Friday, July 3, 2026

I love Shilong


ये शिलांग की सुबह है। इस सुबह में बीते दिन की पूरी धमक है, बीती शाम की सरगोशियां हैं, चमक है। सुबह की सैर पर निकली तो चलती ही गई, मानो शिलांग को अपने कदमों से भी जीना चाहती हूँ। किसी भी शहर की सुबह में उसकी रात की कहानी का पता होता है। बस उस पते का पता पूछने वाले कम ही होते हैं। अपने चलते हुए कदमों और दृश्यों में छुपी शहर की बतकही से मुख़ातिब थी। वही चाय का उठता धुआँ, कुछ घूमने निकले जोड़े, कुछ परिवार, कुछ ब्लॉगर कैमरे की क्लिक्स का महासागर।

कुछ लोग I love Shilong के सामने फोटो खिंचा रहे थे। एक प्रेमी जोड़े की तस्वीर उसके इसरार पर मैंने भी खींची। तभी चिप्स के पैकेट को वहीं फेंककर आगे बढ़ गए अंकल जी अपनी बीवी को डांटते हुए उधर से जाने लगे। ये अभी I Love Shilong के साथ फोटो खिंचवा रहे थे। मैंने अपना माथा पीट लिया। गुस्से से उन्हें घूरना चाहा लेकिन वो अपनी बीवी को किसी बात पर डांटने में व्यस्त थे। पास खड़ी की सोलह सत्रह साल की लड़की ने मेरे चेहरे के भाव पढ़ लिए थे शायद। वो मुझे देखकर मुस्कुराई और उसने खुद जाकर वह पैकेट उठा लिया।

कुछ दूरी आज के दिन के अख़बार के ढेर और कुछ अख़बार खरीदते और खबरों की दुनिया पर गुफ्तगू करते लोग दिखे। अख़बार पर बात करने वालों में ज़्यादातर स्थानीय लोग ही थे और इनमें महिलाएं एक भी नहीं थीं। महिलाएं कब और कहाँ कहाँ नहीं होतीं हैं, इसकी वजह पर नहीं जाऊँगी क्योंकि अगर गई तो बात जरा लंबी ही जाएगी। खैर, अख़बारों के पहले पेज पर जंतर मंतर की और अभिजीत दीपिके की तस्वीरें थीं।

शहर का कुछ पता नहीं था, किसी से पूछना भी नहीं था, गूगल से भी नहीं, तो जिधर भीड़ कम लगे और हरियाली ज्यादा दिखे उधर चल पड़ी। कुछ चर्च, कुछ लाइब्रेरी रास्ते में पड़ते गए। सड़कों की सफाई बराबर हो रही थी। सफाई कर्मचारी रात के निशान सड़कों से मिटा रहे थे। उन्हें अगले दिन के लिए तैयार कर रहे थे। तभी सड़क पर एक पिता और पुत्र पर नज़र पड़ी। पिता सड़क पर झाड़ू लगा रहा था, कूड़ा उठा रहा था और उसका छोटा सा बच्चा शायद डेढ़ या दो साल का होगा, कूड़ा उठाने के लिए थर्माकोल के डिब्बे में प्लास्टिक की खाली बोतल को फंसाकर बनाए गए कूड़ा इकट्ठा करने वाले डब्बे को खेल गाड़ी बनाकर खेलता दिखा। वह बहुत खुश था। खेलगाड़ी को खींचता, उसे गोल गोल घुमाता, उसमें कोई कूड़ा उठाकर रख देता फिर भागने लगता। उस बच्चे की मुस्कुराहट में यह सुबह डूब चुकी है।

फिलहाल मेरी हथेलियों में ख़ुशी का यह सिक्का है। इसे मैं कभी खर्च नहीं करूंगी। दुआ करूंगी कि दुनिया के सारे बच्चे यूं ही खुश हों, लेकिन कूड़ा बीनते हुए नहीं, स्कूल जाते हुए, पढ़ते हुए, खेलते हुए और इस लगभग बर्बाद हो चुकी दुनिया को थोड़ा बेहतर बनाते हुए।

सुबह की सैर में शहर का जो चेहरा दिखा वो रात के चेहरे से फर्क था कई मायनों में। रात में जिस मौज मस्ती की रवानगी थी सुबह में एक पुरसुकून ठहराव था। मैं इन सबहों की तलाश में ही तो निकली हूँ, इस पुरसुकून ठहराव की तलाश में। अपने चेहरे को आसमान की ओर करके लंबी गहरी सांस लेते हुए शहर को जज़्ब करने की कोशिश की। बारिश न जाने कहाँ थी कहाँ नहीं लेकिन ठीक उस वक़्त मेरे गालों पर एक बूंद टप्प से टपकी। कुदरत के ये करिश्मे मुझे बिखेर देते हैं। मैं उस लम्हे में वहीं बिखर गयी थी। वापस लौटते समय याद आया चाय तो पी ही नहीं, हालांकि कई जगह चाय बनती देखी थी शायद इच्छा नहीं रही थी। कमरे पर आकर कुछ देर पड़ी रही।
भीतर एक उत्साह था, आज हम चेरापूंजी जाने वाले हैं जिसे सोहरा भी कहा जाता है। एक गाना याद आया और एक लंबी शरारत भरी मुस्कुराहट चेहरे पर तैर गई, 'आज उनसे पहली मुलाक़ात होगी, फिर आमने सामने बात होगी...'

इसी गमक के साथ हम चेरापूंजी के लिए रवाना हुए। मौसम सुहाना था और सफर का इससे अच्छा सामना क्या होगा कि आपके साथ अच्छा मौसम चल पड़े और और अच्छा और अच्छा होता जाय। हम बादलों की गोद में समाने को बेताब थे....
(जारी...)

Tuesday, June 30, 2026

दिल कह रहा है, तुझसे ये रिश्ता जोड़ लूँ...


रिश्ता तो जुड़ चुका था। हम शिलॉन्ग पहुंच चुके थे। एक दिन में जैसे न जाने कितने दिन जी लिए थे हमने। कोई दिन ऐसे होते हैं कि जी करता है ख़त्म ही न हों। हम ऐसे दिनों को आस से देखते हैं बिना कुछ कहे, और कभी-कभी वो हमारी आँखों की सुन लेते हैं। यह ऐसा सा ही दिन था। और अभी तक ख़त्म नहीं हुआ था। कमरे पर पहुंचे तो चाय की जबर्दस्त तलब लगी, और जब चाय होगी तो पकौड़े तो लाज़िमी हुए। कुछ देर आरामदेह बिस्तर में धँसे हुए ज़िंदगी किसी रील सी घूमने लगी। 

रत्ती भर जीने के लिए कितना ज्यादा मरना पड़ता है। अपनी ही ख़्वाहिशों को पहचानने में एक उम्र गुज़र जाती है। कहाँ जानती कि मुझे धूप के सिक्कों से मोहब्बत है, कहाँ जानती थी मुझे बारिशों का स्वाद बेपनाह पसंद है कि मैं भीगना ही नहीं चाहती बारिशें पी जाना चाहती हूँ, कई बार लगता है बारिश हो जाना चाहती हूँ। कहाँ जानती थी कि खुद को महसूस करने के लिए खुद के साथ कुछ दूरी तय करना कितना ज़रूरी है। पिछले कुछ बरसों की छुटपुट यात्राओं के दौरान पाया कि जिस अंजान सी तलाश में भटक रही थी वो तो ये है। कुदरत से शदीद मोहब्बत। इंसानी मोहब्बत आपका दिल दुखा सकती है लेकिन कुदरत आपको कभी अकेला नहीं छोड़ती। हमेशा साथ चलती है कभी धूप बनकर कभी छाया बनकर। 

स्मृतियों के दरीचे खुले हुए थे जबकि वर्तमान अपनी सोंधी ख़ुशबू लिए सामने खड़ा था। चाय, पकौड़े सामने थे और हम आराम की मुद्रा में बिस्तर से निकले बगैर वहीं खाने की इच्छा से जूझते हुए। आखिर बिटिया ने वहीं बिस्तर पर चाय दी और पकौड़े भी। एक जरा सी ख़्वाहिश कोई बिना कहे समझ ले और पूरी कर दे तो कैसा तो पानी हो जाता है मन। ज़िंदगी भर कितने पकौड़े तले होंगे, कितनी चाय बनाई होगी कोई हिसाब नहीं लेकिन यूं इस सुकून से इस तरह इनका होना कमाल है। सोचो तो, मर्दों के लिए जो सुख रोज का है, जिस पर उनका ध्यान भी नहीं जाता वो हम औरतों को कितनी मेहनत से कमाना पड़ता है। 

पकौड़े अच्छे थे साथ ही लाल चाय भी। खाने के बाद कुछ देर और बिस्तर में दुबक गई तो आलस के एक झोंके ने पीठ सहला दी। सच्ची बड़ा आराम आया। घड़ी ने आठ बजाए तो हम माँ बेटी ने एक दूसरे को देखा और कुछ देर का टाइम खुद के लिए और ले लिया।  कुछ देर बाद उठे तो शरीर और मन दोनों ताजादम हो चुके थे। हम दिन का आखिरी हिस्सा जी भर के जीने के लिए तैयार थे। अब तक यह सर्च की जा चुकी थी कि कहाँ पर कौन सा खाना बेस्ट मिलता है। वैसे,खाना हमारे लिए प्रियोरिटी नहीं था, हमें तो शिलॉग की रात देखनी थी। 

दुकानें धीरे-धीरे बंद हो रही थीं और शहर जाग रहा था। चौक के पास लोग बस टहल रहे थे, घूम रहे थे, बैठे थे खड़े थे। कोई कुछ कर नहीं रहा था, बस वो वहाँ थे। न किसी को कहीं जाना था, न कुछ खरीदना था, न कुछ खाना था। मैंने महसूस किया कि लोग आपस में भी ज्यादा बात नहीं कर रहे हैं। बस वो एक-दूसरे का हाथ थामे साथ हैं। जैसे अपनेपन की कोई ख़ुशबू बिखरी हुई थी। 

हमने भी उस महकती शाम के हवाले खुद कर दिया। इधर से उधर भटकते हुए हमारे कानों में सुरीले गाने भी पड़ रहे थे। अक्सर आसपास संगीत रहता ही है लेकिन जाने क्यों यात्राओं का सुर ऐसा लगता है कि कोई गीत कोई गाना सुनने का खयाल तक नहीं आता। तो यह सुबह से कानों में पड़ा पहल गीत था। इस महकती चहकती सी शाम में यह अच्छा लग रहा था। समझ नहीं आ रहा था कि यह आवाज आ कहाँ से रही है। फिर अचानक नज़र पड़ी, कोई जिनके पास से कई बार गुज़र गए ये तो वही सज्जन गा रहे थे। चूंकि स्पीकर दूर कहीं थे तो शायद इसलिए ध्यान नहीं गया। दूसरे लोग उन्हें घेर के खड़े हों ऐसा भी नहीं था। वो अपनी धुन में बस गा रहे थे। असल में वो अपने संगीत को जी रहे थे। वो दृष्टि बाधित थे लेकिन उनके पास एक नज़र थी खुशी को पहचानने की, सलीका था उसे सेलिब्रेट करने का। कुछ लोग उनके सामने रखे बॉक्स में पैसे भी डाल रहे थे। लेकिन वो सिर्फ गा रहे थे...कुणाल गांजावाला की आवाज़ जिसे शायद भूल ही चुकी थी, उस रात से फिर से साथ हो ली है। पहले से ज्यादा अपनाइयत के साथ। अब उस आवाज़ में और न जाने क्या क्या शामिल हो चुका है...दिल कह रहा है, तुझसे ये रिश्ता जोड़ लूँ, तेरी धड़कनों को छू लूँ... जानती हूँ अब जब भी यह गाना सुनूंगी शिलॉन्ग की वह रात जाग उठेगी। 

घूमते फिरते वहाँ ढेर सारी पान वाली दुकानें दिखीं। हमारे यहाँ जैसी होती हैं वैसी नहीं, थोड़ी अलग। छोटे से स्टूल पर पारंपरिक वेश में बैठी महिलाएं और सामने छोटी सी मेज पर करीने से सजे हुए पान। एक नॉर्थ ईस्ट की कलीग की याद आ गई वो खूब पान खाती थी, वो ताम्बूल बोलती थी। मुझे भी पान खाने का चाव तो  है। खासकर नए शहरों में, क्योंकि हर शहर का मिजाज वहाँ के पान में भी होता है। यहाँ के पान या ताम्बूल का मिजाज अलग था। उस वक़्त तो मैंने पैक कराया था डिनर के बाद जब उसे खोला तो पाया यह तो एकदम अलग है। पान के पत्ते पर लगा हुआ थोड़ा सा चूना और बस। साथ में सुपारी के टुकड़े और कच्चे नारियल की कतरन। सुपारी तो खाई न गई नारियल की कतरन के साथ जरूर खाया थोड़ा सा और बाकी संभाल लिया। जानती थी यह थोड़ा-थोड़ा ही खाया जाएगा। यह लखनऊ या बनारस वाले पान से एकदम अलग था। 

किसी रात का तिलिस्म ऐसा होता है कि न हम चाहते हैं वह बीते न वह बीतती है। देर रात तक इधर से उधर घूमते हुए भूल ही गए थे कि हमें डिनर भी करना है। याद आया तो एक बेहतरीन रेस्तरां में खुद को पाया। एक अच्छा सा दिन, प्यारी सी शाम अच्छे से डिनर के साथ ही पूरा होना डिज़र्व करता है। 

हम उस प्यारे से दिन को पलकों में मूंदकर यह सोचते हुए सो गए कि अगला दिन चेरापूंजी का दिन होगा। मेरा बचपन का अनदेखा ख्वाब जो कल हक़ीक़त बनने वाला था। 

नींद सचमुच अच्छी सी आई थी...

