इतनी नफ़रत
Thursday, July 23, 2026
इतनी नफरत, इतनी हिंसा
इतनी नफ़रत
Thursday, July 9, 2026
यह खुशरंग दिनों की बात है
शिलॉन्ग से सोहरा की यात्रा शुरू हो चुकी थी। उत्साह, खुशी और गहरी शांति का हाथ थामे हम माँ बेटी निकल पड़े थे। यूं हम जानते तो थे कि सफ़र सुहाना होने वाला है लेकिन असल मजा उस जाने हुए के पार जाने का है। यात्राओं की सबसे सुंदर बात लगती है कि हमेशा कोई न कोई चौंकाने वाला मंजर यात्राओं के पास होता है। हमारे तमाम जाने हुए से, सोचे हुए से अलग कुछ अनोखा। जैसे कोई बंद मुट्ठी हो, जिसके खुलने का इंतज़ार हो।
रात अच्छी गहरी नींद सो चुकने के बाद का यह ताज़ा दिन कमाल होने वाला था। और हम पूरी तरह से तैयार थे इस दिन को जी लेने के लिए। जैसे-जैसे हम सोहरा यानि चेरापूंजी की ओर बढ़ रहे थे, मौसम बदल रहा था। वही मौसम जिससे मिलने की बेकरारी थी। मन कुलांचे मार रहा था। बाहर का मौसम मन के मौसम की ओर हाथ बढ़ा रहा था। हम एक गहरी चुप में धँसे हुए मौसमों की कारस्तानी देख रहे थे। शिलॉन्ग से सोहरा की दूरी सिर्फ 55 किमी है। टैक्सी से यह दूरी 2 घंटे के अनुमानित समय में आराम से पूरी हो जाती है जिसमें बीच में आने वाले खूबसूरत रास्तों का आनंद लेने के लिए रुकना भी शामिल करें तो ज्यादा से ज्यादा 3 घंटे।
असल में यह रास्ता इतना ज्यादा खूबसूरत है कि हर थोड़ी देर बाद लगता है कि यहाँ रुकना चाहिए, यहीं रुके रहना चाहिए। ऊंची विस्तृत पहाड़ियों के बीच खूबसूरत हरियाली और पर मँडराते बादल, जैसे दिल की धड़कनों की रफ्तार भी मध्ध्म हो जाए। कैब ड्राइवर अब्दुल भाई को अंदाजा है कि पर्यटक कैसे बावरे हो जाते हैं यहाँ इसलिए वो खुद ही बीच बीच में कैब रोक रहे थे। सच कह रही हूँ कितने ही वीडियो देखे हों, यात्रा वृतांत पढे हों लेकिन जहां होने का सुख है वहाँ होने का ही सुख है। और यह सुख न कभी शब्दों में ढल सकता है और न ही कैमरे में कैद हो सकता है। हम सिर्फ कोशिश करते हैं वर्तमान के लम्हों को भविष्य की स्मृतियों के लिए सहेजने की। सिर्फ एक बचकानी सी कोशिश। लेकिन यह बात जीकर जानी है कि बटोरना तो असल में जीवन ही है।
क्या आप पानी लिख सकते हैं, इस तरह कि उसे पढ़कर प्यास बुझे। शायद दुनिया भर के लेखक इसी कोशिश में हैं, इसी साधना में कि एक रोज वो इस तरह पानी लिखना सीख पाएंगे कि उसे पढ़कर पढ़ने वालों की प्यास बुझेगी। इस तरह रोटी लिख पाएंगे कि पढ़ने वालों की उसे पढ़कर भूख मिटेगी। लेकिन यह कल्पना की बातें हैं। रोटी की भूख रोटी के बारे में पढ़कर नहीं, रोटी खाकर ही मिट सकती है। ठीक वैसे ही यात्रा का सुख यात्रा करके ही जाना जा सकता है। सवाल मन में यह भी आता है कि फिर मैं क्यों लिख रही हूँ आखिर। लेकिन जवाब मुझे अच्छे से पता है, यह लिखते हुए मैं उसे जिये हुए को फिर से जी रही हूँ। यह सब मेरे लिए ही, सिर्फ मेरे लिए। कि मैं कैसे लिख पाऊँगी उन बादलों के बारे में जो अब हमारी टैक्सी में आकर हमारे बीच बैठ गए थे, मंडरा रहे थे हमारे ऊपर, हथेलियों में, बालों में, पलकों में। सड़क लगभग दिखनी बंद हो चुकी थी और हम बादलों पर ही चल रहे थे।
शायद बादलों के इसी खेल को देखने के लिए हमने यह मौसम चुना यहाँ आने का। न सही टूरिस्ट स्पॉट देख पाने का सुख मुझे ये बादलों के खेल देखने से कब फुर्सत। हमने बीच में कुछ जगहों पर रुककर तस्वीरें लीं और यह सोचकर हंस ही दिये कि यह जानते हुए भी हम दस परसेंट भी तसवीरों में नहीं उतार पाएंगे कोशिश करते रहते हैं। एक ब्रेक में हमने भुट्टा और पाइनएप्पल लिए। यह शायद पहाड़ों पर खाने का रिवाज है या कोई और बात यहाँ भुट्टे के स्वाद का अलग ही मजा होता है।
बिना किसी जल्दबाज़ी के धीरे-धीरे चलते हुए हम आखिर सोहरा पहुँच गए। यहाँ चेरापूंजी के नाम का कोई बोर्ड नहीं है, हर जगह सोहरा है। इसके बारे में कहते हैं कि पहले इस जगह का नाम सोहरा ही था फिर अंग्रेजों ने इसका नाम चेरापूंजी किया, क्यों किया ये तो वही जानें लेकिन फिलहाल मेघालय सरकार ने इसे सोहरा ही घोषित कर दिया है। एक तो ये शहरों के नाम बदलने की राजनीति यह बात क्यों नहीं समझती कि यह बात कितनों की भावनाओं के साथ जुड़ी हुई है।
खैर, बादलों वाले रास्ते से लगभग उड़ते हुए हम अपने गंतव्य पर पहुँच चुके थे। एक छोटे से गाँव में एक प्यारा सा होमस्टे था हमारा ठीहा। यह होमस्टे कुछ महिलाएं ही चलाती हैं। माँ और बेटी मुख्य तौर पर। यहाँ या तो कपल, सिंगल औरतें लड़कियां या परिवार ही रुक सकते हैं। सिंगल लड़कों या लड़कों के ग्रुप के लिए यह नहीं है। बहरहाल, प्यारी सी मुस्कुराहट के साथ हमारा स्वागत किया गया। कमरा बेहद प्यार से और सलीके से सजाया गया था। बादलों में छुपा हुआ वह घर और उस घर के एक हिस्से में हम। हमने पर्दे हटाये खिड़कियाँ खोलीं और बादलों को कमरे में आने दिया। बादल भी इसी इंतज़ार में थे शायद। जरा सी देर में कमरा बादलों से भर गया। बिटिया मेरी चाय के इंतजाम में लगी थीं और मैं बादलों के संग गुफ्तगू में।
संग बने रहिए...बादलों का यह खेल तो अभी बस शुरू ही हुआ है।
(जारी....)
