना। रील्स से लेकर चैट जीपीटी तक सक्रिय थे। साथ ही सक्रिय थे वो लोग जो आकर गए थे। इस सक्रियता से यह हुआ कि मुझे कुछ जगहों के नाम पता चल गए। वहाँ जाऊँगी या नहीं यह पक्का तय नहीं था। लेकिन उमियम झील रास्ते में ही पड़ती थी और पानी वाली सारी जगहों के लिए तो हमेशा हाँ ही होती है। 


हमारे ड्राइवर अब्दुल भाई ने उमियम के सामने से सर्रर्र से गुजरते हुए बताया कि ये है वो झील। मैंने सोचा क्या ऐसे देखते हैं झील। मुझे लोनावला का ब्रिज याद आया हम बस गुजरे उधर से, ठहरकर निगाह भर देखा भी नहीं। वो हुड़क अभी तक फंसी हुई है। 

मैंने अब्दुल भाई से कहा, जरा रुकिए कुछ देर। वो बोले बारिश है मैडम कहाँ जाएंगी। मैंने आप फिकर न करिए, आप बस रुकिए। वो थोड़ा आगे जाकर रुक गए। बिटिया के बैग से दो छतरियाँ निकलीं। हमने छतरियाँ और पैरासीटामॉल सबसे पहले रखे थे। हम जानते थे छतरियाँ ज्यादा देर टिकेंगी नहीं और उसके बाद पैरासीटामाल ही काम आएगी। खैर, अभी तो छतरी ही काम आई। हम दोनों बरसते मौसम में आधे भीगते आधे झूठ-मूठ में खुद को बचाते उमियम के किनारे टहलने लगे। झील पर बारिश होते देख 'समंदर पर बारिश' की याद हो आई। एक ही बारिश के कितने रूप हैं, पहाड़ू पर अलग, जंगल पर अलग, झीलों पर अलग, समंदर पर अलग और सड़कों पर एकदम अलग। मुझे फूलों पर गिरती बारिश की याद भी ताजा हो आई। 



उमियम का विस्तार खूब बड़ा है। ऐसा लग रहा था वो हल्की रिमझिम की चादर ओढ़े कच्ची सी नींद में है। किनारे कुछ लोग छतरियाँ लगाए शायद मछ्ली पकड़ने की फिराक में थे। पल पर से गाडियाँ गुजर रही थीं लेकिन कोई शोर नहीं था। झील के ठीक सामने पहाड़ियों पर बादलों की धमाचौकड़ी मची हुई थी। बावरा मन सब कुछ को पी लेने को आतुर था। सारा सौन्दर्य, सारी छुअन, सारे बादल, सारे पानी। और शायद हम पी भी रहे थे। इसीलिए तो भीतर का सारा कचरा झाड़कर आए थे कि भीतर हर कोने में मौसम की जगह हो। 


हम लगभग पूरी झील का चक्कर काटने की फिराक में थे। उन्हीं रास्तों पर फिर फिर लौटना, फिर फिर दृश्यों को आँखों में समेट लेना जारी था। पूरे रास्ते में उँगलियों की पोरों पर, हथेलियों में बारिश समेटने को बेताब रही। ऐसा लग रहा था हर बूंद मेरी सूखी रूह पर मरहम है। 

बारिशें मुझे हमेशा से बेहिसाब चाहिए थीं...बस उस बेहिसाब होने में बेमौसम की बरसात और किसी का घर तबाह करने वाली बरसात हरगिज़ नहीं थी। 

फ़िलवक्त बूंदों ने लाड़ लड़ाते हुए कहा, मेघालय आई हो, सुखी होकर ही जाओगी। और सुख मेरी देह पर रेंगने लगा था। 

(जारी...)

Sunday, June 14, 2026

दर्द, प्रतिकार और अस्मिता का दस्तावेज है ‘कबिरा सोई पीर है'

स्त्री प्रतिरोध और समाज की परतों को खोलता उपन्यास:  प्रतिभा कटियार द्वारा लिखे उपन्यास 'कबिरा सोई पीर है' में हर कदम पर कवि उपस्थित है. इस कवि ने उपन्यास के हर हिस्से को बहुत सुंदर बना दिया है. लेखिका पत्रकार, कवि और कथाकार हैं. उनकी इस त्रयी ने उपन्यास को पठनीयता और गहनता दोनों लिहाज से समृद्ध किया है.