(जारी...)

Wednesday, June 24, 2026

तेरे लिए मौसम मंगाया है...


1998 में रिलीज हुई फिल्म 'सत्या' के एक गाने की यह लाइन कि 'मैंने तेरे लिए मौसम मंगाया है, तेरे लिए रस्ता बिछाया है...' इतनी ज्यादा अच्छी लगती थी कि ऐसा लगता काश कोई यह कहे मुझसे भी। रूमानियत वाले ऐसे ख़्वाबों की जिंदगी ने कायदे से बैंड बजाई और यह समझाया कि अपनी ख़्वाहिशों को किसी के भरोसे मत छोड़ो, खुद पकड़ो उनकी बागडोर और निकल पड़ो बस...

प्रकृति के क़रीब जाकर हमेशा यह महसूस हुआ है कि मेरे मन का वह प्रेमी और कोई नहीं यह क़ुदरत ही है। जब जितना और जैसा मौसम चाहा, भरपूर मिला। धीरे-धीरे ज़िंदगी के रास्ते भी बिछने लगे, वो रास्ते जो मेरे मन की दुनिया में जाते हैं। लेकिन उन रास्तों पर चलने से पहले या उनके मिलने से पहले हमें उन रास्तों की कितनी तलाश है यह जानना भी ज़रूरी है। पानी का पता प्यास से बेहतर कौन जानता है। और जैसा कि पहले भी कह चुकी हूँ, ज़िंदगी के लिए अपनी भूख प्यास को समझते, बूझते हुए जिंदगी ही गुज़र जाती है।

मेघालय मानो गुनगुना रहा था, 'मैंने तेरे लिए मौसम मंगाया है...' और मैं उसकी गुनगुन को सुनकर मुस्कुरा रही थी। बरसती बूंदें हथेलियों से सरकते हुए आत्मा तक पहुँच रही थीं।

रास्ता लंबा था। हमें तो भूख महसूस नहीं हुई लेकिन अब्दुल भाई की भूख ने गाड़ी रोकी। बारिश हल्की हुई। बिना छतरियों के थोड़ी सी वॉक करने के बाद खाने पहुंचे। हालांकि सच में कुछ भी खाने का मन नहीं था। मैंने छाछ और बेटू ने पेपर डोसा मंगाया और हम दोनों चुप होकर बैठ गए। हम दोनों माँ बेटी का सुर एकदम ठीक लग चुका था। यात्रा के दौरान चुप्पी का सुर। शब्द अक्सर सौंदर्य को खंडित करते हैं यह मेरा अनुभव रहा है। हम दोनों की चुप्पी का यह सुर पूरी यात्रा में लगा रहा। हमने बेहद मामूली बातें कीं और ज्यादा महसूस किया। एक दूसरे को भी और मौसम को भी।

कई बार चुपचाप खिड़की के बाहर देखते हुए हमने एक-दूसरे की हथेलियाँ थामीं, कहा कुछ भी नहीं। भाषा की चुनौती आने वाली थी क्योंकि यहाँ की भाषा से हम अनजान थे और हमारी भाषा से यहाँ के लोग। लेकिन पर्यटकों के कारण अब भाषा और भोजन काफी हद तक कॉमन होने लगा है। अङ्ग्रेज़ी और हिन्दी को तोड़-मरोड़ कर काम किया जा सकता है यह सुना था। और सच ही सुना था। 

खाने के बाद बिल देने के वक़्त हम माँ बेटी के भीतर का बचपन जाग उठा। मैंने ऑरेंज कैंडी जिसे बचपन में कंपट कहते थे लेने को हाथ बढ़ाया तो बेटू ने मैजिक पफ की तरफ। कुछ चॉकलेट और चिक्की के छोटे पाउच भी हमने लिए। खाने से ज्यादा इन चीजों को हथेलियों में भरने का सुख था। बचपन में इन्हीं ऑरेंज कैंडी, माफ कीजिये कंपट के लिए भी तो तरसे ही हुए थे हम। जिस भी उम्र में मिले छूटा हुआ जीवन उसे गले से लगा लेना चाहिए। 

एक कंपट मुंह में रखा और स्कूल के बाहर ठेले पर कंपट बेचने वाले भैया की धुंधली तस्वीर कौंध गई, और कौंध गयी 25 पैसे का सिक्का तलाशते हाथ और न मिलने पर मायूस होती आंखें। इसी स्मृति के साथ वो दिल के आकार वाले काँच के ज़ार में रखे केक और क्रीम रोल भी याद आ गए जिन्हें खरीद पाना ख़्वाब ही रहा बस ललचाई नज़र से देखते ही रहे। हंसी आती है यह सोचकर कि अब जब भी क्रीम रोल मिलता है चाव से खाती हूँ, असल में उसे खाते हुए बचपन का छूटा हुआ हिस्सा जीती हूँ। 

अभी बचपन की इन बचपने से भरपूर स्मृतियों के साथ खिलवाड़ चल ही रहा था कि सामने एक विशाल सा हरा समंदर दिखा। हम शिलोंग पहुँच चुके थे। यह शिलोंग का पोलो ग्राउंड था। इतना हरा कि बस आँखें ठहर जाएँ। 
लेकिन इतनी बारिश में कैसे घूमेंगे यहाँ के सवाल के साथ बिटिया ने मेरी तरफ देखा। मैंने हँसते हुए कहा, 'अरे मौसम अपनी बात मानता है, अभी बारिश रुकवाते हैं। ओ सुनो जरा, थोड़ी देर को रुकना तो बरसने से...' ड्रामेबाजी से भरे अंदाज में कहकर मैं खूब हंस पड़ी। बिटिया भी हंस पड़ी। लेकिन कुछ ही देर में सचमुच बारिश रुक गई। और ऐसा पहली बार नहीं हो रहा था जब मौसम मेरे मन के मुताबिक अपने रंग बदल रहा था। अब तो दोस्तों में यह बात मशहूर ही है बल्कि दोस्तों ने ही मशहूर की है कि ये अपने मौसम साथ लिए चलती हैं....बेटू ने भी चिहुँककर कहा, 'आपके मौसम ने आपकी बात मान ली'। हम दोनों खुश-खुश उस हरे समंदर के भीतर डूबने के लिए निकल गए। 

नीले गुलमोहर जिसका बोटिनिकल नाम जेरकेंडा है की छटा देखते ही बन रही थी। अभी बरस कर थमी बूंदों को पत्तियों ने अपनी हथेलियों पर सहेजा हुआ था। घास के मुहाने पर अटकी बूंदें जैसे किसी जौहरी ने अपनी कला का नायाब नमूना बनाते हुए घास के सिरों को हीरे सी बूंदों से जड़ दिया हो। और हीरे की कनी से सजी बूंदों को न कोई गुमान न घास को। हवा का एक झोंका आता और घास इतराते हुए उन हीरे सी बूंदों को ऐसे झटक देती मानो निर्विकार ही हो किसी भी सज्जा से। और यही उस सज्जा का सबसे सुंदर पहलू था। 

हम माँ बेटी तितलियाँ हो गयी थीं। उस हरे समंदर में उड़ती फिर रही थीं। हम मछलियां हो गई थीं, डुबकियाँ लगातीं और गहरे उतर जाने को बेताब। बरसने के बाद का खुला मौसम पूरे ग्राउंड में खिल खिला रहा था। और सबसे सुंदर बात यह थी कि यहाँ लोग कम थे। जो थे वो बेहद इत्मीनान से या तो बैठे हुए थे, या घूम रहे थे। ऐसे सौंदर्य पर खामोशी की संगत हो तो कमाल होता है। इतनी शांति कि अपनी साँसों की आवाज़ सुनाई दे, ऐसी चमक कि अपनी आत्मा का हर हिस्सा चमक उठे। 

ज़िंदगी ने मेरा हाथ थामा और पूछा, 'तुम्हें मुझसे बड़ी शिकायतें थीं न?' मैंने उसके कांधे पर सर रखते हुए कहा, 'तुमसे ही तो प्यार भी है न?' 
हम दोनों मुस्कुरा दिये....मेरी हथेलियों में घास से टूटकर गिरी ओस की बूंदें थीं। हाँ, हथेलियों से जबसे लकीरें झरकर गिर गईं, या मैंने गिरा दीं तबसे हथेलियाँ सूरज की किरणों से, ओस की बूंदों से, फूलों की ख़ुशबू से लबरेज रहती हैं। मैंने अपनी हथेलियों को अपनी दोनों पलकों पर रखा, और पूरे चेहरे को हथेलियों में रख दिया। जैसा दुआ पढ़ने के बाद पलकों पर रखते हैं हथेलियाँ। 

होंठ बुदबुदा रहे थे, शांति हो, प्यार हो, ख़्वाब  हों और ख़्वाबों की ताबीर हो... 

(जारी...)

Sunday, June 21, 2026

स्वाद एक कारा है


                                                        तस्वीर इन्टरनेट से साभार

 यह इतवार की सुबह है। जाने कहाँ से इतना सारा तनाव आ गया है। लंबे समय से एक चिड़चिड़ाहट तारी है जिसे फुल इगनोर करने पर लगी हूँ। यह चिड़चिड़ाहट रसोई से है, घर के कामों से है। 


बचपन से रोज सुबह आँख खुलते ही किचन में काम करते हुए माँ को ही देखा था। मैं ठीक से जग भी नहीं पाती थी कि आधा खाना बन चुका होता था। चूंकि मेरी माँ भी वर्किंग रही हैं, उनकी घड़ी और उनकी गति के बीच समायोजन के बीच ही मेरे बचपन की शुरुआत हुई। जब वो डेली पैसेंजर थीं और सुबह की ट्रेन से दफ्तर जाती थीं तो सुबह 6 बजे सारे घर का काम निपटाकर, खाना बनाकर, गमलों में पानी डालकर रेडी होकर स्टेशन को निकल जाती थीं। 

फिर लखनऊ में उन्हें उसी शहर में जाना होता था तब यह राहत सुबह के 6 बजे से खिसक कर 8.30 बजे पर आ गई। लेकिन तब तक काम भी काफी बढ़ चुका था। और इन दिनों कोई हाउस हेल्प नहीं हुआ करती थी। तो जैसे जैसे मैं बड़ी हुई खुद को माँ कि हेल्प के लिए हाथ बँटाना शुरू किया। धीरे-धीरे माँ के हाथ के काम अपने हाथ में लेते गई। कॉलेज, पढ़ाई, घर के काम...यह सब सामान्य है। 

घर के काम कभी बोझ नहीं लगे, खाना बनाने में मजा आता था। नई चीज़ें बनाना खिलाना और तारीफ़ें बटोरना। माँ को देखकर हुआ या जीवन की गति ही ऐसी मिली कि काम करने की गति काफी तेज़ रही। फटाफट खाना बनाना, फटाफट पोछा लगा लेना। सब कुछ फटाफट। बाद मुद्दत समझ आया कि मैं तो एक ट्रैप में हूँ।  

सलाद और होता तो मजा आ जाता है, पकौड़े बन जाएँ तो मजा आ जाय। तुम पालक पनीर बहुत अच्छा बनाती हो, और पाव भाजी, और... चाय तो तुम्हारे ही हाथ की पिएंगे जैसे जुमलों वाला ट्रैप। और अपनी खुशी से एक पैर पर नाचते हुए लोगों के स्वाद पर खुद को निछावर करने की खुशी महसूस करने वाला ट्रैप। 

कोई साथ की लड़की जब यह कहे कि उसे खाना बनाना नहीं आता, या बनाने में ऊब लगती है तो उसे जज करने या उसे नसीहत देने वाला ट्रैप, असल में उस बात को न समझ पाने वाला ट्रैप। 

बाद मुद्दत यह समझ आया कि यह जो रसोई है, यह स्त्रियों की नियति नहीं है, बना दी गई है। स्वाद एक जेल है, स्त्रियों की जेल। जिस जेल में तारीफ़ों की सलाखें सख्त हैं, जो अपनी ही जेल में बाखुशी कैद रखने की तैयारी है। तारीफ़ें न भी हों तो भी। 

मुझे याद नहीं पिता ने कब माँ से कहा कि, 'तुम ये चीज़ बहुत अच्छी बनाती हो' माँ की शिकायत यही रही कि कभी जो तारीफ कर दी हो। तारीफ समझने का एक तरीका माँ को यह मिला कि अगर ठीक से खा लिया या सब खत्म कर दिया बिना यह सोचे कि बाकियों के लिए कुछ बचा भी है नहीं, तो खुश हो जाओ कि अच्छा बना है, अगर छोड़ दिया थाली में तो समझो मन का नहीं बना। 

परेशानी खाना न बनाना पड़े की भी हो सकती थी समझ ही नहीं पाये, परेशानी यह हुई कि कम से कम तारीफ तो कर दिया करो। 

पहली बार जब कुक लगने की बात हुई तो घर में घोर संग्राम हुआ। हालांकि कुक लगने की बात माँ ने की भी नहीं, क्योंकि एक समय में वो भी इसके खिलाफ थीं, जाने कैसा बनाएगी, स्वाद नहीं होगा उसके हाथ में आदि आदि। पिता ने हड़ताल कर दी उसके हाथ का नहीं खाएँगे। फिर जैसे तैसे कुक लगी, तो रोज शिकायत कि उसके हाथ में स्वाद नहीं है। 

यानि जिस स्वाद पर जीवन भर चुप्पी रही, वह अब समझ आया कि, था। 

ऐसी लड़ाई शादी के बाद मैंने भी झेली, पति और सास का अबोला सहा और आखिर उन्हें कुक के लिए नहीं मना पाई। 

कुल कहानी यह है कि स्वाद एक जेल है। स्त्रियों की जेल। और स्त्रियों को ही इसे तोड़ना होगा। लेकिन तोड़ नहीं पा रही हैं। सुबह आँख खुलते ही जब खुद के लिए ही सही किचन में खुद को देखती हूँ तो सोचती हूँ यह कारा कितनी मजबूत है। 

मैं अपनी सुबह चाय और पंछियों की आवाज़ के साथ चाहती हूँ लेकिन ऐसा कम ही हो पाता है....क्यों कम हो पाता है, यह सवाल खुद से पूछती हूँ...