Friday, July 3, 2026
I love Shilong
ये शिलांग की सुबह है। इस सुबह में बीते दिन की पूरी धमक है, बीती शाम की सरगोशियां हैं, चमक है। सुबह की सैर पर निकली तो चलती ही गई, मानो शिलांग को अपने कदमों से भी जीना चाहती हूँ। किसी भी शहर की सुबह में उसकी रात की कहानी का पता होता है। बस उस पते का पता पूछने वाले कम ही होते हैं। अपने चलते हुए कदमों और दृश्यों में छुपी शहर की बतकही से मुख़ातिब थी। वही चाय का उठता धुआँ, कुछ घूमने निकले जोड़े, कुछ परिवार, कुछ ब्लॉगर कैमरे की क्लिक्स का महासागर।
कुछ लोग I love Shilong के सामने फोटो खिंचा रहे थे। एक प्रेमी जोड़े की तस्वीर उसके इसरार पर मैंने भी खींची। तभी चिप्स के पैकेट को वहीं फेंककर आगे बढ़ गए अंकल जी अपनी बीवी को डांटते हुए उधर से जाने लगे। ये अभी I Love Shilong के साथ फोटो खिंचवा रहे थे। मैंने अपना माथा पीट लिया। गुस्से से उन्हें घूरना चाहा लेकिन वो अपनी बीवी को किसी बात पर डांटने में व्यस्त थे। पास खड़ी की सोलह सत्रह साल की लड़की ने मेरे चेहरे के भाव पढ़ लिए थे शायद। वो मुझे देखकर मुस्कुराई और उसने खुद जाकर वह पैकेट उठा लिया।
कुछ दूरी आज के दिन के अख़बार के ढेर और कुछ अख़बार खरीदते और खबरों की दुनिया पर गुफ्तगू करते लोग दिखे। अख़बार पर बात करने वालों में ज़्यादातर स्थानीय लोग ही थे और इनमें महिलाएं एक भी नहीं थीं। महिलाएं कब और कहाँ कहाँ नहीं होतीं हैं, इसकी वजह पर नहीं जाऊँगी क्योंकि अगर गई तो बात जरा लंबी ही जाएगी। खैर, अख़बारों के पहले पेज पर जंतर मंतर की और अभिजीत दीपिके की तस्वीरें थीं।
शहर का कुछ पता नहीं था, किसी से पूछना भी नहीं था, गूगल से भी नहीं, तो जिधर भीड़ कम लगे और हरियाली ज्यादा दिखे उधर चल पड़ी। कुछ चर्च, कुछ लाइब्रेरी रास्ते में पड़ते गए। सड़कों की सफाई बराबर हो रही थी। सफाई कर्मचारी रात के निशान सड़कों से मिटा रहे थे। उन्हें अगले दिन के लिए तैयार कर रहे थे। तभी सड़क पर एक पिता और पुत्र पर नज़र पड़ी। पिता सड़क पर झाड़ू लगा रहा था, कूड़ा उठा रहा था और उसका छोटा सा बच्चा शायद डेढ़ या दो साल का होगा, कूड़ा उठाने के लिए थर्माकोल के डिब्बे में प्लास्टिक की खाली बोतल को फंसाकर बनाए गए कूड़ा इकट्ठा करने वाले डब्बे को खेल गाड़ी बनाकर खेलता दिखा। वह बहुत खुश था। खेलगाड़ी को खींचता, उसे गोल गोल घुमाता, उसमें कोई कूड़ा उठाकर रख देता फिर भागने लगता। उस बच्चे की मुस्कुराहट में यह सुबह डूब चुकी है।
फिलहाल मेरी हथेलियों में ख़ुशी का यह सिक्का है। इसे मैं कभी खर्च नहीं करूंगी। दुआ करूंगी कि दुनिया के सारे बच्चे यूं ही खुश हों, लेकिन कूड़ा बीनते हुए नहीं, स्कूल जाते हुए, पढ़ते हुए, खेलते हुए और इस लगभग बर्बाद हो चुकी दुनिया को थोड़ा बेहतर बनाते हुए।
सुबह की सैर में शहर का जो चेहरा दिखा वो रात के चेहरे से फर्क था कई मायनों में। रात में जिस मौज मस्ती की रवानगी थी सुबह में एक पुरसुकून ठहराव था। मैं इन सबहों की तलाश में ही तो निकली हूँ, इस पुरसुकून ठहराव की तलाश में। अपने चेहरे को आसमान की ओर करके लंबी गहरी सांस लेते हुए शहर को जज़्ब करने की कोशिश की। बारिश न जाने कहाँ थी कहाँ नहीं लेकिन ठीक उस वक़्त मेरे गालों पर एक बूंद टप्प से टपकी। कुदरत के ये करिश्मे मुझे बिखेर देते हैं। मैं उस लम्हे में वहीं बिखर गयी थी। वापस लौटते समय याद आया चाय तो पी ही नहीं, हालांकि कई जगह चाय बनती देखी थी शायद इच्छा नहीं रही थी। कमरे पर आकर कुछ देर पड़ी रही।
भीतर एक उत्साह था, आज हम चेरापूंजी जाने वाले हैं जिसे सोहरा भी कहा जाता है। एक गाना याद आया और एक लंबी शरारत भरी मुस्कुराहट चेहरे पर तैर गई, 'आज उनसे पहली मुलाक़ात होगी, फिर आमने सामने बात होगी...'
इसी गमक के साथ हम चेरापूंजी के लिए रवाना हुए। मौसम सुहाना था और सफर का इससे अच्छा सामना क्या होगा कि आपके साथ अच्छा मौसम चल पड़े और और अच्छा और अच्छा होता जाय। हम बादलों की गोद में समाने को बेताब थे....
(जारी...)
Tuesday, June 30, 2026
दिल कह रहा है, तुझसे ये रिश्ता जोड़ लूँ...
रिश्ता तो जुड़ चुका था। हम शिलॉन्ग पहुंच चुके थे। एक दिन में जैसे न जाने कितने दिन जी लिए थे हमने। कोई दिन ऐसे होते हैं कि जी करता है ख़त्म ही न हों। हम ऐसे दिनों को आस से देखते हैं बिना कुछ कहे, और कभी-कभी वो हमारी आँखों की सुन लेते हैं। यह ऐसा सा ही दिन था। और अभी तक ख़त्म नहीं हुआ था। कमरे पर पहुंचे तो चाय की जबर्दस्त तलब लगी, और जब चाय होगी तो पकौड़े तो लाज़िमी हुए। कुछ देर आरामदेह बिस्तर में धँसे हुए ज़िंदगी किसी रील सी घूमने लगी।
रत्ती भर जीने के लिए कितना ज्यादा मरना पड़ता है। अपनी ही ख़्वाहिशों को पहचानने में एक उम्र गुज़र जाती है। कहाँ जानती कि मुझे धूप के सिक्कों से मोहब्बत है, कहाँ जानती थी मुझे बारिशों का स्वाद बेपनाह पसंद है कि मैं भीगना ही नहीं चाहती बारिशें पी जाना चाहती हूँ, कई बार लगता है बारिश हो जाना चाहती हूँ। कहाँ जानती थी कि खुद को महसूस करने के लिए खुद के साथ कुछ दूरी तय करना कितना ज़रूरी है। पिछले कुछ बरसों की छुटपुट यात्राओं के दौरान पाया कि जिस अंजान सी तलाश में भटक रही थी वो तो ये है। कुदरत से शदीद मोहब्बत। इंसानी मोहब्बत आपका दिल दुखा सकती है लेकिन कुदरत आपको कभी अकेला नहीं छोड़ती। हमेशा साथ चलती है कभी धूप बनकर कभी छाया बनकर।
स्मृतियों के दरीचे खुले हुए थे जबकि वर्तमान अपनी सोंधी ख़ुशबू लिए सामने खड़ा था। चाय, पकौड़े सामने थे और हम आराम की मुद्रा में बिस्तर से निकले बगैर वहीं खाने की इच्छा से जूझते हुए। आखिर बिटिया ने वहीं बिस्तर पर चाय दी और पकौड़े भी। एक जरा सी ख़्वाहिश कोई बिना कहे समझ ले और पूरी कर दे तो कैसा तो पानी हो जाता है मन। ज़िंदगी भर कितने पकौड़े तले होंगे, कितनी चाय बनाई होगी कोई हिसाब नहीं लेकिन यूं इस सुकून से इस तरह इनका होना कमाल है। सोचो तो, मर्दों के लिए जो सुख रोज का है, जिस पर उनका ध्यान भी नहीं जाता वो हम औरतों को कितनी मेहनत से कमाना पड़ता है।