- प्रेम कुमार


जाति, स्त्री अस्मिता, प्रतिरोध और समाज की परतों को संवेदनशील तरीके से सामने लाता है है ये उपन्यास.  (Image NDTV)

‘कबिरा सोई पीर है' उपन्यास को खोलते ही आप आप किताब का समर्पण पाठक को अपने पास रोकता है. यह समर्पण “जो अपनी राख से हर बार जन्म लेती रही और लगातार संघर्ष में है ऐसी अस्मिताओं के नाम” यूं ही किसी के जेहन में नहीं आ सकता. इसके लिए एक सुलझी हुई सामाजिक राजनैतिक समझ, परिपक्वता और पक्षधरता की जरूरत होती है. इस समर्पण से उपन्यास और लेखिका का पक्ष स्पष्ट होता है.

जातिभेद की जकड़नें, सामाजिक रूढ़ियाँ, स्त्री अस्मिता की छटपटाहट इस उपन्यास के केंद्र में है. स्त्रियों के मन के भीतर छुपे दर्द, पीड़ा, कसक, दबे हुए सालते हुए दुख, जीवन जीने के ढंग, प्रतिरोध से जुड़े अनुभव बहुत मजबूती से उपन्यास में आए हैं.
मेरी आदत है कि कोई किताब पढ़ते हुए जो हिस्से मुझे अच्छे लगते हैं मैं उन्हें रेखांकित करता जाता हूँ. इस उपन्यास के साथ भी ऐसा ही किया. लेकिन उपन्यास के अंत तक आते-आते मैं हैरान रह गया यह देखकर कि लगभग आधा उपन्यास ही रेखांकित हो चुका है. उपन्यास में इतने सुगठित वाक्य हैं, हिस्से हैं कि पाठक वहाँ लौट कर आता है, ठहरता है और सोचने पर मजबूर होता है.
 

प्रेम कुमार, इस पुस्तक के समीक्षक 

सवर्ण और दलित परिवारों का परिवेश, बुनावट, स्थितियां, मानसिकता, मनोविज्ञान, द्वंद्व विविध पात्रों और घटनाओं के माध्यम से खुलते हैं. इतने सारे पात्रों, घटनाओं और उनके भीतर की गहन यात्रा को एक उपन्यास में साधना आसान नहीं होता. लेकिन लेखिका ने पूरे कौशल के साथ यह किया है. उनका प्रस्तुति का अंदाज और सलीका प्रभावित करता है.

उपन्यास में हर कदम पर कवि उपस्थित है. इस कवि ने उपन्यास के हर हिस्से को बहुत सुंदर बना दिया है. लेखिका पत्रकार, कवि और कथाकार हैं. उनकी इस त्रयी ने उपन्यास को पठनीयता और गहनता दोनों लिहाज से समृद्ध किया है.
 
अनुभव, सीमा, माँ, पिता, तृप्ति, सुधांशु, कनिका, इंस्पेक्टर चौबे, नर्स सारे किरदार अलग-अलग तरह से अनूठे हैं. हर पात्र अपनी यात्रा और परिवेश के साथ उपस्थित है और इसको पात्रों की भाषा, शब्दावली के जरिये लेखिका ने रखा है. देशज शब्दों का प्रयोग, मुहावरों का प्रयोग अच्छा लगता है. कुछ ऐसे शब्द जो कहीं खो से गए थे उनका प्रयोग लेखिका की रेंज को दिखाता है कि उनकी भाषा पर, समाज पर कितनी बारीक पकड़ है, अवलोकन कितना सूक्ष्म है. वाक्यों में जो उपमाएँ हैं, विशेषण हैं, बिम्ब हैं सबमें एक सच है, सम्प्रेषण है. ये यूं ही सुंदर बनाने के लिए नहीं हैं, इनके बड़े अर्थ हैं.

दलित पृष्ठभूमि पर पहले भी काफी लिखा गया है. लेकिन इस उपन्यास में एक अलग सा अंदाज है, चुभन है, व्यंग्य है, क्रोध है, उबाल है लेकिन तरीका बड़ा सलीके का है. आज के परिवेश में जब एक ऐसा वर्ग खड़ा हो गया है जो यह जानने और मानने से इंकार कर रहा है कि यह भी एक सच्चाई है उसी दौर के घटनाक्रम और पात्रों के जरिये लिखा गया यह उपन्यास महत्वपूर्ण है.

