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Saturday, March 5, 2022

कहानी- सात बजकर दस मिनट



-ज्योति नंदा
घड़ी में सात बजकर दस मिनट हुए थे जब माँ अपने मायके जाने के लिए घर से निकली थी। जब सूचना मिली ‘नानाजी की तबियत ठीक नहीं है आकर मिल लो’ तब भी घड़ी में सात बजकर दस मिनट हो रहे थे। माँ के कमरे में रखी उस टेबल क्लॉक में तब भी सात बजकर दस मिनट और तेरह सेकंड बजते थे जब वह स्कूल से घर लौटने की प्रतीक्षा करते हुए मेरे लिए पसंदीदा पकवान बना रही होती थी। पूजा करते, सफाई करते, गमलों की देखभाल करते, बाजार से सामान खरीदते वक्त, हर काम सात बजकर दस मिनट पर। उसके हल्के रंग की साड़ियों से मैच करते आसमान में तपता सूरज हो या मेरी ड्रॉइंग कॉपी में सावन और बसंत के गाढ़े रंगों वाली सीनरी जैसी चमक का मौसम, उसने कभी किसी से नहीं पूछा कि समय क्या हो रहा है।

समय को बीतने के लिए घड़ी की जरूरत नहीं होती।

कक्षा दस तक मेरे पास घड़ी नहीं थी, जरूरत ही नहीं महसूस हुई। कलाई घड़ी मिली मगर जरूरत की वजह से नहीं बल्कि मेरे जन्मदिन पर उपहार स्वरूप मामाजी ने दी थी। उस घड़ी माँ की आवाज में जो औपचारिकता और दयनीयता थी वो मुझे नहीं भूलती, ‘इसकी क्या जरूरत थी भाईसाब, आपका आशीर्वाद ही काफी है।’ मामा ने बहुत लाड़ से कहा था ‘मेरा भांजा है उसे गिफ्ट नहीं दे सकता क्या,

सात बजकर दस मिनट बताने वाली घड़ी के अलावा अब मेरी दराज में रखी रिस्ट वॉच भी थी जो सिर्फ दोस्तों में रौब जमाने काम आती थी।

स्कूल जाने के लिए माँ मुझे सुबह उठा देती थी। और शाम को खेलने कब जाना है, ये खुद समझ आ जाता था जब वो हर दिन घर के सारे काम निपटाकर, थकान उतारने के लिए अपने कमरे में जाती और दोपहर की एक तय झपकी के बाद उठती थी और बाजार जाने के लिए निश्चित समय पर तैयार होती। मैं समझ जाता था कि मेरे खेलने का समय हो गया।

स्कूल की पढ़ाई पूरी होने तक हम दोनों एक-दूसरे का समय थे।
इंजीनियरिंग कॉलेज में आने तक मेरा और घड़ी का नाता दूर का ही रहा। माँ के सात बज कर दस मिनट पर जीवन सुरक्षित था।
एक दिन वो भी आ गया जो हर एक मध्यवर्गीय नौजवान के जीवन मे कभी न कभी आता ही है। वास्तव में बेटों को पाला ही जाता है इसी दिन के लिए।

मैं भी पहली नौकरी के लिए दूसरे शहर जाने को तैयार था। घड़ी में सात बजकर दस मिनट हो रहे थे मैंने माँ से कहा ‘ये टेबिल क्लॉक बनवा दूँ।‘

अपनी अनुपस्थिती को टिक-टिक से भरने की कोशिश थी शायद। माँ ने मुझे यूँ देखा जैसे मैंने ऐसी इच्छा जाहिर कर दी जिसे वो चाहकर भी पूरा नहीं कर सकती। जान से ज्यादा प्यारी इकलौती संतान की छोटी सी इच्छा चाहकर भी पूरी न कर पाने का दर्द उसकी आँखों में मुझसे देखा न गया और मैंने मुँह फेर लिया। उसने मेरा मन रखने के लिए कह दिया ‘बैठक में एक घड़ी टाँग दे’ मैंने वैसा ही किया और चला गया।