पकौड़े अच्छे थे साथ ही लाल चाय भी। खाने के बाद कुछ देर और बिस्तर में दुबक गई तो आलस के एक झोंके ने पीठ सहला दी। सच्ची बड़ा आराम आया। घड़ी ने आठ बजाए तो हम माँ बेटी ने एक दूसरे को देखा और कुछ देर का टाइम खुद के लिए और ले लिया। कुछ देर बाद उठे तो शरीर और मन दोनों ताजादम हो चुके थे। हम दिन का आखिरी हिस्सा जी भर के जीने के लिए तैयार थे। अब तक यह सर्च की जा चुकी थी कि कहाँ पर कौन सा खाना बेस्ट मिलता है। वैसे,खाना हमारे लिए प्रियोरिटी नहीं था, हमें तो शिलॉग की रात देखनी थी।
दुकानें धीरे-धीरे बंद हो रही थीं और शहर जाग रहा था। चौक के पास लोग बस टहल रहे थे, घूम रहे थे, बैठे थे खड़े थे। कोई कुछ कर नहीं रहा था, बस वो वहाँ थे। न किसी को कहीं जाना था, न कुछ खरीदना था, न कुछ खाना था। मैंने महसूस किया कि लोग आपस में भी ज्यादा बात नहीं कर रहे हैं। बस वो एक-दूसरे का हाथ थामे साथ हैं। जैसे अपनेपन की कोई ख़ुशबू बिखरी हुई थी।
हमने भी उस महकती शाम के हवाले खुद कर दिया। इधर से उधर भटकते हुए हमारे कानों में सुरीले गाने भी पड़ रहे थे। अक्सर आसपास संगीत रहता ही है लेकिन जाने क्यों यात्राओं का सुर ऐसा लगता है कि कोई गीत कोई गाना सुनने का खयाल तक नहीं आता। तो यह सुबह से कानों में पड़ा पहल गीत था। इस महकती चहकती सी शाम में यह अच्छा लग रहा था। समझ नहीं आ रहा था कि यह आवाज आ कहाँ से रही है। फिर अचानक नज़र पड़ी, कोई जिनके पास से कई बार गुज़र गए ये तो वही सज्जन गा रहे थे। चूंकि स्पीकर दूर कहीं थे तो शायद इसलिए ध्यान नहीं गया। दूसरे लोग उन्हें घेर के खड़े हों ऐसा भी नहीं था। वो अपनी धुन में बस गा रहे थे। असल में वो अपने संगीत को जी रहे थे। वो दृष्टि बाधित थे लेकिन उनके पास एक नज़र थी खुशी को पहचानने की, सलीका था उसे सेलिब्रेट करने का। कुछ लोग उनके सामने रखे बॉक्स में पैसे भी डाल रहे थे। लेकिन वो सिर्फ गा रहे थे...कुणाल गांजावाला की आवाज़ जिसे शायद भूल ही चुकी थी, उस रात से फिर से साथ हो ली है। पहले से ज्यादा अपनाइयत के साथ। अब उस आवाज़ में और न जाने क्या क्या शामिल हो चुका है...दिल कह रहा है, तुझसे ये रिश्ता जोड़ लूँ, तेरी धड़कनों को छू लूँ... जानती हूँ अब जब भी यह गाना सुनूंगी शिलॉन्ग की वह रात जाग उठेगी।
घूमते फिरते वहाँ ढेर सारी पान वाली दुकानें दिखीं। हमारे यहाँ जैसी होती हैं वैसी नहीं, थोड़ी अलग। छोटे से स्टूल पर पारंपरिक वेश में बैठी महिलाएं और सामने छोटी सी मेज पर करीने से सजे हुए पान। एक नॉर्थ ईस्ट की कलीग की याद आ गई वो खूब पान खाती थी, वो ताम्बूल बोलती थी। मुझे भी पान खाने का चाव तो है। खासकर नए शहरों में, क्योंकि हर शहर का मिजाज वहाँ के पान में भी होता है। यहाँ के पान या ताम्बूल का मिजाज अलग था। उस वक़्त तो मैंने पैक कराया था डिनर के बाद जब उसे खोला तो पाया यह तो एकदम अलग है। पान के पत्ते पर लगा हुआ थोड़ा सा चूना और बस। साथ में सुपारी के टुकड़े और कच्चे नारियल की कतरन। सुपारी तो खाई न गई नारियल की कतरन के साथ जरूर खाया थोड़ा सा और बाकी संभाल लिया। जानती थी यह थोड़ा-थोड़ा ही खाया जाएगा। यह लखनऊ या बनारस वाले पान से एकदम अलग था।
किसी रात का तिलिस्म ऐसा होता है कि न हम चाहते हैं वह बीते न वह बीतती है। देर रात तक इधर से उधर घूमते हुए भूल ही गए थे कि हमें डिनर भी करना है। याद आया तो एक बेहतरीन रेस्तरां में खुद को पाया। एक अच्छा सा दिन, प्यारी सी शाम अच्छे से डिनर के साथ ही पूरा होना डिज़र्व करता है।
हम उस प्यारे से दिन को पलकों में मूंदकर यह सोचते हुए सो गए कि अगला दिन चेरापूंजी का दिन होगा। मेरा बचपन का अनदेखा ख्वाब जो कल हक़ीक़त बनने वाला था।
नींद सचमुच अच्छी सी आई थी...
(जारी...)
Wednesday, June 24, 2026
तेरे लिए मौसम मंगाया है...
प्रकृति के क़रीब जाकर हमेशा यह महसूस हुआ है कि मेरे मन का वह प्रेमी और कोई नहीं यह क़ुदरत ही है। जब जितना और जैसा मौसम चाहा, भरपूर मिला। धीरे-धीरे ज़िंदगी के रास्ते भी बिछने लगे, वो रास्ते जो मेरे मन की दुनिया में जाते हैं। लेकिन उन रास्तों पर चलने से पहले या उनके मिलने से पहले हमें उन रास्तों की कितनी तलाश है यह जानना भी ज़रूरी है। पानी का पता प्यास से बेहतर कौन जानता है। और जैसा कि पहले भी कह चुकी हूँ, ज़िंदगी के लिए अपनी भूख प्यास को समझते, बूझते हुए जिंदगी ही गुज़र जाती है।
नीले गुलमोहर जिसका बोटिनिकल नाम जेरकेंडा है की छटा देखते ही बन रही थी। अभी बरस कर थमी बूंदों को पत्तियों ने अपनी हथेलियों पर सहेजा हुआ था। घास के मुहाने पर अटकी बूंदें जैसे किसी जौहरी ने अपनी कला का नायाब नमूना बनाते हुए घास के सिरों को हीरे सी बूंदों से जड़ दिया हो। और हीरे की कनी से सजी बूंदों को न कोई गुमान न घास को। हवा का एक झोंका आता और घास इतराते हुए उन हीरे सी बूंदों को ऐसे झटक देती मानो निर्विकार ही हो किसी भी सज्जा से। और यही उस सज्जा का सबसे सुंदर पहलू था। Sunday, June 21, 2026
स्वाद एक कारा है
तस्वीर इन्टरनेट से साभार
यह इतवार की सुबह है। जाने कहाँ से इतना सारा तनाव आ गया है। लंबे समय से एक चिड़चिड़ाहट तारी है जिसे फुल इगनोर करने पर लगी हूँ। यह चिड़चिड़ाहट रसोई से है, घर के कामों से है।
Saturday, June 20, 2026
कॉकटेल-2 : मिसोजिनी से भरपूर घटिया मसाला
अंत में मंगलसूत्र जिंदाबाद, आज़ाद लड़कियों का कैरेक्टर एसेसनेशन, उन्हें ओब्जेक्टीफाई करना। प्यार और रिश्तों पर लंबे लंबे दार्शनिक लेक्चर जिनका कोई अर्थ नहीं।
Tuesday, June 16, 2026
पहली मुलाक़ात का तिलिस्म