जो पुरुष मैं तो बना लेता हूँ, की हुंकार भरते हैं और महीने में एक दिन या हफ्ते में एक दिन अपनी मर्जी से अपने मूड के मुताबिक कभी कुकिंग कर देते हैं यह उनके लिए नहीं है। मैं उनकी कुकिंग को गिनती ही नहीं। और जो महिलाएं यह कहकर खुश हैं, कि मेरे ये तो कभी कभी चाय बना देते हैं, या मुझे अच्छा लगता है उनके लिए बनाना तो उनसे यही कहना है कि बहन, अभी तुम जेल में आनंद ले रही हो, अच्छा हो तुम्हारा भ्रम न टूटे। 

आग लगे ऐसे स्वाद को जिसने एक स्त्री को जीवन भर की रसोई की कैद में डाल रखा है।  

Saturday, June 20, 2026

कॉकटेल-2 : मिसोजिनी से भरपूर घटिया मसाला



अकसर जो चीज़ें अच्छी नहीं लगतीं उनके बारे में बात नहीं करती। देखने में टाइम वेस्ट करने के बाद उसके बारे में बात करके और टाइम क्यों वेस्ट करूँ आखिर। लेकिन हमारी फिल्मची दोस्त ज्योति नन्दा ने कहा, कुछ तो लिखो तो लिख रही हूँ।

ज्योति की ही पिछली पोस्ट से बात शुरू करती हूँ। नीयत। जिसे समझ और अप्रोच भी कह सकती हूँ। फिल्म बनाने के पीछे की नीयत क्या है, और देखने वाले की नीयत क्या है। यहीं से सारी बात शुरू होती है। किसे क्या और कैसा लगता है।

कॉकटेल 2, से ज्यादा उम्मीद तो थी नहीं क्योंकि लव रंजन का अप्रोच पहले ही काफी निराश करता रहा है। कॉकटेल वन में भी उसका खासा असर था। यहाँ भी अप्रोच वही है। लव रंजन को लड़कियों से कोई खास दिक्कत लगती है। उन्हें लड़कियों को डीमीन करने के तमाम रचनात्मक तरीके आते हैं। और उनके हीरो बेचारे, पाक दामन, संस्कारी टाइप होते हैं। कोई दिक्कत नहीं कि आपका हीरो कैसा है लेकिन हीरो को आपके जैसा आदर्श हीरो होने के लिए लड़कियों को क्यों डीमीन करना है भाई।

फिल्म खूब सजा धजा, रंगा पुता कचरा है। दो लड़कियां हैं, एक लड़के पर मरती हैं। बिलो द बेल्ट तरीके आज़माती हैं लड़के को परखने को। फिर आपस में बिल्लियों की तरह लड़ती हैं। और लड़का अंत में चमचमाता हुआ संस्कारी बालक शादी शादी खेलने लगता है। वही लड़का जो शादी में विश्वास नहीं करता है।
अंत में मंगलसूत्र जिंदाबाद, आज़ाद लड़कियों का कैरेक्टर एसेसनेशन, उन्हें ओब्जेक्टीफाई करना। प्यार और रिश्तों पर लंबे लंबे दार्शनिक लेक्चर जिनका कोई अर्थ नहीं।

महंगे सेट, दमकते शूट, गाने, सब मिलकर भी कुछ नहीं कर पाते। कृति सेनन कमाल लगी हैं लेकिन उनका रोल थोड़ा डिग्निटी से लिखा जाना था।

इतना ही टाइम इस पर खर्च कर सकती हूँ। टाटा।

(नोट- फिल्म एक्स्पर्ट नहीं हूँ। यह समीक्षा भी नहीं है। बस मेरी भड़ास है।)

Tuesday, June 16, 2026

पहली मुलाक़ात का तिलिस्म

गुवाहाटी एयरपोर्ट की सबसे खूबसूरत बात यह लगी कि न कोई ज्यादा भीड़ न आपाधापी। संभवतः हमारी फ्लाइट सुबह की थी इसलिए भी ऐसा हो। एक सुकून, एक ख़ामोशी और तसल्ली सी दिखी। हर एयरपोर्ट की अपनी कुछ अलग सी पहचान होती ही है। और अगर हम पहली बार उस एयरपोर्ट पर होते हैं तो तस्वीरों का मोह भी होना लाज़िम है। एयरपोर्ट पर जो सज्जा थी उसमें असम ज्यादा था या मेघालय यह नहीं पता लेकिन उसमें एक बारीकी और तरतीब थी। 

गुवाहाटी एयरपोर्ट से हमें शिलॉन्ग जाना था। एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही गर्मी से सामना हुआ। ये अपेक्षित तो बिलकुल भी नहीं था। देश की राजनैतिक गर्मी का असर यहाँ के मौसम पर भी पड़ रहा है शायद सोचते हुए हम माँ बेटी कैब के भीतर दुबक गए। सफर की थकान और तेज़ चिलकती धूप का असर था शायद बिटिया तुरंत सो गई और कुछ देर में मैं भी। 

छोटी सी झपकी के बाद आँख खुली तो मौसम बदलने लगा था। 'वेलकम टू मेघालय' का बोर्ड बारिश की फुहारों के बीच ही दिखा। यह हमारा मेघालय में स्वागत था। बरसता भीगता मौसम। ऐसी चिहुँक उठी मन में। मन बावरा हो उठा। फाइनली मैं मेघालय में हूँ। 

उमियम झील : मेघालय आने की योजना में मेरे मन में कोई योजना नहीं थी। मुझे सिर्फ बादल और बारिशों से मिलना था और उनके हाथों में हाथ डालकर घूमते फिरना था। फिर भी योजनाओं की बाढ़ चारों तरफ थी। ये देखना वो देखना। रील्स से लेकर चैट जीपीटी तक सक्रिय थे। साथ ही सक्रिय थे वो लोग जो आकर गए थे। इस सक्रियता से यह हुआ कि मुझे कुछ जगहों के नाम पता चल गए। वहाँ जाऊँगी या नहीं यह पक्का तय नहीं था। लेकिन उमियम झील रास्ते में ही पड़ती थी और पानी वाली सारी जगहों के लिए तो हमेशा हाँ ही होती है। 


हमारे ड्राइवर अब्दुल भाई ने उमियम के सामने से सर्रर्र से गुजरते हुए बताया कि ये है वो झील। मैंने सोचा क्या ऐसे देखते हैं झील। मुझे लोनावला का ब्रिज याद आया हम बस गुजरे उधर से, ठहरकर निगाह भर देखा भी नहीं। वो हुड़क अभी तक फंसी हुई है। 

मैंने अब्दुल भाई से कहा, जरा रुकिए कुछ देर। वो बोले बारिश है मैडम कहाँ जाएंगी। मैंने आप फिकर न करिए, आप बस रुकिए। वो थोड़ा आगे जाकर रुक गए। बिटिया के बैग से दो छतरियाँ निकलीं। हमने छतरियाँ और पैरासीटामॉल सबसे पहले रखे थे। हम जानते थे छतरियाँ ज्यादा देर टिकेंगी नहीं और उसके बाद पैरासीटामाल ही काम आएगी। खैर, अभी तो छतरी ही काम आई। हम दोनों बरसते मौसम में आधे भीगते आधे झूठ-मूठ में खुद को बचाते उमियम के किनारे टहलने लगे। झील पर बारिश होते देख 'समंदर पर बारिश' की याद हो आई। एक ही बारिश के कितने रूप हैं, पहाड़ू पर अलग, जंगल पर अलग, झीलों पर अलग, समंदर पर अलग और सड़कों पर एकदम अलग। मुझे फूलों पर गिरती बारिश की याद भी ताजा हो आई। 



उमियम का विस्तार खूब बड़ा है। ऐसा लग रहा था वो हल्की रिमझिम की चादर ओढ़े कच्ची सी नींद में है। किनारे कुछ लोग छतरियाँ लगाए शायद मछ्ली पकड़ने की फिराक में थे। पल पर से गाडियाँ गुजर रही थीं लेकिन कोई शोर नहीं था। झील के ठीक सामने पहाड़ियों पर बादलों की धमाचौकड़ी मची हुई थी। बावरा मन सब कुछ को पी लेने को आतुर था। सारा सौन्दर्य, सारी छुअन, सारे बादल, सारे पानी। और शायद हम पी भी रहे थे। इसीलिए तो भीतर का सारा कचरा झाड़कर आए थे कि भीतर हर कोने में मौसम की जगह हो। 


हम लगभग पूरी झील का चक्कर काटने की फिराक में थे। उन्हीं रास्तों पर फिर फिर लौटना, फिर फिर दृश्यों को आँखों में समेट लेना जारी था। पूरे रास्ते में उँगलियों की पोरों पर, हथेलियों में बारिश समेटने को बेताब रही। ऐसा लग रहा था हर बूंद मेरी सूखी रूह पर मरहम है। 

बारिशें मुझे हमेशा से बेहिसाब चाहिए थीं...बस उस बेहिसाब होने में बेमौसम की बरसात और किसी का घर तबाह करने वाली बरसात हरगिज़ नहीं थी। 

फ़िलवक्त बूंदों ने लाड़ लड़ाते हुए कहा, मेघालय आई हो, सुखी होकर ही जाओगी। और सुख मेरी देह पर रेंगने लगा था। 

(जारी...)

Sunday, June 14, 2026

दर्द, प्रतिकार और अस्मिता का दस्तावेज है ‘कबिरा सोई पीर है'

स्त्री प्रतिरोध और समाज की परतों को खोलता उपन्यास:  प्रतिभा कटियार द्वारा लिखे उपन्यास 'कबिरा सोई पीर है' में हर कदम पर कवि उपस्थित है. इस कवि ने उपन्यास के हर हिस्से को बहुत सुंदर बना दिया है. लेखिका पत्रकार, कवि और कथाकार हैं. उनकी इस त्रयी ने उपन्यास को पठनीयता और गहनता दोनों लिहाज से समृद्ध किया है.

- प्रेम कुमार


जाति, स्त्री अस्मिता, प्रतिरोध और समाज की परतों को संवेदनशील तरीके से सामने लाता है है ये उपन्यास.  (Image NDTV)

‘कबिरा सोई पीर है' उपन्यास को खोलते ही आप आप किताब का समर्पण पाठक को अपने पास रोकता है. यह समर्पण “जो अपनी राख से हर बार जन्म लेती रही और लगातार संघर्ष में है ऐसी अस्मिताओं के नाम” यूं ही किसी के जेहन में नहीं आ सकता. इसके लिए एक सुलझी हुई सामाजिक राजनैतिक समझ, परिपक्वता और पक्षधरता की जरूरत होती है. इस समर्पण से उपन्यास और लेखिका का पक्ष स्पष्ट होता है.

जातिभेद की जकड़नें, सामाजिक रूढ़ियाँ, स्त्री अस्मिता की छटपटाहट इस उपन्यास के केंद्र में है. स्त्रियों के मन के भीतर छुपे दर्द, पीड़ा, कसक, दबे हुए सालते हुए दुख, जीवन जीने के ढंग, प्रतिरोध से जुड़े अनुभव बहुत मजबूती से उपन्यास में आए हैं.
मेरी आदत है कि कोई किताब पढ़ते हुए जो हिस्से मुझे अच्छे लगते हैं मैं उन्हें रेखांकित करता जाता हूँ. इस उपन्यास के साथ भी ऐसा ही किया. लेकिन उपन्यास के अंत तक आते-आते मैं हैरान रह गया यह देखकर कि लगभग आधा उपन्यास ही रेखांकित हो चुका है. उपन्यास में इतने सुगठित वाक्य हैं, हिस्से हैं कि पाठक वहाँ लौट कर आता है, ठहरता है और सोचने पर मजबूर होता है.
 

प्रेम कुमार, इस पुस्तक के समीक्षक 

सवर्ण और दलित परिवारों का परिवेश, बुनावट, स्थितियां, मानसिकता, मनोविज्ञान, द्वंद्व विविध पात्रों और घटनाओं के माध्यम से खुलते हैं. इतने सारे पात्रों, घटनाओं और उनके भीतर की गहन यात्रा को एक उपन्यास में साधना आसान नहीं होता. लेकिन लेखिका ने पूरे कौशल के साथ यह किया है. उनका प्रस्तुति का अंदाज और सलीका प्रभावित करता है.

उपन्यास में हर कदम पर कवि उपस्थित है. इस कवि ने उपन्यास के हर हिस्से को बहुत सुंदर बना दिया है. लेखिका पत्रकार, कवि और कथाकार हैं. उनकी इस त्रयी ने उपन्यास को पठनीयता और गहनता दोनों लिहाज से समृद्ध किया है.
 