उपन्यास में गांधी, अंबेडकर की घटनाओं का जिक्र भी महत्वपूर्ण है, जो लेखिका की सोच, तार्किकता, परिपक्वता को दिखाता है. यह सब एक लंबी तैयारी से ही संभव है. यह राजनैतिक उपन्यास है जिसमें समाजशास्त्रीय विवेचन घटनाओं और पात्रों के जरिये हुआ है.

यहाँ केंद्र में जाति का मुद्दा तो है ही लेकिन उसके अलावा बहुत से मुद्दे हैं जो मुद्दों की तरह नहीं रोज़मर्रा के जीवन की तरह इसमें खुलते हैं. वह हिस्सा जब छोटी बहन अपने ही भाई के द्वारा यौन शोषित होती है और किसी से कुछ कह नहीं पा रही, फिर दोनों बहनों का संवाद, उनकी सदाशयता घटना की कचोट की परतों को बहुत आहिस्ता से खोलती है. जैसे कोई ज़ख्म साफ करता हो कि दवा भी लग जाय और दर्द भी न हो.

स्त्रियों के संसार की तमाम परतें उपन्यास में खुलती हैं. जहां बड़े सुभीते से लेखिका यह बताने में सफल हैं कि ये जो एक-दूसरे के आमने सामने खड़ी स्त्रियाँ हैं असल में ये सब सताई हुई हैं और जरा सा हाथ बढ़ाने की देर है सब साथ ही हैं. स्त्रियों के हक़ की पूरी लड़ाई है लेकिन कहीं कोई लाउडनेस नहीं है.

प्रकृति के साथ जुड़ाव कदम-कदम पर इतने रूपों मे दिखता है कि आप उस जुड़ाव से जुड़े बगैर नहीं रह सकते. गंगा, गंगा पर पड़ती सूरज की किरनें, रातरानी की उचकती डाल, उसकी ख़ुशबू, चिड़िया सब आपके साथ हो लेते हैं. गंगा का किनारा, शहर ऋषिकेश उपन्यास में किसी पात्र की तरह आता है. गंगा नदी को कैसे सखि के रूप में तब्दील कर लिया है लेखिका ने जिससे कुछ भी कहा सुना जा सकता है. इसमें एक वेदना भी है और सुख है. पूरे उपन्यास में पीड़ा और प्रतिकार एक साथ चलते हैं. प्रकृति इस यात्रा में पात्रों की उदासी पोंछने और ज़ख़्मों पर फाहे रखने, कभी-कभी सपने बुनने के लिए उपस्थित रहती है. कई हिस्सों को पढ़ते हुए सुमित्रानन्दन पंत की याद हो आई.

मुझे उपन्यास में आए हर छोटे बड़े पात्र की उपस्थिति ने जिस तरह सामाजिक ताने-बाने की परतों को खोला है उसने बहुत प्रभावित किया. कोचिंग चलाने वाले विक्रम त्रिपाठी हों या कोचिंग के बाहर छात्रों की बातचीत, वो माहौल. सीमा का अपने होने वाले पति से पहली बार मिलने का अनुभव, सीमा की शादी में आई औरतों का तृप्ति पर किया गया कटाक्ष, भाई का एक्सीडेंट, सीमा का मैरिटल रेप और अस्पताल की नर्स का यह कहना कि, 'घर का है करके छोड़ना मत' इंस्पेक्स्टर चौबे का गुस्सा, चाचा की दलित राजनीति में घुसने की कमजोर सी कोशिश, पापा की रोज की हालत, चपरासी विनोद के ताने और तृप्ति की चुप्पी, उसके फर्स्ट आने पर पिता का माफी मांगना और घर आकर कहना बेटा अब कभी फर्स्ट मत आना, तृप्ति और सीमा की माँ का रात दिन का बड़बड़ाना, सीमा की ससुराल में स्त्रियों का पहले अलग-थलग होना फिर एक होना, कनिका की माँ की पति द्वारा किए गए यौन शोषण की कहानी ये सब समाज की सच्चाई पर पड़े सुनहरी पर्दे को तार-तार करते हैं.


उपन्यास में एक हिस्सा कश्मीर का भी है। ऐसा लगा वो हिस्सा जैसे लाया गया है, वो न होता तो भी उपन्यास अच्छा ही चल रहा था लेकिन उस हिस्से के अंत में एक बच्चे के कोमल स्पर्श को जिस तरह लाया गया है इस हिस्से का आना अखरता नहीं बल्कि मानीखेज़ हो जाता है. एक बात यह है कि अंत में लगा कि उपन्यास को खत्म करने की जल्दी सी थी लेखिका को. प्रूफ की कुछ गलतियां भी अखरती हैं.