दूसरे शहर आकर मैं चकित सा होने लगा हूँ। मेरी घड़ी में अब रोज सुबह के नौ बजते हैं। कभी कभी शाम के छः बजते हैं। जब ऑफिस का काम जल्दी निपट जाता है। ऐसे ही एक रोज नये शहर का आसमान ताकते झील किनारे टहलते हुए अचानक घड़ी पर नजर गई ठीक सात बजकर दस मिनट हो रहे थे । मुझे लगा मेरी घड़ी बंद पड़ गयी है। फिर टिक टिक सुनी पर घबराहट और बढ़ गई। दिमाग खुद को समझाने मे उलझता जाता कि क्यों परेशान हो, ये वक्त घड़ी में पहली बार तो नहीं बजा है, लेकिन ये इस घड़ी में क्यों बजा ये तो माँ का समय है। जाने कैसी बेचैनी, कितने सवाल, ढेरों जवाब सीने में उफनती धड़कन और टिक-टिक सब गड्मड्...। लगा अब एक कदम भी आगे नही बढ़ा पाऊँगा, सब ठहर जायेगा मेज घड़ी की तरह । घबराहट में कलीग को बुला लिया। बहुत मुश्किल से खुद को संयत कर झील किनारे बेंच पर बैठे हुए उसके कदमों को अपनी ओर बढ़ते हुए देख रहा हूँ ऐसा लग रहा है घड़ी की सुइयाँ चल रही हैं। सुचित्रा के आते ही कब साढ़े नौ बज गये पता नहीं चला।

उस दिन के बाद से समय दौड़ने लगा। हर काम जल्दी-जल्दी निपटा कर शाम का इंतज़ार करने लगा। एक बार फिर साबित हुआ कि समय को बीतने और ठहरने के लिए घड़ी की जरूरत नहीं होती। सात बजकर दस मिनट कब बजे ध्यान नहीं जाता। माँ की चिन्ता होती तो फुर्र से उड़कर उनके पास पहुँच जाता। ये सुनिश्चित कर वापस लैाट आता था कि दीवार घड़ी की टिक टिक ने माँ से सात बजकर दस मिनट को कोई नुकसान नहीं पहुँचाया है।

मेरी दुनिया में कुछ नयी घड़ियाँ शामिल हो गई हैं। उनमें से सुचित्रा की घडियाँ दिल के करीब आ गईं हैं। अक्सर इतवार का दिन उसके घर ही बीतने लगा। उस घर में ढेर सारी घड़ियाँ हैं। दीवार पर, मेज पर, कोने में सजी संवरी, आधुनिक ऐंटीक हर तरह की समय के साथ चलती हुई घड़ियाँ। एक दीवार पर वो पेंटिग भी है जिसमें पेंटर ने घड़ी को पिघलते हुए चित्रित किया है। उसकी माँ से मिलकर बहुत अलग अनुभव होता है, माँ ऐसी भी होती है। दोस्त जैसी। सुचित्रा से बातों के दौरान पहली बार सुना ‘सिंगल पैरेंट’। ये दो शब्द अपने जीवन से जुड़े भी लगे और नहीं भी। सुचित्रा की माँ ने उसे अकेले पाला था, जैसे ‘तुम्हारी माँ ने तुम्हें’ वो अक्सर कहती थी। पर मैं यह बात अपने बारे में निश्चित तौर पर नहीं कह सकता था। हमारे साथ सात बजकर दस मिनट भी था हर समय प्रॉक्सी पैरेंट की तरह।

सुचित्रा बताती है माँ को घड़ियों का बहुत शौक है। ये जो क्लासिक घड़ी मेरी कलाई पर देख रहे हो ये उन्हीं के कलेक्शन से है। उसने अपनी सुडौल कलाई दिखाते हुए कहा। ‘ये भी अजीब शौक है फिजूलखर्ची वाला। सारी घड़ियाँ एक वक्त पर एक समय बताती हैं’ मैंने ईर्ष्या से कहा। उसने समझाया ‘हाँ! पर ये उन्हें पसंद है। जैसे अधिकतर औरतों को गहनों का शौक होता है उसी तरह उन्हें घड़ियाँ पहनना और घर में सजाना अच्छा लगता है। माँ अपने शौक को लेकर बहुत पर्टिकुलर है। किसी से नहीं पूछती, किसी पर निर्भर नहीं हैं. वो बोलती जा रही थी....’ममा ने मुझे बचपन में भी कभी ये कह कर नहीं डराया ‘कर लो शैतानी जितनी करनी है नौ बजने दो आने दो पापा को फिर पता चलेगा...’