गुवाहाटी एयरपोर्ट की सबसे खूबसूरत बात यह लगी कि न कोई ज्यादा भीड़ न आपाधापी। संभवतः हमारी फ्लाइट सुबह की थी इसलिए भी ऐसा हो। एक सुकून, एक ख़ामोशी और तसल्ली सी दिखी। हर एयरपोर्ट की अपनी कुछ अलग सी पहचान होती ही है। और अगर हम पहली बार उस एयरपोर्ट पर होते हैं तो तस्वीरों का मोह भी होना लाज़िम है। एयरपोर्ट पर जो सज्जा थी उसमें असम ज्यादा था या मेघालय यह नहीं पता लेकिन उसमें एक बारीकी और तरतीब थी।
गुवाहाटी एयरपोर्ट से हमें शिलॉन्ग जाना था। एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही गर्मी से सामना हुआ। ये अपेक्षित तो बिलकुल भी नहीं था। देश की राजनैतिक गर्मी का असर यहाँ के मौसम पर भी पड़ रहा है शायद सोचते हुए हम माँ बेटी कैब के भीतर दुबक गए। सफर की थकान और तेज़ चिलकती धूप का असर था शायद बिटिया तुरंत सो गई और कुछ देर में मैं भी।
छोटी सी झपकी के बाद आँख खुली तो मौसम बदलने लगा था। 'वेलकम टू मेघालय' का बोर्ड बारिश की फुहारों के बीच ही दिखा। यह हमारा मेघालय में स्वागत था। बरसता भीगता मौसम। ऐसी चिहुँक उठी मन में। मन बावरा हो उठा। फाइनली मैं मेघालय में हूँ।
उमियम झील : मेघालय आने की योजना में मेरे मन में कोई योजना नहीं थी। मुझे सिर्फ बादल और बारिशों से मिलना था और उनके हाथों में हाथ डालकर घूमते फिरना था। फिर भी योजनाओं की बाढ़ चारों तरफ थी। ये देखना वो देखना। रील्स से लेकर चैट जीपीटी तक सक्रिय थे। साथ ही सक्रिय थे वो लोग जो आकर गए थे। इस सक्रियता से यह हुआ कि मुझे कुछ जगहों के नाम पता चल गए। वहाँ जाऊँगी या नहीं यह पक्का तय नहीं था। लेकिन उमियम झील रास्ते में ही पड़ती थी और पानी वाली सारी जगहों के लिए तो हमेशा हाँ ही होती है।
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हमारे ड्राइवर अब्दुल भाई ने उमियम के सामने से सर्रर्र से गुजरते हुए बताया कि ये है वो झील। मैंने सोचा क्या ऐसे देखते हैं झील। मुझे लोनावला का ब्रिज याद आया हम बस गुजरे उधर से, ठहरकर निगाह भर देखा भी नहीं। वो हुड़क अभी तक फंसी हुई है।
मैंने अब्दुल भाई से कहा, जरा रुकिए कुछ देर। वो बोले बारिश है मैडम कहाँ जाएंगी। मैंने आप फिकर न करिए, आप बस रुकिए। वो थोड़ा आगे जाकर रुक गए। बिटिया के बैग से दो छतरियाँ निकलीं। हमने छतरियाँ और पैरासीटामॉल सबसे पहले रखे थे। हम जानते थे छतरियाँ ज्यादा देर टिकेंगी नहीं और उसके बाद पैरासीटामाल ही काम आएगी। खैर, अभी तो छतरी ही काम आई। हम दोनों बरसते मौसम में आधे भीगते आधे झूठ-मूठ में खुद को बचाते उमियम के किनारे टहलने लगे। झील पर बारिश होते देख 'समंदर पर बारिश' की याद हो आई। एक ही बारिश के कितने रूप हैं, पहाड़ू पर अलग, जंगल पर अलग, झीलों पर अलग, समंदर पर अलग और सड़कों पर एकदम अलग। मुझे फूलों पर गिरती बारिश की याद भी ताजा हो आई।
उमियम का विस्तार खूब बड़ा है। ऐसा लग रहा था वो हल्की रिमझिम की चादर ओढ़े कच्ची सी नींद में है। किनारे कुछ लोग छतरियाँ लगाए शायद मछ्ली पकड़ने की फिराक में थे। पल पर से गाडियाँ गुजर रही थीं लेकिन कोई शोर नहीं था। झील के ठीक सामने पहाड़ियों पर बादलों की धमाचौकड़ी मची हुई थी। बावरा मन सब कुछ को पी लेने को आतुर था। सारा सौन्दर्य, सारी छुअन, सारे बादल, सारे पानी। और शायद हम पी भी रहे थे। इसीलिए तो भीतर का सारा कचरा झाड़कर आए थे कि भीतर हर कोने में मौसम की जगह हो।
हम लगभग पूरी झील का चक्कर काटने की फिराक में थे। उन्हीं रास्तों पर फिर फिर लौटना, फिर फिर दृश्यों को आँखों में समेट लेना जारी था। पूरे रास्ते में उँगलियों की पोरों पर, हथेलियों में बारिश समेटने को बेताब रही। ऐसा लग रहा था हर बूंद मेरी सूखी रूह पर मरहम है।
बारिशें मुझे हमेशा से बेहिसाब चाहिए थीं...बस उस बेहिसाब होने में बेमौसम की बरसात और किसी का घर तबाह करने वाली बरसात हरगिज़ नहीं थी।
फ़िलवक्त बूंदों ने लाड़ लड़ाते हुए कहा, मेघालय आई हो, सुखी होकर ही जाओगी। और सुख मेरी देह पर रेंगने लगा था।
(जारी...)
Sunday, June 14, 2026
दर्द, प्रतिकार और अस्मिता का दस्तावेज है ‘कबिरा सोई पीर है'

जाति, स्त्री अस्मिता, प्रतिरोध और समाज की परतों को संवेदनशील तरीके से सामने लाता है है ये उपन्यास. (Image NDTV)
‘कबिरा सोई पीर है' उपन्यास को खोलते ही आप आप किताब का समर्पण पाठक को अपने पास रोकता है. यह समर्पण “जो अपनी राख से हर बार जन्म लेती रही और लगातार संघर्ष में है ऐसी अस्मिताओं के नाम” यूं ही किसी के जेहन में नहीं आ सकता. इसके लिए एक सुलझी हुई सामाजिक राजनैतिक समझ, परिपक्वता और पक्षधरता की जरूरत होती है. इस समर्पण से उपन्यास और लेखिका का पक्ष स्पष्ट होता है.
जातिभेद की जकड़नें, सामाजिक रूढ़ियाँ, स्त्री अस्मिता की छटपटाहट इस उपन्यास के केंद्र में है. स्त्रियों के मन के भीतर छुपे दर्द, पीड़ा, कसक, दबे हुए सालते हुए दुख, जीवन जीने के ढंग, प्रतिरोध से जुड़े अनुभव बहुत मजबूती से उपन्यास में आए हैं.
मेरी आदत है कि कोई किताब पढ़ते हुए जो हिस्से मुझे अच्छे लगते हैं मैं उन्हें रेखांकित करता जाता हूँ. इस उपन्यास के साथ भी ऐसा ही किया. लेकिन उपन्यास के अंत तक आते-आते मैं हैरान रह गया यह देखकर कि लगभग आधा उपन्यास ही रेखांकित हो चुका है. उपन्यास में इतने सुगठित वाक्य हैं, हिस्से हैं कि पाठक वहाँ लौट कर आता है, ठहरता है और सोचने पर मजबूर होता है.

प्रेम कुमार, इस पुस्तक के समीक्षक
सवर्ण और दलित परिवारों का परिवेश, बुनावट, स्थितियां, मानसिकता, मनोविज्ञान, द्वंद्व विविध पात्रों और घटनाओं के माध्यम से खुलते हैं. इतने सारे पात्रों, घटनाओं और उनके भीतर की गहन यात्रा को एक उपन्यास में साधना आसान नहीं होता. लेकिन लेखिका ने पूरे कौशल के साथ यह किया है. उनका प्रस्तुति का अंदाज और सलीका प्रभावित करता है.
उपन्यास में हर कदम पर कवि उपस्थित है. इस कवि ने उपन्यास के हर हिस्से को बहुत सुंदर बना दिया है. लेखिका पत्रकार, कवि और कथाकार हैं. उनकी इस त्रयी ने उपन्यास को पठनीयता और गहनता दोनों लिहाज से समृद्ध किया है.