मैंने अरसे बाद कोई उपन्यास पूरा पढ़ा और इसका श्रेय उपन्यास को ही जाता है कि वह खुद को पूरा पढ़ा ले गया. इसे पढ़ते हुए लेखिका की पूरी तैयारी दिखती है. उनके पास समाजशास्त्रीय निगाह है, राजनैतिक समझ है और कोमल मन है. एक एक्टिविस्ट है जो समझाइश भी देता है. उपन्यास के शीर्षक बड़े ही सुंदर शेर के टुकड़े हैं जिनका उस हिस्से से जुड़ाव है. और अंत में वह पूरा शेर भी दिया गया है. यह काफी दिलचस्प है.

उपन्यास के अंतिम पेज पर प्रियदर्शन द्वारा लिखे गए ब्लर्ब की हर पंक्ति से सहमत होते हुए यही कहना चाहता हूँ कि यह एक महत्वपूर्ण उपन्यास है और इसे खूब पढ़ा जाना चाहिए, इस पर बात होनी चाहिए.

पुस्तक- कबिरा सोई पीर है (उपन्यास)
लेखक – प्रतिभा कटियार
प्रकाशक- लोकभारती प्रकाशन

लेखक परिचय : प्रेम कुमार साहित्य, समाज और संस्कृति से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय लेखन करते हैं. उनकी रुचि समकालीन हिंदी साहित्य, सामाजिक न्याय, अस्मिता विमर्श और वैचारिक बहसों में रही है. पुस्तक समीक्षा और आलोचनात्मक लेखन के माध्यम से वे साहित्यिक कृतियों को व्यापक सामाजिक संदर्भों में पढ़ने और समझने का प्रयास करते हैं.

https://ndtv.in/literature/kabira-soi-peer-hai-book-review-pratibha-katiyar-11632427

Friday, June 12, 2026

मैंने सपने में तुम्हें देखा था


मेघालय....मेघों का घर। कब बादलों से प्यार हुआ, कब बारिशों के लिए दीवानगी पैदा हुआ कुछ याद नहीं। याद है तो बस इतना ही ज़िंदगी शुरू ही काफी देर से हुई। आधी ज़िंदगी जी चुकने के बाद ज़िंदगी का एक सिरा हाथ आया और तब खुद से दोस्ती होनी शुरू हुई। अपना अच्छा बुरा दिखना शुरू हुआ। 

बचपन कोई कमाल का नहीं था, लेकिन शायद था भी। कि बचपन के खेल, सखा सहेलियों के नाम पर किताबें ही याद हैं। ओ हेनरी, चेखव, प्रेमचंद शुरुआती लेखक थे जिनसे दोस्ती हुई फिर ये लिस्ट बढ़ती गई। कुछ लेखकों के प्रति दीवानगी बढ़ती गई। इन सबके बीच कॉलेज के किस्से, ज़िंदगी के वो हिस्से जहां उम्र की अठखेलियाँ सांस लेती हैं वो सब गायब रहीं। 

पिछले एक दशक से ज़िंदगी का सिरा थामा और पाया कि ज़िंदगी तो किताबों के बाहर भी बहुत सुंदर है। लेकिन यह सुंदरता लोगों के करीब जाने पर टूटती है और प्र्कृति के क़रीब जाने पर निखरती है।  


देहरादून के मौसम ने मुझे बताया कि मेरे भीतर दीवानगी किन चीजों के लिए है, मेरी तलाश क्या है आख़िर। इस तलाश में मौसम क़रीब आता गया और लोग कम होते गए। अब जो सुख था आँखें डबडबाने के लिए काफी थे। घंटों चुपचाप आसमान देखते हुए महसूस हुआ यह ख़ामोशी मेरी तलाश थी, मुझे पता ही नहीं था। याद आया बचपन में मेहमान घर आने पर कैसी घबराहट होती थी। किसी शादी या दूसरे फङ्क्शन में जाने के नाम पर क्यों आँसू ही आ जाते थे। घर के काम करने, घंटों खाना बनाने ने मुझे लोगों से बात करने से थोड़ा तो बचाया था। 