मैं अपनी माँ के बारे में सोचने लगा। माँ के शौक भी होते हैं ‘मेरी माँ को क्या पसंद था’.
‘पता नही।’
बहुत जोर डालने पर भी नहीं याद आया ऐसा कुछ भी जिसे शौक कहा जा सके। एक बार उन्हें शहर घुमाने ले गया था, मुझे लगा उन्हें अच्छा लगेगा। पर मैंने महसूस किया उनका मन तो वहीं अटका था। देाबारा मैंने भी जानने की कोशिश नहीं की कि उन्हें क्या पसंद है क्या नहीं हर हफ्ते मिलने चला जाता और फिर चुपचाप अपने काम पर लौट आता। धीरे- धीरे समय की कमी होने लगी है मुझे। अब केवल छुट्टियों में ही माँ के पास आना होता है। कभी-कभी माँ पर गुस्सा भी आने लगा है। झगड़ा करने को मन करता। क्या है ये ‘बस हर समय सात बजकर दस मिनट, लेकिन माँ से झगड़ा करना तो क्या, किसी तरह की असहमति की संभावना भी नहीं थी क्योंकि वो मेरी हर बात से सहमत थी। मैं अपने अंदर पनपते गुस्से और उठते सवालों पर अपराधबोध से भर जाता हूँ। क्यों माँ से नाराज होने लगा हूँ, वो माँ जिसने कभी किसी गलत आदत या झूठ बोलने पर भी पीटना तो दूर की बात डाँटा तक नहीं। यहाँ तक कि एक बार चोरी की लत लग गई और माँ को पता तब चला जब टीचर ने उन्हें बुलाकर शिकायत की। तब भी उसने ऐसे दिखाया जैसे कुछ पता ही न हो। ऐसी सीधी-सादी बेचारी माँ पर गुस्सा कैसे किया जाय।

जबकि सभी लोग उनसे बहुत हमदर्दी रखते थे। और अब सोचता हूँ कि माँ को इस दया से कभी कोई दिक्कत क्यों नही थी।
माँ ने कभी नहीं कहा कि मेरे जाने से घर सूना लगता है। नौकरी के साल भर होते-होते मैंने देखा उनकी सेहत गिर रही है। दुबला पतला शरीर और ज्यादा मुरझाया, बेजान सा दिखने लगा। मामा ने डाँटते हुए समझाया ‘वो तो ऐसी ही है कुछ कहती नहीं तो क्या तुम्हें दिखता नहीं तुम्हें पालपोस कर बड़ा करने में कितनी तपस्या की है उसने अब जवान बेटे के कंधों का सहारा उसका हक़ है।’ एक बार फिर ग्लानि से भर गया। अधिकारियों से माँ की बीमारी और अकेलेपन की दुहाई दे किसी तरह तबादला वापिस अपने शहर में करा लिया। और साथ ही सुचित्रा के साथ शादी का फैसला भी। माँ आज मुस्कुराई शायद पहली बार उसकी आँखो में पनीली सी चमक दिखी।

बारात चढ़ने का समय हो रहा था माँ अपने कमरे में सात बजकर दस मिनट के सामने खड़ी बुदबुदा रही थी ‘ऐसी भीड़भाड़ और शोर इक्कीस बरस पहले हुई थी।’ मामी उन्हें ढूढँते हुए ठीक समय कमरे में पहुँची और सुन लिया। नाराज भी हुईं कि उन्होने शुभ मौके की बराबरी अनहोनी से क्योंकि, बात कमरे से बाहर भी कुछ लोगों तक पहुँच गई सभी के मन में माँ के लिए आश्चर्य मिश्रित दया भर गई। वे सब नहीं जानते कि जब पूरी ज़िन्दगी सात बजकर दस मिनट तेरह सेकंड पर बीत रही है तो ये अवसर कैसे साझा नहीं होगा। इ..ई ’माँ ने बेहोश होने से पहले कहा कुछ देर में डॉक्टर माँ को होश में ले आये। उनकी बहू ने घबराकर बताया ‘आज शाम ही घड़ी रिपेयर करने को देकर आई हूँ, बंद घड़ी का घर में होना अशुभ होता है।’ उस रात मैं माँ के पास ही रहा। बार-बार उनकी धड़कनें सुनता और टबल क्लॉक की खाली जगह देखकर खो जाता जैसे किसी ने समय मे सेंध लगा दी हो। मैं तो नई घड़ियों का अभ्यस्त हो गया हूँ पर माँ सोचते- सोचते आँख लग गई।

अगली सुबह मैं और सुचित्रा जगे पर माँ नहीं। जैसे इक्कीस बरस पहले पिताजी की सांसें टूट गईं थी और उनकी र्निजीव देह भहराकर गिरते हुए मेज की उस खाली जगह पर रखी घड़ी से टकराई थी सात बजकर दस मिनट तेरह सेकंड पर।