अनुभव, सीमा, माँ, पिता, तृप्ति, सुधांशु, कनिका, इंस्पेक्टर चौबे, नर्स सारे किरदार अलग-अलग तरह से अनूठे हैं. हर पात्र अपनी यात्रा और परिवेश के साथ उपस्थित है और इसको पात्रों की भाषा, शब्दावली के जरिये लेखिका ने रखा है. देशज शब्दों का प्रयोग, मुहावरों का प्रयोग अच्छा लगता है. कुछ ऐसे शब्द जो कहीं खो से गए थे उनका प्रयोग लेखिका की रेंज को दिखाता है कि उनकी भाषा पर, समाज पर कितनी बारीक पकड़ है, अवलोकन कितना सूक्ष्म है. वाक्यों में जो उपमाएँ हैं, विशेषण हैं, बिम्ब हैं सबमें एक सच है, सम्प्रेषण है. ये यूं ही सुंदर बनाने के लिए नहीं हैं, इनके बड़े अर्थ हैं.
दलित पृष्ठभूमि पर पहले भी काफी लिखा गया है. लेकिन इस उपन्यास में एक अलग सा अंदाज है, चुभन है, व्यंग्य है, क्रोध है, उबाल है लेकिन तरीका बड़ा सलीके का है. आज के परिवेश में जब एक ऐसा वर्ग खड़ा हो गया है जो यह जानने और मानने से इंकार कर रहा है कि यह भी एक सच्चाई है उसी दौर के घटनाक्रम और पात्रों के जरिये लिखा गया यह उपन्यास महत्वपूर्ण है.
उपन्यास में गांधी, अंबेडकर की घटनाओं का जिक्र भी महत्वपूर्ण है, जो लेखिका की सोच, तार्किकता, परिपक्वता को दिखाता है. यह सब एक लंबी तैयारी से ही संभव है. यह राजनैतिक उपन्यास है जिसमें समाजशास्त्रीय विवेचन घटनाओं और पात्रों के जरिये हुआ है.
यहाँ केंद्र में जाति का मुद्दा तो है ही लेकिन उसके अलावा बहुत से मुद्दे हैं जो मुद्दों की तरह नहीं रोज़मर्रा के जीवन की तरह इसमें खुलते हैं. वह हिस्सा जब छोटी बहन अपने ही भाई के द्वारा यौन शोषित होती है और किसी से कुछ कह नहीं पा रही, फिर दोनों बहनों का संवाद, उनकी सदाशयता घटना की कचोट की परतों को बहुत आहिस्ता से खोलती है. जैसे कोई ज़ख्म साफ करता हो कि दवा भी लग जाय और दर्द भी न हो.
स्त्रियों के संसार की तमाम परतें उपन्यास में खुलती हैं. जहां बड़े सुभीते से लेखिका यह बताने में सफल हैं कि ये जो एक-दूसरे के आमने सामने खड़ी स्त्रियाँ हैं असल में ये सब सताई हुई हैं और जरा सा हाथ बढ़ाने की देर है सब साथ ही हैं. स्त्रियों के हक़ की पूरी लड़ाई है लेकिन कहीं कोई लाउडनेस नहीं है.
प्रकृति के साथ जुड़ाव कदम-कदम पर इतने रूपों मे दिखता है कि आप उस जुड़ाव से जुड़े बगैर नहीं रह सकते. गंगा, गंगा पर पड़ती सूरज की किरनें, रातरानी की उचकती डाल, उसकी ख़ुशबू, चिड़िया सब आपके साथ हो लेते हैं. गंगा का किनारा, शहर ऋषिकेश उपन्यास में किसी पात्र की तरह आता है. गंगा नदी को कैसे सखि के रूप में तब्दील कर लिया है लेखिका ने जिससे कुछ भी कहा सुना जा सकता है. इसमें एक वेदना भी है और सुख है. पूरे उपन्यास में पीड़ा और प्रतिकार एक साथ चलते हैं. प्रकृति इस यात्रा में पात्रों की उदासी पोंछने और ज़ख़्मों पर फाहे रखने, कभी-कभी सपने बुनने के लिए उपस्थित रहती है. कई हिस्सों को पढ़ते हुए सुमित्रानन्दन पंत की याद हो आई.
मुझे उपन्यास में आए हर छोटे बड़े पात्र की उपस्थिति ने जिस तरह सामाजिक ताने-बाने की परतों को खोला है उसने बहुत प्रभावित किया. कोचिंग चलाने वाले विक्रम त्रिपाठी हों या कोचिंग के बाहर छात्रों की बातचीत, वो माहौल. सीमा का अपने होने वाले पति से पहली बार मिलने का अनुभव, सीमा की शादी में आई औरतों का तृप्ति पर किया गया कटाक्ष, भाई का एक्सीडेंट, सीमा का मैरिटल रेप और अस्पताल की नर्स का यह कहना कि, 'घर का है करके छोड़ना मत' इंस्पेक्स्टर चौबे का गुस्सा, चाचा की दलित राजनीति में घुसने की कमजोर सी कोशिश, पापा की रोज की हालत, चपरासी विनोद के ताने और तृप्ति की चुप्पी, उसके फर्स्ट आने पर पिता का माफी मांगना और घर आकर कहना बेटा अब कभी फर्स्ट मत आना, तृप्ति और सीमा की माँ का रात दिन का बड़बड़ाना, सीमा की ससुराल में स्त्रियों का पहले अलग-थलग होना फिर एक होना, कनिका की माँ की पति द्वारा किए गए यौन शोषण की कहानी ये सब समाज की सच्चाई पर पड़े सुनहरी पर्दे को तार-तार करते हैं.
मैंने अरसे बाद कोई उपन्यास पूरा पढ़ा और इसका श्रेय उपन्यास को ही जाता है कि वह खुद को पूरा पढ़ा ले गया. इसे पढ़ते हुए लेखिका की पूरी तैयारी दिखती है. उनके पास समाजशास्त्रीय निगाह है, राजनैतिक समझ है और कोमल मन है. एक एक्टिविस्ट है जो समझाइश भी देता है. उपन्यास के शीर्षक बड़े ही सुंदर शेर के टुकड़े हैं जिनका उस हिस्से से जुड़ाव है. और अंत में वह पूरा शेर भी दिया गया है. यह काफी दिलचस्प है.
उपन्यास के अंतिम पेज पर प्रियदर्शन द्वारा लिखे गए ब्लर्ब की हर पंक्ति से सहमत होते हुए यही कहना चाहता हूँ कि यह एक महत्वपूर्ण उपन्यास है और इसे खूब पढ़ा जाना चाहिए, इस पर बात होनी चाहिए.
पुस्तक- कबिरा सोई पीर है (उपन्यास)
लेखक – प्रतिभा कटियार
प्रकाशक- लोकभारती प्रकाशन
लेखक परिचय : प्रेम कुमार साहित्य, समाज और संस्कृति से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय लेखन करते हैं. उनकी रुचि समकालीन हिंदी साहित्य, सामाजिक न्याय, अस्मिता विमर्श और वैचारिक बहसों में रही है. पुस्तक समीक्षा और आलोचनात्मक लेखन के माध्यम से वे साहित्यिक कृतियों को व्यापक सामाजिक संदर्भों में पढ़ने और समझने का प्रयास करते हैं.