अनुभव, सीमा, माँ, पिता, तृप्ति, सुधांशु, कनिका, इंस्पेक्टर चौबे, नर्स सारे किरदार अलग-अलग तरह से अनूठे हैं. हर पात्र अपनी यात्रा और परिवेश के साथ उपस्थित है और इसको पात्रों की भाषा, शब्दावली के जरिये लेखिका ने रखा है. देशज शब्दों का प्रयोग, मुहावरों का प्रयोग अच्छा लगता है. कुछ ऐसे शब्द जो कहीं खो से गए थे उनका प्रयोग लेखिका की रेंज को दिखाता है कि उनकी भाषा पर, समाज पर कितनी बारीक पकड़ है, अवलोकन कितना सूक्ष्म है. वाक्यों में जो उपमाएँ हैं, विशेषण हैं, बिम्ब हैं सबमें एक सच है, सम्प्रेषण है. ये यूं ही सुंदर बनाने के लिए नहीं हैं, इनके बड़े अर्थ हैं.

दलित पृष्ठभूमि पर पहले भी काफी लिखा गया है. लेकिन इस उपन्यास में एक अलग सा अंदाज है, चुभन है, व्यंग्य है, क्रोध है, उबाल है लेकिन तरीका बड़ा सलीके का है. आज के परिवेश में जब एक ऐसा वर्ग खड़ा हो गया है जो यह जानने और मानने से इंकार कर रहा है कि यह भी एक सच्चाई है उसी दौर के घटनाक्रम और पात्रों के जरिये लिखा गया यह उपन्यास महत्वपूर्ण है.

उपन्यास में गांधी, अंबेडकर की घटनाओं का जिक्र भी महत्वपूर्ण है, जो लेखिका की सोच, तार्किकता, परिपक्वता को दिखाता है. यह सब एक लंबी तैयारी से ही संभव है. यह राजनैतिक उपन्यास है जिसमें समाजशास्त्रीय विवेचन घटनाओं और पात्रों के जरिये हुआ है.

यहाँ केंद्र में जाति का मुद्दा तो है ही लेकिन उसके अलावा बहुत से मुद्दे हैं जो मुद्दों की तरह नहीं रोज़मर्रा के जीवन की तरह इसमें खुलते हैं. वह हिस्सा जब छोटी बहन अपने ही भाई के द्वारा यौन शोषित होती है और किसी से कुछ कह नहीं पा रही, फिर दोनों बहनों का संवाद, उनकी सदाशयता घटना की कचोट की परतों को बहुत आहिस्ता से खोलती है. जैसे कोई ज़ख्म साफ करता हो कि दवा भी लग जाय और दर्द भी न हो.

स्त्रियों के संसार की तमाम परतें उपन्यास में खुलती हैं. जहां बड़े सुभीते से लेखिका यह बताने में सफल हैं कि ये जो एक-दूसरे के आमने सामने खड़ी स्त्रियाँ हैं असल में ये सब सताई हुई हैं और जरा सा हाथ बढ़ाने की देर है सब साथ ही हैं. स्त्रियों के हक़ की पूरी लड़ाई है लेकिन कहीं कोई लाउडनेस नहीं है.

प्रकृति के साथ जुड़ाव कदम-कदम पर इतने रूपों मे दिखता है कि आप उस जुड़ाव से जुड़े बगैर नहीं रह सकते. गंगा, गंगा पर पड़ती सूरज की किरनें, रातरानी की उचकती डाल, उसकी ख़ुशबू, चिड़िया सब आपके साथ हो लेते हैं. गंगा का किनारा, शहर ऋषिकेश उपन्यास में किसी पात्र की तरह आता है. गंगा नदी को कैसे सखि के रूप में तब्दील कर लिया है लेखिका ने जिससे कुछ भी कहा सुना जा सकता है. इसमें एक वेदना भी है और सुख है. पूरे उपन्यास में पीड़ा और प्रतिकार एक साथ चलते हैं. प्रकृति इस यात्रा में पात्रों की उदासी पोंछने और ज़ख़्मों पर फाहे रखने, कभी-कभी सपने बुनने के लिए उपस्थित रहती है. कई हिस्सों को पढ़ते हुए सुमित्रानन्दन पंत की याद हो आई.

मुझे उपन्यास में आए हर छोटे बड़े पात्र की उपस्थिति ने जिस तरह सामाजिक ताने-बाने की परतों को खोला है उसने बहुत प्रभावित किया. कोचिंग चलाने वाले विक्रम त्रिपाठी हों या कोचिंग के बाहर छात्रों की बातचीत, वो माहौल. सीमा का अपने होने वाले पति से पहली बार मिलने का अनुभव, सीमा की शादी में आई औरतों का तृप्ति पर किया गया कटाक्ष, भाई का एक्सीडेंट, सीमा का मैरिटल रेप और अस्पताल की नर्स का यह कहना कि, 'घर का है करके छोड़ना मत' इंस्पेक्स्टर चौबे का गुस्सा, चाचा की दलित राजनीति में घुसने की कमजोर सी कोशिश, पापा की रोज की हालत, चपरासी विनोद के ताने और तृप्ति की चुप्पी, उसके फर्स्ट आने पर पिता का माफी मांगना और घर आकर कहना बेटा अब कभी फर्स्ट मत आना, तृप्ति और सीमा की माँ का रात दिन का बड़बड़ाना, सीमा की ससुराल में स्त्रियों का पहले अलग-थलग होना फिर एक होना, कनिका की माँ की पति द्वारा किए गए यौन शोषण की कहानी ये सब समाज की सच्चाई पर पड़े सुनहरी पर्दे को तार-तार करते हैं.


उपन्यास में एक हिस्सा कश्मीर का भी है। ऐसा लगा वो हिस्सा जैसे लाया गया है, वो न होता तो भी उपन्यास अच्छा ही चल रहा था लेकिन उस हिस्से के अंत में एक बच्चे के कोमल स्पर्श को जिस तरह लाया गया है इस हिस्से का आना अखरता नहीं बल्कि मानीखेज़ हो जाता है. एक बात यह है कि अंत में लगा कि उपन्यास को खत्म करने की जल्दी सी थी लेखिका को. प्रूफ की कुछ गलतियां भी अखरती हैं.

मैंने अरसे बाद कोई उपन्यास पूरा पढ़ा और इसका श्रेय उपन्यास को ही जाता है कि वह खुद को पूरा पढ़ा ले गया. इसे पढ़ते हुए लेखिका की पूरी तैयारी दिखती है. उनके पास समाजशास्त्रीय निगाह है, राजनैतिक समझ है और कोमल मन है. एक एक्टिविस्ट है जो समझाइश भी देता है. उपन्यास के शीर्षक बड़े ही सुंदर शेर के टुकड़े हैं जिनका उस हिस्से से जुड़ाव है. और अंत में वह पूरा शेर भी दिया गया है. यह काफी दिलचस्प है.

उपन्यास के अंतिम पेज पर प्रियदर्शन द्वारा लिखे गए ब्लर्ब की हर पंक्ति से सहमत होते हुए यही कहना चाहता हूँ कि यह एक महत्वपूर्ण उपन्यास है और इसे खूब पढ़ा जाना चाहिए, इस पर बात होनी चाहिए.

पुस्तक- कबिरा सोई पीर है (उपन्यास)
लेखक – प्रतिभा कटियार
प्रकाशक- लोकभारती प्रकाशन

लेखक परिचय : प्रेम कुमार साहित्य, समाज और संस्कृति से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय लेखन करते हैं. उनकी रुचि समकालीन हिंदी साहित्य, सामाजिक न्याय, अस्मिता विमर्श और वैचारिक बहसों में रही है. पुस्तक समीक्षा और आलोचनात्मक लेखन के माध्यम से वे साहित्यिक कृतियों को व्यापक सामाजिक संदर्भों में पढ़ने और समझने का प्रयास करते हैं.

https://ndtv.in/literature/kabira-soi-peer-hai-book-review-pratibha-katiyar-11632427

Friday, June 12, 2026

मैंने सपने में तुम्हें देखा था


मेघालय....मेघों का घर। कब बादलों से प्यार हुआ, कब बारिशों के लिए दीवानगी पैदा हुआ कुछ याद नहीं। याद है तो बस इतना ही ज़िंदगी शुरू ही काफी देर से हुई। आधी ज़िंदगी जी चुकने के बाद ज़िंदगी का एक सिरा हाथ आया और तब खुद से दोस्ती होनी शुरू हुई। अपना अच्छा बुरा दिखना शुरू हुआ। 

बचपन कोई कमाल का नहीं था, लेकिन शायद था भी। कि बचपन के खेल, सखा सहेलियों के नाम पर किताबें ही याद हैं। ओ हेनरी, चेखव, प्रेमचंद शुरुआती लेखक थे जिनसे दोस्ती हुई फिर ये लिस्ट बढ़ती गई। कुछ लेखकों के प्रति दीवानगी बढ़ती गई। इन सबके बीच कॉलेज के किस्से, ज़िंदगी के वो हिस्से जहां उम्र की अठखेलियाँ सांस लेती हैं वो सब गायब रहीं। 

पिछले एक दशक से ज़िंदगी का सिरा थामा और पाया कि ज़िंदगी तो किताबों के बाहर भी बहुत सुंदर है। लेकिन यह सुंदरता लोगों के करीब जाने पर टूटती है और प्र्कृति के क़रीब जाने पर निखरती है।  


देहरादून के मौसम ने मुझे बताया कि मेरे भीतर दीवानगी किन चीजों के लिए है, मेरी तलाश क्या है आख़िर। इस तलाश में मौसम क़रीब आता गया और लोग कम होते गए। अब जो सुख था आँखें डबडबाने के लिए काफी थे। घंटों चुपचाप आसमान देखते हुए महसूस हुआ यह ख़ामोशी मेरी तलाश थी, मुझे पता ही नहीं था। याद आया बचपन में मेहमान घर आने पर कैसी घबराहट होती थी। किसी शादी या दूसरे फङ्क्शन में जाने के नाम पर क्यों आँसू ही आ जाते थे। घर के काम करने, घंटों खाना बनाने ने मुझे लोगों से बात करने से थोड़ा तो बचाया था। 

जगजीत सिंह की गज़लें सुनते हुए पूरे घर का पोछा लगाना फेवरेट काम हुआ करता था। वह शायद मेरे बनने के दिन थे, जो ठीक से बन न सके। वरना भला मुझे कैसे पता न चला कि मुझे मौसम चाहिए, ढेर सारे मौसम। ठंड का कोहरा, बारिशों की बौछारें और तपती गरमियाँ। खुद को पहली बार तलाशा अपनी ही कहानियों में। प्रेम और प्रकृति की उन कहानियों में मुझे जिस कदर सुख मिलता था बताना मुश्किल है। हालांकि उन कहानियों का उपहास भी कम नहीं उड़ाया गया। लेकिन मैं कैसे बताती वो कहानियाँ मेरा जीवन हैं। न लगें किसी को अच्छी न सही, मैं जीना तो नहीं छोड़ सकती न। 

ऐसे ही उलझते बिखरते दिनों में मैंने एक रोज ट्रैवल ब्लॉग देखते हुए मेघालय का ब्लॉग देखा, कनिष्क गुप्ता का। मैं जैसे सुध बुध बिसराने लगी थी। जब भी मन उदास होता मैं उस ब्लॉग को खोल लेती और देखने लगती। देखते देखते ही याद आया कि मेघालय और चेरापूंजी के बारे में जनरल नॉलेज के सवाल के लिए पढ़ाते हुए माँ ने कितनी डांट लगाई थी। सही जवाब न देना डांट खाने कभी कभी मार खाने के लिए भी पर्याप्त वजह होती थी उन दिनों। 


इम्तिहान में शायद मैंने एक नंबर का जवाब गलत किया हो लेकिन ज़िंदगी में चेरापूंजी ठहर चुका था। जैसे अनजाने प्रेमी से प्यार होता है वैसा ही कुछ मेरा रिश्ता चेरापूंजी से बनने लगा। मुझे सपने में बादल आते, मैं उन्हें पकड़ने को हाथ बढ़ाती और दीवार पर टंगी घड़ी 'ऑफिस जाने का टाइम हो गया है 'कहकर आँखें दिखाती। 

क़रीब 5 बरस मैंने मेघालय जाने के सपने को अपनी पलकों में सहेजा है। और आख़िर 2026 का जून महीना उस ख़्वाब की ताबीर लेकर आया। यह यात्रा कई लिहाज से अलहदा थी। यह हम माँ बेटी की पहली यात्रा थी साथ में। इसके पहले हम दोनों लंदन गए थे लेकिन तब सिर्फ जाना और आना ही अकेले था। इस यात्रा की पूरी ज़िम्मेदारी बिटिया रानी ने उठाई थी। मैं एकदम बेफिक्र थी। 

और यह कोई छोटा सुख नहीं था।
(जारी....)