(लेखिका ने कई वर्षों तक विभिन्न हिन्दी अखबारों हिन्दुस्तान, स्वतंत्र भारत, जनसत्ता, नई दुनिया आदि में स्वतंत्र लेखन किया। थोड़े समय र॔गमंच से जुड़ाव। 2017 से फिल्म निर्माण के क्षेत्र में कथा पटकथा लेखन जारी। "रंगम फिल्मस" से जुड़कर ‘कॉटन कैंडी’ ‘वाशरूम’ ‘दोहरी सोच’ तथा एक निर्माणाधीन शॉर्ट फिल्म की पटकथा भी लिखी। 2020 मे उपन्यास A son never forgets का हिन्दी अनुवाद ("पदचिह्न") प्रकाशित। लेखन के साथ वर्तमान में आकाशवाणी लखनऊ में समनुदेशी उद्घोषिका के रूप में कार्यरत।)

Tuesday, October 6, 2020

हैपी बर्थडे पार्टनर


प्यारी सी दीत्या, 

आज तुम्हारे जन्मदिन पर खूब खूब प्यार! स्पेशल वाला. सोचा क्यों न आज तुम्हें चिठ्ठी लिखूं. यूँ तो हम बातें करते ही रहते हैं, आसान है फोन उठाओ और नम्बर डायल कर दो. पूछो आवाज आ रही है? हा हा हा. मजेदार है न? तो फिर आज ऐसी कौन सी बात करेगी मासी चिठ्ठी में जो अलग होगी.

तुम्हें पता है मासी तुम्हारे संग तुम्हारी उम्र को जीना चाहती है, जीती भी है. यह उम्र ढेर सारे सपनों की उम्र है. बहुत बहुत सारे सपने देखना. उनमें से हो सकता है सारे पूरे न भी हों लेकिन कुछ तो यकीनन पूरे होंगे और यह कितना सुंदर होगा न. किसी और के सपने मत देखना तुम. अपने सपने देखना. और देखो, ज्यादा समझदार होने में कुछ नहीं रखा, बिंदास जो जी में आये वो करो बस कि उससे किसी का दिल न दुखे. अब यह दिल दुखने वाला मामला इतना नाज़ुक है कि लोगों का बात बात में दिल दुखने लगता है ऐसे में क्या करें ऐसे में तुम जानती हो क्या करना है.

तुम्हारे साथ घूमने जाना है यार. सिर्फ मैं और तुम. हम दोनों पार्टनर. चलोगी न? मुझे तुमसे बातें करना बहुत अच्छा लगता है. मैं सोचती हूँ कि अगर मुझे दोबारा बचपन जीने को मिले तो मैं तुम्हारी जैसी हो जाऊं और तुम्हारा बचपन जियूं. ये जो प्रेजेंट है न हमारे सामने जिसे हम जी रहे हैं यही इस जिन्दगी का अब तक का बेस्ट मूमेंट है. हो सकता है कल इससे भी बेस्ट कुछ मिले. लेकिन अभी तो यही है और इसे जी भर के जीना है....

जल्दी ही हम मिलेंगे और ढेर सारी मस्ती करेंगे. इस चिठ्ठी को ज्ञानवाणी समझकर कहीं रखकर भूल जाना और खूब मस्ती करना.

मैं तुम्हारे बर्थडे पर चिड़ियों से बातें करते हुए उन्हें बता रही हूँ कि आज मेरी दीत्या का जन्मदिन है. देहरादून की सारी चिड़ियों ने तुम्हें हैपी बर्थडे कहा है...खूब मस्ती करना और तस्वीरें भेजना.

प्यार
मासी

Wednesday, April 1, 2020

हाथ धोते रहें बस...