https://ndtv.in/literature/kabira-soi-peer-hai-book-review-pratibha-katiyar-11632427
Friday, June 12, 2026
मैंने सपने में तुम्हें देखा था
Thursday, June 11, 2026
माँ बहन : हँसाएगी नहीं चुभेगी
उफ़्फ़...यह तुम्हारे हाथ का खाना, तुम्हारे हाथ की चाय....ज़िंदगी निगल रखी है इसने। वो रोटी बनाती है। बनाती जाती है, बनाती जाती है। उस घर की घड़ी में समय के पीछे से रोटी झाँकती है। कुछ दृश्यों को जान बूझकर नाटकीय बनाया गया है लेकिन वह नाटकीयता मारक है, चुभती है। हंसी नहीं आती, कुछ कचोटता है।
Wednesday, May 27, 2026
कौन जात हो भाई- बच्चा लाल उन्मेष
बच्चा लाल के पास कहन की जो बेबाकी है वह इन कविताओं की ताक़त है। वो दलित शोषण की बात को पूरी ताक़त से कहते हैं लेकिन इसमें कोई बेचारगी नहीं है। एक झुंझलाहट है, पीड़ा है जिसने अब गुस्से का, प्रतिकार का रूप ले लिया है।
कविताओं को पढ़ते हुए दोतरफा युद्ध नज़र आता है। एक दलितों के भीतर का संघर्ष। उन्हें यह समझना कि उनका पीड़ित होना नॉर्मल नहीं है, वे भी मनुष्य हैं और उन्हें भी जीवन जीने के समस्त अधिकार मिलने चाहिए। और दूसरा युद्ध है इसी बात को बाकी समाज को बताने का। इस बताने पर मिलने वाले उपहास, प्रताड़ना और अपमान के बावजूद अपने हक़ के लिए लड़ने का। इस लड़ाई में जो ज़ख्म मिलें, चाहे देह पर या मन पर उनसे टूटने की बजाय उसे अपनी ताक़त बनाने का काम बच्चा लाल ने अपनी कविताओं के ज़रिये किया है।
ये कवितायें पढ़ते वक़्त कुछ मांग करती हैं। मांग करती हैं कि आप जातिगत उच्चता की आलीशान पोशाक उतार कर इन्हें पढ़ें। इन्हें पढ़ते समय महसूस करें इसमें दर्ज शोषण की उस दास्तान को जो कविता कहानी में दर्ज होने भर से काफी ज्यादा गहरी है लम्बी है। और बात सिर्फ जातीय भेदभाव की भी नहीं है, बात है हर उस वजह की जो शोषण की बुनियाद बनती है।
इस समय में जब कुछ भी बोलना एक खास किस्म के राजनैतिक, सामाजिक खांचे में धकेल दिए जाने का जोखिम हो, इन कविताओं की सच्चाई, बेबाकी सहेजे जाने वाली वह आवाज है जिसमें से मद्ध्म सी उम्मीद झाँकती है।
कुछ टुकड़े जो मैंने अपनी किताब में अंडरलाइन किए-
रईसों ने बख़्श दी है जान, इतना काफी नहीं?
दे रहा आश्वासन है निज़ाम, इतना काफी नहीं?
('आश्वासन' से)
ईश्वर वह कर्जा है
जिसे गरीब आजीवन भरता है
सत्ता की तरह।
('सत्ता का ईश्वर' से)
तब भी नहीं थे और अब भी नहीं हो
तुम शूद्र थे, शूद्र हो और शूद्र ही रहोगे।
कुछ आएंगे तुम्हारे अपने, बुनियाद उठाने तुम्हें पढ़ाने
पर तुम हरक़त नहीं करोगे
क्योंकि तुम्हारा समाज
मंदिरों में जा-जाकर मूढ़ हो चुका है।
('क्योंकि तुम्हारी लत्त चलती है, बुद्धि नहीं' से )
तुम्हारे इंसान बनने की प्रक्रिया में जाति आड़े आ रही है
मर रही हैं संवेदनाएं और तमाम मानवीय संभावनाएं
इन्हें जगाने के लिए जाति का दंभ छोड़ना पड़ेगा
पर तुम नहीं छोड़ोगे दोस्त! दलित थोड़ी न हो।
('तुम क्यों झुकोगे दोस्त' से)
मनुष्य हो तो आगे आओ, जाति-धरम का भेद मिटाओ
संविधान में सबके लिए, बनी एक ही खाट है।
होगा तेरी लिए अफवाह, मेरा भोगा हुआ यथार्थ है।
('भोगा हुआ यथार्थ' से )
जिसने वहशी दरिंदों को एक बार भी नहीं टोका
वो मेरा भी खुदा हो, ये मुझे मंजूर नहीं।
('मुझे मंजूर नहीं' से)
हम अब भी अन्न उगाते हैं
वे अब भी अंग चबाते हैं
हैं गज़ब के भूखे लोग यहाँ
मेरा टूटा हल भी खाते हैं।
('हम तब भी अन्न उगाते हैं' से)
Wednesday, May 20, 2026
मैं मिलने जाऊँगी
पिछले बरस मेरे जन्मदिन पर चमोली में मित्र ने एक पौधा लगाया था। सुना है वह पौधा अब बड़ा हो गया है।
Tuesday, May 19, 2026
आवाज़ भी एक जगह है
आशुतोष, रविभूषण, ज़हूर आलम, दिगम्बर और राम जी राय (जी का सम्बोधन सबके साथ माना जाय) को सुनना सुखद था। कविता की लेयर्स को देखना, टटोलना, उसके भीतर और भीतर झांकना और कविता के मर्म तक पहुंचना सुखद था। जानना हमेशा ही कम होता है। हर बार लगता है, कितना तो कम जानते हैं हम। कल भी ऐसा ही सा दिन था।
इतने सारे कवियों ने इतना सुंदर सुवावस्थित कविता पाठ किया, आनंद हुआ। भरोसा हुआ कि हालात से बैचेन लोग कम भी नहीं हैं। प्रेम शंकर और मृत्युंजय ने क्या ही गज़ब का संचालन किया। यह उस संचालन की ही खूबी थी कि कार्यक्रम में इतने वक्ताओं के वक्तव्य और 20 कवियों के कविता पाठ से रचा बसा कार्यक्रम समय पर शुरू हुआ और समय पर खत्म हुआ।
न किसी कवि ने माइक पकड़कर पकड़े ही रहने की जिद की और ऐसा भी नहीं लगा कि बहुत हड़बड़ी हुई। तो यह संतुलन ख़ूबसूरत था। मदन चमोली शांति से सब संभाले भी रहे और लगने भी नहीं दिया कि कोई कुछ संभाल रहा है।
इब्बार रब्बी जी को पहली बार सुना, क्या ख़ूब हैं वो। क्या उत्साह, क्या बेबाक़ी और क्या ही कमाल का पाठ। नाम लेकर हर कवि के बारे में लिखूँगी तो कई किलोमीटर की पोस्ट हो जाएगी बस इतना ही कि हर कवि अपने होने में कमाल था। इतने सारे कवियों को एक साथ सुनना और एक मिनट के लिए भी कविता से ध्यान न हटना इस बात की तसदीक़ है।
श्रोताओं की संख्या भी सुख का एक कारण था। इतने सारे लोग समय पर आ गए और लगातार बने रहे, यह कम महत्वपूर्ण बात नहीं। प्रतिरोध के स्वर में इतने सारे साथियों का होना सुख तो है ही।
मंगलेश जी से जुड़े इतने स्नेहिल किस्से सुनने को मिले कि ऐसा लगा नहीं हैं वो हमारे बीच नहीं हैं। दैहिक रूप से वे हमारे साथ भले नहीं हैं लेकिन हम सबके भीतर वो हैं और रहेंगे। कार्यक्रम की शुरुआत में उनके कविता पाठ की रिकॉर्डिंग सुनना भी कम सुंदर अनुभव नहीं था।
तो कुल जमा बात इतनी है कि ये माना कि अंधेरा घना है, लेकिन इस अंधेरे को तोड़ने की कोशिश करने वाले भी कम नहीं हैं, और ये अंधेरा एक दिन टूटेगा ज़रूर।
मृत्युंजय पुराने साथी हैं, उनसे अरसे बाद मिलना बड़ा ही सुखद रहा। बाकी इस कार्यक्रम में जो गुना है वो धीरे-धीरे भीतर जगह बना रहा है। धीरे-धीरे उस पर भी लिखूँगी अगर वक़्त इज़ाजत देगा।
जिंदाबाद साथियों!