जगजीत सिंह की गज़लें सुनते हुए पूरे घर का पोछा लगाना फेवरेट काम हुआ करता था। वह शायद मेरे बनने के दिन थे, जो ठीक से बन न सके। वरना भला मुझे कैसे पता न चला कि मुझे मौसम चाहिए, ढेर सारे मौसम। ठंड का कोहरा, बारिशों की बौछारें और तपती गरमियाँ। खुद को पहली बार तलाशा अपनी ही कहानियों में। प्रेम और प्रकृति की उन कहानियों में मुझे जिस कदर सुख मिलता था बताना मुश्किल है। हालांकि उन कहानियों का उपहास भी कम नहीं उड़ाया गया। लेकिन मैं कैसे बताती वो कहानियाँ मेरा जीवन हैं। न लगें किसी को अच्छी न सही, मैं जीना तो नहीं छोड़ सकती न। 

ऐसे ही उलझते बिखरते दिनों में मैंने एक रोज ट्रैवल ब्लॉग देखते हुए मेघालय का ब्लॉग देखा, कनिष्क गुप्ता का। मैं जैसे सुध बुध बिसराने लगी थी। जब भी मन उदास होता मैं उस ब्लॉग को खोल लेती और देखने लगती। देखते देखते ही याद आया कि मेघालय और चेरापूंजी के बारे में जनरल नॉलेज के सवाल के लिए पढ़ाते हुए माँ ने कितनी डांट लगाई थी। सही जवाब न देना डांट खाने कभी कभी मार खाने के लिए भी पर्याप्त वजह होती थी उन दिनों। 


इम्तिहान में शायद मैंने एक नंबर का जवाब गलत किया हो लेकिन ज़िंदगी में चेरापूंजी ठहर चुका था। जैसे अनजाने प्रेमी से प्यार होता है वैसा ही कुछ मेरा रिश्ता चेरापूंजी से बनने लगा। मुझे सपने में बादल आते, मैं उन्हें पकड़ने को हाथ बढ़ाती और दीवार पर टंगी घड़ी 'ऑफिस जाने का टाइम हो गया है 'कहकर आँखें दिखाती। 

क़रीब 5 बरस मैंने मेघालय जाने के सपने को अपनी पलकों में सहेजा है। और आख़िर 2026 का जून महीना उस ख़्वाब की ताबीर लेकर आया। यह यात्रा कई लिहाज से अलहदा थी। यह हम माँ बेटी की पहली यात्रा थी साथ में। इसके पहले हम दोनों लंदन गए थे लेकिन तब सिर्फ जाना और आना ही अकेले था। इस यात्रा की पूरी ज़िम्मेदारी बिटिया रानी ने उठाई थी। मैं एकदम बेफिक्र थी। 

और यह कोई छोटा सुख नहीं था।
(जारी....)

Thursday, June 11, 2026

माँ बहन : हँसाएगी नहीं चुभेगी


फ़िल्म का पहला दृश्य देखकर ही मुझे सिहरन हुई, जब एक लड़की फ़िल्म की जया आईवीएफ के लिए डॉक्टर से बात कर रही है। पति को भी बिना बताए वो पति के ही वीर्य से गर्भ धारण करना चाहती है। ठीक उसी वक़्त उसके ससुर का फोन आता है, चाय पीने के लिए बहू का इंतज़ार करते ससुर उसे कहते हैं वो किसी और के हाथ की चाय नहीं पीते।

उफ़्फ़...यह तुम्हारे हाथ का खाना, तुम्हारे हाथ की चाय....ज़िंदगी निगल रखी है इसने। वो रोटी बनाती है। बनाती जाती है, बनाती जाती है। उस घर की घड़ी में समय के पीछे से रोटी झाँकती है। कुछ दृश्यों को जान बूझकर नाटकीय बनाया गया है लेकिन वह नाटकीयता मारक है, चुभती है। हंसी नहीं आती, कुछ कचोटता है। 

दूसरा दृश्य, माधुरी दीक्षित यानि रेखा के पाँव के नीचे एक कागज आता है जिस पर लिखा है, 'क्या आप अकेले हैं?' यह अकेलेपन को मसालेदार नज़रिये से देखने और भरने वाला विज्ञापन है, जिसे वह रौंदकर आगे बढ़ जाती है। फ़िल्म की कहानी का मर्म क्या होने वाला है,  यहीं से समझ आने लगा था। 