ज्योति नन्दा- 

लोग मर रहे हैं"- क्रोनोलॉजी
विक्रम संवत 1941 फाल्गुन मास की 1 तिथि, दिनांक 24 फरवरी सन 2020
"लोग मर रहे हैं ,हां वो चीन के वुहान में."
"पता है किसी ने भविष्य वाणी की थी सालों पहले कि लोग मिसाइल से नहीं वाईरस से मरेंगे. अब देखो लोग मर रहे हैं"
"और खाओ चमगादड़, मरो, हम तो वेजिटेरियन हैं कुछ नहीं होगा"
" सुना जर्मनी इटली स्पेन मे लोग मरने लगे हैं"
"पापा! यूरोपियन देश तो कितने डेवलपड हैं फिर भी लोग मर रहे हैं अमेरिका में भी. कैसे?
" लीडरशिप. लीडरशिप का कमाल है बेटा! मजबूत नेता देश को बचा लेता है.
".....जी कोरोना को मार देंगे अकेले. वाॅव."
"बंद करो ये चुम्मा चाटी. भारतीय संस्कृति पूरी दुनिया में फैल रही है सबको नमस्कार."
"आदाब-अर्ज से भी तो बच सकते हैं ?" "चुप रहो ! लोग मर रहे हैं इनको लाॅजिक की पडी है."
"गो कोरोना गो कोरोना गो"
चैत्र मास की 13वी तिथि दिनांक 22मार्च 2020.
" देश को मरने से बचाने के लिये लाकडाउन किया गया है.प्रधानमंत्री जी का साथ दें "
"थाली बजाओ, ताली बजाओ उत्सव मनाओ करोना आ गया यहा भी लोग मरेंगे.देश बच जायेगा"
" मैं ने तो बजा बजा के थाली में छेद कर दिया."
"चमचा तो चमक गया न बस ठीक है. देश बच जायेगा"
"डाक्टर के पास मास्क दस्ताने नहीं है. लेकिन उनको सैल्यूट वो लोगों को बचा रहे हैं."
"अगले चुनाव तक याद रखना सैल्यूट ठोंकते रहना देश बचेगा"
"हाऊ इज द जोश?"
"हाई रिस्क सर"
"चुप! पप्पू कही का"
" लोग मरते हैं अपनी मूर्खता से"
चैत्र मास की पहली तिथी दिनांक 24 मार्च --
"मैने कहा था न. देखो वो सडक पर आ गये मरने के लिए. जाहिल कही के.इनके लिए छुट्टी है घर जा रहे हैं. सबकी जान लेके मानेगे.
"दीज इडियट्स लाॅक देम गोली मार दो."
"सर आपने सरकार से पूछा स्वास्थ्य और शिक्षा बजट कैसे कहाँ? खर्च होता है"
"राफायेल विमान कित्ता शानदार है न देश बचाने के काम आयेगा पड़ोसी के घर में घुस के मारेगा|"
"हम तो लेखक हैं जो देखेगे लिख देंगे "भूख और गरीबी से बडी महामारी कोई दूसरी नहीं यहा तो रोज़ सैकड़ों भूख से मर जाते है. कोरोना क्या चीज है.?"
लाकडाउन काटने के उच्च मध्यमवर्गीय नुस्खे.--
"मजदूरों के पलायन के ह्रदय विदारक, अवसाद पैदा करने वाले वीडिओ और खबरे सोशल मीडिया के जरिये लोगो तक पहुचाने वाले जागरुक नागरिक और पत्रकारों को तुरंत अनफ्रेंड कर दें."
"प्रधानमंत्री को फालो करे."
" आँखे बंद करे, ध्यान करे स्वच्छ नदी कल कल करती बह रही है,हवा बहने की मधुर ध्वनि को महसूस करे. लम्बी सांस भरें कुछ देर रुके फिर छोडे. ऐसा करने से सांस रोकने की क्षमता बढेगी और वेंटिलेटर की कमी महसूस नहीं होगी"
फिर ध्यान करे कि लोग अपने पिछले जनम के बुरे कर्मों की सजा फलस्वरुप असमय मर रहे हैं. ऐसा सोचने से सकारात्मक सोच के रहस्य को जान पायेंगे और अपने मन की बात को दर किनार कर दूसरे के मन की बात को आत्मा में उतार लेंगे .
फिर आप सुख की अनवरत बहती धारा मे कोई व्यवधान उत्पन्न नहीं होगा फिर से ट्वीट करते हुए असीम सुख प्राप्त करेंगे -
"जान से हाथ धोने से बेहतर है बार बार हाथ धोते रहें"

Friday, April 12, 2019

कहानी- स्कूल


- ज्योति नंदा

सुन ऋषि ,कल रात को खूब मजा आया" वो बोली।
"अच्छा। क्या हुआ ? फिर वही , झूठ- मूठ सोने की एक्टिंग "
"नहीं नहीं ,कल मम्मा -पापा को बहुत डांट पड़ी.।
हा हा हा..... ऋषि की हंसी रुक ही नहीं रही थी। मां पापा को भी कभी डांट पड़ती है क्या ? उसने तो कभी देखा ही नहीं था कि माँ को कभी किसी ने डाटा ?
"हंस क्यों रहा है तू ?, रात को अचानक दादी दादू आ गए ,गाँव से, उन्होंने डांटा बड़ा मजा आया। " सुडूप्प ..की आवाज़ के साथ होठों को गोल बना कर नूडल्स खाती है।
क्यों"? मुश्किल से हंसी रोकते हुए ऋषि ने पूछा।
"मम्मा पापा एक कमरे में नहीं सोते इसीलिए और क्या?" उसने व्यंग किया जिस तरह उसे फ़िज़ूल की बातो पे डात पड़ती है वैसे ही दादा ने अपने बेटे को डाटा। मानो कोई रीत हो जो पीढ़ियों से चलती आ रही है। बेवजह बातो पे बड़ो का छोटों को डांटना।
ऋषि झल्लाया "ऐ तू चुतिया है क्या?"
"ऐ ऐ तू पागल , इडियट ,जबान संभाल अपनी न न पुन.. सक हकलाती ज़बान में नया शब्द बोला उसने।