Sunday, May 17, 2026
जीवन में ऋषभ का होना
Friday, May 15, 2026
मर्मस्पर्शी उपन्यास है ‘कबिरा सोई पीर है’ : महेश पुनेठा

प्रतिभा कटियार, जिनकी मुख्य पहचान एक संवेदनशील कवयित्री के रूप में है, अपने पहले उपन्यास ‘कबिरा सोई पीर है’ के माध्यम से हिंदी साहित्य में एक सशक्त विमर्श प्रस्तुत करती हैं। यह उपन्यास जाति, लिंग, आरक्षण, सामाजिक कंडीशनिंग और मानवीय अंतर-संघर्षों की जटिलता को केंद्र में रखकर लिखा गया है। मात्र 168 पृष्ठों में लेखिका ने समाज के गहरे घावों को छुआ है, बिना किसी व्यक्ति-विशेष को दोषी ठहराए।
Thursday, April 16, 2026
अप्रैल उम्मीद है
Sunday, April 12, 2026
कहानियों के फूल हक़ीक़त की धरती पर खिल उठे थे
लगभग आधी ज़िंदगी जी चुकने के बाद सहमते हुए ख़्वाबों की ओर हाथ बढ़ाना शुरू किया। चारों तरह देखते हुए कि कोई ख़्वाब देखते हुए देख न ले। कोई देखेगा तो मज़ाक ही उड़ाएगा 'आईं बड़ी, इत्ते बड़े-बड़े ख़्वाब देखने।वालीं'।
फिर मैंने अपनी दुनिया समेट ली। लोगों से दूरी बना ली। शब्दों से, कुदरत से दोस्ती कर ली। अपनी छोटी-छोटी कहानियों में अपने तमाम सपने लिखने लगी। इन कहानियों में मैं थी, मेरा मन था। वो जंगल थे जिन्हें मैंने देखा नहीं, वो रास्ते जिनसे मैं गुजरना चाहती थी, मुक्कमल प्रेम की चाहना जो ख़्वाब में भी पूरा होने को तैयार नहीं। इन कहानियों समंदर, नदी, झरने, फूल, बादल, बारिश सब भरपूर थे। और थी इस धरती को प्यार से भर देने की इच्छा।
मैं अपनी कहानियों में सांस लेने लगी थी, मैंने देखा मैं खुश रहने लगी हूँ। इन कहानियों से एक ख़ुशबू आती है जो मुझे टूटने से बचा लेती है।
फिर ये कहानियाँ भी जज की जाने लगीं। इनका भी उपहास किया जाने लगा। और हम सब जानते हैं कि हमारा मनोबल हमारे सबसे करीबी लोग ही तोड़ते हैं। मेरी कहानियों के फूल मुरझाने लगे, मेरी कहानी की नदियां सूखने लगीं।
कहानियाँ लिखना बंद होने लगा। एक रोज मैंने ख़ुद को ख़ुद से बिछड़ते पाया। मैं सूखी नदी के सीने से धंस जाती और देर तक सुबकती रहती। अमावस की रात में चाँद ढूंढती फिरती। एक रोज मैंने अपने सूखे मन पर कुछ बूंदें महसूस कीं। मेरी ही कोई कहानी हक़ीक़त में मेरा हाथ थामकर मुझे लेकर चल पड़ी। मैं उसके पीछे-पीछे हैरत से, वो मेरा हाथ थामे मुसकुराते हुए।
मैं समझ गयी, मेरी कहानियाँ हक़ीक़त की ज़मीन पर उतर भी सकती हैं। वो समंदर का किनारा, वो प्रेमी के कांधे से टिककर घंटो जाते हुए सूरज को देखना, तारों की छाँव में बिना बोले बस चलते जाना और सोचना कि एक दिन यूध्ध खत्म हो जाएंगे सारे, धरती पर सिर्फ प्यार बचेगा।
'फिर?' मैं कहानी से पूछती।
आसमान में तारे उस रोज झमककर खिले थे। सप्तऋषि मण्डल को देखते हुए हम ध्रुव तारे को ढूंढने लगे ताकि ख़्वाबों पर यक़ीन करना चाहिए इस बात पर ध्रुव तारे की मुहर लगा दी जाय। ध्रुव तारा मुस्कुरा रहा था।
अगली सुबह मैं नया ख़्वाब लिख रही थी....कि एक रोज़ धरती पर कोई किसी से नफ़रत नहीं करेगा, ईर्ष्या नहीं करेगा, कोई प्रेम से नफरत नहीं करेगा...
उस रोज चाँद आसमान से जाने को तैयार नहीं था। वो कहानी में लिखे ख़्वाब को किसी आयत की तरह बुदबुदा रहा था। समंदर की लहरें करीब आकर बैठी थीं, एकदम शांत।
मैंने कहानी के अंत में लिखा...आमीन!
Friday, April 3, 2026
जीवन के पास क्या मरहम है?
इस सुबह में कल रात का कलरव भी दाखिल है। पूर्णमासी का चाँद मानो सुबह के करीब रखे चाय के कप को जरा सा सरकाकर बैठा ऊंघ रहा हो। मैं नन्हे अचंभे से चाय के कप को देख रही हूँ, जिसके दाहिनी तरफ सुबह की किरनें हैं और बायीं तरफ पूर्णमासी के चाँद की धज।
सुबह के वैभव को देखती हूँ तो खुशी गालों पर छलक़ने को आतुर होती है। ठीक उसी वक़्त कोई मध्धम सी सिसकी जो भीतर ही भीतर न जाने कबसे पल रही है आँखों के रास्ते बाहर आने का रास्ता ढूंढ लेती है। सिसकियाँ बेआवाज होती है, उन्हें भीड़ से डर लगता है। उन्हें आईने से भी डर लगता है। वे एकांत की फिराक में रहती हैं। वे फिराक में रहती हैं कि कब मैं भीड़ से तनिक हाथ छुड़ाऊँ और खुद के करीब आऊँ।
इस गहरी सिसकी में जमाने भर की औरतों की वेदना घुली है। इसमें मेरी बेबसी घुली है। जब्त है, आक्रोश है। मैं इससे आँखें नहीं चुरा सकती।
नन्हा सा सुख भी किसी कर्ज़ सा लगता है।
इस सुबह में प्यार है। साथ ही एक गुहार है। ईश्वर से प्रार्थना है, कि तुम हो, तो हो न यार। सारे पत्थर दिलों को मोम कर दो न। सारे हथियारों को फूलों में बदल दो न। सारे बस्तों में सपने भर दो, इस दुनिया को कुछ तो जीने लायक बना दो।
तो क्या मैं इतनी निराश हो चुकी हूँ कि किसी चमत्कार.का इंतज़ार करने लगी हूँ। मैं खबरें छुपाती फिरती हूँ, या खबरों से छुपती फिरती हूँ पता नहीं लेकिन जानती हूँ बच तो बिलकुल भी नहीं पाती।
अशोक के पेड़ों की कतारें जिस तरह प्रार्थनामय हैं मेरे हाथ अपने आप जुड़ गए हैं, ओ जीवन, जरा सा मरहम बन जा, जा जख्मी दिलों को गले से लगा ले। सामने ख़रगोश कुलांचे मार रहे हैं, सुबह पूरी तरह धरती पर बिखर चुकी है, लेकिन क्या अंधेरा पूरी तरह गायब हो चुका है।
Thursday, March 19, 2026
दिल से दस तक
दिल ने कविता की देहरी पर दस्तक दी थी और कार्यक्रम की शुरुआत हुई थी। आज वह दिल की दस्तक दस वर्ष का सफर तय कर चुकी है।
इस सुंदर कान्सेप्ट को किसने शुरू किया, कैसे आगे बढ़ा यह बात लगातार अर्थहीन होती गई और यही इसकी सफलता है। हर वो शख्श जो एक बार बैठक में शामिल हुआ इस आयोजन का उतना ही owner हुआ जितना शुरुआत करने वाले कभी थे। फिर यह सिलसिला बढ़ता गया, जिम्मेदारियाँ एक से दूसरे को ट्रांसफर होती रहीं। शहर-दर-शहर बैठकियां होने लगीं।
आज दसवीं सालगिरह की दहलीज़ पर खड़े हुए सिर्फ एक एहसास तारी है, कितना प्यार मिला, कितने प्यारे लोग मिले, कितना सुकून मिला। जीवन में भला और क्या चाहिए होता है।
कविता कारवां हर कविता प्रेमी का अपना कार्यक्रम है। दुनिया भर से लोग इसमें जुड़े हुए हैं। कोई कुछ चाहता नहीं है, सिर्फ देता है अपना समय, प्यार और साझेदारी। हम नहीं जानते यह दुनिया कैसे बेहतर हो सकती है, बस इतना जानते हैं कि हम जहां हैं, वहाँ से शुरुआत हो सकती है।
कविता कारवां पर नाज़ है। यहाँ कोई ईर्ष्या नहीं, द्वेष नहीं, कोई राजनीति नहीं, सिर्फ और सिर्फ प्यार है और है अपनी प्यारी कविताओं के जरिये एक ख़ूबसूरत दुनिया का सपना देखना।
तो आइये, शामिल होते हैं कविता कारवां की दसवीं सालगिरह के उत्सव में और तलाशते हैं अपनी भूमिका इस दुनिया को मानवीय और करुणा से भरा हुआ बनाने की।
हैपी बर्थडे कविता कारवाँ!