Thursday, June 11, 2026

माँ बहन : हँसाएगी नहीं चुभेगी


फ़िल्म का पहला दृश्य देखकर ही मुझे सिहरन हुई, जब एक लड़की फ़िल्म की जया आईवीएफ के लिए डॉक्टर से बात कर रही है। पति को भी बिना बताए वो पति के ही वीर्य से गर्भ धारण करना चाहती है। ठीक उसी वक़्त उसके ससुर का फोन आता है, चाय पीने के लिए बहू का इंतज़ार करते ससुर उसे कहते हैं वो किसी और के हाथ की चाय नहीं पीते।

उफ़्फ़...यह तुम्हारे हाथ का खाना, तुम्हारे हाथ की चाय....ज़िंदगी निगल रखी है इसने। वो रोटी बनाती है। बनाती जाती है, बनाती जाती है। उस घर की घड़ी में समय के पीछे से रोटी झाँकती है। कुछ दृश्यों को जान बूझकर नाटकीय बनाया गया है लेकिन वह नाटकीयता मारक है, चुभती है। हंसी नहीं आती, कुछ कचोटता है। 

दूसरा दृश्य, माधुरी दीक्षित यानि रेखा के पाँव के नीचे एक कागज आता है जिस पर लिखा है, 'क्या आप अकेले हैं?' यह अकेलेपन को मसालेदार नज़रिये से देखने और भरने वाला विज्ञापन है, जिसे वह रौंदकर आगे बढ़ जाती है। फ़िल्म की कहानी का मर्म क्या होने वाला है,  यहीं से समझ आने लगा था। 

फ़िल्म एक डार्क ह्यूमर है जो हँसाएगा कम परेशान ज़्यादा करेगा। अन्यथा यह आपको इरिटेट करेगा। यह बात सही है कि कथानक के घनत्व को फ़िल्म का ट्रीटमेंट ठीक से डिफ़ाइन करने में कई जगह चूकता है फिर भी मुझे लगता है उस चूक के बावजूद काफी कुछ कह जाता है। 

फ़िल्म के तीन मुख्य पात्र, जया सुषमा और रेखा हैं, बाद में इसमें हेमा भी जुड़ती है। सबके जीवन की व्यथा, अकेलापन, कुंठा, संघर्ष उनके हंसी ठिठोली वाले किरदारों में समाहित है। रेखा का गुनाह है उसके कपड़े, उसका बिंदास होना और सबसे ऊपर उसका स्त्री होना, जिसका आगे चलकर सिंगल हो जाना। 

समाज के तमाम संस्कारी और चरित्रवान पुरुषों का लड़खड़ाना और फिर बनाना कई नई कहानियाँ जिसमें मसाला ही मसाला है। 

स्त्री अगर अकेली है, कमजोर है तो उसे समाज रोता हुआ, असहाय और दीन हीन ही देखना चाहता है। ऐसी स्त्री जिसे तमाम कंधों की ज़रूरत हो। ताकि तमाम बेरोजगार कंधों को रोजगार मिले। लेकिन जैसे ही स्त्री कमजोर होने के बजाय लड़ना और रोने बिसूरने के बजाय खुश रहना चुनती है वह किरकिरी हो जाती है, जिसे डायन से लेकर न जाने कितने नाम दिये जाते हैं। ज़ाहिर है उसका चरित्रहीन होना तो सबसे पहले है ही। 

इन्हीं कुछ मुद्दों की तरफ ले जाती है फ़िल्म। बेटियों की मेकिंग में भी माँ की जर्नी का कसैलापन शामिल है ही। 
वह तमाम कोशिश करती है सम्मान से अपनी बेटियों को पालने के लेकिन हर बार संस्कारी और चरित्रवान समाज उसे मजा चखाता है। 

घर, दुकान तोड़े जा रहे हैं और एक अकेली माँ अपनी दो छोटी बेटियों के साथ साँप सीढ़ी खेलते हुए बच्चों का ध्यान हटाने की कोशिश करती है। यह एक मेटाफर है जो काफी असर करता है। 

फ़िल्म के अंत में गुप्ता जी की पत्नी सब कुछ जानने के बाद पति को लेकर चुपचाप चली जाती है, यह खटक सकता है लेकिन मुझे खटकता नहीं, सच लगता है, यही हक़ीक़त है। स्त्रियों के पास न तो ज़्यादा च्वाइस है, न हिम्मत। बस उनकी गृहस्थी बनी रहे, बच्चों की ठीक से शादी हो जाये, सब ढंका मुंदा रहे। 

फ़िल्म तमाम पहलुओं को सामने लाती है, हालांकि यह बात सही है कि फ़िल्म और बेहतर हो सकती थी। लेकिन यह संभावना तो हमेशा रहती ही है। मास्टरपीस नहीं है फ़िल्म लेकिन देखी चाहिए और ठीक से देखी जानी चाहिए। 

फ़िल्म का गाना 'खोल पिंजरा' फ़िल्म का एसेंस है। 

Wednesday, May 27, 2026

कौन जात हो भाई- बच्चा लाल उन्मेष


एक लम्बी गहरी चुप, सदियों से दबी हुई सिसकी, शोषण की लम्बी और लगभग सामान्य मान ली गई परिपाटी को तोड़ने की कोशिश में लहूलुहान होती कवितायें हैं बच्चा लाल उन्मेष के संग्रह 'कौन जात हो भाई' में। ये कवितायें आपके सुख चैन में सुराख करेंगी, बेचैन करेंगी। जिस जीवन को हमने सामान्य मान कर स्वीकार कर लिया है उस स्वीकार्यता को खंडित करेंगी। ये कवितायें शोषण की लम्बी दास्तान का वह दस्तावेज़ है, जिसे झुठलाने में पूरा समाज और सरकार न जाने कबसे लगी है।

बच्चा लाल के पास कहन की जो बेबाकी है वह इन कविताओं की ताक़त है। वो दलित शोषण की बात को पूरी ताक़त से कहते हैं लेकिन इसमें कोई बेचारगी नहीं है। एक झुंझलाहट है, पीड़ा है जिसने अब गुस्से का, प्रतिकार का रूप ले लिया है।

कविताओं को पढ़ते हुए दोतरफा युद्ध नज़र आता है। एक दलितों के भीतर का संघर्ष। उन्हें यह समझना कि उनका पीड़ित होना नॉर्मल नहीं है, वे भी मनुष्य हैं और उन्हें भी जीवन जीने के समस्त अधिकार मिलने चाहिए। और दूसरा युद्ध है इसी बात को बाकी समाज को बताने का। इस बताने पर मिलने वाले उपहास, प्रताड़ना और अपमान के बावजूद अपने हक़ के लिए लड़ने का। इस लड़ाई में जो ज़ख्म मिलें, चाहे देह पर या मन पर उनसे टूटने की बजाय उसे अपनी ताक़त बनाने का काम बच्चा लाल ने अपनी कविताओं के ज़रिये किया है।

ये कवितायें पढ़ते वक़्त कुछ मांग करती हैं। मांग करती हैं कि आप जातिगत उच्चता की आलीशान पोशाक उतार कर इन्हें पढ़ें। इन्हें पढ़ते समय महसूस करें इसमें दर्ज शोषण की उस दास्तान को जो कविता कहानी में दर्ज होने भर से काफी ज्यादा गहरी है लम्बी है। और बात सिर्फ जातीय भेदभाव की भी नहीं है, बात है हर उस वजह की जो शोषण की बुनियाद बनती है।

इस समय में जब कुछ भी बोलना एक खास किस्म के राजनैतिक, सामाजिक खांचे में धकेल दिए जाने का जोखिम हो, इन कविताओं की सच्चाई, बेबाकी सहेजे जाने वाली वह आवाज है जिसमें से मद्ध्म सी उम्मीद झाँकती है।

कुछ टुकड़े जो मैंने अपनी किताब में अंडरलाइन किए-

रईसों ने बख़्श दी है जान, इतना काफी नहीं?
दे रहा आश्वासन है निज़ाम, इतना काफी नहीं?
('आश्वासन' से)

ईश्वर वह कर्जा है
जिसे गरीब आजीवन भरता है
सत्ता की तरह।
('सत्ता का ईश्वर' से)

तुम पूज्य नहीं हो हमारे ग्रन्थों में
तब भी नहीं थे और अब भी नहीं हो
तुम शूद्र थे, शूद्र हो और शूद्र ही रहोगे।
कुछ आएंगे तुम्हारे अपने, बुनियाद उठाने तुम्हें पढ़ाने
पर तुम हरक़त नहीं करोगे
क्योंकि तुम्हारा समाज
मंदिरों में जा-जाकर मूढ़ हो चुका है।
('क्योंकि तुम्हारी लत्त चलती है, बुद्धि नहीं' से )

तुम्हारे इंसान बनने की प्रक्रिया में जाति आड़े आ रही है
मर रही हैं संवेदनाएं और तमाम मानवीय संभावनाएं
इन्हें जगाने के लिए जाति का दंभ छोड़ना पड़ेगा
पर तुम नहीं छोड़ोगे दोस्त! दलित थोड़ी न हो।
('तुम क्यों झुकोगे दोस्त' से)

मनुष्य हो तो आगे आओ, जाति-धरम का भेद मिटाओ
संविधान में सबके लिए, बनी एक ही खाट है।
होगा तेरी लिए अफवाह, मेरा भोगा हुआ यथार्थ है।
('भोगा हुआ यथार्थ' से )

जिसने वहशी दरिंदों को एक बार भी नहीं टोका
वो मेरा भी खुदा हो, ये मुझे मंजूर नहीं।
('मुझे मंजूर नहीं' से)

हम अब भी अन्न उगाते हैं
वे अब भी अंग चबाते हैं
हैं गज़ब के भूखे लोग यहाँ
मेरा टूटा हल भी खाते हैं।
('हम तब भी अन्न उगाते हैं' से)
बच्चा लाल उन्मेष को उनकी कविताओं के लिए बधाई देते हुए मैं कामना करती हूँ कि उनकी सच कहने की, हालत से टकराने की ताक़त बची रहे।

Wednesday, May 20, 2026

मैं मिलने जाऊँगी

 


पिछले बरस मेरे जन्मदिन पर चमोली में मित्र ने एक पौधा लगाया था। सुना है वह पौधा अब बड़ा हो गया है।
एक रोज मैं उस पौधे से मिलने जाऊँगी। उस शहर में एक नदी बहती है,जो मेरी सहेली है। मैं उस नदी से मिलने जाऊँगी। उस शहर के मौसम ने मेरे गाढ़े दुखों में गुलाबी फूल खिलाये थे, मैं उस मौसम से मिलने जाऊँगी।

जिस मित्र ने मेरे नाम के पौधे को न सिर्फ लगाया उसे साल भर सहेजा, बड़ा किया मैं उसे मित्र से मिलने जाऊँगी।

एक दिन मैं स्नेह से भरे हर व्यक्ति से मिलने जाऊँगी।

Tuesday, May 19, 2026

आवाज़ भी एक जगह है


कल जन संस्कृति मंच ने देहरादून में मंगलेश जी की स्मृति में एक कार्यक्रम का आयोजन किया। सच कहूँ अरसे बाद किसी कार्यक्रम से इतना तृप्त होकर लौटी हूँ। तृप्ति का केंद्र मैंने खुद के लिए जिन चीजों में पाया है वे हैं स्नेह, सम्मान और अब तक जाने हुए में तनिक इज़ाफ़ा। कल की शाम इन तीनों से लबरेज़ रही।

आशुतोष, रविभूषण, ज़हूर आलम, दिगम्बर और राम जी राय (जी का सम्बोधन सबके साथ माना जाय) को सुनना सुखद था। कविता की लेयर्स को देखना, टटोलना, उसके भीतर और भीतर झांकना और कविता के मर्म तक पहुंचना सुखद था। जानना हमेशा ही कम होता है। हर बार लगता है, कितना तो कम जानते हैं हम। कल भी ऐसा ही सा दिन था।

इतने सारे कवियों ने इतना सुंदर सुवावस्थित कविता पाठ किया, आनंद हुआ। भरोसा हुआ कि हालात से बैचेन लोग कम भी नहीं हैं। प्रेम शंकर और मृत्युंजय ने क्या ही गज़ब का संचालन किया। यह उस संचालन की ही खूबी थी कि कार्यक्रम में इतने वक्ताओं के वक्तव्य और 20 कवियों के कविता पाठ से रचा बसा कार्यक्रम समय पर शुरू हुआ और समय पर खत्म हुआ।

न किसी कवि ने माइक पकड़कर पकड़े ही रहने की जिद की और ऐसा भी नहीं लगा कि बहुत हड़बड़ी हुई। तो यह संतुलन ख़ूबसूरत था। मदन चमोली शांति से सब संभाले भी रहे और लगने भी नहीं दिया कि कोई कुछ संभाल रहा है।

इब्बार रब्बी जी को पहली बार सुना, क्या ख़ूब हैं वो। क्या उत्साह, क्या बेबाक़ी और क्या ही कमाल का पाठ। नाम लेकर हर कवि के बारे में लिखूँगी तो कई किलोमीटर की पोस्ट हो जाएगी बस इतना ही कि हर कवि अपने होने में कमाल था। इतने सारे कवियों को एक साथ सुनना और एक मिनट के लिए भी कविता से ध्यान न हटना इस बात की तसदीक़ है।

श्रोताओं की संख्या भी सुख का एक कारण था। इतने सारे लोग समय पर आ गए और लगातार बने रहे, यह कम महत्वपूर्ण बात नहीं। प्रतिरोध के स्वर में इतने सारे साथियों का होना सुख तो है ही।

मंगलेश जी से जुड़े इतने स्नेहिल किस्से सुनने को मिले कि ऐसा लगा नहीं हैं वो हमारे बीच नहीं हैं। दैहिक रूप से वे हमारे साथ भले नहीं हैं लेकिन हम सबके भीतर वो हैं और रहेंगे। कार्यक्रम की शुरुआत में उनके कविता पाठ की रिकॉर्डिंग सुनना भी कम सुंदर अनुभव नहीं था।

तो कुल जमा बात इतनी है कि ये माना कि अंधेरा घना है, लेकिन इस अंधेरे को तोड़ने की कोशिश करने वाले भी कम नहीं हैं, और ये अंधेरा एक दिन टूटेगा ज़रूर।

मृत्युंजय पुराने साथी हैं, उनसे अरसे बाद मिलना बड़ा ही सुखद रहा। बाकी इस कार्यक्रम में जो गुना है वो धीरे-धीरे भीतर जगह बना रहा है। धीरे-धीरे उस पर भी लिखूँगी अगर वक़्त इज़ाजत देगा। 

जिंदाबाद साथियों!