फ़िल्म एक डार्क ह्यूमर है जो हँसाएगा कम परेशान ज़्यादा करेगा। अन्यथा यह आपको इरिटेट करेगा। यह बात सही है कि कथानक के घनत्व को फ़िल्म का ट्रीटमेंट ठीक से डिफ़ाइन करने में कई जगह चूकता है फिर भी मुझे लगता है उस चूक के बावजूद काफी कुछ कह जाता है। 

फ़िल्म के तीन मुख्य पात्र, जया सुषमा और रेखा हैं, बाद में इसमें हेमा भी जुड़ती है। सबके जीवन की व्यथा, अकेलापन, कुंठा, संघर्ष उनके हंसी ठिठोली वाले किरदारों में समाहित है। रेखा का गुनाह है उसके कपड़े, उसका बिंदास होना और सबसे ऊपर उसका स्त्री होना, जिसका आगे चलकर सिंगल हो जाना। 

समाज के तमाम संस्कारी और चरित्रवान पुरुषों का लड़खड़ाना और फिर बनाना कई नई कहानियाँ जिसमें मसाला ही मसाला है। 

स्त्री अगर अकेली है, कमजोर है तो उसे समाज रोता हुआ, असहाय और दीन हीन ही देखना चाहता है। ऐसी स्त्री जिसे तमाम कंधों की ज़रूरत हो। ताकि तमाम बेरोजगार कंधों को रोजगार मिले। लेकिन जैसे ही स्त्री कमजोर होने के बजाय लड़ना और रोने बिसूरने के बजाय खुश रहना चुनती है वह किरकिरी हो जाती है, जिसे डायन से लेकर न जाने कितने नाम दिये जाते हैं। ज़ाहिर है उसका चरित्रहीन होना तो सबसे पहले है ही। 

इन्हीं कुछ मुद्दों की तरफ ले जाती है फ़िल्म। बेटियों की मेकिंग में भी माँ की जर्नी का कसैलापन शामिल है ही। 
वह तमाम कोशिश करती है सम्मान से अपनी बेटियों को पालने के लेकिन हर बार संस्कारी और चरित्रवान समाज उसे मजा चखाता है। 

घर, दुकान तोड़े जा रहे हैं और एक अकेली माँ अपनी दो छोटी बेटियों के साथ साँप सीढ़ी खेलते हुए बच्चों का ध्यान हटाने की कोशिश करती है। यह एक मेटाफर है जो काफी असर करता है। 

फ़िल्म के अंत में गुप्ता जी की पत्नी सब कुछ जानने के बाद पति को लेकर चुपचाप चली जाती है, यह खटक सकता है लेकिन मुझे खटकता नहीं, सच लगता है, यही हक़ीक़त है। स्त्रियों के पास न तो ज़्यादा च्वाइस है, न हिम्मत। बस उनकी गृहस्थी बनी रहे, बच्चों की ठीक से शादी हो जाये, सब ढंका मुंदा रहे। 

फ़िल्म तमाम पहलुओं को सामने लाती है, हालांकि यह बात सही है कि फ़िल्म और बेहतर हो सकती थी। लेकिन यह संभावना तो हमेशा रहती ही है। मास्टरपीस नहीं है फ़िल्म लेकिन देखी चाहिए और ठीक से देखी जानी चाहिए। 

फ़िल्म का गाना 'खोल पिंजरा' फ़िल्म का एसेंस है। 

Wednesday, May 27, 2026

कौन जात हो भाई- बच्चा लाल उन्मेष


एक लम्बी गहरी चुप, सदियों से दबी हुई सिसकी, शोषण की लम्बी और लगभग सामान्य मान ली गई परिपाटी को तोड़ने की कोशिश में लहूलुहान होती कवितायें हैं बच्चा लाल उन्मेष के संग्रह 'कौन जात हो भाई' में। ये कवितायें आपके सुख चैन में सुराख करेंगी, बेचैन करेंगी। जिस जीवन को हमने सामान्य मान कर स्वीकार कर लिया है उस स्वीकार्यता को खंडित करेंगी। ये कवितायें शोषण की लम्बी दास्तान का वह दस्तावेज़ है, जिसे झुठलाने में पूरा समाज और सरकार न जाने कबसे लगी है।

बच्चा लाल के पास कहन की जो बेबाकी है वह इन कविताओं की ताक़त है। वो दलित शोषण की बात को पूरी ताक़त से कहते हैं लेकिन इसमें कोई बेचारगी नहीं है। एक झुंझलाहट है, पीड़ा है जिसने अब गुस्से का, प्रतिकार का रूप ले लिया है।