"व्हाट व्हाट.....यु सैड"
तू गन्दी बात बोलेगा तो मै भी बोलूंगी ."
"अच्छा अच्छा ठीक है अब नहीं कहूँगा पलटवार होते ही ऋषि समझौते की मुद्रा में आ गया."पर तूने क्या बोला, न न ??? यह तो कुछ नया है , कहा से सीखी ?
"पता नहीं" अदिति चिढ गयी।
ऋषि समझ गया ज्यादा पूछना ठीक नहीं "अच्छा तू ही बोल अलग सोने के लिए डांट पड़ती है क्या "?
"कल मम्मा पापा मुझे सुलाने के बाद फिर से झगड़ने लगे"
'अरे वाह! बहुत दिनों के बाद तेरे मम्मा पापा ने फाइट की" ऋषि ने चटकारे लेकर कहा.उसकी आँखे चमक से और फ़ैल गयी. ऐसा कुछ जानने कि लालसा में जो वह अक्सर सुनना चाहता है.लेकिन क्यों ? ये वो नहीं जानता।

अदिति मायूसी से बोली "अब तो मम्मा पापा बात ही नहीं करते.बस मेरे पीछे पड़े रहते है,अदिति खाना खालो, नहा लो, पढ़ लो. पर कल फिर से लड़ने लगे" मुँह टेढ़ा कर बोली."हम दिवाली पर गाँव गए थे न वहा भी दादी मम्मा पर गुस्सा कर रही थी एक छोटा भइय्या चाहिए ही चाहिए"
ऋषि परेशां हो गया "अब यह कैसे आएगा "?
"ओहो बुद्धू तुझे कुछ नहीं पता.तेरे मम्मा पापा साथ नहीं रहते न इसीलिए.जब मम्मा पापा एक कमरे में सोते हैं तभी तो छोटा भैय्या आता है." ऋषि इस नए प्राप्त हुय ज्ञान को समझने की कोशिश में लगा हुआ था.
".घर में सबको छोटा भैय्या चाहिए.दादी दादू नानू नानी सबको. पर मम्मा ने बोला उन्हें नहीं चाहिए.पापा से कहा की एक ही बहुत है. जैसे चल रहा है चलने दो, नहीं तो कुछ भी नहीं बचेगा और न मैं बचाउंगी "
"क्या बचाना है?" ऋषि के मन में जाने कैसे कैसे ख्याल आ रहे थे क्या बचाना है अदिति की माँ को। कही वो कोई सीक्रेट एजेंट तो नहीं है? या फिर सुपर मैन वीमेन के भेष में? उन्हें दुनिया बचानी है।

"यह तो मुझे भी नहीं प.ता फिर पापा उठ कर दूसरे कमरे में चले गए. रात को दादी ,दादू आ गए अचानक और मम्मा पापा को खूब डांटा.मजा आया." ताली बजा कर हसने लगी."सब समझ रहे थे में सो रही हूं पर......ऋषि ने फिर छेड़ा।
"पर तू तो नंबर वन चोरनी है सब सुनती देखती रहती है" ऋषि ने चिढाया .अदिति ने आँखे तरेरी.
"मैं तो रात भर आराम से सोता हूँ अपनी मम्मा के साथ , फिर थोडा ठहरा, गहरी सांस ली "कभी कभी नानी आ जाती है बड़ बड करने लगती है.........
...........अच्छा हुआ तू अलग हो गयी,रात को चैन से सो तो लेती है.....कोई फिजूल की झिक झिक नहीं करता........बुढा तो ना जीने देता है न मरने.....".
"बुड्डा कौन ?"अदिति ब्रेड का टुकड़ा मुह तक ले जाते हुय रुकी.
"नाना और कौन" हा हा...दोनों ने ठहाके लगाये "तेरी मम्मा क्या बोलती है?"
"कुछ नहीं बस सिर के नीचे रखा तकिया कान पे ढँक कर सो जाती है.नानी बड़ बड़ करके चली जाती है".
टन टन टन ......"चल-चल टिफिन टाइम ख़त्म हो गया.तेरी बातें ही नहीं ख़त्म होती".ऋषि ने फटाफट टिफिन समेटा और क्लास की ओर दौड़ गया.अदिति भी बेमन से पीछे हो ली.