Wednesday, March 18, 2026
उसने कहा, मैं हूँ न!
लाल टिब्बा का वैभव अब ब्लोगर्स और फोटोग्राफर के हवाले हो चुका है। दुर्लभ प्राकृतिक दृश्यों से घिरी जगह की खूबसूरती को सम्पूर्ण मौन और समर्पण में ही महसूस किया जा सकता है। शुरुआती दिनों में कई बरस पहले जब आती थी तब इतनी भीड़ नहीं होती थी। ख़ासकर ऊपर जहां बड़ी सी दूरबीन से हिमालय की रेंज को देखने का सुख रखा था। हम अक्सर मौसम के खुलने का इंतज़ार करते थे हालांकि दूधिया ओढ़नी में लिपटे पहाड़ों और जंगलों के सौंदर्य में गुम होते हुए बर्फ से लदे पहाड़ों को न देख पाने का मलाल नहीं ही हुआ कभी।
अक्सर यहाँ चाय की प्यालियों में बादल का कोई टुकड़ा रखा देखा है। चलते हुए महसूस किया है कि पाँव ज़मीन पर नहीं बादलों पर पड़ रहे हैं। कल्पना में नहीं सच में। यही बात लैढ़ोर को खास बनाती है।
लेकिन, हम जिस सुख की तलाश में पहाड़ों पर जाते हैं उसी सुख को नष्ट करने की अभिलाषा भी साथ लिए जाते हैं। जिस डाल पर बैठे हैं उसे ही काटने में लगे लोग हैं हम। लालच इतना कि दुनिया कि हर अच्छे पर अपनी नेम प्लेट लगाने को व्याकुल। बाज़ार को दोष देना कई बार खुद को बचाना भी लगता है।
लाल टिब्बा का वैभव इस बार लोगों की भीड़ में, खुद को अच्छे अच्छे पोज में फोटो में कैद कर लेने की हड़बड़ी में और ढेर सारा खाना पीना करने में गुम होता दिखा। वो जगह जो मेडिटेटिव हुआ करती थी अब कैफे में बदल गयी है। खाना और फोटोग्राफी की होड़ मिलकर जैसे शांत पानी में कंकड़ी मार रहे थे।
जगह की कमी थी और लोग इंतज़ार की लाइन में थे। सूरज अपने पूरे वैभव के साथ डूब रहा था और लोग अपनी कॉफी, अपने खाने का ऑर्डर करने में बिज़ी थे।
वहाँ जमा तमाम लोगों में मुझे एक भी ऐसा नहीं दिखा जो प्र्कृति इस अनमोल लम्हे के सजदे में हो, जो इस सुख को आत्मसात करते हुए छलक पड़ा हो, जिसने अपने भीतर कुछ पिघलते हुए महसूस किया हो।
जिस जगह बैठकर कभी सुख से छलक पड़ा करती थी आज उस जगह के खो जाने का दुख तारी होने लगा था। एक बार फिर यह बात पुख्ता हुई कि टिकट कटाकर निकल पड़ने से आप यात्रा का सुख ले पाएंगे यह बात अधूरी है। यात्रा की तैयारी पहले भीतर करनी होती है। वरना सोशल मीडिया तो अपडेट हो जाएगा लेकिन जीवन अपडेट नहीं हो पाएगा।
मन की इस उथल-पुथल और बेचैनी को कौन सुनता वहाँ सिवाय मौसम के। सो ठंडी हवा के झोंके ने कंधे सहलाते हुए कहा, 'परेशान न हो मैं हूँ न।' मैंने चलना शुरू कर दिया...ठंड ने गाल सहलाये तो साथ लाई हुई शाल मुस्कुरा उठी।
जारी...
Tuesday, March 17, 2026
उसने मेरा हाथ थाम लिया था
सूरज ढलते ढलते उदास शाम का सिरा थमा गया था। दिन के जाने और रात के आने के बीच का यह छोटा सा वक्फ़ा अपने भीतर न जाने कितनी उथल पुथल समेटे होता है। किसी के जाने और आने के बीच का वो हिस्सा जिसमें न जाने कितने संशय सांस ले रहे होते हैं। विगत की हथेलियाँ छूट नहीं रही होतीं और आगत की आहट का कोई पता नहीं होता।
देवदार के घने जंगलों के बीच रोशनी और अंधेरे के रंग खेल खेल रहे थे। यह आँख मिचौली का खेल नहीं था, यह खेल था सांस के आने और जाने के बीच जरा सा सुस्ता लेने का। लैंढ़ोर न जाने कितनी बार आई हूँ लेकिन आने और आने में फर्क होता है। इस बार का आने खुद से ख़ुद को रिहा करने के लिए जरूरी था। मैं उन रास्तों पर चलते हुए जीवन की उन पगडंडियों की स्मृतियों को भी पार कर रही थी जिन पर चलकर मेरा वजूद बना है।
जंगल की ख़ुशबू को थाम लेने को व्याकुल हथेलियाँ ख़ुद पर हंस रही थीं। ख़ुशबू को भला कोई थाम सकता है? क्या उसकी कोई तस्वीर ली जा सकती है? नहीं, ख़ुशबू को सिर्फ जिया जा सकता है। एक जगह बैठकर मैं देवदार और आसमान की गुफ्तगू को होते हुए देख रही थी। मेरे पीछे जीवन और मृत्यु का मंत्र बुदबुदा रही थीं कब्रें। उन कब्रों में सोये हुए लोग सुकून में तो होंगे शायद।
जब सब कुछ इतना फ़ानी है तो झगड़ा किस बात का है आखिर। झगड़े का संसार हमारा बनाया हुआ है। झगड़ा कितना बेवजह यह बताने को कुदरत हमेशा तैयार रहती है। टट्टू पर बैठा खिल खिल करता बच्चा, उसके साथ चलता पिता, फोटो का ठीक ठीक एंगल ढूंढती माँ की खुशी, जीवन पर भरोसा है। वह भरोसा जिसे दुनिया भर के समझदार लोग लगातार तोड़ने पर लगे हैं।
चलते-चलते पूरी धरती नाप लेना चाहती हूँ। इन दिनों पाँव थकते नहीं हैं। असल में जितना चलती हूँ मन को उतनी रिहाई मिलती है। चलना रास्तों से रिश्ता बनाना है, ख़ुद के करीब लाता है। चलते हुए चुप रहना किसी ध्यान में होने जैसा होता है। यह हाल ही में जाना है। अपने हाल में जाने हुए को मुट्ठियों में कैद कर लेना चाहती हूँ। फिर ख़ुद की बेवकूफी पर हंस देती हूँ। जो कुछ भी दुनिया में अच्छा है उस पर कब्जेदारी की हमारी फितरत।
यह मेरा जाना हुआ है, यह व्यक्ति मेरा है, यह जगह मेरी है, यह घर मेरा है...सारा झगड़ा मैं का है। ख़यालों के गहरे समंदर में डूबे हुए मैं अपने भीतर धँसती जा रही थी। भीतर धँसते जाने का अर्थ है अपने भीतर छुपा कर रखी उस क़ीमती शय जिसका नाम उदासी है को छू लेना।
मेरी आँखें बह निकली थीं और इस बात की खबर गालों के अलावा किसी को नहीं थी। लैंढ़ोर की हवा मरहम सी बन चुकी थी। भीतर का अंधेरा खाली हो रहा था और बाहर उगा रहा ताजा अंधेरा रोशनी बनकर भीतर प्रवेश कर रहा था।
युवा खिलखिलाहटों का सैलाब उधर से गुजरा तो लगा ढेर सारे फूल खिले हों। उनकी हंसी से एक फूल चुराकर मैंने अपने बालों में टाँक लिया था...
लैढ़ोर ने हाथ थाम लिया था।
(जारी...)






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