कविताओं को पढ़ते हुए दोतरफा युद्ध नज़र आता है। एक दलितों के भीतर का संघर्ष। उन्हें यह समझना कि उनका पीड़ित होना नॉर्मल नहीं है, वे भी मनुष्य हैं और उन्हें भी जीवन जीने के समस्त अधिकार मिलने चाहिए। और दूसरा युद्ध है इसी बात को बाकी समाज को बताने का। इस बताने पर मिलने वाले उपहास, प्रताड़ना और अपमान के बावजूद अपने हक़ के लिए लड़ने का। इस लड़ाई में जो ज़ख्म मिलें, चाहे देह पर या मन पर उनसे टूटने की बजाय उसे अपनी ताक़त बनाने का काम बच्चा लाल ने अपनी कविताओं के ज़रिये किया है।

ये कवितायें पढ़ते वक़्त कुछ मांग करती हैं। मांग करती हैं कि आप जातिगत उच्चता की आलीशान पोशाक उतार कर इन्हें पढ़ें। इन्हें पढ़ते समय महसूस करें इसमें दर्ज शोषण की उस दास्तान को जो कविता कहानी में दर्ज होने भर से काफी ज्यादा गहरी है लम्बी है। और बात सिर्फ जातीय भेदभाव की भी नहीं है, बात है हर उस वजह की जो शोषण की बुनियाद बनती है।

इस समय में जब कुछ भी बोलना एक खास किस्म के राजनैतिक, सामाजिक खांचे में धकेल दिए जाने का जोखिम हो, इन कविताओं की सच्चाई, बेबाकी सहेजे जाने वाली वह आवाज है जिसमें से मद्ध्म सी उम्मीद झाँकती है।

कुछ टुकड़े जो मैंने अपनी किताब में अंडरलाइन किए-

रईसों ने बख़्श दी है जान, इतना काफी नहीं?
दे रहा आश्वासन है निज़ाम, इतना काफी नहीं?
('आश्वासन' से)

ईश्वर वह कर्जा है
जिसे गरीब आजीवन भरता है
सत्ता की तरह।
('सत्ता का ईश्वर' से)

तुम पूज्य नहीं हो हमारे ग्रन्थों में
तब भी नहीं थे और अब भी नहीं हो
तुम शूद्र थे, शूद्र हो और शूद्र ही रहोगे।
कुछ आएंगे तुम्हारे अपने, बुनियाद उठाने तुम्हें पढ़ाने
पर तुम हरक़त नहीं करोगे
क्योंकि तुम्हारा समाज
मंदिरों में जा-जाकर मूढ़ हो चुका है।
('क्योंकि तुम्हारी लत्त चलती है, बुद्धि नहीं' से )

तुम्हारे इंसान बनने की प्रक्रिया में जाति आड़े आ रही है
मर रही हैं संवेदनाएं और तमाम मानवीय संभावनाएं
इन्हें जगाने के लिए जाति का दंभ छोड़ना पड़ेगा
पर तुम नहीं छोड़ोगे दोस्त! दलित थोड़ी न हो।
('तुम क्यों झुकोगे दोस्त' से)

मनुष्य हो तो आगे आओ, जाति-धरम का भेद मिटाओ
संविधान में सबके लिए, बनी एक ही खाट है।
होगा तेरी लिए अफवाह, मेरा भोगा हुआ यथार्थ है।
('भोगा हुआ यथार्थ' से )

जिसने वहशी दरिंदों को एक बार भी नहीं टोका
वो मेरा भी खुदा हो, ये मुझे मंजूर नहीं।
('मुझे मंजूर नहीं' से)

हम अब भी अन्न उगाते हैं
वे अब भी अंग चबाते हैं
हैं गज़ब के भूखे लोग यहाँ
मेरा टूटा हल भी खाते हैं।
('हम तब भी अन्न उगाते हैं' से)
बच्चा लाल उन्मेष को उनकी कविताओं के लिए बधाई देते हुए मैं कामना करती हूँ कि उनकी सच कहने की, हालत से टकराने की ताक़त बची रहे।

Wednesday, May 20, 2026

मैं मिलने जाऊँगी

 


पिछले बरस मेरे जन्मदिन पर चमोली में मित्र ने एक पौधा लगाया था। सुना है वह पौधा अब बड़ा हो गया है।
एक रोज मैं उस पौधे से मिलने जाऊँगी। उस शहर में एक नदी बहती है,जो मेरी सहेली है। मैं उस नदी से मिलने जाऊँगी। उस शहर के मौसम ने मेरे गाढ़े दुखों में गुलाबी फूल खिलाये थे, मैं उस मौसम से मिलने जाऊँगी।