Sunday, May 17, 2026

जीवन में ऋषभ का होना


भीतर भीतर कुछ दरक रहा होता है, जिसे कभी ढेर सारे काम से, कभी तेज़ कदमों से, कभी संगीत से, कभी ढेर सारी मुस्कुराहटों से और कभी झूठ मूठ की खिलखिलाहटों से रिप्लेस करने की कोशिश करती रहती हूँ। उस वक़्त अपने ज़िंदगी को चकमा देने के इस हुनर पर फख्र सा होने लगता है लेकिन...वो ज़िंदगी है, चुपके से धप्पा देती है। वो इंतज़ार करती है, एक ऐसी तनहाई का जिसमें आप टूटकर बिखर ही लें। 

बिखरना, बुरा नहीं है। टूटना बुरा है। टूटन को छुपाये फिरने के खेल में हम लगातार और टूटते जाते हैं। 
कभी सब्र की नब्ज़ टटोलती हूँ। बहुत मद्ध्म मद्ध्म सी हरकत मुश्किल से ढूंढ पाती हूँ। अपने ही सब्र को गले लगाकर बैठी हूँ। आज की इस सुबह में मैं हूँ मेरा लगभग टूटा हुआ सब्र है और कुछ अगड़म बगड़म सा दिन है। 

शायद मैं लिख भी न पाती कुछ। न जाने कबसे लिखना, पढ़ना स्थगित सा है। किया नहीं है स्थगित, यह खुद दूर जाकर बैठा है। मैं इंतज़ार में हूँ कि करीब आए वो नहीं आता। मैं अपनी पसंद की किताबों के साथ उसके करीब जाती हूँ, वो मुंह घुमाकर बैठ जाता है। मैं लौट आती हूँ। हालांकि, मनुहार करना जारी है। 

मैंने पाया है कि आपके कितने ही करीबी लोग हों वो आपके दुख, सॉरी दुख नहीं उदासी का सामना नहीं करना चाहते। उस बारे में बात नहीं करना चाहते। शायद मैं भी नहीं। और इसलिए हमारे चेहरे पर मुस्कुराहटों के मुखौटे मजबूत होते जाते हैं। 

कल मैंने 3 लोगों से कहा, 'मन अच्छा नहीं है'।  2 लोगों ने पूछा, 'अरे क्या हुआ?' और 1 ने कहा, 'मेरा भी मन बहुत खराब है' मैं इन सबके साथ खुद में वापस  लौट आई। क्योंकि 'क्या हुआ' जैसा कुछ तो हुआ नहीं। लेकिन क्या नहीं हुआ जैसा तो न जाने कितना कुछ है। 

जानती हूँ कि हर कोई अपने भीतर न जाने कितना सैलाब लिए फिर रहा है। देश दुनिया के हालात ऐसे हैं कि आप इनसे अछूते रह नहीं सकते। कुछ कहकर कभी कुछ न कहकर। 

मैंने बचपन से अपना कोपिंग मैकेनिज़्म चुप रहने और घर की सफाई में पाया है। बड़ी हुई (मतलब पिछले दस बारह सालों में ) लॉन्ग ड्राइव या ट्रैवल भी कोपिंग मैकेनिज़्म की तरह पाया है। हालांकि आम जीवन में इस तरह के मैकेनिज़्म वो भी स्त्रियॉं के लिए एक लग्ज़री ही है। 

पिछले तीन दिन से घिस-घिस कर घर के कोने चमकाने, और बेमतलब के आँसू बहा चुकने के बाद आज इतवार को मैंने कुछ मना सा लिया है। इसका एक बड़ा क्रेडिट जाता है ऋषभ को। उसने एक ब्लॉग बनाया है। सिंगापूर डायरी लिखनी शुरू की है। मुझे उसने रात भेजा था। मेरी सुबह हुई उसे पढ़ने से। पढ़ते-पढ़ते लगा जैसे ठंडी हवा के झोंके ने छू लिया हो। 

सरल होना मुझे इस कदर मोहता है कि क्या कहूँ। जिस सादगी से ऋषभ लिखता है, वैसा ही वो है। इसलिए ऐसा लगा, उसने अपना लिखा भेजकर कहा हो, 'प्रतिभा जी, मैं हूँ न साथ।' 

ऋषभ, तुम्हारे लिखे का जादू देखो, दिन खिला हुआ है। मन भी। 

हम दुनिया के किसी भी कोने में हों, अपने हिस्से की मानवीयता को जीते हुए इस दुनिया को सुंदर बनाने के सपने में एक छोटा सा योगदान तो कर ही रहे हैं। कि हर रात सोने से पहले खुद से पूछना, आज किसी का दिल तो नहीं दुखाया न? 

जब जीवन का 'स' ही न सध रहा हो ऐसे में  ऋषभ का जीवन में  यूं होना ब्लेसिंग ही तो है। और इस बात को सेलिब्रेट तो करना चाहिए। है न? तो अब उठती हूँ, आज फिर से दो कप चाय बनाऊँगी। पहला कप ऋषभ का, दूसरा...आप जानते तो हैं न। 
दिन शुभ हो सबका।  

ऋषभ के ब्लॉग का लिंक- https://open.substack.com/pub/riserishabh/p/singapore-slowly-some-days-improve?utm_source=share&utm_medium=android&r=1dr9dp 

Friday, May 15, 2026

मर्मस्पर्शी उपन्यास है ‘कबिरा सोई पीर है’ : महेश पुनेठा



प्रतिभा कटियार, जिनकी मुख्य पहचान एक संवेदनशील कवयित्री के रूप में है, अपने पहले उपन्यास ‘कबिरा सोई पीर है’ के माध्यम से हिंदी साहित्य में एक सशक्त विमर्श प्रस्तुत करती हैं। यह उपन्यास जाति, लिंग, आरक्षण, सामाजिक कंडीशनिंग और मानवीय अंतर-संघर्षों की जटिलता को केंद्र में रखकर लिखा गया है। मात्र 168 पृष्ठों में लेखिका ने समाज के गहरे घावों को छुआ है, बिना किसी व्यक्ति-विशेष को दोषी ठहराए।

उपन्यास की शुरुआत सिविल सेवा की तैयारी कर रहे युवाओं के कोचिंग सेंटर से होती है। नायक और नायिका दोनों निम्न-मध्यवर्गीय परिवारों से आते हैं, लेकिन अलग-अलग जातियों से। उनकी मुलाकात और बढ़ती आत्मीयता उपन्यास की मुख्य धुरी बनती है। नायक लिबरल दृष्टिकोण वाला, जाति-लिंग संकीर्णताओं से ऊपर उठने की कोशिश कर रहा व्यक्ति है, जबकि नायिका अपने कड़वे अनुभवों के कारण शंकालु, तल्ख और पूर्वाग्रहों से ग्रस्त है,जो स्वाभाविक है। उपन्यास की संरचना उल्लेखनीय है।

उपन्यास 29 अध्यायों में लिखा गया है। हर अध्याय के अंत में एक शेर दिया गया है, जो कवयित्री प्रतिभा की पहचान को गद्य में भी जीवंत रखता है। बीच-बीच में काव्य पंक्तियों और कविताओं का आना तथा प्रकृति-चित्रण उपन्यास को काव्यात्मक गहराई प्रदान करता है।उनके प्रकृति और कविता के प्रति गहरी रागात्मकता को दिखाता है। लेखिका ने अंतर-संघर्ष को बहुत बारीकी से उकेरा है। वे दिखाती हैं कि भेदभाव अब मुख्यतः प्रत्यक्ष नहीं, बल्कि मानसिक और सूक्ष्म स्तर पर विद्यमान है — परिवार की बातचीत, दोस्तों के बीच “मजाक”, आरक्षण का ताना और योग्यता पर उठाए जाने वाले प्रश्नचिह्न। आरक्षण नौकरी दे सकता है, लेकिन सम्मान और स्वीकृति नहीं — यह कटु सत्य उपन्यास में बार-बार प्रतिध्वनित होता है।

सबसे मजबूत पक्ष बहु-स्तरीय भेदभाव का चित्रण है। लेखिका दिखाती हैं कि शोषक वर्ग में भी स्त्रियाँ शोषित हैं, दलित पुरुष दलित स्त्री से और सवर्ण स्त्री दलित स्त्री से खुद को बेहतर मानने का दंभ रखता है। नई पीढ़ी में बदलाव के बीज हैं, लेकिन सामाजिक संरचना इतनी जटिल है कि बाहर निकलना आसान नहीं। अनुच्छेद 370 के हटाए जाने के बहाने लोगों के मन में धर्म के नाम पर बजबजाती नफरत को भी दिखाया गया है।

अच्छी बात है कि समाज में व्याप्त भेदभाव के लिए उपन्यास किसी एक पक्ष को पूरी तरह दोषी नहीं ठहराता है। वह सोशल कंडीशनिंग को “नसों में इंजेक्ट वायरस” की संज्ञा देता है और समझने की कोशिश करता है कि भेदभाव करने वाला व्यक्ति भी पूरी तरह जिम्मेदार नहीं होता। उपन्यास इस पर सहानुभूति पूर्वक देखे जाने की अपील करता है । मार्मिक पंक्ति है — “दर्द ही उनका देश है” — जो शोषितों की सार्वभौमिक पीड़ा को रेखांकित करती है।

यथार्थ और रूमानियत का संतुलित मिश्रण, पात्रों के आंतरिक द्वंद्व का गहरा चित्रण और काव्यात्मक भाषा उपन्यास को मजबूत बनाती हैं।

उपन्यास पाठक को बेचैनी और सवालों के साथ छोड़ता है — “जब तक दिमाग ठीक नहीं, तब तक कैसे ठीक हो सकता है?” कानून सतह बदल सकता है, दिल नहीं। महत्वपूर्ण बात कही गई है।

कुल मिलाकर ‘कबिरा सोई पीर है’ एक मर्मस्पर्शी उपन्यास है, जो 21वीं सदी के भारत में जाति-लिंग के जटिल प्रश्नों को उठाता है। यह न सिर्फ पीड़ा को दर्ज करता है, बल्कि समझ, सहानुभूति और बदलाव की यात्रा पर भी जोर देता है।

प्रतिभा कटियार ने साबित किया है कि कविता की संवेदनशीलता गद्य में भी समाज को आईना दिखा सकती है। जो पीड़ा नहीं झेला, वह शायद पूरी तरह न समझ पाए — लेकिन इस उपन्यास को पढ़ने के बाद अनुभव करने का एक मौका जरूर मिलता है। यह उन सबके लिए अनिवार्य पढ़ने योग्य है जो समाज में बदलाव चाहते हैं।

कबीर की तरह — पीर वही समझता है जो सोई हुई पीड़ा को जागृत कर सके। प्रतिभा कटियार ने ठीक यही किया है। 

Thursday, April 16, 2026

अप्रैल उम्मीद है


वो जो खिलखिला रहे हैं मोगरे इन दिनों
ये अप्रैल की आहट है
ये जो सारे दरवाजे खिड़की भेदकर 
चली आती है रातरानी की ख़ुशबू 
ये अप्रैल का दीवानापन है 
ये जो आँखों से निकल भागे हैं ख़्वाब 
मटरगश्ती करते फिर रहे हैं यहाँ से वहाँ 
ये अप्रैल की शरारत है 
ये जो समन्दर की लहरों को 
अंजुरियों में समेट लेने को व्याकुल है एक लड़की 
ये अप्रैल पर भरोसा है 
ये उड़ते हुए सेमल के फाहे 
आ बैठे हैं काँधों पर 
ये अप्रैल से उम्मीद है 

Sunday, April 12, 2026

कहानियों के फूल हक़ीक़त की धरती पर खिल उठे थे


मुझे ख़्वाब देखते लोग बहुत अच्छे लगते हैं। उनके पास से अलग ही ख़ुशबू आती है। न जाने क्यों लेकिन ख़ुद ख़्वाब देखने से डरती रही। डर ख़्वाब टूट जाने का। डर मेरे ख़्वाबों का उपहास उड़ाए जाने का। 

लगभग आधी ज़िंदगी जी चुकने के बाद सहमते हुए ख़्वाबों की ओर हाथ बढ़ाना शुरू किया। चारों तरह देखते हुए कि कोई ख़्वाब देखते हुए देख न ले। कोई देखेगा तो मज़ाक ही उड़ाएगा 'आईं बड़ी, इत्ते बड़े-बड़े ख़्वाब देखने।वालीं'। 

फिर मैंने अपनी दुनिया समेट ली। लोगों से दूरी बना ली। शब्दों से, कुदरत से दोस्ती कर ली। अपनी छोटी-छोटी कहानियों में अपने तमाम सपने लिखने लगी। इन कहानियों में मैं थी, मेरा मन था। वो जंगल थे जिन्हें मैंने देखा नहीं, वो रास्ते जिनसे मैं गुजरना चाहती थी, मुक्कमल प्रेम की चाहना जो ख़्वाब में भी पूरा होने को तैयार नहीं। इन कहानियों समंदर, नदी, झरने, फूल, बादल, बारिश सब भरपूर थे। और थी इस धरती को प्यार से भर देने की इच्छा। 
मैं अपनी कहानियों में सांस लेने लगी थी, मैंने देखा मैं खुश रहने लगी हूँ। इन कहानियों से एक ख़ुशबू आती है जो मुझे टूटने से बचा लेती है।

फिर ये कहानियाँ भी जज की जाने लगीं। इनका भी उपहास किया जाने लगा। और हम सब जानते हैं कि हमारा मनोबल हमारे सबसे करीबी लोग ही तोड़ते हैं। मेरी कहानियों के फूल मुरझाने लगे, मेरी कहानी की नदियां सूखने लगीं। 

कहानियाँ लिखना बंद होने लगा। एक रोज मैंने ख़ुद को ख़ुद से बिछड़ते पाया। मैं सूखी नदी के सीने से धंस जाती और देर तक सुबकती रहती। अमावस की रात में चाँद ढूंढती फिरती। एक रोज मैंने अपने सूखे मन पर कुछ बूंदें महसूस कीं। मेरी ही कोई कहानी हक़ीक़त में मेरा हाथ थामकर मुझे लेकर चल पड़ी। मैं उसके पीछे-पीछे हैरत से, वो मेरा हाथ थामे मुसकुराते हुए।

मैं समझ गयी, मेरी कहानियाँ हक़ीक़त की ज़मीन पर उतर भी सकती हैं। वो समंदर का किनारा, वो प्रेमी के कांधे से टिककर घंटो जाते हुए सूरज को देखना, तारों की छाँव में बिना बोले बस चलते जाना और सोचना कि एक दिन यूध्ध खत्म हो जाएंगे सारे, धरती पर सिर्फ प्यार बचेगा। 

कहानी कहती, 'उस प्यार को बचाने के लिए भी युध्ध तो करना पड़ेगा। युद्ध सबको लड़ना होगा, हर किसी को। किसी से नहीं, ख़ुद से। अपने भीतर पल रही हिंसाओं से। तरह-तरह की हिंसाओं से।'

'फिर?' मैं कहानी से पूछती। 
'फिर दुनिया में कोई किसी से नफ़रत नहीं करेगा।'  कहानी मुस्कुराती। मैं उसका हाथ थामे उसके पीछे पीछे चलते हुए मासूमियत से पूछती 'लेकिन यह तो यूटोपिया है न ? 

