Tuesday, August 29, 2023

सुख का स्वाद



सुख का स्वाद
उस वक़्त पता नहीं चलता
जब वह घट रहा होता है

वह पता चलता है
घट चुकने के बाद

जीभ पर टपकता है
बूंद-बूंद
धीमे-धीमे
मध्धम-मध्धम 
राग हंसध्वनि की तरंग सा

जैसे मिसरी की डली
घुल रही हो
जैसे नाभि से फूट रही हो कोई ख़ुशबू.
जैसे बालों में अटका हो
बनैली ख़ुशबू से गुंथा
एक फूल।

Friday, August 11, 2023

ये भी कोई बात हुई


बात बात बात… कितना कुछ कहा जा रहा है. मैं थक जाती हूँ. थोड़ा सुनती हूँ उतने में ही थक जाती हूँ. कुछ कहने की इच्छा मात्र से थक जाती हूँ. कहना भीतर होता है लेकिन कौन उसे बाहर लाये सोचकर चुपचाप सामने मुस्कुराती जूही को देखने लगती हूँ. 

बिस्तर के पास वाली छोटी टेबल किताबों से भर चुकी है. ये वो किताबें हैं जिन्हें मैं कभी भी हाथ बढ़ाकर पढ़ना चाह सकती हूँ. उस संभावना में ये किताबें बिस्तर के क़रीब रहती हैं. अब कुछ किताबें बिस्तर तक पहुँच चुकी हैं. कुछ नहीं बहुत सारी. नहीं बहुत सारी से भी ज़्यादा. इतनी कि अब ये किताबों का बिस्तर हो गया है और मैं अपने लिए थोड़ी सी जगह बनाती हूँ कि सो सकूँ. लेकिन मुश्किल यह नहीं है कि मेरे ही बिस्तर पर मेरी जगह नहीं बची मुश्किल यह है कि किसी भी किताब पर टिक नहीं पा रही. उन्हें देखती हूँ. आधी पढ़ी किताबें. बुकमार्क लगी किताबें. अधख़ुली किताबें. अब उन्हें देखते ही थकान से भर जाती हूँ. 

आज समीना से कहा इन सब किताबों को ड्राइंग रूम की बुकशेल्फ में रख दो और जैसे ही वो किताबें लेकर गई भीतर कोई हुड़क सी उठी. कभी कभी हम सिर्फ़ पास रहना महसूस करते हैं, करना चाहते हैं. और यह उपयोगिता से काफ़ी बड़ा होता है. यह महसूस करना. ड्राइंग रूम की शेल्फ में सजने के बाद वो किताबें मुझे उदास लगीं. जैसे मेरा उनके साथ जो आत्मीय रिश्ता था उसे मैंने पराया कर दिया हो. 

ख़ाली साफ़ सलीक़ेदार बिस्तर मुझे चिढ़ा रहा है. बाहर बारिश हो रही है और भीतर बारिश की वो आवाज़ बज रही है बिलकुल वैसे ही जैसे ख़ाली बर्तन में बजती है कोई आवाज़. न पढ़ने का अर्थ किताबें ख़ुद से दूर करना कैसे मान लिया मैंने. ऐसा ही जीवन के साथ तो नहीं कर रही हूँ? उन ख़ामोश लम्हों को समेटने लगी हूँ जिनके होने में कुछ होना दर्ज नहीं है लेकिन जिनके होने ने बिना किसी लाग लपेट बिना किसी अपेक्षा के मुझे अपने भीतर पसर जाने दिया. 
(सुबह की अगड़म बगड़म)

Wednesday, August 9, 2023

जीवन से प्रेम की कहानी


‘रिकी और रानी की प्रेम’ कहानी एक सुंदर कहानी है। न जाने कितने नर्म लम्हे, मीठी सी अधूरी ख्वाहिशें हैं फिल्म में। असल में रिकी और रानी की प्रेम कहानी में उन दोनों की प्रेम कहानी ही केंद्र नहीं है। और यह शायद जरूरी भी था कि दर्शक प्रेम की एक कहानी में सिमट कर न रह जाएँ और देख सकें दुनिया के वो खूबसूरत पहलू जो पास होकर नज़रों से ओझल ही रहे।

फैज के शेर का हाथ थामकर जो प्रेम कहानी शुरू होती है उसका हर शेड खूबसूरत है। शबाना और धर्मेन्द्र की प्रेम कहानी के बहाने फिल्म झूठे, दोगले समाज की चारदीवारी में दम घुटते लोगों को ऑक्सीज़न देती है। विवाह प्रेम की बाध्यता नहीं है। किसी एक लम्हे का प्यार उम्र भर के साथ पर भारी पड़ता है।

शादियों में और कुछ हो न हो अहंकार बहुत होता है, 'ये व्यक्ति मेरा है, इस पर मेरा ही हक़ है' जैसा अहंकार। जया बच्चन उस किरदार को पोट्रे करता है और ठीक से करता है। पितृसत्ता किस तरह स्त्रियॉं को एक टूल कि तरह इस्तेमाल करती है इसकी मिसाल बनकर उभरी हैं जया बच्चन।

पूरी फिल्म मुझे अच्छी लगी। दृश्य, संगीत, आलिया की साड़ियाँ, शबाना की ग्रेस रणवीर की अदायगी।

आलिया के पिता का किरदार, माँ का किरदार, सब किस तरह करीने से गढे गए हैं। वैसे ही रणवीर की माँ का, पिता का बहन का किरदार। हर बिहेवियर एक जर्नी होता है। हम सिर्फ बिहेवियर को देखते हैं जर्नी को नहीं देख पाते। फिल्म उस जर्नी को दिखाती है।

बस जरा सी कसक रह गयी कि जया बच्चन के किरदार की उस जर्नी कि झलक भी जरूर मिलनी चाहिए थी। यह जरूरी था। वह स्त्री होकर स्त्री की दुशमन वाले खांचे में फिट न हो इसलिए यह जरूरी था।

जब फिल्म लिखने वाले और निर्देशक की नज़र साफ हो तब ग्लैमर, गाने बजाने, साड़ी झुमके और रंगीनियों के बीच भी जरूरी बातों को ठीक से रखा जाना मुश्किल नहीं होता।

करन जौहर की ‘कभी अलविदा न कहना’ फिल्म मुझे खूब पसंद आई थी जो एक लाइन में यह बात कहती थी कि किसी को पसंद न करने के लिए उसका बुरा या गलत होना जरूरी नहीं होता ठीक इसके उलट किसी को पसंद करने के लिए उसका सर्वश्रेष्ठ या महान होना जरूरी नहीं होता। 

फिलहाल रिकी और रानी जरूर देखनी चाहिए, मनोरंजन भरपूर है और कुछ जरूरी काम की बातें भी हैं जो बिना किसी नसीहत सी लगे साथ हो लेती हैं।

फिल्म में पुराने गानों का इस कदर खूबसूरत प्रयोग है कि कोई दिखाये तो फिल्म मैं दोबारा देख सकती हूँ...शबाना के लिए , ईशिता मोइत्रा, शशांक खेतान और सुमित राय की कहानी के लिए।

यह प्रेम कहानी सिर्फ दो लोगों के बीच के प्रेम की कहानी नहीं है जीवन के तमाम रंगों से प्रेम करने की कहानी है जिन्हें अपनी नासमझी से हमने बदरंग कर रखा है और जिसकी अक्सर हमें ख़बर भी नहीं है।