जिस मित्र ने मेरे नाम के पौधे को न सिर्फ लगाया उसे साल भर सहेजा, बड़ा किया मैं उसे मित्र से मिलने जाऊँगी।

एक दिन मैं स्नेह से भरे हर व्यक्ति से मिलने जाऊँगी।

Tuesday, May 19, 2026

आवाज़ भी एक जगह है


कल जन संस्कृति मंच ने देहरादून में मंगलेश जी की स्मृति में एक कार्यक्रम का आयोजन किया। सच कहूँ अरसे बाद किसी कार्यक्रम से इतना तृप्त होकर लौटी हूँ। तृप्ति का केंद्र मैंने खुद के लिए जिन चीजों में पाया है वे हैं स्नेह, सम्मान और अब तक जाने हुए में तनिक इज़ाफ़ा। कल की शाम इन तीनों से लबरेज़ रही।

आशुतोष, रविभूषण, ज़हूर आलम, दिगम्बर और राम जी राय (जी का सम्बोधन सबके साथ माना जाय) को सुनना सुखद था। कविता की लेयर्स को देखना, टटोलना, उसके भीतर और भीतर झांकना और कविता के मर्म तक पहुंचना सुखद था। जानना हमेशा ही कम होता है। हर बार लगता है, कितना तो कम जानते हैं हम। कल भी ऐसा ही सा दिन था।

इतने सारे कवियों ने इतना सुंदर सुवावस्थित कविता पाठ किया, आनंद हुआ। भरोसा हुआ कि हालात से बैचेन लोग कम भी नहीं हैं। प्रेम शंकर और मृत्युंजय ने क्या ही गज़ब का संचालन किया। यह उस संचालन की ही खूबी थी कि कार्यक्रम में इतने वक्ताओं के वक्तव्य और 20 कवियों के कविता पाठ से रचा बसा कार्यक्रम समय पर शुरू हुआ और समय पर खत्म हुआ।

न किसी कवि ने माइक पकड़कर पकड़े ही रहने की जिद की और ऐसा भी नहीं लगा कि बहुत हड़बड़ी हुई। तो यह संतुलन ख़ूबसूरत था। मदन चमोली शांति से सब संभाले भी रहे और लगने भी नहीं दिया कि कोई कुछ संभाल रहा है।

इब्बार रब्बी जी को पहली बार सुना, क्या ख़ूब हैं वो। क्या उत्साह, क्या बेबाक़ी और क्या ही कमाल का पाठ। नाम लेकर हर कवि के बारे में लिखूँगी तो कई किलोमीटर की पोस्ट हो जाएगी बस इतना ही कि हर कवि अपने होने में कमाल था। इतने सारे कवियों को एक साथ सुनना और एक मिनट के लिए भी कविता से ध्यान न हटना इस बात की तसदीक़ है।

श्रोताओं की संख्या भी सुख का एक कारण था। इतने सारे लोग समय पर आ गए और लगातार बने रहे, यह कम महत्वपूर्ण बात नहीं। प्रतिरोध के स्वर में इतने सारे साथियों का होना सुख तो है ही।

मंगलेश जी से जुड़े इतने स्नेहिल किस्से सुनने को मिले कि ऐसा लगा नहीं हैं वो हमारे बीच नहीं हैं। दैहिक रूप से वे हमारे साथ भले नहीं हैं लेकिन हम सबके भीतर वो हैं और रहेंगे। कार्यक्रम की शुरुआत में उनके कविता पाठ की रिकॉर्डिंग सुनना भी कम सुंदर अनुभव नहीं था।

तो कुल जमा बात इतनी है कि ये माना कि अंधेरा घना है, लेकिन इस अंधेरे को तोड़ने की कोशिश करने वाले भी कम नहीं हैं, और ये अंधेरा एक दिन टूटेगा ज़रूर।

मृत्युंजय पुराने साथी हैं, उनसे अरसे बाद मिलना बड़ा ही सुखद रहा। बाकी इस कार्यक्रम में जो गुना है वो धीरे-धीरे भीतर जगह बना रहा है। धीरे-धीरे उस पर भी लिखूँगी अगर वक़्त इज़ाजत देगा। 

जिंदाबाद साथियों!