कहानी मुझे हौसला देती, 'सपने देखने से न डर पगली। तू सपने लिख, क्या पता किसी दिन तेरे सपने हक़ीक़त बन खिल उठें।' यह सुनते हुए मैंने उस रोज अपने सबसे प्यारे सपने की हथेलियों को ज़ोर से अपनी हथेलियों में भींच लिया। मेरी आँखें बह निकली थीं, सुख से। सपने को सब पता होता है, उसने मुझे गले से लगा लिया। लहरों की आवाज़ कानों में घुल रही थी।

आसमान में तारे उस रोज झमककर खिले थे। सप्तऋषि मण्डल को देखते हुए हम ध्रुव तारे को ढूंढने लगे ताकि ख़्वाबों पर यक़ीन करना चाहिए इस बात पर ध्रुव तारे की मुहर लगा दी जाय। ध्रुव तारा मुस्कुरा रहा था।

अगली सुबह मैं नया ख़्वाब लिख रही थी....कि एक रोज़ धरती पर कोई किसी से नफ़रत नहीं करेगा, ईर्ष्या नहीं करेगा, कोई प्रेम से नफरत नहीं करेगा...

उस रोज चाँद आसमान से जाने को तैयार नहीं था। वो कहानी में लिखे ख़्वाब को किसी आयत की तरह  बुदबुदा रहा था। समंदर की लहरें करीब आकर बैठी थीं, एकदम शांत।

मैंने कहानी के अंत में लिखा...आमीन!

Friday, April 3, 2026

जीवन के पास क्या मरहम है?


खरगोशों की उदुक-फुदक दिन के उगने से पहले धरती को संवार रही है। अरसे बाद बालकनी से लटक कर लगभग कांधे से आ लगने को आतुर अशोक धरती को शोक मुक्त करने की प्रार्थना में मानो आँखें मूँदें खड़े हैं। धूप के कुछ कतरे इधर-उधर बिखरना शुरू हो चुके हैं।

इस सुबह में कल रात का कलरव भी दाखिल है। पूर्णमासी का चाँद मानो सुबह के करीब रखे चाय के कप को जरा सा सरकाकर बैठा ऊंघ रहा हो। मैं नन्हे अचंभे से चाय के कप को देख रही हूँ, जिसके दाहिनी तरफ सुबह की किरनें हैं और बायीं तरफ पूर्णमासी के चाँद की धज।

सुबह के वैभव को देखती हूँ तो खुशी गालों पर छलक़ने को आतुर होती है। ठीक उसी वक़्त कोई मध्धम सी सिसकी जो भीतर ही भीतर न जाने कबसे पल रही है आँखों के रास्ते बाहर आने का रास्ता ढूंढ लेती है। सिसकियाँ बेआवाज होती है, उन्हें भीड़ से डर लगता है। उन्हें आईने से भी डर लगता है। वे एकांत की फिराक में रहती हैं। वे फिराक में रहती हैं कि कब मैं भीड़ से तनिक हाथ छुड़ाऊँ और खुद के करीब आऊँ।

इस गहरी सिसकी में जमाने भर की औरतों की वेदना घुली है। इसमें मेरी बेबसी घुली है। जब्त है, आक्रोश है। मैं इससे आँखें नहीं चुरा सकती।

नन्हा सा सुख भी किसी कर्ज़ सा लगता है।

इस सुबह में प्यार है। साथ ही एक गुहार है। ईश्वर से प्रार्थना है, कि तुम हो, तो हो न यार। सारे पत्थर दिलों को मोम कर दो न। सारे हथियारों को फूलों में बदल दो न। सारे बस्तों में सपने भर दो, इस दुनिया को कुछ तो जीने लायक बना दो।

तो क्या मैं इतनी निराश हो चुकी हूँ कि किसी चमत्कार.का इंतज़ार करने लगी हूँ। मैं खबरें छुपाती फिरती हूँ, या खबरों से छुपती फिरती हूँ पता नहीं लेकिन जानती हूँ बच तो बिलकुल भी नहीं पाती।

अशोक के पेड़ों की कतारें जिस तरह प्रार्थनामय हैं मेरे हाथ अपने आप जुड़ गए हैं, ओ जीवन, जरा सा मरहम बन जा, जा जख्मी दिलों को गले से लगा ले। सामने ख़रगोश कुलांचे मार रहे हैं, सुबह पूरी तरह धरती पर बिखर चुकी है, लेकिन क्या अंधेरा पूरी तरह गायब हो चुका है।

Thursday, March 19, 2026

दिल से दस तक


ऐसे रास्ते पर चलना जिसमें कोई होड़ न हो। जिस पर चलने वालों को कहीं पहुँचने की हड़बड़ी न हो। किसी को किसी से बेहतर साबित करने का कोई दबाव ही न हो। बस सुख हो साथ चलने का। हाँ, यह रास्ता है कविता कारवां का। कुछ कविता प्रेमियों ने सपना देखा किसी ढलती शाम में किसी पहाड़ी, किसी नदी किसी जंगल के तीरे बैठकर अपने दिल के बेहद क़रीब रहने वाली कविताओं को एक-दूसरे से साझा करने का। कवितायें भी अपनी नहीं, अपने प्रिय कवियों की। तो बस 2016 की एक शाम देहरादून के जसवंत मॉडल स्कूल में पहली बैठक हुई। तब से आज तक यह सिलसिला देश दुनिया में लगातार चल रहा है।

दिल ने कविता की देहरी पर दस्तक दी थी और कार्यक्रम की शुरुआत हुई थी। आज वह दिल की दस्तक दस वर्ष का सफर तय कर चुकी है।

इस सुंदर कान्सेप्ट को किसने शुरू किया, कैसे आगे बढ़ा यह बात लगातार अर्थहीन होती गई और यही इसकी सफलता है। हर वो शख्श जो एक बार बैठक में शामिल हुआ इस आयोजन का उतना ही owner हुआ जितना शुरुआत करने वाले कभी थे। फिर यह सिलसिला बढ़ता गया, जिम्मेदारियाँ एक से दूसरे को ट्रांसफर होती रहीं। शहर-दर-शहर बैठकियां होने लगीं।

आज दसवीं सालगिरह की दहलीज़ पर खड़े हुए सिर्फ एक एहसास तारी है, कितना प्यार मिला, कितने प्यारे लोग मिले, कितना सुकून मिला। जीवन में भला और क्या चाहिए होता है।

कविता कारवां हर कविता प्रेमी का अपना कार्यक्रम है। दुनिया भर से लोग इसमें जुड़े हुए हैं। कोई कुछ चाहता नहीं है, सिर्फ देता है अपना समय, प्यार और साझेदारी। हम नहीं जानते यह दुनिया कैसे बेहतर हो सकती है, बस इतना जानते हैं कि हम जहां हैं, वहाँ से शुरुआत हो सकती है।

कविता कारवां पर नाज़ है। यहाँ कोई ईर्ष्या नहीं, द्वेष नहीं, कोई राजनीति नहीं, सिर्फ और सिर्फ प्यार है और है अपनी प्यारी कविताओं के जरिये एक ख़ूबसूरत दुनिया का सपना देखना।

तो आइये, शामिल होते हैं कविता कारवां की दसवीं सालगिरह के उत्सव में और तलाशते हैं अपनी भूमिका इस दुनिया को मानवीय और करुणा से भरा हुआ बनाने की।

हैपी बर्थडे कविता कारवाँ!

Wednesday, March 18, 2026

उसने कहा, मैं हूँ न!

लाल टिब्बा का वैभव अब ब्लोगर्स और फोटोग्राफर के हवाले हो चुका है। दुर्लभ प्राकृतिक दृश्यों से घिरी जगह की खूबसूरती को सम्पूर्ण मौन और समर्पण में ही महसूस किया जा सकता है। शुरुआती दिनों में कई बरस पहले जब आती थी तब इतनी भीड़ नहीं होती थी। ख़ासकर ऊपर जहां बड़ी सी दूरबीन से हिमालय की रेंज को देखने का सुख रखा था। हम अक्सर मौसम के खुलने का इंतज़ार करते थे हालांकि दूधिया ओढ़नी में लिपटे पहाड़ों और जंगलों के सौंदर्य में गुम होते हुए बर्फ से लदे पहाड़ों को न देख पाने का मलाल नहीं ही हुआ कभी। 

अक्सर यहाँ चाय की प्यालियों में बादल का कोई टुकड़ा रखा देखा है। चलते हुए महसूस किया है कि पाँव ज़मीन पर नहीं बादलों पर पड़ रहे हैं। कल्पना में नहीं सच में। यही बात लैढ़ोर को खास बनाती है।  

लेकिन, हम जिस सुख की तलाश में पहाड़ों पर जाते हैं उसी सुख को नष्ट करने की अभिलाषा भी साथ लिए जाते हैं। जिस डाल पर बैठे हैं उसे ही काटने में लगे लोग हैं हम। लालच इतना कि दुनिया कि हर अच्छे पर अपनी नेम प्लेट लगाने को व्याकुल। बाज़ार को दोष देना कई बार खुद को बचाना भी लगता है। 

लाल टिब्बा का वैभव इस बार लोगों की भीड़ में, खुद को अच्छे अच्छे पोज में फोटो में कैद कर लेने की हड़बड़ी में और ढेर सारा खाना पीना करने में गुम होता दिखा। वो जगह जो मेडिटेटिव हुआ करती थी अब कैफे में बदल गयी है। खाना और फोटोग्राफी की होड़ मिलकर जैसे शांत पानी में कंकड़ी मार रहे थे। 

जगह की कमी थी और लोग इंतज़ार की लाइन में थे। सूरज अपने पूरे वैभव के साथ डूब रहा था और लोग अपनी कॉफी, अपने खाने का ऑर्डर करने में बिज़ी थे। 

वहाँ जमा तमाम लोगों में मुझे एक भी ऐसा नहीं दिखा जो प्र्कृति इस अनमोल लम्हे के सजदे में हो, जो इस सुख को आत्मसात करते हुए छलक पड़ा हो, जिसने अपने भीतर कुछ पिघलते हुए महसूस किया हो। 

जिस जगह बैठकर कभी सुख से छलक पड़ा करती थी आज उस जगह के खो जाने का दुख तारी होने लगा था। एक बार फिर यह बात पुख्ता हुई कि टिकट कटाकर निकल पड़ने से आप यात्रा का सुख ले पाएंगे यह बात अधूरी है। यात्रा की तैयारी पहले भीतर करनी होती है। वरना सोशल मीडिया तो अपडेट हो जाएगा लेकिन जीवन अपडेट नहीं हो पाएगा। 

मन की इस उथल-पुथल और बेचैनी को कौन सुनता वहाँ सिवाय मौसम के। सो ठंडी हवा के झोंके ने कंधे सहलाते हुए कहा, 'परेशान न हो मैं हूँ न।' मैंने चलना शुरू कर दिया...ठंड ने गाल सहलाये तो साथ लाई हुई शाल मुस्कुरा उठी।   

जारी...

