- दिनेश कर्नाटक
कबिरा सोई पीर है, जो जाने पर पीर।जो पर पीर ना जानई, सो काफिर बे पीर।
(कबीर कहते हैं, जो दूसरे की पीड़ा को समझ सके, वही साधु- संत है, जो न समझ सके वह धर्म तथा हृदय हीन है।)
कबीर के दोहे की पंक्तियों से ही प्रतिभा कटियार ने अपने उपन्यास का नाम 'कबिरा सोई पीर है' रखा है, जो लोकभारती पेपरबैक्स से वर्ष 2025 में प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास में जातिवाद के नाम पर भेदभाव, अपमान, उत्पीड़न की वह पीड़ा है जो सब जगह व्याप्त है, मगर दिखाई नहीं देती। उपन्यास को पढ़ते हुए दिमाग में उत्तराखंड में पिछले दिनों पौड़ी में हुई केतन की हत्या, चंपावत में ड्राइवर के गले में जूते चप्पल की माला पहनाकर घुमाने तथा मेरठ का वह प्रसंग भी आंखों के सामने आता है, जहां रोड पर प्रदर्शन कर रहे लोगों से आगबबूला हुए एसपी साहब कैदी वैन के अंदर जाकर प्रदर्शनकारी को पीटने लगते हैं।
हम प्रायः लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि अब कहां होता है भेदभाव, अब तो सब ठीक है, मगर उसी समाज में हम, 'इन्हें तो बहुत सिर पर चढ़ा दिया गया है', आरक्षण पर गालियां तथा दुर्व्यवहार के अनेक रूप देखते सुनते रहते हैं।
उपन्यास के केंद्र में तृप्ति है जिसके पिता, भाई व बहन अपने-अपने जीवन में भेदभाव व उत्पीड़न झेलते रहते हैं। तृप्ति धैर्य व संयम से इन सब स्थितियों का सामना करते हुए कामयाब होकर सम्मान अर्जित करने का इरादा रखती है। उसे अनुभव और कनिका जैसे दोस्त मिलते हैं जो उसे हौंसला देते हैं।
उत्पीड़न का रूप जातिवाद ही नहीं है। सीमा और कनिका को स्त्री होने की वजह से दोहरी तरह का भेदभाव झेलना पड़ता है। अनुभव एक उदार और लोकतांत्रिक नौजवान है जो जातिवाद और भेदभाव के परे चीजों को देखता है, लेकिन पुरुषोचित अहं तथा सामाजिक ताने-बाने में वह बहुत आगे नहीं जा पाता। इस अंधेरे को तोड़ने की उम्मीद पैदा करते तृप्ति और अनुभव आखिरकार उसी का शिकार हो जाते हैं।
यह उपन्यास बाहर से बेहद शांत, शालीन और उदार दिखने वाले हमारे सामाजिक ताने-बाने के भीतर छिपे हुए सामंती तथा जातिवादी चेहरे को उजागर करता है। इस महत्वपूर्ण विषय पर लिखने के लिए प्रतिभा जी को बहुत-बहुत बधाई !

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