दूसरे दिन स्कूल में सुबह से ही अदिति कुछ कहने के लिए उतावली दिख रही थी। जी.के.और मोरल साइंस की साप्ताहिक क्लास में अदिति का कभी मन नहीं लगता था। आज तो बिलकुल भी नहीं.टीचर बड़ों का आदर और माता पिता के सम्मान का महत्तव समझा रही थी। अदिति इस इन्तजार में थी कि कब टन टन की आवाज आये. ऋषि उसका उतावलापन भांप गया."ऐ ,क्या बात है?" वह अदिति के कान में फुसफुसाया.
"झूठ नहीं बोलना चाहिए" टीचेर का स्वर गूंजा.
"मम्मा पापा से बहुत गुस्सा है बोल रही थी तुम हमेशा झूठ बोलते हो" अदिति भी फुसफुसाई .
तभी घंटी बज गयी सारे बच्चे मैदान की तरफ दौड़ पड़े.अदिति और ऋषि अब भी घर का, समाज का और किताबी नैतिकता का भेद समझने की कोशिश कर रहे थे.
"कल मम्मा ऑफिस से आने के बाद थक कर लेटी थी तब पापा ने उन्हें एन्रेर्जी ड्रिंक दिया .उसके बाद मम्मा मुझे बहुत प्यार करने लगी .और......ही ही ...ही...."अदिति मुह पर हाथ रख कर हसने लगी.ऋषि फिर झल्लाया " क्या है जल्दी बता."........खी खी ....और न...और और . मम्मा,पापा को भी प्यार कर रही थी.फिर पापा ने कहा अदिति तू दादी के पास सो जा। मैं नहीं जा रही थी लेकिन दादी और पापा ने बोला सन्डे फिल्म दिखायेंगे और आइसक्रीम खिलायंगे तो मैं चली गयी.""ऐ चटोरी" ऋषि ने फिर चिढाया.
"अरे सुन तो. में तो सुबह वापस मम्मा के पास ही थी"
'"अच्छा ! जादू क्या" ऋषि को मजा आने लगा था.
"मम्मा को तो कुछ भी याद नहीं था. फिर मैंने मम्मा को बताया की उन्होंने पापा की दी हुए एनेर्जी ड्रिंक पी थी तो वह पापा से फिर लड़ने लगी और रोने लगी "तुमने मेरा रेप किया है "
"यह रेप क्या होता है? वो जो टी वी की न्यूज़ में नाना नानी दिनभर सुनते रहते है। जब पूछता हूँ तो चैनल बदल देते है। "
वो होगी कोई मामी पापा के बीच की बात, छोड़ न ,.पर दादी ने पता है.... बताया कि...कि"
क्या ?"
"अब छोटा भइय्या आयेगा हमारे घर "

Thursday, February 25, 2010

ये क्या गड़बड़झाला है...


ज्योति नंदा
'माय नेम इज खान' के रिलीज़ के एक हफ्ते बाद दर्शकों की प्रतिक्रिया स्वरुप एक अखबार में ३ स्टार दिए गए, जबकि पूरे मीडिया फिल्म आलोचकों ने इसे 5 या 4 स्टार से अलंकृत किया था. एक आम दर्शक की भाँति ही मुझे भी समझ में नहीं आया कि ऐसा इस फिल्म में क्या नवीन और अद्भुत है,जो अब से पहले कभी नहीं कहा और दिखाया गया. यदि इस फिल्म से अमेरिकी परिवेश और नज़रिया हटा दिया जाय तो यह एक औसत दर्जे की फिल्म है.

आम आदमी द्वारा आतंकवाद की पीड़ा को भोगे जाने पर हिंदी सिनेमा में ढेरों कहानियां बनायीं हैं,जो माय नेम इज खान से कहीं बेहतर और सशक्त हैं. अच्छा इन्सान बुरा इन्सान, बुरे पर अच्छे की जीत, नेकी बदी हमारी संस्कृति में यह बातें मिटटी की खुशबू की तरह घुली हुई हैं. 1947 से हम यही कहते चले आ रहे हैं.ज्यादा पीछे जाने की जरुरत नहीं है. पिछले साल आई अ वेडनेसडे कहीं ज्यादा सशक्त फिल्म है, जो बयां करती है हर उस इन्सान के दर्द को जो किसी भी मज़हब का है और बन रहा है शिकार कुछ बुरे लोगो के वहशीपन का.