Tuesday, March 17, 2026

उसने मेरा हाथ थाम लिया था

सूरज ढलते ढलते उदास शाम का सिरा थमा गया था। दिन के जाने और रात के आने के बीच का यह छोटा सा वक्फ़ा अपने भीतर न जाने कितनी उथल पुथल समेटे होता है। किसी के जाने और आने के बीच का वो हिस्सा जिसमें न जाने कितने संशय सांस ले रहे होते हैं। विगत की हथेलियाँ छूट नहीं रही होतीं और आगत की आहट का कोई पता नहीं होता। 

देवदार के घने जंगलों के बीच रोशनी और अंधेरे के रंग खेल खेल रहे थे। यह आँख मिचौली का खेल नहीं था, यह खेल था सांस के आने और जाने के बीच जरा सा सुस्ता लेने का। लैंढ़ोर न जाने कितनी बार आई हूँ लेकिन आने और आने में फर्क होता है। इस बार का आने खुद से ख़ुद को रिहा करने के लिए जरूरी था। मैं उन रास्तों पर चलते हुए जीवन की उन पगडंडियों की स्मृतियों को भी पार कर रही थी जिन पर चलकर मेरा वजूद बना है। 

जंगल की ख़ुशबू को थाम लेने को व्याकुल हथेलियाँ ख़ुद पर हंस रही थीं। ख़ुशबू को भला कोई थाम सकता है? क्या उसकी कोई तस्वीर ली जा सकती है? नहीं, ख़ुशबू को सिर्फ जिया जा सकता है। एक जगह बैठकर मैं देवदार और आसमान की गुफ्तगू को होते हुए देख रही थी। मेरे पीछे जीवन और मृत्यु का मंत्र बुदबुदा रही थीं कब्रें। उन कब्रों में सोये हुए लोग सुकून में तो होंगे शायद। 

जब सब कुछ इतना फ़ानी है तो झगड़ा किस बात का है आखिर। झगड़े का संसार हमारा बनाया हुआ है। झगड़ा कितना बेवजह यह बताने को कुदरत हमेशा तैयार रहती है। टट्टू पर बैठा खिल खिल करता बच्चा, उसके साथ चलता पिता, फोटो का ठीक ठीक एंगल ढूंढती माँ की खुशी, जीवन पर भरोसा है। वह भरोसा जिसे दुनिया भर के समझदार लोग लगातार तोड़ने पर लगे हैं। 

चलते-चलते पूरी धरती नाप लेना चाहती हूँ। इन दिनों पाँव थकते नहीं हैं। असल में जितना चलती हूँ मन को उतनी रिहाई मिलती है। चलना रास्तों से रिश्ता बनाना है, ख़ुद के करीब लाता है। चलते हुए चुप रहना किसी ध्यान में होने जैसा होता है। यह हाल ही में जाना है। अपने हाल में जाने हुए को मुट्ठियों में कैद कर लेना चाहती हूँ। फिर ख़ुद की बेवकूफी पर हंस देती हूँ। जो कुछ भी दुनिया में अच्छा है उस पर कब्जेदारी की हमारी फितरत। 

यह मेरा जाना हुआ है, यह व्यक्ति मेरा है, यह जगह मेरी है, यह घर मेरा है...सारा झगड़ा मैं का है। ख़यालों के गहरे समंदर में डूबे हुए मैं अपने भीतर धँसती जा रही थी। भीतर धँसते जाने का अर्थ है अपने भीतर छुपा कर रखी उस क़ीमती शय जिसका नाम उदासी है को छू लेना। 

मेरी आँखें बह निकली थीं और इस बात की खबर गालों के अलावा किसी को नहीं थी। लैंढ़ोर की हवा मरहम सी बन चुकी थी। भीतर का अंधेरा खाली हो रहा था और बाहर उगा रहा ताजा अंधेरा रोशनी बनकर भीतर प्रवेश कर रहा था। 

युवा खिलखिलाहटों का सैलाब उधर से गुजरा तो लगा ढेर सारे फूल खिले हों। उनकी हंसी से एक फूल चुराकर मैंने अपने बालों में टाँक लिया था...

लैढ़ोर ने हाथ थाम लिया था। 

(जारी...) 

Monday, March 16, 2026

लैढ़ोर- ख़्वाब का खुलता सिरा



चलते-चलते अचानक पाँव अचानक मुड़ गया। मीठे दर्द की लहर सी उठी। टीस देह में उतर गयी। जिस वक़्त यह हुआ सूरज दिन के रजिस्टर पर अपनी दिहाड़ी पूरे होने के सिग्नेचर कर रहा था। देवदार के पेड़ अपनी गर्दन उठाए कुछ इस गलतफहमी को जी रहे थे मानो वो सामने खड़े हिमालय से ज़्यादा ऊंचे हों। हालांकि उनकी लहराती झूमती शाख़ों को ऐसा कोई गुमान नहीं था, वे बस अपने होने में ही खुश थीं। ढेर सारे टूरिस्ट पहाड़ी की ओट में जाते सूरज को अपने-अपने मोबाइल में कैद करने की जुगत लगा रहे थे। इस जुगत लगाने में उनका उस लम्हे को जीना लगभग छूटा जा रहा था।

मेरे पाँव के मुड़ने की ख़बर मेरे क़रीब खड़े मेरे दोस्त को नहीं हुई लेकिन उफ़क में अटके सूरज को हो गई। उसके घर जाने की स्पीड में ब्रेक लग गया। उसने पलकें झपकाकर पूछा, 'क्या हुआ?' 
मैं हंस दी। 'कुछ नहीं' कहकर वहीं उसी पहाड़ी के किनारे बैठ गई।
सूरज नाराज़ होकर बदली में छुप गया।

मैं जानती हूँ इसके ये खेल, मैंने दर्द को घूंटते हुए कहा, 'तुझे कुछ देर और रोकना था, बस इसलिए। देख, तू रुक गया न?' बदली से झाँकते हुए उसने अपनी नाराज़गी को कुछ यूं लपेटा, जैसे पड़ोस वाली आंटी ने शाल लपेटा।

मैंने उस हँसकर दिखाया, देख मैं ठीक हूँ। उसने मेरी पीठ पर धौल देते हुए कहा, 'मुझसे न छुपा, मैं सब जानता हूँ।
अब संभलकर घर जा, आराम कर।'

'पहले तू तो जा। देख कितने सारे लोग तेरे जाने को देखने को व्याकुल हैं'। वो हंसकर चल दिया। जाते-जाते अपनी रोशनी मेरे दर्द पर रख दी थी उसने।

दर्द में थोड़ी राहत तो आई थी।

Saturday, March 14, 2026

सुख को नाराज़ होते देखा है कभी?

खुद से इतनी शिकायतें रहती हैं कि मुंह चुराती फिरती हूँ। मानो खुश रहना कोई गुनाह हो। जब-जब रत्ती भर सुख हुआ, उसके छूटने के दुख ने इतना विचलित किया कि सुख के गाल पर मानो कोई स्क्रेच आ गया हो। वो मुझे घूर के देखता और मुंह फेर लेता। सुख को नाराज़ होते देखा है कभी? 

मैं उसके नाराज़ होने से उदास तो होती हूँ लेकिन उसे मना नहीं पाती। जाने कहाँ से प्रेमी की यह आदत मुझमें छूट गई। 

बाज दफा तमाम शिकायतें होती ही इसलिए हैं कि उन्हें मान मिले, उनकी परवाह की जाय। देखा है अक्सर झगड़ों की वजह इतनी मामूली होती हैं कि हैरत होती है कि भला इस बात पर कोई कैसे झगड़ सकता है लेकिन जो इश्क़ के खेल से वाकिफ हैं वो जानते हैं ये झगड़ा नहीं प्रेम है। वजह पर मत जाओ, प्यार पर जाओ। जब प्रेमी रूठे तो रूठने की वजह मत तलाशो, तर्क मत करो बस बाहों में भर लो। एक स्नेहिल स्पर्श हज़ार मर्ज की दवा होती है। 

सब जानते हुए भी सुख की हथेलियाँ थाम नहीं पाती, हालांकि चाहती हूँ उसके कंधे पर सर टिकाकर बची हुई उम्र गुज़ार दूँ। प्रेम में मान बहुत होता है। सुना था मानिनी प्रेमिकाओं का माथा हमेशा उन्नत होता है और उनके चेहरे पर अलग ही चमक होती है। क्या मेरे चेहरे पर वह चमक है? आईना देखती हूँ और मुस्कुरा देती हूँ। 

मेरा रूठा हुआ सुख मुझे आईने में देख अपना रूठना भूल जाता है। क़रीब आकर खड़ा हो जाता है। बिलकुल सटकर। हम दोनों साथ में अच्छे लगते हैं मैंने मन में सोचा। मेरा ऐसा सोचते ही खिड़की से हवा का झोंका कमरे में दाखिल हुआ। आईने में मेरे सिवा कोई नहीं था। 

कमरे में भी कोई नहीं। घबराकर इधर-उधर देखा, वो कहीं नहीं था। वो जा चुका था। नहीं जानती थी कि फिर वापस आएगा या नहीं। एक पूरा बरस या शायद उससे ज्यादा ही बीत गया उसे गए। वो सुख था पढ़ने का सुख, लिखने का सुख, संगीत का सुख, जीने का सुख। सुबह की चाय के साथ देर तक बारिश देखने का सुख, परिंदों के खेल देखने का सुख। मैंने सबको नाराज़ कर दिया और खुद को काम में झोंक दिया। 

किताबें पास होने से आप उन्हें पढ़ लेंगे यह संभव नहीं। कई बार किताबों को पलटा, कुछ पन्नों का सफर तय किया और फिर जाने कहाँ खो गई। वो किताबें अच्छी हैं, मेरा ही सुर बिगड़ा हुआ है। 

आज इस सुबह में जब आबिदा को कबीर गाते सुन रही हूँ तो महसूस हो रहा है कि कोंपलें सिर्फ बाहर नहीं फूट रही हैं। शायद मेरे सुख दरवाजे पर हैं। शायद वो लौटना चाहते हैं। शायद वो भी मुझे मिस कर रहे होंगे। अजीब सा दीवानापन है इस सुबह में। थोड़ी सी हड़बड़ी भी। ज्यादा सुकून है। 

सोच रही हूँ चाय का पानी पहले चढ़ाऊँ या दरवाजा पहले खोलूँ? सुबह की चाय पिये कई महीने बीत चुके हैं। आखिर दरवाजा पहले खोलते हूँ, कहने को वहाँ कोई नहीं लेकिन मैं जानती हूँ एक जीवन है जो रूप बदलकर बिना दस्तक दिये आने की फिराक में है। 

चाय का पानी चढ़ा दिया है, दो कप चाय का पानी। आबिदा आपा मुस्कुराकर गा रही हैं, भला हुआ मोरी मटकी फूट गई....

Thursday, March 12, 2026

क्या मुझे नींद आएगी


कई रोज से एक ख़ुशबू को थामे चल रही हूँ। उगते सूरज की ख़ुशबू। नई कोंपले फूटने की ख़ुशबू। सड़कें झरे हुए फूलों से भर उठी हैं। जिन रास्तों से गुजरती हूँ मेरे सर पर आसमान के साथ-साथ फूलों का एक सैलाब सा छाया होता है। मेरे दायीं तरफ फूलों की कतारे हैं और बाईं तरफ आम, लीची की बौर। पूरा शहर फिर से नये उगने की ख़ुशबू में डूबा है।

सारे दिन शहर का मौसम मुझे देश दुनिया के मौसम से, ख़बरों से बचाए रहता है। शाम होते-होते सब बिखरने लगता है। ख़बरों के छींटे कानों में पड़ते हैं और कानों से खून रिसने लगता है। अंधेरा छाने लगता है आँखों के आगे। नींद आ तो जाती है लेकिन बुरे ख़्वाब के चलते टूट जाती है। सोचती हूँ ख़्वाब ज्यादा बुरा था या हक़ीकत ज्यादा बुरी है।

नानी की कहानी में प्यार का जिक्र यूं होता था जैसे दाल में नमक का। बिना नमक की कोई दाल हुई भला, वैसे ही बिना प्यार के कोई ज़िंदगी हुई भला। सम्मान और प्यार हर इंसान की जरूरत है। रोटी भी बिना सम्मान के मिले तो बुरी ही लगती है ये बात और है कि मुफ़लिसी ने सम्मान को पीछे धकेलने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

जब सबको प्यार चाहिए तो ये नफ़रत कौन परोस रहा है। इतनी नफ़रत कि इंसान को इंसान ही न समझें। दुनिया की नफ़रत के बारे में ड्राइंगरूम या सोशल मीडिया पर मोर्चा खोलने या ज्ञान देने के बाद वक़्त मिले तो यह ज़रूर सोचना चाहिए कि एक व्यक्ति के रूप में हमारे भीतर कितनी हिंसा है। हमने कितनी बार हिंसक व्यवहार किया। किसके साथ किया। हिंसा को किस तरह समझा।

एक लंबी चुप्पी, उपेक्षा, उपहास क्या कम हिंसक होती है?

हमारे भीतर जो आक्रोश है वो किसके प्रति है? Powerless के प्रति ही तो। यही सारा खेल है। इसे समझने की बजाय इसमें फँसते जा रहे हैं हम सब। नफ़रत का यह चक्रव्यूह सबको घेरता जा रहा है। ऐसा चक्रव्यूह जिससे निकलने का रास्ता कोई नहीं जानता।

इस चक्रव्यूह की गिरफ्त बढ़ती जा रही है। हम एक अंधी सुरंग में जाते जा रहे हैं। धरती पर खून के छींटे बढ़ते जाते हैं और मन पर स्याह अंधेरा घिरता जाता है।

मैं खिलती हुई कोंपलों को देख ही रही थी कि खेल के मैदान में खेलता एक बच्चा ठोकर खाकर गिर गया। तभी एक दूसरे बच्चे ने आकर उसे उठाया और उसकी धूल झाड़ी।

मैं न तो गिरने वाले बच्चे का धर्म या जाति जानती थी, न उसे उठाने वाले बच्चे की। बस उन दोनों के चेहरे की मुस्कुराहट को और साथ खेलने को देख रही थी। तेज हवा के झोंके से वोगेनवेलिया के फूल शाखों से छूटकर मेरे काँधों पर आ बैठे थे।

क्या मुझे आज कुछ अच्छी नींद आएगी?