नंदिता दास के निर्देशन में बनी फिल्म फिराक इस लिहाज़ से बेहतरीन फिल्म है, जो डील करती है गुजरात में हुए दंगो के बाद के बदले हुए सामजिक ताने-बाने से.इसमें एक माँ है, जो सबकी नज़र से बचा कर दंगों में अनाथ हुए मुस्लिम बच्चे को अपने घर में पनाह देती है. मध्यम वर्गीय दंपत्ति हैं-बिलकुल रिजवान खान और मंदिरा की तरह जो कभी अपनी पहचान छुपाते नज़र आते है तो कभी हालात से लड़ने की हिम्मत जुटाते हुए दिखते हैं.

रिजवान खान कहता है कि सिर्फ उसके नाम की वजह से उससे नफरत मत करो.यह सन्देश अमेरिका के लिए ही हो सकता है.जो 9/11 के बाद इतनी नफरत उगल रहा है कि पूरी दुनिया इसमें जल रही है. हमारे लिए मुसलमानों से नफरत कर पाना इतना आसान और सीधा नहीं है.हम शताब्दियों से मिलजुल कर रहे हैं. आज भी दिवाली और ईद एक ही महीने में मानते है. 1992 के मुंबई धमाके से दहल गयी दुनिया लेकिन तारीख नहीं बदली. तारीख तब इतिहास बनी जब अमेरिका ने आतंकवाद का स्वाद चखा.अमेरिका के नजरिये से आहत खान सच्चाई का रास्ता नहीं छोड़ता. तूफ़ान में फंसे अमेरिकियों की मदद करने पहुँच जाता है.भारत में जब जब साम्प्रदायिकता की आग भड़की है, तब तब मानवीय संवेदनाओं को जगाने और झकझोरने वाले कितने उदाहरण मिलते हैं, जो कितनी भी नफरत हो अच्छे का साथ नहीं छोड़ते. हम ऐसे किस्सों से रोज़ दो चार होते है.खान कुछ भी अनूठा नहीं करता. कहने का अर्थ यह नहीं कि उसे ऐसा नहीं करना चाहिए. किसी फिल्म में ऐसे मोड़ परिस्थितियां पहली बार नहीं है.यह एक घिसीपिटी सिचुएशन है.

किसी एक का नजरिया पूरी दुनिया की सोच कैसे बन सकती है.उसे अन्तरराष्ट्रीय नजरिया और फिल्म भी करार दिया गया है.अन्तरराष्ट्रीय होने का पैमाना यही रह गया है.अमेरिका में जाकर फिल्म बनाएं, उनके राष्ट्रपति की तारीफ़ कीजिये.जबकि सही मायनों में 9/11 के बाद कोई फिल्म इस्लाम को सही ढंग से समझने की कोशिश करती है तो वह है पाकिस्तानी फिल्म खुदा के लिए.खान अपने धर्म को गलत अर्थो में समझने पर एक दृश्य में बयां करता है.खुदा के लिए न सिर्फ अमेरिकी ज्यादतियों को दर्शाती है बल्कि पढ़े लिख मुस्लिम नौजवानों को किस तरह बहकाया जाता है, इस पर भी रौशनी डालती है.खान की भाभी अपमानित होने पर कहती है कि हिजाब उसका वजूद है. इस संवाद का क्या मतलब है. इस्लाम में हिजाब ही औरत का वजूद है. जबकि खुदा के लिए की नायिका अपने हक के लिए पूरे कट्टरपंथी समाज से लड़ जाती है.कानूनी लड़ाई में हदीस की आयतों का एक ज़हीन मौलाना द्वारा सही इन्टरपिटेशन कर झूठे बदनियतों को मुंहतोड़ जवाब देती है.

माय नेम इज खान देखने के बाद ज़हन में रह जाता है एक माँ का दर्द और औटिस्टिक खान की मासूमियत.जो अपनी इमानदारी से कभी हंसाता है रुलाता और अचंभित भी करता है,जो खुद इन सारे भावों को व्यक्त नहीं कर पाता.और यही रोमांटिसिज्म शायद शाहरुख़ खान के फैन को भाता है. लेकिन इस बार मीडिया भी शाहरुख़ के मोहपाश में बंधा नज़र आता है.